मज़दूरी और काम के बारे में नए विचार क्यों आए
1800 के दशक में यूरोप में कारख़ाने और रेलें फैल गईं। बहुत से लोग खेत छोड़कर मज़दूरी (काम के बदले पैसा) करने लगे। कारख़ाने के मालिक (पूँजीपति वर्ग, यानी संपत्ति वाला वर्ग) अमीर हो गए। मज़दूर (सर्वहारा वर्ग, यानी जिनके पास बेचने को सिर्फ़ अपना श्रम है) अक्सर भीड़ भरे शहरों में लंबे घंटे और कम वेतन पर जीते थे।
विचारकों ने पूछा: क्या यह न्याय है, और क्या यह बदल सकता है? कुछ लोग छोटे सुधार चाहते थे। दूसरे, जिन्हें समाजवादी कहा गया, चाहते थे कि मुख्य कारख़ाने और ज़मीन सबके साझे हों। कार्ल मार्क्स और फ़्रेडरिक एंगेल्स ने समाजवाद को एक विस्तृत योजना और इतिहास का सिद्धांत दिया। उनके विचारों को मार्क्सवाद कहते हैं।
कम्युनिस्ट घोषणापत्र (1848)
मार्क्स (एक जर्मन विचारक जो देश से बाहर रहते थे) और एंगेल्स (एक कारख़ानेदार के बेटे जिन्होंने मैनचेस्टर में मज़दूरों का जीवन देखा) ने 1848 में एक छोटी पुस्तिका लिखी। वह एक छोटे समूह, कम्युनिस्ट लीग, के लिए थी। वह फ़रवरी 1848 में छपी, यूरोप में क्रांतियों से ठीक पहले।
- वर्ग संघर्ष: पुस्तिका कहती है कि इतिहास समूहों की लड़ाइयों की कहानी है: मालिक और ग़ुलाम, सामंत और भू-दास, और अब मालिक और मज़दूर।
- पूँजीवाद: ऐसी अर्थव्यवस्था जिसमें पैसे और कारख़ानों के मालिक मुनाफ़े के लिए माल बनाने को मज़दूर रखते हैं। लेखकों के अनुसार पूँजीवाद तेज़ी से बढ़ा, पर उसने एक बड़ा मज़दूर वर्ग भी बनाया जो एक दिन उसे चुनौती देगा।
- उत्पादन के साधन: कारख़ाने, ज़मीन और मशीनें। लेखक चाहते थे कि लंबे समय में ये साझी संपत्ति बनें।
- अंतिम पंक्ति: "सब देशों के मज़दूरो, एक हो जाओ!"
शुरू में इसे कम लोगों ने पढ़ा। मज़दूर आंदोलन बढ़ने पर यह बाद में मशहूर हुई।
प्रथम इंटरनेशनल (1864–1876)
28 सितंबर 1864 को ब्रिटेन, फ़्रांस, जर्मनी, इटली और दूसरे देशों के ट्रेड यूनियनवादी और समाजवादी लंदन में मिले। उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय मज़दूर संघ बनाया, जिसे अब प्रथम इंटरनेशनल कहते हैं। इसका संस्थापक भाषण मार्क्स ने लिखा।
- उद्देश्य: अलग-अलग देशों के मज़दूरों की एक-दूसरे की मदद, जैसे मालिकों को हड़ताल तोड़ने के लिए विदेश से मज़दूर लाने से रोकना।
- सम्मेलन: हर साल जिनेवा, लोज़ान, ब्रसेल्स और बेसल जैसे शहरों में सभाएँ।
- समस्या: सदस्यों में मतभेद थे। मार्क्स चाहते थे कि मज़दूर दल बनाएँ और राजनीतिक सत्ता जीतें। अराजकतावादी, यानी मिख़ाइल बाकुनिन के अनुयायी, राज्य को तुरंत ख़त्म करना चाहते थे।
- अंत: 1872 की हेग सभा के बाद संगठन में फूट पड़ गई। वह न्यूयॉर्क चला गया और 1876 में बंद हो गया।
संगठन के रूप में यह असफल रहा, पर इसने दिखाया कि मज़दूर सीमाओं के पार सोच सकते हैं।
पेरिस कम्यून (1871)
पृष्ठभूमि। 1870 में फ़्रांस प्रशिया से युद्ध हार गया। पेरिस घिर गया और वहाँ खाने की कमी हो गई। राष्ट्रीय सरकार वर्साय चली गई। 18 मार्च 1871 को सैनिकों ने उन तोपों को लेने की कोशिश की जिन्हें पेरिस के स्वयंसेवकों (नेशनल गार्ड) ने पैसे जोड़कर ख़रीदा था। लोगों ने मना कर दिया और शहर पर क़ब्ज़ा कर लिया।
कम्यून। पेरिसवासियों द्वारा चुनी गई एक परिषद, यानी कम्यून, ने 72 दिन शहर चलाया। उसके फ़ैसलों में थे:
- चर्च और राज्य को अलग करना और स्कूल सबके लिए खोलना;
- मालिकों के छोड़े हुए ख़ाली कारख़ाने मज़दूरों की सहकारी समितियों को देना;
