पिछला मोर्चा (होम फ्रंट) क्या है?
बड़े युद्ध में सैनिक मोर्चे पर लड़ते हैं। बाक़ी सब लोग पिछले मोर्चे (होम फ्रंट) पर होते हैं। कारख़ाने के मज़दूर हथियार बनाते हैं। किसान अनाज उगाते हैं। नर्सें घायलों की देखभाल करती हैं। बच्चे कबाड़ जमा करते हैं और घर में हाथ बँटाते हैं।
आज का युद्ध अकेले सैनिक नहीं जीतते। सेना को रोज़ जूते, गोलियाँ, ट्रक और रोटी चाहिए। यह सब पिछला मोर्चा देता है।
निकासी: कारख़ाने और लोग पूर्व की ओर
22 जून 1941 को सोवियत संघ पर हमला हुआ। कुछ ही दिनों में दुश्मन देश के भीतर बहुत आगे आ गया। बहुत से बड़े कारख़ाने पश्चिम में थे, ठीक उसके रास्ते में। अगर वे पकड़े जाते तो सेना के हथियार ख़त्म हो जाते।
इसलिए देश ने उन्हें हटा दिया। एक विशेष परिषद ने योजना बनाई। मशीनें खोली गईं, रेल के डिब्बों में लदीं और पूर्व में वोल्गा क्षेत्र, यूराल, साइबेरिया और मध्य एशिया भेजी गईं, लड़ाई से दूर। कुशल मज़दूर अपने परिवारों के साथ गए। 1941-42 में लगभग 1,500 बड़े कारख़ाने और क़रीब 1 करोड़ लोग हटाए गए। ये गोल आँकड़े हैं जो इतिहासकार बताते हैं।
नई जगह पर काम अक्सर खुले आसमान के नीचे शुरू हुआ, छत बाद में बनी। कई कारख़ाने कुछ हफ़्तों या महीनों में फिर माल बनाने लगे। जाना-माना उदाहरण एक टैंक कारख़ाना है जो यूराल गया और T-34 टैंक बनाता रहा।
युद्ध-अर्थव्यवस्था
युद्ध-अर्थव्यवस्था वह अर्थव्यवस्था है जो युद्ध को सबसे पहले रखती है। सरकार तय करती है कि कारख़ाने क्या बनाएँ। टैंक, विमान, गोले और वर्दियाँ पहले। जूते, कपड़ा, फ़र्नीचर और खिलौने कम हो जाते हैं।
- राशन कार्ड: हर आदमी को रोटी और दूसरे खाने की तय मात्रा मिलती है, ताकि बँटवारा बराबर हो।
- लंबे घंटे: बहुत से मज़दूर हफ़्ते में छह दिन या ज़्यादा लंबी पालियों में काम करते थे।
- नए कामगार: मोर्चे पर गए पुरुषों की जगह महिलाओं, किशोरों और बुज़ुर्गों ने ली।
- खेती: खेतों में आदमी और घोड़े कम थे, फिर भी सेना और शहरों को खिलाना था।
- बाहर की मदद: मित्र देशों ने ट्रक, खाना और धातुएँ भेजीं, जिनसे मदद मिली।
यह सफल रहा। 1942 से सोवियत कारख़ाने दुश्मन से ज़्यादा टैंक और विमान बना रहे थे। पर क़ीमत भारी थी: भूख, ठंड, थकान और बहुत कम फ़ुरसत।
दूसरे देशों में पिछला मोर्चा
युद्ध में शामिल हर देश का एक पिछला मोर्चा था।
- ब्रिटेन: 1939 में दस लाख से ज़्यादा बच्चे और माँएँ बमबारी से बचने के लिए शहरों से गाँवों में गए। कई साल खाना राशन से मिला।
- अमेरिका: कार के कारख़ाने टैंक और विमान बनाने लगे। लाखों महिलाओं ने कारख़ानों में नौकरी की।
- भारत: बीस लाख से ज़्यादा भारतीयों ने स्वेच्छा से सेना में भर्ती ली, और भारतीय कारख़ाने व खेत मित्र देशों के युद्ध-प्रयास को सामान देते रहे।
विचार वही हैं: लोगों या काम को सुरक्षित जगह ले जाओ, कारख़ानों को युद्ध के सामान पर लगाओ, खाना बराबर बाँटो, और सबको मदद में लगाओ।
करके देखिए: दस सिक्के बाँटिए
10 सिक्के या बटन लीजिए। यह आपके खिलौना-शहर का एक हफ़्ते का पूरा काम है। 7 को "युद्ध का सामान" वाले डिब्बे में और 3 को "रोज़ की ज़िंदगी" वाले डिब्बे में रखिए। लिखिए कि शहर में किस चीज़ की कमी हुई। अब 3 और 7 आज़माइए। फिर 3D के खुले खेल वाले चरण में वही संख्याएँ स्लाइडर से चलाइए। कौन-सा बँटवारा सबसे अच्छा है? कोई पूरा सही उत्तर क्यों नहीं है?
