मानव के पूर्वज और पुरातात्त्विक युग
बहुत पहले मानव के कई पूर्वज (पुराने रिश्तेदार) थे। वे दो पैरों पर चलते थे और धीरे-धीरे औज़ार बनाना सीखे। हमारी प्रजाति का नाम होमो सेपियन्स है, यानी 'बुद्धिमान मानव'। यह लगभग 3 लाख साल पहले अफ़्रीका में आई। वहाँ से छोटे समूह एशिया, यूरोप और दूसरी जगहों पर फैले। भारत में ये हज़ारों-हज़ारों साल पहले पहुँचे।
तब लिखना नहीं था। तो हमें कैसे पता? पुरातत्त्वविद् ज़मीन खोदकर औज़ार, हड्डियाँ, बीज, बर्तन और चित्र पढ़ते हैं। वे औज़ार की मुख्य चीज़ के हिसाब से पुरातात्त्विक युग बनाते हैं:
- पाषाण युग: पत्थर के औज़ार। इसके तीन भाग: पुरापाषाण, मध्यपाषाण, नवपाषाण।
- ताम्रपाषाण युग: ताँबा और पत्थर साथ-साथ।
- कांस्य युग: कांसा = ताँबा + टिन।
- लौह युग: लोहे के औज़ार और हथियार।
ये युग हर जगह एक साथ शुरू नहीं हुए।
ई.पू. और ईसवी
ई.पू. मतलब ईसा पूर्व (BCE)। ई.पू. में बड़ी संख्या ज़्यादा पुरानी होती है: 2500 ई.पू., 1500 ई.पू. से पहले आता है।
पुरापाषाण, मध्यपाषाण और नवपाषाण
पुरापाषाण (पुराना पत्थर युग)
यह सबसे लंबा युग है, लगभग 12,000 साल पहले तक। लोग छोटे घूमते झुंडों में रहते थे। वे शिकारी-संग्राहक थे: जानवरों का शिकार करते और फल, जड़ें, मेवे, शहद इकट्ठा करते। वे बड़ी पत्थर की कुल्हाड़ियाँ बनाते थे। उन्होंने आग पर काबू पाया: गर्मी, रोशनी, सुरक्षा और खाना पकाने के लिए। भारत में सोन घाटी, चेन्नई के पास अत्तिरमपक्कम और मध्य प्रदेश के भीमबेटका शैलाश्रय ऐसी जगहें हैं। भीमबेटका में बाद में जानवरों और शिकार के चित्र बने।
मध्यपाषाण (बीच का पत्थर युग)
लगभग 12,000 साल पहले हिमयुग ख़त्म हुआ। मौसम गरम हुआ, घास के मैदान फैले, छोटे जानवर और मछलियाँ बढ़ीं। लोग माइक्रोलिथ (सूक्ष्म पाषाण, बहुत छोटे नुकीले औज़ार) बनाने लगे, जिन्हें लकड़ी या हड्डी पर लगाकर तीर और हँसिया बनते। कुत्ता पालतू बना। बागोर (राजस्थान) और आदमगढ़ (मध्य प्रदेश) इसके स्थल हैं।
नवपाषाण (नया पत्थर युग)
अब औज़ार घिसकर चिकने किए जाते थे। सबसे बड़ा बदलाव था खेती और पशुपालन। खेती से लोग एक जगह टिक गए, घर बने, बर्तन बने, अनाज जमा हुआ। स्थल: मेहरगढ़ (सिंधु के पश्चिम, बोलन क्षेत्र), कश्मीर का बुर्ज़होम (ज़मीन में गड्ढे वाले घर), बिहार का चिरांद, और दक्षिण के राख-टीले जहाँ मवेशी रखे जाते थे।
खेती की शुरुआत
खेती दुनिया में अलग-अलग जगह अलग समय पर शुरू हुई, पश्चिम एशिया में लगभग 10,000 साल पहले। उपमहाद्वीप में मेहरगढ़ में लगभग 7000 ई.पू. से खेती के सबूत हैं। लोग गेहूँ और जौ उगाते और भेड़, बकरी, गाय-बैल पालते थे। गंगा घाटी और उत्तर-पूर्व में चावल जल्दी उगाया गया।
पालतू बनाना मतलब पौधों और जानवरों को वश में करना और अच्छे बीज व शांत जानवर चुनकर आगे बढ़ाना।
