जबरन औद्योगीकरण
1928 में सोवियत संघ ने पहली पंचवर्षीय योजना शुरू की। लक्ष्य था भारी उद्योग (इस्पात, कोयला, मशीनें, बिजलीघर) बहुत तेज़ी से बनाना। यूक्रेन में इसका मतलब था नीपर पर बिजलीघर (नीप्रोहेस, 1932) और खार्किव तथा दोनबास में बड़े कारख़ाने।
शासन के पास पैसा कम था, इसलिए विदेशी मशीनें अनाज और कच्चा माल बेचकर खरीदी गईं। मज़दूरों पर ऊँचे लक्ष्य थोपे गए। पैसा गाँवों से आया, यानी कारख़ानों की क़ीमत किसानों ने चुकाई।
सामूहिकीकरण और विरोध
सामूहिकीकरण (1929 से) में किसानों को अपनी ज़मीन, पशु और औज़ार छोड़कर सामूहिक खेत (कोल्होज़) में शामिल होना पड़ा। इससे राज्य एक बड़ी इकाई से अनाज आसानी से ले सकता था।
अपेक्षाकृत खाते-पीते किसानों को अधिकारी कुलक कहकर "दुश्मन" बताते थे। बहुतों को निर्वासित किया गया या सब कुछ छिन गया (कुलक-उन्मूलन)।
विरोध: किसानों ने शिकायतें लिखीं, कई जगह विद्रोह किए, अनाज छिपाया और पशु सौंपने की जगह मार डाले। राज्य ने ताक़त और डर से जवाब दिया।
होलोडोमोर, 1932-33
1932 में यूक्रेन की ख़राब फ़सल के लिए कोटा बहुत ऊँचा रखा गया। जो गाँव पूरा नहीं कर पाए, उनसे अनाज और दूसरा खाना भी ले लिया गया, उन्हें "काली सूची" में डाला गया और 1933 की शुरुआत में भूखे गाँवों से बाहर जाने पर रोक लगी। बाहर की मदद ठुकराई गई और अकाल से सरकारी तौर पर इनकार किया गया।
यूक्रेन में अनुमानतः 3.5 से 5 मिलियन लोग मरे। विद्वानों के आँकड़े अलग-अलग हैं। कुबान और कज़ाख़स्तान में भी भयानक अकाल पड़े।
नरसंहार? "नरसंहार" (जेनोसाइड) शब्द रफ़ाएल लेमकिन ने गढ़ा, जिन्होंने इसे यूक्रेनी गाँवों और संस्कृति पर हमले से जोड़ा। यूक्रेन और कई अन्य देश होलोडोमोर को आधिकारिक रूप से नरसंहार कहते हैं। कुछ इतिहासकार क़ानूनी शब्द पर बहस करते हैं, पर इस पर बड़ी सहमति है कि अकाल राज्य की नीति से हुआ और जान-बूझकर लिए गए फ़ैसलों से और बिगड़ा।
आज नवंबर का चौथा शनिवार स्मृति-दिवस है।
महान आतंक और "मार दिया गया पुनर्जागरण"
1937-38 के महान आतंक में पूरे सोवियत संघ में सैकड़ों हज़ार लोग गिरफ़्तार हुए और मारे गए, अक्सर अन्यायपूर्ण मुक़दमों के बाद। यूक्रेन में कई पार्टी सदस्य, सैन्य अफ़सर और आम लोग पकड़े गए।
1920 के दशक में यूक्रेनी संस्कृति का उभार हुआ था (लेखक, चित्रकार, रंगमंच, फ़िल्में)। उस पीढ़ी के ज़्यादातर लोग 1930 के दशक में गिरफ़्तार हुए, कैंपों में भेजे गए या मार दिए गए। इसीलिए इसे "मार दिया गया पुनर्जागरण" कहते हैं। लेखक मीकोला कुलिश, वालेरियन पिद्मोहिल्नी और रंगमंच निर्देशक लेस कुर्बास इसके उदाहरण हैं।
