इतिहास के पाठ
348 पाठ
- 1450 के बाद का विश्व इतिहास: समाज कैसे मिले, लड़े और बदले – 1450 के बाद बेहतर जहाज़, कम्पास और छपाई, और मसालों, चाँदी व नए व्यापार मार्गों की तलाश ने समाजों को पास ला दिया। संपर्क से फ़सलें, पशु और विचार आए-गए, पर बीमारियाँ, विजय और क्रूर अटलांटिक दास व्यापार भी आए। बारूदी साम्राज्यों और धार्मिक बँटवारे से नए युद्ध हुए। 1776 से अमेरिका, फ़्रांस, हैती और लैटिन अमेरिका की क्रांतियों ने अधिकार और स्वशासन के विचार फैलाए, और भारत के 1857 जैसे विद्रोहों ने औपनिवेशिक शासन को चुनौती दी। 1800 के दशक में सुधार आंदोलनों ने दास प्रथा, बाल श्रम और अन्यायपूर्ण क़ानूनों का विरोध किया, और महिलाओं को पढ़ाई, संपत्ति के अधिकार और वोट मिलने लगे।
- 1500 तक विश्व इतिहास: सभ्यताओं ने कैसे सहयोग किया, लड़े और सीखा – 1500 से पहले समाज दो तरह से बढ़े: सहयोग (व्यापार, साझा काम, गठबंधन) से और संघर्ष (ज़मीन, पानी और व्यापार मार्गों के लिए युद्ध) से। कोई सभ्यता तब स्थिर रहती थी जब उसके पास अतिरिक्त अनाज, क़ानून, साझा आस्था, शिक्षा और मज़बूत रक्षा होती थी। ताक़तवर राज्य विदेश नीति चुनते थे: व्यापार, गठबंधन, नज़राना या युद्ध। विजय से नए शासक, कर और विचार आते थे। काग़ज़, अंक 0-9 और कम्पास जैसे आविष्कार एक समाज से दूसरे में गए और रास्ते में बेहतर होते गए।
- 16वीं सदी के रूस का समाज और उसके लोग – 1500 के दशक में रूसी राज्य समूहों की सीढ़ी था: ज़ार, बोयार, सेना की सेवा के बदले ज़मीन रखने वाले सेवा-कुलीन, नगरवासी, और किसान जो धीरे-धीरे ज़मीन से बँध रहे थे। यह कई समुदायों का राज्य भी था। 1552 और 1556 में वोल्गा की ज़मीनें जुड़ने और 1580 के दशक से साइबेरिया खुलने के बाद तातार, बश्किर, चुवाश, मारी और कई अन्य लोग रूसियों के साथ अपनी रीतियों समेत रहे, और कज़ाक किनारों की रखवाली करते थे।
- 16वीं सदी के रूस की संस्कृति: इमारतें और किताबें – 16वीं सदी के रूस ने अपनी निर्माण-शैली विकसित की: तंबूनुमा छत वाले पत्थर के गिरजे, जैसे कोलोमेन्स्कोये का आरोहण गिरजा (1532), और रेड स्क्वायर पर नौ चैपल वाला गिरजा, जिसे आज सेंट बेसिल का गिरजा कहते हैं (1555 से 1561), जो कज़ान पर विजय के बाद बना। राजमिस्त्रियों ने मज़बूत दीवारें और क़िले बनाए और धातुकारों ने विशाल तोपें ढालीं। 1564 में इवान फ़्योदोरोव और प्योत्र मस्तिस्लावेत्स ने मॉस्को में पहली तिथि वाली रूसी किताब, अपोस्तोल, छापी। इतिवृत्त, महान मेनायोन-वाचन और डोमोस्त्रोई उस समय के पठन और विचारों को दिखाते हैं।
- 16वीं सदी में रूस की विदेश नीति – इवान IV के समय रूस ने कज़ान ख़ानत (1552) और आस्त्राख़ान ख़ानत (1556) ले ली, जिससे पूरी वोल्गा नदी रूसी व्यापार के लिए खुल गई। फिर रूस ने बाल्टिक बंदरगाह के लिए लिवोनियाई युद्ध (1558–1583) लड़ा, पर ताक़तवर पड़ोसी भी कूद पड़े और रूस को बंदरगाह नहीं मिला।
- 17वीं सदी के रूस में समाज और सत्ता – 1600 के दशक में रूसी समाज परतों में बँटा था: ज़ार, बोयार और पादरी, सेवा-कुलीन, नगरवासी और किसान। 1649 के क़ानून-संग्रह (सोबोर्नोये उलोज़ेनिये) ने, जो ज़ार अलेक्सेई मिखाइलोविच के समय ज़ेम्स्की सोबोर ने पास किया, किसानों को हमेशा के लिए ज़मीन से और नगरवासियों को उनकी बस्ती से बाँध दिया। ज़ेम्स्की सोबोर (देश की परिषदें) कम बैठे और आख़िरी 1684 में बैठा, जबकि ज़ार और उसके दफ़्तर अकेले शासन करने लगे: निरंकुशता मज़बूत हुई।
- 17वीं सदी में रूस की अर्थव्यवस्था – 1600 के दशक में ज़्यादातर रूसी किसान थे, पर व्यापार और उद्योग बढ़ रहे थे। मकारियेव जैसे बड़े मेलों में कई इलाक़ों के व्यापारी जुटते थे। पहली मैन्युफ़ैक्टरी (बड़ी कार्यशालाएँ) लोहा, कपड़ा और हथियार बनाती थीं। 1653 के व्यापार-अधिनियम ने कई छोटे शुल्कों की जगह एक 5 प्रतिशत का शुल्क रखा, और 1667 के नए अधिनियम ने रूसी व्यापारियों को विदेशी व्यापारियों से बचाया।
- 17वीं सदी में रूस की विदेश नीति – संकट-काल के बाद रूस ने पहले ज़मीन खोई: स्वीडन ने बाल्टिक तट रखा (स्टोलबोवो, 1617) और पोलैंड-लिथुआनिया ने स्मोलेंस्क (देउलिनो, 1618; पोल्यानोव्का, 1634)। 1654 में वाम-तट यूक्रेन ज़ार के साथ आया, फिर पोलैंड से लंबा युद्ध रूस के पक्ष में ख़त्म हुआ: 1667 में अंद्रुसोवो पर स्मोलेंस्क और वाम-तट यूक्रेन, और 1686 में कीव हमेशा के लिए। स्वीडन से 1656–58 के युद्ध में कुछ नहीं मिला, और ऑटोमन व क्रीमिया के युद्ध युद्धविराम और विफल अभियानों (1687, 1689) पर ख़त्म हुए।
- 17वीं सदी में रूस की संस्कृति – 1600 के दशक में रूसी संस्कृति की जड़ें चर्च में रहीं पर वह ज़्यादा सांसारिक हुई। गिरजों को तंबू-छत और चटक सजावट मिली; साइमन उशाकोव जैसे इकन-चित्रकारों ने असली चेहरे और छाया-रोशनी दिखाई, और पहले चित्र-पोर्ट्रेट आए। छपाई फैली: पहली वर्णमाला-पुस्तक 1634 में आई। नया लेखन आया, जैसे आर्कप्रीस्ट अवाकुम की जीवनी, हास्य-व्यंग्य, शिमोन पोलोत्स्की की कविता और दरबारी रंगमंच (1672)। स्कूल बढ़े और 1687 में स्लाविक-यूनानी-लैटिन अकादमी खुली।
- 1815 के बाद का यूरोप: वियना कांग्रेस और औद्योगिक क्रांति – नेपोलियन की हार के बाद बड़ी ताक़तें वियना कांग्रेस (1814-15) में मिलीं ताकि यूरोप को फिर से बसाया जा सके। ऑस्ट्रिया, रूस, प्रशिया, ब्रिटेन और फ़्रांस शांति चाहते थे, इसलिए उन्होंने शक्ति-संतुलन रखा: कोई देश इतना ताक़तवर न हो कि सब पर राज करे। पुराने राजघराने अपनी गद्दी पर लौटे। फ़्रांस को छोटा किया गया। पोलैंड की ज़मीन फिर बाँटी गई: पश्चिम (पोज़नान) प्रशिया के पास रहा, दक्षिण (गैलिसिया) ऑस्ट्रिया के पास, और बीच का ज़्यादातर हिस्सा रूस को मिला, जो रूसी ज़ार के राजा होने के साथ छोटा पोलैंड राज्य बना। क्राकूफ़ एक छोटा स्वतंत्र शहर बना। उसी समय एक और बड़ा बदलाव फैल रहा था: औद्योगिक क्रांति। नई मशीनों (कताई मशीन, भाप का इंजन, रेल) ने काम को घरों और खेतों से निकालकर फ़ैक्टरियों में पहुँचा दिया। उद्योग सबसे पहले वहाँ बढ़ा जहाँ कोयला और लोहा पास थे, जैसे ब्रिटेन, बेल्जियम और बाद में रूर, सिलेसिया और वुज़। इससे दो नए वर्ग बने: अमीर फ़ैक्टरी मालिक और भीड़ भरे शहरों में रहने वाले मज़दूर।
- 18वीं सदी की यूरोपीय संस्कृति – 1700 के दशक में यूरोप की संस्कृति तीन धाराओं में बढ़ी। विज्ञान ने देखने और परखने पर भरोसा किया (न्यूटन, लिनियस, फ्रैंकलिन, जेनर)। कला और संगीत भव्य बैरोक से हल्के रोकोको और सादी शास्त्रीय शैली की ओर गए (बाख़, हैंडल, हेडन, मोज़ार्ट)। रोज़मर्रा का जीवन कॉफ़ी-घरों, सैलूनों, अख़बारों और उपन्यासों से बदला, जिन्होंने नए विचार तेज़ी से फैलाए।
- 18वीं सदी के उत्तरार्ध में रूस की अर्थव्यवस्था – 1762 से 1796 तक रूसी साम्राज्य की जनसंख्या लगभग 1.9 करोड़ से बढ़कर लगभग 3.6 करोड़ हो गई, जिसमें नए इलाक़ों का भी योगदान था। लगभग सभी लोग खेती करते थे। भूदास प्रथा और भारी हुई: ज़मींदार काम के दिन (बारशचिना) या पैसे (ओब्रोक) लेते थे, भूदासों को दूर भेज सकते थे (1760), और भूदास शिकायत नहीं कर सकते थे (1767)। काली मिट्टी वाले दक्षिण और काला सागर के नए तटों से अनाज का निर्यात बढ़ा। उराल में लोहा बनता था जो विदेश बिकता था और जिसमें बहुत से भूदास मज़दूर लगे थे, और 1775 में लोग खुलकर कारख़ाना खोल सकते थे। भीतरी चुंगी 1753 में ख़त्म हुई, मेले बढ़े, और 1769 में राज्य ने पहली काग़ज़ी मुद्रा, असिग्नाट, जारी की।
- 18वीं सदी में रूस की संस्कृति – 1700 के दशक में रूस ने ज्ञानोदय के विचार अपनाए: तर्क और शिक्षा में विश्वास। कैथरीन द्वितीय ने उनकी प्रशंसा की और नोविकोव तथा रादिश्चेव जैसे लेखकों ने उन्हीं से भूदास प्रथा की आलोचना की। स्कूल और संस्थान खुले: विज्ञान अकादमी (1725), मॉस्को विश्वविद्यालय (1755), कला अकादमी (1757), लड़कियों के लिए स्मोल्नी संस्थान (1764) और जन-विद्यालय (1786)। मिखाइल लोमोनोसोव ने विज्ञान, कविता और व्याकरण पर काम किया और 1761 में देखा कि शुक्र का वायुमंडल है। इमारतें बारोक (रास्त्रेल्ली का शीत महल) से शास्त्रीय शैली (स्तंभ और तिकोनी छतें) की ओर गईं। रोकोतोव, लेवित्स्की और बोरोविकोव्स्की जैसे चित्रकारों ने चित्र बनाए और फ़ाल्कोने ने कांस्य घुड़सवार बनाया (1782)। पहला सार्वजनिक रंगमंच 1756 में खुला और फ़ोन्विज़िन की द माइनर (1782) जैसे नाटकों ने बुरे व्यवहार पर लोगों को हँसाया।
- 18वीं सदी में रूस के लोग और राज्य की नीति – 1700 के दशक में रूसी साम्राज्य इतना बढ़ा कि उसमें कई लोग आ गए: रूसी और यूक्रेनी, वोल्गा के तातार, बश्कीर, चुवाश और मारी, कल्मीक, साइबेरिया के लोग, बाल्टिक लोग और पोलैंड के बँटवारे के बाद बेलारूसी, लिथुआनियाई और बहुत से यहूदी। राज्य सब जगह एक जैसा बर्ताव नहीं करता था। उसने यूक्रेन का स्वशासन ख़त्म किया (1764 में हेतमान का पद, 1775 में ज़ापोरोज़ियन सिच), बाल्टिक कुलीनों को कुछ समय अधिकार रखने दिए, और साइबेरिया के लोगों से यासाक, यानी फ़र का कर, लिया। 1773 के आदेश ने सभी धर्मों की अनुमति दी और 1788 में ऊफ़ा में मुस्लिम धार्मिक सभा बनी। राज्य ने विदेशी बसने वालों को भी बुलाया (1763) और 1791 में यहूदी व्यापारियों के लिए बस्ती-सीमा तय की। बश्कीर जैसे कुछ लोगों ने ज़मीन खोई, और पुगाचेव युद्ध ने उनका ग़ुस्सा दिखाया।
- 1900 के बाद विश्व इतिहास: वैश्विक और क्षेत्रीय संबंध – 1900 में कुछ साम्राज्य दुनिया के बड़े हिस्से पर राज करते थे। दो विश्व युद्धों, महामंदी और तानाशाहों के उदय ने वह व्यवस्था तोड़ दी। 1945 के बाद संयुक्त राष्ट्र बना, अमेरिका और सोवियत संघ ने शीत युद्ध में होड़ की, और भारत समेत 100 से ज़्यादा उपनिवेश आज़ाद राष्ट्र बने। 1991 के बाद व्यापार, इंटरनेट और प्रवास से दुनिया ज़्यादा जुड़ी, पर क्षेत्रीय संघर्ष और साझी समस्याएँ अब भी देशों के सहयोग की माँग करती हैं।
- 1911 की क्रांति: वूचांग से गणराज्य तक – 10 अक्तूबर 1911 को वूचांग में सैनिकों ने विद्रोह किया। कुछ ही हफ़्तों में एक दर्जन से ज़्यादा प्रांत छिंग शासन से अलग हो गए। 1 जनवरी 1912 को सुन यात-सेन के अस्थायी राष्ट्रपतित्व में चीन गणराज्य शुरू हुआ, और 12 फरवरी 1912 को बाल सम्राट पूयी ने गद्दी छोड़ी, जिससे 2,000 से ज़्यादा साल का शाही शासन ख़त्म हुआ। पर नया गणराज्य कमज़ोर था।
- 1917 की रूसी क्रांति: फ़रवरी और अक्टूबर – 1917 में रूस में दो क्रांतियाँ हुईं। फ़रवरी (हमारे कैलेंडर से मार्च) में पेत्रोग्राद की हड़तालों और सैनिक विद्रोह से ज़ार निकोलस द्वितीय का शासन ख़त्म हुआ और दोहरी सत्ता बनी: अस्थायी सरकार और पेत्रोग्राद सोवियत। अक्टूबर (नवंबर) में लेनिन के नेतृत्व में बोल्शेविकों ने सत्ता ली, शांति और भूमि के आदेश दिए और नई सरकार बनाई। चुनी हुई संविधान सभा जनवरी 1918 में एक बार बैठी और बंद कर दी गई।
- 1930 के दशक का सोवियत यूक्रेन और होलोडोमोर – 1930 के दशक में स्टालिन के नेतृत्व वाले सोवियत शासन ने बहुत तेज़ी से कारख़ाने बनाए और निजी खेतों को सामूहिक खेतों में मिला दिया। उसने गाँवों से इतना अनाज माँगा जितना वे दे नहीं सकते थे। 1932-33 में यूक्रेन में इंसानों के बनाए अकाल, होलोडोमोर, में अनुमानतः 3.5 से 5 मिलियन लोग मरे। यूक्रेन और कई अन्य देश इसे नरसंहार मानते हैं। इतिहासकार मानते हैं कि इसका कारण राज्य की नीतियाँ थीं। 1937-38 के महान आतंक ने "मार दिए गए पुनर्जागरण" के यूक्रेनी लेखकों और विचारकों को निशाना बनाया। भाषा, चर्च और रोज़मर्रा का जीवन भी कड़े नियंत्रण में आ गए।
- 1930 के दशक के अंतरराष्ट्रीय संबंध: आक्रमण और तुष्टीकरण – 1930 के दशक में कई देशों ने बल से अपनी चाही चीज़ें ले लीं: जापान ने मंचूरिया (1931) और चीन (1937) में, इटली ने इथियोपिया (1935) में, जर्मनी ने राइनलैंड (1936), ऑस्ट्रिया (1938) और चेकोस्लोवाकिया (1938–39) में। राष्ट्र संघ केवल विरोध कर सका। ब्रिटेन और फ़्रांस ने तुष्टीकरण की नीति अपनाई, यानी युद्ध टालने के लिए झुक गए; म्यूनिख समझौते (सितंबर 1938) में उन्होंने जर्मनी को सुडेटनलैंड लेने दिया। यह काम नहीं आया: जर्मनी ने 1 सितंबर 1939 को पोलैंड पर हमला किया और दूसरा विश्व युद्ध शुरू हो गया।
- 1930 के दशक में सोवियत संघ की राजनीति और समाज – 1936 के संविधान ने बराबर वोट और अधिकारों का वादा किया, पर पार्टी सबका नेतृत्व करती थी और चुनाव में एक ही सूची होती थी। 1934 में किरोव की हत्या के बाद दिखावटी मुक़दमे और 1937-38 का महा आतंक आया: लगभग 15 लाख गिरफ़्तार और लगभग 6.8 लाख को गोली। संस्कृति राज्य की सेवा में थी (समाजवादी यथार्थवाद), फिर भी साक्षरता बहुत बढ़ी। विदेश नीति में 1934 में राष्ट्र संघ, 1935 की संधियाँ, 1938 के म्यूनिख़ में बाहर रखा जाना, फिर 1939 का नाज़ी-सोवियत समझौता।
- 1945 के बाद अमेरिका और पश्चिमी यूरोप – 1945 के बाद पश्चिमी यूरोप ने अमेरिकी मदद (मार्शल योजना) से पुनर्निर्माण किया और 1973 तक तेज़ी से बढ़ा। ऊँचे वेतन, उधार और बड़े पैमाने के उत्पादन से उपभोक्ता समाज बना; राज्य ने कल्याण की व्यवस्थाएँ बनाईं; यूरोपीय देश धीरे-धीरे जुड़कर आज का यूरोपीय संघ बने। 1973 के तेल झटके से तेज़ी थमी, और 1970 के दशक से कंप्यूटर और इंटरनेट ने सूचना क्रांति शुरू की।
- 1945 के बाद इटली: पुनर्निर्माण, उछाल, सुधार और संकट – 1945 में युद्ध और तानाशाही के बाद इटली खंडहर था। 1946 में लोगों ने जनमत-संग्रह से गणराज्य चुना और 1948 में नया संविधान शुरू हुआ। मार्शल योजना की मदद और कड़ी मेहनत से लगभग 1950 से 1963 तक आर्थिक उछाल आया: कारख़ाने बढ़े, शहर भरे और लाखों लोग ग़रीब दक्षिण से औद्योगिक उत्तर गए। 1960 के दशक के अंत के आंदोलनों से सुधार हुए, जैसे सबके लिए एक मिडिल स्कूल, मज़बूत श्रमिक अधिकार, क्षेत्रीय सरकारें, तलाक़ क़ानून और राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा। उन्हीं सालों में छोटे उग्र समूहों का आतंकवाद भी आया: 1969 में मिलान, 1978 में मोरो की हत्या और 1980 में बोलोन्या। 1990 के शुरू में "साफ़ हाथ" जाँच ने तांजेंतोपोली नाम की रिश्वत-व्यवस्था खोली और पुरानी बड़ी पार्टियाँ गिर गईं। फिर इटली नए राजनीतिक दौर में पहुँचा।
- 1945 के बाद एशिया: चीन, भारत, कोरिया, वियतनाम और जापान – पाँच देशों ने 1945 के आसपास नया जीवन शुरू किया। चीन 1949 में जनवादी गणराज्य बना और 1978 में बाज़ार की ओर मुड़ा। भारत 1947–50 में लोकतंत्र बना और 1991 में अर्थव्यवस्था खोली। कोरिया 1945 में बँटा और आज भी दो राज्य हैं। वियतनाम ने आज़ादी पाई, 1954 में बँटा और 1975 में फिर एक हुआ। जापान ने हार के बाद शांति संविधान लिखा और 1990 के दशक तक बहुत तेज़ी से बढ़ा।
- 1945 के बाद दुनिया के बदलाव: समाज, आस्था और संस्कृति – 1945 के बाद दुनिया ने फिर से निर्माण किया, शहर बढ़े और जन-संस्कृति फैली। 1960 के दशक में छात्रों और युवाओं ने अपनी आवाज़ माँगी, और नई आज़ादियों ने परिवार और महिलाओं की भूमिका बदली। चर्च ने दूसरी वैटिकन परिषद करके संवाद का रास्ता खोला, इस्लाम का सार्वजनिक असर बढ़ा, खेल विश्व का तमाशा बना, और परमाणु हथियार व जलवायु बदलाव जैसे नए ख़तरे आए।
- 1945 के बाद मध्य और पूर्वी यूरोप – 1945 के बाद सोवियत सेना यूरोप के पूर्व में थी। 1946 से 1949 के बीच पोलैंड, हंगरी, चेकोस्लोवाकिया, रोमानिया, बुल्गारिया, अल्बानिया और पूर्वी जर्मनी में साम्यवादी दलों ने सत्ता ले ली। राज्य अर्थव्यवस्था की योजना बनाता था और एक दल शासन करता था। 1956 और 1968 के विद्रोह दबा दिए गए, पर पोलैंड में सॉलिडैरिटी (1980) बढ़ती गई। 1989 में सोवियत संघ ने बल प्रयोग बंद किया और कुछ ही महीनों में एक दल का शासन गिर गया। फिर नए राज्य, स्वतंत्र चुनाव, बाज़ार और यूरोपीय संघ व नाटो की सदस्यता आई।
- 1945 के बाद मध्य पूर्व और अफ़्रीका – 1945 में अफ़्रीका का अधिकांश और मध्य पूर्व के कुछ हिस्से बाहर से शासित थे। उपनिवेशवाद के अंत ने इसे बदला: घाना (1957), 1960 में 17 देश, फिर बाकी। मध्य पूर्व के तेल ने 1960 (ओपेक) और 1973 के तेल झटके से क्षेत्र को नई ताकत दी। क्षेत्र में युद्ध और क्रांतियाँ भी हुईं, जैसे इज़राइल-फ़िलिस्तीन विवाद (1948 से) और ईरान की क्रांति (1979)। दक्षिण अफ़्रीका में रंगभेद मंडेला की रिहाई (1990) और 1994 के चुनाव से खत्म हुआ।
- 1990 के दशक का रूस: बाज़ार-सुधार, 1993 का संविधान और नया राज्य – स्वतंत्र रूस की शुरुआत 1992 में "शॉक थेरेपी" से हुई: क़ीमतें मुक्त हुईं, जिससे भारी महँगाई आई, और सरकारी कंपनियों का निजीकरण हुआ, पहले वाउचर से और फिर "शेयर के बदले क़र्ज़" से। 1993 में राष्ट्रपति येल्तसिन और संसद के टकराव का अंत नए संविधान (12 दिसंबर 1993) से हुआ, जिसने राष्ट्रपति को मज़बूत अधिकार दिए और दो सदनों की संसद बनाई। क्षेत्रों ने केंद्र से संधियाँ कीं, पर चेचन्या में दो युद्ध हुए। बहुतों के लिए रोज़ की ज़िंदगी कठिन रही, वेतन देर से मिले और 1998 में संकट आया, फिर भी नए सामान और आज़ादियाँ आईं। विदेश नीति में रूस ने सोवियत संघ की संयुक्त राष्ट्र सीट ली, CIS में रहा और नाटो तथा G8 के साथ काम किया।
- 19वीं सदी के नए विचार और जन-संस्कृति – 1800 के दशकों में चार बड़े राजनीतिक विचारों ने यूरोप और दुनिया को आकार दिया: उदारवाद (स्वतंत्रता और अधिकार), रूढ़िवाद (व्यवस्था और परंपरा), राष्ट्रवाद (राष्ट्र के प्रति निष्ठा) और समाजवाद (मज़दूरों के लिए न्याय)। साथ ही स्कूल, सस्ते अख़बार, रेलवे, शहर और बिजली की रोशनी ने करोड़ों आम लोगों तक ख़बरें, मनोरंजन और नई आदतें पहुँचाईं। यही जन-संस्कृति और आधुनिक रहन-सहन की शुरुआत है।
- 21वीं सदी का रूस (2000 से 2020 के दशक की शुरुआत तक) – 2000 के बाद रूस ने क्षेत्रों को संघीय ज़िलों में बाँटा, तेल-गैस निर्यात के सहारे 2008 तक तेज़ी से बढ़ा, 2009, 2015 और 2020 में गिरावट देखी, 2014 का शीतकालीन ओलंपिक और 2018 का विश्व कप कराया और SCO, BRICS और WTO जैसे समूहों से जुड़ा। 2014 से कई देशों से संबंध तनावपूर्ण हुए।
- अंतर्राष्ट्रीय संगठन और शांति की खोज – दो विश्व युद्धों के बाद राज्यों ने सामूहिक सुरक्षा (राष्ट्र संघ, फिर UN) से शांति रखने की कोशिश की। शीत युद्ध ने इसे कई बार रोका, और शस्त्र-नियंत्रण संधियों ने परमाणु हथियारों को सीमित करने का प्रयास किया।
- अटलांटिक दास व्यापार, विरोध और दासता का उन्मूलन – लगभग 1500 से 1860 के दशक तक यूरोपीय व्यापारी लगभग 1.25 करोड़ अफ़्रीकी लोगों को ज़बरदस्ती अटलांटिक महासागर पार अमेरिका महाद्वीप ले गए, जहाँ उनसे बिना मज़दूरी बागानों में काम कराया गया। इसने यूरोप, अफ़्रीका और अमेरिका को 'त्रिकोणीय व्यापार' में जोड़ा। दास क़ानून (slave codes) उन्हें संपत्ति मानते थे। ग़ुलाम बनाए लोगों ने रोज़ के छोटे विरोध से लेकर भाग निकलने, आज़ाद 'मरून' बस्तियों और हैती क्रांति जैसे विद्रोहों तक, हर तरह से विरोध किया। लंबे उन्मूलन आंदोलन ने पहले व्यापार और फिर दासता को 1794 से 1888 के बीच देश-दर-देश ख़त्म किया। नस्लवाद और असमानता जैसे इसके असर आज भी दिखते हैं।
- अधिकारियों का चयन और प्रबंधन – हर राज्य को अधिकारी चाहिए, इसलिए हर राज्य को तय करना होता है कि उन्हें कैसे चुनें और चलाएँ। हान चीन में सिफ़ारिश चलती थी, जिससे मित्रों और धनी परिवारों का पक्ष हो सकता था। सुई और तांग काल से शाही परीक्षाओं ने पढ़ सकने वाले हर व्यक्ति के लिए रास्ता खोला, जो 1905 में समाप्त हुईं। पश्चिम में लूट-प्रणाली में पद दल के समर्थकों को मिलते थे, और बाद में योग्यता-आधारित सिविल सेवाओं (ब्रिटेन में 1850 के दशक से, अमेरिका में 1883) ने परीक्षा से चयन किया। आधुनिक चीन खुली परीक्षा से सिविल सेवक भर्ती करता है और उन्हें परखकाल, मूल्यांकन, प्रशिक्षण व पदोन्नति से क़ानून के तहत चलाता है।
- अफ़ीम युद्ध: कारण, घटनाक्रम और असमान संधियाँ – 1800 के दशक की शुरुआत में ब्रिटेन चीन से बहुत चाय खरीदता था पर चीन को ब्रिटेन से कम चीज़ें चाहिए थीं, इसलिए ब्रिटिश व्यापारियों ने चाय का दाम चुकाने के लिए चोरी-छिपे अफ़ीम बेची। अफ़ीम ने बहुत लोगों को नुकसान पहुँचाया और चीन से चाँदी बाहर गई। 1839 की छिंग रोक के बाद पहला अफ़ीम युद्ध (1839-42) नानजिंग संधि पर खत्म हुआ। दूसरे अफ़ीम युद्ध (1856-60) से और असमान संधियाँ हुईं। चीन ने अपने व्यापार और बंदरगाहों पर नियंत्रण खो दिया और अर्ध-औपनिवेशिक हो गया।
- अमेरिका का इतिहास: 1791 से आज तक – अमेरिका 1790 में अटलांटिक तट पर 40 लाख लोगों का देश था; आज 33 करोड़ से ज़्यादा लोग हैं। इस सफ़र में मूल निवासियों की ज़मीन छिनी, दास-प्रथा पर गृहयुद्ध हुआ, आप्रवासियों की मेहनत से बड़ा औद्योगिक देश बना, महामंदी झेली और महाशक्ति बना। बार-बार पीछे छोड़े गए समूहों (मूल अमेरिकी, अश्वेत अमेरिकी, महिलाएँ, मज़दूर, आप्रवासी) ने बराबरी के लिए संघर्ष किया।
- अमेरिका में 1920 का दशक: 'रोअरिंग ट्वेंटीज़' – पहले विश्वयुद्ध के बाद अमेरिका में तेज़ तरक्की का दशक आया। असेंबली लाइन से कारें और घरेलू सामान सस्ते हुए, किस्तों पर ख़रीद और विज्ञापन फैले, और रेडियो व फ़िल्मों ने साझा जन-संस्कृति बनाई। जैज़, हार्लेम पुनर्जागरण और महान प्रवासन ने संगीत और शहर बदले, और 1920 में महिलाओं ने पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर वोट दिया। इसी दशक में तीखे टकराव भी थे: शराबबंदी से संगठित अपराध बढ़ा, प्रवासियों पर कोटा लगा, कू क्लक्स क्लान फिर बढ़ा, और स्कोप्स मुक़दमे में विज्ञान व धर्म टकराए। उछाल के नीचे किसान परेशान थे, धन बहुत असमान था और लोग उधार लेकर शेयर ख़रीद रहे थे — यही कमज़ोरियाँ 1929 के क्रैश तक ले गईं।
- अमेरिका में सुधार आंदोलन और प्रगतिशील युग – लगभग 1820 से 1920 के बीच अमेरिका के आम लोगों के समूहों ने समाज की समस्याएँ सुधारने का काम किया। शुरुआती सुधारक, जिन्हें एक धार्मिक जागरण (द्वितीय महान जागरण) से भी प्रेरणा मिली, मुफ़्त सरकारी स्कूल, नशाबंदी, कैदियों और मानसिक रोगियों की बेहतर देखभाल, दासता के अंत और महिला अधिकारों के लिए लड़े। गृहयुद्ध के बाद तेज़ औद्योगिक विकास से नई समस्याएँ आईं: असुरक्षित कारख़ाने, बाल मज़दूरी, भीड़ भरे शहर, एकाधिकार और भ्रष्ट राजनीति। प्रगतिशील सुधारकों और मकरेकर पत्रकारों ने इन्हें उजागर किया, और नए क़ानून व संविधान के चार संशोधन (16वाँ–19वाँ) आए।
- अमेरिकी क्रांति (1763–1791) – उत्तरी अमेरिका के अटलांटिक तट पर बसे 13 ब्रिटिश उपनिवेश ब्रिटेन से अलग हुए और संयुक्त राज्य अमेरिका बना। सात वर्षीय युद्ध (1756–63) के बाद ब्रिटेन भारी कर्ज़ में था और उसने नियंत्रण कसा: 1763 की घोषणा ने पश्चिम में बसने पर रोक लगाई, और नए कर (शुगर, स्टाम्प, टाउनशेंड, चाय क़ानून) उस संसद ने लगाए जिसमें उपनिवेशों का कोई सदस्य नहीं था। उपनिवेशियों ने "प्रतिनिधित्व नहीं तो कर नहीं" का नारा दिया, बहिष्कार किए, और बोस्टन टी पार्टी हुई। ब्रिटेन ने दमनकारी क़ानून लगाए और 1775 में लेक्सिंगटन और कॉनकॉर्ड में लड़ाई शुरू हुई। प्राकृतिक अधिकार और जनता की सहमति से सरकार जैसे प्रबोधन विचार, और थॉमस पेन की कॉमन सेंस, 4 जुलाई 1776 की स्वतंत्रता की घोषणा तक ले गए। फ़्रांस, स्पेन और डच गणराज्य की मदद से जॉर्ज वॉशिंगटन की सेना साराटोगा और यॉर्कटाउन में जीती, और पेरिस संधि (1783) ने स्वतंत्रता मानी। कमज़ोर परिसंघ के अनुच्छेदों की जगह 1787 का संविधान आया: शक्तियों का बँटवारा, नियंत्रण और संतुलन, संघवाद, और अधिकार पत्र (1791)। क्रांति ने दूसरों को प्रेरित किया, पर अधिकार सीमित रहे: दासता जारी रही, मूल निवासियों ने ज़मीन खोई और महिलाओं को वोट नहीं मिला।
- अमेरिकी गृहयुद्ध और पुनर्निर्माण (1845–1877) – 1845 से 1877 के बीच संयुक्त राज्य अमेरिका पश्चिम की ओर फैला, गुलामी (दास प्रथा) के सवाल पर बँटा, गृहयुद्ध लड़ा और फिर खुद को दोबारा जोड़ने की कोशिश की। उत्तर में कारखाने और वेतन पाने वाले मज़दूर थे; दक्षिण लगभग 40 लाख गुलाम लोगों से कपास उगवाता था। नई पश्चिमी ज़मीन पर बार-बार एक ही सवाल उठा: नए राज्यों में गुलामी होगी या नहीं? 1820 और 1850 के समझौते टूट गए, और 1860 में अब्राहम लिंकन के चुनाव के बाद 11 दक्षिणी राज्य संघ से अलग हो गए। युद्ध (1861–65) में लगभग 6.2 लाख सैनिक मारे गए। ज़्यादा लोग, कारखाने और रेल होने से उत्तर जीता, और 13वें संशोधन ने गुलामी खत्म की। पुनर्निर्माण (1865–77) में अश्वेत पुरुषों को नागरिकता और वोट मिला, पर 1877 में संघीय सेना हटते ही लगभग सौ साल के लिए कई अधिकार छिन गए।
- अलेक्ज़ेंडर द्वितीय के महान सुधार (1861-1874) – क्रीमिया युद्ध में हार के बाद अलेक्ज़ेंडर द्वितीय ने राज्य को बदला। 19 फ़रवरी (3 मार्च) 1861 को दास-प्रथा ख़त्म हुई: किसान आज़ाद इंसान बने, पर ज़मीन की क़ीमत उन्हें 49 साल में चुकानी थी। 1864 में ज़ेमस्त्वो (चुनी हुई स्थानीय परिषदें) और 1870 में शहर परिषदें बनीं। 1864 में नई अदालतों ने बराबरी, खुली सुनवाई, वकील और जूरी दी। 1874 में सब वर्गों के लिए छह साल की सेना-सेवा आई, और स्कूल-विश्वविद्यालय खुले। सुधारों ने रूस को आधुनिक बनाया, पर ज़ार की पूरी सत्ता बनी रही और किसानों की कई समस्याएँ रहीं।
- आज की दुनिया के संघर्ष: कारण, कीमत और शांति की खोज – 1989–91 में शीत युद्ध खत्म होने के बाद दुनिया दो महाशक्तियों से कई शक्ति केंद्रों की ओर गई। आज के संघर्षों में राज्यों के बीच युद्ध, गृहयुद्ध, आतंकवाद और हाइब्रिड या साइबर हमले शामिल हैं। इनके कारण संसाधन, पहचान, ज़मीन, कमज़ोर राज्य और बाहरी ताकतें मिलकर बनते हैं। सबसे बड़ी कीमत आम लोग चुकाते हैं, इसलिए दुनिया कूटनीति, संयुक्त राष्ट्र शांति सेना और अंतरराष्ट्रीय अदालतों से युद्ध रोकने और सबसे बुरे अपराधों को सज़ा देने की कोशिश करती है।
- आज की समस्या की खोज: विषय चुनो, स्रोत जाँचो, टिकाऊ भविष्य सोचो – जलवायु, बुढ़ापा, असमानता या संघर्ष जैसी आज की समस्या को समझने के लिए: विषय चुनो, उसे एक साफ़ सवाल बनाओ, प्राथमिक और बाद के स्रोत इकट्ठा करो, हर स्रोत जाँचो (किसने, कब, क्यों), अतीत से कारण खोजो, और आख़िर में ऐसा सुझाव दो जिसमें लोग, अर्थव्यवस्था और प्रकृति तीनों संतुलित रहें।
- आज के मुद्दे: आज की दुनिया को 1914-1945 तक खोजना – आज की बहुत-सी समस्याओं और उम्मीदों की जड़ें 1914-1945 के सालों में हैं: दो विश्व युद्ध, जन-राजनीति, विश्व आर्थिक संकट और पहले विश्व संगठन। इतिहासकार आज के मुद्दे को खोजते हैं यह पूछकर कि वह क्या है, कब शुरू हुआ और किन घटनाओं ने उसे बदला। दो बड़े विषय बार-बार आते हैं। एकीकरण बनाम बँटवारा: राष्ट्र संघ (1920), संयुक्त राष्ट्र (1945), व्यापार नियम और बाद में यूरोपीय संघ ने देशों को जोड़ा, जबकि राष्ट्रवाद, प्रतिद्वंद्वी गुट और व्यापार की दीवारों ने अलग किया। टकराव बनाम सहयोग: एक तरफ़ युद्ध, परमाणु हथियार और हथियारों की होड़, दूसरी तरफ़ संधियाँ, शांति-वार्ता और साझा नियम। इस पाठ की चार कड़ियाँ (परमाणु हथियार, महिलाओं के अधिकार, देशों का सहयोग, व्यापार और संकट) दिखाती हैं कि अतीत वर्तमान को कैसे समझाता है, और कहानी का कोई सरल अंत क्यों नहीं।
- आत्म-सशक्तीकरण आंदोलन और सीमांत संकट (1861-1895) – अफ़ीम युद्धों और ताइपिंग युद्ध के बाद ज़ेंग गुओफ़ान, ली होंगज़ांग और ज़ुओ ज़ोंगतांग जैसे कुछ छिंग अधिकारियों ने कहा कि चीन को पश्चिम के औज़ार अपनाने चाहिए पर अपने मूल्य बनाए रखने चाहिए। 1860 के दशक से उन्होंने शस्त्रागार, जहाज़-घाट, भाषा-विद्यालय, एक भाप-जहाज़ कंपनी, खदानें और तार लाइनें बनाईं और आधुनिक नौसेना खड़ी की। साथ ही चीन की सीमाओं पर संकट आए: पश्चिम में इली, ताइवान और र्यूक्यू द्वीप, वियतनाम और कोरिया। सेना ने ज़्यादातर शिनजियांग वापस ले लिया, पर चीन ने र्यूक्यू, वियतनाम और कोरिया में प्रभाव खोया। 1894-95 में वह जापान से युद्ध और अपना बेयांग बेड़ा हार गया, और माना गया कि आंदोलन लक्ष्य से चूक गया। उसके असली लाभ भी थे (पहला आधुनिक उद्योग और स्कूल), पर धन कम था, एक योजना नहीं थी और पुरानी व्यवस्था नहीं बदली।
- आधुनिक अमेरिका का इतिहास: 1865 से आज तक – गृहयुद्ध के बाद अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी औद्योगिक अर्थव्यवस्था और फिर महाशक्ति बना। गिल्डेड एज (1865–1900) में रेल, कारखाने और करोड़ों प्रवासी आए, पर गहरी असमानता भी। पॉपुलिस्ट और प्रगतिशील लोगों (1890–1920) ने सुधार माँगे, और अमेरिका ने विदेशों में विस्तार किया और पहले विश्व युद्ध में उतरा। 1920 का उछाल 1929 की गिरावट और महामंदी में बदला; रूज़वेल्ट की न्यू डील और दूसरे विश्व युद्ध ने अर्थव्यवस्था संभाली। 1945 के बाद ज़्यादातर अमेरिकी अमीर हुए, नागरिक अधिकार आंदोलन ने अलगाव से लड़ाई की, देश ने शीत युद्ध में एक गुट का नेतृत्व किया, और वियतनाम व वॉटरगेट ने जनता का भरोसा हिलाया। 1980 के बाद रीगन की रूढ़िवादी नीतियाँ, शीत युद्ध का अंत, इंटरनेट अर्थव्यवस्था, नया प्रवास, 9/11 और 2008 का संकट आज का अमेरिका बनाते हैं। पूरे दौर को समझने का एक सवाल: मौका किसे मिला, और असमानता किसने झेली?
