स्रोत और साम्राज्य का फैलाव
रोम के बारे में हम कैसे जानते हैं? इतिहासकार तीन तरह के स्रोत (अतीत बताने वाली चीज़ें) देखते हैं:
- पाठ्य सामग्री: उस समय लिखे इतिहास, पत्र, भाषण और क़ानून।
- दस्तावेज़: पत्थर पर खुदे अभिलेख और पैपाइरस (मिस्र का एक तरह का काग़ज़) पर लिखे अनुबंध और हिसाब।
- भौतिक अवशेष: इमारतें, सिक्के, बर्तन, मटके, पच्चीकारी (मोज़ेक), जिन्हें पुरातत्वविद खोजते हैं।
अपने सबसे बड़े रूप में साम्राज्य ब्रिटेन से फ़रात नदी तक और डेन्यूब से उत्तर अफ़्रीका व मिस्र तक था। भूमध्य सागर बीच में था, जैसे साम्राज्य के अंदर एक झील। कई भाषाएँ थीं: पश्चिम में लैटिन और पूर्व में यूनानी मुख्य थीं। पड़ोस में ईरान में एक प्रतिद्वंद्वी साम्राज्य था: पहले पार्थियन, फिर सासानी।
रोमन राजतंत्र: सम्राट, सीनेट और सेना
राजतंत्र (पॉलिटी) यानी शासन की व्यवस्था। रोम पहले गणराज्य था, जहाँ चुने हुए अधिकारी और सीनेट राज करते थे। 27 ई.पू. में ऑगस्टस पहला सम्राट बना। इससे प्रिंसिपेट शुरू हुआ: सम्राट को 'प्रमुख नागरिक' (प्रिंसेप्स) कहा जाता था, पर असली ताक़त उसी की थी।
तीन मुख्य खिलाड़ी
- सम्राट: सबसे ऊपर शासक। क़ानून बनाता, सेना चलाता; मृत्यु के बाद कई बार देवता जैसा सम्मान मिलता।
- सीनेट: अमीर, पुराने, ज़्यादातर ज़मींदार परिवारों की सभा। असली ताक़त कम हो गई थी, पर सम्मान बाकी था। रोम के कई इतिहास सीनेटरों ने लिखे, इसलिए वे सम्राटों को इस बात से परखते थे कि उन्होंने सीनेट से कैसा व्यवहार किया।
- सेना: वेतन पाने वाली, पेशेवर सेना; सैनिक लंबे समय तक सेवा करते थे। यह साम्राज्य का सबसे बड़ा संगठित समूह था। नाराज़ होने पर सैनिक विद्रोह कर सकते थे और नया सम्राट भी चुन सकते थे।
साम्राज्य को जोड़े रखना
साम्राज्य प्रांतों में बँटा था। शासन की नींव नगर थे: स्थानीय अमीर लोग कर वसूलते और नगर चलाते। सड़कें, क़िले और एक जैसे सिक्के साम्राज्य को जोड़ते थे। तीसरी सदी में संकट आया: ईरान और जर्मन कबीलों के हमले, और 50 साल में लगभग 25 सम्राट। चौथी सदी में डायोक्लीशियन और कॉन्स्टैन्टाइन ने राज्य फिर से गढ़ा: ज़्यादा प्रांत, नागरिक और सैनिक अधिकारी अलग, और नया सोने का सिक्का सॉलिडस।
रोमन अर्थव्यवस्था
- खेती: गेहूँ, जैतून और अंगूर। बड़ी जागीरों पर मज़दूर और दास काम करते थे।
- बंदरगाह, खानें, कारख़ाने: कई नगरों में जैतून के कोल्हू, बर्तन बनाने के कारख़ाने और बाज़ार थे।
- व्यापार: शराब और जैतून तेल जैसे द्रव बड़े मिट्टी के मटकों में जाते थे, जिन्हें एम्फ़ोरा कहते हैं। रोम की एक पहाड़ी (मोंटे टेस्टैकियो) लगभग 5 करोड़ टूटे मटकों से बनी है। मटकों पर लगी मुहरें बताती हैं कि तेल कहाँ से आया, जैसे स्पेन से।
- अनाज: मिस्र, सिसली और उत्तर अफ़्रीका से रोम को अनाज जाता था।
- पैसा और बैंक: सोने, चाँदी और काँसे के सिक्के, बैंकिंग व्यवस्था और अमीर व्यापारी।
सब इलाक़े बराबर अमीर नहीं थे। कैम्पेनिया, मिस्र और सीरिया जैसे उपजाऊ इलाक़े समृद्ध थे; कुछ पहाड़ी इलाक़े ग़रीब रहे। पनचक्की और तेल निकालने की नई तकनीक दिखाती है कि तकनीक सुधर रही थी।
