एक नेता का आगमन
वापसी और BHU भाषण
गांधीजी ने लगभग 20 साल दक्षिण अफ़्रीका में भारतीयों के हक़ के लिए संघर्ष किया। जनवरी 1915 में वे भारत लौटे। फ़रवरी 1916 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के उद्घाटन पर उन्होंने साहसी बात कही। उन्होंने कहा कि यहाँ बैठे नेता अमीर और पढ़े-लिखे हैं, जबकि असली भारत ग़रीब किसान और मज़दूर हैं। आज़ादी का मतलब तभी है जब वह उन तक पहुँचे।
पहले स्थानीय आंदोलन
- चंपारण (1917): नील किसानों को अन्यायी नियमों से राहत।
- खेड़ा (1918): फ़सल ख़राब होने पर लगान माफ़ी की माँग।
- अहमदाबाद (1918): मिल मज़दूरों की बेहतर मज़दूरी के लिए साथ।
1919 में उन्होंने रॉलट एक्ट के ख़िलाफ़ देशभर में विरोध बुलाया। इस क़ानून से बिना मुक़दमे जेल में रखा जा सकता था।
असहयोग और जनता के नेता का बनना
असहयोग (1920–22)
कांग्रेस ने ख़िलाफ़त नेताओं के साथ मिलकर लोगों से अंग्रेज़ी राज से सहयोग बंद करने को कहा: सरकारी स्कूल, कॉलेज और अदालतें छोड़ो, उपाधियाँ लौटाओ, विदेशी कपड़े का बहिष्कार करो। किसान, मज़दूर, आदिवासी और छात्र जुड़े। फ़रवरी 1922 में चौरी चौरा में भीड़ ने थाने में आग लगा दी, तो गांधीजी ने आंदोलन वापस ले लिया क्योंकि वे अहिंसा पर अड़े थे। 1922 में उन्हें जेल हुई।
लोग उनके पीछे क्यों चले
- वे ग़रीबों की तरह सादी धोती पहनते और चरखा चलाते थे।
- वे आसान शब्दों में और भारतीय भाषाओं में बोलते थे।
- उनकी चमत्कारी शक्तियों की कहानियाँ और अफ़वाहें फैलीं; किसान उन्हें उद्धारक मानने लगे।
- गाँवों में स्थानीय नेता और कांग्रेस समितियाँ उनका संदेश फैलाती थीं।
विचार और संस्थाएँ
गांधीजी सत्याग्रह (सत्य और अहिंसा की शक्ति), स्वदेशी (भारतीय सामान) और खादी (हाथ से कता कपड़ा) में विश्वास करते थे। वे छुआछूत के ख़िलाफ़ और हिंदू–मुस्लिम एकता के लिए काम करते थे। साबरमती और वर्धा के आश्रम और कांग्रेस संगठन स्वयंसेवकों को तैयार करते और ये विचार फैलाते थे।
सविनय अवज्ञा और उसके बाद
पूर्ण स्वराज और नमक यात्रा
दिसंबर 1929 में लाहौर में कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज (पूरी आज़ादी) को लक्ष्य बनाया, और 26 जनवरी 1930 को स्वतंत्रता दिवस मनाया गया। 12 मार्च 1930 को गांधीजी साबरमती आश्रम से समुद्र तट पर दांडी तक पैदल चले। 6 अप्रैल को उन्होंने नमक बनाकर नमक क़ानून तोड़ा। नमक हर घर में लगता है, इसलिए नमक कर हर घर को चुभता था। पूरे भारत में लोगों ने नमक और जंगल क़ानून तोड़े। दुनिया भर के अख़बारों ने यह यात्रा छापी।
गोलमेज़ सम्मेलन
अंग्रेज़ों ने लंदन में सम्मेलन बुलाए। कांग्रेस पहले सम्मेलन (1930–31) में नहीं गई। गांधी-इरविन समझौते (मार्च 1931) के बाद सविनय अवज्ञा रुकी और गांधीजी दूसरे सम्मेलन में गए, पर वह नाकाम रहा। दूसरे दलों ने मुसलमानों, दलित वर्गों और राजाओं की ओर से बोलने का दावा किया। 1932 के पूना समझौते से दलित वर्गों के लिए आरक्षित सीटें तय हुईं।
भारत छोड़ो (1942)
दूसरे विश्व युद्ध के दौरान, क्रिप्स मिशन नाकाम होने पर, कांग्रेस ने अगस्त 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन शुरू किया। गांधीजी का नारा था "करो या मरो"। बड़े नेता तुरंत गिरफ़्तार हुए, पर युवाओं, छात्रों और मज़दूरों ने पूरे देश में आंदोलन चलाए रखा।
आज़ादी, बँटवारा और आख़िरी वीर दिन
