असंतोष और क्रांति, 1917
1917 से पहले: रूस पर निरंकुश ज़ार निकोलस II का राज था। ज़्यादातर लोग ग़रीब किसान थे; शहरों के मज़दूर बुरी हालत में रहते थे। पहले विश्व युद्ध में भारी नुक़सान, खाने की कमी और महँगाई आई। 1915 में ज़ार ने ख़ुद सेना की कमान ली, इसलिए हार का दोष उन पर आया।
फ़रवरी क्रांति: पेत्रोग्राद में हड़तालें और रोटी के दंगे; सैनिक भी भीड़ में मिल गए। ज़ार ने गद्दी छोड़ी। सत्ता अस्थायी सरकार और पेत्रोग्राद सोवियत (मज़दूरों-सैनिकों की परिषद) में बँटी: 'दोहरी सत्ता'।
दोनों क्रांतियों के बीच: अस्थायी सरकार युद्ध लड़ती रही और भूमि सुधार टालती रही। लेनिन लौटे और अप्रैल थीसिस दी ('शांति, ज़मीन, रोटी', 'सारी सत्ता सोवियतों को')। अगस्त के विफल कोर्निलोव मामले के बाद बोल्शेविकों का समर्थन बढ़ा।
अक्टूबर क्रांति: लेनिन के नेतृत्व और त्रॉत्स्की की योजना से बोल्शेविकों ने पेत्रोग्राद की मुख्य इमारतें लीं और सरकार को गिरफ़्तार किया; लड़ाई बहुत कम हुई।
बोल्शेविक सत्ता की मज़बूती, 1918–1924
- तानाशाही: जनवरी 1918 में चुनी हुई संविधान सभा एक दिन बाद बंद कर दी गई। दूसरे दलों पर रोक लगी; गुप्त पुलिस (चेका) ने 'लाल आतंक' चलाया। 1921 में 'गुटों पर रोक' से पार्टी के अंदर विरोधी समूह ख़त्म हुए।
- शांति: ब्रेस्त-लितोव्स्क संधि (1918) में जर्मनी को बहुत ज़मीन दी, पर युद्ध ख़त्म हुआ।
- गृहयुद्ध (1918–21): लाल सेना ने सफ़ेदों (ज़ार के अफ़सर, उदारवादी और दूसरे) को हराया; सफ़ेदों की ओर विदेशी सैनिक भी थे। लाल जीते क्योंकि बीच के शहर और रेलवे उनके पास थे, एक कमान थी और त्रॉत्स्की की मज़बूत लाल सेना थी, जबकि सफ़ेद बँटे हुए थे।
- अर्थव्यवस्था: युद्ध साम्यवाद (अनाज ज़ब्ती, उद्योग पर सरकारी कब्ज़ा) से सेना को खाना मिला, पर अकाल और विद्रोह हुए, जैसे क्रोनश्टाट के नाविकों का (1921)। नई आर्थिक नीति (NEP) में किसान बचा अनाज बेच सकते थे और छोटे व्यापारी काम कर सकते थे; उत्पादन सँभला।
- विदेश संबंध: दूसरे देश कम्युनिस्टों पर भरोसा नहीं करते थे; कॉमिन्टर्न (1919) विदेश में क्रांति फैलाना चाहता था; जर्मनी से रापालो संधि (1922) ने अकेलापन तोड़ा। 1922 में सोवियत संघ बना।
स्तालिन का सत्ता तक पहुँचना, 1924–1929
लेनिन ने कोई साफ़ उत्तराधिकारी नहीं छोड़ा; उनके 'वसीयतनामे' में स्तालिन के ख़िलाफ़ चेतावनी भी थी। दावेदार:
- त्रॉत्स्की: लाल सेना के प्रतिभाशाली नेता; 'स्थायी क्रांति' (विदेश में क्रांति फैलाना) और तेज़ उद्योग चाहते थे; बहुत से लोग उन्हें घमंडी मानते थे।
- ज़िनोव्येव और कामेनेव: वामपंथी नेता; पहले त्रॉत्स्की के ख़िलाफ़ स्तालिन के साथ।
- बुख़ारिन: दक्षिणपंथी; NEP रखना और धीरे बढ़ना चाहते थे।
- स्तालिन: 1922 से महासचिव; पार्टी में नियुक्तियाँ उनके हाथ में थीं, तो वफ़ादार समर्थक बने। उन्होंने 'एक देश में समाजवाद' का विचार दिया।
उन्होंने वामपंथियों के साथ मिलकर त्रॉत्स्की को हराया (1927 में निष्कासित, 1929 में देश निकाला), फिर दक्षिणपंथियों के साथ मिलकर वामपंथियों को, और 1928–29 में अनाज संकट और NEP के सवाल पर बुख़ारिन को भी हटा दिया। अब पार्टी सरकार उनके हुक्म पर चलती थी।
