ऑपरेशन बारबारोसा: 22 जून 1941 का हमला
जर्मनी ने 1939 का समझौता तोड़कर 22 जून 1941 को बिना चेतावनी हमला किया। उसने लगभग तीस लाख सैनिक, हज़ारों टैंक और विमान तीन समूहों में लगाए: उत्तर (लेनिनग्राद की ओर), बीच (मास्को की ओर) और दक्षिण (यूक्रेन के अनाज और कोयले की ओर)। जर्मनी ने कुछ महीनों में जीत की योजना बनाई थी (ब्लिट्ज़क्रीग)।
- कई सोवियत विमान ज़मीन पर ही नष्ट हो गए, और पहले महीनों में सेना ने लाखों सैनिक खोए।
- ब्रेस्ट क़िले और स्मोलेंस्क जैसे बहादुरी भरे प्रतिरोध ने हमले को धीमा किया।
- 3 जुलाई 1941 को स्तालिन ने जनता को "देशभक्ति युद्ध" की पुकार दी, और राज्य रक्षा समिति सब चलाने लगी।
- सितंबर 1941 में जर्मन सेनाओं ने कीव को घेर लिया और बहुत बड़ी सोवियत टुकड़ी खो गई।
कारख़ाने पूरब ले जाना और पिछला मोर्चा
हथियार बनाते रहने के लिए राज्य ने 1941-42 में 1,500 से ज़्यादा कारख़ानों और लाखों मज़दूरों को रेल से पश्चिम से हटाकर वोल्गा, उराल और साइबेरिया पहुँचाया। मशीनें खुले मैदानों में लगीं; कुछ हफ़्तों-महीनों में उत्पादन फिर शुरू हुआ। 1942 तक सोवियत कारख़ाने जर्मनी से ज़्यादा टैंक, तोपें और विमान बनाने लगे।
खेतों और शहरों में मोर्चे पर गए पुरुषों की जगह महिलाओं, बुज़ुर्गों और किशोरों ने काम सँभाला। राशन बहुत कम था।
लेनिनग्राद की घेराबंदी
जर्मन और सहयोगी सेनाओं ने 8 सितंबर 1941 को लेनिनग्राद के चारों ओर घेरा बंद किया। घेरा 872 दिन चला, 27 जनवरी 1944 तक।
- भोजन बहुत कम राशन में बदल गया, और 1941-42 की सर्दी बहुत कड़ी थी, इसलिए भूख और ठंड से कई लाख नागरिक मरे।
- जीवन मार्ग: जमी हुई लादोगा झील पर ट्रक भोजन लाते और बच्चों-कमज़ोरों को बाहर ले जाते थे।
- शहर ने कारख़ाने, स्कूल और रेडियो चालू रखे। जनवरी 1943 में ज़मीनी तंग गलियारा खुला, और जनवरी 1944 में घेरा पूरा उठा।
मास्को की लड़ाई
अक्टूबर 1941 में जर्मनी ने मास्को लेने के लिए ऑपरेशन टाइफ़ून शुरू किया। दिसंबर की शुरुआत तक उसके टैंक कुछ जगह शहर के किनारे से लगभग 30 किमी पर थे।
- नागरिकों ने खाइयाँ खोदीं, और मास्को में घेराबंदी की स्थिति लागू हुई। 7 नवंबर को सामान्य परेड हुई, और सैनिक सीधे मोर्चे पर गए।
- साइबेरिया और सुदूर पूर्व से आए ताज़ा सोवियत रिज़र्व, कीचड़ और जल्दी आई कड़ी सर्दी ने जर्मनों को थका दिया।
- 5-6 दिसंबर 1941: सोवियत जवाबी हमले ने जनवरी 1942 तक जर्मन मोर्चे को 100 से 250 किमी पीछे धकेल दिया।
- महत्व: तेज़ जर्मन जीत का भ्रम टूटा। युद्ध में ज़मीन पर जर्मनी की यह पहली बड़ी हार थी।
1942 की गर्मी और स्तालिनग्राद की राह
1942 की गर्मियों में जर्मनी ने दक्षिण में ताक़त जुटाई, लक्ष्य वोल्गा और काकेशस का तेल। सोवियत सेना को फिर पीछे हटना पड़ा। 28 जुलाई 1942 को आदेश संख्या 227 ने सैनिकों से कहा: "एक क़दम पीछे नहीं"। साथ ही सहयोगियों से लेंड-लीज़ (ट्रक, भोजन, एल्युमिनियम) के ज़रिए मदद भी बढ़ी। अगस्त में स्तालिनग्राद की लड़ाई शुरू हुई, और 19 नवंबर 1942 को सोवियत जवाबी वार शुरू हुआ। इतिहासकार इस तारीख़ को "पहले दौर" का अंत और बड़े मोड़ की शुरुआत मानते हैं।
करके देखो
चरण 5 का तारीख़ स्लाइडर चलाओ। छह तारीख़ें काग़ज़ पर लिखो। हर एक के लिए तय करो: मोर्चा आगे बढ़ रहा है, रुक रहा है या पीछे जा रहा है? फिर नोट्स ढककर कड़ी बोलो: धावा, खिसकना, घेरा, रोक, वोल्गा।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- 22 जून 1941: ऑपरेशन बारबारोसा शुरू
- 8 सितंबर 1941 से 27 जनवरी 1944: लेनिनग्राद की घेराबंदी = 872 दिन
- 5-6 दिसंबर 1941: मास्को में सोवियत जवाबी हमला
- 28 जुलाई 1942: आदेश 227 "एक क़दम पीछे नहीं"
- 19 नवंबर 1942: स्तालिनग्राद में सोवियत जवाबी वार (पहले दौर का अंत)
- 1941-42 में लगभग 1,500 कारख़ाने पूरब ले जाए गए
- तीन जर्मन सेनाएँ: उत्तर, बीच, दक्षिण
हल किए गए उदाहरण
1. लेनिनग्राद की घेराबंदी 8 सितंबर 1941 से 27 जनवरी 1944 तक चली। यह लगभग कितने साल हुए?
872 दिन ÷ 365 ≈ 2.4 साल, यानी लगभग दो साल पाँच महीने।
2. कारख़ानों को पूरब ले जाना युद्ध के लिए क्यों ज़रूरी था?
पश्चिम के कारख़ाने जर्मन सेना के रास्ते में थे। उन्हें पूरब, पहुँच से बाहर ले जाने से सोवियत संघ टैंक, तोपें और विमान बनाता रहा, जिसने बाद में उसे जर्मनी के बराबर आने और हराने में मदद की।
3. मास्को की लड़ाई को पूर्वी मोर्चे का पहला मोड़ क्यों कहते हैं?
जर्मनी जल्दी जीत चाहता था पर मास्को से लगभग 30 किमी पर रुक गया और फिर 100 से 250 किमी पीछे धकेला गया। इससे दिखा कि सोवियत सेना टिककर पलटवार कर सकती है और जर्मनी के सामने लंबा, कठिन युद्ध है।
आम गलतियाँ
- यह सोचना कि जर्मनों ने मास्को ले लिया। वे उसके बाहर रोके गए और दिसंबर 1941 में पीछे धकेले गए।
- लेनिनग्राद की घेराबंदी (8 सितंबर 1941 से 27 जनवरी 1944) को स्तालिनग्राद (1942 से 1943 की शुरुआत) से उलझाना।
- कहना कि सोवियत संघ तैयार था। वह चौंक गया था और शुरू के महीनों में उसे भारी नुक़सान हुआ।
- यह भूल जाना कि कारख़ाने पूरब गए और इससे बाद की जीतों में मदद मिली।