मेसोपोटामिया, यूनान, रोम, चीन और दक्षिण-पूर्व एशिया से व्यापार
मेसोपोटामिया (लगभग 2500–1900 ई.पू.)
हड़प्पा के व्यापारी कार्नेलियन मनके, ताँबा, लकड़ी, हाथी-दाँत और कपास मेसोपोटामिया (दजला-फ़रात के बीच की ज़मीन) भेजते थे। वहाँ हड़प्पा की मुहरें और बाट मिले हैं। वहाँ की मिट्टी की पट्टियों में मेलुहा से आने वाले जहाज़ों का ज़िक्र है, जिसे ज़्यादातर इतिहासकार हड़प्पा क्षेत्र मानते हैं। गुजरात के लोथल में ईंटों का बड़ा कुंड था, जिसे कई लोग गोदी मानते हैं।
यूनान
सिकंदर के उत्तर-पश्चिम आने (326 ई.पू.) के बाद यूनानी दुनिया से संपर्क बढ़ा। यूनानी दूत मेगस्थनीज़ चंद्रगुप्त मौर्य के दरबार में रहा और इंडिका लिखी। बाद में हिंद-यूनानी राजाओं ने यूनानी और भारतीय लिखावट वाले सिक्के चलाए।
रोम (लगभग पहली सदी ई.पू.–तीसरी सदी ई.)
नाविकों ने मानसून हवाओं का इस्तेमाल सीखा: लगभग जून से हवा दक्षिण-पश्चिम से भारत की ओर चलती है; लगभग नवंबर से उत्तर-पूर्व से वापस। जहाज़ सीधे अरब सागर पार कर सकते थे। रोम काली मिर्च ('काला सोना'), सूती कपड़ा, मोती, रत्न और हाथी-दाँत ख़रीदता। बदले में ज़्यादातर सोने-चाँदी के सिक्के देता; दक्षिण भारत में रोमन सिक्कों के ढेर मिले हैं। बंदरगाह: मुज़िरिस (केरल), अरिकामेडु (पुडुचेरी के पास), भरुच। एक यूनानी नाविक-पुस्तिका, पेरिप्लस ऑफ़ द एरिथ्रियन सी, इन बंदरगाहों की सूची देती है।
चीन
रेशम मार्ग ज़मीनी रास्तों का जाल था जो चीन को मध्य एशिया, भारत और पश्चिम से जोड़ता। चीन रेशम भेजता; भारत कपड़ा, मसाले, रत्न भेजता। समुद्री रास्ते भी भारतीय और चीनी बंदरगाह जोड़ते।
दक्षिण-पूर्व एशिया
भारतीय व्यापारी सुवर्णभूमि ('सोने की ज़मीन') जाते: आज के म्यांमार, थाईलैंड, कंबोडिया, वियतनाम, मलेशिया, इंडोनेशिया। वे कपड़ा और मनके देकर मसाले, सोना और ख़ुशबूदार लकड़ी लेते। लगभग 1025 ई. में चोल राजा राजेंद्र प्रथम ने समुद्री व्यापार की रक्षा के लिए श्रीविजय पर नौसैनिक अभियान भेजा।
मध्य एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया से सांस्कृतिक संबंध
मध्य एशिया
कुषाणों (पहली–तीसरी सदी ई.) का राज मध्य एशिया से उत्तर भारत तक था। उनके समय गांधार कला में भारतीय और यूनानी शैली मिली; बुद्ध की शुरुआती मानव मूर्तियाँ यहीं और मथुरा में बनीं। बौद्ध धर्म रेशम मार्ग से मध्य एशिया, फिर चीन, कोरिया और जापान गया। बामियान में बुद्ध की विशाल मूर्तियाँ बनीं। चीनी तीर्थयात्री पढ़ने और ग्रंथ लेने भारत आए: फ़ाह्यान (लगभग 400 ई.), ह्वेनसांग (लगभग 630–645 ई., नालंदा में पढ़े) और इत्सिंग (7वीं सदी)।