अर्थव्यवस्था और समाज, 1929–1941
- सामूहिकीकरण: 1929 से किसानों को ज़बरदस्ती सामूहिक खेतों (कोलख़ोज़) में शामिल किया गया। अमीर किसानों (कुलक) को निर्वासित किया गया या मार दिया गया। विरोध में किसानों ने पशु काट डाले; अनाज घटा, फिर भी राज्य अनाज ले गया। 1932–33 के अकाल में लाखों लोग मरे, ख़ासकर यूक्रेन और कज़ाख़स्तान में।
- पंचवर्षीय योजनाएँ (1928 से): कोयला, इस्पात, तेल और बिजली के बड़े लक्ष्य। मैग्नितोगोर्स्क जैसे नए औद्योगिक शहर बने। भारी उद्योग बहुत तेज़ी से बढ़ा, पर रोज़ की चीज़ें, घर और गुणवत्ता पीछे रह गईं। स्ताख़ानोव आंदोलन और सख़्त श्रम क़ानूनों से मज़दूरों पर दबाव डाला गया; गुलाग के क़ैदियों से भी काम कराया गया।
- स्तालिन पूजा: तस्वीरें, मूर्तियाँ, गीत और बदला हुआ इतिहास स्तालिन को 'जनता का पिता' दिखाते थे।
- 1941 तक समाज: साक्षरता बढ़ी, ज़्यादा लोग शहरों में रहने लगे और ज़्यादा महिलाएँ काम करने लगीं, पर जीवन-स्तर नीचा था और हर तरफ़ डर था।
स्तालिनवाद, राजनीति और नियंत्रण, 1929–1941
- तानाशाही: किरोव की हत्या (1934) के बाद सफ़ाए बढ़े। दिखावटी मुक़दमों (1936–38) में ज़िनोव्येव, कामेनेव और बुख़ारिन जैसे पुराने बोल्शेविकों ने गढ़े हुए अपराध 'क़बूल' किए और उन्हें गोली मार दी गई।
- येज़ोवश्चिना (1936–38, NKVD प्रमुख येज़ोव के नाम पर): महा आतंक। दो साल में लगभग 15 लाख लोग गिरफ़्तार हुए और लगभग 6.8 लाख को गोली मारी गई; सेना के अफ़सरों का भी सफ़ाया हुआ। लाखों गुलाग में थे।
- संस्कृति: समाजवादी यथार्थवाद में कला को व्यवस्था की तारीफ़ करनी थी; धर्म पर हमला हुआ; 1936 के संविधान में लिखे अधिकार असली नहीं थे।
- अंतरराष्ट्रीय संबंध: सोवियत संघ राष्ट्र संघ में शामिल हुआ (1934) और हिटलर के ख़िलाफ़ साथी खोजे, पर म्यूनिख के बाद नाज़ी–सोवियत समझौता (1939) किया, जिससे समय और ज़मीन मिली।
महान देशभक्ति युद्ध और स्तालिन की तानाशाही, 1941–1953
जून 1941 में जर्मनी ने हमला किया और मॉस्को के पास तक पहुँच गया। कारख़ाने पूर्व की ओर ले जाए गए; पूरी अर्थव्यवस्था युद्ध के लिए लगी। सोवियत संघ ने मॉस्को (1941), स्तालिनग्राद (1942–43) और कुर्स्क (1943) की अहम लड़ाइयाँ जीतीं, मित्र देशों की सप्लाई से मदद मिली, और 1945 में बर्लिन पहुँचा। लगभग 2.7 करोड़ सोवियत लोग मारे गए।
चरम स्तालिनवाद (1945–53): चौथी पंचवर्षीय योजना से पुनर्निर्माण; लौटे युद्धबंदियों पर शक; नए सफ़ाए (जैसे लेनिनग्राद मामला) और ज़्यादातर यहूदी डॉक्टरों के ख़िलाफ़ 'डॉक्टरों की साज़िश'। व्यक्ति-पूजा चरम पर पहुँची।
दुनिया में स्थान: सोवियत संघ महाशक्ति बना, पूर्वी यूरोप पर नियंत्रण किया, परमाणु बम का परीक्षण किया (1949) और शीत युद्ध में पश्चिम के सामने खड़ा हुआ। मार्च 1953 में स्तालिन की मृत्यु हुई।
करके देखो: योजनाओं से किसे फ़ायदा, किसे नुक़सान
दो सूचियाँ बनाओ: स्तालिन के बदलावों से किसे फ़ायदा हुआ (जैसे नए कारख़ाना मैनेजर, पार्टी में ऊपर उठे कुछ मज़दूर) और किसे नुक़सान (किसान, कुलक, गुलाग के लोग)। फिर 3D स्लाइडर से 1928, 1932 और 1940 की तुलना करो। कौन-से खंभे बढ़े और कौन-से नहीं?
