बंधुत्व और विवाह
बंधुत्व का मतलब परिवार के रिश्ते: कौन किससे जुड़ा है। कुल परिवार है; संबंधित परिवारों का बड़ा समूह ञाति है। पीढ़ी दर पीढ़ी चलने वाली कड़ी वंश है।
पितृवंशिकता
पितृवंशिकता में वंश पिता से पुत्र, फिर पौत्र तक चलता है। मातृवंशिकता में माँ से। महाभारत में कौरवों और पांडवों (दोनों कुरु वंश) का युद्ध पितृवंशिकता के विचार को मज़बूत करता है। कुछ राजपरिवार अपवाद थे: प्रभावती गुप्त ने संरक्षिका के रूप में शासन किया।
विवाह के नियम
- बहिर्विवाह: अपने समूह (जैसे गोत्र) के बाहर विवाह। अंतर्विवाह: समूह (जैसे जाति) के अंदर विवाह।
- कन्यादान को पिता का कर्तव्य बताया गया।
- धर्मसूत्रों में विवाह के आठ प्रकार हैं; पहले चार 'उत्तम', बाक़ी निंदित।
- बहुपत्नी प्रथा (एक पुरुष, कई पत्नियाँ) शासकों में ज़्यादा थी; बहुपति प्रथा (एक स्त्री, कई पति, जैसे द्रौपदी) दुर्लभ थी।
गोत्र
ब्राह्मणों ने लोगों को गोत्रों में बाँटा, हर गोत्र एक वैदिक ऋषि के नाम पर। दो नियम: विवाह पर स्त्री पति का गोत्र लेती थी, और एक गोत्र वाले विवाह नहीं कर सकते थे। पर सातवाहन अभिलेखों में रानियाँ पिता का गोत्र-नाम रखती हैं, और राजाओं के नाम माँ पर हैं, जैसे गोतमी-पुत्त सिरि-सातकणि। कुछ सातवाहन रानियाँ पति के गोत्र की ही थीं (अंतर्विवाह, जो दक्षिण भारत में मिलता है)।
वर्ण, जाति और नियमों से परे जीवन
ब्राह्मणों के लिखे धर्मसूत्र और धर्मशास्त्र (जैसे मनुस्मृति, लगभग 200 ई.पू.-200 ई.) चार वर्ण बताते हैं, हर एक का काम जन्म से तय:
- ब्राह्मण: वेद पढ़ना-पढ़ाना, यज्ञ करना, दान लेना।
- क्षत्रिय: युद्ध, रक्षा, शासन।
- वैश्य: खेती, पशुपालन, व्यापार।
- शूद्र: तीनों ऊँचे वर्णों की सेवा।
लोग इसे मानें, इसके लिए ब्राह्मणों ने कहा कि यह ईश्वर की देन है (पुरुष सूक्त), राजाओं को इसे लागू करने की सलाह दी और सिखाया कि दर्जा जन्म से मिलता है।
जातियाँ
चार वर्णों के उलट, जातियाँ अनेक थीं और बढ़ती रहीं। नए समूह (जैसे वनवासी या विदेशी) और पेशे जातियाँ बने। कभी एक पेशे वाली जाति श्रेणी में संगठित होती थी: जैसे मंदसौर के रेशम बुनकर, जो नए इलाक़े में आए और बाद में पेशा भी बदला।
राजा हमेशा क्षत्रिय नहीं
कई राजवंश क्षत्रिय नहीं थे: कुछ ग्रंथ मौर्यों को निम्न कुल का कहते हैं; मध्य एशिया से आए शकों को बाहरी माना गया; सातवाहन राजा ने खुद को अनूठा ब्राह्मण और क्षत्रियों का घमंड तोड़ने वाला कहा।
चार वर्णों से परे
निषाद जैसे वनवासी (एकलव्य की कथा), घुमंतू पशुपालक और संस्कृत न बोलने वालों को 'म्लेच्छ' या बाहरी कहा गया। कुछ लोगों को अस्पृश्य (चांडाल) कहा गया; वे गाँव के बाहर रहते और 'अपवित्र' माना जाने वाला काम, जैसे शव उठाना, करते थे। बौद्ध जातक कथाएँ चांडालों को बुद्धिमान और अच्छा दिखाकर इस पर सवाल उठाती हैं।
संपत्ति, स्त्री-पुरुष और वर्ग
मनुस्मृति के अनुसार पिता की संपत्ति पुत्रों में बराबर बँटती थी, बड़े को थोड़ा विशेष हिस्सा। स्त्रियाँ इसमें दावा नहीं कर सकती थीं। वे स्त्रीधन, यानी विवाह के उपहार, रख सकती थीं, जो उनके बच्चों को मिलता; पति का उस पर हक़ नहीं। ग्रंथ स्त्रियों को चुपके से धन जमा न करने की चेतावनी भी देता है।
कुछ अमीर स्त्रियाँ थीं, जैसे भूमिदान करने वाली प्रभावती गुप्त। पर ज़्यादातर ज़मीन, पशु और धन पुरुषों के हाथ में था।
वर्ण और धन
नियमों के अनुसार शूद्र केवल सेवा करें और अमीर न हों। पर बौद्ध ग्रंथों में अमीर शूद्र और ग़रीब ब्राह्मण दिखते हैं। बौद्धों ने कहा कि सामाजिक अंतर इंसानों ने बनाए, ईश्वर ने नहीं। एक बौद्ध कथा कहती है कि लोगों ने पहले एक शासक (महासम्मत) चुना और उसे हिस्सा देने पर सहमत हुए; यानी राजत्व इंसानी समझौता है।