समाज और दास प्रथा
समाज की परतें
रोमन लेखक टैसिटस ने ऊपर के समूह बताए: सीनेटर (बहुत अमीर ज़मींदार), इक्विटीज़ (अश्वारोही; कई व्यापारी या सेना अधिकारी), बड़े घरानों से जुड़े सम्मानित आम लोग, ग़रीब लोग और दास। बाद के साम्राज्य में सरकारी सेवा से जुड़ा एक नया अमीर वर्ग उभरा, जिसे सोने में वेतन मिलता था।
परिवार और महिलाएँ
परिवार ज़्यादातर छोटे (एकल) थे। शादी के बाद भी महिलाओं को पिता के परिवार की संपत्ति में हक़ रहता था। पर बच्चों पर पिता का क़ानूनी अधिकार बहुत था, और कई लड़कियों की शादी कम उम्र में होती थी।
साक्षरता
नगरों में कई लोग थोड़ा पढ़-लिख लेते थे; पॉम्पेई की दीवारों पर लिखी बातें यह दिखाती हैं। पर गाँवों में साक्षरता बहुत कम थी।
दास प्रथा
दास प्रथा यानी एक इंसान पर दूसरे का मालिकाना हक़ और ज़बरदस्ती काम। भूमध्य सागर की दुनिया में यह गहरी जमी थी। दास युद्ध से, बेचे जाने से, या दास माँ से जन्म लेकर आते थे। वे घरों, खेतों, खानों और कारख़ानों में काम करते थे। पहली सदी में बड़े युद्ध रुकने पर नए दास कम आने लगे। तब मालिकों ने दासों के बच्चे होने को बढ़ावा दिया या मज़दूरी पर लोगों को रखा, जो अक्सर सस्ता पड़ता था। कुछ दासों को व्यापार चलाने के लिए पैसा दिया गया। कई दास आज़ाद भी किए गए; उन्हें मुक्त दास कहते थे। दास प्रथा रोमन जीवन का कठोर पहलू दिखाती है।
मज़दूर
आज़ाद मज़दूरों से भी बुरा व्यवहार होता था। बाद के साम्राज्य में कई किसान ज़मीन से बँध गए।
भारतीय उपमहाद्वीप से संपर्क
- जहाज़ मिस्र के लाल सागर वाले बंदरगाहों से मानसूनी हवाओं के सहारे अरब सागर पार करते थे (गर्मी में दक्षिण-पश्चिमी हवा भारत की ओर, सर्दी में उत्तर-पूर्वी हवा वापस)।
- वे मुज़िरिस (केरल), अरिकामेडु (पुदुच्चेरी के पास) और पश्चिमी तट के बंदरगाहों तक पहुँचते थे।
- भारत से काली मिर्च, मसाले, सूती कपड़ा, क़ीमती पत्थर और मोती जाते थे। रोम बदले में सोने-चाँदी के सिक्के, एम्फ़ोरा में शराब और तेल, और लाल चमकदार बर्तन देता था।
- सबूत: दक्षिण भारत में रोमन सिक्कों के ढेर, अरिकामेडु में एम्फ़ोरा के टुकड़े और रोमन शैली के बर्तन, और नाविकों की एक यूनानी मार्गदर्शिका जिसमें भारतीय बंदरगाह और सामान लिखे हैं।
कुछ रोमन लेखक शिकायत करते थे कि विलासिता के सामान के लिए बहुत सोना पूर्व जा रहा है। इस व्यापार से सातवाहन और शुरुआती तमिल सरदार भी अमीर हुए।
सांस्कृतिक बदलाव और उत्तर-पुरातन काल
उत्तर-पुरातन काल रोमन साम्राज्य के आख़िरी हिस्से का नाम है, लगभग चौथी से सातवीं सदी। यह बड़े सांस्कृतिक और धार्मिक बदलाव का समय था।
- धर्म: रोमन लोग कई देवताओं को पूजते थे, जैसे जूपिटर, जूनो, मिनर्वा, मार्स, और हर इलाक़े के स्थानीय देवता। यहूदी समुदाय भी थे। 312 में सम्राट कॉन्स्टैन्टाइन ने ईसाई धर्म अपनाया; बाद में यही मुख्य धर्म बना। चर्च और बिशप महत्वपूर्ण हो गए।
- नई राजधानी: कॉन्स्टैन्टाइन ने 330 में पूर्व में कुस्तुंतुनिया (आज का इस्तांबुल) बसाया।
