पहला विश्व युद्ध, ख़िलाफ़त और असहयोग
युद्ध से मुश्किलें
पहले विश्व युद्ध (1914–18) में रक्षा पर ख़र्च बढ़ा, तो टैक्स और सीमा-शुल्क बढ़े और आयकर शुरू हुआ। 1913 से 1918 के बीच दाम लगभग दोगुने हुए। गाँवों से लोगों को ज़बरदस्ती सेना में भर्ती किया गया। 1918–21 में फ़सलें ख़राब हुईं और फ़्लू (इन्फ़्लुएंज़ा) से 1.2 से 1.3 करोड़ लोग मरे।
सत्याग्रह का विचार
गांधीजी जनवरी 1915 में दक्षिण अफ़्रीका से लौटे। सत्याग्रह यानी सच पर डटे रहना। अगर तुम्हारी बात सच्ची है, तो जीतने के लिए हिंसा की ज़रूरत नहीं; ज़ुल्म करने वाले के मन को छूना है।
- चंपारण, बिहार (1917): नील की खेती की कठोर व्यवस्था के ख़िलाफ़ किसानों का साथ दिया।
- खेड़ा, गुजरात (1917): फ़सल ख़राब होने और प्लेग के बाद लगान न चुका पाने वाले किसानों का साथ दिया।
- अहमदाबाद (1918): सूती मिल के मज़दूरों का साथ दिया।
रॉलट एक्ट और जलियाँवाला बाग़
रॉलट एक्ट (1919) से सरकार राजनीतिक क़ैदियों को बिना मुक़दमे दो साल तक जेल में रख सकती थी। गांधीजी ने 6 अप्रैल 1919 को हड़ताल बुलाई। 13 अप्रैल 1919 को अमृतसर के जलियाँवाला बाग़ में जनरल डायर ने रास्ते बंद कर शांत भीड़ पर गोलियाँ चलवाईं, सैकड़ों लोग मारे गए। पूरे भारत में गुस्सा फैल गया।
ख़िलाफ़त
युद्ध के बाद तुर्की के ऑटोमन सम्राट, ख़लीफ़ा (मुसलमानों के धार्मिक प्रमुख), पर कठोर संधि थोपी गई। मार्च 1919 में बंबई में मोहम्मद अली और शौकत अली ने ख़िलाफ़त समिति बनाई। गांधीजी ने इसे हिंदू-मुसलमानों को जोड़ने का मौक़ा माना।
असहयोग क्यों?
अपनी किताब हिंद स्वराज (1909) में गांधीजी ने लिखा कि अंग्रेज़ी राज भारतीयों के सहयोग से ही चल रहा है। सहयोग बंद तो राज ख़त्म। दिसंबर 1920 के नागपुर अधिवेशन में कांग्रेस ने असहयोग कार्यक्रम अपनाया: उपाधियाँ लौटाओ, सरकारी नौकरी, सेना, पुलिस, अदालत, परिषद, स्कूल और विदेशी सामान का बहिष्कार करो।
आंदोलन की अलग-अलग धाराएँ
- शहर: छात्रों ने सरकारी स्कूल छोड़े, वकीलों ने अदालतें, विदेशी कपड़े जलाए गए। मद्रास छोड़कर परिषद चुनावों का बहिष्कार हुआ। पर खादी मिल के कपड़े से महँगी थी और भारतीय स्कूल कम थे, इसलिए आंदोलन धीमा पड़ा।
- अवध के किसान: बाबा रामचंद्र के नेतृत्व में ऊँचा लगान और बेगार (बिना पैसे काम) लेने वाले तालुक़दारों और ज़मींदारों के ख़िलाफ़। अक्टूबर 1920 में अवध किसान सभा बनी।
- गूडेम पहाड़ियों के आदिवासी (आंध्र): अल्लूरी सीताराम राजू के नेतृत्व में जंगल कानूनों के ख़िलाफ़; उन्होंने अहिंसा नहीं, गुरिल्ला लड़ाई की। 1924 में राजू मारे गए।
- असम के बाग़ान मज़दूर: 1859 के इनलैंड इमिग्रेशन एक्ट के कारण वे चाय बाग़ान नहीं छोड़ सकते थे। "गांधी राज आ रहा है" मानकर वे निकल पड़े।
