अंग्रेज़ों की लगान व्यवस्था: बंगाल का स्थायी बंदोबस्त
कंपनी ने लगान तय क्यों किया
1765 के बाद कंपनी बंगाल में भू-राजस्व यानी ज़मीन का टैक्स वसूलने लगी। उसे पक्की और नियमित कमाई चाहिए थी। उसे यह भी लगा कि रकम तय होगी तो ज़मींदार खेती सुधारने में पैसा लगाएँगे।
व्यवस्था कैसे चली
1793 में गवर्नर-जनरल कॉर्नवालिस के समय स्थायी बंदोबस्त लागू हुआ। ज़मींदार ख़ुद किसान नहीं था। वह कई गाँवों (उसकी ज़मींदारी) से लगान इकट्ठा करता था। उसे हर साल कंपनी को एक तय रकम देनी थी, हमेशा के लिए।
ज़मींदार पैसा क्यों नहीं दे पाए
- शुरू में ही माँग बहुत ऊँची रखी गई।
- 1790 के दशक में अनाज के दाम कम थे, रैयत पैसा नहीं दे पाए।
- सूर्यास्त क़ानून: तय दिन सूर्यास्त तक पैसा नहीं पहुँचा तो ज़मींदारी नीलाम हो सकती थी।
- ज़मींदार की ताक़त घटाई गई: उसकी सेना भंग हुई, उसकी अदालतें छिन गईं।
बहुत-सी ज़मींदारियाँ नीलाम हुईं। कुछ ज़मींदारों ने चालाकी की: बेनामी ख़रीद करके अपनी ही ज़मीन वापस ख़रीद ली।
जोतदारों का उदय
जोतदार गाँव के अमीर किसान थे। उनके पास बहुत ज़मीन थी, वे कर्ज़ देते थे और अनाज का व्यापार करते थे। वे गाँव में ही रहते थे, इसलिए ग़रीब किसानों पर उनका सीधा असर था। कई जगह वे ज़मींदारों से भी ज़्यादा ताक़तवर हो गए और रैयतों को ज़मींदार का लगान रोकने के लिए उकसाते थे।
राजमहल की पहाड़ियों के किसान और वनवासी
पहाड़िया
पहाड़िया लोग राजमहल की पहाड़ियों में रहते थे। वे झूम खेती करते थे: जंगल का एक टुकड़ा साफ़ करो, कुछ साल खेती करो, फिर आगे बढ़ो। वे जंगल की चीज़ें इकट्ठा करते थे और कभी-कभी मैदान के गाँवों पर छापा भी मारते थे। जंगल ही उनका घर था।
संथाल
संथाल लगभग 1800 के आसपास इस इलाक़े में आए। वे हल चलाने वाले स्थायी किसान थे। अंग्रेज़ उन्हें पसंद करते थे क्योंकि वे जंगल साफ़ करके खेती करते और लगान देते थे। 1832 में कंपनी ने एक बड़े इलाक़े को दामिन-इ-कोह यानी संथालों की भूमि घोषित किया और सीमा पर खंभे लगाए।
टकराव और विद्रोह
पहाड़िया लोग और ऊँची पथरीली पहाड़ियों में धकेल दिए गए। संथालों पर भी भारी लगान लगा, साहूकार (दिकू, यानी बाहरी लोग) भारी ब्याज लेते थे और ज़मीन छीनते थे। 1855–56 में संथालों ने विद्रोह किया। इसके बाद अंग्रेज़ों ने विशेष क़ानूनों के साथ संथाल परगना बनाया।
दक्कन: रैयतवाड़ी, कपास और 1875 के दंगे
रैयतवाड़ी बंदोबस्त
बंबई दक्कन में (1820 के दशक) कंपनी ने सीधे रैयत यानी किसान से समझौता किया। यही रैयतवाड़ी व्यवस्था है। ज़मीन का सर्वे हुआ और लगान लगभग 30 साल के लिए तय हुआ। माँग ऊँची थी, इसलिए बहुत से किसानों ने साहूकारों से कर्ज़ लिया।
कपास का उछाल और गिरावट
अमेरिका के गृहयुद्ध (1861–65) से अमेरिकी कपास ब्रिटेन पहुँचना बंद हुआ। ब्रिटेन को भारत की कपास चाहिए थी। दाम बढ़े और साहूकारों ने आसानी से कर्ज़ दिया। 1865 के बाद अमेरिकी कपास लौट आई। दाम गिरे, कर्ज़ मिलना बंद हुआ और अगले बंदोबस्त में लगान बढ़ा दिया गया। किसान गहरे कर्ज़ में डूब गए।
दक्कन दंगे
मई 1875 में पुणे ज़िले के सूपे और आसपास के गाँवों में किसानों ने साहूकारों के घरों पर हमला किया। उन्होंने बही-खाते और कर्ज़ के बॉन्ड छीनकर जला दिए, क्योंकि यही काग़ज़ उनके कर्ज़ का सबूत थे। 1859 के परिसीमन क़ानून के अनुसार कर्ज़ का बॉन्ड सिर्फ़ तीन साल चलता था, पर साहूकार हर तीन साल में किसानों से नया बॉन्ड लिखवा लेते थे, अक्सर झूठी रकम के साथ।
