क़ब्ज़ा शासन ("नई व्यवस्था")
1941 से 1944 के बीच जर्मनी ने बेलारूस, यूक्रेन, बाल्टिक क्षेत्र और पश्चिमी रूस के बड़े हिस्से पर क़ब्ज़ा रखा। क़ब्ज़ा यानी कोई बाहरी शक्ति ज़मीन और लोगों पर बल से शासन करे।
- शासन: ओस्टलैंड और यूक्रेन नाम के नागरिक प्रदेश, और सेना के अधीन एक क्षेत्र। स्थानीय पुलिस बनाई गई, कुछ लोगों ने सहयोग किया, और बहुतों ने इनकार किया।
- नस्लवादी योजनाएँ: नाज़ी नेता स्लावों को "निम्न" लोग मानते थे और जर्मन बसने वालों के लिए ज़मीन लेने की योजना बनाई (जनरलप्लान ओस्ट)।
- आर्थिक लूट: जर्मनी और उसकी सेना को खिलाने के लिए खेतों से ज़बरदस्ती अनाज और पशु लिए गए।
- जबरन मज़दूरी: लगभग 30 लाख सोवियत नागरिकों (ओस्टआर्बाइटर) को ख़राब हालात में जर्मनी काम करने ले जाया गया।
नागरिकों का कष्ट और सामूहिक हत्याएँ
आम लोग भूख और डर में रहे।
- सामूहिक सज़ा: पक्षपातियों के हमले पर पूरे गाँव को सज़ा मिल सकती थी। बेलारूस, यूक्रेन और रूस के हज़ारों गाँव जलाए गए।
- क़ैदी: 1941 में पकड़े गए लाखों सोवियत सैनिक शिविरों में भूख और बीमारी से मरे।
- यहूदियों की हत्या: क़ब्ज़े वाले सोवियत इलाक़ों में यहूदी समुदायों को सामूहिक रूप से गोली मारी गई, जैसे सितंबर 1941 में कीव के पास बाबी यार में। यह होलोकॉस्ट का हिस्सा था (होलोकॉस्ट का पाठ देखो)।
- कुल क़ीमत: युद्ध में लगभग 2.7 करोड़ सोवियत लोग मरे, उनमें करीब आधे नागरिक।
पक्षपाती आंदोलन और भूमिगत प्रतिरोध
पक्षपाती (पार्टिज़न) वे सशस्त्र लड़ाके हैं जो दुश्मन की पंक्तियों के पीछे काम करते हैं। वे जंगलों और दलदलों में छिपते हैं और आपूर्ति लाइनों, छोटी चौकियों और रेलगाड़ियों पर वार करते हैं।
- 3 जुलाई 1941: स्तालिन ने जर्मन पंक्तियों के पीछे "पक्षपाती युद्ध" की पुकार दी।
- 30 मई 1942: पक्षपाती आंदोलन का केंद्रीय मुख्यालय बना, जो टुकड़ियों को सोवियत कमान से जोड़ता और रेडियो, विस्फोटक और आदेश भेजता था।
- कहाँ: बेलारूस (जंगल और दलदल) में सबसे मज़बूत, यूक्रेन और पश्चिमी रूस में भी। 1944 तक लगभग दस लाख लोग आंदोलन में थे।
- भूमिगत: शहरों में समूह पर्चे लिखते, जानकारी पहुँचाते और भागने में मदद करते थे। प्रसिद्ध उदाहरण क्रास्नोदोन की किशोरों वाली "यंग गार्ड" है।
- एक कहानी नहीं: आम लोगों ने कई तरह से विरोध किया; कुछ ने क़ब्ज़ाधारियों का साथ भी दिया, और कुछ ने दोनों तरफ़ से सज़ा झेली।
रेल युद्ध और उसका महत्व
अगस्त-सितंबर 1943 में पक्षपातियों ने रेल युद्ध और बाद में ऑपरेशन "कंसर्ट" चलाया, जो सोवियत हमलों के साथ तालमेल में था। दो लाख से ज़्यादा पटरियाँ उड़ाई गईं। टूटी पटरी से गाड़ी रुकती है और मरम्मत में समय लगता है, इसलिए गोला-बारूद और ईंधन जर्मन मोर्चे तक देर से पहुँचे।
पक्षपातियों ने लाल सेना को जर्मन टुकड़ियों की ख़बर भी दी, 1943 और 1944 में सोवियत सेना के बढ़ने पर मदद की और नागरिकों की उम्मीद ज़िंदा रखी। क़ब्ज़ाधारियों ने कठोर सज़ाओं से जवाब दिया।
करके देखो
चरण 5 में स्लाइडर पहले 0 पर, फिर 4 पर, फिर 8 पर रखो। हर बार गाड़ी के रुकने की जगह और देरी लिखो। किसका असर बड़ा है: पहली टुकड़ी का या आख़िरी का? गाड़ी पहली कटी पटरी पर ही क्यों रुकती है?
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- 1941 से 1944: पश्चिमी सोवियत संघ पर जर्मन क़ब्ज़ा
- लगभग 30 लाख ओस्टआर्बाइटर जर्मनी ले जाए गए
- 3 जुलाई 1941: स्तालिन की पक्षपाती युद्ध की पुकार
- 30 मई 1942: पक्षपाती आंदोलन का केंद्रीय मुख्यालय
- अगस्त-सितंबर 1943: रेल युद्ध, दो लाख से ज़्यादा पटरियाँ
- कुल सोवियत मृतक: लगभग 2.7 करोड़ (करीब आधे नागरिक)
- पक्षपाती = दुश्मन के पीछे लड़ाके; भूमिगत = शहरों में छिपे समूह
हल किए गए उदाहरण
1. युद्ध में लगभग 2.7 करोड़ सोवियत लोग मरे और करीब आधे नागरिक थे। नागरिक लगभग कितने हुए?
2.7 करोड़ ÷ 2 = 1.35 करोड़ नागरिक।
2. समझाओ कि एक टूटी पटरी पूरी सेना को कैसे धीमा करती है।
सेना को आपूर्ति गाड़ियों से गोला-बारूद, ईंधन और भोजन चाहिए। टूटी पटरी से गाड़ी मरम्मत और पहरे तक रुकी रहती है, इसलिए सामान देर से पहुँचता है और मोर्चा कमज़ोर पड़ता है।
3. पक्षपाती आंदोलन बेलारूस में सबसे मज़बूत क्यों था?
बेलारूस में बड़े जंगल और दलदल हैं जहाँ छोटे समूह छिप सकते हैं और टैंक आसानी से नहीं जा सकते। वह जर्मन मोर्चे की रेल लाइनों पर भी था, और क़ब्ज़ा कठोर था, इसलिए कई ग्रामीण जुड़े।
आम गलतियाँ
- यह मानना कि सब क़ब्ज़े वाले लोगों ने एक जैसा विरोध किया। कुछ ने विरोध किया, कुछ ने सहयोग, और ज़्यादातर ने बचने की कोशिश की।
- पक्षपातियों (जंगल के लड़ाकों) और भूमिगत (शहर के छिपे समूहों) को उलझाना।
- कहना कि रेल युद्ध ने अकेले क़ब्ज़ा ख़त्म कर दिया। इसने आपूर्ति धीमी की और लाल सेना की मदद की, जिसने ज़मीन आज़ाद कराई।
- यह भूल जाना कि 2.7 करोड़ मृतकों में करीब आधे नागरिक थे।