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उपनिवेशवाद और देहात

ईस्ट इंडिया कंपनी ज़मीन से पक्की कमाई चाहती थी। बंगाल में 1793 में स्थायी बंदोबस्त हुआ: ज़मींदार हमेशा के लिए तय रकम देगा। रकम बहुत ऊँची थी, इसलिए कई ज़मींदारियाँ नीलाम हुईं और गाँव के अमीर किसान, जोतदार, ताक़तवर बने। राजमहल की पहाड़ियों में अंग्रेज़ों ने संथालों को बसाया, 1832 में दामिन-इ-कोह की सीमा बनी, पहाड़िया लोग पीछे धकेले गए और 1855–56 में संथालों ने विद्रोह किया। बंबई दक्कन में रैयतवाड़ी से लगान सीधे किसान से लिया गया; कपास का उछाल (1861–65) गिरावट में बदला, कर्ज़ बढ़ा और 1875 में दक्कन दंगे हुए। यह सब हम पाँचवीं रिपोर्ट, बुकानन के सर्वे और दक्कन दंगा आयोग जैसे सरकारी अभिलेखों से जानते हैं, जिन्हें सावधानी से पढ़ना होता है।

🎬 कदम-दर-कदम कहानी

  1. सिक्कों को चलते देखो। रैयत यानी किसान ज़मींदार को लगान देते हैं। ज़मींदार कंपनी को तय रकम देता है। कंपनी ने कहा, यह रकम कभी नहीं बढ़ेगी। यही 1793 का स्थायी बंदोबस्त है।
  2. यह तय रकम बहुत ज़्यादा थी। पैसा देर से पहुँचा, चाहे सूर्यास्त तक ही, तो ज़मींदारी नीलाम। देखो ज़मींदार का खंभा छोटा होता है। गाँव का अमीर किसान, जोतदार, बड़ा होता है।
  3. अब राजमहल की पहाड़ियाँ। पहाड़िया लोग ऊपर रहते हैं, जंगल से जीते हैं। संथाल नीचे जंगल साफ़ करके हल चलाते हैं। पत्थर के खंभे दामिन-इ-कोह (1832) की सीमा बताते हैं। टैक्स और साहूकारों से तंग संथाल 1855–56 में विद्रोह करते हैं।
  4. बंबई दक्कन में कंपनी लगान सीधे किसान से लेती है: रैयतवाड़ी। हरा खंभा, कपास का दाम, 1861–65 में ऊपर जाता है, फिर गिरता है। लाल खंभा, कर्ज़, बढ़ता जाता है। 1875 में नाराज़ किसान साहूकारों पर टूट पड़ते हैं।
  5. यह सब हमें कैसे पता? सरकारी काग़ज़ों से: पाँचवीं रिपोर्ट (1813), फ्रांसिस बुकानन का सर्वे और दक्कन दंगा आयोग (1878)। ये काम के हैं। पर अफ़सरों ने लिखे, इसलिए पूछो: किसने लिखा और क्यों?
  6. अब तुम्हारी बारी। फ़सल वाला स्लाइडर चलाओ। कंपनी की माँग वही रहती है। ख़राब साल में देखो किसान के पास कितना कम बचता है। तय माँग इसी तरह चोट करती थी।

टिप: 3D दृश्य को घुमाने के लिए खींचें। ज़ूम के लिए दो उंगलियाँ इस्तेमाल करें।

🤔 आम शंकाएँ और उनके जवाब

लगान तय था, फिर देना इतना मुश्किल क्यों था?

क्योंकि वह बहुत ऊँचे स्तर पर तय था और ख़राब साल में कम नहीं होता था। छठे चरण का स्लाइडर दिखाता है कि ख़राब फ़सल में लगभग कुछ नहीं बचता।

क्या ज़मींदार ख़ुद खेती करने वाला मालिक था?

नहीं। वह कई गाँवों के रैयतों से लगान लेकर कंपनी को देता था। पहले चरण के सिक्के यही कड़ी दिखाते हैं।

जोतदार ज़मींदारों से ज़्यादा ताक़तवर क्यों हुए?

वे गाँव में रहते थे और ज़मीन, कर्ज़ और अनाज पर उनका क़ब्ज़ा था, जबकि ज़मींदार नीलामी में ज़मींदारी खो रहे थे। दूसरे चरण में दोनों खंभे जगह बदलते हैं।

क्या संथाल और पहाड़िया आपस में दुश्मन थे?

अपनी मर्ज़ी से नहीं। अंग्रेज़ी नीति ने संथालों को उस ज़मीन में बसाया जिसे पहाड़िया इस्तेमाल करते थे, इसलिए पहाड़िया और ऊपर धकेले गए। तीसरा चरण पहाड़ और नीचे के खेत दिखाता है।

1865 के बाद कपास के दाम क्यों गिरे?

