सर्वसत्तावाद क्या है?
सर्वसत्तावाद ऐसा शासन है जिसमें राज्य समाज पर पूरा नियंत्रण चाहता है। यह साधारण तानाशाही से आगे है: यह चाहता है कि लोग सिर्फ़ हुक्म न मानें, बल्कि उस पर विश्वास भी करें।
आम विशेषताएँ:
- सिर्फ़ एक दल; दूसरे दल और आज़ाद मज़दूर संघ प्रतिबंधित।
- नेता की पूजा (ड्यूचे, फ़्यूरर, “जनता के पिता”)।
- एक सरकारी विचारधारा जो सब कुछ समझाती है और “दुश्मन” तय करती है।
- अख़बार, रेडियो, फ़िल्म और किताबों पर प्रचार और सेंसरशिप।
- आतंक: गुप्त पुलिस, जेल-शिविर, विरोधियों पर हिंसा।
- स्कूल और युवा संगठनों से युवाओं पर नियंत्रण।
- अर्थव्यवस्था पर राज्य का नियंत्रण या निर्देशन।
इतिहासकार आज भी बहस करते हैं कि हर शासन कितना “पूरा” नियंत्रण पा सका, पर यह शब्द उनकी तुलना में मदद करता है।
1918 के बाद लोकतंत्र क्यों कमज़ोर हुए
युद्ध का नुकसान: पहले विश्व युद्ध में लगभग 1 करोड़ सैनिक मारे गए। लौटे बहुत से सैनिक हिंसा के आदी थे और ठगा महसूस करते थे।
शांति संधि पर ग़ुस्सा: जर्मनी को दोष, ज़मीन का नुकसान और हर्जाना (reparations) स्वीकार करना पड़ा। इटली जीतने वालों में था पर उसे लगा कि बहुत कम मिला (“अधूरी जीत”)।
आर्थिक संकट: 1923 में जर्मनी की मुद्रा की क़ीमत लगभग ख़त्म हो गई (अति-मुद्रास्फीति)। फिर 1929 के वॉल स्ट्रीट संकट से महामंदी शुरू हुई। 1932 तक जर्मनी में लगभग हर तीन में से एक मज़दूर बेरोज़गार था।
क्रांति का डर: 1917 की रूसी क्रांति से मालिक और मध्यम वर्ग डरे, और कभी-कभी साम्यवाद-विरोधी कड़े नेताओं का साथ देने लगे।
कमज़ोर नए लोकतंत्र: कई सरकारें नई और बँटी हुई गठबंधन सरकारें थीं जो जल्दी गिरती थीं, इसलिए लोग “मज़बूत आदमी” ढूँढने लगे।
फ़ासीवादी इटली
बेनिटो मुसोलिनी ने 1919 में फ़ासीवादी आंदोलन शुरू किया। उसके हथियारबंद दस्ते (ब्लैकशर्ट्स) समाजवादियों और मज़दूर संघों पर हमला करते थे। रोम पर कूच (1922) के बाद राजा ने मुसोलिनी को प्रधानमंत्री बनाया। 1925–26 से दूसरे दल बंद हुए और प्रेस पर क़ब्ज़ा हुआ।
फ़ासीवाद राष्ट्र और राज्य को व्यक्ति से ऊपर रखता था: “सब कुछ राज्य के भीतर, राज्य के बाहर कुछ नहीं”। यह युद्ध, अनुशासन और रोम जैसी महानता लौटाने की बात करता था। बच्चे युवा संगठनों में भर्ती होते थे। 1935 में इटली ने इथियोपिया पर हमला किया और 1938 में यहूदियों के ख़िलाफ़ क़ानून बनाए।
स्तालिन का सोवियत संघ
लेनिन की मृत्यु (1924) के बाद 1920 के दशक के अंत तक जोसेफ़ स्तालिन सत्ता की लड़ाई जीत गया। कम्युनिस्ट पार्टी अकेला दल था।
- पंचवर्षीय योजनाएँ (1928 से) ने भारी उद्योग बहुत तेज़ी से खड़े किए।