- आधुनिक और समकालीन जापान के मोड़ – आधुनिक जापान में चार बड़े मोड़ हैं: मेइजी बहाली और संविधान (1868-1890), सभ्यता और औद्योगिक विकास, मंदी, सैन्यवाद और युद्ध (1929-1945), और क़ब्ज़ा-काल के सुधार जिन्होंने युद्धोत्तर जापान गढ़ा (1945-1952)।
- आधुनिक काल की ओर: जापान का खुलना और शोगुन व्यवस्था का अंत – 1800 के आसपास जापान कुछ ही द्वारों से व्यापार करता था। 1853 में विदेशी जंगी जहाज़ आने के बाद 1854 और 1858 की संधियों से बंदरगाह खुले। व्यापार, महँगाई और शोगुन पर घटते भरोसे से 1867-68 में शोगुन व्यवस्था टूट गई।
- आधुनिक चीन 1946–1997: माओ से देंग तक – 1946 से 1997 के बीच चीन बहुत तेज़ी से बदला। माओ त्से तुंग के नेतृत्व में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) ने राष्ट्रवादियों (GMD) से गृहयुद्ध जीता और 1949 में जनवादी गणराज्य चीन (PRC) बनाया। माओ ने भूमि सुधार और बड़े अभियानों से पक्की पकड़ बनाई। फिर उन्होंने जल्दी समाजवाद लाने की कोशिश की: पंचवर्षीय योजना, सामूहिक खेती और 'लंबी छलांग', जिससे भयानक अकाल पड़ा। फिर 1966–76 में सांस्कृतिक क्रांति आई, दस साल की उथल-पुथल। 1976 में माओ की मृत्यु के बाद देंग शियाओपिंग ने बाज़ार और विदेशी व्यापार खोले, पर एक-दलीय शासन रखा और 1989 के थ्यानआनमेन विरोध को कुचला। 1997 तक चीन एक उभरती विश्व शक्ति था।
- आधुनिक ब्रिटेन 1851–1964: सुधार, युद्ध और कल्याण – 1851 से 1964 के बीच ब्रिटेन बदल गया: पहले बहुत कम पुरुष वोट देते थे और सरकार बहुत कम काम करती थी; बाद में सब वयस्क वोट देने लगे और सरकार "जन्म से मृत्यु तक" लोगों का ध्यान रखने लगी। मुख्य कारण: सुधार क़ानून (1867, 1884, 1918, 1928), लेबर पार्टी और मज़दूर संघ, लिबरल कल्याण सुधार (1906–14), दो पूर्ण युद्ध, 1930 की मंदी, बेवरिज रिपोर्ट और 1945 की लेबर सरकार (NHS 1948), फिर 1950 के दशक की समृद्धि और साम्राज्य का अंत।
- आधुनिक युद्ध: रूस-यूक्रेन युद्ध एक उदाहरण के रूप में – आधुनिक युद्ध में ज़मीन पर सैनिकों के साथ ड्रोन, साइबर हमले, झूठी ख़बरें, प्रतिबंध और कानून भी मिले होते हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध यह साफ दिखाता है: यह 2014 में क्रीमिया पर कब्ज़े और डोनबास की लड़ाई से शुरू हुआ, मिन्स्क समझौते उसे रोक नहीं पाए, स्वयंसेवक शुरू से मदद करते रहे, और फ़रवरी 2022 में रूस ने पूर्ण पैमाने का आक्रमण कर दिया। दुनिया ने गठबंधन, युद्ध-अपराध जाँच और यूक्रेन को EU उम्मीदवार दर्जे से जवाब दिया, जबकि लाखों लोग शरणार्थी या विस्थापित हुए।
- आधुनिक विज्ञान और संस्कृति: डार्विन, आइंस्टीन, साहित्य और कला (1830–1920) – 1800 के दशक और 1900 के शुरुआती वर्षों में कारख़ानों, रेलों और बढ़ते शहरों ने जीवन बदल दिया, और लोग प्रकृति और समाज के बारे में नए सवाल पूछने लगे। विज्ञान में चार्ल्स डार्विन ने 1859 में बताया कि जीव प्राकृतिक चयन से धीरे-धीरे बदलते हैं, ग्रेगर मेंडल ने आनुवंशिकता के नियम खोजे, मैरी और पियरे क्यूरी ने रेडियोधर्मिता पर काम किया, और अल्बर्ट आइंस्टीन ने 1905 और 1915 में दिखाया कि समय, स्थान, द्रव्यमान और ऊर्जा आपस में जुड़े हैं। साहित्य में चार्ल्स डिकेंस, विक्टर ह्यूगो और लियो टॉल्स्टॉय जैसे लेखकों ने ग़रीबी, न्याय और रोज़ के जीवन को लिखा, और 1913 में रवींद्रनाथ टैगोर साहित्य का नोबेल जीतने वाले पहले एशियाई बने। कला में फ़ोटोग्राफ़ी ने चित्रकारों को रोशनी, भावना और देखने के नए ढंग की ओर धकेला, जिससे इंप्रेशनिज़्म और फिर क्यूबिज़्म आए। इन सबने मिलकर सोचने का आधुनिक ढंग बनाया।
- आधुनिकीकरण और आज के मुद्दे: आज़ादी, बराबरी और प्रकृति – आधुनिकीकरण का मतलब है कारखाने, शहर, रेल, स्कूल, नए कानून और मज़बूत राज्य। इससे बहुत लोगों का जीवन आसान हुआ, पर ऐसी समस्याएँ भी बनीं जिन पर आज भी बहस होती है। तीन बड़े द्वंद्व हैं। आज़ादी बनाम नियंत्रण: लोग कितना बोलने-करने के लिए आज़ाद हों और नियम दूसरों को कितना बचाएँ? बराबरी बनाम असमानता: आधुनिक अर्थव्यवस्था बढ़ती है, पर लाभ अमीर-ग़रीब, शहर-गाँव, पुरुष-महिला में बराबर नहीं बँटता। विकास बनाम संरक्षण: कारखाने और खदानें नौकरी और पैसा देती हैं, पर जंगल, नदी और हवा को नुकसान पहुँचाती हैं। जापान में मेइजी राज्य ने सब वर्गों को कानून में बराबरी दी, पर बोलने की आज़ादी सीमित की, कई किसान और कारखाना-मज़दूर ग़रीब रहे, और आशियो तांबे की खान ने एक नदी ज़हरीली की। इनका कोई एक सही उत्तर नहीं; समाज को संतुलन खोजना होता है।
- आधुनिकीकरण और राष्ट्रीय पहचान: संस्कृति राष्ट्र कैसे बनाती है – 19वीं और 20वीं सदी में कई समाजों का आधुनिकीकरण हुआ: स्कूल, रेल, छापाखाने और राज्य बने। लोग बहस करते रहे कि कौन-से नए विचार अपनाएँ और कौन-सी परंपराएँ रखें। सरकारों ने सांस्कृतिक नीति (मानक भाषा, स्कूल, संग्रहालय, अकादमियाँ, राष्ट्रीय प्रतीक) से स्थानीय समुदायों को एक राष्ट्र में जोड़ा। कई राष्ट्र खुद को यूरोप का हिस्सा भी मानते थे, इसलिए पहचान कई परतों वाली बनी। विदेश में बसे नागरिकों ने अपनी संस्कृति ज़िंदा रखी और घर से जुड़े रहे।
- आधुनिकीकरण के रास्ते: जापान, चीन और कोरिया – जापान, चीन और कोरिया तीनों आधुनिक बने, पर अलग-अलग रास्तों से। 1853 में अमेरिकी जहाज़ों ने जापान को खुलने पर मजबूर किया; 1868 से मेजी सुधार हुए: रेल, कारखाने, स्कूल और सम्राट के नीचे मज़बूत सेना। फिर जापान साम्राज्य बना, दूसरा विश्व युद्ध लड़ा और 1945 में हारा। अमेरिकी कब्ज़े में उसे शांति वाला संविधान मिला और वह फिर अमीर देश बना (1964 ओलंपिक)। चीन में 1911 में सन यात-सेन के नेतृत्व में राजशाही ख़त्म हुई; गृहयुद्ध और जापानी हमले के बाद 1949 में माओ की कम्युनिस्ट पार्टी जीती। माओ की "महान छलांग" और "सांस्कृतिक क्रांति" से अर्थव्यवस्था को नुक़सान हुआ। 1978 से देंग शियाओपिंग ने चार आधुनिकीकरण के साथ बाज़ार खोले और चीन तेज़ी से बढ़ा। कोरिया 1910–45 तक जापान का उपनिवेश रहा, दो हिस्सों में बँटा और युद्ध झेला (1950–53); दक्षिण कोरिया निर्यात वाले कारखानों से बढ़ा और 1987 में लोकतंत्र बना।
- आरंभिक आधुनिक काल: 1450 से 1800 तक दुनिया कैसे बदली – आरंभिक आधुनिक काल लगभग 1450 से 1800 तक है, मध्यकाल और आधुनिक काल के बीच। छपाई ने विचार तेज़ी से फैलाए। समुद्री यात्राओं ने व्यापार और उपनिवेशों से महाद्वीपों को जोड़ा। धर्मसुधार ने पश्चिमी ईसाई धर्म को बाँटा। बड़े साम्राज्य और नए तरह के राज्य बने। वैज्ञानिक क्रांति और ज्ञानोदय ने प्रकृति, शासकों और अधिकारों के बारे में सोच बदल दी।
- आरंभिक आधुनिक जापान: एदो का शासन और समाज – 1603 से 1868 तक तोकुगावा शोगुन एदो से राज करते थे। वे क़ानून, चार वर्गों की व्यवस्था और दाइम्यो की बारी-बारी की हाज़िरी से व्यवस्था रखते थे। शांति में खेती, दस्तकारी और व्यापार बढ़े, पर ख़राब फ़सल से अकाल और विद्रोह हुए।
- आर्थिक इतिहास: समय के साथ लोग रोज़ी-रोटी कैसे कमाते रहे – आर्थिक इतिहास पढ़ता है कि लोग समय के साथ कैसे उत्पादन, व्यापार और धन का बँटवारा करते रहे। ज़्यादातर इतिहास में अर्थव्यवस्था खेती पर टिकी थी और शासक फ़सल, श्रम या सिक्कों में कर लेते थे। व्यापार, मुद्रा और बैंकों ने आय धीरे-धीरे बढ़ाई। औद्योगिक क्रांति ने प्रति व्यक्ति उत्पादन तेज़ी से बढ़ाया। 20वीं सदी में देशों ने बाज़ार, योजनाबद्ध और मिश्रित मॉडल आज़माए। विकास के साथ संकट भी आए: प्रथम विश्व युद्ध के बाद अति-मुद्रास्फीति, 1929 की महामंदी, 1997 का एशियाई वित्तीय संकट और 2008 का वैश्विक संकट। आज चुनौती है न्यायपूर्ण और टिकाऊ विकास।
- आर्थिक वृद्धि और वैश्वीकरण करती दुनिया – 1955 से 1973 तक जापान की अर्थव्यवस्था हर साल लगभग 9 से 10 प्रतिशत बढ़ी और लगभग 4.8 गुना बड़ी हो गई। इसकी क़ीमत प्रदूषण और भीड़ भरे शहरों के रूप में चुकानी पड़ी। 1972 में ओकिनावा जापान को लौटा और जापान-चीन संबंध सामान्य हुए। 1973 के तेल संकट ने तेज़ वृद्धि का दौर ख़त्म किया और उसके बाद दुनिया-भर में व्यापार और निवेश तेज़ी से बढ़े: वैश्वीकरण।
- आस्था और तर्क – ईश्वर के प्रश्न तक लोग अलग-अलग रास्तों से पहुँचते हैं: प्रकृति का विस्मय, समुदाय, प्रार्थना या दुख। धर्म साझा परंपरा है, धार्मिकता व्यक्ति का अपना जुड़ाव है, और आस्था भरोसा है। विचारक इस पर असहमत हैं कि आस्था और तर्क टकराते हैं या साथ चलते हैं। प्रत्यक्षवाद केवल वे कथन मानता है जिन्हें अनुभव से जाँचा जा सके। ईश्वर के पक्ष और विपक्ष के हर क्लासिक तर्क में वज़न है, पर कोई बहस खत्म नहीं करता। यह पाठ मतों को समझाता है, क्या मानना है यह नहीं बताता।
- इंग्लैंड पर नॉर्मन विजय – जनवरी 1066 में एडवर्ड द कन्फ़ेसर बिना बेटे के मरा, तो इंग्लैंड के मुकुट के तीन दावेदार हुए: हैरल्ड गॉडविनसन, नॉर्मंडी का विलियम और नॉर्वे का हैराल्ड हार्ड्राडा। हैरल्ड राजा बना, उसने स्टैमफ़र्ड ब्रिज पर हार्ड्राडा को हराया, फिर 14 अक्टूबर 1066 को हेस्टिंग्स में विलियम से हार गया। विलियम ने किलों, विद्रोहों को कठोरता से कुचलने (ख़ासकर उत्तर का विनाश), नए नॉर्मन शासक वर्ग और सामंती व्यवस्था से नियंत्रण रखा। डोम्सडे बुक (1086) में लिखा गया कि किसके पास कितनी ज़मीन है और उसकी क़ीमत क्या है। आर्चबिशप लैनफ़्रैंक के समय चर्च नए सिरे से संगठित हुआ, पत्थर के बड़े गिरजाघर बने और नए मठ खुले। आज बचे किले और गिरजाघर हमें पत्थर में लिखा इतिहास पढ़ने देते हैं।
- इज़राइल-फ़िलिस्तीन संघर्ष का इतिहास – दो समुदाय, यहूदी और फ़िलिस्तीनी अरब, एक ही ज़मीन पर दावा करते हैं। 1890 के दशक से ज़ायोनी आंदोलन के साथ यहूदी आप्रवासन बढ़ा, जब यह इलाका पहले ओटोमन और फिर ब्रिटिश शासन में था। 1947 में संयुक्त राष्ट्र ने दो राज्यों का सुझाव दिया। 1948 में इज़राइल बना और लगभग सात लाख फ़िलिस्तीनी शरणार्थी बने। 1967 में इज़राइल ने वेस्ट बैंक, पूर्वी यरुशलम, गाज़ा, सिनाई और गोलान ले लिए। यरुशलम और शरणार्थियों का प्रश्न अब भी अनसुलझा है। यह पाठ घटनाएँ और दोनों दृष्टिकोण दिखाता है; किसी का पक्ष नहीं लेता।
- इतिहास और स्मृति: हम अतीत को कैसे याद रखते हैं – स्मृति यानी लोग और समूह अतीत को कैसे याद करते हैं; इतिहास यानी सबूतों के आधार पर अतीत का सावधान अध्ययन। किसी घटना के बाद गवाह कुछ पीढ़ियों तक जीवित स्मृति रखते हैं। दस्तावेज़, फ़ोटो, वस्तुएँ और बातचीत जैसे स्रोत ज़्यादा समय तक बचे रहते हैं। समाज याद को स्मारक, संग्रहालय, सड़कों के नाम और स्मृति दिवस में बदलता है। अलग समूह एक ही घटना को अलग तरह से याद कर सकते हैं, इसलिए इतिहासकार स्रोतों की तुलना करके याद को जाँचते हैं और मिथक सुधारते हैं। पुराने अन्याय को याद रखना न्याय और मेल-मिलाप में मदद करता है।
- इतिहास का दर्शन – इतिहास का दर्शन अतीत के बड़े सवाल पूछता है: हम कुछ घटनाएँ क्यों याद रखते हैं और कुछ क्यों भूल जाते हैं? क्या इतिहास गोल घूमता है या आगे बढ़कर प्रगति करता है? क्या एक ही घटना अलग-अलग ढंग से सच्चाई से कही जा सकती है? और अतीत भविष्य के बारे में क्या सिखाता है? इनका एक ही उत्तर नहीं है, पर साफ़ तर्क ज़रूरी है।
- इतिहास में अंतरराष्ट्रीय संबंध: युद्ध, गठबंधन और शांति – अंतरराष्ट्रीय संबंध यानी राज्य एक-दूसरे से कैसे निपटते हैं। तीस वर्षीय युद्ध (1618 से 1648) वेस्टफ़ालिया की संधि पर खत्म हुआ, जिसने हर राज्य को अपनी ज़मीन का शासक माना। 1700 के दशक में बड़ी ताकतों ने उपनिवेशों के युद्ध लड़े और कमज़ोर पड़ोसी को बाँटा। 1914 से पहले दो गुटों ने एक झगड़े को विश्व युद्ध बना दिया। 1930 के दशक में आक्रमण के आगे झुकना (तुष्टीकरण) विफल रहा। 1945 के बाद दो गुट, संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाएँ और साम्राज्यों का अंत दुनिया को ढालते रहे, और आज नई ताकतें और साझा समस्याएँ उसे ढालती हैं।
- इतिहास में महिलाओं के अधिकार – ज़्यादातर इतिहास में क़ानूनों और रीति-रिवाज़ों ने महिलाओं को राजनीति, उच्च शिक्षा और पैसे पर नियंत्रण से दूर रखा। 1700 के अंत से महिलाओं ने बराबर अधिकार माँगने शुरू किए। पहली लहर (लगभग 1848–1930) ने संपत्ति, शिक्षा और वोट दिलाया। दूसरी लहर (1960–70) ने समान वेतन के क़ानून और काम, पैसे व परिवार में आज़ादी दिलाई। तीसरी और चौथी लहर (1990 से) हिंसा से सुरक्षा, साझी देखभाल और हर महिला से बराबर व्यवहार पर ध्यान देती है। कई देशों में क़ानून बराबर हैं, पर वेतन, देखभाल के काम और सुरक्षा में अंतर बाक़ी है।
- इतिहास में मुद्रा और कर – पैसा वस्तु-विनिमय की समस्या हल करता है। चीनी मुद्रा सीपियों से काँसे के औज़ार-धन, छिन के मानक गोल सिक्के, चाँदी, सोंग काल के काग़ज़ी धन और 1948 के बाद रेनमिनबी तक पहुँची। दुनिया ने स्वर्ण-मान अपनाया, फिर 1944 की ब्रेटन वुड्स प्रणाली (डॉलर सोने से, अन्य मुद्राएँ डॉलर से), और 1970 के दशक से अधिकतर तैरती विनिमय दरें। कर राज्य का ख़र्च चलाते हैं; चीन में वे अनाज, कपड़ा और श्रम (तांग) से दो-कर क़ानून (780), चाँदी में दिए जाने वाले एकल कोड़े (मिंग, 1500 के दशक) और 2006 में कृषि कर की समाप्ति तक बदले।
- इतिहास, विज्ञान और तकनीकी विषयों में पढ़ना और लिखना – हर विषय के अपने तरह के पाठ होते हैं। उन्हें अच्छे से पढ़ने के लिए स्रोत जाँचो (किसने, कब, क्यों), दावा खोजो, प्रमाण खोजो और देखो कि तर्क उन्हें कैसे जोड़ता है। लिखते समय वही मीनार बनाओ: नीचे प्रमाण, बीच में तर्क, ऊपर दावा, और राय को प्रमाण बनाकर मत रखो।
- इलाकों की पहचान: पूर्वी एशिया, दक्षिण एशिया, पश्चिम एशिया और भूमध्य सागर – पूर्वी एशिया में छिन, हान और तांग राजवंशों ने अफ़सरों से चलने वाले बड़े राज्य बनाए, और उनके विचार कोरिया, जापान और वियतनाम तक गए। दक्षिण एशिया में बौद्ध और हिंदू धर्म बने और बाहर फैले। पश्चिम एशिया और भूमध्य सागर के आसपास यूनानी नगर-राज्यों, रोम और पुराने साम्राज्यों ने कानून, व्यापार और सोच को आकार दिया। व्यापार के रास्तों ने तीनों को जोड़ा।
- इवान चतुर्थ की ओप्रिच्निना, 1565 से 1572 – 1565 में ज़ार इवान चतुर्थ ने रूस को दो भागों में बाँटा: ओप्रिच्निना, उनका अपना निजी क्षेत्र जिसमें अपने रक्षक (ओप्रिच्निकी) थे, और ज़ेम्शचिना, बाक़ी राज्य। वे पुराने बोयार परिवारों की ताक़त तोड़ना और पूरी वफ़ादारी चाहते थे। ओप्रिच्निकी ने ज़मीनें लीं, डर फैलाया और भारी नुक़सान किया, जिसमें 1570 में नोवगोरोद पर हमला भी है। 1571 में मॉस्को पर क्रीमिया के हमले और 1572 में मोलोदी की जीत के बाद ज़ार ने ओप्रिच्निना ख़त्म की। व्यापार और खेती को चोट पहुँची और भरोसा टूटा।
- इवान IV का युग (1533–1560) – 1533 में इवान तीन साल की उम्र में रूस का शासक बना। 1538 तक माँ एलेना ग्लिंस्काया ने उसकी जगह राज किया, फिर बोयार परिवार सत्ता के लिए लड़े। 1547 में वह पहला ज़ार बना। चुनी हुई परिषद के साथ उसने 16वीं सदी के मध्य में सुधार किए: क़ानून-संहिता, सभा, बंदूकधारी सेना और स्थानीय शासन।
- इस्लाम का उदय और अरब साम्राज्य – इस्लाम की शुरुआत अरब में पैग़ंबर मुहम्मद (जन्म लगभग 570 ई.) से हुई। 632 में उनके निधन के बाद ख़लीफ़ाओं के नेतृत्व में तेज़ विस्तार हुआ। उमय्यद दमिश्क़ से (661–750) और अब्बासी बग़दाद से (750–1258) शासन करते थे। व्यापार, अनुवाद और विज्ञान ने इसे ज्ञान का स्वर्ण युग बनाया।
- ईंटें, मनके तथा अस्थियाँ: हड़प्पा सभ्यता – हड़प्पा (सिंधु घाटी) सभ्यता में दक्षिण एशिया के पहले नगर बने, लगभग 2600 से 1900 ई.पू.। नगरों में ऊँचा दुर्ग, निचला शहर, सीधी सड़कें और ढकी नालियाँ थीं। लोग मनके, शंख और धातु की चीज़ें बनाते, एक जैसे पत्थर के बाट और मुहरें इस्तेमाल करते और ओमान व मेसोपोटामिया तक व्यापार करते थे। इनकी लिपि आज तक पढ़ी नहीं गई। 1920 के दशक में ASI ने इसे खोजा; इतिहासकार ईंटों, मनकों, हड्डियों और मुहरों से इसका जीवन समझते हैं।
- उच्च छिंग और संकट: विस्तार, ग्रैंड काउंसिल और छिपी समस्या – लगभग 1680 से 1790 के बीच चीन का छिंग राजवंश तीन लंबे शासन वाले सम्राटों (कांग्शी, योंगचंग, छियानलोंग) के अधीन बहुत बड़ा, धनी और शांत बना। ताइवान, मंगोलिया, तिब्बत और शिनच्यांग इसके अधीन आए और ग्रैंड काउंसिल से सम्राट का तेज़ और गोपनीय नियंत्रण बना। पर लोग खेतों से कहीं तेज़ी से बढ़े, अधिकारी लालची हुए और व्यापार के नियम बहुत कड़े रहे। चमक के नीचे संकट पल रहा था।
- उत्तरी युद्ध (1700–1721) – 1700 में रूस, डेनमार्क और सैक्सनी-पोलैंड ने बाल्टिक सागर तक पहुँचने के लिए स्वीडन से युद्ध शुरू किया। रूस 1700 में नार्वा में हारा, फिर पीटर ने सेना नए सिरे से बनाई और 1703 में सेंट पीटर्सबर्ग की नींव रखी। 1709 में पोल्टावा में रूस ने स्वीडन की मुख्य सेना हराई। नौसैनिक जीतें भी हुईं। निस्ताद की संधि (1721) ने रूस को बाल्टिक तट दिया, और पीटर "सम्राट" घोषित हुआ, यानी रूस साम्राज्य बना।
- उन्नत प्रौद्योगिकी और ज्ञान-आधारित समाज – परमाणु ऊर्जा, अंतरिक्ष खोज और सूचना व संचार प्रौद्योगिकी (आईसीटी) ने 1945 के बाद जीवन बदला। इनसे ज्ञान-आधारित समाज बना, जहाँ ज्ञान संपत्ति का मुख्य स्रोत है।
- उन्नीसवीं सदी के अंत और बीसवीं सदी की शुरुआत में पश्चिम – लगभग 1860 से 1914 तक पश्चिम के देश तेज़ी से बदले। रानी विक्टोरिया के समय ब्रिटेन ने धीरे-धीरे और पुरुषों को वोट दिया। फ़्रांस ने 1870 में साम्राज्य छोड़कर गणराज्य बनाया। इटली (1861-70) और जर्मनी (1871) एक देश बने। ऑस्ट्रिया-हंगरी कई जातियों को जोड़कर रखने की कोशिश करता रहा। अमेरिका ने दासता खत्म की, रेल से तट जोड़े और बड़ी औद्योगिक ताक़त बना।
- उपनिवेशवाद और देहात – ईस्ट इंडिया कंपनी ज़मीन से पक्की कमाई चाहती थी। बंगाल में 1793 में स्थायी बंदोबस्त हुआ: ज़मींदार हमेशा के लिए तय रकम देगा। रकम बहुत ऊँची थी, इसलिए कई ज़मींदारियाँ नीलाम हुईं और गाँव के अमीर किसान, जोतदार, ताक़तवर बने। राजमहल की पहाड़ियों में अंग्रेज़ों ने संथालों को बसाया, 1832 में दामिन-इ-कोह की सीमा बनी, पहाड़िया लोग पीछे धकेले गए और 1855–56 में संथालों ने विद्रोह किया। बंबई दक्कन में रैयतवाड़ी से लगान सीधे किसान से लिया गया; कपास का उछाल (1861–65) गिरावट में बदला, कर्ज़ बढ़ा और 1875 में दक्कन दंगे हुए। यह सब हम पाँचवीं रिपोर्ट, बुकानन के सर्वे और दक्कन दंगा आयोग जैसे सरकारी अभिलेखों से जानते हैं, जिन्हें सावधानी से पढ़ना होता है।
- उपनिवेशीकरण: यूरोपीय साम्राज्य दुनिया में कैसे फैले (1450–1750) – उपनिवेशीकरण का मतलब है कि कोई देश दूर की ज़मीन पर कब्ज़ा करे, वहाँ अपने लोग या अफ़सर भेजे और वहाँ की ज़मीन, लोगों और माल को अपने फ़ायदे के लिए इस्तेमाल करे। लगभग 1450 से 1750 तक स्पेन, पुर्तगाल, ब्रिटेन, फ़्रांस और नीदरलैंड ने समुद्र पार साम्राज्य बनाए। अमेरिका में बीमारियों और जीत से कई मूल समाज बर्बाद हुए; स्पेन ने ज़बरदस्ती मज़दूरी और जन्म पर टिकी सामाजिक सीढ़ी बनाई; ब्रिटेन ने तेरह उपनिवेश जैसे बस्ती वाले उपनिवेश बसाए; और करोड़ों अफ़्रीकियों को ज़बरदस्ती अटलांटिक पार ले जाया गया। एशिया में यूरोपीयों ने पहले ज़्यादातर व्यापारिक चौकियाँ बनाईं, जो बाद में भारत की तरह साम्राज्य बन गईं।
- उपभोक्ता समाज और पर्यावरण – 1945 के बाद कई देश उपभोक्ता समाज बन गए: बड़े पैमाने के उत्पादन, सस्ते सामान, कार, प्लास्टिक और विज्ञापन ने ख़रीदारी बहुत बढ़ा दी। साथ में धुआँ, गंदी नदियाँ, कचरा और CO₂ भी बढ़े। 1952 का लंदन का धुँधलका, किताब साइलेंट स्प्रिंग (1962) और पहला अर्थ डे (1970) जैसी घटनाओं से साफ़ हवा-पानी के क़ानून बने। स्थानीय प्रदूषण अक्सर घटा, पर कुल कचरा और CO₂ बढ़ते रहे।
- उस्मानी साम्राज्य और क्रीमियाई ख़ानत (1300 से 1700 के दशक) – उस्मानी साम्राज्य लगभग 1300 में छोटे सीमावर्ती राज्य के रूप में शुरू हुआ और तीन महाद्वीपों तक फैली बड़ी शक्ति बना। उसने 1453 में कुस्तुनतुनिया जीता और सुल्तान सुलेमान (मृत्यु 1566) के समय चरम पर पहुँचा। सुल्तान वज़ीर-ए-आज़म, परिषद, गवर्नरों, भूमि-अनुदान वाले घुड़सवारों और वेतनभोगी सेना, यानी जनिसरियों, के सहारे शासन करता था। दूसरे धर्मों के लोग मिल्लत नामक स्वशासित समुदायों में रहते थे। क्रीमियाई ख़ानत, एक तातार राज्य, 1475 में उस्मानियों की सामंत बनी। यूक्रेनी कोसैक, क्रीमियाई तातार और उस्मानी अलग-अलग समय पर प्रतिद्वंद्वी, साथी और व्यापारिक पड़ोसी रहे। यूनानी, सर्ब, बुल्गारियाई और रोमानियाई जैसे दक्षिण-पूर्वी यूरोप के कई समुदाय उस्मानी शासन में रहे। 1683 के बाद साम्राज्य ने ज़मीन खोनी शुरू की, और 1783 में रूस ने क्रीमिया ले लिया।
- एक साम्राज्य की राजधानी: विजयनगर (हम्पी) – विजयनगर यानी 'जीत का शहर'। यह 1336 से 1565 तक दक्षिण भारत के बड़े साम्राज्य की राजधानी थी। इसके खंडहर कर्नाटक में तुंगभद्रा नदी के किनारे हम्पी में हैं। शहर में मज़बूत दीवारों के कई घेरे थे, दीवारों के भीतर खेत थे, तालाबों और नहरों की समझदार व्यवस्था थी, बड़े चबूतरे वाला राजकीय केंद्र और ऊँचे मंदिर-द्वारों वाला धार्मिक केंद्र था। अब्दुर रज़्ज़ाक़, डोमिंगो पेस और फ़र्नाओ नूनिज़ जैसे विदेशी यात्रियों ने इसकी दौलत और बाज़ारों के बारे में लिखा। 1565 में तालीकोटा की लड़ाई के बाद शहर उजड़ गया। 1800 में कॉलिन मैकेंज़ी ने खंडहरों का नक़्शा बनाना शुरू किया।
- एथेंस का लोकतंत्र: नागरिकों का शासन – ईसा पूर्व 5वीं-4थी सदी में एथेंस प्रत्यक्ष लोकतंत्र था: वयस्क पुरुष नागरिक सभा (एक्लेसिया) में मिलकर ख़ुद क़ानून, युद्ध और शांति पर वोट देते थे। लॉटरी से चुनी 500 की परिषद (दस कबीलों से 50-50) एजेंडा तैयार करती थी। लॉटरी से चुनी बड़ी जूरी मुक़दमे तय करती थी। ज़्यादातर अधिकारी एक साल के लिए लॉटरी से चुने जाते थे; केवल सेनापति चुनाव से। ऑस्ट्रैसिज़्म (निष्कासन) से बहुत ताक़तवर व्यक्ति को दस साल के लिए बाहर भेजा जा सकता था। महिलाओं, दासों और विदेशी निवासियों को वोट नहीं था। प्लेटो जैसे विचारकों ने आलोचना की, फिर भी इसके विचार आज के लोकतंत्र में दिखते हैं।
- एदो जापान: खेती, सड़कें, स्कूल और नगरवासियों की संस्कृति – लगभग 250 साल की शांति में जापान के खेत नए खेतों, औज़ारों और खाद से बढ़े और किसानों ने कपास जैसी फ़सलें बेचीं। दस्तकारी और व्यापार फैला; ओसाका व्यापार का केंद्र और एदो विशाल नगर बना। पाँच राजमार्गों और मालवाहक जहाज़ों ने देश को जोड़ा। मंदिर-स्कूलों में आम बच्चों ने पढ़ना सीखा और धनी नगरवासियों ने काबुकी, हाइकु, कठपुतली-नाटक और रंगीन छापों पर पैसा लगाया।
- एलिज़ाबेथ कालीन इंग्लैंड (1558–1603) – एलिज़ाबेथ प्रथम ने 45 साल इंग्लैंड पर राज किया। मुश्किलें बड़ी थीं: लोगों को शक था कि औरत अकेले राज कर सकती है, देश धर्म पर बँटा था, ख़ज़ाना ख़ाली था और कैथोलिक स्पेन ख़तरा था। उन्होंने दरबार और प्रिवी काउंसिल से शासन चलाया, संसद के साथ काम किया (और बहस भी की), मैरी के नाम पर बनी साज़िशों से बचीं और 1588 में आर्मडा को हराया। अमीरों के लिए यह नाटक, बड़े घरों और समुद्री यात्राओं का 'स्वर्ण युग' था; ग़रीबों के लिए महँगाई और भूख का समय, जिससे निर्धन क़ानून बने।
- एशिया और अफ़्रीका, 1500–1700 – 1500 से 1700 तक पाँच मज़बूत राज्यों ने एशिया और पास के अफ़्रीका के बड़े हिस्से पर राज किया: ऑटोमन साम्राज्य, सफ़वी ईरान, मुग़ल भारत, मिंग फिर छिंग चीन, और तोकुगावा जापान। सबके अपने शासक, सेना, कर और व्यापार व विदेशियों से निपटने के तरीक़े थे।
- एशिया और यूरोप का पुनर्गठन (लगभग 1450-1700) – 1450 से 1700 के बीच एशिया में बड़े साम्राज्य (ऑटोमन, सफ़वी, मुग़ल, मिंग फिर छिंग) बने, जबकि यूरोप धर्म-सुधार से बँटा और 1648 तक संप्रभु राज्यों में बदला।
- एशियाई सभ्यताएँ: फ़ारस, भारत, चीन और जापान (1500–1900) – 1500 से 1800 के बीच एशिया की चार भूमियाँ ताक़तवर और धनी थीं: सफ़वी फ़ारस, मुग़ल भारत, मिंग और छिंग चीन, और तोकुगावा जापान। हर एक का अपना धर्म, कला और शासक था। यूरोपीय व्यापारी आए; भारत और फ़ारस खुले रहे, चीन ने एक बंदरगाह दिया और जापान ने दरवाज़े बंद कर लिए। 1800 के अंत में एशिया जागा: जापान मेइजी के अधीन तेज़ी से आधुनिक बना, और फ़ारस, भारत व चीन में सुधार और आज़ादी के आंदोलन शुरू हुए।
- ऐतिहासिक अन्वेषण: प्रश्न से पूरे निबंध तक – ऐतिहासिक अन्वेषण तुम्हारा अपना शोध-निबंध है। तुम लगभग 100 साल फैला एक बहस योग्य प्रश्न चुनते हो, उस समय के प्राथमिक स्रोत और इतिहासकारों के द्वितीयक काम जुटाते हो, हर स्रोत को उसके मूल, उद्देश्य और सामग्री से परखते हो, समझाते हो कि इतिहासकार अतीत की अलग व्याख्या क्यों करते हैं, और लगभग 3000–3500 शब्दों का तर्कपूर्ण निबंध लिखते हो — साफ़ निर्णय, फ़ुटनोट और संदर्भ सूची के साथ, सब अपने शब्दों में।
- ऐतिहासिक चिंतन: इतिहासकार कैसे काम करते हैं – इतिहास साक्ष्य के सहारे अतीत का अध्ययन है। घटनाओं को समय-रेखा पर क्रम से रखिए और उनके संदर्भ में पढ़िए। प्राथमिक स्रोत (उसी समय बने) और द्वितीयक स्रोत (बाद में बने) दोनों का उपयोग कीजिए। हर स्रोत को परखिए: किसने, कब, क्यों बनाया और क्या छूट गया। घटनाओं के कई कारण होते हैं: धीमे दीर्घकालिक कारण और एक तात्कालिक कारण। परिवर्तन और निरंतरता दोनों देखिए, महत्व तय कीजिए और साक्ष्य के साथ तर्क दीजिए।
- ओदा, तोयोतोमी और पहले यूरोपीय: आरंभिक आधुनिक जापान की राह – 1500 के दशक में जापान युद्धरत दाइम्यो में बँटा था। ओदा नोबुनागा ने बंदूकें (नागाशिनो, 1575) इस्तेमाल कीं, मुक्त बाज़ार खोले और आख़िरी आशिकागा शोगुन को हटाया (1573)। 1582 में उसकी मृत्यु के बाद तोयोतोमी हिदेयोशी ने ज़मीन नापी, किसानों से हथियार लिए (1588) और योद्धा-किसान को अलग किया। पुर्तगाली नाविक 1543 में आए, बंदूकें और 1549 से ईसाई धर्म लाए; हिदेयोशी ने 1587 में पादरियों को निकलने का आदेश दिया पर व्यापार नियंत्रण में रखा।
- ओलंपिक आंदोलन – प्राचीन ओलंपिक खेल यूनान के ओलंपिया में, परंपरा के अनुसार 776 ई.पू. में, देवता ज़्यूस के धार्मिक उत्सव के रूप में शुरू हुए और हर चार साल में होते थे। आज़ाद यूनानी पुरुष दौड़, कुश्ती, मुक्केबाज़ी, रथ-दौड़ और पेंटाथलॉन में भाग लेते थे; विजेता को जैतून का मुकुट मिलता था और "पवित्र संधि" से खिलाड़ी सुरक्षित आ-जा सकते थे। ये खेल लगभग 393 ईस्वी में बंद हुए। पियरे दे कुबर्तें ने 1894 में अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति (IOC) बनाई और 1896 में एथेंस में पहले आधुनिक खेल हुए। आज ओलंपिक आंदोलन में IOC, अंतरराष्ट्रीय खेल महासंघ और राष्ट्रीय ओलंपिक समितियाँ हैं। प्रतीक: पाँच छल्ले, मशाल, आदर्श वाक्य "तेज़, ऊँचा, मज़बूत – साथ मिलकर"; मूल्य: उत्कृष्टता, मित्रता, सम्मान।
- औद्योगिक क्रांति: कारण, प्रभाव और सुधार (1760–1914) – लगभग 1760 से 1914 के बीच काम घर के हाथ-औज़ारों से हटकर कारख़ानों की मशीनों पर आ गया। पहली लहर (लगभग 1760–1840) ब्रिटेन में कोयला, लोहा, भाप शक्ति और सूती मिलों से शुरू हुई। दूसरी लहर (लगभग 1870–1914) में इस्पात, बिजली, रसायन और तेल आए, और उद्योग पश्चिमी यूरोप, अमेरिका, जापान और रूस तक फैला। शहर तेज़ी से बढ़े; मज़दूरों को लंबे घंटे, बाल श्रम और गंदे घर मिले। मज़दूरों ने संघ बनाए, नए विचारों (उदारवाद, समाजवाद, रूढ़िवाद) में बहस हुई, और सरकारों ने धीरे-धीरे कारख़ाना, स्वास्थ्य और मताधिकार के सुधार किए।