15 अगस्त 1947 को भारत आज़ाद हुआ, पर देश बँट गया और भयानक हिंसा हुई। गांधीजी दिल्ली के जश्न में नहीं थे। वे कलकत्ता में शांति के लिए उपवास और प्रार्थना कर रहे थे। इससे पहले 1946–47 में वे नोआखाली (बंगाल) और बिहार के गाँवों में पैदल घूमे, ताकि डर और नफ़रत शांत हो। वे बार-बार कहते रहे कि हिंदू और मुसलमान साथ रहें। 30 जनवरी 1948 को दिल्ली में उन्हें गोली मार दी गई। पूरी दुनिया ने शोक मनाया।
गांधीजी को जानना: अख़बार और चिट्ठियाँ जैसे स्रोत
सार्वजनिक आवाज़ और निजी आवाज़
गांधीजी के भाषण और लेख (उनके अख़बार यंग इंडिया और हरिजन में) उनकी सार्वजनिक आवाज़ हैं: जो वे देश को सुनाना चाहते थे। उनकी चिट्ठियाँ निजी आवाज़ दिखाती हैं: शंकाएँ, चिंताएँ और साथियों से बहस। पर कई चिट्ठियाँ बाद में छपीं, इसलिए लिखने वाले जानते थे कि वे सार्वजनिक हो सकती हैं।
आत्मकथा
उनकी आत्मकथा सत्य के प्रयोग उनकी ज़िंदगी को वैसे बताती है जैसे उन्हें याद थी। आत्मकथा याद के सहारे, पीछे मुड़कर लिखी जाती है और उसमें वही होता है जो लेखक बताना चाहता है।
सरकारी रिकॉर्ड
पुलिस और अफ़सर राजनीतिक घटनाओं पर पाक्षिक रिपोर्ट (हर पंद्रह दिन की रिपोर्ट) लिखते थे। इनसे पता चलता है कि सरकार किससे डरती थी, पर इनमें अक्सर आंदोलन की ताक़त को कम करके दिखाया गया।
अख़बार
भारतीय और अंग्रेज़ी अख़बारों ने अंग्रेज़ी और भारतीय भाषाओं में आंदोलन की ख़बरें छापीं। हर अख़बार की अपनी राजनीति थी, इसलिए एक ही घटना अलग-अलग ढंग से लिखी गई।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- सत्याग्रह = अन्याय से लड़ने का तरीक़ा: सत्य + अहिंसा
- असहयोग (1920–22) → सविनय अवज्ञा (1930–34) → भारत छोड़ो (1942)
- पूर्ण स्वराज = पूरी आज़ादी (लाहौर, 1929)
- गांधी-इरविन समझौता = मार्च 1931, सविनय अवज्ञा रुकी, गांधीजी लंदन गए
- सार्वजनिक आवाज़ = भाषण, लेख; निजी आवाज़ = चिट्ठियाँ
- पाक्षिक रिपोर्ट = सरकार की नियमित पुलिस/अफ़सरों की रिपोर्ट
हल किए गए उदाहरण
1. 1916 का BHU भाषण क्यों महत्वपूर्ण है?
इसमें गांधीजी ने कहा कि भारतीय राष्ट्रवाद अमीर और पढ़े-लिखे लोगों तक सीमित है और इसमें किसान-मज़दूर शामिल होने चाहिए। इससे पता चला कि वे आम लोगों का जन आंदोलन बनाएँगे।
2. गांधीजी ने 1922 में असहयोग आंदोलन क्यों रोका?
चौरी चौरा में भीड़ ने थाने में आग लगा दी, जिसमें पुलिसवाले मारे गए। गांधीजी मानते थे कि आंदोलन अहिंसक रहना चाहिए, इसलिए उन्होंने इसे रोक दिया, भले ही वह बहुत मज़बूत था।
3. 1930 में नमक चुनना समझदारी क्यों थी?
नमक अमीर-ग़रीब सबको चाहिए था, इसलिए नमक कर सबको चुभता था। नमक क़ानून तोड़ना आसान और शांतिपूर्ण था, समुद्र के पास कोई भी कर सकता था, इसलिए लोग एक हुए और दुनिया का ध्यान खिंचा।
4. ऐतिहासिक स्रोत के रूप में चिट्ठियाँ भाषणों से कैसे अलग हैं?
भाषण वह दिखाते हैं जो नेता जनता को सुनाना चाहता था। चिट्ठियाँ अक्सर निजी भावनाएँ, शंकाएँ और मतभेद दिखाती हैं। पर इतिहासकार याद रखते हैं कि चिट्ठियाँ भी यह सोचकर लिखी जा सकती थीं कि वे छपेंगी।
आम गलतियाँ
- साल मिलाना: असहयोग 1920 में, सविनय अवज्ञा 1930 में, भारत छोड़ो 1942 में शुरू हुआ।
- यह मानना कि गांधीजी 15 अगस्त 1947 को दिल्ली में जश्न मना रहे थे। वे कलकत्ता में शांति के लिए काम कर रहे थे।
- पुलिस रिपोर्टों को पूरा सच मानना। उनमें सरकार का डर दिखता है और आंदोलन को कम आँका गया।
- यह मानना कि कांग्रेस सभी गोलमेज़ सम्मेलनों में गई। वह केवल दूसरे (1931) में गई।