अमेरिका का गृहयुद्ध ख़त्म हुआ और अमेरिकी कपास फिर ब्रिटेन पहुँचने लगी, इसलिए भारतीय कपास की माँग घटी। चौथे चरण में हरा खंभा गिरता है।

क्या पाँचवीं रिपोर्ट पर भरोसा किया जा सकता है?

यह काम की है, पर अफ़सरों ने अपने मक़सद से लिखी। पाँचवें चरण का आवर्धक लेंस याद दिलाता है: हमेशा पूछो किसने और क्यों लिखा।

अंग्रेज़ों की लगान व्यवस्था: बंगाल का स्थायी बंदोबस्त

कंपनी ने लगान तय क्यों किया

1765 के बाद कंपनी बंगाल में भू-राजस्व यानी ज़मीन का टैक्स वसूलने लगी। उसे पक्की और नियमित कमाई चाहिए थी। उसे यह भी लगा कि रकम तय होगी तो ज़मींदार खेती सुधारने में पैसा लगाएँगे।

व्यवस्था कैसे चली

1793 में गवर्नर-जनरल कॉर्नवालिस के समय स्थायी बंदोबस्त लागू हुआ। ज़मींदार ख़ुद किसान नहीं था। वह कई गाँवों (उसकी ज़मींदारी) से लगान इकट्ठा करता था। उसे हर साल कंपनी को एक तय रकम देनी थी, हमेशा के लिए।

ज़मींदार पैसा क्यों नहीं दे पाए

बहुत-सी ज़मींदारियाँ नीलाम हुईं। कुछ ज़मींदारों ने चालाकी की: बेनामी ख़रीद करके अपनी ही ज़मीन वापस ख़रीद ली।

जोतदारों का उदय

जोतदार गाँव के अमीर किसान थे। उनके पास बहुत ज़मीन थी, वे कर्ज़ देते थे और अनाज का व्यापार करते थे। वे गाँव में ही रहते थे, इसलिए ग़रीब किसानों पर उनका सीधा असर था। कई जगह वे ज़मींदारों से भी ज़्यादा ताक़तवर हो गए और रैयतों को ज़मींदार का लगान रोकने के लिए उकसाते थे।

राजमहल की पहाड़ियों के किसान और वनवासी

पहाड़िया

पहाड़िया लोग राजमहल की पहाड़ियों में रहते थे। वे झूम खेती करते थे: जंगल का एक टुकड़ा साफ़ करो, कुछ साल खेती करो, फिर आगे बढ़ो। वे जंगल की चीज़ें इकट्ठा करते थे और कभी-कभी मैदान के गाँवों पर छापा भी मारते थे। जंगल ही उनका घर था।

संथाल

संथाल लगभग 1800 के आसपास इस इलाक़े में आए। वे हल चलाने वाले स्थायी किसान थे। अंग्रेज़ उन्हें पसंद करते थे क्योंकि वे जंगल साफ़ करके खेती करते और लगान देते थे। 1832 में कंपनी ने एक बड़े इलाक़े को दामिन-इ-कोह यानी संथालों की भूमि घोषित किया और सीमा पर खंभे लगाए।

टकराव और विद्रोह

पहाड़िया लोग और ऊँची पथरीली पहाड़ियों में धकेल दिए गए। संथालों पर भी भारी लगान लगा, साहूकार (दिकू, यानी बाहरी लोग) भारी ब्याज लेते थे और ज़मीन छीनते थे। 1855–56 में संथालों ने विद्रोह किया। इसके बाद अंग्रेज़ों ने विशेष क़ानूनों के साथ संथाल परगना बनाया।

दक्कन: रैयतवाड़ी, कपास और 1875 के दंगे

रैयतवाड़ी बंदोबस्त

बंबई दक्कन में (1820 के दशक) कंपनी ने सीधे रैयत यानी किसान से समझौता किया। यही रैयतवाड़ी व्यवस्था है। ज़मीन का सर्वे हुआ और लगान लगभग 30 साल के लिए तय हुआ। माँग ऊँची थी, इसलिए बहुत से किसानों ने साहूकारों से कर्ज़ लिया।

कपास का उछाल और गिरावट

अमेरिका के गृहयुद्ध (1861–65) से अमेरिकी कपास ब्रिटेन पहुँचना बंद हुआ। ब्रिटेन को भारत की कपास चाहिए थी। दाम बढ़े और साहूकारों ने आसानी से कर्ज़ दिया। 1865 के बाद अमेरिकी कपास लौट आई। दाम गिरे, कर्ज़ मिलना बंद हुआ और अगले बंदोबस्त में लगान बढ़ा दिया गया। किसान गहरे कर्ज़ में डूब गए।