- सामूहिकीकरण ने किसानों को ज़बरदस्ती सरकारी सामूहिक खेतों में डाला। विरोध कुचला गया, और 1932–33 के अकाल में लाखों लोग मरे, ख़ासकर यूक्रेन और कज़ाख़स्तान में।
- महा आतंक (1936–38): दिखावटी मुक़दमे और बड़े पैमाने पर गिरफ़्तारियाँ; लगभग 7 लाख लोगों को मृत्युदंड और लाखों को श्रम शिविरों (गुलाग) में भेजा गया।
- स्तालिन को बुद्धिमान पिता के रूप में पूजा गया; इतिहास और तस्वीरें बदली गईं।
घोषित लक्ष्य वर्गहीन साम्यवादी समाज था, जो फ़ासीवाद के राष्ट्रवाद से अलग है।
नाज़ी जर्मनी
एडॉल्फ़ हिटलर नेशनल सोशलिस्ट (नाज़ी) पार्टी का नेता था। मंदी के दौरान इसके वोट बढ़े, और जनवरी 1933 में उसे चांसलर बनाया गया। कुछ ही महीनों में “सक्षमकारी अधिनियम” (Enabling Act) से वह अकेले क़ानून बनाने लगा; दूसरे दल और संघ बंद हुए। 1934 में वह फ़्यूरर बना।
नाज़ीवाद ने उग्र राष्ट्रवाद को नस्लवाद से जोड़ा: “श्रेष्ठ नस्ल” का दावा किया और यहूदियों, रोमा, विकलांगों और दूसरों को दुश्मन माना। न्यूरेम्बर्ग क़ानूनों (1935) ने यहूदियों की नागरिकता छीन ली। गेस्टापो (गुप्त पुलिस) और SS विरोधियों के ख़िलाफ़ शिविरों का इस्तेमाल करते थे। जोसेफ़ गोएबल्स प्रचार चलाता था; हिटलर यूथ बच्चों को तैयार करता था।
नाज़ी जर्मनी पूर्व में “रहने की जगह” चाहता था। इससे दूसरा विश्व युद्ध (1939) हुआ और होलोकॉस्ट — लगभग 60 लाख यहूदियों और बहुत से दूसरों की योजनाबद्ध हत्या।
तीनों शासनों की तुलना
| फ़ासीवादी इटली | स्तालिन का सोवियत संघ | नाज़ी जर्मनी | |
|---|---|---|---|
| सत्ता में आए | 1922 | 1920 के दशक का अंत | 1933 |
| मुख्य विचार | राष्ट्र और राज्य पहले | साम्यवाद, वर्गों का अंत | राष्ट्र + नस्ल |
| अर्थव्यवस्था | निजी कंपनियाँ, राज्य के निर्देश में | पूरी तरह सरकारी, योजनाबद्ध | निजी कंपनियाँ, हथियार बनाने में लगीं |
| मुख्य “दुश्मन” | समाजवादी, उदारवादी | “वर्ग शत्रु”, संदिग्ध विरोधी | यहूदी, कम्युनिस्ट, दूसरे समूह |
समान: एक दल, नेता की पूजा, प्रचार, गुप्त पुलिस, युवा संगठन, कोई स्वतंत्र चुनाव नहीं। अलग: विचार, निजी संपत्ति के बारे में सोच, और नियंत्रण कितना गहरा था।
उनके आक्रामक लक्ष्य और लोकतंत्रों की ढीली प्रतिक्रिया दूसरे विश्व युद्ध तक ले गई। फ़ासीवाद और नाज़ीवाद 1945 में गिरे; सोवियत व्यवस्था 1991 तक चली।
करके देखो: संकेत पहचानो