खेती ने सब क्यों बदला (कारण → असर)
- खेती → कम ज़मीन में ज़्यादा भोजन → ज़्यादा लोग साथ रह सके।
- फ़सल को महीनों लगते हैं → लोग एक जगह बसे → पक्के घर और गाँव।
- बचा हुआ अनाज → रखना ज़रूरी → बर्तन, कोठियाँ, अन्नागार।
- ज़्यादा भोजन → सबको खेती नहीं करनी पड़ी → कुम्हार, बुनकर, व्यापारी, पुजारी बने।
इसे कभी-कभी 'नवपाषाण क्रांति' कहते हैं, पर यह बदलाव हज़ारों सालों में धीरे-धीरे हुआ।
हड़प्पा और उसी समय की संस्कृतियाँ
हड़प्पा सभ्यता (सिंधु या सिंधु-सरस्वती सभ्यता) उपमहाद्वीप की पहली नगरीय संस्कृति है। इसका परिपक्व (पूरा विकसित) दौर लगभग 2600–1900 ई.पू. था। नगर सिंधु और घग्गर-हकरा नदियों के पास बसे। मुख्य स्थल: हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, धौलावीरा, लोथल, कालीबंगा और राखीगढ़ी।
ख़ास बातें
- नगर योजना: गलियाँ जाल की तरह, एक-दूसरे को समकोण पर काटती हुई। पकी ईंटें एक तय अनुपात (लगभग 1:2:4) में।
- नालियाँ: गलियों के साथ ढकी नालियाँ, घरों में स्नानघर।
- मोहनजोदड़ो का विशाल स्नानागार: पानी न रिसने वाला बड़ा कुंड।
- अन्नागार और भंडार।
- पत्थर की मुहरें, जिन पर बैल जैसे जानवर और एक लिपि है जिसे आज तक पढ़ा नहीं जा सका।
- तय बाट, कार्नेलियन के मनके, ताँबे-कांसे के औज़ार, सूती कपड़ा।
- लोथल में गोदी जैसा कुंड, धौलावीरा में जलाशय।
लगभग 1900 ई.पू. के बाद नगर धीरे-धीरे कमज़ोर हुए। संभावित कारण: नदियों का रास्ता बदलना या सूखना, मौसम का सूखा होना, बाढ़, व्यापार घटना। लोग छोटे गाँवों में चले गए; संस्कृति एक दिन में ग़ायब नहीं हुई।
उसी समय की संस्कृतियाँ
सब लोग नगरों में नहीं रहते थे। साथ-साथ खेती और ताँबा इस्तेमाल करने वाली गाँव संस्कृतियाँ भी थीं: राजस्थान की आहाड़-बनास संस्कृति (ताँबे के औज़ार, काले-लाल बर्तन), गंगा-यमुना क्षेत्र की गेरुए रंग के बर्तन (OCP) वाली संस्कृति, और दक्षिण के नवपाषाण पशुपालक। बाद में दक्कन में इनामगाँव और जोरवे जैसे ताम्रपाषाण गाँव बने।
मेसोपोटामिया, मिस्र और चीन
हड़प्पा की तरह दूसरी पुरानी सभ्यताएँ भी बड़ी नदियों के पास बनीं। नदी से पानी, उपजाऊ मिट्टी और आने-जाने का आसान रास्ता मिलता था।
मेसोपोटामिया
'मेसोपोटामिया' मतलब 'दो नदियों के बीच की ज़मीन': दजला (टिगरिस) और फ़रात (यूफ्रेटीस)। लगभग 3500 ई.पू. से उरुक और उर जैसे नगर बने। लोगों ने ज़िगुरात (सीढ़ीदार ऊँचे मंदिर) बनाए और कीलाक्षर (क्यूनिफ़ॉर्म) लिपि में मिट्टी की पट्टियों पर लिखा। उनके लेखों में मेलुहा नाम की जगह से व्यापार का ज़िक्र है, जो शायद हड़प्पा क्षेत्र था। वहाँ हड़प्पा की मुहरें और मनके मिले हैं।
मिस्र