- औद्योगीकरण का युग – फ़ैक्टरी से पहले सौदागर गाँव के परिवारों को कच्चा माल देते थे और वे घर पर कातते-बुनते थे (आदि-औद्योगीकरण)। 1760 के दशक से ब्रिटेन में कॉटन मिलें, स्पिनिंग जेनी जैसी मशीनें और जेम्स वॉट का बेहतर भाप इंजन आए। बदलाव धीमा था: हाथ का श्रम सस्ता और आम रहा। भारत के बुनकर पहले दुनिया भर को कपड़ा देते थे; ईस्ट इंडिया कंपनी ने गुमाश्तों के ज़रिए उन पर क़ब्ज़ा किया और बाद में मैनचेस्टर का कपड़ा भारत में भर गया। 1854 से बंबई और दूसरी जगहों पर भारतीय मिलें बनीं और छोटे कारख़ाने भी बढ़े। सामान बेचने के लिए लेबल, कैलेंडर और विज्ञापन आए, और स्वदेशी विज्ञापनों ने देशप्रेम जगाया।
- औपनिवेशिक प्रतिरोध: भारत का 1857 का विद्रोह और लैटिन अमेरिका की आज़ादी – उपनिवेश वह ज़मीन है जिस पर कोई दूर की ताक़त राज करती है और उसका माल व कर ले जाती है। 1800 के दशक में कई उपनिवेशों के लोगों ने विरोध किया। भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के सिपाही 10 मई 1857 को मेरठ में उठ खड़े हुए और बहुत से आम लोग भी जुड़ गए। विद्रोह दिल्ली, कानपुर, लखनऊ, झाँसी और दूसरी जगहों तक फैला, पर उसके पास एक साझा योजना नहीं थी और 1858 तक दबा दिया गया; इसके बाद कंपनी का शासन ख़त्म हुआ और ब्रिटिश ताज सीधे भारत पर राज करने लगा। लैटिन अमेरिका में हैती के ग़ुलाम बनाए गए लोगों ने 1804 में आज़ादी जीती। 1808 में नेपोलियन ने स्पेन पर हमला किया तो स्पेन और पुर्तगाल के साम्राज्य कमज़ोर हो गए, और सिमोन बोलिवार तथा ख़ोसे दे सान मार्टिन जैसे नेताओं की मदद से 1820 के दशक तक ज़्यादातर उपनिवेश आज़ाद हो गए। दोनों की तुलना से समझ आता है कि कुछ प्रतिरोध क्यों सफल हुए और कुछ क्यों नहीं।
- कक्षा 12 इतिहास मानचित्र कार्य: समय के साथ स्थान खोजें – कक्षा 12 इतिहास में मानचित्र का प्रश्न 5 अंक का होता है। आपको एक रेखा-मानचित्र मिलता है। उस पर जगहें अंकित करनी होती हैं और उनके नाम लिखने होते हैं। जगहें आपके पाठों से आती हैं: हड़प्पा के नगर, 16 महाजनपद, अशोक के अभिलेख, बौद्ध स्थल, विजयनगर और मुग़ल स्थान, और 1857 व राष्ट्रीय आंदोलन के केंद्र। तरीका आसान है। हर जगह को उसकी नदी, तट या पड़ोसी से याद रखिए। जगहों को युग के हिसाब से बाँटिए। फिर अंकित करना जल्दी और पक्का हो जाता है।
- कनाडा का इतिहास: समूह, टकराव और सहयोग – कनाडा की कहानी समूहों के मिलने की कहानी है: फ़र्स्ट नेशंस, इनुइट और मेटिस, फ़्रांसीसी और ब्रिटिश बसने वाले, बाद में क्यूबेक, प्रवासी और बाकी दुनिया। हर युग में कुछ मुलाक़ातें सहयोग थीं (व्यापार, गठबंधन, परिसंघ, संधियाँ) और कुछ टकराव (युद्ध, विद्रोह, भर्ती संकट, अन्यायपूर्ण नीतियाँ)। दोनों को देखकर आज की कनाडाई पहचान समझ आती है।
- कनाडा के मूल निवासी: प्राचीन राष्ट्रों से सुलह तक – कनाडा का संविधान मूल निवासियों (Indigenous peoples) के तीन समूह मानता है: फ़र्स्ट नेशंस, इनुइट और मेटिस (2021 में लगभग 18 लाख लोग, आबादी का 5%)। वे इस ज़मीन पर 10,000 साल से ज़्यादा से रह रहे हैं, अपने राष्ट्रों, भाषाओं, कानूनों और व्यापार के साथ। 1500 के दशक में संपर्क के बाद फ़र व्यापार, गठबंधन और संधियाँ आईं (टू रो वैम्पम, 1763 की शाही उद्घोषणा, 1871–1921 की क्रमांकित संधियाँ)। इंडियन एक्ट (1876) और आवासीय स्कूलों (1883–1996) ने उन्हें आत्मसात करने की कोशिश की और गहरा नुकसान किया। 1960 के दशक से अधिकार वापस मिले: वोट (1960), काल्डर मामला (1973), संविधान की धारा 35 (1982), नुनावुत (1999), भूमि दावे और स्वशासन। सत्य और सुलह आयोग (2008–2015) ने 94 कार्य-आह्वान दिए। आज मूल निवासी राजनीति, कानून, कला, साहित्य और मीडिया में आगे हैं।
- कन्फ़्यूशियसवाद – कन्फ़्यूशियसवाद जीने का एक तरीका है, जो चीन के शिक्षक कन्फ़्यूशियस (लगभग 551–479 ई.पू.) ने सिखाया। इसके केंद्र में हैं रेन (दूसरों के प्रति दया) और ली (आदरपूर्ण व्यवहार)। इन्हें पाँच रिश्तों में निभाकर इंसान अच्छा बनता है: शासक-प्रजा, माता-पिता और संतान, पति-पत्नी, बड़े-छोटे और मित्र। मेंशियस ने कहा कि मानव स्वभाव जन्म से अच्छा है, अंकुर की तरह; ज़ुन्ज़ी ने कहा कि उसे शिक्षा और नियमों से ढालना पड़ता है। नव-कन्फ़्यूशियसवाद (लगभग 11वीं-12वीं सदी) ने इन विचारों को ब्रह्मांड की व्याख्या और आत्म-सुधार से जोड़ा।
- कानून और नैतिक शिक्षा – शुरुआती नगरों से ही शासक व्यवस्था दो तरीकों से रखते थे: दंड वाला लिखित कानून और आदतें बनाने वाली नैतिक शिक्षा। प्राचीन चीन में विधिवादी और कन्फ्यूशियस विचारकों ने इन पर बहस की, बाद में दोनों जुड़ गए। रोम ने पश्चिम को लिखित, सार्वजनिक, बराबर कानून दिया। आधुनिक राज्य "कानून का शासन" जोड़ते हैं: शासक भी कानून के अधीन है।
- कामाकुरा शोगुनशाही और मंगोल आक्रमण – 1185-1192 में मिनामोतो नो योरितोमो ने कामाकुरा में योद्धाओं की सरकार बनाई और शोगुन बना। शोगुन और गोकेनिन के बीच ज़मीन के बदले वफ़ादारी का रिश्ता था। होजो परिवार रीजेंट बनकर शासन करता रहा। मंगोलों (युआन) ने 1274 और 1281 में हमला किया और रुक गए, पर इनाम में देने को नई ज़मीन न होने से शोगुनशाही कमज़ोर होकर 1333 में गिर गई।
- काल विभाजन: इतिहासकार समय को कालों में कैसे बाँटते हैं – काल विभाजन का मतलब है समय की लंबी रेखा को नाम वाले कालों में काटना, ताकि पढ़ना आसान हो। वर्ष 1 से पहले के वर्ष ई.पू. (ईसा पूर्व) और बाद के ई. (ईसवी) गिने जाते हैं, और 100-100 वर्ष की शताब्दियों में बँटते हैं। एक आम ढाँचे में चार बड़े काल हैं: प्राचीन काल, मध्यकाल, प्रारंभिक आधुनिक काल और आधुनिक/समकालीन काल, जिन्हें 476, 1453 या 1492, और 1789 जैसे मोड़ अलग करते हैं। राजवंश, तकनीकी युग या क्षेत्रीय ढाँचे भी काम आते हैं। काल इतिहासकारों के चुने औज़ार हैं, प्रकृति के तथ्य नहीं।
- किसान, ज़मींदार और राज्य: मुग़ल साम्राज्य में खेतिहर समाज – 16वीं और 17वीं सदी में मुग़ल साम्राज्य के लगभग 85 प्रतिशत लोग गाँवों में रहते थे। किसान अनाज और नक़दी फ़सलें उगाते थे, बारिश, कुओं और नहरों के सहारे। गाँव में मुखिया वाली पंचायत होती थी। किसानों के ऊपर ज़मींदार थे, जो राजस्व वसूलते और क़िले व सैनिक रखते थे। मुग़ल राज्य भू-राजस्व लेता था, अक्सर फ़सल का लगभग एक-तिहाई, जिसे अधिकारी नापते और दर्ज करते थे। अबुल फ़ज़ल की आइन-ए-अकबरी हमारा मुख्य स्रोत है। यह ज़मीन को चार तरह में बाँटती है। मक्का और तंबाकू जैसी नई फ़सलों और दुनिया के व्यापार से आई चाँदी ने गाँव की ज़िंदगी बदली।
- किसी क्लासिक की पृष्ठभूमि: काल, लेखक और दूसरी रचनाओं से संबंध – क्लासिक तब आसानी से समझ आता है जब पता हो कि वह कब लिखा गया (काल), किसने लिखा (लेखक) और किन पुरानी रचनाओं का उपयोग या उत्तर है (संबंध)। बाद की रचना अक्सर पहले की रचना से दृश्य, विषय या पंक्ति लेती है, इसलिए रचनाएँ समय के पार जाल बनाती हैं।
- कुलीनों से योद्धाओं तक: मध्यकालीन जापान की ओर बदलाव – लगभग 900 से 1185 तक कर-मुक्त जागीरों (शोएन) ने राज्य को खोखला किया, 1086 में सेवानिवृत्त सम्राटों ने इन्सेई शासन शुरू किया, और संरक्षकों की पकड़ ढीली पड़ी। गवर्नर और जागीर-मालिक रक्षा के लिए योद्धा-दल रखते थे। होगेन (1156) और हेइजी (1159) संघर्षों में योद्धाओं ने दरबारी झगड़े तय किए। पहले कियोमोरी के नेतृत्व में ताइरा उठे, फिर 1185 में मिनामोतो ने उन्हें हराया और योद्धा-युग खुला।
- कैथरीन द्वितीय की घरेलू नीति (1762-1796) – कैथरीन द्वितीय निरंकुश शासक थीं जो प्रबोधन के लेखकों की प्रशंसक थीं। उन्होंने नकाज़ (1767) लिखा और विधायी आयोग बुलाया, जो बैठा पर कोई नया क़ानून नहीं बना। पुगाचोव विद्रोह के बाद उन्होंने स्थानीय शासन को प्रांतों और ज़िलों में बाँटा (1775)। 1785 में दो चार्टरों ने सामंतों और शहरवासियों को साफ़ अधिकार दिए। सबसे ज़्यादा लाभ सामंतों को मिला, जबकि भूदासों को कुछ नहीं मिला और अक्सर नुक़सान हुआ।
- कोसैक: सिच, 1648 का विद्रोह और हेटमनात – कोसैक आज़ाद हथियारबंद समुदाय थे जो 15वीं और 16वीं सदी में नीपर नदी के निचले इलाक़े के खुले घास के मैदान (स्तेपी) में बने। उनका अड्डा ज़ापोरीज़्ज़िया सिच नदी के रैपिड्स के पार एक क़िला था, जहाँ सब पुरुषों की सभा नेता चुनती थी। पोलिश-लिथुआनियाई राष्ट्रमंडल ने कुछ कोसैकों को सीमा-रक्षक रखा और 1572 से रजिस्टर में लिखा। कई विद्रोहों के बाद बोहदान ख़मेलनित्स्की के नेतृत्व में 1648 में महान विद्रोह हुआ। इससे कोसैक राज्य, हेटमनात, बना जिसमें रेजिमेंट, हेटमन और परिषद थी। 1657 में उसकी मृत्यु के बाद गृह-कलह का लंबा दौर आया जिसे "तबाही" कहते हैं। इवान माज़ेपा के समय सांस्कृतिक उभार हुआ, फिर स्वशासन गया: हेटमन का पद 1764 में समाप्त हुआ और सिच 1775 में बंद हुई।
- क्रांति और तानाशाही: रूस और स्तालिन का सोवियत संघ (1917–1953) – 1917 में युद्ध की हारों, भूख और ज़ार निकोलस II पर ग़ुस्से से फ़रवरी क्रांति हुई; ज़ार ने गद्दी छोड़ी और कमज़ोर अस्थायी सरकार आई। अक्टूबर में लेनिन के बोल्शेविकों ने सत्ता ले ली। उन्होंने चुनी हुई संविधान सभा बंद की, जर्मनी से शांति की, गोरों (सफ़ेद) के ख़िलाफ़ गृहयुद्ध (1918–21) जीता और गुप्त पुलिस (चेका) वाला एक-दलीय राज्य बनाया। युद्ध साम्यवाद से भूख और विद्रोह हुए, इसलिए 1921 में लेनिन ने नई आर्थिक नीति (NEP) अपनाई। 1924 में लेनिन की मृत्यु के बाद स्तालिन ने महासचिव पद का इस्तेमाल करके 1929 तक त्रॉत्स्की, ज़िनोव्येव, कामेनेव और बुख़ारिन को हराया। फिर पंचवर्षीय योजनाओं से तेज़ औद्योगीकरण और ज़बरन सामूहिक खेती कराई: भारी उद्योग बहुत बढ़ा, पर 1932–33 में भयानक अकाल पड़ा। सफ़ाए, दिखावटी मुक़दमे, महा आतंक (1936–38), गुलाग और व्यक्ति-पूजा से स्तालिन ने डर के बल पर राज किया। 1941 के जर्मन हमले के बाद सोवियत संघ ने भारी क़ीमत पर महान देशभक्ति युद्ध जीता और महाशक्ति बना। 1953 में स्तालिन की मृत्यु तक कड़ा शासन चला।
- क्रांतियों का युग (लगभग 1770–1850) – लगभग 1770 से 1850 के बीच अमेरिका और यूरोप में लोगों ने राजाओं, औपनिवेशिक शासकों और पुराने विशेषाधिकारों को उखाड़ा या चुनौती दी। स्वतंत्रता, समानता और अधिकारों के नए विचार असली मुश्किलों से मिले: अन्यायपूर्ण कर, कर्ज़, भूख और दासता। अमेरिकी क्रांति (1776) ने लिखित संविधान वाला गणराज्य बनाया। फ़्रांसीसी क्रांति (1789) ने सामंती विशेषाधिकार ख़त्म किए और नागरिकों के अधिकार घोषित किए। लहर हैती, लैटिन अमेरिका और 1848 में यूरोप तक फैली। 1815 में वियना में राजाओं ने पलटवार किया, पर नागरिकता, संविधान और राष्ट्र के विचार बने रहे।
- क्लासिक को आज से जोड़ना: विचारों को जोड़ना और बढ़ाना – क्लासिक को अपने ज्ञान से जोड़ने के लिए पुराने पाठ में कोई भाव या विचार खोजिए, वही भाव अपने जीवन या आज की दुनिया में खोजिए, और साफ़ कारण के साथ दोनों के बीच पुल बनाइए। फिर जो सीखा उससे अपने विचार बढ़ाइए और एक नया विचार साझा कीजिए।
- खाड़ी और अफ़ग़ानिस्तान में संघर्ष और तनाव, 1990–2009 – 1990 से 2009 के बीच खाड़ी क्षेत्र और अफ़ग़ानिस्तान में तीन जुड़े हुए संघर्ष हुए। खाड़ी में बहुत तेल है, इसलिए वहाँ की शांति पूरी दुनिया के लिए ज़रूरी है। ईरानी क्रांति (1979) और लंबे ईरान–इराक युद्ध (1980–88) के बाद सद्दाम हुसैन का इराक भारी क़र्ज़ में था। अगस्त 1990 में इराक ने कुवैत पर हमला किया। संयुक्त राष्ट्र ने वापसी की माँग की और अमेरिका के नेतृत्व में लगभग 35 देशों के गठबंधन ने खाड़ी युद्ध (जनवरी–फ़रवरी 1991) में कुवैत को मुक्त कराया, पर सद्दाम सत्ता में रहा और इराक पर प्रतिबंध और नो-फ़्लाई ज़ोन लगे। ओसामा बिन लादेन द्वारा लगभग 1988 में बना अल-क़ायदा सऊदी अरब में अमेरिकी सैनिकों और अमेरिकी नीति का विरोधी था; उसके हमलों की कड़ी 2001 के 9/11 तक पहुँची। राष्ट्रपति बुश ने "आतंक के विरुद्ध युद्ध" घोषित किया। अक्टूबर 2001 में अमेरिका और साथियों ने अफ़ग़ानिस्तान पर हमला कर अल-क़ायदा को पनाह देने वाले तालिबान को हटाया; पर बिन लादेन बच निकला और तालिबान का विद्रोह बढ़ा। मार्च 2003 में अमेरिका और ब्रिटेन ने सामूहिक विनाश के हथियारों (WMD) का दावा कर इराक पर हमला किया; सद्दाम का शासन गिरा, वह पकड़ा गया और बाद में उसे फाँसी हुई, पर WMD नहीं मिले। युद्ध और उसके बाद के वर्षों में बहुत से नागरिक मारे गए, लाखों बेघर हुए, सेवाएँ टूटीं और सांप्रदायिक हिंसा बढ़ी, साथ ही नए चुनाव भी हुए।
- खोज का युग (लगभग 1400–1600) – लगभग 1400 से 1600 के बीच पुर्तगाल और स्पेन के नाविकों ने, और बाद में दूसरे यूरोपीय देशों ने, दुनिया के महासागरों में नए समुद्री रास्ते खोले। वे बिचौलियों के बिना मसाले और सोना चाहते थे, ईसाई धर्म फैलाना चाहते थे और नाम कमाना चाहते थे। कैरवेल जहाज़, कुतुबनुमा, एस्ट्रोलैब और बेहतर नक्शों ने लंबी यात्राएँ मुमकिन कीं। डियास अफ़्रीका के दक्षिणी सिरे तक पहुँचा (1488), कोलंबस अमेरिका पहुँचा (1492), वास्को द गामा भारत पहुँचा (1498) और मैगलन के बेड़े ने दुनिया का चक्कर लगाया (1519–22)। इससे पहले चीन के झेंग हे के बड़े बेड़े अफ़्रीका तक गए थे (1405–33)। इन यात्राओं ने पहली बार पूरी दुनिया को जोड़ा। यूरोप को व्यापार, नई फ़सलें और धन मिला, पर दूसरों को जीत लिया जाना, जानलेवा बीमारियाँ और अटलांटिक दास व्यापार झेलना पड़ा।
- खोजों के युग में स्पेन, 1469–1598 – 1469 में कास्तील की इसाबेला का आरागॉन के फ़र्डिनेंड से विवाह हुआ, जिससे ताजों का मेल बना। कैथोलिक सम्राटों ने राजसत्ता फिर मज़बूत की, धर्म को एकता का औज़ार बनाया (इन्क्विज़िशन, ग्रेनाडा का पतन, यहूदियों का निष्कासन, मुसलमानों का ज़बरन धर्मांतरण) और कोलंबस की मदद की। उनके पोते चार्ल्स प्रथम (सम्राट चार्ल्स पंचम) को विशाल साम्राज्य विरासत में मिला; उसने महँगे युद्ध लड़े और विजेताओं ने एज़्टेक व इंका साम्राज्य जीते। फ़िलिप द्वितीय ने पहले विश्वव्यापी साम्राज्य पर राज किया, लेपांटो जीता और पुर्तगाल पाया, पर डच विद्रोह, आर्मडा की असफलता, मोरिस्को विद्रोह और बार-बार दिवालियापन झेला। अमेरिकी चाँदी ताक़त के साथ महँगाई और कर्ज़ भी लाई और गहरी औपनिवेशिक विरासत छोड़ी।
- गतिविधि: एक संगठित बहु-जातीय राज्य कैसे बना – इस गतिविधि में तुम युवा इतिहासकार बनते हो। तुम प्रश्न पूछते हो, प्रमाण जुटाते हो, घटनाओं को समय-रेखा पर रखते हो (किन 221 ई.पू., हान, युआन, छिंग), निष्कर्ष लिखते हो और प्रस्तुत करते हो। इतिहासकार हमेशा एकमत नहीं होते, इसलिए प्रमाण दिखाओ।
- गतिविधि: सामाजिक जीवन में बदलाव – रोज़मर्रा की ज़िंदगी में बदलाव जानने के लिए एक विषय चुनें (फ़ोन, यात्रा, खाना, ख़रीदारी), अलग उम्र के लोगों से वही सवाल पूछें, जवाब गिनें, पहले और अब की तुलना करें, बदलाव के कारण खोजें और चार्ट, समय-रेखा और छोटी कहानी से प्रस्तुत करें।
- गुलाबों का युद्ध (1450–1499): ताज कैसे बार-बार बदला – गुलाबों का युद्ध इंग्लैंड के ताज के लिए शाही परिवार की दो शाखाओं की लंबी लड़ाई थी: लंकास्टर (लाल गुलाब) और यॉर्क (सफ़ेद गुलाब)। 1450 के दशक में कई समस्याएँ एक साथ थीं: कमज़ोर और कभी-कभी बीमार राजा हेनरी VI, फ्रांस में हार, ख़ाली ख़ज़ाना, और निजी सेनाओं वाले ताक़तवर सामंत। ड्यूक ऑफ़ यॉर्क ने पहले सरकार में हिस्सा माँगा, फिर गद्दी पर दावा किया। 1455 में सेंट एल्बन्स से लड़ाई शुरू हुई। 1461 में टॉटन जीतकर यॉर्क का बेटा एडवर्ड IV राजा बना। 'राजा बनाने वाले' वॉरविक ने 1470 में हेनरी VI को लौटाया, पर 1471 में एडवर्ड फिर जीता और 1483 तक अच्छा राज किया। फिर उसका भाई रिचर्ड III राजा बना और दोनों छोटे राजकुमार ग़ायब हो गए। 1485 में बॉसवर्थ में हेनरी ट्यूडर जीता, यॉर्क की एलिज़ाबेथ से विवाह करके दोनों गुलाब जोड़े, और 1499 तक सारे दावेदारों को हरा दिया।
- गोर्यो राजवंश (918–1392) – गोर्यो कोरिया का एक राज्य था जो 474 साल चला। वांग गन ने 918 में इसकी नींव रखी और 936 में बँटी हुई ज़मीन को एक किया। इसने थांग जैसी सरकार बनाई, परीक्षा से अधिकारी चुने, सोंग से व्यापार किया, खितान को रोका, फिर सेनापतियों का शासन देखा, मंगोलों से लड़ा और युआन के असर में रहा, जब तक राजा गोंगमिन ने सुधार नहीं किए। 1392 में सेनापति यी सोंग-गे ने इसे समाप्त किया। "कोरिया" नाम गोर्यो से ही निकला है।
- चार मई आंदोलन (1919) – नव संस्कृति आंदोलन (1915 से) ने लोकतंत्र, विज्ञान और रोज़ की भाषा में लेखन की माँग की। जब पेरिस शांति वार्ता में शानतुंग में जर्मनी के अधिकार जापान को दिए गए, तो 4 मई 1919 को पेइचिंग में 3,000 से ज़्यादा छात्र सड़कों पर उतरे। व्यापारियों और मज़दूरों की हड़तालें हुईं, तीन अधिकारी हटे और चीन ने संधि पर हस्ताक्षर नहीं किए। आंदोलन ने आधुनिक चीनी राजनीति का नया दौर खोला।
- चिकित्सा का इतिहास – लगभग 1000 से 1500 तक ज़्यादातर डॉक्टर प्राचीन यूनानी विचार मानते थे: शरीर के चार द्रवों का संतुलन बिगड़ने से बीमारी होती है, इलाज खून निकालना, जड़ी-बूटी और प्रार्थना। पुनर्जागरण (1500–1700) में शरीर की सही रचना (वेसेलियस), खून का घूमना (हार्वे) और पहला टीका (जेनर, 1796) आया। 1800 के दशक में रोगाणु सिद्धांत (पाश्चर, कोख) ने बताया कि कीटाणु बीमारी करते हैं; सर्जरी में दर्द, संक्रमण और खून बहना हल हुए। 1900 के बाद एंटीबायोटिक, एक्स-रे, डीएनए, युद्ध, तकनीक और सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था ने चिकित्सा बदल दी। बदलाव में व्यक्ति, विज्ञान, तकनीक, युद्ध, सरकार और संचार ने मदद की; परंपरा और ज्ञान की कमी ने रोका।
- चिन एकीकरण: सात राज्य, एक साम्राज्य – लगभग 500 साल तक चीन आपस में लड़ते कई राज्यों में बँटा रहा। 221 ई.पू. में पश्चिमी राज्य चिन ने छह प्रतिद्वंद्वियों में से आख़िरी को हराया और उसका राजा प्रथम सम्राट बना। उसने एक सिक्का, एक लिपि और एक माप-तौल बनाई। उसने देश को ऐसे क्षेत्रों में बाँटा जिन्हें वह अधिकारी चलाते थे जिन्हें वह हटा सकता था। इसे केंद्रीकृत व्यवस्था कहते हैं। पर भारी कर, बेगार और कठोर क़ानूनों से किसान नाराज़ हुए। 210 ई.पू. में उसकी मृत्यु के बाद उन्होंने विद्रोह किया और एकीकरण के सिर्फ़ 15 साल बाद, 206 ई.पू. में, चिन ख़त्म हो गया।
- चीन 1842-2001: कमज़ोर साम्राज्य से बड़ी शक्ति तक – 1842 में चीन एक विशाल साम्राज्य था जो पहला अफ़ीम युद्ध हार गया और उसे पहली असमान संधि पर दस्तख़त करने पड़े। छिंग (Qing) सरकार कमज़ोर थी, विदेशी दबाव और ताइपिंग विद्रोह जैसे विद्रोहों से घिरी थी; उसके आत्म-सुदृढ़ीकरण सुधार (शस्त्रागार, जहाज़ घाट, कारखाने) बहुत धीमे थे, फिर 1895 में जापान से हार और 1900 का बॉक्सर विद्रोह आया, और 1911 की क्रांति ने साम्राज्य का अंत कर दिया। 1912 में शुरू हुए गणराज्य में मज़बूत केंद्र नहीं था: क्षेत्रों पर सरदारों का राज था, 1919 के चार मई आंदोलन ने नए विचार दिए, राष्ट्रवादी और साम्यवादी पहले साथ आए और फिर लड़े, जबकि जापान ने 1931 से बड़े इलाकों पर क़ब्ज़ा किया और 1937 में पूरा आक्रमण किया। गृहयुद्ध के बाद 1949 में जनवादी गणराज्य की घोषणा हुई। एक दल का शासन, सोवियत मदद से भारी उद्योग की सरकारी योजनाएँ और महान छलांग तथा सांस्कृतिक क्रांति जैसे जन अभियान तेज़ बदलाव और भारी कठिनाई दोनों लाए। शीत युद्ध में चीन की जगह सोवियत संघ से गठजोड़ से बदलकर अलगाव और अमेरिका से संपर्क तक पहुँची। 1978 के बाद देंग शियाओपिंग के आर्थिक सुधारों और खुलेपन (खेती में सुधार, विशेष आर्थिक क्षेत्र, व्यापार और विदेशी निवेश) से तेज़ विकास, बढ़ती समृद्धि और 2001 में विश्व व्यापार संगठन की सदस्यता मिली।
- चीन और पश्चिम की राजनीतिक व्यवस्थाएँ – राजनीतिक व्यवस्था वह ढंग है जिससे राज्य सत्ता बाँटता है: कौन निर्णय लेता है, कौन लागू करता है और कौन जाँचता है। प्राचीन चीन ने सम्राट के नीचे केंद्रीकृत पिरामिड बनाया, जिसमें अधिकारी और बाद में तीन विभाग-छह मंत्रालय थे। यूनान और रोम में नागरिकों की सभाओं और सीनेट में आवाज़ थी। आधुनिक पश्चिमी राज्य सत्ता को विधायिका, कार्यपालिका और न्यायालय में बाँटते हैं। आधुनिक चीन जन कांग्रेसों के माध्यम से चलता है और कम्युनिस्ट पार्टी नेतृत्व करती है। इतिहास के सुधार केंद्रीय नियंत्रण और साझा सत्ता की लंबी खींचतान दिखाते हैं।
- जनवरी विद्रोह (1863-64) – जनवरी विद्रोह रूसी शासन के खिलाफ़ पोलैंड का विद्रोह था, जो 22 जनवरी 1863 को शुरू हुआ और 1864 में खत्म हुआ। इसे छोटी गुरिल्ला टुकड़ियों और एक भूमिगत सरकार ने लड़ा। यह हार गया और रूस ने कड़ा दमन और निर्वासन किया, पर इसी से किसानों की ज़मीन का सवाल भी हल की ओर बढ़ा।
- ज़मीनी साम्राज्य (1450–1750): विस्तार, शासन, आस्था और तुलना – साम्राज्य यानी एक केंद्र का बहुत-से लोगों और इलाक़ों पर राज। 1450 से 1750 तक उस्मानी, सफ़वी, मुग़ल और चिंग साम्राज्य बारूद वाली सेनाओं से फैले, वेतन वाले अधिकारियों और भू-राजस्व से शासन चलाया, और धर्म व स्मारकों से अपने राज के अधिकार को दिखाया।
- जातीय संबंध और अंतरराष्ट्रीय संबंध – अलग जीवन-शैली वाले जन, जैसे किसान और चरवाहे, व्यापार, विवाह-संधि और संघर्ष से मिले और सदियों में बड़े समुदायों में घुल गए। यूरोप में 1648 के बाद समान संप्रभु राज्यों और साझा संधियों का विचार अंतरराष्ट्रीय क़ानून में बदला। आधुनिक राज्य जातीय विविधता को समान अधिकार, एकता और चीन में क्षेत्रीय जातीय स्वायत्तता से संभालते हैं। कूटनीति, झांग छियेन की यात्राओं से 1954 के शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के पाँच सिद्धांतों तक, राज्यों के संबंध शांत और उपयोगी रखती है।
- जापान का लोकतंत्रीकरण और शीत युद्ध की दुनिया – 1945 के बाद जापान मित्र देशों की देखरेख (GHQ) में रहा, जिसका नेतृत्व अमेरिका के पास था। सुधारों ने किसानों को ज़मीन, महिलाओं को वोट और मज़दूरों को अधिकार दिए और बड़े व्यापारिक घरानों को तोड़ा। 1947 के संविधान ने संप्रभुता जनता को दी और युद्ध का त्याग किया। शीत युद्ध बढ़ने पर जापान पश्चिमी गुट का साथी बना और 1951 की शांति संधि से 1952 में उसकी स्वतंत्रता लौटी।
- जापान की औद्योगिक क्रांति और आधुनिक संस्कृति – लगभग 1880 के दशक से जापान ने मशीन से चलने वाली रेशम और सूती मिलें बनाईं, फिर लगभग 1900 में भारी उद्योग, जैसे यावाता स्टील वर्क्स (1901)। निर्यात और बड़े कारोबारी घराने (जाइबात्सु) बढ़े। पर मज़दूरों को लंबे घंटे और कम मज़दूरी मिली, और आशियो जैसी खदानों ने नदियाँ दूषित कीं, इसलिए सामाजिक समस्याएँ और पहले मज़दूर व विरोध आंदोलन उभरे। साथ ही उपन्यास, कला, विज्ञान और अख़बारों में पश्चिमी और जापानी विचारों के मेल से आधुनिक संस्कृति बनी।
- जोसॉन राजवंश (1392-1910) – जोसॉन कोरिया का वह राज्य था जो 1392 से 1910 तक, लगभग 518 साल चला। यह कन्फ़्यूशियाई राज्य था: एक राजा, छह मंत्रालय, निगरानी करने वाले कार्यालय और अधिकारी चुनने की परीक्षा। इसने जापानी (1592) और मांचू (1627, 1636) हमले झेले, कर-सुधार और व्यावहारिक विद्या से खुद को सँभाला, फिर ससुराल-परिवारों के राज और किसान अशांति से कमज़ोर हुआ।
- ज्ञानोदय (प्रबोधन युग) – ज्ञानोदय (लगभग 1680–1800) यूरोप का एक आंदोलन था जिसने कहा कि दुनिया को समझने और समाज चलाने में सिर्फ़ परंपरा नहीं, तर्क और सबूत काम में लाओ। यह वैज्ञानिक क्रांति से निकला। लॉक, मॉन्टेस्क्यू, वॉल्टेयर, रूसो, कांट और मैरी वॉल्स्टनक्राफ़्ट जैसे विचारकों ने प्राकृतिक अधिकार, शक्तियों का बँटवारा, बोलने और धर्म की आज़ादी और जनता की सहमति से सरकार की बात की। विचार किताबों, अख़बारों, सैलूनों और विश्वकोश से फैले। कुछ राजाओं ने सुधार किए (प्रबुद्ध निरंकुशता); इन विचारों ने अमेरिकी (1776) और फ़्रांसीसी (1789) क्रांति और बाद में भारत समेत दुनिया भर के सुधारकों को प्रेरणा दी।
- ट्यूडर इंग्लैंड (1485–1603) – ट्यूडर वंश ने 118 साल इंग्लैंड पर राज किया। हेनरी सप्तम ने 1485 में युद्ध जीतकर ताज लिया और उसे सुरक्षित किया: विरोधी परिवार में शादी की, ख़ज़ाना भरा और सामंतों को काबू में रखा। हेनरी अष्टम ने अपनी शादी ख़त्म करने के लिए पोप से नाता तोड़ा, ख़ुद चर्च के प्रमुख बने और मठ बंद कराए। उनके बच्चों के समय धर्म बार-बार बदला: एडवर्ड षष्ठ ने प्रोटेस्टेंट बनाया, मैरी प्रथम ने कैथोलिक पूजा लौटाई, और एलिज़ाबेथ प्रथम ने प्रोटेस्टेंट 'बीच का रास्ता' चुना। पूरी सदी में आबादी और दाम बढ़े, मज़दूरी पीछे रही, ग़रीबी बढ़ी और निर्धन क़ानून बने। स्कॉटलैंड, फ़्रांस और स्पेन से रिश्ते युद्ध और कच्ची शांति के बीच रहे, और 1588 में आर्मडा लौटा दिया गया।
- ठहराव का दौर: ब्रेझनेव का सोवियत संघ (1964-1985) – ख्रुश्चेव के बाद लियोनिद ब्रेझनेव ने शांत पर बूढ़ा होता देश चलाया। 1965 के सुधारों ने कारख़ानों को थोड़ी छूट दी, पर वे फीके पड़ गए। हर पंचवर्षीय योजना में वृद्धि घटी, जबकि तेल की बिक्री ने कमी ढँकी। सोवियत संघ ने अंतरिक्ष-स्टेशन बनाए, 1975 में अमेरिकियों के साथ उड़ान भरी और भारत का पहला उपग्रह छोड़ा। राज्य की आलोचना करने वाले लेखकों-वैज्ञानिकों (असहमत लोगों) को चुप कराया गया। विदेश नीति में डेटांत (1972-75) ने शीत युद्ध ढीला किया, जब तक कि प्राग (1968) और अफ़ग़ानिस्तान (1979) ने तनाव लौटा नहीं दिया। गोर्बाचेव के साथ 1985 में ठहराव समाप्त हुआ।
- तर्कवाद और अनुभववाद: ज्ञान तर्क से या अनुभव से? – 1600 और 1700 के दशक में यूरोप के विचारकों में बहस हुई कि ज्ञान का स्रोत क्या है। तर्कवादी (देकार्त, स्पिनोज़ा, लाइबनिट्ज़) कहते थे कि सबसे पक्का ज्ञान तर्क (बुद्धि) से आता है और कुछ विचार जन्मजात हैं। देकार्त ने हर चीज़ पर शक किया और एक निश्चित बात पर पहुँचे: "मैं सोचता हूँ, इसलिए मैं हूँ"। अनुभववादी (लॉक, बर्कले, ह्यूम) कहते थे कि सारे विचार अनुभव से आते हैं; जन्म के समय मन कोरी पट्टी है। ह्यूम ने दिखाया कि हम कारण को कभी देखते नहीं, सिर्फ़ एक घटना के बाद दूसरी देखते हैं; कारण पर हमारा विश्वास आदत से आता है। बाद में कांट ने दोनों को जोड़ा।
- ताइपिंग आंदोलन (1850-1864) – ताइपिंग आंदोलन 1850 से 1864 तक चीन में हुआ एक विशाल विद्रोह था। भूख, भारी कर और कमज़ोर छिंग सरकार पर ग़ुस्से ने बहुत से ग़रीब लोगों को हॉन्ग श्योछ्वान के साथ खड़ा कर दिया। 1851 में उन्होंने "महान शांति के स्वर्गीय राज्य" की घोषणा की और 1853 में उनकी सेना ने नानजिंग लेकर उसे राजधानी बनाया। ताइपिंग ने साझा ज़मीन, स्त्री-पुरुष की बराबरी और अफ़ीम, जुआ व पैर बाँधने पर रोक का वादा किया। पर कई योजनाएँ काग़ज़ पर ही रहीं, 1856 में नेता आपस में लड़ पड़े और उनके नए धर्म से कई विद्वान दूर हो गए। छिंग की क्षेत्रीय सेनाओं ने, विदेशी-प्रशिक्षित दस्तों की मदद से, 1864 में नानजिंग ले लिया। युद्ध में लाखों जानें गईं और असली शक्ति छिंग के केंद्र से क्षेत्रीय नेताओं के पास चली गई।