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- पिछला मोर्चा: युद्ध की मदद करने वाले नागरिक और अर्थव्यवस्था।
- निकासी: लोगों, मशीनों या सामान को ख़तरे से दूर ले जाना।
- युद्ध-अर्थव्यवस्था: युद्ध का सामान पहले, राशन, लंबे घंटे, नए कामगार।
- राशन कार्ड: काग़ज़ जिससे आदमी तय मात्रा में खाना ख़रीद सकता है।
- सोवियत आँकड़े (गोल): लगभग 1,500 बड़े कारख़ाने और लगभग 1 करोड़ लोग, 1941-42।
हल किए गए उदाहरण
1. कारख़ानों को पश्चिम में छोड़ने के बजाय पूर्व क्यों ले जाया गया?
मशीनों और कुशल मज़दूरों की जगह लेना बहुत कठिन है। पश्चिम दुश्मन के रास्ते में था और पूर्व लड़ाई से दूर। कारख़ाने हटाने से वे दुश्मन के हाथ नहीं लगे और हथियार बनाते रहे।
2. युद्ध-अर्थव्यवस्था से रोज़ की ज़िंदगी में आए दो बदलाव बताइए।
खाना राशन कार्ड से बँटा, हर आदमी को तय मात्रा मिली। जूते और खिलौने जैसी चीज़ें कम हो गईं और लोग लंबे घंटे काम करने लगे। महिलाओं और किशोरों ने कारख़ानों में काम किया।
3. 1939 में ब्रिटेन की निकासी और सोवियत निकासी की तुलना कीजिए।
सोवियत निकासी मुख्यतः कारख़ानों और कुशल मज़दूरों की थी, ताकि उत्पादन चलता रहे। ब्रिटिश निकासी मुख्यतः बच्चों और माँओं की थी, बमबारी से बचाने के लिए। दोनों में चीज़ों या लोगों को ख़तरे से दूर ले जाया गया।
4. एक कारख़ाना हफ़्ते में 200 इकाइयाँ बनाता है। युद्ध-अर्थव्यवस्था में 75% युद्ध के सामान को जाता है। रोज़ की ज़िंदगी के लिए कितनी बचीं?
युद्ध का सामान: 200 का 75% = 150। बचा: 200 - 150 = 50 इकाइयाँ (25%)।
आम गलतियाँ
- यह सोचना कि पिछला मोर्चा केवल सुरक्षित जगहें हैं। इसका मतलब वह पूरा नागरिक जीवन है जो युद्ध की मदद करता है।
- यह सोचना कि निकासी में केवल लोग गए। कारख़ाने और मशीनें भी हटाई गईं।
- यह मानना कि हटाने में सिर्फ़ कुछ दिन लगे। इसमें महीनों लगे; कई कारख़ाने हफ़्तों या महीनों में फिर चालू हुए।
- यह सोचना कि युद्ध-अर्थव्यवस्था में शांति के सामान बिल्कुल बंद हो जाते हैं। वे कम हो जाते हैं, ख़त्म नहीं होते।