फ़रवरी 1922 में चौरी चौरा (गोरखपुर) में शांत जुलूस हिंसक हो गया और थाना जला दिया गया। गांधीजी ने आंदोलन वापस ले लिया।
सविनय अवज्ञा की ओर
कुछ नेताओं (सी.आर. दास, मोतीलाल नेहरू) ने परिषदों में जाने के लिए स्वराज पार्टी बनाई। जवाहरलाल नेहरू और सुभाष चंद्र बोस जैसे युवा नेता पूरी आज़ादी चाहते थे। 1926 के बाद दुनिया की मंदी से फ़सलों के दाम गिरे।
1928 में साइमन कमीशन भारत आया, पर उसमें एक भी भारतीय नहीं था। लोगों ने "साइमन वापस जाओ" के नारे लगाए। दिसंबर 1929 में जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में लाहौर अधिवेशन में कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज की माँग की। 26 जनवरी 1930 को स्वतंत्रता दिवस मनाया गया।
नमक यात्रा
31 जनवरी 1930 को गांधीजी ने वायसराय इरविन को 11 माँगें भेजीं। सबसे बड़ी: नमक कर हटाओ, क्योंकि नमक अमीर-ग़रीब सब खाते हैं। जवाब न मिलने पर 12 मार्च 1930 को गांधीजी ने 78 स्वयंसेवकों के साथ नमक यात्रा शुरू की। वे 24 दिन में 240 मील (लगभग 385 किमी) चलकर साबरमती से दांडी पहुँचे। 6 अप्रैल 1930 को उन्होंने समुद्र के पानी से नमक बनाया।
सविनय अवज्ञा का मतलब सिर्फ़ सहयोग न करना नहीं, बल्कि औपनिवेशिक कानून तोड़ना भी था: नमक बनाना, विदेशी कपड़े का बहिष्कार, टैक्स न देना, जंगल कानून तोड़ना। सरकार ने नेताओं को गिरफ़्तार किया; अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान की गिरफ़्तारी पर पेशावर में विरोध हुआ। मार्च 1931 में गांधी-इरविन समझौता हुआ और गांधीजी लंदन के दूसरे गोलमेज़ सम्मेलन में गए, पर निराश लौटे। आंदोलन फिर शुरू हुआ और 1934 में ख़त्म हुआ।
अलग-अलग लोगों ने आंदोलन को कैसे देखा
- अमीर किसान (गुजरात के पाटीदार, उत्तर प्रदेश के जाट): दाम गिरने से परेशान, लगान कम चाहते थे। 1931 में आंदोलन रुकने पर निराश हुए।
- ग़रीब किसान: लगान माफ़ी चाहते थे; कांग्रेस ने "लगान मत दो" अभियान का पूरा साथ नहीं दिया।
- व्यापारी वर्ग: विदेशी माल से सुरक्षा चाहते थे; 1920 में इंडियन इंडस्ट्रियल एंड कमर्शियल कांग्रेस और 1927 में FICCI बनाई (पुरुषोत्तमदास ठाकुरदास, जी.डी. बिड़ला)। बाद में फैलती अशांति से डरने लगे।
- औद्योगिक मज़दूर: नागपुर जैसे कुछ जगह जुड़े; कांग्रेस ने उद्योगपतियों को नाराज़ न करने के लिए उन्हें दूर रखा।
- महिलाएँ: जुलूस में गईं, नमक बनाया, दुकानों पर धरना दिया; ज़्यादातर शहरों के ऊँची जाति वाले और गाँवों के अमीर किसान परिवारों से।
सीमाएँ
दलित ("अछूत" कहे जाने वाले, जिन्हें गांधीजी ने हरिजन कहा) अलग निर्वाचन क्षेत्र चाहते थे। डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने 1930 में दमित वर्ग एसोसिएशन बनाई। गांधीजी ने अलग निर्वाचन के ख़िलाफ़ अनशन किया; पूना समझौते (सितंबर 1932) से दलितों को इसकी जगह आरक्षित सीटें मिलीं। ख़िलाफ़त के ठंडा पड़ने और सांप्रदायिक झगड़ों के बाद कई मुसलमान दूर हो गए; 1928 में मोहम्मद अली जिन्ना से सीटों पर बात नहीं बनी।