- ताओवाद (दाओवाद) – ताओवाद प्राचीन चीन की सोच है कि हमें दाओ, यानी प्रकृति की 'राह' के साथ तालमेल में जीना चाहिए। लाओज़ी (ताओ ते चिंग) ने कोमलता, सरलता और वू वेई, यानी बिना ज़ोर लगाए कर्म, सिखाया। ज़ुआंगज़ी ने कहानियों से दिखाया कि बड़ा-छोटा, अच्छा-बुरा जैसे विचार हमारे नज़रिए पर निर्भर हैं, इसलिए हमें स्वतंत्र और लचीला होना चाहिए। यिन और यांग बताते हैं कि विपरीत चीज़ें एक-दूसरे को संतुलित करती हैं। आज वू वेई का अर्थ है प्रकृति और अपनी सीमाओं के साथ काम करना, उनसे लड़ना नहीं।
- तीन महाद्वीपों में फैला हुआ साम्राज्य: रोमन साम्राज्य – रोमन साम्राज्य भूमध्य सागर के चारों ओर की ज़मीन पर फैला था: यूरोप, पश्चिम एशिया और उत्तर अफ़्रीका के हिस्से। सत्ता तीन के बीच बँटी थी: सम्राट, सीनेट और सेना। अर्थव्यवस्था खेती, नगरों, जहाज़ों, सिक्कों और जैतून तेल, शराब व अनाज के व्यापार पर चलती थी। समाज परतों में बँटा था, ऊपर अमीर सीनेटर और नीचे बहुत सारे दास। रोमन व्यापारी मानसूनी हवाओं से भारत के बंदरगाहों तक आते थे। चौथी सदी से बदलाव आया: ईसाई धर्म मुख्य धर्म बना, कुस्तुंतुनिया नई राजधानी बनी और 476 ई. में पश्चिमी हिस्सा टूट गया। इस बदलाव के दौर को 'उत्तर-पुरातन काल' कहते हैं।
- तीन राज्य से तांग तक की संस्कृति (220 से 907) – 220 से 907 के बीच चीन ने युद्ध भी देखा और स्वर्ण युग भी। भारत से बौद्ध धर्म आया और कन्फ़्यूशियस व दाओ विचारों के साथ घुल-मिल गया। कविता, सुलेख, चित्र और गुफा-कला खिलीं। वैज्ञानिकों ने पाई का अच्छा मान निकाला, सबसे पुरानी तारीख़ वाली किताब छापी और बारूद खोजा।
- तीन राज्य से दक्षिणी राजवंश तक: सत्ता-परिवर्तन और जातीय मेल – 220 ई. में हान के अंत के बाद चीन तीन राज्यों में बँट गया: वेई, शू और वू। जिन राजवंश ने 280 ई. में इन्हें जोड़ा, पर राजकुमारों के युद्धों और आक्रमणों से 316 ई. तक वह टूट गया। जिन नेता दक्षिण भागे और पूर्वी जिन (317 ई.) बनाया। अगले लगभग 270 साल उत्तर पर पशुपालक समूहों के शुरू किए राजवंश, जैसे उत्तरी वेई, शासन करते रहे, जबकि दक्षिण में चार छोटे हान-नेतृत्व वाले राजवंश थे: सोंग, छी, लियांग, छन। इस लंबे विभाजन-काल में लाखों लोग चले, खेती दक्षिण तक फैली, और अलग-अलग समुदाय विवाह, भाषा, पहनावे और बौद्ध धर्म के ज़रिये आपस में मिले। इस मेल ने सुई और तांग की ज़मीन तैयार की।
- तीन वर्ग: यूरोप का सामंती समाज – लगभग 9वीं से 16वीं सदी तक पश्चिमी यूरोप में सामंती समाज था। लोगों को तीन वर्गों में देखा जाता था: प्रार्थना करने वाले पादरी, लड़ने वाले अभिजात और काम करने वाले किसान। लॉर्ड राजा से ज़मीन लेते थे और अपनी जागीर (मेनर) चलाते थे, जहाँ कृषिदास काम करते थे। नए औज़ारों और व्यापार से शहर बढ़े, पर 14वीं सदी में ठंडे मौसम, अकाल और ब्लैक डेथ से संकट आया। इसके बाद फ़्रांस, इंग्लैंड, स्पेन के राजाओं ने स्थायी सेना और कर-व्यवस्था बनाई; यहीं से राष्ट्र-राज्यों की शुरुआत हुई।
- तीस वर्षीय युद्ध (1618–1648) और वेस्टफ़ालिया की संधि – तीस वर्षीय युद्ध 1618 से 1648 तक मुख्य रूप से मध्य यूरोप में लड़ी गई लंबी लड़ाइयों की शृंखला थी। यह पवित्र रोमन साम्राज्य के भीतर कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट शासकों के झगड़े से शुरू हुआ, 1618 की प्राग की खिड़की वाली घटना के बाद। डेनमार्क, स्वीडन और फ़्रांस एक-एक करके जुड़ते गए, इसलिए यह आस्था के साथ-साथ ताक़त की लड़ाई भी बन गई। सेनाएँ ज़मीन से ही खाना लेती थीं, और सबसे ज़्यादा प्रभावित इलाक़ों में लगभग हर तीसरा आदमी लड़ाई, भूख और बीमारी से मरा। यूक्रेनी कोसैक भी भाड़े के सैनिक बनकर लड़े, जैसे 1646 में डनकर्क में। युद्ध 1648 की वेस्टफ़ालिया की संधि से खत्म हुआ, जिसने राज्यों को अपने मामलों पर अधिकार दिया और क़ानून में बराबर माना। इस विचार को वेस्टफ़ालियाई व्यवस्था कहते हैं।
- तुंगमेंगहुई: 1905 का क्रांतिकारी गठबंधन – तुंगमेंगहुई (चीनी क्रांतिकारी गठबंधन) की स्थापना अगस्त 1905 में तोक्यो में सुन यात-सेन के नेतृत्व में तीन क्रांतिकारी समूहों को जोड़कर हुई। इसका लक्ष्य छिंग शासन ख़त्म करके गणराज्य बनाना था। सुन ने लक्ष्य को तीन सिद्धांतों से समझाया: राष्ट्रवाद, लोकतंत्र और जन-आजीविका। उसने अख़बार चलाया और कई विद्रोह किए।
- दुनिया के व्यापार नेटवर्क, लगभग 1200–1450 – लगभग 1200 से 1450 के बीच तीन बड़े नेटवर्क अफ़्रीका, एशिया और यूरोप को जोड़ते थे: ज़मीन पर रेशम मार्ग, समुद्र में हिंद महासागर के रास्ते, और रेगिस्तान में सहारा पार के ऊँट-मार्ग। व्यापार इसलिए बढ़ा क्योंकि अलग-अलग क्षेत्रों के पास अलग चीज़ें थीं, नई तकनीक ने सफ़र सुरक्षित और सस्ता किया, और ताक़तवर राज्यों (चीन के सोंग और मिंग, मंगोल साम्राज्य, माली, स्वाहिली शहर-राज्य और मुस्लिम सल्तनतें) ने व्यापारियों की रक्षा की। इन रास्तों पर रेशम, मसाले, सोना और नमक ही नहीं, धर्म, तकनीक, फ़सलें और बीमारी भी चलीं। साथ ही पूर्वी एशिया, इस्लामी दुनिया, दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया, अफ़्रीका, यूरोप और अमेरिका में राज्य अपने-अपने ढंग से बढ़े।
- देर का एदो जापान: अकाल, सुधार और पश्चिमी शक्तियों का आना – 1700 के दशक से ख़राब फ़सलों ने बड़े अकाल लाए (1732, 1782-87, 1833-39)। भूखे गाँववाले विद्रोह में उठे और नगरों में भीड़ ने चावल की दुकानों पर हमले किए। शोगुनेट ने तीन सुधार आज़माए (क्योहो 1716, कांसेई 1787, तेम्पो 1841), पर धन का व्यापार चावल-कर की व्यवस्था से ज़्यादा ताक़तवर था। उसी बीच रूसी और ब्रिटिश जहाज़ पास आए और अफ़ीम-युद्ध की ख़बर ने जापान को चेताया। 1853 तक शोगुनेट कमज़ोर हो चुका था।
- दो विश्व युद्धों के बीच का काल (1918–1939) – प्रथम विश्व युद्ध के अंत (1918) से द्वितीय के आरंभ (1939) तक चार साम्राज्य टूटे और मध्य-पूर्वी यूरोप में कई नए राज्य बने। वर्साय-वॉशिंगटन शांति व्यवस्था और राष्ट्र संघ ने व्यवस्था बनाए रखने की कोशिश की। 1920 के दशक की शुरुआती अशांति के बाद थोड़ी स्थिरता आई, पर 1929 के शेयर बाज़ार पतन से महामंदी शुरू हुई। भारी बेरोज़गारी ने लोकतंत्रों को कमज़ोर किया; ज़्यादातर नए राज्य सत्तावादी बने, जबकि फ़ासीवादी इटली, नाज़ी जर्मनी और स्टालिन का सोवियत संघ सर्वसत्तावादी बने। सरकारें अर्थव्यवस्था सँभालने लगीं, राष्ट्र संघ आक्रमण नहीं रोक सका, और स्पेनी गृहयुद्ध व तुष्टीकरण 1939 के युद्ध तक ले गए।
- दोनों विश्व युद्ध: कारण, नुक़सान और नई विश्व व्यवस्था – प्रथम विश्व युद्ध (1914–1918) सैन्यवाद, गुटबंदी, साम्राज्यवादी होड़ और राष्ट्रवाद से पैदा हुआ, और 1914 की एक हत्या ने चिंगारी लगाई। उसकी शांति संधि, महामंदी और तानाशाहों के उदय से द्वितीय विश्व युद्ध (1939–1945) हुआ। दोनों संपूर्ण युद्ध थे, जिनमें पूरी अर्थव्यवस्था और नई तकनीक लगी। दूसरे युद्ध में लगभग चार गुना लोग मरे, आधे से ज़्यादा आम नागरिक, जिनमें होलोकॉस्ट में मारे गए साठ लाख यहूदी भी हैं। पहले युद्ध के बाद राष्ट्र संघ असफल रहा; दूसरे के बाद संयुक्त राष्ट्र, मानव अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा (1948) और उपनिवेशों की आज़ादी ने दुनिया बदल दी।
- द्वितीय विश्व युद्ध (1939–1945) – द्वितीय विश्व युद्ध इतिहास का सबसे जानलेवा युद्ध था। इसकी जड़ें थीं: पहले विश्व युद्ध के बाद की नाराज़गी, महामंदी, और जर्मनी, इटली व जापान में तानाशाहों का उदय। यह 1 सितंबर 1939 को जर्मनी के पोलैंड पर हमले से शुरू हुआ। धुरी राष्ट्र (जर्मनी, इटली, जापान) मित्र राष्ट्रों (ब्रिटेन और उसका साम्राज्य, फ़्रांस, सोवियत संघ, अमेरिका, चीन आदि) से लड़े। यह संपूर्ण युद्ध और विनाश का युद्ध था: होलोकॉस्ट में लगभग 60 लाख यहूदियों की हत्या हुई और कुल 7–8.5 करोड़ लोग मरे। जर्मनी ने मई 1945 और जापान ने सितंबर 1945 में आत्मसमर्पण किया। इसके बाद संयुक्त राष्ट्र बना, शीत युद्ध शुरू हुआ और साम्राज्य टूटे।
- द्वितीय विश्व युद्ध का पिछला मोर्चा: निकासी और युद्ध-अर्थव्यवस्था – पिछला मोर्चा (होम फ्रंट) यानी वे सब लोग जो लड़ते नहीं, पर जीत में मदद करते हैं: मज़दूर, किसान, परिवार। 1941-42 में सोवियत संघ ने लगभग 1,500 बड़े कारख़ाने और क़रीब 1 करोड़ लोग लड़ाई से दूर पूर्व भेजे और उन्हें काम पर लगाया। युद्ध-अर्थव्यवस्था में युद्ध का सामान सबसे पहले बनता है और खाना राशन कार्ड से बँटता है। दूसरे देशों में भी पिछला मोर्चा था।
- द्वितीय विश्व युद्ध में आपका इलाक़ा: मोर्चा, पिछला क्षेत्र और क़ब्ज़ा – बड़ा युद्ध हर इलाक़े तक अलग तरह से पहुँचा। कुछ इलाक़े पिछले क्षेत्र थे, लड़ाई से दूर, और युद्ध के लिए काम करते थे। कुछ मोर्चे के पास थे और रक्षा-पंक्ति बन गए। कुछ पर दुश्मन का क़ब्ज़ा हुआ और वहाँ लोगों ने कठिनाई सही और कभी-कभी विरोध भी किया। हर इलाक़े की अपनी कहानी है, जो संग्रहालय, स्मारक, अभिलेखागार और परिवार की यादों से खोजी जा सकती है।
- धर्मयुद्ध: यूरोप और पश्चिम एशिया के बीच पवित्र युद्ध – धर्मयुद्ध (क्रूसेड) धार्मिक युद्धों की एक शृंखला थे, ज़्यादातर 1095 से 1291 के बीच, जिनमें लैटिन (कैथोलिक) यूरोप की सेनाओं ने यरूशलम और आसपास की ज़मीन जीतने और बचाए रखने की कोशिश की. 1071 में मंज़िकर्ट में सल्जूक तुर्कों ने बाइज़ेंटाइन सेना हराई, सम्राट ने मदद माँगी, और 1095 में पोप अर्बन द्वितीय ने सशस्त्र तीर्थयात्रा का आह्वान किया. पहले धर्मयुद्ध ने 1099 में यरूशलम लिया और चार क्रूसेडर राज्य (आउटरेमर) बनाए. मुस्लिम शासक धीरे-धीरे एक हुए: ज़ंगी ने 1144 में एडेसा लिया, दूसरा धर्मयुद्ध विफल रहा, और सलादीन ने 1187 में हत्तीन जीतकर यरूशलम वापस लिया. तीसरे धर्मयुद्ध (1189–92) ने तटीय नगर लिए पर यरूशलम नहीं, और चौथा (1202–04) ईसाई नगर कॉन्स्टेंटिनोपल पर ही टूट पड़ा. अंतिम क्रूसेडर नगर अक्का 1291 में गया. इनसे भारी नुकसान हुआ, पर व्यापार और विचारों का लेन-देन भी बढ़ा.
- धर्मसुधार आंदोलन और कैथोलिक सुधार: कारण और प्रभाव – 1500 के दशक में पश्चिमी यूरोप का एक ईसाई चर्च बँट गया। लोग माफ़ीनामे बेचने और भ्रष्टाचार से नाराज़ थे, छापाख़ाने ने नए विचार तेज़ी से फैलाए और राजा ज़्यादा ताक़त चाहते थे। लूथर (1517), काल्विन और इंग्लैंड के राजा ने प्रोटेस्टेंट चर्च बनाए। कैथोलिक चर्च ने अपना सुधार किया। युद्धों के बाद संधियों ने शांति लाई।
- नई आर्थिक नीति (NEP), 1921–1928 – नई आर्थिक नीति 1921 में लेनिन का रास्ता बदलना था, जब युद्ध साम्यवाद अकाल और विद्रोहों में ख़त्म हुआ। अनाज की वसूली की जगह तय कर लगा, छोटा निजी व्यापार और खेती की इजाज़त मिली, और राज्य ने अर्थव्यवस्था की ऊँची चोटियाँ अपने पास रखीं। 1926–27 तक उत्पादन लगभग 1913 के स्तर पर लौटा, पर कैंची संकट, अनाज रोके जाने और पार्टी की बहस से 1928–29 के आसपास यह नीति ख़त्म हुई और पंचवर्षीय योजनाएँ शुरू हुईं।
- नए इलाक़ों की खोज: 17वीं सदी में साइबेरिया और सुदूर पूर्व – 1600 के दशक में रूसी कज़ाक, व्यापारी और अधिकारी एक सदी से कम में साइबेरिया पार करके पूर्व पहुँचे, ज़्यादातर फर के लिए। उन्होंने नदियों के किनारे ऑस्त्रोग नाम के क़िले बनाए (तोबोल्स्क, तोम्स्क, येनिसेस्क, याकुत्स्क), ओखोत्स्क (1647) पर प्रशांत तक पहुँचे, सुदूर उत्तर-पूर्व के सिरे का समुद्र से चक्कर लगाया (देझनेव, 1648), अमूर (पोयारकोव, खाबारोव) और कामचाटका (अतलासोव, 1697) की खोज की। याकूत जैसे स्थानीय लोगों से यासाक नाम का फर-कर लिया गया; नेरचिन्स्क की संधि (1689) ने अमूर पर चीन के साथ सीमा तय की।
- नागरिक अधिकार आंदोलन: आम लोगों ने अन्यायपूर्ण क़ानून कैसे बदले – नागरिक अधिकार आंदोलन (लगभग 1954–1968) अमेरिका में काले अमेरिकियों और उनके साथियों का बड़ा अभियान था, जिसका लक्ष्य क़ानूनी अलगाव और भेदभाव ख़त्म करना था। दासता ख़त्म होने के बाद "जिम क्रो" क़ानूनों ने काले लोगों को अलग और ख़राब स्कूलों, सीटों और सेवाओं में रखा और वोट देने से रोका। अदालती मुक़दमों, बहिष्कार, सिट-इन, फ़्रीडम राइड और मार्च से, और ज़्यादातर गांधी से प्रेरित अहिंसक तरीकों से, NAACP, SCLC, SNCC और CORE जैसे संगठनों ने ब्राउन फ़ैसला (1954), नागरिक अधिकार अधिनियम (1964), मताधिकार अधिनियम (1965) और फ़ेयर हाउसिंग अधिनियम (1968) जीते। बाद में ब्लैक पावर, ब्लैक कला और ब्लैक नारीवादी आंदोलनों तथा उपनिवेश-विरोधी संघर्षों से जुड़ाव ने लड़ाई आगे बढ़ाई। आवास, संपत्ति और न्याय में असमानता पर बहस आज भी जारी है।
- निकोलस प्रथम की आंतरिक नीति (1825-1855) – निकोलस प्रथम 1825 में ज़ार बने, ठीक तभी जब अफ़सरों ने बग़ावत की (डिसेम्ब्रिस्ट)। उन्होंने कड़ी पकड़ से जवाब दिया। उन्होंने अपनी निजी चांसलरी बनाई, जिसके कई खंड थे। तीसरा खंड गुप्त पुलिस था। सेंसर बहुत सख़्त था। साथ ही स्पेरांस्की की टीम ने सारे क़ानूनों को 15 जिल्दों की "क़ानून संहिता" में सजाया, और उवारोव ने "रूढ़िवादी चर्च, निरंकुशता, राष्ट्रीयता" का विचार दिया। कुछ काम की चीज़ें भी हुईं: राज्य के किसानों के लिए सुधार, चाँदी का रूबल और पहली रेल।
- निकोलस प्रथम की विदेश नीति और क्रीमिया युद्ध – निकोलस प्रथम (1825-1855) के समय रूस ने फ़ारस (1828) और तुर्की (1829) से संधियाँ जीतीं और 1849 में हंगरी की बग़ावत दबाने में मदद की। "पूर्वी प्रश्न" यह था कि तुर्की राज्य के कमज़ोर होने पर किसका असर बढ़ेगा। 1853 में युद्ध शुरू हुआ, रूस सिनोप में जीता, फिर ब्रिटेन और फ़्रांस तुर्की के साथ आ गए (1854)। सेवास्तोपोल की लंबी घेराबंदी के बाद पेरिस की संधि (1856) ने काला सागर को तटस्थ बनाया। युद्ध ने दिखाया कि रूस जहाज़ों, बंदूकों और रेल में पीछे है, और इससे महान सुधार शुरू हुए।
- निरंकुशता और प्रबोधन के युग में रूस (1682–1796) – 1682 में रूस एक विशाल, ज़्यादातर ग्रामीण देश था। ज़ार के पास लगभग पूरी ताक़त थी; ऑर्थोडॉक्स चर्च, पुराने सामंत परिवार (बोयार) और ज़मीन से बँधे करोड़ों भूदास (serfs) थे। पीटर महान ने 1689 में पूरी सत्ता ली, पश्चिमी यूरोप घूमे और ज़बरदस्ती बदलाव किए: नई सेना और नौसेना, सेंट पीटर्सबर्ग नई राजधानी, नई सरकारी संस्थाएँ, पदों की तालिका और चर्च पर राज्य का नियंत्रण। उन्होंने स्वीडन को हराकर रूस को यूरोप की बड़ी ताक़त बनाया। 1725 के बाद महल तख़्तापलट का दौर आया, जब गार्ड रेजिमेंटों ने शासक बिठाए। एलिज़ाबेथ ने स्थिरता और संस्कृति दी। कैथरीन महान (1762–96) प्रबोधन की भाषा बोलती थीं और स्थानीय शासन सुधारा, पर भूदास प्रथा कठोर हुई, सामंतों को विशेषाधिकार मिले, और पुगाचोव विद्रोह (1773–75) ने गहरा ग़ुस्सा दिखाया। ऑटोमन युद्धों और पोलैंड के बँटवारों से रूस बड़ा हुआ।
- निरंकुशतावाद: जब सारी ताक़त एक राजा के हाथ में थी – निरंकुशतावाद (लगभग 1600–1789) शासन का ऐसा तरीका था जिसमें लगभग सारी ताक़त एक राजा या रानी के पास होती थी। वही कानून बनाता, वही लागू करता और वही सबसे बड़ा न्यायाधीश होता। राजा कहते थे कि उनकी ताक़त ईश्वर से मिली है (दैवी अधिकार), इसलिए कोई सवाल नहीं कर सकता। देश को काबू में रखने के लिए उन्होंने स्थायी सेना बनाई, वेतन वाले अफ़सर रखे, हर जगह कर वसूले और बड़े कुलीनों को दरबार में उलझाए रखा। फ़्रांस का लुई चौदहवाँ ('सूर्य राजा') और उसका वर्साय महल सबसे बड़ा उदाहरण है। रूस का पीटर महान और ऑस्ट्रिया-स्पेन के हैब्सबर्ग भी ऐसे ही शासक थे। ये राजा अक्सर वाणिज्यवाद अपनाते थे: बाहर ज़्यादा बेचो, कम खरीदो, ताकि सोना देश में आए। इंग्लैंड और डच गणराज्य में संसद और व्यापारियों ने राजा की ताक़त सीमित की, और 1689 के बाद इंग्लैंड संवैधानिक राजतंत्र बना। प्रबोधन (एनलाइटनमेंट) के विचारों और 1789 की फ़्रांसीसी क्रांति ने निरंकुशतावाद को कमज़ोर कर दिया।
- नेपोलियन का यूरोप (1799–1815) – नेपोलियन बोनापार्ट ने 1799 में फ़्रांस की सत्ता ली और 1804 में सम्राट बना। उसकी सेनाओं ने कई युद्ध जीते और साम्राज्य यूरोप के बड़े हिस्से में फैला। उसने नागरिक संहिता भी दी: सब नागरिकों के लिए बराबर क़ानून। 1812 में रूस पर चढ़ाई विफल होने के बाद दुश्मन एकजुट हुए और 1813 व 1815 में उसे हरा दिया। फिर वियना सम्मेलन (1814-15) ने शक्ति-संतुलन के साथ यूरोप को नए सिरे से बसाया और पुराने राजवंश लौटे।
- परिवहन और सामाजिक परिवर्तन – परिवहन तय करता है कि लोग, सामान और विचार कितनी दूर जा सकते हैं। नदियाँ और समुद्र पहली सड़कें थीं: नावें भारी माल सस्ते में ढोती हैं, इसलिए शुरुआती शहर पानी के पास बसे। ज़मीन पर लोग पैदल, फिर लदे पशुओं और गाड़ियों से चले और सड़कें बनीं, पर माल कम और यात्रा लंबी थी। 1800 के दशकों में भाप के जहाज़ों और रेल ने यात्रा तेज़, सस्ती और भरोसेमंद बनाई; बंदरगाहों और स्टेशनों के आसपास शहर बढ़े। 1900 के दशकों में कार, ट्रक, बस और हवाई जहाज़ ने दरवाज़े से दरवाज़े और बहुत तेज़ यात्रा दी। तेज़ परिवहन ने बाज़ार जोड़े, मज़दूर शहरों में पहुँचे, ख़बरें और रीति-रिवाज फैले; साथ में प्रदूषण, दुर्घटना और पुराने व्यापार केंद्रों के पतन जैसी कीमतें भी आईं।
- पश्चिमी और पूर्वी हान: चीन का लंबा स्वर्ण-युग – हान राजवंश ने लगभग 400 साल (206 ई.पू. से 220 ई.) चीन पर शासन किया। चिन के पतन के बाद किसान के बेटे लिउ बांग ने इसकी स्थापना की। शुरू के हान शासकों ने कर घटाए और खेती को संभलने दिया। सम्राट वू (141 से 87 ई.पू.) ने साम्राज्य बढ़ाया और अधिकारियों को कन्फ़्यूशियस के विचारों में प्रशिक्षित किया। उनके दूत चांग छिएन ने रेशम मार्ग का रास्ता खोला, जो व्यापार-मार्गों की ऐसी कड़ी है जिस पर रेशम, विचार और बाद में बौद्ध धर्म आए-गए। वांग मांग के छोटे अंतराल के बाद 25 ई. में पूर्वी हान शुरू हुआ, जिसकी राजधानी लोयांग थी। हान लोगों ने चीन को काग़ज़, भूकंप-सूचक और पहली महान इतिहास-पुस्तक दी। ताक़तवर परिवारों, विद्रोहों और सेनापतियों ने 220 ई. में हान का अंत किया।
- पिघलाव (थॉ): ख्रुश्चेव का सोवियत संघ (1953-1964) – 1953 में स्टालिन के निधन के बाद निकिता ख्रुश्चेव मुख्य नेता बने। 1956 के गुप्त भाषण में उन्होंने स्टालिन की आलोचना की, बहुत से क़ैदी छूटे और लेखकों को ज़्यादा जगह मिली। राज्य ने अनाज के लिए कुँवारी भूमि खोली और लाखों फ़्लैट बनवाए। सोवियत विज्ञान ने स्पुतनिक (1957) और यूरी गागरिन (1961) को अंतरिक्ष में भेजा। विदेश नीति में उन्होंने शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की बात की, फिर भी बर्लिन (1961) और क्यूबा (1962) ने दुनिया को युद्ध के क़रीब ला दिया। 1964 में पार्टी नेताओं ने उन्हें हटा दिया।
- पीटर प्रथम के शासन की शुरुआत (1682–1698) – 1682 में दस साल का पीटर और उसका सौतेला भाई इवान पंचम साथ ज़ार बने, और उनकी बहन सोफ़िया रीजेंट बनकर राज चलाती रही। 1689 में पीटर ने सत्ता ली। 1695 में बेड़ा न होने से वह आज़ोव में विफल रहा, फिर उसने वोरोनेज़ में बेड़ा बनाया और 1696 में आज़ोव जीत लिया। 1697-98 में वह महान दूत-मंडल के साथ गुप्त रूप से पश्चिमी यूरोप घूमा, जहाज़ बनाना और नई विद्याएँ सीखीं, और लौटकर रूस को बदलने लगा।
- पीटर प्रथम के सुधार – पीटर प्रथम (शासन 1682-1725) ने ज़्यादातर उत्तरी युद्ध जीतने के लिए रूस का राज्य नए सिरे से बनाया। उसने सीनेट (1711) और कॉलेजियम (1717-18) बनाए, चर्च के पैट्रिआर्क की जगह पवित्र सिनॉड (1721) रखी, गाँवों से भर्ती किए रंगरूटों की नियमित सेना और नौसेना खड़ी की, गृह-कर की जगह प्रति-व्यक्ति कर लगाया, पद-तालिका (1722) बनाई और कई कारख़ाने और खदानें शुरू कीं।
- पीटर महान के सुधारों के परिणाम – 1725 में पीटर की मृत्यु तक रूस के पास नियमित सेना, बाल्टिक बेड़ा, नई राजधानी, शासन के नए दफ़्तर और सेवा के पदों की सीढ़ी थी। उसने महान उत्तरी युद्ध जीतकर साम्राज्य का रूप ले लिया था। पर क़ीमत भारी थी: नए कर, जीवन भर की सेना-सेवा, जबरन मज़दूरी, कसती भूदासता, कुचले गए विद्रोह और पश्चिमी रंग में रंगे सामंतों व आम लोगों के बीच दूरी। इतिहासकार दोनों पक्ष तौलते हैं।
- पुगाचेव का किसान युद्ध, 1773 से 1775 – 1773 से 1775 के बीच रूस ने 1700 के दशक का सबसे बड़ा विद्रोह देखा। यह याइक कज़ाकों में शुरू हुआ और इसका नेता डॉन कज़ाक येमेल्यान पुगाचेव था, जिसने झूठ कहा कि वह ज़ार पीटर तृतीय है। उसने ज़मीन और आज़ादी का वादा किया। बश्कीर, तातार और वोल्गा क्षेत्र के अन्य लोग, उराल के कारख़ाना मज़दूर और भूदास जुड़ गए। विद्रोहियों ने ओरेनबर्ग को घेरा, वोल्गा के किनारे फैले और जुलाई 1774 में कज़ान जला दिया। प्रशिक्षित और तोपों वाली नियमित सेना ने उन्हें हरा दिया। पुगाचेव को उसके अपने अफ़सरों ने सौंप दिया और जनवरी 1775 में उसे मृत्युदंड मिला। इसके बाद राज्य ने पकड़ कसी और नदी याइक का नाम उराल रखा गया।
- पुनर्जागरण और खोज यात्राएँ: यूरोप कैसे बदला, लगभग 1450–1648 – लगभग 1450 से इटली के नगर-राज्यों ने यूनानी और रोमन ज्ञान (मानवतावाद) को फिर जगाया और परिप्रेक्ष्य पर टिकी नई कला बनाई। यह आंदोलन उत्तर तक फैला, जहाँ यह ज़्यादा धार्मिक बना। छापेखाने ने विचार तेज़ी से फैलाए। राजाओं ने मज़बूत 'नए राजतंत्र' बनाए। नए जहाज़ों और यंत्रों से पुर्तगाल, स्पेन और बाद में डच, अंग्रेज़ और फ़्रांसीसी समुद्र पार गए, जिससे साम्राज्य, कोलंबियन विनिमय, ज़बरन अटलांटिक दास व्यापार और बैंकों व संयुक्त पूँजी कंपनियों वाली वाणिज्यिक क्रांति आई।
- पुनर्स्थापना काल का इंग्लैंड (1660–1685) – गृहयुद्धों और 11 साल बिना राजा के बाद 1660 में चार्ल्स द्वितीय लौटे और राजतंत्र बहाल हुआ। उन्हें संसद के साथ सत्ता बाँटनी पड़ी, क्योंकि पैसा संसद के हाथ में था। कैथोलिकों का डर बढ़ा, ख़ासकर क्योंकि राजा के भाई जेम्स कैथोलिक थे — इससे पोपिश प्लॉट और बहिष्कार संकट हुआ और पहले राजनीतिक दल (व्हिग और टोरी) बने। लंदन ने 1665 का प्लेग और 1666 की आग झेली, फिर ईंट-पत्थर से नया बना। समुद्र पार व्यापार बढ़ा, डचों से युद्ध हुए और कॉफ़ी हाउस, रंगमंच और रॉयल सोसाइटी ने नए विचार फैलाए।
- पूँजीवाद का उदय: मैन्युफ़ैक्टरी और शुरुआती पूँजीवादी अर्थव्यवस्था – पूँजीवाद अर्थव्यवस्था चलाने का वह तरीक़ा है जिसमें मालिक पूँजी लगाकर बेचने के लिए माल बनाते हैं, मज़दूरों को मज़दूरी देकर रखते हैं, और प्रतिस्पर्धा वाले बाज़ार में लाभ चाहते हैं। यह यूरोप में 1500 से 1700 के दशक तक धीरे-धीरे बढ़ा। पहले व्यापारी घर पर काम करने वालों को सामान देते थे (बाँटकर काम की व्यवस्था)। फिर मैन्युफ़ैक्टरी में कई मज़दूर एक छत के नीचे हाथ से, हर एक अपना एक काम करने लगे (श्रम-विभाजन), जिससे उत्पादन बढ़ा। नए व्यापार-मार्गों से आई चाँदी और माल, बैंक और व्यापारिक कंपनियों ने इसे बढ़ाया। समाज भी बदला: व्यापारी और मालिक अमीर हुए, कई किसानों ने भूमि खोई और मज़दूर बने, और पुराने वर्ग धीरे-धीरे कमज़ोर हुए। औद्योगिक क्रांति की मशीनें और कारखाने बाद में आए।
- पूर्व और पश्चिम के बीच: रोमानियाई भूमि 1821-1848 – 1800 के शुरुआती सालों में रोमानियाई भूमि बाहरी सत्ता के अधीन थी और ज़मींदारों और भूदासता की पुरानी व्यवस्था से चलती थी। 1821 में तूदोर व्लादिमिरेस्कू का विद्रोह और पश्चिमी यूरोप के विचारों से प्रेरित 1848 की पीढ़ी ने अधिकार, भूमि सुधार और एकता माँगी। क्रांतियाँ कुचली गईं, पर विचार जीवित रहे, और रोमा दासता 1855-1856 के क़ानूनों से ख़त्म हुई।
- पूर्वजों के जीवन और प्रकृति पर विचार – पुराने लेखकों ने जीवन (वह छोटा है, बदलता है) और प्रकृति (वह सुंदर है, बदलती रहती है) पर विचार रखे। हम उनके शब्द पढ़ते हैं, पूछते हैं कि उन्होंने ऐसा क्यों सोचा, और फिर कारण के साथ तय करते हैं कि हमारा नज़रिया मेल खाता है या अलग है।
- पूर्वी एशिया का इतिहास: चीन, कोरिया और जापान ने एक-दूसरे को कैसे बदला – पूर्वी एशिया (चीन, कोरिया, जापान, मंगोलिया और वियतनाम जैसे पास के इलाक़े) का इतिहास आपस में जुड़ा है। स्टेपी के पशुपालक और नदी मैदानों के किसान मिले भी और लड़े भी। शुरुआती राज्य साम्राज्य बने। नज़राना व्यवस्था, चीनी लिपि, कन्फ़्यूशियस के विचार, बौद्ध धर्म और क़ानून संहिताओं ने पूरे क्षेत्र को जोड़ा। व्यापार, मंगोल विजय और 1590–1640 के युद्धों ने इसे बदला, फिर छिंग, जोसॉन और एदो का दौर आया।
- पूर्वी एशिया की संस्कृति: चीन, कोरिया और जापान क्या साझा करते हैं – चीन, कोरिया और जापान की बोली अलग है, पर लगभग दो हज़ार साल तक इन्होंने चीनी अक्षरों पर आधारित लिपि (चीन में हान्ज़ी, कोरिया में हान्जा, जापान में कांजी) और कई विचार साझा किए: परिवार और पढ़ाई पर कन्फ़्यूशियस के विचार, भारत से आया बौद्ध धर्म, काग़ज़ और छपाई, और चंद्र पंचांग। हर जगह ने उधार ली चीज़ को बदला: कोरिया ने अपनी वर्णमाला (हंगुल, 1443) बनाई और जापान ने अक्षरों से काना बनाया। विद्वान शास्त्रीय चीनी में लिखते थे, इसलिए किताबें दूर तक पढ़ी जाती थीं। जोसियन राजवंश के इतिहास (एनल्स) और त्रिपिटक कोरियाना जैसे अभिलेख इस विरासत को आज भी सँभाले हैं। बहुत से शब्द एक ही अक्षरों से बने हैं, इसलिए तीनों भाषाओं में मिलते-जुलते लगते हैं (जैसे टेलीफ़ोन: diànhuà, jeonhwa, denwa)। पर कुछ शब्द "झूठे दोस्त" हैं: अक्षर वही, अर्थ अलग। साझा और स्थानीय दोनों हिस्से समझना ही इस क्षेत्र को समझने की कुंजी है।
- पूर्वी मोर्चे पर निर्णायक मोड़ और विजय, 1942-1945 – 1942-43 में सोवियत सेनाओं ने स्टालिनग्राद में एक पूरी सेना को घेर लिया और फिर कुर्स्क में बड़े हमले को हराया। इसके बाद पूर्वी मोर्चा दो साल तक पश्चिम की ओर बढ़ता गया: सोवियत सेनाओं ने अपना इलाक़ा और फिर यूरोप का बड़ा हिस्सा आज़ाद कराया, और दूसरी ओर से पश्चिमी मित्र देश दबाव डालते रहे। 8-9 मई 1945 को जर्मनी ने आत्मसमर्पण किया। लगभग 2.7 करोड़ सोवियत लोग मारे गए और विजय दिवस गर्व के साथ शोक का भी दिन है।
- पेरेस्त्रोइका, ग्लासनोस्त और सोवियत संघ का अंत (1985-1991) – मार्च 1985 में मिखाइल गोर्बाचेव धीमी अर्थव्यवस्था को सुधारने के लिए नेता बने। उनके पेरेस्त्रोइका ("पुनर्निर्माण") ने कारख़ानों और सहकारी संस्थाओं को ज़्यादा छूट दी, पर कमी बढ़ी। ग्लासनोस्त ("खुलापन") ने लोगों को ज़्यादा खुलकर बोलने-लिखने दिया। राजनीतिक सुधार से असली चुनाव (1989) हुए, पार्टी की गारंटीशुदा सत्ता ख़त्म हुई (1990) और वे राष्ट्रपति बने। बाल्टिक देशों के नेतृत्व में गणराज्यों ने संप्रभुता और फिर आज़ादी माँगी। अगस्त 1991 के असफल तख़्तापलट के बाद गणराज्य एक-एक कर अलग हुए और 26 दिसंबर 1991 को सोवियत संघ समाप्त हो गया।
- पोलैंड का राज्य और नवंबर विद्रोह – 1815 में वियना कांग्रेस ने पोलैंड का राज्य बनाया, जिस पर रूस का ज़ार राज करता था, पर उसका अपना संविधान, संसद (सेम), सेना, स्कूल और अर्थव्यवस्था थी। ज़ार नियम तोड़ता रहा, गुप्त संगठन बने और 29 नवंबर 1830 की रात वारसॉ में युवा अफ़सरों ने नवंबर विद्रोह शुरू किया। पोलिश सेना बहादुरी से लड़ी, पर उसके सैनिक कम थे और विदेशी मदद नहीं मिली। सितंबर 1831 में वारसॉ गिर गया। 1832 में संविधान और सेना ख़त्म कर दिए गए और कई नेता देश छोड़कर चले गए।