दो खाने बनाओ: “लोकतंत्र” और “सर्वसत्तावादी राज्य”। ये कार्ड छाँटो: कई दल, गुप्त पुलिस, आज़ाद प्रेस, एक नेता की पूजा, अदालतें सरकार पर फ़ैसला दें, सब बच्चों के लिए एक युवा संगठन, असली विकल्प वाले चुनाव, सेंसर किया रेडियो। पहले अनुमान लगाओ, फिर 3D के कदम 4 से जाँचो। फिर साल वाला स्लाइडर खिसकाकर लिखो कि हर शासन किस साल शुरू हुआ।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- सर्वसत्तावाद = एक दल + नेता पूजा + विचारधारा + प्रचार + आतंक + युवाओं और अर्थव्यवस्था पर नियंत्रण
- कारण: युद्ध का नुकसान + अन्यायपूर्ण संधि + आर्थिक संकट (1923, 1929) + क्रांति का डर + कमज़ोर लोकतंत्र
- इटली 1922 (मुसोलिनी) · सोवियत संघ 1920 के दशक का अंत (स्तालिन) · जर्मनी 1933 (हिटलर)
- फ़ासीवाद: राष्ट्र/राज्य सबसे ऊपर · नाज़ीवाद: राष्ट्र + नस्लवाद · स्तालिनवाद: एक-दलीय साम्यवाद
- 1939: दूसरा विश्व युद्ध शुरू · 1945: फ़ासीवादी और नाज़ी शासन का अंत
हल किए गए उदाहरण
1. 1932 तक बहुत से जर्मनों ने नाज़ियों का साथ क्यों दिया? दो कारण लिखो।
1) मंदी में लगभग एक-तिहाई मज़दूर बेरोज़गार थे, और नाज़ियों ने काम और व्यवस्था का वादा किया। 2) बहुत से लोग शांति संधि और हर्जाने से नाराज़ थे, और नाज़ियों ने जर्मनी को फिर मज़बूत बनाने का वादा किया।
2. प्रचार ने सर्वसत्तावादी शासन की मदद कैसे की?
राज्य अख़बार, रेडियो, फ़िल्म और स्कूल चलाता था। एक ही संदेश दोहराया जाता, नेता की तारीफ़ होती और “दुश्मनों” को दोष दिया जाता, जिससे लोगों को दूसरी राय सुनने को नहीं मिलती और बहुत से उस पर विश्वास करने लगे।
3. फ़ासीवादी इटली और स्तालिन के सोवियत संघ में एक समानता और एक अंतर बताओ।
समानता: दोनों में एक दल, नेता पूजा और गुप्त पुलिस थी। अंतर: इटली में निजी कारोबार बने रहे, जबकि सोवियत संघ में सारे उद्योग और खेत सरकारी हो गए।
4. नाज़ी जर्मनी को अक्सर सबसे चरम उदाहरण क्यों माना जाता है?
उसने पूरे नियंत्रण को नस्लवादी विचारधारा से जोड़ा, जिससे होलोकॉस्ट — लगभग 60 लाख यहूदियों की योजनाबद्ध हत्या — और विजय का युद्ध हुआ।
5. क्रम से लगाओ: वॉल स्ट्रीट संकट, रोम पर कूच, हिटलर चांसलर बना, दूसरा विश्व युद्ध शुरू।
रोम पर कूच (1922) → वॉल स्ट्रीट संकट (1929) → हिटलर चांसलर (1933) → युद्ध शुरू (1939)।
आम गलतियाँ
- सोचना कि हिटलर ने 1933 में बलपूर्वक सत्ता छीनी। उसे क़ानूनी तरीक़े से चांसलर बनाया गया, फिर उसने अंदर से लोकतंत्र ख़त्म किया।
- तीनों शासनों को एक जैसा मानना। तरीक़े मिलते थे, पर विचार और अर्थव्यवस्था अलग थीं।
- कहना कि सिर्फ़ 1929 के संकट से सर्वसत्तावाद आया। इटली 1922 में ही फ़ासीवादी हो गया था; कई कारण साथ काम कर रहे थे।
- भूल जाना कि आम लोग शिकार भी थे और कभी-कभी समर्थक भी। इतिहास यह भी पूछता है कि लोग साथ क्यों गए।