विश्वासों और भक्ति ग्रंथों में बदलाव (लगभग 8वीं से 18वीं सदी)
भक्ति यानी भगवान से प्रेम भरा समर्पण। सूफ़ीवाद यानी इस्लाम का प्रेम और भीतर वाला रास्ता। दोनों 8वीं से 18वीं सदी में भारत में ख़ूब फैले।
परंपराओं का मेल
महान परंपरा वह है जो ब्राह्मणों ने संस्कृत ग्रंथों में लिखी। लघु परंपराएँ गाँव और जंगल के लोगों के स्थानीय विश्वास हैं। समय के साथ ये मिलीं। जैसे किसी स्थानीय देवता को विष्णु या शिव का रूप माना गया, कई स्थानीय देवियों को देवी का रूप। आसान संस्कृत की कहानियों वाले पुराणों ने यह मेल कराया।
तांत्रिक पूजा
कुछ पूजा-पद्धतियाँ, जिन्हें तांत्रिक कहते हैं, सभी जातियों की औरतों और पुरुषों के लिए खुली थीं और वैदिक नियमों को अक्सर नहीं मानती थीं।
नए भक्ति ग्रंथ
संतों ने लोगों की भाषाओं में लिखा: तमिल, कन्नड़, मराठी, हिंदी, पंजाबी। उनके गीत पवित्र ग्रंथों में जमा हुए। यह सिर्फ़ संस्कृत वाली पूजा से बड़ा बदलाव था।
तमिलनाडु के अलवार और नयनार
6वीं से 9वीं सदी में अलवार (विष्णु भक्त) और नयनार (शिव भक्त) जगह-जगह घूमकर तमिल भजन गाते थे।
- 12 अलवार और 63 नयनार थे। वे कई जातियों से थे, उनमें वे भी जिन्हें तब 'अछूत' कहा जाता था।
- भजन-संग्रह: नालायिरा दिव्यप्रबंधम् (अलवारों के 4,000 भजन) और तेवरम् (नयनारों के भजन)।
- कुछ अलवारों ने कहा जन्म से ज़्यादा प्रेम मायने रखता है।
- स्त्री संत: अलवार अंडाल ने विष्णु से प्रेम के गीत गाए। नयनार करइक्काल अम्मइयार ने सुख छोड़कर कठिन रास्ता चुना। इन्होंने घर तक सीमित रहने की सोच को चुनौती दी।
- राजा और मंदिर: चोल राजाओं ने ज़मीन दी, शिव के बड़े मंदिर बनवाए और वहाँ भजन गवाए। संतों की काँसे की मूर्तियाँ मंदिरों में रखी गईं।
कर्नाटक की वीरशैव परंपरा
12वीं सदी में चालुक्य दरबार के मंत्री बसवन्ना ने नया आंदोलन शुरू किया। उनके अनुयायी वीरशैव (शिव के वीर) या लिंगायत (लिंग धारण करने वाले) कहलाए।
- वे शिव की पूजा लिंग रूप में करते हैं, जिसे छोटी डिबिया में शरीर पर पहनते हैं।
- उन्होंने जाति और अपवित्रता का विचार ठुकराया।
- उन्होंने पुनर्जन्म के सिद्धांत पर सवाल उठाया। वे मृतकों को जलाते नहीं, दफ़नाते हैं।
- उन्होंने विधवा पुनर्विवाह और बड़े होने के बाद विवाह का समर्थन किया, जिसे धर्मशास्त्र पसंद नहीं करते थे।
- उनकी कन्नड़ कविताएँ वचन कहलाती हैं।
इस्लाम और सूफ़ी सिलसिले
इस्लाम 7वीं सदी से व्यापारियों के साथ और बाद में शासकों के साथ भारत आया। शासक शरिया (इस्लामी क़ानून) मानते थे, पर ज़्यादातर प्रजा मुसलमान नहीं थी। कुछ ग़ैर-मुसलमानों को ज़िम्मी (संरक्षित) का दर्जा मिला और वे जज़िया कर देते थे। अकबर ने जज़िया हटाया।
सूफ़ी कौन थे?