- पोलैंड के विभाजन और राष्ट्रमंडल का पतन – 1772, 1793 और 1795 में रूस, प्रशिया और ऑस्ट्रिया ने पोलिश-लिथुआनियाई राष्ट्रमंडल को बाँट लिया, जब तक वह मिट नहीं गया। सरदारों के झगड़े, लिबरम वीटो, छोटी सेना और विदेशी दख़ल से राज्य कमज़ोर था। सुधार का संविधान (3 मई 1791) देर से आया: टारगोविका संघ ने रूसी सेना बुला ली, और 1794 का कोशिउश्को विद्रोह हार गया। पोलैंड फिर राज्य बनकर 1918 में लौटा।
- प्रतिरोध और लचीलापन: क्षेत्रीय राज्य (1000–1700 ई.) – 1000 से 1700 ई. के बीच भारत पर उत्तर-पश्चिम से हमले हुए और नई शक्तियाँ आईं, जैसे ग़ज़नवी, दिल्ली सल्तनत और बाद में मुग़ल। कई क्षेत्रीय राज्यों ने प्रतिरोध किया: राजपूत, दक्षिण का विजयनगर, असम के अहोम, गोंड और मराठा। उन्होंने युद्ध लड़े, गठबंधन और संघ बनाए, और मज़बूत क़िले बनाए। लचीलापन मतलब फिर से उठ खड़े होना: कठिन समय में भी लोगों ने बड़े मंदिर बनाए, अपनी भाषाओं में लिखा और भक्ति गीत गाए कि प्रेम से कोई भी ईश्वर तक पहुँच सकता है। राज्य भू-राजस्व लेते, व्यापार की रक्षा करते और मंदिरों, बाज़ारों व श्रेणियों को सहारा देते।
- प्रथम विश्व युद्ध (1914–1918): कारण, घटनाक्रम और परिणाम – प्रथम विश्व युद्ध 1914 से 1918 तक मित्र राष्ट्रों (फ़्रांस, ब्रिटेन, रूस, बाद में इटली, अमेरिका आदि) और केंद्रीय शक्तियों (जर्मनी, ऑस्ट्रिया-हंगरी, ऑटोमन साम्राज्य और बुल्गारिया) के बीच लड़ा गया। चार दीर्घकालिक कारणों ने तनाव बढ़ाया: सैन्यवाद, गठबंधन, साम्राज्यवाद और राष्ट्रवाद (MAIN)। चिंगारी थी 28 जून 1914 को साराजेवो में आर्चड्यूक फ़्रांज़ फ़र्डिनेंड की हत्या। पश्चिमी मोर्चे पर युद्ध खाइयों का गतिरोध बन गया; नए हथियारों ने इसे बहुत घातक बनाया। यह संपूर्ण युद्ध था: पूरी अर्थव्यवस्था, महिला कामगार और उपनिवेश लगाए गए, जिनमें लगभग 13 लाख भारतीय भी थे। 1917 की क्रांति के बाद रूस बाहर हुआ, अमेरिका 1917 में आया, और 11 नवंबर 1918 के युद्धविराम से लड़ाई रुकी। 1919–1920 की शांति संधियों, जिनमें वर्साय भी है, ने यूरोप को नया रूप दिया, चार साम्राज्य ख़त्म किए, राष्ट्र संघ बनाया और ऐसा ग़ुस्सा छोड़ा जिसने दूसरे विश्व युद्ध का रास्ता बनाया।
- प्रथम विश्व युद्ध और जन-समाज: जापान, वोट और महिलाएँ – प्रथम विश्व युद्ध (1914-1918) में केवल सेनाएँ नहीं, पूरे समाज लगे। महिलाओं ने कारखानों में काम किया, सरकारों ने उद्योग पर नियंत्रण रखा और आम लोगों ने महसूस किया कि उनकी भी सुनी जानी चाहिए। जापान 1914 में मित्र-पक्ष में शामिल हुआ, चीन और प्रशांत में जर्मन ठिकाने ले लिए और उसके कारखाने व निर्यात तेज़ी से बढ़े (1918 तक लगभग तीन गुना)। पर दाम भी बढ़े और 1918 में चावल दंगे हुए। युद्ध के बाद कई देशों ने वोट का अधिकार बढ़ाया: ब्रिटेन और जर्मनी ने 1918-1919 के आसपास महिलाओं को वोट दिया, अमेरिका ने 1920 में। जापान में सब वयस्क पुरुषों को 1925 में और महिलाओं को 1945-46 में वोट मिला। जन-समाज आ गया: बड़े शहर, अख़बार, रेडियो, सिनेमा, मज़दूर संघ और जन-दल। इससे आज़ादी बढ़ी, पर नई समस्याएँ भी आईं।
- प्रथम विश्व युद्ध के बाद की दुनिया (1918–1938) – प्रथम विश्व युद्ध 1918 में खत्म हुआ। चार साम्राज्य (जर्मन, ऑस्ट्रो-हंगेरियन, रूसी, ऑटोमन) खत्म हो गए और यूरोप में कई नए देश बने। शांति-संधियों ने नई व्यवस्था बनाई: वर्साय की संधि (1919) ने जर्मनी को सज़ा दी, वाशिंगटन संधियों (1921–22) ने नौसेनाएँ सीमित कीं और प्रशांत को सँभाला, और राष्ट्र संघ (1920) को शांति बनाए रखनी थी, पर उसके पास सेना नहीं थी और अमेरिका उसका सदस्य नहीं बना। वर्साय और वाशिंगटन मिलकर "वर्साय–वाशिंगटन व्यवस्था" कहलाते हैं।
- प्रथम विश्व युद्ध में रूस: मोर्चा और घरेलू मोर्चा – रूस अगस्त 1914 में यूरोप की सबसे बड़ी सेना के साथ युद्ध में उतरा, पर उसका उद्योग कमज़ोर और रेल कम थीं। 1914 में टैनेनबर्ग और 1915 के महान पीछे हटने में उसे भारी नुकसान हुआ, फिर 1916 के ब्रूसिलोव आक्रमण में बढ़त मिली। लाखों लोग मरे, अनाज-ईंधन की कमी हुई और दाम बढ़े। 1917 की शुरुआत तक लोगों का ज़ार निकोलस द्वितीय पर भरोसा ख़त्म हो गया, जिससे क्रांति हुई।
- प्रवास और सांस्कृतिक पहचान: चलते लोग नई संस्कृतियाँ कैसे बनाते हैं – प्रवास यानी लोगों का नई जगह रहने के लिए जाना। लोग धक्का कारकों (भूख, युद्ध, काम की कमी) और खिंचाव कारकों (ज़मीन, काम, सुरक्षा) की वजह से जाते हैं। प्राचीन प्रवास ने हज़ारों साल में किसानों, चरवाहों और भाषाओं को फैलाया। लगभग 1500 से औपनिवेशिक प्रवास में बसने वालों, ग़ुलाम बनाए गए लोगों और गिरमिटिया मज़दूरों को अकसर ज़बरदस्ती समुद्र पार ले जाया गया, जिसने कई देश बदल दिए। आधुनिक प्रवास तेज़ है और दोनों दिशाओं में होता है: पढ़ाई, काम और परिवार के लिए, और घर पैसा (रेमिटेंस) भी भेजा जाता है। जहाँ नए आने वाले और स्थानीय लोग मिलते हैं, वहाँ खाना, भाषा, संगीत और त्योहार मिलते हैं और लोग परतदार पहचान बनाते हैं। सांस्कृतिक पहचान यह एहसास है कि हम कौन हैं और किन समूहों के हैं; इसमें एक से ज़्यादा संस्कृतियाँ हो सकती हैं।
- प्राचीन अफ़्रीकी इतिहास: भूमि, राज्य, व्यापार और विचार (लगभग 1600 तक) – अफ़्रीका रेगिस्तान, सवाना और वर्षावनों वाला विशाल महाद्वीप है जहाँ 2000 से ज़्यादा भाषाएँ बोली जाती हैं। यहाँ बड़े समाज पनपे: नील के किनारे केमेट और कुश, हॉर्न में अक्सुम, लोहा गलाने वाले नोक लोग, सोने-नमक से अमीर घाना, माली और सोंघाई, स्वाहिली व्यापारी शहर, ग्रेट ज़िम्बाब्वे और कोंगो राज्य। रिश्तेदारी, मौखिक और लिखित ज्ञान, और मिली-जुली आस्थाओं ने जीवन को आकार दिया, और अफ़्रीकी लोग अटलांटिक दास व्यापार से बहुत पहले दुनिया भर में घूमते थे।
- प्राचीन जापान के स्रोत और उन्हें पढ़ने का तरीक़ा – हम प्राचीन जापान को लिखे स्रोतों (कोजिकी और निहोन शोकी जैसे दरबारी इतिहास, क़ानून-संहिताएँ, कविताएँ और चीनी लेख) और चीज़ों (लकड़ी की पट्टियाँ, मक़बरे, मिट्टी की मूर्तियाँ, बर्तन) से जानते हैं। हर स्रोत का एक नज़रिया और एक सीमा होती है, इसलिए इतिहासकार कई स्रोत मिलाकर जाँचते हैं और फिर पूरे दौर की परिकल्पना बनाते हैं, जिसे नए प्रमाण परख सकते हैं।
- प्राचीन जापान: कोफुन टीलों से हेआन दरबार के शासन तक – लगभग 250 से 1050 ईस्वी के बीच जापान बड़े मक़बरा-टीलों और कुलों के नेता यामातो राजा (कोफुन युग) से लिखित क़ानून-संहिताओं, जनगणना और कर वाले राज्य (रित्सुर्यो, 645 और 701 से) तक पहुँचा, जिसकी राजधानियाँ नारा (710) और क्योटो (794) थीं। बाद में फ़ुजिवारा कुल संरक्षक बनकर राज करने लगा, और हेआन दरबारी जीवन से काना लेखन और गेंजी की कथा जैसी रचनाएँ बनीं।
- प्राचीन ज्ञान: पुराने शब्द, नया जीवन – क्लासिक या श्रेष्ठ ग्रंथ वे पुराने ग्रंथ हैं जिन्हें लोग सदियों से पढ़ते आए हैं क्योंकि उनके विचार आज भी काम आते हैं। चीन, भारत, यूनान और दूसरी जगहों के विचारकों ने सीखने, मेहनत, दया और प्रकृति के साथ जीने पर छोटी सूक्तियाँ छोड़ीं। कई मुहावरे पूरी पुरानी कहानी को कुछ शब्दों में समेटते हैं। ग्रंथ पढ़ने के लिए जानो किसने, कब और क्यों कहा, आज की भाषा में अर्थ लिखो, परखो कि क्या आज भी सच है, और अपने जीवन में लगाओ। परंपरा का सम्मान मतलब हर पुरानी बात मानना नहीं: जो बुद्धिमानी है उसे रखो, जो अन्याय है उस पर सवाल करो।
- प्राचीन दर्शन: पहले सवालों से स्टोइकवाद तक – दर्शन (फ़िलॉसफ़ी) का अर्थ है 'ज्ञान से प्रेम'। लगभग 600 ई.पू. में यूनानी विचारकों ने प्रकृति को मिथक की बजाय तर्क (लोगोस) से समझाना शुरू किया। सुकरात-पूर्व दार्शनिकों ने मूल तत्व (आर्खे) खोजा: पानी, हवा, आग, न बदलने वाला सत् या परमाणु। फिर सोफ़िस्ट और सुकरात इंसानी जीवन की ओर मुड़े; सुकरात को सवाल पूछने के लिए मृत्युदंड मिला (प्लेटो की 'अपोलॉजी' में)। प्लेटो ने रूपों का सिद्धांत दिया; अरस्तू ने अवलोकन से तर्कशास्त्र और विज्ञान बनाया। बाद में स्टोइक, एपिक्यूरियन, सिनिक और सिसरो-सेनेका जैसे रोमनों ने पूछा कि अच्छा, शांत जीवन कैसे जिएँ।
- प्राचीन दासिया: गेतो-दासी लोग और रोमन विजय – गेतो-दासी आपस में जुड़े हुए लोग थे जो कार्पेथियन पहाड़ों, निचली दन्यूब नदी और काला सागर के तट के आसपास रहते थे। हम उनके बारे में यूनानी और रोमन लेखकों और खंडहरों से जानते हैं। बुरेबिस्ता (लगभग 82-44 ई.पू.) ने कई कबीले जोड़े। देचेबालस ने रोमन सम्राट त्राजन से दो युद्ध लड़े (101-102 और 105-106 ई.), और 106 ई. में दासिया रोमन प्रांत बन गया।
- प्राचीन भारतीय शिक्षा: गुरुकुल, बड़े ज्ञान केंद्र और शिक्षण विधियाँ – प्राचीन भारत में बच्चे अक्सर गुरु के साथ गुरुकुल में रहकर पढ़ते थे: छोटा समूह, हर छात्र पर ध्यान, रोज़ के काम और कोई तय फ़ीस नहीं; अंत में धन्यवाद के रूप में गुरु-दक्षिणा। पढ़ाई ज़्यादातर मौखिक थी। सीखने के तीन चरण थे: श्रवण (सुनना), मनन (सोचना और सवाल करना) और निदिध्यासन (गहराई से आत्मसात करना)। शास्त्रार्थ, प्रश्नोत्तर और करके सीखना आम थे। भाषा, व्याकरण, गणित, खगोल, चिकित्सा से लेकर तर्क, कला, शिल्प और शासन तक पढ़ाया जाता था। तक्षशिला, नालंदा, विक्रमशिला और वलभी जैसे बड़े केंद्रों में पूरे एशिया से छात्र आते थे, बड़े पुस्तकालय थे और द्वार पर परीक्षा होती थी।
- प्राचीन यूनान: नगर-राज्य, लोकतंत्र और स्थायी विरासत – प्राचीन यूनान ईजियन सागर के आसपास पनपा, पहाड़ों, छोटी घाटियों और ढेरों द्वीपों वाली ज़मीन पर। पहाड़ों ने बस्तियों को अलग रखा, तो यूनानी सैकड़ों स्वतंत्र नगर-राज्यों (पोलिस) में रहते थे, हर एक के अपने क़ानून, सेना और देवता; सागर व्यापार से उन्हें जोड़ता था। सबसे मशहूर थे एथेंस, एक व्यापारी नगर जिसने लगभग 508 ई.पू. में पहला लोकतंत्र बनाया, और स्पार्टा, एक सैनिक राज्य। यूनानियों ने मिलकर 490 और 480 ई.पू. में फ़ारसी हमले हराए, फिर पेलोपोनेसियन युद्ध में आपस में लड़े। बाद में मकदूनिया का सिकंदर सेना लेकर मिस्र और सिंधु तक गया, और हेलेनिस्टिक युग में यूनानी संस्कृति फैली। राजनीति, दर्शन, इतिहास-लेखन, विज्ञान, गणित, नाटक, खेल और वास्तुकला में यूनानी विचार आज भी दुनिया को आकार देते हैं।
- प्राचीन यूनानी और रोमन चिंतन में प्रेम और संबंध – यूनानी और रोमन चिंतकों ने पूछा कि प्रेम क्या है और लोगों को साथ कैसे रहना चाहिए। प्लेटो के सिम्पोज़ियम में अरिस्टोफ़ेनीज़ कहते हैं कि प्रेम अपने खोए आधे की खोज है, और डियोटिमा कहती हैं कि प्रेम अच्छाई की इच्छा है जो एक शरीर से स्वयं सौंदर्य तक चढ़ सकती है। मुसोनियस रूफ़स और सेनेका जैसे स्टोइक विवाह को मन और शरीर की साझेदारी मानते थे और वासना के वश में होने से सावधान करते थे। कवि अलग पहलू दिखाते हैं: सैफ़ो के लिए प्रेम शरीर में महसूस होने वाली मीठी-कड़वी शक्ति है, ओविड के लिए नियमों वाला खेल। इन सबके पीछे स्त्री-पुरुष पर प्राचीन विचार हैं जो अधिकतर असमान थे, कुछ आवाज़ें अधिक बराबरी के पक्ष में थीं।
- प्राचीन यूनानी महाकाव्य: होमर की इलियड और ओडिसी तथा रोमन ईनीड – महाकाव्य वीरों के लंबे काव्य हैं जो पहले गाए जाते थे। जानो कि चारण उन्हें कैसे रचते थे, नायक किन मूल्यों पर चलता था, देवता और नियति कैसे काम करते हैं, और तीन प्रसिद्ध कथाएँ: द्वंद्व, साइक्लोप्स और लकड़ी का घोड़ा।
- प्राचीन यूनानी: भाषा को कैसे पढ़ें – प्राचीन यूनानी शब्द स्टेम (अर्थ) और अंत (वाक्य में काम) से बनता है। 24 अक्षर, ज़ोर से पढ़ना, क्रिया के परिवार (-ω, -μι, -νυμι), -τός और -τέος वाले क्रियाजन्य विशेषण, मुख्य वाक्य-रचना (सजातीय कर्म, संबंधवाचक का आकर्षण, छोड़ा गया सर्वनाम) और वाक्य-विश्लेषण की 5-चरण विधि।
- प्राचीन साम्राज्य: फ़ारस, यूनान, रोम, भारत और चीन – साम्राज्य एक बहुत बड़ा राज्य है जिसमें एक शासक कई इलाक़ों और समुदायों पर शासन करता है। प्राचीन विश्व में फ़ारस (लगभग 550 ई.पू.) ने सड़कें और राज्यपालों वाले प्रांत बनाए। मकदूनिया के सिकंदर ने यूनानी विचार सिंधु तक पहुँचाए। रोम एक नगर से साम्राज्य बना, जिसे क़ानून, सड़कें और सेनादल जोड़े रखते थे। भारत में मौर्य साम्राज्य और अशोक ने दया का संदेश फैलाया; चीन में चिन ने कई राज्य जोड़े और हान साम्राज्य ने रेशम मार्ग चलाया। इन साम्राज्यों ने व्यापार, क़ानून, धर्म और विचारों से यूरोप, पश्चिम एशिया, भारत और चीन को जोड़ा।
- प्रारंभिक अमेरिकी गणराज्य, 1789–1848 – 1789 में संविधान लागू होने के बाद नया संयुक्त राज्य अमेरिका तेज़ी से बढ़ा। दो राजनीतिक दल बने और 1800 में सत्ता शांति से बदली। लुइज़ियाना ख़रीद से ज़मीन दोगुनी हुई और 1812 के युद्ध से राष्ट्रीय गर्व बढ़ा। नहरों, कारख़ानों और रेल से बाज़ार अर्थव्यवस्था बनी। एंड्रयू जैक्सन के समय लगभग सभी गोरे पुरुषों को वोट मिला, जबकि मूल राष्ट्रों को ज़बरन पश्चिम भेजा गया और कपास के साथ ग़ुलामी बढ़ी। धार्मिक जागरण से प्रेरित सुधारकों ने ग़ुलामी के ख़िलाफ़ और महिला अधिकारों के लिए आवाज़ उठाई। ग़ुलामी पर क्षेत्रीय तनाव ने आगे के संघर्ष की ज़मीन तैयार की।
- प्रारंभिक मध्य युग (लगभग 400–1000 ई.) – प्रारंभिक मध्य युग लगभग 400 से 1000 ई. का समय है। पश्चिम में रोमन साम्राज्य 476 में बिखर गया और जर्मैनिक लोगों (फ्रैंक, गॉथ, लोम्बार्ड, ऐंग्लो-सैक्सन) ने राज्य बनाए। ज़्यादातर लोग गाँवों में खेती करते थे। चर्च और मठों ने पढ़ाई जीवित रखी। 600 के दशक में अरब में इस्लाम शुरू हुआ और व्यापार व ज्ञान के साथ फैला। 800 में शारलेमेन सम्राट बना। राजाओं को सैनिक चाहिए थे, इसलिए सामंतवाद चला: राजा, सामंत, शूरवीर और किसान।
- प्रारंभिक मानव और सभ्यता की शुरुआत – आज के इंसान (होमो सेपियन्स) लगभग 3 लाख साल पहले अफ़्रीका में आए और धीरे-धीरे पूरी दुनिया में फैले। इतिहासकार बीते समय को औज़ारों के हिसाब से युगों में बाँटते हैं: पुरापाषाण, मध्यपाषाण, नवपाषाण, फिर ताँबा, कांसा और लोहा। खेती सीखने पर लोग गाँवों में बस गए, अनाज जमा करने लगे और बर्तन बनाने लगे। कुछ गाँव बढ़कर योजनाबद्ध नगर बने, जैसे सिंधु और घग्गर नदियों के किनारे हड़प्पा के नगर। लगभग उसी समय मेसोपोटामिया, मिस्र और चीन में भी नदी-घाटी सभ्यताएँ बनीं।
- प्लेटो और अरस्तू: वास्तविक क्या है, इसके दो उत्तर – प्लेटो (लगभग 427–347 ई.पू.) ने सिखाया कि सच्ची वास्तविकता पूर्ण, अपरिवर्तनशील प्रत्ययों (Forms) का लोक है, आत्मा अमर है और सीखना पुनःस्मरण है। उनके शिष्य अरस्तू (384–322 ई.पू.) ने प्रत्ययों को धरती पर उतारा: हर वस्तु पदार्थ + रूप है, परिवर्तन संभाव्यता का वास्तविक बनना है, और आत्मा जीवित शरीर का रूप है।
- फ़ासीवादी इटली (1915–1945): मुसोलिनी कैसे आया, कैसे राज किया, कैसे गिरा – इटली 1915 में पहले विश्व युद्ध में शामिल हुआ और जीता, पर वादे से कम ज़मीन मिली, इसलिए राष्ट्रवादियों ने इसे 'अधूरी जीत' कहा। 1919 के बाद महँगाई बढ़ी, सैनिक बेरोज़गार हुए, मज़दूरों ने हड़तालें कीं और कारख़ानों पर क़ब्ज़ा किया, और कमज़ोर गठबंधन सरकारें गिरती रहीं। बेनितो मुसोलिनी के फ़ासीवादी आंदोलन ने हथियारबंद दस्तों (काली कमीज़) से समाजवादियों पर हमले किए और ज़मींदारों, उद्योगपतियों और मध्यवर्ग का साथ पाया। अक्टूबर 1922 के रोम कूच के बाद राजा ने मुसोलिनी को प्रधानमंत्री बनाया। एसर्बो क़ानून (1923), 1924 का हिंसक चुनाव, मात्तेओत्ती की हत्या और 1925–26 के क़ानूनों से इटली एक-दलीय तानाशाही बन गया। फ़ासीवाद ने 'इल दूचे' की पूजा, प्रचार, गुप्त पुलिस (OVRA), युवा संगठन, कॉरपोरेट राज्य, अनाज की लड़ाई और चर्च से लैटरन समझौते (1929) का सहारा लिया। विदेश में मुसोलिनी नया रोमन साम्राज्य चाहता था: अबीसीनिया पर हमला (1935), हिटलर से धुरी (1936) और 1940 में युद्ध। हारों के बाद 1943 में उसे हटाया गया और 1945 में मार दिया गया।
- फ़्रांस का तीसरा गणतंत्र (1870-1914) – तीसरा गणतंत्र 1870 में सम्राट के गिरने से शुरू हुआ और 1875 के क़ानूनों से पक्का हुआ। इसने प्रेस, सभा और यूनियन की आज़ादी, मुफ़्त, अनिवार्य और धर्मनिरपेक्ष स्कूल (1881-82) दिए और 1905 में चर्च को राज्य से अलग किया। ड्रेफ़स कांड ने देश को बाँटा, और महिलाओं को 1944 तक वोट नहीं मिला।
- फ्रांस का पाँचवाँ गणराज्य – फ्रांस आज पाँचवें गणराज्य में है, जो 1958 में कमज़ोर चौथे गणराज्य और अल्जीरिया संकट के बाद बना। जनरल दे गॉल फिर नेता बने। नए संविधान ने राष्ट्रपति को बड़ी शक्तियाँ दीं और 1962 से जनता उसे सीधे चुनती है। सांसद दो चरणों के बहुमत वाले मतदान से चुने जाते हैं। फिर सत्ता वाम और दक्षिण के बीच बदलती रही, और कभी राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री विरोधी खेमों के रहे (सहवास)।
- बंधुत्व, जाति तथा वर्ग: आरंभिक समाज (लगभग 600 ई.पू. - 600 ई.) – आरंभिक भारतीय समाज को परिवार के रिश्तों (बंधुत्व), विवाह के नियमों, वर्ण व्यवस्था और अनेक जातियों, और संपत्ति के नियमों ने आकार दिया। ब्राह्मणों ने ये नियम धर्मसूत्र और मनुस्मृति जैसे संस्कृत ग्रंथों में लिखे, पर असल जीवन अक्सर अलग था, जैसा बौद्ध ग्रंथ और अभिलेख दिखाते हैं। महाभारत, जो लगभग 1,000 साल में बदलता-बढ़ता रहा, मुख्य स्रोत है; 1919 में शुरू हुए समालोचनात्मक संस्करण से इसका अध्ययन आसान हुआ।
- बदलती विश्व व्यवस्था: तेल संकट, एशिया का विकास और शीत युद्ध का अंत – 1973 में तेल का दाम लगभग 4 गुना हो गया और सस्ती ऊर्जा का दौर ख़त्म हुआ। जापान ने ऊर्जा बचाकर और बेहतर सामान बनाकर जवाब दिया। कोरिया, ताइवान, हांगकांग और सिंगापुर ने सामान बाहर बेचकर तेज़ तरक़्क़ी की। 1989 से 1991 के बीच शीत युद्ध ख़त्म हुआ, दोनों गुट टूटे और बहुत-से देशों में चुनी हुई सरकारें आईं।
- बदलती हुई सांस्कृतिक परंपराएँ: पुनर्जागरण, धर्म-सुधार और विज्ञान – 14वीं से 17वीं सदी में इटली के व्यापारी शहरों से यूनानी-रोमन ज्ञान में नई रुचि जगी, जिसे मानवतावाद कहते हैं। कलाकारों ने परिप्रेक्ष्य और शरीर-रचना के अध्ययन से असली जैसे चित्र बनाए; वास्तुकारों ने बड़े गुंबद बनाए। छपाई ने विचार फैलाए। कुछ पढ़ी-लिखी महिलाओं ने लिखा और शासन किया। 1517 में लूथर के विरोध से पश्चिमी चर्च कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट में बँटा, और कैथोलिक चर्च ने भी सुधार किए। कोपरनिकस, गैलीलियो और न्यूटन ने ब्रह्मांड की समझ बदली, और नाविकों ने अमेरिका और भारत के समुद्री रास्ते खोजे।
- बदलाव का युग: खेती, उद्योग और पूँजीवाद – 1700 के दशक में फ़सल चक्र, घिरे खेतों और नए औज़ारों से खेती बहुत उत्पादक हो गई। कम किसान ज़्यादा लोगों को खिला सकते थे और लोग शहर गए। स्पिनिंग जेनी और भाप इंजन जैसी मशीनों ने औद्योगिक क्रांति शुरू की। जो मालिक मुनाफ़े के लिए पूँजी लगाते थे, उन्होंने पूँजीवाद नाम की नई आर्थिक व्यवस्था बनाई।
- बीज़ान्टिन साम्राज्य – सन् 395 में रोमन दुनिया पश्चिम और पूर्व में बँट गई। पूर्व का हिस्सा बीज़ान्टिन साम्राज्य कहलाया। उसकी राजधानी कॉन्स्टेंटिनोपल थी और वह 1453 तक चला। सम्राट जस्टिनियन (527–565) ने क़ानून इकट्ठे किए, हागिया सोफ़िया बनवाई और खोई ज़मीन वापस जीती। इसकी ग्रीक-ईसाई-कला संस्कृति ने पूर्वी यूरोप को ढाला और पुरानी किताबें बचाईं।
- बीसवीं सदी की दहलीज़ पर रूस: जनसंख्या, अर्थव्यवस्था, विट्टे और निकोलस द्वितीय – सन 1900 के आसपास रूसी साम्राज्य में लगभग 12.6 करोड़ लोग थे, ज़्यादातर ग़रीब किसान, और कई अलग-अलग जातियाँ। वित्त मंत्री सेरगेई विट्टे (1892-1903) ने रेलवे, सोने के रूबल, विदेशी कर्ज़ और सीमा-शुल्क से उद्योग को तेज़ी से बढ़ाया। गाँव तंग और ग़रीब रहे, मज़दूरों का जीवन कठिन था, और ज़ार निकोलस द्वितीय के पास पूरी सत्ता रही। नए दल बने और इस दबाव से 1905 की क्रांति आई।
- बॉक्सर आंदोलन और आठ-राष्ट्र गठबंधन – 1899-1901 में उत्तर चीन के ग़रीब किसानों के यिहेतुआन (बॉक्सर) आंदोलन ने विदेशियों और चीनी ईसाइयों पर हमले किए। 1900 में छिंग दरबार ने उनका साथ दिया, आठ शक्तियों की सेना पेइचिंग पहुँची, और 1901 के बॉक्सर प्रोटोकॉल में चीन को 45 करोड़ ताएल देने और विदेशी सैनिक मानने पड़े।
- ब्रिटिश साम्राज्य: अमेरिकी उपनिवेशों से भारत तक (1585–1885) – 1585 से अंग्रेज़ों ने उत्तरी अमेरिका में बस्तियाँ बसाईं, गुलाम अफ़्रीकी लोगों से प्लांटेशन में फ़सलें उगवाकर कमाई की और 1776 में तेरह उपनिवेश खो दिए। 1807 में दास व्यापार और 1833 में गुलामी ख़त्म हुई। उधर ईस्ट इंडिया कंपनी व्यापारी से भारत की शासक बन गई। 1857 के बाद ताज का सीधा शासन आया और 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस बनी।
- ब्रिटेन में सत्ता और जनता – लगभग 800 सालों में ब्रिटेन में सत्ता धीरे-धीरे राजा से जनता की ओर आई। 1215 में विद्रोही सामंतों ने राजा जॉन से मैग्ना कार्टा मनवाया, जिसमें राजा पर सीमाएँ लगीं। संसद राजा की परिषदों से बनी, और 1265 में पहली बार कस्बों के प्रतिनिधि बुलाए गए। आम लोग भी कभी-कभी उठ खड़े हुए, जैसे 1381 का किसान विद्रोह और 1536 का पिलग्रिमेज ऑफ़ ग्रेस। 1600 के दशक में 'ईश्वरीय अधिकार' का दावा करने वाले राजा संसद से टकराए; गृहयुद्ध और गौरवपूर्ण क्रांति के बाद अधिकार विधेयक (1689) ने संसद को राजा से ऊपर रखा। 1800 के दशक से विरोध और सुधारों ने वोट का अधिकार कदम-दर-कदम बढ़ाया (1832, 1867, 1884, 1918, 1928), और मज़दूरों ने यूनियनें बनाईं। 1900 के दशक में अभियानों ने महिलाओं, मज़दूरों और अल्पसंख्यकों के अधिकार जीते।
- भक्ति-सूफ़ी परंपराएँ: विश्वास और भक्ति में बदलाव – लगभग 8वीं से 18वीं सदी में भारत में बहुत लोग प्यार भरी, सीधी पूजा की ओर मुड़े। भक्ति में भक्त एक भगवान से सीधे प्रेम करता है, महँगे कर्मकांड के बिना। तमिल अलवार (विष्णु के) और नयनार (शिव के) अपनी भाषा में गाते थे और जाति पर सवाल उठाते थे। कर्नाटक में बसवन्ना के वीरशैवों ने जाति और कर्मकांड ठुकराए। सूफ़ी मुसलमान संत थे जो प्रेम, पीर और संगीत से ख़ुदा के क़रीब जाना चाहते थे। चिश्ती सिलसिला बहुत लोकप्रिय हुआ। उत्तर में कबीर और गुरु नानक ने बिना रूप वाले ईश्वर की भक्ति की, और मीराबाई ने कृष्ण से प्रेम किया। इनके गीत आज भी गाए जाते हैं।
- भारत और विश्व: प्राचीन संबंध (1900 ई.पू.–1200 ई.) – 3,000 से ज़्यादा सालों तक भारत ज़मीन और समुद्र से दुनिया से जुड़ा रहा। हड़प्पा के व्यापारी मेसोपोटामिया को मनके और सामान भेजते थे। सिकंदर के बाद यूनानी दूत भारतीय दरबारों में आए। रोमन जहाज़ मानसून हवाओं से आकर भारतीय काली मिर्च, कपड़ा और रत्न ख़रीदते और सोने के सिक्के देते। रेशम मार्ग के कारवाँ भारत को मध्य एशिया और चीन से जोड़ते, और बौद्ध भिक्षु व तीर्थयात्री दोनों ओर आते-जाते। जहाज़ भारतीय व्यापारियों, संस्कृत, रामायण जैसी कथाओं और मंदिर शैलियों को दक्षिण-पूर्व एशिया ले गए। भारतीय ज्ञान भी फैला: शून्य वाली दशमलव स्थानीय मान पद्धति, आर्यभट का खगोल, और चरक-सुश्रुत की चिकित्सा।
- भारत में उपनिवेशवाद: व्यापारी से शासक तक – उपनिवेशवाद का मतलब है कि एक देश दूसरी ज़मीन पर कब्ज़ा करके वहाँ के लोगों और धन का इस्तेमाल अपने फ़ायदे के लिए करे। 1600 के आसपास यूरोप की कंपनियाँ भारत व्यापार करने आईं। अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कंपनी ने किले और सेना बनाई, प्लासी (1757) और बक्सर (1764) जीते और 1765 में बंगाल की दीवानी (कर वसूलने का हक़) पाई। भारत का कच्चा माल और पैसा ब्रिटेन गया, वहाँ की मशीनों का कपड़ा भारत के बाज़ार में भर गया, और बहुत-से बुनकर बेरोज़गार हुए। अंग्रेज़ी स्कूल, रेल और नए क़ानून भी आए, पर ज़्यादातर अपने शासन के लिए। 1857 के विद्रोह के बाद ब्रिटिश ताज ने सीधा शासन किया, और 1947 में भारत आज़ाद हुआ।
- भारत में राज्य और समाज (1000 ई. तक) – वेद भारत के सबसे पुराने ग्रंथ हैं, जो सदियों तक याद करके बचाए गए। वैदिक युग में राजन (मुखिया) सभा और समिति की सलाह से शासन करता था। समाज को वर्णों और चार आश्रमों के रूप में बताया गया। छोटे जन बढ़कर जनपद और फिर 16 महाजनपद बने; कुछ में राजा, कुछ में गण (सभा) का शासन था। मगध बढ़कर मौर्य साम्राज्य बना, जो प्रांतों, अधिकारियों, कर और गुप्तचरों से चलता था, जैसा कौटिल्य के अर्थशास्त्र में है; अशोक ने शिलालेखों से धम्म फैलाया। बाद में गुप्त, चोल आदि राज्य आए; दक्षिण में गाँव की सभाएँ थीं। गुरुकुल, तक्षशिला और नालंदा में शिक्षा बढ़ी। व्यापारी लंबे मार्गों से सामान ले जाते और कारीगर श्रेणियों में संगठित थे।
- भारत में राष्ट्रवाद – पहले विश्व युद्ध से भारत में टैक्स, महँगाई और ज़बरदस्ती भर्ती बढ़ी। गांधीजी के सत्याग्रह (सच और अहिंसा) ने चंपारण, खेड़ा और अहमदाबाद में जीत पाई। रॉलट एक्ट और जलियाँवाला बाग़ के बाद कांग्रेस ने ख़िलाफ़त का साथ दिया और 1920 में असहयोग शुरू किया; शहर, किसान, आदिवासी और बाग़ान मज़दूर अपने-अपने तरीक़े से जुड़े। चौरी चौरा के बाद 1922 में यह रुका। 1930 में नमक यात्रा से सविनय अवज्ञा शुरू हुई: अमीर-ग़रीब किसान, व्यापारी, मज़दूर और महिलाएँ जुड़े, पर कई दलित और मुसलमान दूर रहे। गीतों, भारत माता, लोककथाओं, झंडों और इतिहास ने सामूहिक अपनेपन का भाव बनाया।
- भारतीय ज्ञान परंपरा – भारतीय ज्ञान परंपरा (IKS) वे विचार, कौशल और विधियाँ हैं जो भारतीय उपमहाद्वीप में हज़ारों वर्षों में गणित, खगोल, धातुकर्म, रसायन, चिकित्सा, वास्तु, भाषा और कलाओं में विकसित हुईं। मुख्य उदाहरण: शून्य सहित स्थानीय मान, जंग-रोधी लोहा, बड़े पैमाने पर जस्ते का आसवन, वुट्ज़ इस्पात, रंगबंधक के साथ प्राकृतिक रंग, आयुर्वेद और शल्य ग्रंथ, पाणिनि का व्याकरण, और बावड़ी, जाली व आँगन वाले घर जैसी जलवायु-अनुकूल डिज़ाइन। इसे पढ़ने का मतलब है दावों को प्रमाण से जाँचना और पुराने विचारों को आज के विज्ञान-डिज़ाइन से जोड़ना।
- भारतीय महाकाव्य: रामायण, महाभारत और पुराण – संस्कृत के दो महाकाव्य 'इतिहास' (ऐसा हुआ था) कहलाते हैं: वाल्मीकि की रामायण, 7 कांड और लगभग 24 000 श्लोक; और व्यास का महाभारत, 18 पर्व और लगभग 1 लाख श्लोक, जिसमें भगवद्गीता है। पुराण ('पुरानी कथाएँ') में 18 महापुराण और अनेक उपपुराण हैं; आदर्श पुराण के पाँच लक्षण हैं: सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वंतर और वंशानुचरित। ये ग्रंथ पहले मौखिक रूप से, फिर पांडुलिपियों में आगे बढ़े और कई भारतीय व एशियाई भाषाओं व कलाओं में फिर से कहे गए। ये धर्म (सही कर्तव्य) सिखाते हैं और भाषा, मूल्य, कला और अतीत के अध्ययन के स्रोत हैं।
- भारतीय युद्ध कला परंपराएँ: शैलियाँ, प्रशिक्षण और फ़ायदे – भारत में कई क्षेत्रीय युद्ध कलाएँ हैं। कलरीपयट्टु (केरल) का अभ्यास कलरी में शरीर-व्यायाम, लाठी, धातु के हथियार और खाली हाथ की लड़ाई के चरणों में होता है, और इसमें उपचार भी सिखाया जाता है। सिलंबम (तमिलनाडु) में बाँस की लाठी, गतका (पंजाब) में लकड़ी की तलवार-लाठी और ढाल, थांग-ता (मणिपुर) में तलवार और भाला, मर्दानी खेल (महाराष्ट्र) में लंबी पट्टा तलवार, मल्लखंब में खंभे या रस्सी पर व्यायाम, कुश्ती अखाड़े में और लाठी खेला लाठी से होता है। सब मुद्रा, संतुलन और साँस पर नियंत्रण से शुरू होती हैं और अनुशासन व गुरु-सम्मान पर ज़ोर देती हैं। आज इनका अभ्यास फ़िटनेस, आत्मरक्षा, प्रदर्शन, खेल और सांस्कृतिक विरासत के लिए होता है।