दक्कन दंगे

मई 1875 में पुणे ज़िले के सूपे और आसपास के गाँवों में किसानों ने साहूकारों के घरों पर हमला किया। उन्होंने बही-खाते और कर्ज़ के बॉन्ड छीनकर जला दिए, क्योंकि यही काग़ज़ उनके कर्ज़ का सबूत थे। 1859 के परिसीमन क़ानून के अनुसार कर्ज़ का बॉन्ड सिर्फ़ तीन साल चलता था, पर साहूकार हर तीन साल में किसानों से नया बॉन्ड लिखवा लेते थे, अक्सर झूठी रकम के साथ।

कारीगर

गाँव के कारीगर, जैसे बुनकर, भी परेशान हुए, क्योंकि ब्रिटेन का मशीन से बना कपड़ा गाँवों तक पहुँच गया और स्थानीय माँग घट गई।

सरकारी अभिलेख: सावधानी से पढ़ना

मुख्य स्रोत

कैसे पढ़ें

ये अभिलेख बहुत काम के हैं। पर इन्हें अफ़सरों ने अफ़सरों के लिए लिखा। इनमें वही दिखता है जो सरकार देखना चाहती थी। जैसे दंगा आयोग ने साहूकारों और किसानों के ग़ुस्से को दोष दिया, पर ऊँचे लगान पर कम बोला। बुकानन ने उस ज़मीन की तारीफ़ की जिससे मुनाफ़ा बन सकता था। इसलिए हमेशा पूछो: किसने लिखा? किसके लिए? उसका मक़सद क्या था?

मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ

हल किए गए उदाहरण

1. 1793 के बाद कई ज़मींदारियाँ नीलाम क्यों हुईं?

माँग बहुत ऊँची थी, अनाज के दाम कम थे, रैयत लगान देर से देते थे, और सूर्यास्त क़ानून में एक किस्त देर होने पर भी नीलामी हो सकती थी। ज़मींदार की सेना और अदालत भी छिन गई थी, इसलिए वह ज़ोर से वसूली नहीं कर पाता था।

2. जोतदार ताक़तवर कैसे बने?

उनके पास बड़ी ज़मीन थी, वे ग़रीब किसानों को कर्ज़ देते और अनाज बेचते थे। वे गाँव में रहते थे, इसलिए रोज़ की ज़िंदगी पर उनका नियंत्रण था, जबकि ज़मींदार दूर शहर में रहते थे। वे रैयतों से ज़मींदार का लगान तक रुकवा सकते थे।

3. 1875 में दक्कन के किसानों ने बही-खाते क्यों जलाए?

बही-खाते और बॉन्ड ही उनके कर्ज़ का लिखित सबूत थे। किसानों को लगता था कि साहूकारों ने झूठी रकम लिखकर उन्हें ठगा है। काग़ज़ जलाना मानो कर्ज़ जलाना था।

4. अंग्रेज़ पहाड़ियों से ज़्यादा संथालों को क्यों पसंद करते थे?

संथाल स्थायी किसान थे, जंगल साफ़ करते और ऐसी फ़सल उगाते जिस पर लगान लग सके। पहाड़िया घूमते रहते, जंगल से जीते और कभी-कभी मैदानों पर छापा मारते, इसलिए उनसे लगान कम मिलता था।

आम गलतियाँ

अभ्यास क्विज़

1. बंगाल में स्थायी बंदोबस्त कब लागू हुआ?
2. जोतदार कौन थे?
3. दामिन-इ-कोह किसके लिए तय भूमि थी?
4. भारत में कपास का उछाल किस कारण आया?
5. पाँचवीं रिपोर्ट ब्रिटिश संसद में कब पेश हुई?

अभ्यास: खुद जवाब दो

अपना जवाब लिखो या चुनो, फिर जाँचें दबाओ। अटको तो संकेत देखो; जवाब देने के बाद पूरा हल दिखेगा।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

उपनिवेशवाद और देहात अध्याय किस बारे में है?

अंग्रेज़ों की लगान व्यवस्थाओं ने गाँवों की ज़िंदगी कैसे बदली: बंगाल में ज़मींदार और जोतदार, राजमहल में पहाड़िया और संथाल, दक्कन में किसान और साहूकार, और यह सब सरकारी अभिलेखों से कैसे दिखता है।

स्थायी बंदोबस्त और रैयतवाड़ी में क्या अंतर है?

स्थायी बंदोबस्त (बंगाल) में ज़मींदार हमेशा के लिए तय रकम देता था। रैयतवाड़ी (बंबई, मद्रास) में किसान सीधे लगान देता था और रकम लगभग हर 30 साल में बदली जाती थी।

इस अध्याय को सरकारी अभिलेखों का अध्ययन क्यों कहा जाता है?

क्योंकि हमारी ज़्यादातर जानकारी पाँचवीं रिपोर्ट, बुकानन के सर्वे और दक्कन दंगा आयोग जैसे सरकारी काग़ज़ों से आती है, और यह अध्याय उन्हें परखकर पढ़ना सिखाता है।

यह कहाँ पढ़ाया जाता है

सीबीएसई (भारत)कक्षा 12भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग-3

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