दान और प्रतिष्ठा
तमिल संगम कविताओं में सरदार कवियों को दान देकर नाम कमाते थे। महाभारत में कर्ण दानी के रूप में प्रसिद्ध है। देना प्रतिष्ठा पाने का तरीक़ा था।
स्रोत के रूप में महाभारत
समालोचनात्मक संस्करण
1919 में संस्कृत विद्वान वी.एस. सुकथांकर के नेतृत्व में महाभारत का समालोचनात्मक संस्करण बनाने की परियोजना शुरू हुई। विद्वानों ने पूरे उपमहाद्वीप से संस्कृत पांडुलिपियाँ जुटाईं, श्लोक मिलाए और ज़्यादातर पाठों में मिलने वाले श्लोक चुने। काम 1966 में पूरा हुआ, 13,000 से ज़्यादा पन्नों में। इसने दिखाया कि कहानी का साझा मूल है, पर अनेक क्षेत्रीय अंतर भी हैं, जो ब्राह्मणीय आदर्शों और स्थानीय परंपराओं के संवाद से बने।
इतिहासकार इसे कैसे पढ़ते हैं
- भाषा और विषय: सरल संस्कृत में। इसमें आख्यान (कहानी) और उपदेशात्मक (नियम और सीख, जैसे भगवद्गीता) भाग हैं।
- लेखक: पहले सूत (सारथी-कवि) इसे रचकर गाते थे, जो योद्धाओं के साथ जाते थे। लगभग पाँचवीं सदी ई.पू. से ब्राह्मणों ने इसे अपनाया और लिखा। परंपरा व्यास ऋषि को लेखक मानती है।
- समय: लगभग 1,000 साल में रचा गया (लगभग 500 ई.पू. से); लगभग 10,000 श्लोकों से बढ़कर लगभग 1,00,000 हो गया।
- क्या यह सच्चा इतिहास है? हस्तिनापुर की खुदाई (1951-52, बी.बी. लाल) में बस्तियाँ मिलीं, पर घटनाओं को सिद्ध नहीं कर सकते। इतिहासकार इससे उस समय के मूल्य और बहसें समझते हैं।
यह ग्रंथ बदलता रहता है: अनेक भाषाओं, नाटकों, नृत्य और टीवी में दोबारा कहा जाता है, इसलिए यह गतिशील ग्रंथ है।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- बंधुत्व = परिवार के रिश्ते; कुल = परिवार; ञाति = बड़ा नातेदार समूह
- पितृवंशिकता = वंश पिता से पुत्र को
- बहिर्विवाह = समूह के बाहर विवाह; अंतर्विवाह = समूह के अंदर
- गोत्र = वैदिक ऋषि के नाम वाला समूह
- वर्ण = 4 वर्ग (ग्रंथों में); जाति = जन्म-आधारित अनेक समूह
- स्त्रीधन = विवाह के उपहारों से स्त्री का अपना धन
- महाभारत का समालोचनात्मक संस्करण = 1919-1966, वी.एस. सुकथांकर
- उपदेशात्मक = सीख देने वाला; आख्यान = कहानी
हल किए गए उदाहरण
1. सातवाहन उदाहरण ब्राह्मणीय गोत्र नियमों पर कैसे सवाल उठाता है?
नियम 1: स्त्री पति का गोत्र लेती है। पर सातवाहन रानियों ने पिता का गोत्र-नाम (जैसे गोतमी) रखा। नियम 2: एक गोत्र में विवाह मना। पर कुछ रानियाँ पति के गोत्र की ही थीं। तो नियम हर जगह नहीं माने गए, ख़ासकर दक्षिण में।
2. ब्राह्मणों ने वर्ण व्यवस्था को ईश्वर की देन क्यों बताया?
ताकि यह स्वाभाविक और न बदलने वाली लगे। लोग इसे दैवी मानें तो पालन करें। साथ ही राजाओं से इसे लागू करवाया और कहा कि दर्जा जन्म से मिलता है। ये तीन रणनीतियाँ थीं।
3. जाति वर्ण से कैसे अलग है?
वर्ण केवल चार थे, ग्रंथों में तय और ऊँच-नीच में बँधे। जातियाँ अनेक थीं, नए समूहों और पेशों के साथ बढ़ती रहीं और श्रेणियों में संगठित हो सकती थीं। दोनों जन्म से थे, पर जाति असल जीवन के ज़्यादा क़रीब थी।
4. महाभारत पढ़ते समय इतिहासकार कौन-से तीन सवाल पूछता है?
1. भाषा और विषय: कहानी है या सीख? 2. लेखक और श्रोता: किसने रचा (सूत, फिर ब्राह्मण) और किसके लिए? 3. समय: कौन-सा भाग कब लिखा गया, क्योंकि यह 1,000 साल में बढ़ा?
आम गलतियाँ
- वर्ण और जाति को एक समझना। वर्ण 4 थे; जातियाँ अनेक।
- मानना कि सब धर्मशास्त्रों का पालन करते थे। अभिलेख और बौद्ध ग्रंथ कई अपवाद दिखाते हैं।
- कहना कि सभी राजा क्षत्रिय थे। मौर्य, शक और सातवाहन उलटा दिखाते हैं।
- महाभारत को एक लेखक की एक तय किताब मानना। यह सदियों में अनेक लोगों के योगदान से बढ़ा।