कारीगर
गाँव के कारीगर, जैसे बुनकर, भी परेशान हुए, क्योंकि ब्रिटेन का मशीन से बना कपड़ा गाँवों तक पहुँच गया और स्थानीय माँग घट गई।
सरकारी अभिलेख: सावधानी से पढ़ना
मुख्य स्रोत
- पाँचवीं रिपोर्ट (1813): भारत में कंपनी के शासन पर ब्रिटिश संसद को दी गई रिपोर्ट। इसमें 1,000 से ज़्यादा पन्ने थे और ज़मींदारों व रैयतों की बात थी।
- फ्रांसिस बुकानन का सर्वे: 1800 के शुरू में उसने राजमहल की पहाड़ियों और बंगाल की यात्रा करके ज़मीन, लोग और फ़सलों के बारे में लिखा।
- दक्कन दंगा आयोग (1878): दंगों के कारण जानने के लिए बनी रिपोर्ट।
कैसे पढ़ें
ये अभिलेख बहुत काम के हैं। पर इन्हें अफ़सरों ने अफ़सरों के लिए लिखा। इनमें वही दिखता है जो सरकार देखना चाहती थी। जैसे दंगा आयोग ने साहूकारों और किसानों के ग़ुस्से को दोष दिया, पर ऊँचे लगान पर कम बोला। बुकानन ने उस ज़मीन की तारीफ़ की जिससे मुनाफ़ा बन सकता था। इसलिए हमेशा पूछो: किसने लिखा? किसके लिए? उसका मक़सद क्या था?
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- स्थायी बंदोबस्त = हमेशा के लिए तय लगान, ज़मींदार देता है (बंगाल, 1793)
- रैयतवाड़ी = लगान सीधे रैयत से, लगभग हर 30 साल में बदलता (बंबई दक्कन, 1820 का दशक)
- सूर्यास्त क़ानून = तय दिन सूर्यास्त तक पैसा दो, वरना नीलामी
- जोतदार = बंगाल के गाँव का अमीर किसान, कर्ज़दाता और व्यापारी
- दामिन-इ-कोह = 1832 में संथालों के लिए तय भूमि
- साहूकार = दक्कन का कर्ज़ देने वाला और व्यापारी
हल किए गए उदाहरण
1. 1793 के बाद कई ज़मींदारियाँ नीलाम क्यों हुईं?
माँग बहुत ऊँची थी, अनाज के दाम कम थे, रैयत लगान देर से देते थे, और सूर्यास्त क़ानून में एक किस्त देर होने पर भी नीलामी हो सकती थी। ज़मींदार की सेना और अदालत भी छिन गई थी, इसलिए वह ज़ोर से वसूली नहीं कर पाता था।
2. जोतदार ताक़तवर कैसे बने?
उनके पास बड़ी ज़मीन थी, वे ग़रीब किसानों को कर्ज़ देते और अनाज बेचते थे। वे गाँव में रहते थे, इसलिए रोज़ की ज़िंदगी पर उनका नियंत्रण था, जबकि ज़मींदार दूर शहर में रहते थे। वे रैयतों से ज़मींदार का लगान तक रुकवा सकते थे।
3. 1875 में दक्कन के किसानों ने बही-खाते क्यों जलाए?
बही-खाते और बॉन्ड ही उनके कर्ज़ का लिखित सबूत थे। किसानों को लगता था कि साहूकारों ने झूठी रकम लिखकर उन्हें ठगा है। काग़ज़ जलाना मानो कर्ज़ जलाना था।
4. अंग्रेज़ पहाड़ियों से ज़्यादा संथालों को क्यों पसंद करते थे?
संथाल स्थायी किसान थे, जंगल साफ़ करते और ऐसी फ़सल उगाते जिस पर लगान लग सके। पहाड़िया घूमते रहते, जंगल से जीते और कभी-कभी मैदानों पर छापा मारते, इसलिए उनसे लगान कम मिलता था।
आम गलतियाँ
- ज़मींदार को खेती करने वाला किसान समझना। वह कई गाँवों से लगान वसूलने वाला था; खेती रैयत करते थे।
- व्यवस्थाएँ मिलाना: स्थायी बंदोबस्त बंगाल (1793) में ज़मींदारों के साथ था; रैयतवाड़ी बंबई और मद्रास में रैयतों के साथ।
- सरकारी रिपोर्ट को पूरी तरह निष्पक्ष मान लेना। उन्हें अफ़सरों ने सरकार की नज़र से लिखा।
- यह कहना कि कपास के उछाल से किसान हमेशा के लिए अमीर हो गए। 1865 के बाद यह ख़त्म हुआ और कर्ज़ बढ़ा।