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- बोल्शेविक = लेनिन का दल, बाद में कम्युनिस्ट पार्टी
- दोहरी सत्ता = अस्थायी सरकार + पेत्रोग्राद सोवियत (1917)
- युद्ध साम्यवाद = अनाज ज़ब्ती और सरकारी नियंत्रण (1918–21)
- NEP = नई आर्थिक नीति, छोटे निजी व्यापार की छूट (1921–28)
- एक देश में समाजवाद = पहले सोवियत संघ में समाजवाद बनाना (स्तालिन)
- सामूहिकीकरण = किसानों को ज़बरन सामूहिक खेतों में डालना
- पंचवर्षीय योजना = उद्योग के लिए सरकारी लक्ष्य
- कुलक = अपेक्षाकृत अमीर किसान, 'वर्ग शत्रु' माना गया
- गुलाग = श्रम शिविरों की व्यवस्था
- महा आतंक / येज़ोवश्चिना = 1936–38 की बड़े पैमाने पर गिरफ़्तारियाँ और हत्याएँ
हल किए गए उदाहरण
1. समझाओ कि अक्टूबर 1917 में बोल्शेविक सत्ता क्यों ले पाए।
अस्थायी सरकार कमज़ोर थी: वह युद्ध लड़ती रही और भूमि सुधार टालती रही, इसलिए समर्थन खो बैठी। कोर्निलोव मामले में बोल्शेविक क्रांति के रक्षक दिखे और उनके लाल गार्डों को हथियार मिले। लेनिन के आसान नारों और सोवियत की सैन्य समिति से त्रॉत्स्की की योजना ने उन्हें बिना ख़ास विरोध के पेत्रोग्राद दिला दिया।
2. सत्ता संघर्ष में त्रॉत्स्की नहीं, स्तालिन क्यों जीते?
महासचिव पद से स्तालिन ने वफ़ादार अफ़सर नियुक्त किए जो उनके पक्ष में वोट देते थे। उन्होंने चतुराई से गठबंधन बदले: पहले वामपंथियों के साथ त्रॉत्स्की के ख़िलाफ़, फिर दक्षिणपंथियों के साथ। 'एक देश में समाजवाद' त्रॉत्स्की की विश्व क्रांति से ज़्यादा लोकप्रिय था। त्रॉत्स्की ने ग़लतियाँ कीं: वे घमंडी लगे, लेनिन के अंतिम संस्कार में नहीं पहुँचे और पार्टी में आधार नहीं बनाया।
3. पहली दो पंचवर्षीय योजनाओं की सफलता परखो।
भारी उद्योग में बड़ी सफलता: कोयला, इस्पात और बिजली कई गुना बढ़े, नए शहर और बाँध बने, जिनसे 1941 में देश बचा। पर लक्ष्यों के आँकड़े अक्सर झूठे होते थे, गुणवत्ता कमज़ोर थी, रोज़ की चीज़ें और घर पीछे रह गए, और क़ीमत भारी थी: ज़बरन श्रम, सख़्त क़ानून और सामूहिकीकरण से खोखले गाँव। संतुलित उत्तर: राज्य की ताक़त के लिए सफल, जीवन-स्तर के लिए विफल।
आम गलतियाँ
- फ़रवरी क्रांति (ज़ार गिरे) और अक्टूबर क्रांति (बोल्शेविक सत्ता में) को मिला देना।
- यह मानना कि लेनिन की मृत्यु के तुरंत बाद स्तालिन ने सत्ता ले ली। इसमें पाँच साल की राजनीतिक चालें लगीं (1924–29)।
- यह मानना कि सामूहिकीकरण से अनाज बढ़ा। शुरू में उत्पादन घटा; फिर भी राज्य अनाज ले गया और अकाल पड़ा।
- यह मानना कि महा आतंक सिर्फ़ राज्य के दुश्मनों पर था। आम मज़दूर, पार्टी सदस्य और सेना के अफ़सर सब शिकार हुए।