दक्षिण-पूर्व एशिया
ये संबंध ज़्यादातर शांतिपूर्ण थे, व्यापारियों, पुरोहितों और विद्वानों से, जीत से नहीं। वहाँ के राजाओं ने संस्कृत नाम और शिलालेख अपनाए, और स्थानीय लिपियाँ भारतीय लिपियों से बनीं। बड़े मंदिर साझा विचार दिखाते हैं:
- जावा का बोरोबुदुर (लगभग 800 ई.), विशाल बौद्ध स्मारक।
- जावा का प्रम्बनन, हिंदू मंदिर समूह।
- कंबोडिया का अंकोरवाट (12वीं सदी), पहले विष्णु के लिए बना।
- वियतनाम में चंपा राजाओं के माई सन मंदिर।
वहाँ रामायण स्थानीय रूपों में प्रिय है: थाईलैंड में रामकियेन, जावा में ककाविन रामायण, जो आज भी नृत्य और कठपुतली में दिखती है। लोगों ने इन विचारों को अपनी संस्कृति में मिलाया, यह नकल नहीं, लेन-देन था।
भारतीय ज्ञान परंपरा: गणित, खगोल और चिकित्सा
गणित
- शुल्ब सूत्र (बौधायन आदि) में यज्ञ-वेदी बनाने के नियम हैं, जिनमें वह नियम भी है जिसे आज पाइथागोरस प्रमेय कहते हैं।
- दशमलव स्थानीय मान पद्धति: सिर्फ़ 10 अंक, और अंक का मान उसकी जगह (इकाई, दहाई, सैकड़ा) से तय होता है। ख़ाली जगह के लिए बिंदु या गोला, यानी शून्य। तो 305 = 3 सैकड़े, 0 दहाई, 5 इकाई।
- ब्रह्मगुप्त (628 ई.) ने शून्य और ऋण संख्याओं के साथ हिसाब के नियम दिए, जैसे किसी संख्या में से वही संख्या घटाओ तो शून्य।
- ये अंक अरब दुनिया में गए (9वीं सदी में अल-ख़्वारिज़्मी ने 'हिंदू अंकों' पर लिखा) और फिर यूरोप। इसलिए इन्हें हिंदू-अरबी अंक कहते हैं।
- भास्कर द्वितीय (12वीं सदी) ने लीलावती लिखी, जिसमें पद्य में गणित के सवाल हैं।
खगोल
- आर्यभट (जन्म 476 ई.) ने 499 ई. में आर्यभटीय लिखा। उन्होंने कहा पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है, ग्रहण को पृथ्वी और चंद्रमा की छाया से समझाया, और π ≈ 3.1416 दिया।
- वराहमिहिर ने खगोल और पंचांग पर लिखा।
- भारतीय खगोल सारणियाँ बग़दाद में अरबी में अनुवादित हुईं।
चिकित्सा
- आयुर्वेद ('जीवन का ज्ञान'): आहार, दिनचर्या, जड़ी-बूटियाँ और शरीर का संतुलन।
- चरक संहिता: रोग पहचानना और इलाज।
- सुश्रुत संहिता: शल्य चिकित्सा (सर्जरी), 100 से ज़्यादा औज़ार, और नाक की मरम्मत (राइनोप्लास्टी)। सुश्रुत को शल्य चिकित्सा का जनक कहा जाता है।
- ये ग्रंथ फ़ारसी और अरबी में अनुवादित हुए।
हल किया उदाहरण: स्थानीय मान
2,407 को स्थानीय मान में लिखो। चरण 1: हज़ार की जगह 2 → 2000। चरण 2: सैकड़ा 4 → 400। चरण 3: दहाई 0 → शून्य जगह ख़ाली रखता है। चरण 4: इकाई 7। कुल 2000 + 400 + 0 + 7 = 2407। शून्य के बिना '247' कुछ और हो जाता। यही शून्य की ताक़त है।