- बँटवारा: साम्राज्य पूर्व और पश्चिम में बँटा। पश्चिम में जर्मन समूहों (गोथ, वैंडल, लोम्बार्ड) ने अपने राज्य बनाए। 476 में आख़िरी पश्चिमी सम्राट हटाया गया। पूर्व (बाइज़ेंटियम) चलता रहा; छठी सदी में जस्टिनियन ने कुछ इलाक़े फिर जीते।
- इस्लाम: सातवीं सदी में अरब में इस्लाम के उदय के बाद अरब सेनाओं ने सीरिया, फ़िलिस्तीन और मिस्र जैसे कई पूर्वी प्रांत ले लिए।
- अर्थव्यवस्था: पूर्व में व्यापार और नगर बहुत समय तक मज़बूत रहे। सोने का सॉलिडस भरोसेमंद सिक्का रहा।
यानी रोमन दुनिया एक दिन में 'गिरी' नहीं। वह धीरे-धीरे नई दुनियाओं में बदल गई: बाइज़ेंटियम, जर्मन राज्य और इस्लामी दुनिया।
करके देखो: काली मिर्च का रास्ता
भौतिक ग्लोब या बिना सीमाओं वाले ख़ाली नक्शे पर भूमध्य सागर, मिस्र का लाल सागर तट और केरल तट ढूँढो। धागे से जहाज़ का रास्ता बनाओ: रोम → मिस्र → लाल सागर → अरब सागर पार → मुज़िरिस। जुलाई और जनवरी में मानसूनी हवा किस ओर चलती है, निशान लगाओ। फिर 3D का पाँचवाँ चरण खोलकर मिलान करो।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- राजतंत्र = सम्राट + सीनेट + सेना (तीन मुख्य खिलाड़ी)
- प्रिंसिपेट: 27 ई.पू. में ऑगस्टस से शुरू
- एम्फ़ोरा = शराब, जैतून तेल के मिट्टी के मटके
- सॉलिडस = कॉन्स्टैन्टाइन का सोने का सिक्का
- मुज़िरिस, अरिकामेडु = रोम से व्यापार करने वाले भारतीय बंदरगाह
- उत्तर-पुरातन काल ≈ चौथी–सातवीं सदी: ईसाई धर्म, कुस्तुंतुनिया (330), पश्चिम का अंत (476), इस्लाम का उदय
हल किए गए उदाहरण
1. रोमन साम्राज्य में सेना इतनी ताक़तवर क्यों थी?
यह वेतन वाली, पेशेवर सेना थी और सबसे बड़ा संगठित समूह थी। सैनिकों को अच्छा वेतन चाहिए था। नाराज़ होने पर वे विद्रोह करते, और तीसरी सदी में सेनाएँ अक्सर अपना सम्राट चुन लेती थीं।
2. एम्फ़ोरा से इतिहासकार रोमन व्यापार कैसे समझते हैं?
एम्फ़ोरा में तेल और शराब जाती थी। उनका आकार और मुहरें बताती हैं कि वे कहाँ बने। स्पेन के मटकों के टुकड़े रोम या भारत में मिलें, तो पता चलता है कि सामान वहाँ तक गया।
3. पहली सदी के बाद खेतों पर दासों का इस्तेमाल क्यों घटा?
बड़े युद्ध धीमे पड़े, इसलिए बंदी बनकर नए दास कम आए। मालिकों ने दासों के बच्चों पर ज़ोर दिया या आज़ाद मज़दूर रखे, जो अक्सर सस्ते पड़ते थे क्योंकि उन्हें साल भर खिलाना नहीं पड़ता था।
4. रोमन व्यापारी भारत कैसे पहुँचे और क्या ख़रीदा?
वे मिस्र के लाल सागर वाले बंदरगाहों से मानसूनी हवाओं के सहारे मुज़िरिस और अरिकामेडु पहुँचे। उन्होंने काली मिर्च, मसाले, कपड़ा और क़ीमती पत्थर ख़रीदे और सोने-चाँदी के सिक्कों में दाम दिया।
आम गलतियाँ
- सोचना कि सीनेट साम्राज्य चलाती थी। 27 ई.पू. के बाद असली ताक़त सम्राट की थी।
- कहना कि 476 में पूरा साम्राज्य गिर गया। सिर्फ़ पश्चिमी हिस्सा ख़त्म हुआ; पूर्व चलता रहा।
- सोचना कि सब दास एक जैसे थे। कुछ व्यापार चलाते, कुछ आज़ाद हुए, कुछ कठोर खानों में थे।
- सोचना कि रोम और भारत में कोई संपर्क नहीं था। दक्षिण भारत में मिले रोमन सिक्के व्यस्त समुद्री व्यापार दिखाते हैं।