- भारतीय व्याकरण परंपरा: भारत ने भाषा को कैसे समझा – भारत में दो हज़ार साल से भी पहले से भाषा का अध्ययन होता आया है। वर्णमाला में ध्वनियाँ उस जगह के हिसाब से सजाई गईं जहाँ से वे मुँह में बनती हैं। पाणिनि ने अष्टाध्यायी लिखी, जिसमें लगभग 4000 छोटे नियम हैं, और नियम छोटे रखने के लिए ध्वनियों को शिव-सूत्रों में बाँधा। शब्द धातु (मूल) + प्रत्यय (अंत) से बनते हैं। यास्क, कात्यायन, पतंजलि, भर्तृहरि, हेमचंद्र और तमिल के तोल्काप्पियम ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया।
- भारतीय स्थापत्य कला: स्तूप, मंदिर, गुंबद और किले – भारतीय इमारतों में खाली जगह ढकने के दो मूल तरीके हैं: खंभों पर सीधी धरन (स्तंभ-धरन या ट्रेबीट शैली) और मेहराब व गुंबद (आर्कुएट शैली)। स्तूप अवशेषों पर बना ठोस अर्धगोल टीला है। मंदिरों की दो बड़ी शैलियाँ बनीं: नागर (उत्तर, घुमावदार शिखर) और द्रविड़ (दक्षिण, सीढ़ीदार विमान और गोपुरम); बीच में मिली-जुली वेसर शैली। मस्जिदों और मकबरों में सच्ची मेहराब, बड़ा गुंबद, मीनार और चारबाग आए। किलों में मोटी दीवारें, बुर्ज, द्वार और खाई होती थी। हड़प्पा से जयपुर तक नगर योजना से बसाए गए। यह सब हमारी विरासत है, जिसे आज बचाना ज़रूरी है।
- भूमध्य सागर: संस्कृतियों का चौराहा – भूमध्य सागर यूरोप, अफ़्रीका और एशिया के बीच है। प्राचीन समय में यह एक आसान सड़क था, क्योंकि पहाड़ों और रेगिस्तानों से सामान ढोने से नाव में ले जाना सस्ता और तेज़ था। मिस्र अनाज और पेपाइरस भेजता था, फ़िनीशियाई तट बैंगनी रंग और काँच, यूनान जैतून का तेल और शराब, और कार्थेज चाँदी। सामान के साथ विचार भी चले। यूनानियों ने फ़िनीशियाई वर्णमाला ली और उसमें स्वर जोड़े, फिर रोमनों ने ली, और इसी से आज के अक्षर बने। यूनानियों और फ़िनीशियाइयों ने दूर के तटों पर उपनिवेश भी बसाए, जहाँ नए लोग और स्थानीय लोग व्यापार करते और रीति-रिवाज बाँटते थे। सिकंदर के बाद और रोम के समय अलेक्ज़ेंड्रिया जैसे नगरों में संस्कृतियाँ ख़ूब मिलीं। आज भी फ़ेरी, बंदरगाह, सैलानी, प्रवासी और साझा भोजन इसे मिलन-स्थल बनाते हैं, पर यहाँ तनाव भी है।
- मज़दूर आंदोलन: मज़दूरों ने अपने अधिकार कैसे पाए – मज़दूर आंदोलन मेहनतकश लोगों का लंबा प्रयास है: उचित वेतन, कम घंटे, सुरक्षित कार्यस्थल और समाज में आवाज़ पाने का। यह 1800 के दशक में कारख़ाने फैलने के साथ शुरू हुआ। अकेले मज़दूर के पास कोई ताक़त नहीं थी, इसलिए मज़दूरों ने ट्रेड यूनियन बनाईं, हड़ताल की, मिलकर सौदेबाज़ी की और राजनीतिक दल बनाए। उनके दबाव से, सुधारकों और सरकारों के साथ, बाल श्रम, काम के घंटे, सुरक्षा, पेंशन और यूनियन में शामिल होने के अधिकार पर क़ानून बने।
- मताधिकार: वोट के अधिकार की लड़ाई – मताधिकार यानी वोट देने का अधिकार। 1800 के दशक की शुरुआत में ज़्यादातर देशों में केवल अमीर पुरुष वोट देते थे (संपत्ति या कर आधारित मताधिकार)। धीरे-धीरे शर्तें हटीं। फ़्रांस ने 1848 में सार्वभौमिक पुरुष मताधिकार दिया (और उसी साल दास प्रथा ख़त्म की), पर द्वितीय गणराज्य जल्द ही नेपोलियन तृतीय के द्वितीय साम्राज्य में बदल गया, जिसने वोट रखा पर उस पर नियंत्रण रखा। 1800 के अंत से महिला आंदोलनों ने वोट माँगा: सबसे पहले न्यूज़ीलैंड (1893), फिर 1918 के बाद कई देश, फ़्रांस 1944 में, और भारत ने 1950 से सभी वयस्कों को वोट दिया। सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार = हर वयस्क नागरिक, एक व्यक्ति एक वोट, गुप्त मतदान।
- मध्य-18वीं सदी के रूस की अर्थव्यवस्था और संस्कृति – 1750 के आसपास ज़्यादातर रूसी गाँवों में रहते थे, और भूदास ज़मींदारों के लिए श्रम से या किराया चुकाकर काम करते थे। उराल के लौह-कारख़ानों, नए व्यापार-नियमों (1753 में भीतरी चुंगी ख़त्म) और सामंतों के बैंकों ने अर्थव्यवस्था बढ़ाई। संस्कृति में विज्ञान अकादमी (1725) और मॉस्को विश्वविद्यालय (1755) ने रूस को अपने विद्वान दिए। मछुआरे के बेटे मिख़ाइल लोमोनोसोव रसायनज्ञ, भौतिकविद्, कवि और शिक्षक बने और विश्वविद्यालय स्थापित करने में मदद की।
- मध्यकालीन अफ़्रीका और अमेरिका – जब यूरोप और एशिया के अपने साम्राज्य थे, तब अफ़्रीका में सोने, नमक और समुद्री व्यापार पर घाना, माली, स्वाहिली बंदरगाह और ग्रेट ज़िम्बाब्वे जैसे समृद्ध राज्य थे। अमेरिका में माया, एज़्टेक और इंका ने पुरानी दुनिया से संपर्क के बिना नगर, सड़कें, कैलेंडर और गणित बनाए।
- मध्यकालीन इंग्लैंड, 1066–1307: राजा, बैरन और क़ानून कैसे बदले – 1066 की नॉर्मन विजय के बाद इंग्लैंड सामंती व्यवस्था से चला: वफ़ादारी और सेवा के बदले ज़मीन। हेनरी द्वितीय (1154–1189) ने गृहयुद्ध के बाद शाही शक्ति लौटाई, शाही अदालतों और जूरी से कॉमन लॉ बनाया, और आर्चबिशप थॉमस बेकेट से टकराया। रिचर्ड प्रथम ज़्यादातर विदेश में रहा। राजा जॉन ने फ़्रांस की ज़मीनें खोईं, भारी कर लगाए और 1215 में मैग्ना कार्टा मानना पड़ा, जिसने राजा को क़ानून के अधीन रखा। एडवर्ड प्रथम (1272–1307) ने कर और अधिनियमों के लिए संसद का उपयोग किया, वेल्स जीता और स्कॉटलैंड में लंबे युद्ध लड़े। ज़्यादातर लोग गाँवों में किसान थे, जागीर के लॉर्ड और चर्च के अधीन।
- मध्यकालीन जापान: आम लोग और नई संस्कृति – कामाकुरा और मुरोमाची काल में बेहतर औज़ारों और साल में दो फ़सलों से उपज बढ़ी। बाज़ार, संघ (ज़ा) और सिक्के बढ़े। गाँव (सो) और क़स्बे ख़ुद शासन करने लगे और लोग निष्पक्ष नियमों के लिए एक साथ उठे (इक्की)। योद्धा, ज़ेन और आम लोगों की पसंद से मुरोमाची संस्कृति बनी: नो, चाय, स्याही चित्र और शोइन कमरे।
- मध्यकालीन जापान: योद्धा सरकारें और बढ़ती अर्थव्यवस्था – कामाकुरा बाकुफ़ु (1185-1333) एक सौदे पर चलता था: शोगुन ज़मीन और सुरक्षा (कृपा) देता, सेवक वफ़ादार सैन्य सेवा देते। होजो संरक्षकों के पास शक्ति थी, और 1274 और 1281 के मंगोल हमलों ने व्यवस्था पर बोझ डाला। आशिकागा मुरोमाची बाकुफ़ु शुगो के ज़रिए राज करता और 1404 से मिंग चीन से व्यापार करता, पर ओनिन युद्ध (1467-77) ने केंद्रीय शासन तोड़ दिया। इस बीच खेती, बाज़ार और सिक्कों का उपयोग बढ़ा।
- मध्यकालीन दर्शन: ऑगस्टीन से ओकम तक आस्था और तर्क – मध्यकालीन दर्शन लगभग 400 से 1450 ई. तक का है। इसका बड़ा प्रश्न था कि आस्था (धर्म जो सिखाता है) और तर्क (जो हम सोचकर जान सकते हैं) आपस में कैसे मेल खाते हैं। ऑगस्टीन ने सिखाया कि सत्य भीतर मिलता है, ईश्वर के प्रकाश से, और आस्था समझ खोजती है। बोएथियस ने यूनानी तर्कशास्त्र आगे पहुँचाया। इब्न सीना, इब्न रुश्द और मैमोनिडीज़ जैसे इस्लामी और यहूदी विचारकों ने अरस्तू को गहराई से पढ़ा, और उनका काम लैटिन अनुवादों से यूरोप पहुँचा। नए विश्वविद्यालयों में स्कॉलैस्टिसिज़्म ने सावधान प्रश्न-उत्तर पद्धति अपनाई। एंसेल्म ने सबसे महान संभव सत्ता के विचार से ईश्वर के लिए तर्क दिया। थॉमस एक्विनास ने अरस्तू को ईसाई आस्था से जोड़ा: तर्क और आस्था एक घर की दो मंज़िलें हैं, और तर्क दिखा सकता है कि पहला कारण है (पाँच मार्ग)। 1300 के दशक में विलियम ऑफ़ ओकम ने सरल व्याख्या पर ज़ोर दिया (ओकम का उस्तरा), और आस्था व तर्क अलग होने लगे, जिससे पुनर्जागरण और आधुनिक विज्ञान का रास्ता खुला।
- मध्यकालीन दुनिया: यूरोप, एशिया, अफ़्रीका और अमेरिका (लगभग 500–1500) – लगभग 500 से 1500 तक दुनिया अलग-अलग क्षेत्रों का समूह थी, हर एक के अपने शासक, धर्म और व्यापार। यूरोप में राजा, सामंत, किसान और ताक़तवर चर्च थे। एशिया में बड़े साम्राज्य (तांग और सोंग चीन, अब्बासी ख़िलाफ़त, मंगोल) व्यापार मार्गों से जुड़े थे। अफ़्रीका में धनी व्यापारी राज्य (घाना, माली, ग्रेट ज़िम्बाब्वे, स्वाहिली बंदरगाह) थे। अमेरिका में मक्का पर टिके शहर (माया, एज़्टेक, इंका) थे, जिनका 1492 तक बाक़ी दुनिया से संपर्क नहीं था।
- मध्यकालीन नगर, 1050–1302: नागरिकों को आवाज़ कैसे मिली – लगभग 1050 से बेहतर खेती ने ज़्यादा लोगों का पेट भरा। कुछ लोग खेत छोड़कर कपड़ा बुनने और व्यापार करने लगे। नगरों को अधिकार-पत्र (चार्टर) मिले, जिनसे उन्हें अपनी अदालत, बाज़ार और दीवार मिली। अमीर सौदागर (पैट्रिशियन) परिषद चलाते थे और गिल्ड के कारीगर हिस्सा माँगते थे, जिससे 1302 के आसपास तक हड़तालें और विद्रोह हुए।
- मध्यकालीन भूमध्य सागर: आदान-प्रदान और संघर्ष – लगभग 600 से 1500 ईस्वी तक भूमध्य सागर के किनारे तीन सभ्यताएँ थीं: पश्चिम में लैटिन ईसाई जगत, पूर्व में बीज़ान्टिन साम्राज्य और दक्षिण-पूर्व में इस्लामी दुनिया। जहाज़ों से माल और विचार आए-गए, पर इसी समुद्र पर धर्मयुद्ध जैसे युद्ध भी हुए। वेनिस सबके साथ व्यापार करके अमीर बना।
- मध्यकालीन यूरोप में शहर और विश्वविद्यालय – लगभग 1000 से 1300 के बीच बेहतर खेती और व्यापार से लोग बाज़ारों के पास बसे। बाज़ार दीवार वाले शहर बने, जहाँ कारीगरों के गिल्ड थे। इन शहरों में शिक्षकों और छात्रों ने मिलकर पहले विश्वविद्यालय बनाए, जैसे बोलोना, पेरिस और ऑक्सफ़ोर्ड।
- मध्यकालीन यूरोप: रोम से पुनर्जागरण तक के हज़ार साल – यूरोप का मध्यकाल लगभग 1000 साल चला, पश्चिमी रोमन साम्राज्य के अंत (476 ई.) से लगभग 1500 ई. तक. आरंभिक काल में बाहर से आए लोगों ने पश्चिम में नए राज्य बनाए, शार्लमेन के समय फ़्रैंक शक्तिशाली हुए, और पूरब में बाइज़ेंटाइन साम्राज्य ने रोमन शासन जारी रखा. समाज सामंतवाद से चलता था: ज़मीन के बदले वफ़ादारी और सेवा. चर्च ने मठ, गिरजाघर और धर्मयुद्धों के ज़रिए रोज़ की ज़िंदगी को आकार दिया. लगभग 1000 ई. के बाद व्यापार लौटा, क़स्बे, गिल्ड और विश्वविद्यालय बढ़े और राजा मज़बूत हुए. 1300 के दशक में काली मौत और लंबे युद्धों के संकट ने मध्यकाल को ख़त्म करने में मदद की.
- मध्यकालीन राज्य: कैसे बने, बँटे और फिर जुड़े – लगभग 900 से 1600 ई. के बीच यूरोप के कई राज्य एक जैसे ढंग से बने। एक शासक वंश ने कबीलों को जोड़ा, ईसाई धर्म अपनाया और शाही मुकुट पाया। ज़मीन वारिसों में बाँटने से अक्सर विखंडन हुआ; बाद में ताक़तवर राजा ने ज़मीन फिर जोड़ी और किले, नगर व कानून बनाए। राज्य शादी से भी जुड़े (व्यक्तिगत और वास्तविक संघ), और संसद के ज़रिए सामंतों की ताक़त बढ़ी।
- महात्मा गांधी और राष्ट्रीय आंदोलन – गांधीजी 1915 में भारत लौटे। 1916 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में उन्होंने कहा कि राष्ट्रवाद में आम किसान और मज़दूर शामिल होने चाहिए। चंपारण, खेड़ा और अहमदाबाद के सत्याग्रहों से वे जाने गए। असहयोग आंदोलन (1920–22) में भारी संख्या में लोग जुड़े, और खादी, चरखा, सादा जीवन और आम बोली से गांधीजी जनता के नेता बने। 1930 की नमक यात्रा से सविनय अवज्ञा शुरू हुई; फिर गोलमेज़ सम्मेलन और गांधी-इरविन समझौता (1931) हुए। 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन ने अंग्रेज़ों से जाने को कहा। 1947 में आज़ादी मिली, साथ में बँटवारे का दर्द भी। गांधीजी अंतिम महीनों में शांति के लिए काम करते रहे और 30 जनवरी 1948 को उनकी हत्या हुई। इतिहासकार यह सब भाषणों, अख़बारों, चिट्ठियों, आत्मकथा और पुलिस रिपोर्टों से जानते हैं, जिनका अपना-अपना नज़रिया है।
- महान देशभक्ति युद्ध का पहला दौर (जून 1941 से नवंबर 1942) – 22 जून 1941 को जर्मनी ने ऑपरेशन बारबारोसा में सोवियत संघ पर हमला किया: तीन सेनाएँ उत्तर, बीच और दक्षिण की ओर। सोवियत सेना को भारी नुक़सान हुआ और वह पीछे हटी, पर लगभग 1,500 कारख़ाने पूरब ले जाकर फिर चालू किए गए। लेनिनग्राद पर 872 दिन घेरा रहा। दिसंबर 1941 में सोवियत जवाबी हमले ने जर्मनों को मास्को के पास रोक दिया, यह पहला बड़ा मोड़ था। 1942 की गर्मियों में जर्मनी वोल्गा और स्तालिनग्राद तक पहुँचा, और 19 नवंबर 1942 के सोवियत जवाबी वार से यह दौर ख़त्म हुआ।
- महामंदी (1929–1939) – महामंदी बीसवीं सदी का सबसे बड़ा आर्थिक संकट था। यह अक्टूबर 1929 में अमेरिका के वॉल स्ट्रीट शेयर बाज़ार के गिरने से शुरू हुई। शेयर गिरे, बैंक डूबे, कारखाने बंद हुए और 1933 तक अमेरिका में हर चार में से एक मज़दूर बेरोज़गार था। देशों ने आयात पर भारी कर (टैरिफ़) लगाए, जिससे दुनिया का व्यापार लगभग दो-तिहाई घट गया और संकट यूरोप, एशिया, अफ़्रीका तक फैल गया। अमेरिका ने न्यू डील अपनाई; जर्मनी और जापान में संकट ने उग्र राष्ट्रवादी दलों को ताक़त दी, जो आगे दूसरे विश्व युद्ध की ओर ले गया।
- महामंदी, सैन्यवाद और जापान में द्वितीय विश्व युद्ध – 1929 में अमेरिका का पैसों का संकट पूरी दुनिया की महामंदी (Great Depression) बन गया। जापान में रेशम के दाम गिरे, खेत और कारख़ाने मुश्किल में आए और बहुत लोग बेरोज़गार हुए। सेना के नेताओं ने रास्ता दिखाने का वादा करके ताक़त बढ़ाई, दलों की सरकार ख़त्म हुई और जापान एशिया और फिर प्रशांत क्षेत्र में युद्ध में उतर गया। 1945 में भारी जान-माल के नुक़सान के बाद युद्ध ख़त्म हुआ।
- मानव इतिहास और पृथ्वी का पर्यावरण – आधुनिक मानव (होमो सेपियंस) करीब 3 लाख साल पहले अफ्रीका में आया। फिर छोटे-छोटे समूह कई लहरों में बाहर निकले और अंटार्कटिका को छोड़कर हर महाद्वीप तक पहुँचे। हिमयुग में समुद्र नीचे गया और ज़मीनी रास्ते बने। बाद की गर्मी में बर्फ़ पिघली, समुद्र चढ़ा और खेती शुरू हुई।
- मार्क्सवाद का जन्म: घोषणापत्र, प्रथम इंटरनेशनल और पेरिस कम्यून – मार्क्सवाद समाज के बारे में विचारों का एक समूह है, जिसे सबसे पहले कार्ल मार्क्स और फ़्रेडरिक एंगेल्स ने विस्तार से लिखा। उनका कहना था कि कारख़ानों वाले समाज में दो बड़े वर्ग होते हैं जिनके हित उलटे हैं: मालिक और मज़दूर। 1848 में उन्होंने कम्युनिस्ट घोषणापत्र छापा, जिसमें कहा गया कि इतिहास वर्गों के संघर्ष से आगे बढ़ता है और सब देशों के मज़दूरों से एक होने की अपील की गई। 1864 में कई शहरों के मज़दूर संगठनों ने लंदन में प्रथम इंटरनेशनल बनाया ताकि वे सीमाओं के पार मिलकर काम कर सकें। 1871 में पेरिस के मज़दूरों और नागरिकों ने 72 दिन अपना शहर ख़ुद चलाया (पेरिस कम्यून), फिर सरकारी सेना ने उसे कुचल दिया। ये तीनों घटनाएँ दिखाती हैं कि काम, दौलत और सत्ता के बारे में एक नया विचार कारख़ानों के ज़माने से निकलकर दुनिया भर के आंदोलन में कैसे बदला।
- मिंग और मध्य छिंग चीन में अर्थव्यवस्था और संस्कृति – 1400 से 1700 के अंत तक चीनी किसान पहले से ज़्यादा बेचने लगे, कारीगरों के कारख़ाने और व्यापारी समूह बढ़े, और चाँदी व्यापार तथा कर का पैसा बन गई। इस वस्तु अर्थव्यवस्था से शहर धनी हुए और ज़्यादा लोगों को पढ़ने का समय मिला। नतीजा: उपन्यासों, मन और शासन पर नए विचारों, व्यावहारिक विज्ञान और विशाल ग्रंथों की जीवंत संस्कृति, साथ ही कुछ लेखन पर कड़ा नियंत्रण।
- मिंग से आरंभिक छिंग तक (1368 से 1644) – चू युआनचांग ने 1368 में मिंग की स्थापना की और सारी सत्ता सम्राट के पास रखी। योंगल राजधानी बीजिंग ले गए और चंग हे को सात महान यात्राओं पर भेजा। मिंग के अंतिम काल में दूर दरबार, महँगे युद्ध, अकाल, कर और विद्रोह ने राज्य को कमज़ोर किया और 1644 में मांचू छिंग बीजिंग में आए।
- मिथक: देवता, नायक और कथाएँ जो आज भी हमें गढ़ती हैं – मिथक बहुत पुरानी पारंपरिक कथाएँ हैं जो देवताओं, नायकों और दुनिया की शुरुआत के बारे में हैं। यूनानी और रोमन मिथकों में शक्तिशाली पर कमियों वाले देवता, लंबी यात्राओं में परखे जाते नायक, न्याय के कठिन प्रश्न, और जादुई रूप-परिवर्तन हैं। ऐसे ही कथा-ढाँचे दुनिया भर की संस्कृतियों में मिलते हैं, और शास्त्रीय मिथक आज भी हमारे शब्दों, कला, विज्ञान के नामों और फ़िल्मों में जीवित हैं।
- मुद्रण संस्कृति और आधुनिक दुनिया – छपाई चीन में लकड़ी के ठप्पों से शुरू हुई और जापान व कोरिया पहुँची। यूरोप में गुटेनबर्ग की धातु के चल टाइप वाली प्रेस (1430 का दशक) ने किताबें तेज़ और सस्ती बनाईं। इस मुद्रण क्रांति से नए पाठक बने, लूथर का विरोध और ज्ञानोदय के विचार फैले और फ़्रांसीसी क्रांति का माहौल बना; चर्च और राजाओं ने सेंसर लगाने की कोशिश की। 19वीं सदी में बच्चे, महिलाएँ और मज़दूर पाठक बने। भारत में छपाई गोवा में पुर्तगाली मिशनरियों के साथ आई; 1780 से अख़बार, धार्मिक बहस, सुधार, महिलाओं का लेखन और जाति-विरोध सामने आए, और अंग्रेज़ों ने 1878 के वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट से प्रेस पर क़ाबू की कोशिश की।
- मुरोमाची शोगुनशाही, मिंग व्यापार और र्युक्यू – आशिकागा परिवार ने क्योटो में मुरोमाची शोगुनशाही (1336-1573) बनाई। योशिमित्सु ने 1392 में दो दरबार ख़त्म किए और 1404 में मिंग चीन से टैली व्यापार शुरू किया। र्युक्यू राज्य (1429) पूर्वी एशिया के व्यापार का बिचौलिया बना। शुगो दाइम्यो बन गए और ओनिन युद्ध (1467) से युद्धरत राज्यों का युग आया।
- मूल और नागरिकता: एक जातीय समूह का इतिहास – किसी देश के हर जातीय समुदाय के इतिहास में एक जैसे बड़े अध्याय होते हैं: लोगों ने अपना देश क्यों छोड़ा (संघर्ष, दमन, अधिकारों से इनकार, ज़बरदस्ती निकाला जाना, गरीबी), नई ज़मीन ने उन्हें क्यों खींचा (काम, परिवार, आज़ादी), उनका स्वागत कैसा हुआ (कभी नस्ल पर आधारित अन्यायपूर्ण कानून), उन्होंने समुदाय कैसे बनाया (पूजा स्थल, अख़बार, स्कूल, व्यवसाय), और उन्होंने पूरी नागरिकता कैसे पाई और देश को क्या दिया। इतिहासकार चिट्ठियों, जहाज़ की सूचियों, तस्वीरों, कानूनों और परिवार की कहानियों से यह कहानी बताते हैं।
- मूल निवासियों का विस्थापन – यूरोपियों के आने से हज़ारों साल पहले से उत्तरी अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में मूल निवासी रहते थे। वे समूहों में रहते, शिकार करते, मछली पकड़ते और खेती करते थे, और ज़मीन को सबकी मानते थे। 1600 के दशक से यूरोपीय लोग पहले फ़र (खाल) के लिए और फिर ज़मीन के लिए आए। उत्तरी अमेरिका में संधियाँ तोड़कर और 1830 के बाद ज़बरदस्ती हटाकर मूल निवासियों को पश्चिम धकेला गया और छोटे आरक्षित क्षेत्रों (रिज़र्वेशन) में बंद किया गया। ऑस्ट्रेलिया में 1788 से ब्रिटिश बसावट ने ज़मीन को "किसी की नहीं" (टेरा न्यूलियस) माना; एबोरिजिनल लोगों की ज़मीन छिनी और कई बच्चे परिवारों से अलग किए गए। 20वीं सदी में कुछ अधिकार वापस मिले: अमेरिकी नागरिकता (1924), कनाडा के संविधान में अधिकार (1982), ऑस्ट्रेलिया में माबो फ़ैसला (1992) और सरकारी माफ़ी (2008)।
- मेइजी पुनर्स्थापना: जापान कैसे खुला और आधुनिक राज्य बना – 1853 में अमेरिका के चार भाप-जहाज़ जापान पहुँचे और जापान को अपने बंदरगाह खोलने पड़े। 1868 में शोगुन का शासन ख़त्म हुआ और सम्राट मेइजी के नाम पर नई सरकार बनी। उसने पुराने डोमेन ख़त्म किए (1871), रेल और कारख़ाने बनाए (1872), राष्ट्रीय सेना बनाई (1873), और नए स्कूल, अख़बार और पश्चिमी तौर-तरीक़े आए। नारे थे 'अमीर देश, मज़बूत सेना' (फुकोकू क्योहेई) और 'सभ्यता और ज्ञानोदय' (बुनमेइ काइका)।
- यात्रियों के नज़रिए: बाहर से आए लोगों ने समाज को कैसे देखा – 10वीं से 17वीं सदी के बीच कई विदेशी यात्रियों ने भारत के बारे में लिखा। तीन सबसे मशहूर हैं। अल-बिरूनी 11वीं सदी में ख़्वारिज़्म (उज़्बेकिस्तान) से आया और अरबी में किताब-उल-हिंद लिखी। उसने संस्कृत सीखी और वर्ण व्यवस्था समझाई। इब्न बतूता 14वीं सदी में मोरक्को से आया और रिहला लिखा। उसे भीड़ भरे शहर, बाज़ार और तेज़ डाक व्यवस्था बहुत पसंद आई। फ्रांस का डॉक्टर फ्रांस्वा बर्नियर 17वीं सदी में मुग़ल दरबार आया। उसने भारत की तुलना यूरोप से की और कहा कि सारी ज़मीन बादशाह की है, जो पूरी तरह सही नहीं था। इनकी किताबें काम की हैं, पर इन्हें सावधानी से पढ़ना होता है।
- यायावर साम्राज्य: चंगेज़ ख़ान के अधीन मंगोल – मंगोल मध्य एशिया के स्टेपी घास के मैदानों के पशुपालक ख़ानाबदोश (यायावर) थे। वे जानवर पालते और मौसम के साथ जगह बदलते थे। 1206 में तेमुजिन ने मंगोल और तुर्की कबीलों को एक किया और चंगेज़ ख़ान कहलाया। उसने दशमलव पद्धति पर सेना, घोड़ों की डाक (याम) और नियम-संहिता (यासा) बनाई। उसके बेटों-पोतों ने चीन से पूर्वी यूरोप तक दुनिया का सबसे बड़ा ज़मीनी साम्राज्य बनाया, जो बाद में चार ख़ानतों में बँट गया। चंगेज़ ख़ान को लोग अलग-अलग तरह याद करते हैं: विनाशक, अपने लोगों को जोड़ने वाला नायक, और एशिया-यूरोप को सुरक्षित रास्तों से जोड़ने वाला।
- युआन शिखाई, राजतंत्र बहाल करने की कोशिशें और सरदार – 1912 के बाद सबसे ताकतवर सेना वाले युआन शिखाई ने गणराज्य से सत्ता छीन ली: उसने गुओमिंदांग पर रोक लगाई और संसद बंद की। 1915 में उसने सम्राट बनने की कोशिश की, पर प्रांतों ने विद्रोह किया, और मार्च 1916 में उसने गद्दी छोड़ी और जून में मर गया। उसके बाद पेइयांग सेना प्रतिद्वंद्वी गुटों में टूटी, और 1916 से 1928 तक सरदारों ने चीन के क्षेत्रों पर राज किया।
- युद्ध और सांस्कृतिक मुठभेड़ – युद्ध और विजय अलग-अलग लोगों को आमने-सामने ला देते हैं। संपर्क के बाद तकनीक, कला, खान-पान, शब्द और विचार दोनों तरफ़ चलते हैं। नतीजा मिश्रण, एक संस्कृति का हावी होना, या दोनों का साथ-साथ रहना हो सकता है। युद्ध धरोहर को नष्ट भी कर सकता है। यह बात प्राचीन, आधुनिक और आज के संघर्षों, सब में दिखती है।
- युद्ध के बाद के वर्षों में सोवियत संघ (1945-1953) – सोवियत संघ युद्ध जीता, पर खंडहर बन चुका था: लगभग 2.7 करोड़ लोग मरे और हज़ारों शहर-गाँव उजड़े। चौथी पंचवर्षीय योजना (1946-50) ने भारी उद्योग को तेज़ी से खड़ा किया, पर खेती और आम ज़िंदगी पीछे रही और 1946-47 में अकाल पड़ा। स्टालिन के हाथ में पूरी सत्ता रही और पार्टी ने लेखकों, कलाकारों और वैज्ञानिकों पर पकड़ कसी। 1949 में सोवियत वैज्ञानिकों ने परमाणु बम का परीक्षण किया। बाहर, सोवियत संघ पूर्वी गुट का नेता और अमेरिका का शीत-युद्ध प्रतिद्वंद्वी बन गया।
- युद्धोत्तर ब्रिटेन 1951–2007: सहमति से न्यू लेबर तक – 1951 से 2007 के बीच ब्रिटेन 'युद्धोत्तर सहमति' (दोनों बड़े दलों का कल्याणकारी राज्य, NHS, मज़बूत यूनियनों और मिश्रित अर्थव्यवस्था को स्वीकार करना) से खुले बाज़ार पर टिकी नई सहमति तक पहुँचा। 1950 के दशक में कंज़र्वेटिव राज में जीवन-स्तर बढ़ा। 1960 के दशक में विल्सन के समय उदार सामाजिक सुधार और युवा संस्कृति आई, पर अर्थव्यवस्था कमज़ोर रही। 1970 के दशक में महँगाई, हड़तालों और तेल संकट ने पुरानी सहमति तोड़ी, और ब्रिटेन EEC में शामिल हुआ। मार्गरेट थैचर (1979–90) ने यूनियनों की ताक़त घटाई और उद्योगों का निजीकरण किया, पर बेरोज़गारी बढ़ी। मेजर के बाद टोनी ब्लेयर की न्यू लेबर (1997–2007) ने बाज़ार को माना पर सार्वजनिक सेवाओं पर ज़्यादा खर्च किया, सत्ता का हस्तांतरण किया और इराक़ युद्ध में शामिल हुई।
- यूक्रेन का सैन्य इतिहास: समय के साथ सेना कैसे बदली – यूक्रेन के सशस्त्र बलों की कहानी पाँच युगों से गुज़रती है: कीवी रूस की द्रुज़िना और जन-सेना, चुने हुए हेटमैन वाली कोसैक सेना, 1917 से 1921 की राष्ट्रीय सेना, 1991 में आधुनिक सशस्त्र बलों की स्थापना, और 1996 के संविधान के बाद का दौर, जब रक्षा राज्य का साफ़ कर्तव्य बनी और 2014 के बाद सेना में सुधार हुए। हर युग दिखाता है कि समाज रक्षा कैसे संगठित करता है: कौन सेवा करता है, कौन नेतृत्व करता है और किन नियमों से।
- यूनानी पहचान और "बर्बर" की धारणा: फ़ारसी युद्ध और नाटक – फ़ारसी युद्धों (490 से 479 ई.पू.) के बाद बहुत से यूनानी बाहरी लोगों से अपनी तुलना करके अपनी पहचान बताने लगे, जिन्हें वे "बर्बरोई" कहते थे। यह धारणा हेरोडोटस की "हिस्ट्रीज़", एस्किलस के नाटक "पर्शियन्स", यूरिपिडीज़ की "मेडिया" तथा मृद्भांडों और मूर्तियों में दिखती है। ये सब यूनानी आवाज़ें हैं, इसलिए हर स्रोत पर पूछना चाहिए: कौन बोल रहा है, किससे, और क्यों।
- यूरोप 1800-1900: उद्योग, विचार और लोकतंत्र – 1800 के दशकों में भाप के इंजनों और कारख़ानों ने यूरोप के लोगों का काम और जीवन बदल दिया। भीड़ भरे शहरों से सामाजिक सवाल उठा: मज़दूरों के साथ कैसा बर्ताव हो? कारख़ानों को कच्चा माल और बाज़ार चाहिए थे, इसलिए राज्य दूर के इलाक़ों तक पहुँचे (आधुनिक साम्राज्यवाद)। मज़दूरों, महिलाओं और दूसरे समूहों ने हक़ माँगे, मताधिकार धीरे-धीरे फैला, और पाँच विचारों ने राजनीति गढ़ी: उदारवाद, राष्ट्रवाद, समाजवाद, धर्म-आधारित राजनीति और नारीवाद।
- यूरोप के बाहर की दुनिया (1700–1820) – जब यूरोप तेज़ी से बदल रहा था, एशिया और अमेरिका के बड़े राज्य भी बदल रहे थे। ऑटोमन साम्राज्य और ईरान की ताक़त घटी। भारत में मुग़ल कमज़ोर हुए और ईस्ट इंडिया कंपनी बढ़ी। चिंग चीन धनी था पर विदेशियों को सिर्फ़ कैंटन में व्यापार देता था। जापान तोकुगावा शोगुन के राज में लगभग बंद रहा। लैटिन अमेरिका के उपनिवेश 1800 के शुरुआती सालों में आज़ाद हुए।
- यूरोप के राज्य, 1500–1800: ताक़त किसके पास थी? – 1500 से 1800 के बीच यूरोप के राज्य मज़बूत हुए और सवाल यह था कि ताक़त किसके पास रहे। स्पेन अमेरिका की चाँदी से अमीर हुआ, पर राजा ने ताक़त अपने पास रखकर पैसा युद्धों में लगाया। नीदरलैंड ने स्पेन के खिलाफ़ विद्रोह किया और व्यापारी गणराज्य बना। फ़्रांस में राजा सर्वशक्तिमान हुआ (निरंकुशता)। इंग्लैंड में ताक़त राजा से संसद की ओर गई। 1700 के दशकों में प्रशा और हैब्सबर्ग में प्रबुद्ध निरंकुशता रही: ऊपर से सुधार, पर शासक का पूरा नियंत्रण।
- यूरोप में यहूदी मुक्ति: रोकों से बराबर अधिकारों तक – मुक्ति (एमैन्सिपेशन) का मतलब है बराबर नागरिक अधिकार पाना। 1780 के दशक से 1919 तक यूरोप के यहूदी राज्य-दर-राज्य कई क़ानूनी रोकों से बराबर नागरिकता की ओर बढ़े, ज्ञानोदय और हस्कला की मदद से। पर क़ानून में बराबरी से पूर्वाग्रह ख़त्म नहीं हुआ और 1870 के दशक से आधुनिक यहूदी-विरोध बढ़ा।
- यूरोप में राष्ट्रवाद का उदय – 1789 से पहले यूरोप कई छोटे राज्यों में बँटा था और लोग राजा के वफ़ादार थे। फ़्रांसीसी क्रांति ने कहा कि सत्ता जनता की है और जनता मिलकर एक राष्ट्र है। नेपोलियन ने बराबरी वाले कानून फैलाए। 1815 में राजा लौटे, पर उदारवादी, लेखक और भूखे आम लोग 1830 और 1848 में उठ खड़े हुए। कई छोटे राज्य जोड़कर इटली (1861) और जर्मनी (1871) बने। राष्ट्र को मारियान और जर्मेनिया जैसी स्त्री-आकृतियों से दिखाया गया। 1914 तक राष्ट्रवाद साम्राज्यवाद से जुड़ गया और बाल्कन का तनाव पहले विश्व युद्ध तक ले गया।
- यूरोपीय समाज में बदलाव, 1500–1700 – 1500 से 1700 के बीच यूरोप में नए औज़ार और मशीनें आईं, काम को छोटे हिस्सों में बाँटने वाले कारख़ाने (मैन्युफ़ैक्टरी) बने, और पूँजीवाद आया: मालिक पूँजी लगाता है, मज़दूरी देता है और मुनाफ़ा कमाता है। शहर, व्यापारी और मज़दूर बढ़े।
- राजनीतिक शासन व्यवस्थाएँ: लोकतंत्र, सत्तावादी और पूर्णसत्तावादी शासन – राजनीतिक शासन व्यवस्था यह बताती है कि राज्य में सत्ता कैसे ली और चलाई जाती है। लोकतंत्र में सत्ता बँटी और सीमित होती है: खुले चुनाव, कई दल, स्वतंत्र अदालतें और आज़ाद प्रेस। पूर्णसत्तावादी शासन में एक दल और एक नेता सब कुछ नियंत्रित करते हैं। सत्तावादी शासन बीच में आता है। 1989 के बाद कई देश एक-दलीय शासन से कानून के शासन की ओर बढ़े।
