रूस युद्ध में क्यों उतरा
1914 में रूस एक साम्राज्य था, जिसके शासक ज़ार निकोलस द्वितीय के पास अंतिम फ़ैसले की ताक़त थी। रूस का फ़्रांस और ब्रिटेन से गठबंधन था। जब ऑस्ट्रिया-हंगरी ने सर्बिया पर हमला किया, जिसका रूस समर्थक था, तो रूस ने सेना जुटाई और अगस्त 1914 में जर्मनी ने उस पर युद्ध घोषित कर दिया। राजधानी सेंट पीटर्सबर्ग का नाम बदलकर पेत्रोग्राद रखा गया (कम जर्मन-सा लगने वाला नाम)।
रूस के पास यूरोप की सबसे बड़ी सेना थी (शुरू में लगभग 50 लाख और पूरे युद्ध में लगभग डेढ़ करोड़ भर्ती)। पर कारख़ाने कम और रेलें पतली थीं, इसलिए सेना बड़ी थी लेकिन सामान की कमी थी।
मोर्चा: टैनेनबर्ग, महान पीछे हटना, ब्रूसिलोव आक्रमण
- 1914: रूस ने फ़्रांस की मदद के लिए जल्दी हमला किया। अगस्त 1914 में टैनेनबर्ग में एक रूसी सेना घिर गई और जर्मनी से हार गई। ऑस्ट्रिया-हंगरी के सामने दक्षिण में रूस का प्रदर्शन बेहतर रहा।
- 1915: जर्मन और ऑस्ट्रियाई हमलों से महान पीछे हटना पड़ा। रूस ने पश्चिम में बड़ा इलाका और बहुत सैनिक खोए। गोले और राइफ़लें कम पड़ गईं। सितंबर में ज़ार ने सेना की कमान ख़ुद सँभाली। इसके बाद हर हार का दोष उन्हीं पर आया।
- 1916: जनरल अलेक्सेई ब्रूसिलोव के ब्रूसिलोव आक्रमण ने ऑस्ट्रिया-हंगरी की पंक्तियाँ तोड़ दीं। यह रूस का युद्ध का सबसे अच्छा हमला था, पर इसमें लगभग दस लाख रूसी हताहत हुए और उसका लाभ आगे नहीं उठाया जा सका।
घरेलू मोर्चा: अनाज, दाम और ग़ुस्सा
घरेलू मोर्चा यानी वे लोग जो घर पर रहकर युद्ध में मदद करते हैं। रूस में उस पर भारी बोझ पड़ा:
- लाखों किसान और घोड़े सेना में ले लिए गए, इसलिए अनाज कम उगा।
- रेलें सैनिकों और तोपों में लगी थीं, इसलिए अनाज स्टेशनों पर सड़ता रहा और शहरों तक नहीं पहुँचा।
- सरकार ने युद्ध के लिए नोट छापे, इसलिए दाम मज़दूरी से तेज़ बढ़े।
- युद्ध-क्षेत्र से आए शरणार्थी और घायल सैनिक शहरों में भर गए। कारख़ाने बढ़े और मज़दूर तंग घरों में रहे।
नगर-परिषदों और व्यापारियों के स्वयंसेवी संगठनों ने सामान और अस्पतालों में मदद की और ड्यूमा (संसद) ने ऐसी सरकार माँगी जिस पर जनता भरोसा कर सके। ज़ार नहीं झुके। ज़ारीना के क़रीबी संत रासपुतिन के प्रभाव की अफ़वाहों से दरबार की साख और गिरी।
युद्ध से 1917 तक कैसे पहुँचे
1916-17 की सर्दी तक पेत्रोग्राद में रोटी की कतारें लंबी हो गईं और ठंड कड़ी थी। मज़दूरों ने हड़ताल की और सैनिक, जो वर्दी में किसान ही थे, लड़ते-लड़ते थक चुके थे। युद्ध रूस की सभी समस्याओं का कारण नहीं था, पर उसने उन्हें अनदेखा करना असंभव बना दिया। अगला पाठ 1917 की क्रांति बताता है कि फ़रवरी और अक्टूबर में क्या हुआ।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- रूस के युद्ध वर्ष: 1914 टैनेनबर्ग (हार) → 1915 महान पीछे हटना → 1916 ब्रूसिलोव आक्रमण → 1917 क्रांति
- घरेलू मोर्चे की कड़ी: युद्ध → खेतों में कम मज़दूर + जाम रेल → अनाज की कमी + महँगाई → हड़ताल और ग़ुस्सा
- मुख्य शब्द: मोर्चा (जहाँ सेनाएँ लड़ती हैं), घरेलू मोर्चा (घर पर रहने वाले लोग), ड्यूमा (संसद), पेत्रोग्राद (सेंट पीटर्सबर्ग का नया नाम)
- ज़ार निकोलस द्वितीय ने सितंबर 1915 में सेना की कमान सँभाली
हल किए गए उदाहरण
1. सबसे बड़ी सेना होने पर भी रूस 1914-15 में इतना क्यों हारा?
क्योंकि केवल संख्या काफ़ी नहीं होती। रूस के कारख़ाने कम थे, इसलिए सैनिकों के पास गोले और राइफ़लें कम थीं। रेलें पतली थीं, इसलिए सामान और अतिरिक्त सैनिक धीरे पहुँचे। सेनापतियों में तालमेल भी जर्मन कमान से कम था।
2. खेती वाले देश रूस में पेत्रोग्राद में रोटी क्यों कम पड़ी?
बहुत से खेतिहर मज़दूर और घोड़े सेना में चले गए, इसलिए अनाज कम उगा। जो उगा वह अक्सर शहर नहीं पहुँचा क्योंकि रेलें पहले सैनिक और तोपें ढोती थीं। नोट छपने से दाम भी बढ़े।
3. ज़ार के ख़ुद सेना की कमान लेने से वे कमज़ोर क्यों हुए?
सितंबर 1915 से वे सेनापति थे, इसलिए मोर्चे की हर हार और कमी का दोष सीधे उन पर आया। उसी समय घर की सरकार कमज़ोर मंत्रियों के हाथ में रह गई।
4. दो बातें बताइए जो दिखाती हैं कि रूस के लिए यह "संपूर्ण युद्ध" था।
खेत, कारख़ाने और रेलें सब युद्ध में लग गए, और आम लोगों को परिवार के सदस्य खोने के साथ अनाज की कमी और ऊँचे दाम भी झेलने पड़े।
आम गलतियाँ
- यह सोचना कि रूस की सेना छोटी थी इसलिए वह कमज़ोर था। उसकी सेना सबसे बड़ी थी; कमी सामान, रेल और नेतृत्व की थी।
- ब्रूसिलोव आक्रमण को हार लिखना। वह 1916 की सफल सेंध थी, पर बहुत महँगी रही और उसके बाद स्थायी जीत नहीं मिली।
- मोर्चा और घरेलू मोर्चा मिला देना। मोर्चा = जहाँ सेनाएँ लड़ती हैं। घरेलू मोर्चा = युद्ध में मदद करने वाले आम लोग और कारख़ाने।
- यह कहना कि अकेले युद्ध ने क्रांति कराई। ज़ार के शासन में गहरी समस्याएँ पहले से थीं; युद्ध ने उन्हें और बढ़ा दिया।