करके देखें
3D के आख़िरी चरण में 305, फिर 350, फिर 35 दबाओ। पहले अंदाज़ा लगाओ कि हर आकार के कितने ब्लॉक दिखेंगे। घर पर: मसालेदानी देखो। काली मिर्च, इलायची, दालचीनी और हल्दी ढूँढो। पुराने व्यापारी इनमें से क्या रोम, अरब या चीन ले जाते थे? एक छोटी तालिका बनाओ: मसाला → कहाँ गया → बदले में क्या आया।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- मेलुहा = हड़प्पा क्षेत्र का मेसोपोटामियाई नाम
- मानसून: दक्षिण-पश्चिमी हवा (गर्मी) → भारत की ओर; उत्तर-पूर्वी (सर्दी) → वापस पश्चिम
- रोम ने काली मिर्च, कपड़ा, रत्न ख़रीदे; सोने-चाँदी के सिक्के दिए (मुज़िरिस, अरिकामेडु)
- रेशम मार्ग = चीन ↔ मध्य एशिया ↔ भारत ↔ पश्चिम
- स्थानीय मान: 305 = 3×100 + 0×10 + 5×1; शून्य ख़ाली जगह बताता है
- आर्यभट (499 ई.): पृथ्वी घूमती है, π ≈ 3.1416; ब्रह्मगुप्त (628 ई.): शून्य के नियम; सुश्रुत: शल्य चिकित्सा
हल किए गए उदाहरण
1. मानसून हवाओं ने भारत-रोम व्यापार में कैसे मदद की?
लगभग जून से दक्षिण-पश्चिमी हवा जहाज़ों को लाल सागर से सीधे अरब सागर पार भारत लाती। लगभग नवंबर से उत्तर-पूर्वी हवा उन्हें वापस ले जाती। नाविक मौसम देखकर यात्रा तय करते।
2. 4,036 को स्थानीय मान में लिखो और शून्य समझाओ।
4 × 1000 + 0 × 100 + 3 × 10 + 6 × 1 = 4000 + 0 + 30 + 6 = 4036। शून्य बताता है कि सैकड़े नहीं हैं और 3 व 6 को सही जगह रखता है।
3. 1,205 को स्थानीय मान के ब्लॉकों से दिखाओ।
1 हज़ार-ब्लॉक, 2 सैकड़ा-ब्लॉक, 0 दहाई-ब्लॉक, 5 इकाई-ब्लॉक। 1000 + 200 + 0 + 5 = 1205।
4. आर्यभट का π ≈ 3.1416। 10 सेमी व्यास वाले पहिये की परिधि निकालो।
परिधि = π × व्यास ≈ 3.1416 × 10 = 31.416 सेमी।
5. बौद्ध धर्म चीन कैसे पहुँचा?
भिक्षु व्यापारियों के साथ रेशम मार्ग से मध्य एशिया होकर गए। फ़ाह्यान और ह्वेनसांग जैसे चीनी तीर्थयात्री भारत आए, ग्रंथ इकट्ठे किए और अनुवाद के लिए ले गए।
6. हड़प्पा–मेसोपोटामिया व्यापार के दो सबूत दो।
1) मेसोपोटामिया में हड़प्पा की मुहरें, मनके और बाट मिले। 2) वहाँ की पट्टियों में मेलुहा के जहाज़ों का ज़िक्र है।
आम गलतियाँ
- सोचना कि दक्षिण-पूर्व एशिया से संबंध जीत से बने। ये ज़्यादातर व्यापारियों, पुरोहितों और विद्वानों का शांत लेन-देन था।
- शून्य को बस 'कुछ नहीं' समझना। स्थानीय मान में यह जगह भरता है और संख्या बदल देता है (35 बनाम 305)।
- फ़ाह्यान (लगभग 400 ई.) और ह्वेनसांग (लगभग 630 के दशक) को मिलाना; ह्वेनसांग नालंदा में पढ़े।
- सोचना कि रेशम मार्ग एक ही सड़क थी। यह कई रास्तों का जाल था।