- बेकरियों में रात का काम बंद करना;
- सरकार के काम का कुछ हिस्सा चुने हुए और हटाए जा सकने वाले अधिकारियों को देना। लुईस मिशेल जैसी महिलाओं की बड़ी भूमिका रही।
अंत। 21 से 28 मई, "ख़ूनी सप्ताह", में सरकारी सेना पेरिस में घुसी और कम्यून हार गया। हज़ारों लोग मारे गए या मौत की सज़ा पाए, और बहुतों को जेल या देश-निकाला मिला।
यह क्यों अहम है। मार्क्स ने इस पर फ़्रांस में गृहयुद्ध लिखा। समर्थकों ने इसे मज़दूरों की सरकार की शुरुआती कोशिश माना। आलोचकों ने इसमें अव्यवस्था और हिंसा देखी। दोनों पक्ष दशकों तक बहस करते रहे।
करके देखिए: समय-रेखा बनाइए
एक रेखा खींचिए और उस पर तीन निशान लगाइए: 1848, 1864, 1871। हर निशान के नीचे एक शब्द लिखिए: विचार, टोली, परीक्षा। फिर 3D में दिन का स्लाइडर चलाइए: कोई भी दिन चुनकर ज़ोर से बोलिए कि उस दिन कम्यून ने क्या किया। अंत में पूछिए, "कौन-सी घटना सबसे अहम थी और क्यों?" इसका कोई एक सही उत्तर नहीं है; आपको कारण देना होगा।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- पूँजीपति वर्ग (बुर्जुआ): कारख़ानों, ज़मीन और पैसे का मालिक वर्ग
- सर्वहारा वर्ग: मज़दूरी करने वाला वर्ग जिसके पास बेचने को सिर्फ़ श्रम है
- वर्ग संघर्ष: उलटे हितों वाले वर्गों की लड़ाई
- पूँजीवाद: ऐसी अर्थव्यवस्था जिसमें मालिक मुनाफ़े के लिए माल बनाने को मज़दूर रखते हैं
- समाजवाद: यह विचार कि मुख्य कारख़ाने और ज़मीन साझे हों
- कम्युनिस्ट घोषणापत्र (1848): मार्क्स और एंगेल्स की पुस्तिका, अंत में 'सब देशों के मज़दूरो, एक हो जाओ!'
- प्रथम इंटरनेशनल (1864–1876): मज़दूरों का पहला अंतर्राष्ट्रीय संगठन, लंदन में बना
- पेरिस कम्यून (18 मार्च–28 मई 1871): वह परिषद जिसने 72 दिन पेरिस चलाया
हल किए गए उदाहरण
1. कम्युनिस्ट घोषणापत्र किसने और कब लिखा?
कार्ल मार्क्स और फ़्रेडरिक एंगेल्स ने। यह फ़रवरी 1848 में छपा।
2. एक दोस्त कहता है: 'प्रथम इंटरनेशनल असफल रहा, इसलिए उसका कोई महत्व नहीं।' आप क्या जवाब देंगे?
संगठन के रूप में वह 1876 में बंद हो गया, तो असफल रहा। पर उसने पहली बार अलग-अलग देशों के मज़दूरों को साथ लाया, 8 घंटे के दिन और यूनियनों के विचार फैलाए, और बाद के संगठनों ने उसका विचार अपनाया। इसलिए वह टिका नहीं, फिर भी अहम था।
3. कम्यून 18 मार्च 1871 को शुरू हुआ और 28 मई को ख़त्म। दिखाइए कि वह 72 दिन चला।
18 मार्च से 31 मार्च तक शुरुआत के 13 दिन बाद, अप्रैल के 30 दिन, मई में 28 तारीख़ तक 28 दिन। 13 + 30 + 28 = 71 दिन शुरुआत के बाद, यानी पहले दिन को गिनकर 72 दिन।
4. तीन घटनाओं को क्रम में रखिए: पेरिस कम्यून, घोषणापत्र, प्रथम इंटरनेशनल। एक विचार बताइए जो इन्हें जोड़ता है।
घोषणापत्र (1848), प्रथम इंटरनेशनल (1864), पेरिस कम्यून (1871)। जोड़: तीनों इस विश्वास से निकले कि मज़दूरों को अपना जीवन बदलने के लिए मिलकर काम करना चाहिए, पहले विचार के रूप में, फिर संगठन के रूप में, फिर एक शहर पर शासन के रूप में।
आम गलतियाँ
- यह मान लेना कि समाजवाद मार्क्स और एंगेल्स ने गढ़ा। समाजवादी विचार उनसे पहले भी थे; उन्होंने उसे विस्तृत योजना और इतिहास का सिद्धांत दिया।
- यह लिखना कि 1848 में घोषणापत्र बहुत बिका। शुरू में उसे कम लोगों ने पढ़ा, वह बाद में मशहूर हुआ।
- तारीख़ें गड़बड़ करना: घोषणापत्र 1848, प्रथम इंटरनेशनल 1864, कम्यून 1871।
- लिखना कि कम्यून ने फ़्रांस पर राज किया। उसने सिर्फ़ पेरिस पर 72 दिन राज किया।