रूसीकरण, धार्मिक दमन और रोज़मर्रा का जीवन 1921-1939
रूसीकरण का मतलब है लोगों पर रूसी भाषा और संस्कृति थोपना। 1920 के दशक में यूक्रेनीकरण की नीति से यूक्रेनी स्कूल और किताबों को बढ़ावा मिला। 1933 से इसे पलट दिया गया: यूक्रेनी वर्तनी बदली गई, किताबें हटाई गईं और रूसी को तरजीह मिली।
धार्मिक दमन: शासन ने नास्तिकता को बढ़ावा दिया। स्वतंत्र यूक्रेनी ऑर्थोडॉक्स चर्च को 1930 में भंग होना पड़ा, कई पादरी जेल गए और हज़ारों चर्च बंद हुए या गोदाम और क्लब बना दिए गए।
रोज़मर्रा का जीवन: 1920 के दशक की नई आर्थिक नीति (NEP) में छोटा निजी व्यापार चलता था। 1930 के दशक में राशन कार्ड, भीड़ भरे साझा फ़्लैट, लंबी पालियाँ, युवा संगठन, रेडियो-सिनेमा और शिकायत हो जाने का हर समय डर था। गाँव वाले कोल्होज़ में "कार्यदिवस" के हिसाब से काम करते थे और उन्हें आंतरिक पासपोर्ट नहीं मिलते थे, इसलिए शहर जाना मुश्किल था।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- औद्योगीकरण + सामूहिकीकरण + अनाज कोटा → अकाल (1932-33)
- होलोडोमोर = होलोद (भूख) + मोर (मारना / महामारी)
- याद रखने वाले वर्ष: 1928 योजना · 1929 सामूहिकीकरण · 1932-33 होलोडोमोर · 1937-38 महान आतंक
हल किए गए उदाहरण
1. एक गाँव में 12 इकाई अनाज हुआ और कोटा 60% है। कितना बचा? अगर गाँव को 8 चाहिए तो क्या काफ़ी है?
लिया गया = 12 का 60% = 7.2। बचा = 12 − 7.2 = 4.8 इकाई। 4.8 < 8, यानी काफ़ी नहीं। ऊँचे कोटे ऐसे ही भूख लाते हैं।
2. 1930 के शुरुआती सालों में राज्य ने अनाज विदेश क्यों बेचा?
पंचवर्षीय योजना के नए कारख़ानों के लिए विदेशी मशीनें खरीदने के लिए। उद्योग का पैसा गाँवों से लिया गया।
3. 1920 के दशक की लेखक-पीढ़ी को "मार दिया गया पुनर्जागरण" क्यों कहते हैं?
वह यूक्रेनी साहित्य और कला का उज्ज्वल उभार (पुनर्जागरण) था और उसके ज़्यादातर बड़े लोग 1930 के दशक में गिरफ़्तार हुए या मारे गए।
आम गलतियाँ
- अकाल को सिर्फ़ मौसम की मार कहना। फ़सल ख़राब थी, पर ऊँचे कोटे, ज़ब्ती और आवाजाही की रोक ने उसे नीतियों से बिगड़ा अकाल बना दिया।
- तारीख़ें गड़बड़ाना: होलोडोमोर 1932-33 है, महान आतंक 1937-38।
- यह सोचना कि सिर्फ़ यूक्रेन ने कष्ट झेला। कज़ाख़स्तान, कुबान और वोल्गा में भी अकाल पड़े, पर यूक्रेन में गाँवों पर सबसे भारी चोट पड़ी और संस्कृति पर हमला साथ चला।
- यह सोचना कि सामूहिकीकरण स्वेच्छा से हुआ। लोगों पर ज़ोर-ज़बरदस्ती, कर और डर से दबाव डाला गया।