मोड़ से पहले: बढ़त और रुकना
22 जून 1941 को जर्मनी ने सोवियत संघ पर हमला किया और देश के भीतर बहुत आगे बढ़ा। दिसंबर 1941 में मास्को के पास हमला रोक दिया गया। 1942 की गर्मियों में दुश्मन ने दक्षिण में फिर कोशिश की, लक्ष्य था बड़ी नदी वोल्गा और काकेशस का तेल। सेना वोल्गा पर स्टालिनग्राद शहर तक पहुँची।
स्टालिनग्राद: घेरा बंद होता है
कई महीने शहर की गलियों में कठिन लड़ाई चली। फिर 19 नवंबर 1942 को सोवियत सेनाओं ने शहर के उत्तर और दक्षिण में दुश्मन की कमज़ोर बाज़ुओं पर हमला किया और उसके पीछे मिल गईं। इसे घेराबंदी कहते हैं: ऐसा घेरा जो फँसी सेना को खाने, ईंधन और गोलों से काट देता है।
फँसी सेना घेरा तोड़ न सकी। उसने 31 जनवरी से 2 फ़रवरी 1943 के बीच आत्मसमर्पण किया। पहले कभी दुश्मन की इतनी बड़ी सेना एक जगह नहीं खोई थी। स्टालिनग्राद को निर्णायक मोड़ कहते हैं क्योंकि यहाँ से हमलावर जीत नहीं, हार रहा था।
कुर्स्क: टैंकों की सबसे बड़ी लड़ाई
1943 की गर्मियों में दुश्मन ने एक और बड़ा हमला किया, कुर्स्क शहर के पास मोर्चे के उभार पर। इस बार सोवियत पक्ष को ख़बर थी, उसने गहरी रक्षा-पंक्तियाँ खोदी थीं और मज़बूत रिज़र्व रखे थे। लड़ाई 5 जुलाई 1943 को शुरू हुई। 12 जुलाई को प्रोखोरोव्का के आसपास युद्ध की सबसे बड़ी टैंक-भिड़ंतों में से एक हुई।
हमला विफल हुआ और अगस्त में सोवियत सेनाओं ने अपना आक्रमण शुरू किया। कुर्स्क के बाद पूर्व में दुश्मन के पास फिर कभी बड़े हमले की ताक़त नहीं रही। पहल हमेशा के लिए सोवियत पक्ष के हाथ में चली गई।
यूरोप की मुक्ति, 1944-45
जनवरी 1944 में लेनिनग्राद की लंबी घेराबंदी टूटी। जून 1944 में एक विशाल सोवियत आक्रमण ने बेलारूस को आज़ाद कराया। उसी महीने 6 जून को पश्चिमी मित्र देश नॉर्मंडी में उतरे और पश्चिम में दूसरा मोर्चा खुला। फिर सोवियत सेनाएँ मध्य और दक्षिण-पूर्व यूरोप के इलाक़ों में क़दम-क़दम बढ़ीं और अप्रैल-मई 1945 में बर्लिन की लड़ाई लड़ी। इन इलाक़ों के बहुत से लोग क़ब्ज़े से आज़ाद हुए।
सोवियत संघ अकेला नहीं था: मित्र देशों ने ट्रक, खाना और धातुएँ भेजीं, दुश्मन के उद्योग पर बमबारी की और दूसरे मोर्चों पर लड़े। पर युद्ध के ज़्यादातर समय दुश्मन की सेना का सबसे बड़ा हिस्सा पूर्व में लड़ रहा था।
विजय, हानि और स्मृति
जर्मनी ने 8 मई 1945 की देर रात आत्मसमर्पण पर हस्ताक्षर किए। मास्को में तब तक 9 मई हो चुकी थी, इसलिए रूस और कुछ और देशों में विजय दिवस 9 मई को है, और पश्चिमी यूरोप के बड़े हिस्से में 8 मई को। 2 सितंबर 1945 को जापान ने आत्मसमर्पण किया, जिससे पूरा विश्व युद्ध ख़त्म हुआ।