- राजा, किसान और नगर: आरंभिक राज्य और अर्थव्यवस्थाएँ (लगभग 600 ई.पू. - 600 ई.) – लगभग 600 ई.पू. से 600 ई. के बीच उत्तर भारत में सोलह बड़े राज्य (महाजनपद) बने। मगध सबसे ताक़तवर बना और चंद्रगुप्त व अशोक के समय मौर्य साम्राज्य बना। बाद में कुषाण, सातवाहन और गुप्त आए, जिन्होंने बड़ी उपाधियाँ और प्रशस्तियाँ अपनाईं। किसानों से ज़्यादा उपज करवाई गई, भूमिदान फैले और नगरों में सिक्कों से व्यापार हुआ। यह सब ज़्यादातर अभिलेखों से पता चलता है, जिन्हें 1838 में जेम्स प्रिंसेप ने पहली बार पढ़ा।
- राज्य निर्माण: नए राज्य कैसे जन्म लेते हैं – राज्य को भू-क्षेत्र, जनता, सरकार और संप्रभुता चाहिए, और आम तौर पर दूसरे राज्यों की मान्यता। 1917–1918 में जब रूसी, जर्मन, ऑस्ट्रो-हंगेरियन और उस्मानी साम्राज्य गिरे, तो राष्ट्रों ने आत्मनिर्णय के विचार से पोलैंड, चेकोस्लोवाकिया, फ़िनलैंड और बाल्टिक देशों जैसे राज्य बनाए या फिर से खड़े किए, और रोमानिया बड़ा हुआ। सीमाएँ संधियों, जनमत संग्रह और कभी युद्ध से तय हुईं। फिर हर राज्य को संस्थाएँ बनानी पड़ीं: संविधान, संसद, अदालतें, एक मुद्रा, सेना, स्कूल और जुड़ा परिवहन। बाद में भी लहरें आईं (1945 के बाद उपनिवेशवाद का अंत, 1991), और आज के कमज़ोर राज्य शांति, निष्पक्ष चुनाव, क़ानून के राज और सोची-समझी बाहरी मदद से फिर खड़े होते हैं।
- राष्ट्र-राज्य और मेइजी बहाली: क्रांतियों से नए जापान तक – लगभग 250 साल पहले ज़्यादातर लोग राजाओं और स्थानीय सरदारों के अधीन रहते थे। अमेरिकी क्रांति (1776) और फ़्रांसीसी क्रांति (1789) ने कहा कि ताक़त नागरिकों की है। धीरे-धीरे कई छोटे राज्य जुड़कर राष्ट्र-राज्य बने: एक कानून, एक सेना, एक मुद्रा, एक झंडा। फिर शक्तिशाली औद्योगिक देशों ने कच्चे माल और बाज़ार के लिए कमज़ोर इलाक़ों को उपनिवेश बना लिया। जापान को 1853 में विदेशी जहाज़ों ने खोला। 1868 की मेइजी बहाली के बाद उसने अपना राष्ट्र-राज्य बनाया: पुरानी रियासतें खत्म कीं, रेल, स्कूल और कारखाने बनाए, राष्ट्रीय सेना बनाई और 1889 में संविधान लिखा। इससे जापान आज़ाद रहा, पर वह भी साम्राज्य की दौड़ में शामिल हो गया।
- राष्ट्रीय आंदोलन: लोकगीतों से स्वशासन तक – राष्ट्र लोगों का बड़ा समूह है जो साझी भाषा, संस्कृति, इतिहास या अपना भविष्य ख़ुद तय करने की इच्छा के कारण एक होने का एहसास करता है। 19वीं सदी में ज़्यादातर लोग कई जातीय समूहों वाले बड़े साम्राज्यों में रहते थे। राष्ट्रीय आंदोलन आमतौर पर तीन चरणों में बढ़े: विद्वानों ने भाषा और इतिहास को जगाया (A), कार्यकर्ताओं ने समितियाँ, स्कूल और अख़बार बनाए (B), फिर आम लोग दलों और जन आंदोलनों में जुड़े (C)। साम्राज्यों ने सुधार या दमन से जवाब दिया। यही ढर्रा एशिया और अफ़्रीका तक फैला, जहाँ राष्ट्रवाद औपनिवेशिक शासन के ख़िलाफ़ संघर्ष बना और 1945 के बाद कई नए देश बने।
- रूढ़िवादी मोड़ और डिसेम्ब्रिस्ट – 1815 के बाद सिकंदर प्रथम सुधार से सख़्त व्यवस्था की ओर मुड़ गया। अरकचेयेव सैनिक बस्तियाँ चलाता था, स्कूलों और किताबों पर नज़र थी और गुप्त संस्थाओं पर 1822 में रोक लगी। यूरोप देख चुके जवान अफ़सरों ने गुप्त संस्थाएँ बनाईं। उत्तरी समाज (मुरावयोव, रेलेयेव, त्रुबेत्स्कोय) संवैधानिक राजतंत्र चाहता था; दक्षिणी समाज (पेस्तेल) गणराज्य। सिकंदर की मृत्यु पर उन्होंने 14 (26) दिसंबर 1825 को सेनेट चौक में विद्रोह किया। विद्रोह एक दिन में कुचला गया; पाँच नेताओं को फाँसी हुई और बहुतों को साइबेरिया भेजा गया।
- रूस 16वीं सदी के अंत में: फ़्योदोर इवानोविच और बोरिस गोदुनोव – 1584 में इवान चतुर्थ की मृत्यु के बाद उनके पुत्र फ़्योदोर इवानोविच ज़ार बने। फ़्योदोर सौम्य और अक्सर बीमार रहते थे, इसलिए उनके साले बोरिस गोदुनोव व्यवहार में सरकार चलाते थे। रूस ने क़िले बनाए, स्वीडन से शहर वापस जीते, क्रीमिया का हमला खदेड़ा, और 1589 में चर्च को अपना पैट्रिआर्क, योव, मिला। किसान ज़मीन से और मज़बूती से बँधे। 1598 में फ़्योदोर निःसंतान मरे तो रुरिक वंश ख़त्म हो गया और ज़ेम्स्की सोबोर ने बोरिस गोदुनोव को ज़ार चुना।
- रूस का सामाजिक चिंतन: पश्चिमपंथी और स्लावपंथी – निकोलस प्रथम के समय खुली राजनीति मना थी, इसलिए लोग मंडलियों, सैलूनों और पत्रिकाओं में बहस करते थे। 1836 में चादायेव के पत्र ने तीखा सवाल उठाया कि रूस ने दुनिया को क्या दिया। दो मुख्य जवाब आए। स्लावपंथी (ख़ोम्याकोव, किरीयेव्स्की, अक्साकोव) बोले कि रूस अपने रास्ते चले: गाँव की सामूहिक व्यवस्था, रूढ़िवादी आस्था, पुराने रीति-रिवाज। पश्चिमपंथी (ग्रानोव्स्की, बेलिंस्की, काविलिन) बोले कि रूस यूरोप की राह चले: क़ानून, स्कूल, नागरिक आज़ादी। दोनों दास-प्रथा के विरुद्ध थे। एक तीसरी, सरकारी राय थी: "रूढ़िवादी चर्च, निरंकुशता, राष्ट्रीयता"।
- रूस की अर्थव्यवस्था 1880-1890 के दशक में – 1880 और 1890 के दशक में रूस अब भी खेती का देश था: लगभग 10 में से 8 लोग गाँवों में रहते थे। साथ ही रेलें तेज़ी से बढ़ीं, 1880 के लगभग 23,000 किमी से 1900 तक 50,000 किमी से ज़्यादा। दक्षिण (कोयला-लोहा), बाकू (तेल), उराल (धातु) और मॉस्को के आसपास (कपड़ा) में नए कारख़ाना-इलाक़े बने। गाँव वालों के कारख़ानों में काम पर आने से शहर बढ़े। 1892 से वित्त मंत्री सर्गेई विट्टे ने ट्रांस-साइबेरियन रेल, विदेशी पैसे और सोने से जुड़े रूबल से इस उछाल को आगे बढ़ाया। मज़दूरों और किसानों ने कम मज़दूरी और भूख के रूप में भारी क़ीमत चुकाई।
- रूस की विदेश नीति और 1812 का युद्ध – सिकंदर प्रथम के समय रूस ने गठबंधनों में नेपोलियन से लड़ाई की और ऑस्टरलिट्ज़ (1805) व फ़्रीडलैंड (1807) में हारा। 1807 की तिलसित संधि से थोड़े समय की शांति आई। रूस को फ़िनलैंड (1809) और बेस्साराबिया (1812) भी मिले। जून 1812 में नेपोलियन ने बहुत बड़ी सेना के साथ हमला किया। रूसी सेना पीछे हटी, बोरोदिनो (7 सितंबर, नई तिथि) में लड़ी, मॉस्को छोड़ा, पर अपनी सेना बचाई। नेपोलियन ठंड और भूख में लौटा और उसकी सेना नष्ट हुई। 1813-14 में रूस और साथियों ने उसे पूरे यूरोप में खदेड़ा: लाइपज़िग (1813), पेरिस (1814)।
- रूस की विदेश नीति, 1725–1881 – 1725 से 1881 तक रूस की विदेश नीति चार लक्ष्यों के पीछे थी: समुद्र तक पहुँच (बाल्टिक और काला सागर), यूरोप की बड़ी शक्तियों में संतुलन, बाल्कन के ईसाई लोगों का समर्थन, और दूर-दराज़ की सुरक्षित सीमाएँ। मुख्य घटनाएँ: सात वर्षीय युद्ध, कैथरीन II के तुर्की युद्ध, पोलैंड का बँटवारा, अलास्का की बिक्री और 1877–78 का बाल्कन युद्ध।
- रूस के पावेल प्रथम: 1796 से 1801 का छोटा शासन – कैथरीन द्वितीय के पुत्र पावेल प्रथम ने 1796 से 1801 तक रूस पर शासन किया। 1797 में उसने उत्तराधिकार का साफ़ नियम बनाया: ताज पिता से सबसे बड़े पुत्र को जाएगा। उसी साल उसने कहा कि भूदासों से हफ़्ते में तीन दिन से ज़्यादा ज़मींदार के लिए काम न कराया जाए, हालाँकि इस नियम को लागू करना कठिन था। उसने सख़्त अनुशासन, सेना की कवायद और छपाई पर कड़े नियंत्रण की माँग की और कुलीनों के कुछ विशेषाधिकार घटाए। विदेश नीति में रूस क्रांतिकारी फ़्रांस के विरुद्ध युद्ध में शामिल हुआ (सुवोरोव का आल्प्स पार करना और उशाकोव का भूमध्य सागर अभियान, 1799), फिर पावेल ने ऑस्ट्रिया और ब्रिटेन से नाता तोड़ा और फ़्रांस से शांति की ओर बढ़ा। मार्च 1801 में महल-षड्यंत्र ने उसका शासन ख़त्म कर दिया और उसका पुत्र अलेक्सांद्र प्रथम सम्राट बना।
- रूस में 19वीं सदी के उत्तरार्ध की संस्कृति – लगभग 1850 से 1900 के बीच रूसी संस्कृति मज़बूत हुई और पूरी दुनिया में जानी गई। उसका मुख्य विचार था यथार्थवाद: असली जीवन और आम लोगों को दिखाना। टॉल्स्टॉय, दोस्तोयेव्स्की, तुर्गेनेव और चेखव जैसे लेखकों ने बड़े उपन्यास और नाटक लिखे। रेपिन और लेवितान जैसे "घुमक्कड़" चित्रकार प्रदर्शनियाँ कई शहरों तक ले गए। "शक्तिशाली मुट्ठी" और चाइकोव्स्की ने रूसी स्वर का संगीत रचा। विज्ञान में मेंडेलीव ने आवर्त सारणी (1869) बनाई और पोपोव ने रेडियो संकेत दिखाए (1895)।
- रूस में महल तख़्तापलट का युग (1725-1762) – 1725 में पीटर महान मरे तो उन्होंने उत्तराधिकारी नहीं चुना था, और उनका अपना क़ानून कहता था कि शासक ख़ुद उत्तराधिकारी चुनता है। 37 साल तक गद्दी एक से दूसरे के पास जाती रही, अक्सर राजधानी की गार्ड रेजिमेंटों की मदद से। कैथरीन प्रथम से पीटर तृतीय तक छह शासक बैठे, और चहेतों के हाथ में बड़ी ताक़त रही। यह युग 1762 में कैथरीन द्वितीय के गद्दी लेने पर ख़त्म हुआ।
- रूस में मुसीबतों का समय, 1598 से 1613 – रुरिक वंश के 1598 में समाप्त होने के बाद रूस लगभग पंद्रह कठिन वर्षों में पहुँचा जिन्हें मुसीबतों का समय (स्मूता) कहते हैं। कारण थे वंश का न होना, 1601 से 1603 का भारी अकाल और अशांति। कई बहुरूपियों ने खोए राजकुमार दिमित्री होने का दावा किया, शासक जल्दी-जल्दी बदले, और पोलिश-लिथुआनियाई और स्वीडिश सेनाओं ने संघर्ष में हिस्सा लिया, यहाँ तक कि मॉस्को में घुसीं। दो जनसेनाएँ बनीं; दूसरी ने, जिसका नेतृत्व कुज़मा मिनिन और दिमित्री पोझार्स्की ने किया, 1612 में मॉस्को आज़ाद कराया। 1613 में ज़ेम्स्की सोबोर ने मिखाइल रोमानोव को ज़ार चुना, जिससे रोमानोव वंश शुरू हुआ।
- रूस में सार्वजनिक जीवन और सामाजिक आंदोलन (1870-1890 के दशक) – 1800 के उत्तरार्ध में पढ़े-लिखे रूसी, जिन्हें बुद्धिजीवी वर्ग कहते हैं, जनता की मदद को अपना फ़र्ज़ मानते थे। लोकलुभावन (नरोदनिक) आशा करते थे कि किसान बदलाव की अगुवाई करेंगे; उनका 1874 का "जनता के बीच जाना" असफल रहा। कुछ ने आतंक का रास्ता लिया और 1881 में सिकंदर द्वितीय को मार दिया, और राज्य ने कड़ी कार्रवाई की। उसके बाद प्लेखानोव जैसे मार्क्सवादियों ने कहा कि संख्या में बढ़ते कारख़ाना-मज़दूर बदलाव की ताक़त बनेंगे। मज़दूरों की हड़तालें बढ़ीं और 1898 में सामाजिक-जनवादी पार्टी का पहला सम्मेलन हुआ।
- रूसी गृहयुद्ध (1918–1922): कारण, चरण, युद्ध साम्यवाद, परिणाम – 1917 की अक्टूबर क्रांति के बाद रूस बोल्शेविक लाल सेना और बोल्शेविक-विरोधी श्वेत सेनाओं के गृहयुद्ध में फँस गया; बीच में हरे किसान दल और विदेशी सेनाएँ भी थीं। मुख्य लड़ाई 1918–1920 चली और लाल की जीत हुई। बोल्शेविकों ने युद्ध साम्यवाद (अनाज की वसूली, राष्ट्रीयकृत उद्योग, राशन) से अर्थव्यवस्था चलाई। युद्ध ने लाखों जानें लीं, उद्योग और खेती उजाड़ दी, और नई आर्थिक नीति तक पहुँचाया।
- रूसी संस्कृति का रजत युग: विज्ञान, साहित्य, कला, रंगमंच और रूसी सीज़न्स – रजत युग लगभग 1890 के दशक से 1917 तक रूसी संस्कृति के बड़े उफान का नाम है। पावलोव, मेच्निकोव और त्सिओल्कोव्स्की जैसे वैज्ञानिक, प्रतीकवादी, अक्मेवादी और भविष्यवादी कवि, "कला की दुनिया" से मालेविच तक के चित्रकार, मॉस्को आर्ट थिएटर और पेरिस में दिआगिलेव के रूसी सीज़न्स ने रूसी संस्कृति को दुनिया भर में प्रसिद्ध किया।
- रूसी संस्कृति का स्वर्ण युग (19वीं सदी का पूर्वार्ध) – 1812 के युद्ध के बाद रूस की संस्कृति तेज़ी से ऊपर उठी। साहित्य में पुश्किन, लेर्मोंतोव और गोगोल आए; संगीत में ग्लिंका ने राष्ट्रीय धारा शुरू की; चित्रकला में ब्र्युलोव, इवानोव और वेनेत्सियानोव; इमारतों में भव्य साम्राज्य शैली; और विज्ञान में लोबाचेव्स्की, ज़िनिन, पिरोगोव और बेलिंग्सहाउज़ेन-लाज़ारेव की अंटार्कटिका यात्रा। इसे स्वर्ण युग कहते हैं। यह कड़े शासन में उगा, फिर भी दुनिया को ऐसी रचनाएँ दीं जो आज भी पढ़ी और बजाई जाती हैं।
- रूसी साम्राज्य की जातीय-सांस्कृतिक छवि – 1800 के अंत का रूसी साम्राज्य सौ से ज़्यादा जातियों का घर था। 1897 की जनगणना में लगभग 12.6 करोड़ लोग गिने गए: लगभग 100 में 44 रूसी, 18 यूक्रेनी, 6 पोलिश, 5 बेलारूसी और 4 यहूदी, और बहुत-सी और जातियाँ। लगभग 10 में 7 ऑर्थोडॉक्स ईसाई और लगभग 10 में 1 मुस्लिम थे। सिकंदर तृतीय के समय राज्य ने रूसी भाषा और ऑर्थोडॉक्स धर्म को बढ़ावा दिया (रूसीकरण) और अलग-अलग समूहों के लिए अलग नियम चलाए। फिर भी हर जाति ने अपनी भाषा, स्कूल और संस्कृति ज़िंदा रखी।
- रोज़ के जीवन से देखा विश्व इतिहास – इतिहास सिर्फ़ राजाओं और युद्धों का नहीं है। लोग क्या खाते थे, क्या पहनते थे, कैसे घर बनाते थे, परिवार कैसा था, कैसे पढ़ते और खेलते थे, यह भी बहुत कुछ बताता है। जलवायु, फ़सल और व्यापार ने ये आदतें बनाईं, इसलिए एक ही सदी में ठंडे, गर्म-सूखे और बरसात वाले इलाकों का जीवन अलग दिखता था।
- रोमन कानून और रोमन इंजीनियरिंग – रोम ने विशाल साम्राज्य लिखित नियमों (ius, lex) और निर्माण से चलाया: घर (डोमुस, इंसुला), परतों वाली सीधी सड़कें और मील के पत्थर, हल्की ढलान वाले जलसेतु, कंक्रीट की इमारतें और फर्श के नीचे गरम हवा (हाइपोकॉस्ट)। कानून पहले बारह तख्तियों पर खुदे, फिर कानून की किताबों में जमा हुए (संहिताकरण)। सम्राट ट्राजन के समय साम्राज्य सबसे बड़ा था। यूरोप के कई शहर रोमन बस्तियों से शुरू हुए और बाद के यूरोपीय कानून ने रोमन कानून से विचार लिए।
- रोमन गणराज्य: बिना राजा के रोम ने खुद पर कैसे शासन किया – 509 से 27 ईसा पूर्व तक रोम एक गणराज्य था। सत्ता बँटी हुई थी: एक साल के लिए चुने गए दो कॉन्सल, अनुभवी पूर्व अधिकारियों की सीनेट, और नागरिकों की सभाएँ जो क़ानून पर वोट देतीं और अधिकारी चुनतीं। ट्रिब्यून आम लोगों (प्लेबियन) की रक्षा करते थे। नेता पदों की तय सीढ़ी चढ़ते थे। युद्धों से धन और बड़ी सेनाएँ आईं, और सुल्ला व सीज़र जैसे सेनापतियों ने नियम तोड़े। गृहयुद्धों के बाद 27 ईसा पूर्व में ऑगस्टस अकेला शासक बना और गणराज्य ख़त्म हो गया।
- रोमनीकरण और रोमानियाई लोगों की उत्पत्ति – रोम ने सन् 106 में दासिया जीता और लगभग 165 साल शासन किया। सैनिक, बसने वाले और स्थानीय लोग मिल गए और लैटिन रोज़ की भाषा बन गई। सेना के जाने (लगभग सन् 271) के बाद लोग रुके रहे, लैटिन शब्दों में ईसाई धर्म अपनाया और बाद में स्लावों के पास रहे। नतीजा: रोमांस भाषा बोलने वाले लोग।
- लड़ते राज्य, सौ विचारधाराएँ और शांग यांग के सुधार – 770 ई.पू. में चओ राजा कमज़ोर हुआ तो बहुत से छोटे राज्य वसंत-शरद काल (770 से 476 ई.पू.) में सत्ता के लिए लड़ने लगे। लड़ते राज्यों के काल (475 से 221 ई.पू.) तक केवल सात बड़े राज्य बचे। लोहे के औज़ारों और बैल के हल से फ़सल बढ़ी और बड़ी सेनाएँ पल सकीं। सौ विचारधाराओं के विचारकों, जैसे कन्फ़्यूशियसवादी, दाओवादी, मोहवादी और विधिवादी, ने बहस की कि शासन कैसे हो। छिन में शांग यांग के सुधारों ने खेती और सेवा को इनाम दिया और सब पर एक कानून लगाया, जिससे छिन बहुत ताक़तवर हुआ।
- लुई XIV, सूर्य राजा: फ्रांस में निरंकुश राजतंत्र (1643–1715) – लुई XIV 1643 में चार साल की उम्र में फ्रांस के राजा बने और 72 साल राज किया। बचपन में उनकी माँ ऐन और कार्डिनल माज़ारिन ने शासन चलाया। युद्ध के लिए भारी करों से फ्रॉन्द विद्रोह (1648–53) हुए, जिनमें अदालतों (पार्लमाँ) और बड़े सामंतों ने ताज को चुनौती दी; ताज बच गया। 1661 में माज़ारिन की मृत्यु के बाद लुई ने बिना प्रधानमंत्री के ख़ुद राज किया। उन्होंने छोटी परिषदें, कोलबेर जैसे वफ़ादार मंत्री और प्रांतों में इंटेंडेंट नाम के शाही अफ़सर रखे। वर्साय के महल में सामंतों को व्यस्त रखा और कला व समारोहों से ख़ुद को सूर्य राजा दिखाया। कोलबेर ने वाणिज्यवाद से देश को अमीर बनाने की कोशिश की। 1678 तक युद्धों में ज़मीन मिली, पर बाद के युद्ध, 1685 में प्रोटेस्टेंट अधिकारों का अंत और अकालों से 1715 तक फ्रांस भारी कर्ज़ में डूब गया।
- लेखन कला और शहरी जीवन: तीसरी सहस्राब्दी ई.पू. का मेसोपोटामिया – मेसोपोटामिया, यानी दजला और फ़रात नदियों के बीच की ज़मीन, में दुनिया के शुरुआती नगर बने (लगभग 3500 ई.पू. से)। नहरों से दक्षिण में ख़ूब अनाज हुआ। मंदिर बड़ी संस्थाएँ बने, युद्ध-नेता राजा बने, और उरुक और उर जैसे नगर बढ़े। शहरी जीवन में श्रम विभाजन, व्यापार और ऊँच-नीच आई। लेखन लगभग 3200 ई.पू. में मिट्टी की पट्टियों पर कीलाक्षर के रूप में शुरू हुआ: पहले हिसाब, फिर क़ानून, पत्र, कथाएँ और विज्ञान। इतिहासकार बहस करते हैं कि लेखन किसके काम आया।
- लोकतंत्र और एकीकरण: 1989 के बाद रोमानिया – दिसंबर 1989 में रोमानिया की एक-दलीय साम्यवादी सत्ता गिर गई। देश ने स्वतंत्र चुनाव, कई दलों और नए संविधान (1991) वाला लोकतंत्र बनाया, जो सत्ता को संसद, सरकार और अदालतों में बाँटता है। नाटो (2004) और यूरोपीय संघ (2007) में शामिल होना यूरो-अटलांटिक एकीकरण कहलाता है।
- लोकतंत्रीकरण – लोकतंत्रीकरण वह प्रक्रिया है जिसमें कोई देश सत्तावादी शासन से लोकतंत्र की ओर बढ़ता है। इसके चरण होते हैं: सत्तावादी शासन; आंदोलनों, आर्थिक संकट और बाहरी दुनिया से बढ़ता दबाव; पुराने शासकों से बातचीत या टूट; पहले मुक्त चुनाव; और सुदृढ़ीकरण, जब न्यायालय, स्वतंत्र प्रेस, नागरिक समाज और शांतिपूर्ण सत्ता-परिवर्तन लोकतंत्र को स्थिर बनाते हैं। दक्षिण कोरिया (1960 अप्रैल क्रांति, 1980 ग्वांगजू, 1987 जून आंदोलन, 1997 शांतिपूर्ण हस्तांतरण) और पोलैंड (1980 सॉलिडैरिटी, 1981 मार्शल लॉ, 1989 गोलमेज़ और जून चुनाव, 1991 तक मुक्त चुनाव) दो साफ़ उदाहरण हैं। रास्ता सीधा नहीं: यह रुक या पीछे भी जा सकता है।
- ल्याओ, श्या, जिन और युआन का शासन – लगभग 916 से 1368 तक स्टेपी और उत्तर-पूर्व के शासकों ने चीन के हिस्सों पर शासन किया। ल्याओ का दोहरा प्रशासन था: पशुपालकों पर खितान रीति और किसानों पर चीनी ढंग के दफ़्तर। श्या और जिन ने भी पुराने और नए तरीक़े मिलाए। मंगोल युआन ने पूरे चीन को केंद्रीय कार्यालय और लगभग दस प्रांतों से चलाया।
- वर्जिल की एनीड: रोमन महाकाव्य – एनीड वर्जिल का लैटिन भाषा में लिखा बारह पुस्तकों का महाकाव्य है। ट्रॉय से बचा एनियास इटली की ओर जाता है (पुस्तक 1-6) और वहाँ युद्ध लड़ता है (पुस्तक 7-12), नियति उसका मार्ग बनाती है। कविता होमर का जवाब है, रोमन कर्तव्य (पिएतास) का गुणगान करती है और ऑगस्टस के नए युग को स्थापना-कथा देती है।
- वाइमर गणराज्य: जर्मनी का पहला लोकतंत्र – प्रथम विश्व युद्ध के बाद जर्मन सम्राट चले गए और जर्मनी गणराज्य बना (1918-19), जिसका संविधान लोकतांत्रिक था और महिलाओं को भी वोट मिला। गणराज्य पर वर्साय की संधि का बोझ था, वह 1923 तक संकट और अति-मुद्रास्फीति से गुज़रा, 1924 से स्थिर रहा, और महामंदी ने उसे तोड़ दिया, जिससे 1933 में नाज़ियों को सत्ता मिली।
- विउपनिवेशीकरण: साम्राज्य कैसे खत्म हुए और नए देश कैसे बने – विउपनिवेशीकरण वह प्रक्रिया है जिसमें उपनिवेश स्वतंत्र देश बने। यह ज़्यादातर 1945 से 1970 के दशक तक हुआ। दूसरे विश्व युद्ध ने शासक देशों को कमज़ोर किया, आज़ादी के आंदोलन मज़बूत हुए, और संयुक्त राष्ट्र ने हर जनता के स्वशासन के अधिकार का साथ दिया। कुछ उपनिवेश बातचीत और जन-आंदोलन से आज़ाद हुए (भारत 1947, घाना 1957), कुछ लंबे युद्ध से (अल्जीरिया 1962)। नए देशों के सामने गरीबी, एक फ़सल पर टिकी अर्थव्यवस्था, अनुचित सीमाएँ और शीत युद्ध का दबाव था; कई ने गुटनिरपेक्षता चुनी।
- विचारक, विश्वास और इमारतें: सांस्कृतिक विकास (लगभग 600 ई.पू. - 600 ई.) – लगभग छठी सदी ई.पू. से कई विचारकों ने पुराने विचारों और कर्मकांडों पर सवाल उठाए। महावीर ने अहिंसा को केंद्र में रखकर जैन धर्म सिखाया; बुद्ध ने मध्यम मार्ग सिखाया और संघ बनाया। उनके विचार ग्रंथों, विहारों और साँची के महान स्तूप जैसे स्तूपों से फैले, जिनकी नक़्क़ाशी में बुद्ध के लिए प्रतीक हैं। बाद में महायान बौद्ध धर्म, वैष्णव और शैव परंपराएँ मूर्तियों और आरंभिक मंदिरों के साथ बढ़ीं।
- विज्ञान और संस्कृति, 1914–1930 का दशक – प्रथम विश्व युद्ध और 1930 के दशक के अंत के बीच के वर्ष तेज़ बदलाव के थे। भौतिकी को परमाणु (क्वांटम यांत्रिकी) और ब्रह्मांड (सापेक्षता, फैलती आकाशगंगाएँ) के नए नियम मिले। चिकित्सा को इंसुलिन और पेनिसिलिन मिले। रेडियो और सिनेमा ने जन-संस्कृति बनाई। कलाकारों ने पुराने नियम तोड़े (घनवाद, अमूर्त कला, अतियथार्थवाद), लेखकों ने नई शैलियाँ आज़माईं, और सोवियत संघ में 1920 के दशक का खुलापन 1934 में एक आधिकारिक शैली, समाजवादी यथार्थवाद, में बदल गया। एस. एन. बोस और सी. वी. रमन जैसे भारतीय वैज्ञानिकों को विश्व में सम्मान मिला।
- विद्रोही और राज: 1857 का विद्रोह – 10 मई 1857 को मेरठ के सिपाहियों ने बग़ावत की और दिल्ली जाकर बूढ़े मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र को नेता बनाया। विद्रोह छावनी से छावनी एक जैसे ढंग से फैला, जिससे योजना और आपसी संपर्क का पता चलता है। अवध सबसे मज़बूत केंद्र बना, क्योंकि 1856 के विलय से नवाब का दरबार, ताल्लुक़दार, सिपाही और किसान सब एक साथ चोट खाए थे। नाना साहब, रानी लक्ष्मीबाई, बेगम हज़रत महल, कुँवर सिंह और शाह मल जैसे नेताओं ने अगुवाई की। विद्रोहियों की घोषणाओं में हिंदू-मुसलमान एकता और मुग़ल बादशाह का नाम था। अंग्रेज़ों ने सख़्त क़ानूनों और सेना से विद्रोह कुचल दिया। बाद में चित्रों ने इसे अलग-अलग ढंग से दिखाया: अंग्रेज़ी चित्रों में अंग्रेज़ नायक, राष्ट्रवादी चित्रों में वीर विद्रोही।
- विश्व इतिहास की यात्रा: काम, व्यापार और रोज़मर्रा का जीवन कैसे बदला – इतिहास सिर्फ़ राजाओं की कहानी नहीं, आम लोगों के काम की कहानी भी है। खेती से अतिरिक्त अनाज यानी अधिशेष मिला। अधिशेष का व्यापार हुआ, तो बाज़ार, मार्ग और सिक्के बढ़े। अतिरिक्त अनाज होने से कुछ लोग दूसरे काम करने लगे: कारीगरी, व्यापार, लेखन, पूजा-पाठ और सेना। शहर व्यापार, काम, सुरक्षा और शासकों के कारण बढ़े, और बाद में कारख़ानों के कारण। पिछले 200 वर्षों में मशीनों ने लगभग हर काम बदल दिया, और मज़दूरों, महिलाओं व दूसरे समूहों ने आंदोलन करके अधिकार जीते। आज दुनिया के लगभग आधे कामगार सेवा क्षेत्र में हैं।
- विश्व इतिहास: किसी समाज को कैसे समझें, और सेनाएँ कैसे बदलीं – विश्व इतिहास एक देश से आगे देखता है कि एक ही समय में अलग-अलग समाज कैसे जीते थे। किसी भी समाज को समझने के लिए पाँच सवाल पूछो: सत्ता किसके पास थी, लोग क्या काम और व्यापार करते थे, क्या मानते थे, क्या बनाते थे, और किससे मिलते थे। 1500–1950 के चार बड़े समाज (मुग़ल भारत, छिंग चीन, रूसी साम्राज्य और संयुक्त राज्य अमेरिका) दिखाते हैं कि लोगों ने जीवन कितने अलग ढंग से चलाया। सेनाएँ भी बदलीं: भाला-ढाल, फिर घुड़सवार और क़िले, फिर बारूद और तोप, फिर वेतन वाली स्थायी सेना, और आख़िर में रेल और कारखानों वाला औद्योगिक युद्ध। हर बदलाव ने और बदलाव लाए, जैसे मज़बूत केंद्रीय सरकार और ज़्यादा कर।
- विश्व की विविध संस्कृतियाँ: हर क्षेत्र ने दुनिया को क्या दिया – संस्कृति किसी समूह के साझा जीवन का तरीका है: उसका खाना, भाषा, कला, विश्वास और विचार। 1500 से पहले कई क्षेत्रों में समृद्ध संस्कृतियाँ बढ़ीं। पश्चिम एशिया और अफ़्रीका ने शुरुआती शहर, लेखन और कानून दिए। यूरोप ने सार्वजनिक बहस, नाटक, दर्शन और बाद में पुनर्जागरण का विज्ञान दिया। दक्षिण एशिया ने शून्य, दशमलव प्रणाली, योग और बौद्ध धर्म दिया। पूर्वी एशिया ने काग़ज़, छपाई, रेशम और कम्पास दिया। अमेरिका ने मक्का, आलू, टमाटर और सटीक कैलेंडर दिए। कोई भी संस्कृति अकेली नहीं बढ़ी। व्यापार, यात्रा और युद्ध ने विचार इधर से उधर पहुँचाए, इसलिए आज हर संस्कृति एक मेल है।
- वैज्ञानिक क्रांति: विज्ञान ने विचारों को परखना कैसे सीखा – लगभग 1540 से 1700 के बीच यूरोप के विचारकों ने प्रकृति को समझने का तरीका बदल दिया। कोपरनिकस ने सूर्य को केंद्र में रखा, गैलीलियो ने दूरबीन से सबूत जुटाए, केप्लर ने पाया कि कक्षाएँ दीर्घवृत्त हैं, और न्यूटन ने एक ही गुरुत्व नियम से आसमान और धरती दोनों को समझाया। बेकन और देकार्त ने अवलोकन, प्रयोग, तर्क और गणित पर टिकी नई विधि बताई। यही वैज्ञानिक क्रांति है।
- वैश्विक दुनिया का बनना – लोग, सामान, विचार और बीमारियाँ हज़ारों साल से दुनिया में घूम रहे हैं: रेशम मार्ग पर, आलू-मक्का जैसी फ़सलों के साथ और चेचक जैसी बीमारियों के साथ। 1815 से 1914 के बीच विश्व अर्थव्यवस्था तीन धाराओं से बढ़ी: माल, मज़दूर और पूँजी; रेल, भाप के जहाज़ और ठंडे जहाज़ों ने मदद की। उपनिवेशों ने क़ीमत चुकाई: अफ़्रीका में रिंडरपेस्ट और भारत से गिरमिटिया मज़दूर। पहले विश्व युद्ध के बाद अमेरिका में बड़े पैमाने पर उत्पादन और फिर 1929 की महामंदी आई, जिसने भारत के किसानों को बहुत चोट पहुँचाई। 1945 के बाद ब्रेटन वुड्स व्यवस्था, IMF और विश्व बैंक ने दुनिया की अर्थव्यवस्था फिर से खड़ी की।
- व्यापार और रोज़मर्रा का जीवन: वस्तु-विनिमय से विश्व बाज़ार तक – शुरू में लोग सामान की सीधी अदला-बदली (वस्तु-विनिमय) करते थे, पर सौदा तभी होता था जब दोनों को एक-दूसरे का सामान चाहिए। ज़मीन और समुद्र के व्यापार-मार्गों से मसाले, कपड़ा, धातु और विचार दूर-दूर तक पहुँचे। सिक्कों और बाद में कागज़ी नोटों ने वस्तु-विनिमय की दिक्कत हल की और दामों की तुलना आसान की। लगभग 1500 से पाल वाले जहाज़ों, फिर भाप के जहाज़ों, रेल और तार ने क्षेत्रों को जोड़कर विश्व बाज़ार बनाया। 1900 के दशकों में थोक उत्पादन, रेफ्रिजरेशन, तय दाम वाली दुकानें, कंटेनर, कारें और बाद में ऑनलाइन खरीदारी ने रोज़ के जीवन को कई जगहों के सामान से भर दिया। साथ में जोखिम भी आए: असमान लाभ, कुछ समय जबरन मज़दूरी, और युद्ध व महामंदी जैसे झटके जिनसे आपूर्ति टूटी।
- शास्त्रीय अभिव्यक्तियाँ: लोप कर्ता और आदर के संकेत – कई शास्त्रीय पाठों में वाक्य का कर्ता छोड़ दिया जाता है। पाठक सुराग से करने वाले को खोजता है। सबसे मज़बूत सुराग क्रिया का आदर-स्तर है: आदर का रूप बोलने वाले से ऊँचे व्यक्ति को दिखाता है, विनम्र रूप वक्ता या छोटे को, और सादी क्रिया साधारण व्यक्ति को।
- शास्त्रीय रचनाओं के प्रकार – पुराना लेखन तीन बड़े परिवारों में बँटा है। गद्य (कथा, निबंध, डायरी) वाक्यों में होता है। वाका जैसा काव्य 5-7-5-7-7 की तय लय में होता है। चीनी शैली का लेखन (गद्य और कविता) चीनी अक्षरों में होता है, और छोटी कविता में 4 पंक्तियाँ, हर में 5 अक्षर होते हैं। परिवार जानने से पता चलता है कि पाठ कैसे पढ़ना है।
- शिक्षा का इतिहास: प्राचीन विद्यालयों से 19वीं सदी तक – शिक्षा घर और कार्यशाला से शुरू हुई। लिखने वाले समाजों (मिस्र, इज़राइल, यूनान, रोम) ने स्कूल और शिक्षक बनाए। शुरुआती मध्य युग में मठों ने ज्ञान को जीवित रखा और सामंतों ने शूरवीर तैयार किए। लगभग 1100 से कस्बों, शिल्प-संघों और विश्वविद्यालयों ने ज्ञान फैलाया; लगभग 1400 से मानववादियों, छापेखाने और सुधारकों ने कॉलेज और आम लोगों के स्कूल खोले। प्रबोधन ने शिक्षा के अधिकार की बात की और बचपन को खोजा; 1800 के दशक में राज्यों ने स्कूल-व्यवस्था बनाई, और पेस्टालोज़ी, फ्रोबेल और दुर्खाइम जैसे विचारकों ने आधुनिक शिक्षण को आकार दिया।