सूफ़ी मुसलमान रहस्यवादी संत थे। उन्हें कठोर नियम और दिखावटी धन पसंद नहीं था। वे प्रेम, ख़ुदा के नाम का जाप (ज़िक्र) और गुरु के सहारे ख़ुदा के क़रीब जाना चाहते थे।
सूफ़ी व्यवस्था
- ख़ानक़ाह: आश्रम, जहाँ गुरु रहता और लोग खाते, ठहरते, प्रार्थना करते।
- पीर / शेख़: गुरु। मुरीद: शिष्य।
- सिलसिला: गुरु से शिष्य की चेन, जो पैग़ंबर तक जाती है।
- दरगाह: सूफ़ी गुरु की क़ब्र, जहाँ ज़ियारत (तीर्थ) होती है।
- समा: संगीत और गीत (जैसे क़व्वाली), ख़ुदा से जुड़ने के लिए।
चिश्ती
भारत में चिश्ती सिलसिला सबसे लोकप्रिय हुआ। अजमेर में शेख़ मुईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर अमीर-ग़रीब सब आते थे; अकबर कई बार गया। दिल्ली में शेख़ निज़ामुद्दीन औलिया की ख़ानक़ाह में सबके लिए लंगर चलता था। चिश्ती स्थानीय भाषा में बात करते थे; अमीर ख़ुसरो ने हिंदवी और फ़ारसी में लिखा।
सूफ़ी और राज्य
चिश्ती राजाओं से दूरी रखते थे, पर ख़ानक़ाह चलाने के लिए दान और ज़मीन लेते थे। राजा सूफ़ियों का आशीर्वाद चाहते थे क्योंकि लोग उन्हें प्यार करते थे।
उत्तर भारत के नए रास्ते: कबीर, गुरु नानक और मीराबाई
निर्गुण और सगुण
निर्गुण भक्ति यानी बिना रूप और गुण वाले ईश्वर से प्रेम। सगुण भक्ति यानी रूप वाले ईश्वर, जैसे कृष्ण या राम, से प्रेम।
कबीर (14वीं-15वीं सदी)
जुलाहे कबीर ने ईश्वर को कई नाम दिए (राम, अल्लाह, हरि, साहिब)। उन्होंने हिंदू और मुसलमान दोनों के खोखले कर्मकांड पर चोट की और कहा ईश्वर भीतर है। उनकी रचनाएँ बीजक, कबीर ग्रंथावली और आदि ग्रंथ में हैं। दोनों धर्मों के लोग उन्हें अपना मानते हैं; उनका जीवन पूरी तरह पता नहीं।
गुरु नानक (1469 से 1539)
तलवंडी में जन्मे, दूर-दूर घूमे। उन्होंने बिना रूप वाले एक ईश्वर की भक्ति, नाम के स्मरण से, सिखाई। मूर्ति पूजा, तीर्थ और जाति को नहीं माना। संगत (साथ पूजा) और लंगर (साथ भोजन) वाला समुदाय बनाया। उनके और बाद के गुरुओं, कबीर, बाबा फ़रीद के भजन गुरु अर्जन ने आदि ग्रंथ (1604) में जोड़े। गुरु गोबिंद सिंह ने ख़ालसा (1699) बनाया।
मीराबाई (15वीं-16वीं सदी)
राजपूत राजकुमारी मीरा ने कृष्ण को अपना प्रियतम माना। परिवार के विरोध के बाद भी महल छोड़कर गाती रहीं। कहा जाता है उनके गुरु चमड़े का काम करने वाले रैदास थे, जो जाति को चुनौती थी। उनके गीत राजस्थान और गुजरात में आज भी गाए जाते हैं।
इतिहासकार इन परंपराओं को कैसे पढ़ते हैं
स्रोत हैं: भजन, संतों की जीवनियाँ, मलफ़ूज़ात (सूफ़ी गुरुओं की बातचीत), मक्तूबात (उनके पत्र) और तज़किरा (जीवन कथाएँ)। गीत याद करके आगे बढ़े और बदलते गए, इसलिए इतिहासकार कई रूप मिलाते हैं।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- अलवार = 12 विष्णु भक्त संत; नयनार = 63 शिव भक्त संत; तमिल, 6वीं से 9वीं सदी
- वीरशैव / लिंगायत = बसवन्ना, कर्नाटक, 12वीं सदी; वचन
- पीर सिखाता है मुरीद को; चेन = सिलसिला; आश्रम = ख़ानक़ाह; क़ब्र = दरगाह; संगीत = समा
- निर्गुण = बिना रूप का ईश्वर (कबीर, नानक); सगुण = रूप वाला ईश्वर (मीरा)
- आदि ग्रंथ: गुरु अर्जन, 1604; ख़ालसा 1699
हल किए गए उदाहरण
1. पुराणों ने महान और लघु परंपराओं को कैसे जोड़ा?
चरण 1: पुराण आसान संस्कृत की कहानियाँ थे। चरण 2: उन्होंने स्थानीय देवताओं को विष्णु, शिव या देवी का रूप बताया। चरण 3: इस तरह गाँव की पूजा और संस्कृत पूजा एक परिवार बन गईं।
2. अलवार और नयनार कुल कितने थे?
चरण 1: अलवार = 12। चरण 2: नयनार = 63। चरण 3: 12 + 63 = 75 संत।
3. सिलसिला उदाहरण से समझाओ।
चरण 1: पीर मुरीद को सिखाता है। चरण 2: मुरीद बाद में पीर बनकर अपना उत्तराधिकारी (ख़लीफ़ा) चुनता है। चरण 3: मुईनुद्दीन चिश्ती से निज़ामुद्दीन औलिया तक चिश्ती चेन की कड़ियाँ हैं।
4. कबीर और मीरा दोनों भक्त पर अलग क्यों?
चरण 1: दोनों ने सीधा प्रेम किया और जाति का घमंड ठुकराया। चरण 2: कबीर निर्गुण। चरण 3: मीरा सगुण (कृष्ण)। प्रेम एक, ईश्वर की सोच अलग।
आम गलतियाँ
- अलवार और नयनार उलटना। अलवार = विष्णु; नयनार = शिव।
- यह कहना कि सूफ़ियों ने इस्लाम छोड़ा। वे मुसलमान थे जो प्रेम और भीतरी आस्था पर ज़ोर देते थे।
- मीराबाई को निर्गुण कहना। वे कृष्ण की सगुण भक्त थीं।
- दरगाह को मस्जिद समझना। दरगाह सूफ़ी संत की क़ब्र है।