क़ीमत बहुत बड़ी थी। इतिहासकार बताते हैं कि लगभग 2.7 करोड़ सोवियत लोग, सैनिक और नागरिक, मारे गए। बहुत से शहर और गाँव नष्ट हुए। लोग उन्हें स्मारकों, अमर ज्योति, मौन के पलों और दादा-दादी की पारिवारिक कहानियों से याद करते हैं। याद रखना केवल विजय का गर्व नहीं, शांति बनाए रखने का वादा भी है।
करके देखिए: अपनी समयरेखा बनाइए
काग़ज़ की एक लंबी पट्टी लीजिए। पाँच बिंदु लगाइए: नवंबर 1942, फ़रवरी 1943, जुलाई 1943, जून 1944, मई 1945। हर बिंदु के नीचे एक घटना लिखिए। फिर हर घटना से अगली तक तीर खींचिए और तीर पर एक शब्द लिखिए: "इसलिए", "फिर", "बाद में"। अपनी कड़ी की जाँच 3D के स्लाइडर से कीजिए।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- स्टालिनग्राद: 19 नवंबर 1942 जवाबी हमला; आत्मसमर्पण 31 जनवरी - 2 फ़रवरी 1943।
- कुर्स्क: 5 जुलाई 1943 शुरू; प्रोखोरोव्का में टैंक-भिड़ंत 12 जुलाई 1943।
- नॉर्मंडी उतरना (दूसरा मोर्चा): 6 जून 1944। बर्लिन: अप्रैल-मई 1945।
- आत्मसमर्पण 8 मई 1945 देर रात (मास्को में 9 मई)। जापान: 2 सितंबर 1945।
- सोवियत मौतें: लगभग 2.7 करोड़ (सैनिक और नागरिक)।
- घेराबंदी: ऐसा घेरा जो सेना को खाने, ईंधन और गोला-बारूद से काट देता है।
हल किए गए उदाहरण
1. पूर्वी मोर्चे के युद्ध में स्टालिनग्राद को निर्णायक मोड़ क्यों कहते हैं?
इससे पहले हमलावर जीतता और पूर्व बढ़ता रहा। स्टालिनग्राद में दुश्मन की पूरी सेना घिरकर हार गई। इसके बाद सोवियत पक्ष मोर्चे को पश्चिम धकेलता रहा।
2. कुर्स्क की लड़ाई के बाद क्या बदला?
दुश्मन पूर्व में अपना आख़िरी बड़ा हमला हार गया। अगस्त 1943 से सोवियत सेनाओं ने आक्रमण किया और युद्ध के अंत तक आगे रहीं।
3. विजय दिवस मास्को में 9 मई को है पर पश्चिमी यूरोप के बड़े हिस्से में 8 मई को क्यों है?
आत्मसमर्पण मध्य यूरोपीय समय से 8 मई की देर रात हुआ। समय में आगे मास्को में तब तक तारीख़ 9 मई हो चुकी थी।
4. सोवियत जवाबी हमला 19 नवंबर 1942 को शुरू हुआ और फँसी सेना ने 2 फ़रवरी 1943 को आत्मसमर्पण किया। कितने दिन हुए?
19 से 30 नवंबर = 11 दिन, दिसंबर = 31, जनवरी = 31, और फ़रवरी के 2 दिन। कुल 11 + 31 + 31 + 2 = 75 दिन।
आम गलतियाँ
- दो लड़ाइयाँ मिला देना: स्टालिनग्राद (1942-43) घेराबंदी थी; कुर्स्क (1943) गहरी रक्षा से विफल हुआ हमला था।
- यह कहना कि एक लड़ाई ने युद्ध जीता दिया। स्टालिनग्राद निर्णायक मोड़ था, पर युद्ध 1945 तक चला।
- मित्र देशों को भूल जाना। पश्चिमी मित्र देश, लेंड-लीज़ की आपूर्ति और डी-डे भी महत्त्वपूर्ण थे।
- विजय दिवस की केवल एक तारीख़ लिखना। पश्चिमी यूरोप के बड़े हिस्से में 8 मई और रूस व कुछ और देशों में 9 मई है।