- शीत युद्ध (1945–1991) – शीत युद्ध (1945–1991) दो महाशक्तियों के बीच लंबी होड़ थी: पश्चिमी साथियों के साथ अमेरिका (पूँजीवाद, बहुदलीय चुनाव) और पूर्वी साथियों के साथ सोवियत संघ (साम्यवाद, एक दल का शासन)। दोनों आपस में सीधे कभी नहीं लड़े। उन्होंने विरोधी गुट बनाए (नाटो, वारसा संधि), परमाणु हथियार और अंतरिक्ष की होड़ की, छद्म युद्धों में उलटे पक्षों का साथ दिया (कोरिया, वियतनाम, अफ़ग़ानिस्तान) और 1962 में क्यूबा में परमाणु युद्ध के करीब पहुँचे। भारत जैसे कई नए देश गुटनिरपेक्ष रहे। 1970 के दशक में तनाव-शैथिल्य आया। सोवियत सुधार, बर्लिन दीवार का गिरना (1989) और सोवियत संघ का विघटन (1991) इसका अंत बने।
- शीत युद्ध के बाद की दुनिया – 1991 में सोवियत संघ टूटा और शीत युद्ध ख़त्म हुआ। कुछ समय एक ही महाशक्ति अकेली रही (एकध्रुवीय विश्व)। फिर यूरोपीय संघ, चीन, रूस, भारत और आसियान जैसे कई शक्ति-केंद्र उभरे और दुनिया बहुध्रुवीय बनी। पुराना तनाव घटा, पर क्षेत्रीय संघर्ष, आतंकवाद और असमान विकास बने रहे। आज शांति व्यापार, बातचीत और साझा नियमों पर टिकी है।
- शुरुआती इंसान से वर्ग और राज्य तक – शुरुआती इंसान छोटे दलों में रहते और खाना बाँटते थे। खेती से अधिशेष (बचा खाना) मिला। अधिशेष से नए काम बने, फिर धन की असमानता, फिर सामाजिक वर्ग, जिनमें ऊपर शासक और नीचे दास थे। व्यवस्था रखने और कर लेने के लिए शासकों ने कानून, सेना और अधिकारियों वाले राज्य बनाए।
- शूरवीर महाकाव्य: अरियोस्तो और तास्सो – शूरवीर महाकाव्य पुनर्जागरण की लंबी कविता है जिसमें वीर (नाइट), प्रेम, जादू और युद्ध हैं। अरियोस्तो (ओरलांडो फुरियोसो, 1516–1532) कई कहानियाँ मज़ाकिया व्यंग्य के साथ बुनते हैं। तास्सो (गेरुसालेम्मे लिबेराता, 1581) एक गंभीर कथा एक लक्ष्य के साथ कहते हैं। दोनों आठ पंक्तियों वाले छंद ओत्ताव रीमा में लिखते हैं।
- संयुक्त राज्य अमेरिका का पश्चिमी विस्तार (1840–1895) – 1840 से 1895 के बीच लाखों लोग उत्तरी अमेरिका में पश्चिम की ओर बसे। उन्हें ज़मीन, सोना, धार्मिक आज़ादी और "मैनिफ़ेस्ट डेस्टिनी" नाम की सोच खींच रही थी। रास्तों, रेल और होमस्टेड अधिनियम ने यह तेज़ किया। मैदानी जनजातियों के लिए इसका मतलब था बाइसन, ज़मीन और जीने के तरीके का बड़ा नुकसान। नई ज़मीनों में दास-प्रथा के झगड़े ने गृहयुद्ध भी भड़काया। 1890 तक सीमांत बंद घोषित हुआ।
- संविधान का निर्माण – भारत का संविधान दिसंबर 1946 से नवंबर 1949 के बीच संविधान सभा ने बनाया, ऐसे समय में जब उम्मीद भी थी और हिंसा भी। सभा के सदस्य प्रांतीय विधानसभाओं ने चुने थे। 11 सत्रों में 165 दिन बैठकें हुईं और बहसें छपती थीं, ताकि जनता भी पढ़ सके। नेहरू ने उद्देश्य प्रस्ताव रखा, डॉ. बी.आर. आंबेडकर प्रारूप समिति के अध्यक्ष थे और डॉ. राजेंद्र प्रसाद सभा के अध्यक्ष। बड़ी बहसें तीन थीं: अल्पसंख्यकों की रक्षा कैसे हो (पृथक निर्वाचिका ठुकराई गई, पर दलितों और आदिवासियों के लिए आरक्षित सीटें रखी गईं), केंद्र और राज्यों को कितनी ताक़त मिले (तीन सूचियों के साथ मज़बूत केंद्र), और देश की भाषा क्या हो (देवनागरी में हिंदी राजभाषा, अंग्रेज़ी 15 साल और)। संविधान 26 नवंबर 1949 को अपनाया गया और 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ।
- संवैधानिक इतिहास: नियमों ने शासकों को कैसे बाँधा – संविधान सर्वोच्च क़ानून है जो बताता है कि शक्ति किसके पास है, वह कैसे सीमित है और लोगों के क्या अधिकार हैं। शासकों पर सीमाएँ धीरे-धीरे बढ़ीं: मैग्ना कार्टा (1215), पोलिश–लिथुआनियाई राष्ट्रमंडल की सेम जैसी सामंती संसदें और चुने हुए राजा (1569–1573 से), और इंग्लैंड का अधिकार विधेयक (1689)। प्रबोधन के विचारकों ने प्राकृतिक अधिकार, सामाजिक अनुबंध, राष्ट्र की संप्रभुता और शक्तियों के पृथक्करण के विचार जोड़े। फिर पहले लिखित राष्ट्रीय संविधान आए: अमेरिका (1787), पोलैंड–लिथुआनिया का 3 मई संविधान और फ़्रांस (1791), और स्पेन का काडिज़ संविधान (1812)। 19वीं सदी के उदार शासन संपत्ति-आधारित मताधिकार वाले संवैधानिक राजतंत्र थे; 20वीं सदी में वोट सभी पुरुषों और फिर सभी वयस्कों तक फैला। भारत (1950) और 1989 के बाद मध्य-पूर्वी यूरोप के आधुनिक संविधान गारंटीशुदा अधिकार और संवैधानिक अदालतें जोड़ते हैं।
- संस्कृत साहित्य में महाकाव्य, गद्यकाव्य और चम्पू – संस्कृत साहित्य में कथा लिखने के तीन बड़े रूप हैं। महाकाव्य सर्गों में बँटी लंबी कविता है, कम से कम आठ सर्ग, जिसका नायक उदात्त होता है, जैसे कालिदास का रघुवंशम्, भारवि का किरातार्जुनीयम् और माघ का शिशुपालवधम्। गद्यकाव्य सुंदर काव्यमय गद्य में कथा है, जैसे बाणभट्ट की कादम्बरी और दण्डी का दशकुमारचरितम्। चम्पू में गद्य और पद्य बारी-बारी आते हैं, जैसे त्रिविक्रम भट्ट का नलचम्पू और भोज का चम्पूरामायणम्।
- सभ्यता और शुरुआती राज्य: गाँवों से राज्य तक – सभ्यताएँ तब शुरू हुईं जब खेती से अनाज बचने लगा। चीन में खेती वाले गाँव (लगभग 5000 ई.पू.) दीवार वाले कस्बों और कारीगरों में बदले (लगभग 3000 ई.पू.)। फिर आए ज़िया (परंपरा में बताया गया राजवंश), शांग (लगभग 1600 से 1046 ई.पू.) जिसने काँसे और भविष्यवाणी की हड्डियों पर लेखन का उपयोग किया, और पश्चिमी चओ (1046 से 771 ई.पू.) जिसमें राजा ने सामंतों को ज़मीन बाँटी और स्वर्ग के आदेश का दावा किया। इन कदमों से चीन के पहले राज्य बने।
- समकालीन इतिहास: 1945 से आज तक हमारी दुनिया – समकालीन इतिहास 1945 से आज तक का है। दूसरे विश्व युद्ध के बाद संयुक्त राष्ट्र बना और उपनिवेश आज़ाद देश बने। शीत युद्ध ने दुनिया को बाँटा; मध्य और पूर्वी यूरोप में कम्युनिस्ट दलों ने सत्ता लेकर एक-दल राज चलाया। पोलैंड के सॉलिडैरिटी जैसे आंदोलनों से 1989–91 के बदलाव आए। तब से वैश्वीकरण, इंटरनेट और साझा वैश्विक समस्याएँ हमारी दुनिया को आकार दे रही हैं।
- समयरेखा 3: लगभग 1300 से 1700 तक की दुनिया – 1300 से 1700 तक के चार सौ साल (चार शताब्दियाँ) में यूरोप और एशिया बहुत बदले। 14वीं सदी में ब्लैक डेथ (प्लेग) आया; 15वीं सदी में छापाख़ाना, उस्मानी तुर्कों की कुस्तुनतुनिया पर जीत और नए समुद्री रास्ते; 16वीं सदी में धर्म-सुधार, मुग़ल और कोपरनिकस; 17वीं सदी में दूरबीन, न्यूटन और एशिया में व्यापारी कंपनियाँ। समयरेखा इन सबको क्रम में रखती है, ताकि पता चले क्या पहले हुआ और क्या एक साथ।
- समयरेखा-1: कालक्रम का विचार (60 लाख वर्ष पहले से 1 ई.पू.) – कालक्रम का मतलब है घटनाओं को सही समय के क्रम में रखना। वर्षों के लिए ई.पू. और ई. लिखते हैं। बहुत पुराने समय के लिए बी.पी. (वर्तमान से पहले) और MYA (दस लाख वर्ष पहले) लिखते हैं। मिट्टी की परतें और कार्बन डेटिंग तिथि बताती हैं। समयरेखा-1 दो पैरों पर चलने वाले पूर्वजों (लगभग 60 लाख वर्ष पहले) से खेती, नगर और लेखन तक जाती है और 1 ई.पू. पर रुकती है।
- समयरेखा-2: लगभग 100 ई.पू. से 1300 ईसवी – यह समयरेखा लगभग 1,400 साल की है, 100 ई.पू. से 1300 ईसवी तक। इस दौर में दुनिया में बड़े साम्राज्य बने। रोमन साम्राज्य भूमध्य सागर के चारों ओर फैला। अरब में इस्लाम शुरू हुआ और एक बड़ी इस्लामी दुनिया बनी। चीन तांग और सुंग वंश में समृद्ध रहा। 1206 में चंगेज़ ख़ान ने मंगोलों को एक किया। यूरोप में सामंत और किसान थे। भारत में गुप्त, चोल और 1206 से दिल्ली सल्तनत थी। समयरेखा से हम देख पाते हैं कि एक ही समय पर कहाँ क्या हो रहा था।
- समयरेखा-4: आधुनिक दुनिया, लगभग 1700 से 2000 – विश्व इतिहास में आधुनिक युग मोटे तौर पर 1700 से 2000 तक माना जाता है। इन 300 सालों में मशीनें और कारखाने बढ़े, क्रांतियों से नए राष्ट्र बने (अमेरिका 1776, फ़्रांस 1789), यूरोप के साम्राज्य एशिया, अफ़्रीका, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया तक फैले, दो विश्व युद्ध हुए और 1945 के बाद ज़्यादातर उपनिवेश आज़ाद हुए। 1989–91 में शीत युद्ध ख़त्म हुआ। समयरेखा से हम हर घटना को उसकी सदी में रखकर देख पाते हैं कि एक बदलाव से दूसरा कैसे निकला।
- समसामयिक इतिहास 1914–1945: कालविभाजन – कालविभाजन का मतलब है समय की लंबी सड़क को नाम वाले दौरों में बाँटना, ताकि हम उसे पढ़ सकें। कई पाठ्यक्रम "समसामयिक" (नवीनतम) इतिहास 1914 से शुरू करते हैं, जब पहला विश्व युद्ध शुरू हुआ, और 1914–1945 को एक खंड मानकर पढ़ते हैं: पहला युद्ध, दो युद्धों के बीच की छोटी शांति और दूसरा युद्ध। कट कहाँ लगे, यह चुनाव है, इसलिए देखिए आपकी किताब कौन-सा कट लेती है।
- सर्वसत्तावाद (Totalitarianism) – सर्वसत्तावादी शासन एक-दलीय राज्य है जो जीवन के हर हिस्से — राजनीति, अर्थव्यवस्था, अख़बार, स्कूल और लोगों के विचार तक — को एक नेता, प्रचार और आतंक के सहारे नियंत्रित करना चाहता है। पहले विश्व युद्ध और 1929 की मंदी के बाद ऐसे शासन फ़ासीवादी इटली (1922), स्तालिन के सोवियत संघ (1920 के दशक का अंत) और नाज़ी जर्मनी (1933) में आए। उनके विचार अलग थे पर तरीक़े मिलते-जुलते, और उनका उदय दूसरे विश्व युद्ध की एक वजह बना।
- सांस्कृतिक इतिहास: लोगों के विचार, कलाएँ और जीने के ढंग कैसे बदलते हैं – सांस्कृतिक इतिहास इतिहास का वह हिस्सा है जो पढ़ता है कि लोग क्या सोचते, मानते, बनाते और कैसे जीते थे, सिर्फ़ राजाओं और सेनाओं ने क्या किया यह नहीं. इसके चार स्तंभ हैं: विश्वास और धर्म, कलाएँ (साहित्य, संगीत, चित्र, भवन), ज्ञान (शिक्षा, विज्ञान, तकनीक) और रोज़ का जीवन (भोजन, पहनावा, परिवार, त्योहार, खेल). इतिहासकार वस्तुएँ, भवन, किताबें, चित्र और चिट्ठियाँ जैसे स्रोत इस्तेमाल करते हैं. व्यापार मार्गों, यात्राओं, धर्म-प्रचार और प्रवास से विचारों के लेन-देन से संस्कृति बदलती है, जैसे कागज़, अंक और धर्म फैले. छपाई, अख़बार, रेडियो और इंटरनेट जैसी तकनीकों से ज्ञान तेज़ी से फैला, और सबके लिए स्कूलों से दुनिया की साक्षरता 1820 के लगभग 12% से आज लगभग 87% हुई. हर देश में राष्ट्रीय स्कूल, विश्वविद्यालय, वैज्ञानिक संस्थाएँ, लेखक और कलाकार लोगों की पहचान गढ़ते हैं.
- सांस्कृतिक विरासत – सांस्कृतिक विरासत वह सब है जो किसी समुदाय को अतीत से मिला, जिसे वह आज महत्व देता है और आगे सौंपना चाहता है: इमारतें और स्मारक, संग्रहालय की चीज़ें, भाषाएँ, संगीत, नृत्य, त्योहार, हुनर, खाना और ज्ञान। मूर्त विरासत छू सकते हैं (अचल जैसे मंदिर और पुल, चल जैसे सिक्के और पांडुलिपियाँ); अमूर्त विरासत जी और निभाई जाती है; प्राकृतिक विरासत में ख़ास भू-दृश्य और जीव हैं। विरासत पहचान देती है, इतिहास सिखाती है, पर्यटन से कमाई लाती है और संस्कृतियों को जोड़ती है। मौसम, प्रदूषण, भीड़, लापरवाह निर्माण, उपेक्षा और संघर्ष इसे ख़तरे में डालते हैं; संरक्षण, कानून, संग्रहालय, विरासत सूचियाँ, शिक्षा और स्थानीय लोग इसे बचाते हैं।
- सामंती जापान: ताइका सुधार, समुराई और शोगुनेट – 645 में ताइका सुधारों ने जापान की ज़मीन सम्राट के अधीन कर दी। समय के साथ ताक़तवर कुलों और योद्धाओं ने असली ताक़त ले ली। 1192 से कामाकुरा में शोगुन सेनापति के रूप में शासन करने लगा, जबकि सम्राट क्योटो में रहा। दाइम्यो नाम के सामंत समुराई रखते थे और किसान खेती करते थे: यह सामंती पिरामिड था।
- सामाजिक इतिहास: आम लोग कैसे जीते थे – सामाजिक इतिहास सिर्फ़ राजाओं, युद्धों और संधियों का नहीं, आम लोगों के जीवन का अध्ययन है। यह पूछता है कि लोग कैसे काम करते, रहते, खाते, कपड़े पहनते, शादी करते, पूजा करते, बीमार पड़ते और मनोरंजन करते थे, और समाज किन समूहों में बँटा था। आधुनिक समय से पहले ज़्यादातर समाज पिरामिड जैसे थे: ऊपर थोड़े शासक और सामंत, फिर पुरोहित और धनी परिवार, बीच में नगरवासी, व्यापारी और कारीगर, और नीचे किसानों की बहुत बड़ी परत, साथ में कुछ बंधुआ लोग जैसे भूदास या ग़ुलाम। गाँव अपना समुदाय खुद चलाते थे; शहर बाज़ार, गिल्ड और अलग-अलग समूहों के मेल की जगह थे। औद्योगीकरण ने लोगों को खेतों से कारख़ानों में पहुँचाया, मज़दूर वर्ग और बढ़ता मध्य वर्ग बनाया, और यूनियन, नए क़ानून और बाद में कल्याणकारी राज्य लाया। नई रोशनी, यातायात, अख़बार, स्कूल और दवाओं से रोज़ का जीवन बदला। सामाजिक इतिहासकार "छिपे" लोगों (महिलाएँ, ग़रीब, अल्पसंख्यक, प्रवासी) को भी खोजते हैं, और यह भी देखते हैं कि भावनाएँ और रीति-रिवाज कैसे बदले।
- साम्राज्यवाद: साम्राज्य क्यों फैले और लोगों ने कैसे विरोध किया – साम्राज्यवाद तब होता है जब एक ताक़तवर राज्य युद्ध, संधि या पैसे से दूसरी भूमि और लोगों पर नियंत्रण कर लेता है। उपनिवेशवाद इसका एक रूप है: उपनिवेश पर सीधा शासन। लगभग 1870 से 1914 तक ('नव साम्राज्यवाद') औद्योगिक देशों में अफ़्रीका, एशिया और प्रशांत में उपनिवेशों की होड़ लगी। उन्हें कच्चा माल, बाज़ार, पूँजी लगाने की जगह, बंदरगाह और रुतबा चाहिए था, और इसे नस्लवादी विचारों से सही ठहराया गया। नियंत्रण व्यापार चौकी से असमान संधि और फिर पूरे उपनिवेश तक बढ़ा। उपनिवेशों का धन बाहर गया: कच्चा माल सस्ते में गया, मशीनी माल लौटा, स्थानीय उद्योग गिरे। लोगों ने विद्रोह, सुधार और जन आंदोलनों से विरोध किया, और 1970 के दशक तक ज़्यादातर उपनिवेश स्वतंत्र हो गए। पीछे छूटी सीमाएँ और असमानता आज भी दुनिया को प्रभावित करती हैं।
- सिकंदर तृतीय: रूढ़िवादी स्थिरीकरण (1881-1894) – सिकंदर तृतीय 1881 में अपने पिता सिकंदर द्वितीय की हत्या के बाद रूस का ज़ार बना। उसने सारी सत्ता अपने हाथ में रखने और कड़े नियंत्रण से देश को शांत करने का रास्ता चुना। पुलिस क़ानून, अख़बारों के नियम और गुप्त पुलिस समाज पर नज़र रखते थे। प्रति-सुधारों ने 1860 के दशक के सुधार घटाए और रईसों को ज़्यादा अधिकार दिए, जैसे भूमि-प्रमुख (1889)। साथ ही किसानों को भूमि बैंक से मदद मिली और पहले कारख़ाना-नियम बने। उसने रूस को बड़े युद्धों से दूर रखा और 1894 में उसकी मृत्यु हुई।
- सिकंदर प्रथम के सुधार (1801-1812) – सिकंदर प्रथम 1801 में रूस का ज़ार बना। वह राज्य को आधुनिक बनाना चाहता था, पर अपना अधिकार छोड़ना नहीं चाहता था। दोस्तों की "अनौपचारिक समिति" (1801-03) ने सुधार सोचे। 1802 में पुराने बोर्डों की जगह आठ मंत्रालय बने। 1803 के क़ानून से मालिक फ़िरौती लेकर किसानों को आज़ाद कर सकते थे, पर बहुत कम ने किया। 1809 में स्पेरांस्की ने तीन शक्तियों और चुनी हुई दूमा की योजना बनाई। सिर्फ़ राज्य परिषद (1810) बनी, और 1812 में स्पेरांस्की हटा दिए गए।
- सुई और तांग से पाँच राजवंश तक: एकता, स्वर्ण-युग और पतन – 581 में यांग जियान ने सुई राजवंश की स्थापना की और 589 में लगभग 300 साल बाद उत्तर-दक्षिण जोड़े। सुई ने ग्रैंड कैनाल बनवाई पर भारी बेगार और महँगे युद्धों से 618 में गिर गया। तांग राजवंश (618 से 907) ने इससे सीखा। सम्राट ताइज़ोंग ने समझदारी से शासन किया, वू ज़ेतियान ने सम्राट के रूप में शासन किया, और श्वानज़ोंग के समय राजधानी छांगआन दुनिया के सबसे बड़े और खुले नगरों में थी। आन लुशान विद्रोह (755 से 763) ने दरबार को कमज़ोर किया; सैन्य-गवर्नर ताक़तवर हुए और 907 में तांग समाप्त हुआ। उत्तर में पाँच छोटे राजवंश और अन्यत्र दस राज्य चले, जब तक 960 में सोंग ने देश को फिर जोड़ा।
- सुई-तांग संस्थाएँ: तीन विभाग, छह मंत्रालय, परीक्षाएँ और कर – सुई और तांग ने ऐसी सरकार बनाई जिसकी नक़ल बाद के राजवंशों ने सदियों तक की। शीर्ष पर तीन विभाग (सचिवालय, चांसलरी, राज-कार्य) आदेश लिखते, जाँचते और लागू करते थे, इसलिए कोई अकेला फ़ैसला नहीं करता था। राज-कार्य विभाग के नीचे छह मंत्रालय थे: कार्मिक, राजस्व, संस्कार, युद्ध, न्याय और निर्माण। अधिकारी अधिकाधिक शाही परीक्षाओं से चुने जाने लगे, ताकि परिवार के साथ प्रतिभा भी मायने रखे। किसानों को समान-भूमि व्यवस्था में ज़मीन मिलती और वे अनाज, कपड़ा और श्रम के रूप में कर देते थे। आन लुशान विद्रोह के बाद यह टूट गई, और 780 में दो-कर व्यवस्था ने लोगों से उनकी ज़मीन और संपत्ति के हिसाब से, साल में दो बार, कर लिया।
- सुकरात-पूर्व दार्शनिक और यथार्थ की पहेली – लगभग 600 ईसा पूर्व यूनानी विचारक संसार को मिथकों की जगह तर्क से समझाने लगे। पहले उन्होंने आर्के यानी मूल तत्त्व खोजा, जिससे सब कुछ निकलता है: थेल्स के लिए जल, एनेक्सीमेंडर के लिए असीम, एनेक्सीमेनीज़ के लिए वायु। फिर और गहरी पहेली आई: क्या परिवर्तन सच है? हेराक्लिटस ने कहा सब कुछ बहता है और आग बदलाव का चिह्न है। पारमेनाइडीज़ ने कहा जो है वह न बदल सकता है न शून्य से आ सकता है, इसलिए बदलाव भ्रम है। डेमोक्रिटस (और ल्यूसिपस) ने बीच का रास्ता निकाला: न बदलने वाले परमाणु खाली जगह में घूमते हैं, और उनके मेल से हमें बदलाव दिखता है।
- सुकरात: सवाल पूछने वाले दार्शनिक – सुकरात (लगभग 470–399 ई.पू.) एथेंस में रहते थे और उन्होंने कुछ नहीं लिखा। पैसे लेने वाले सोफ़िस्टों से अलग, वे सच खोजने के लिए मुफ़्त में लोगों से सवाल पूछते थे। वे कहते थे कि उनका ज्ञान बस इतना है कि वे जानते हैं कि वे नहीं जानते, और 'स्वयं को जानो' उनका जीवन-कार्य था। उनकी पद्धति किसी परिभाषा को उल्टे उदाहरण से जाँचती है जब तक बेहतर परिभाषा न मिले। उन्होंने सिखाया कि आत्मा (साइकी) की देखभाल सबसे ज़रूरी है, अच्छे जीवन के लिए सद्गुण (आरेटे) चाहिए, और सद्गुण ही ज्ञान है: कोई जानबूझकर ग़लत नहीं करता। उन्हें एक भीतरी चेतावनी की आवाज़ (डाइमोनियन) सुनाई देती थी। 399 ई.पू. में एथेंस ने उन्हें मृत्युदंड दिया; उन्होंने दर्शन छोड़ने की बजाय क़ानून मानकर मरना चुना।
- सेंट पीटर्सबर्ग और पीटर महान की नई संस्कृति – 1703 में पीटर महान ने नेवा नदी के दलदली किनारे पर नया शहर बसाना शुरू किया। यही राजधानी बना और रूस की "यूरोप की खिड़की" कहलाया। पीटर नए विचार भी चाहते थे: उन्होंने स्कूल खोले, अख़बार और संग्रहालय शुरू किया, विज्ञान अकादमी की योजना बनाई, कैलेंडर बदला, अक्षर सरल किए और सामंतों को पश्चिमी ढंग से रहना सिखाया। बदलाव तेज़ और ज़बरदस्ती वाले थे, और हज़ारों मज़दूरों ने भारी क़ीमत चुकाई।
- सॉलिडैरिटी आंदोलन: पोलैंड 1976–1981 – 1976 में दाम बढ़ने पर विरोध हुआ और विपक्षी समूह KOR सज़ा पाए मज़दूरों की मदद करने लगा। कैथोलिक चर्च और 1978 में पोप जॉन पॉल द्वितीय के चुने जाने से लोगों को हिम्मत मिली। अगस्त 1980 में ग्दान्स्क शिपयार्ड की हड़ताल पूरे पोलैंड में फैली और ग्दान्स्क समझौते पर खत्म हुई, जिसने स्वतंत्र यूनियन की इजाज़त दी। सॉलिडैरिटी के लगभग 1 करोड़ सदस्य हो गए।
- सोंग काल की अर्थव्यवस्था, समाज और संस्कृति – सोंग काल में बेहतर धान और गीले खेतों ने लोगों को दक्षिण खींचा और 1127 के बाद दक्षिण में चीन की ज़्यादातर आबादी और व्यापार था। शहर बढ़े और काग़ज़ी मुद्रा आई। नव-कन्फ़्यूशियस मत, ची कविता और चल टाइप, दिशासूचक व जल घड़ी-मीनार जैसे आविष्कार इस संस्कृति की पहचान थे।
- सोंग की राजनीति और सेना (960 से 1279) – चाओ क्वांगयिन ने 960 में सोंग की स्थापना की और राज्यपालों व सेनापतियों से सत्ता लेकर नागरिक अधिकारियों को दी। सोंग घर में मज़बूत पर युद्ध में कमज़ोर था। उसने ल्याओ और श्या से चाँदी, रेशम और चाय देकर शांति रखी और 1127 में उत्तर जिन के हाथों खोकर दक्षिण चला गया।
- सोवियत संघ (USSR) का गठन, 1922, और 1924 का संविधान – 30 दिसंबर 1922 को चार सोवियत गणराज्यों (रूस, यूक्रेन, बेलारूस और ट्रांसकाकेशिया) ने संधि करके सोवियत समाजवादी गणराज्यों का संघ (USSR) बनाया। लेनिन बराबर के गणराज्यों का संघ चाहते थे। 1924 के संविधान से संघ की संसद के दो सदन बने। रक्षा और विदेश नीति केंद्र के पास रही, स्कूल, भाषा और स्थानीय अदालतें गणराज्यों के पास। पर असली ताक़त कम्युनिस्ट पार्टी के पास थी।
- सोवियत संघ और उसके साम्राज्य का विघटन (1953–2000) – 1953 में स्टालिन की मृत्यु के बाद सोवियत संघ ने नियंत्रण खोए बिना सुधार करना चाहा। ख्रुश्चेव ने स्टालिन की आलोचना की और आतंक कम किया, पर 1956 में हंगरी को कुचला। ब्रेझनेव (1964–82) के समय विकास धीमा हुआ और नेता बूढ़े हो गए: 'ठहराव के साल'। पूर्वी यूरोप के उपग्रह देशों को बल (प्राग 1968) से और पश्चिमी कर्ज़ से ख़रीदे आराम के वादे से काबू में रखा गया। विरोध बढ़ा, ख़ासकर पोलैंड की सॉलिडैरिटी यूनियन (1980)। गोर्बाचेव (1985–91) ने ग्लासनोस्त और पेरेस्त्रोइका आज़माए और विदेश में बल प्रयोग बंद किया। 1989 में उपग्रह देशों ने साम्यवाद छोड़ा, और 1991 में सोवियत संघ 15 देशों में बँट गया। फिर येल्तसिन के रूस ने दर्दनाक 'शॉक थेरेपी' झेली, और 2000 में पुतिन आए।
- सोवियत संघ में औद्योगीकरण और सामूहिकीकरण (1928 से 1940) – 1928 से सोवियत राज्य ने पंचवर्षीय योजनाओं से भारी उद्योग तेज़ी से खड़े किए और छोटे खेतों को मिलाकर सामूहिक खेत (कोलख़ोज़) बनाए। कोयला, इस्पात और बिजली कई गुना बढ़े, शहर फैले। पर राज्य ने ज़बरदस्ती अनाज लिया, कुलक हटाए गए और 1932-33 के अकाल में लाखों लोग मरे। उद्योग को लाभ हुआ; खेती और आम जीवन ने क़ीमत चुकाई।
- सोवियत संघ में क़ब्ज़ा और प्रतिरोध (1941 से 1944) – जून 1941 के बाद जर्मनी ने पश्चिमी सोवियत संघ के बड़े हिस्से पर क़ब्ज़ा कर कठोर शासन चलाया: अनाज और सामान लिया गया, लगभग 30 लाख लोगों को जर्मनी में जबरन काम पर भेजा गया, हज़ारों गाँव जलाए गए और यहूदी समुदायों की हत्या हुई। जंगलों-दलदलों में पक्षपाती टुकड़ियों और शहरों में भूमिगत समूहों के रूप में प्रतिरोध बढ़ा। 1943 के रेल युद्ध में दो लाख से ज़्यादा पटरियाँ उड़ाई गईं और जर्मन आपूर्ति धीमी हुई। युद्ध में लगभग 2.7 करोड़ सोवियत लोग मरे, करीब आधे नागरिक।
- सौ दिन का सुधार (1898) – सौ दिन का सुधार 1898 में चीन को ऊपर से बदलने की छोटी पर साहसी कोशिश थी। 1895 में जापान से हार और बंदरगाह व पट्टे की ज़मीन के लिए विदेशी दबाव के बाद कांग योवेई और लियांग छिचाओ जैसे विद्वानों ने केवल नई मशीनों की नहीं, गहरे बदलाव की माँग की। युवा गुआंग्शू सम्राट सहमत हुए। 11 जून से उन्होंने परीक्षा, स्कूल, सेना, खेती, उद्योग, प्रेस, व्यापार और सरकारी दफ़्तरों पर आदेश जारी किए और पेकिंग शाही विश्वविद्यालय बना। पर सुधारकों के पास सेना नहीं थी, दरबार का अनुभव कम था और आदेश बहुत तेज़ी से आए। 21 सितंबर को राजमाता त्सू-शी ने रूढ़िवादी अधिकारियों और सेना प्रमुखों के समर्थन से फिर सत्ता ली, सम्राट को निगरानी में रखा और ज़्यादातर आदेश रद्द कर दिए। छह सुधारकों को मृत्युदंड मिला और कांग व लियांग विदेश भाग गए। सुधार असफल रहा, पर विश्वविद्यालय बना रहा और 1901 के बाद दरबार ने ख़ुद व्यापक सुधार शुरू किए।
- स्टुअर्ट ब्रिटेन और राजतंत्र का संकट (1603–1702) – 1603 में स्कॉटलैंड के जेम्स षष्ठ इंग्लैंड के जेम्स प्रथम बने, यानी एक राजा दोनों राज्यों पर। स्टुअर्ट मानते थे कि राजा ईश्वर चुनता है, पर टैक्स के लिए उन्हें संसद चाहिए थी। चार्ल्स प्रथम के समय पैसे, धर्म और अधिकारों पर झगड़े बढ़े; उन्होंने 1629 से 1640 तक बिना संसद राज किया। स्कॉटलैंड और आयरलैंड के विद्रोहों ने उन्हें संसद बुलाने पर मजबूर किया, और 1642 में गृहयुद्ध शुरू हुआ। संसद की न्यू मॉडल आर्मी जीती, और 1649 में चार्ल्स प्रथम पर मुक़दमा चलाकर मृत्युदंड दिया गया। ब्रिटेन गणराज्य बना, फिर ओलिवर क्रॉमवेल लॉर्ड प्रोटेक्टर बने। 1660 में चार्ल्स द्वितीय लौटे, पर नए 'दल' (व्हिग और टोरी) धर्म और सत्ता पर बहस करने लगे। कैथोलिक जेम्स द्वितीय से प्रोटेस्टेंट शासन और संसद को ख़तरा लगा, तो 1688 में विलियम और मैरी आए। अधिकार विधेयक (1689) ने ताज को सीमित किया: ब्रिटेन संवैधानिक राजतंत्र बना।
- स्तोलिपिन के सुधार (1906-1911): किसान मालिक, पूर्व में बसावट और तीसरी-चौथी दूमा – 1906 से प्रधानमंत्री प्योत्र स्तोलिपिन ने 1905 की बेचैनी का जवाब सख़्ती और सुधार दोनों से दिया। 9 नवंबर 1906 के उनके भूमि-सुधार ने किसानों को गाँव के समुदाय से निकलकर अपने सघन खेतों के मालिक बनने दिया; राज्य ने लगभग 30 लाख लोगों को पूर्व में बसाने में भी मदद की। 3 जून 1907 को मतदान क़ानून बदलने के बाद तीसरी दूमा (1907-12) और चौथी दूमा (1912-17) ज़मींदारों की ओर झुकी रहीं। 1911 में स्तोलिपिन को गोली लगने और युद्ध से काम रुकने तक लगभग एक चौथाई किसान परिवार समुदाय छोड़ चुके थे।
- स्थानीय इतिहास: अपनी जगह की कहानी खोजो – स्थानीय इतिहास किसी एक ऐसी जगह का इतिहास है जहाँ तुम जा सकते हो: गाँव, शहर, मोहल्ला, स्कूल या इमारत। तुम एक सवाल पूछते हो, इमारतों, नक्शों, अभिलेखों, फ़ोटो, स्मारकों और लोगों की यादों में सुराग़ ढूँढते हो, और स्थानीय घटनाओं को बड़ी राष्ट्रीय और विश्व घटनाओं से जोड़ते हो। इससे बदलाव और निरंतरता दिखती है, आज के स्थानीय मुद्दे समझ आते हैं और विरासत बचती है।
- स्रोत विश्लेषण: इतिहासकार सबूत कैसे परखते हैं – स्रोत अतीत का कोई भी निशान है जिससे हमें सबूत मिलता है: चिट्ठी, सिक्का, इमारत, गीत, फ़ोटो या वीडियो। प्राथमिक स्रोत उसी समय के होते हैं जिसका अध्ययन हो रहा है; द्वितीयक स्रोत बाद के विवरण हैं, जैसे इतिहासकारों की किताबें। स्रोत परखने के लिए उसका उद्गम पूछो (किसने, कब, क्यों, किसके लिए बनाया), उसकी बातों को अपनी जानकारी से मिलाओ, पक्षपात ढूँढो, और तय करो कि वह तुम्हारे प्रश्न के लिए कितना विश्वसनीय और कितना उपयोगी है। इतिहासकार स्रोतों को एक-दूसरे से मिलाते हैं (पुष्टि) और अलग-अलग विद्वानों की व्याख्याएँ पढ़कर तर्कपूर्ण टिप्पणी या निबंध लिखते हैं।
- स्वतंत्रता आंदोलन: औपनिवेशिक शासन से स्वतंत्र राज्य तक – स्वतंत्रता आंदोलन किसी देश के लोगों का वह लंबा प्रयास है जिससे वे बाहरी शासन खत्म कर अपना राज्य बनाते हैं। यह आमतौर पर चरणों में बढ़ता है: अन्यायपूर्ण शासन पर गुस्सा, शांतिपूर्ण जनआंदोलन, नेतृत्व (कभी विदेश में), दूसरे देशों का दबाव और कभी-कभी सशस्त्र संघर्ष। कोरिया (1919-1945), भारत (1947 तक) और घाना (1957) एक ही लक्ष्य के अलग रास्ते दिखाते हैं।
- हमारा क्षेत्र 1945 से: हमारी अपनी जगह कैसे बदली – स्थानीय इतिहास बड़ी विश्व-घटनाओं को एक जानी-पहचानी जगह में दिखाता है। 1945 के बाद एक आम क्षेत्र ने युद्ध के बाद पुनर्निर्माण किया, उद्योग और नए आवास से बढ़ा, 1990 और 2000 के दशक में कठिन बदलाव झेले और अब ज़्यादातर सेवाओं और नई तकनीक पर टिका है। इतिहासकार फ़ोटो, नक़्शे, दस्तावेज़ और बड़ों की यादों से यह कहानी बताते हैं।
- होलोकॉस्ट – होलोकॉस्ट (हिब्रू में शोआ) 1933 से 1945 के बीच नाज़ी जर्मनी और उसके साथियों-मददगारों द्वारा यूरोप के लगभग 60 लाख यहूदियों का योजनाबद्ध, राज्य द्वारा संगठित उत्पीड़न और जनसंहार था। यह पुराने यहूदी-विरोध (antisemitism) और नाज़ी नस्लवादी विचारधारा से पैदा हुआ। यह क़दम-दर-क़दम बढ़ा: बहिष्कार और क़ानून (1933–38), घेटो और सामूहिक गोलीबारी (1939–41), और मृत्यु शिविर (1942–45)। रोमा और सिंती, विकलांग लोग, पोलिश और सोवियत नागरिक, सोवियत युद्धबंदी और दूसरे लोग भी सताए और मारे गए। यहूदियों ने कई तरह से प्रतिरोध किया, कुछ लोगों ने जान जोखिम में डालकर उन्हें बचाया, जबकि बहुत से चुप रहे। युद्ध के बाद मुक़दमे, 1948 का जनसंहार अभिसमय और स्मृति के प्रयास हुए, ताकि ऐसा अपराध फिर न हो।