मिस्र की सभ्यता नील नदी के किनारे बनी। हर साल बाढ़ उपजाऊ मिट्टी छोड़ जाती। राजा फ़राओ कहलाते थे। लोग चित्रलिपि (हायरोग्लिफ़) में लिखते और मक़बरों के रूप में पिरामिड बनाते थे, जैसे गीज़ा का महान पिरामिड (लगभग 2560 ई.पू.)।
चीन
चीन में खेती वाले गाँव ह्वांग हो (पीली नदी) और यांग्त्सी के किनारे बने। शांग वंश (लगभग 1600 ई.पू. से) कांसे के सुंदर बर्तन बनाता और ओरेकल हड्डियों पर लिखता था। चीनियों ने रेशम के कीड़े से रेशम बनाना सीखा।
सब में क्या एक जैसा था
- नदी घाटी में खेती और बचा हुआ अनाज
- नगर, राजा और पुजारी
- लिपि, व्यापार और कांसे जैसी कारीगरी
करके देखें
3D के आख़िरी चरण में समय-रेखा का स्लाइडर धीरे-धीरे चलाओ। पहले अंदाज़ा लगाओ: मिस्र के पिरामिड पहले बने या हड़प्पा का स्नानागार? फिर जाँचो। घर पर: 10 कंकड़ या बटन लो। 9 को पुरापाषाण के लिए एक लाइन में रखो और बाक़ी सब युगों के लिए सिर्फ़ 1। इससे समझ आएगा कि इंसान कितने लंबे समय तक शिकारी-संग्राहक रहा।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- पुरापाषाण = शिकारी-संग्राहक, बड़े पत्थर औज़ार, आग
- मध्यपाषाण = माइक्रोलिथ (छोटे औज़ार), कुत्ता पालतू
- नवपाषाण = खेती, चिकने औज़ार, गाँव, बर्तन
- ताम्रपाषाण = ताँबा + पत्थर; कांसा = ताँबा + टिन
- हड़प्पा का परिपक्व दौर ≈ 2600–1900 ई.पू.
- मेसोपोटामिया (दजला–फ़रात, कीलाक्षर), मिस्र (नील, चित्रलिपि), चीन (ह्वांग हो, ओरेकल हड्डियाँ)
हल किए गए उदाहरण
1. नवपाषाण युग में लोग गाँवों में क्यों बसने लगे?
फ़सल उगने में महीनों लगते हैं और उसकी रखवाली करनी पड़ती है। इसलिए किसान खेत के पास रुके, घर बनाए, बर्तन बनाए और अनाज रखा। पास-पास के घर गाँव बन गए।
2. पुराने से नए क्रम में लगाओ: हड़प्पा नगर, मेहरगढ़ की खेती, भीमबेटका के शिकारी।
भीमबेटका के शिकारी-संग्राहक → मेहरगढ़ की खेती (लगभग 7000 ई.पू.) → हड़प्पा नगर (लगभग 2600–1900 ई.पू.)।
3. हमें कैसे पता कि हड़प्पा वाले मेसोपोटामिया से व्यापार करते थे?
मेसोपोटामिया के नगरों में हड़प्पा जैसी मुहरें और कार्नेलियन मनके मिले हैं, और वहाँ के लेखों में मेलुहा से व्यापार का ज़िक्र है।
4. नदियों ने पुरानी सभ्यताओं को बढ़ने में कैसे मदद की? दो कारण।
1) पानी और उपजाऊ मिट्टी से ज़्यादा अनाज उगा। 2) नावों से व्यापार आसान हुआ।
5. 2600 ई.पू. से 1900 ई.पू. तक कितने साल?
दोनों ई.पू. हैं, इसलिए घटाओ: 2600 − 1900 = 700 साल।
आम गलतियाँ
- सोचना कि हर जगह एक साथ पत्थर से धातु आई। अलग-अलग क्षेत्रों में युग अलग समय पर शुरू हुए।
- सोचना कि 1500 ई.पू., 2500 ई.पू. से पुराना है। ई.पू. में बड़ी संख्या ज़्यादा पुरानी है।
- कहना कि हड़प्पा लिपि पढ़ ली गई है। अभी तक नहीं पढ़ी गई।
- सोचना कि हड़प्पा वाले रातोंरात ग़ायब हो गए। नगर धीरे-धीरे कमज़ोर हुए।