सामूहिक अपनेपन का भाव
राष्ट्र तब बनता है जब लोगों को लगे कि उनकी पहचान एक है। भारत में यह संघर्ष और संस्कृति दोनों से आया:
- भारत माता: बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने 1870 के दशक में वंदे मातरम् लिखा; बाद में यह उनके उपन्यास आनंदमठ में आया। अबनींद्रनाथ टैगोर ने भारत माता को शांत, आध्यात्मिक माँ के रूप में बनाया।
- लोककथाएँ: रवींद्रनाथ टैगोर ने लोकगीत और गाथाएँ जुटाईं; नटेसा शास्त्री ने तमिल लोककथाओं का बड़ा संग्रह छापा।
- झंडे और निशान: बंगाल के स्वदेशी आंदोलन में लाल, हरा, पीला तिरंगा, जिस पर 8 कमल और एक अर्धचंद्र। 1921 में गांधीजी ने स्वराज झंडा बनाया: लाल, हरा और सफ़ेद, बीच में चरखा।
- इतिहास की नई व्याख्या: लेखकों ने कला, विज्ञान और कानून में प्राचीन भारत की उपलब्धियाँ बताईं और लोगों से गर्व करने और अंग्रेज़ी राज से लड़ने को कहा।
पर जब अतीत को ज़्यादातर हिंदू प्रतीकों से दिखाया गया, तो दूसरे समुदायों के कुछ लोग ख़ुद को अलग महसूस करने लगे। यह हर राष्ट्र के लिए सबक़ है।
ख़ुद करके देखो
घर पर "नमक यात्रा" करो: एक कप पानी में एक चम्मच नमक घोलो, प्लेट में डालकर 1–2 दिन धूप में रखो और नमक के क्रिस्टल वापस आते देखो। गांधीजी ने दांडी में ऐसे ही नमक बनाया था। फिर 3D में अंदाज़ा लगाओ: यात्रा के किस दिन आधा रास्ता पूरा हुआ? गिनती से जाँचो (लगभग 12वाँ दिन)।
परीक्षा के लिए सुझाव
सबसे ज़्यादा पूछे जाते हैं: गांधीजी ने नमक क्यों चुना, अलग-अलग समूहों ने सविनय अवज्ञा को कैसे देखा, असहयोग क्यों वापस लिया, रॉलट एक्ट, जलियाँवाला बाग़, पूना समझौता, और भारत माता व लोककथाओं से राष्ट्रवाद कैसे बना। वर्ष याद रखो: 1917, 1919, 1920, 1922, 1928, 1929, 1930, 1931, 1932।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- सत्याग्रह = सच + अहिंसा + ज़ुल्म करने वाले के मन को छूना
- असहयोग (1920–22) = सहयोग बंद करो (बहिष्कार)
- सविनय अवज्ञा (1930–34) = सहयोग बंद + औपनिवेशिक कानून तोड़ो
- नमक यात्रा: 12 मार्च → 6 अप्रैल 1930, साबरमती → दांडी, 78 स्वयंसेवक, ~385 किमी
- पूना समझौता 1932 = दलितों के लिए आरक्षित सीटें (अलग निर्वाचन नहीं)
हल किए गए उदाहरण
1. गांधीजी ने सविनय अवज्ञा शुरू करने के लिए नमक क्यों चुना?
नमक हर व्यक्ति की ज़रूरत है, अमीर हो या ग़रीब, इसलिए उस पर टैक्स सबको चुभता था। नमक कानून तोड़ना आसान, शांत और हर जगह संभव था। इससे सब भारतीय एक अन्यायी कानून के ख़िलाफ़ एक हो गए।
2. असहयोग आंदोलन वापस क्यों लिया गया?
फ़रवरी 1922 में चौरी चौरा में शांत भीड़ पुलिस से भिड़ गई और थाना जला दिया। गांधीजी को लगा आंदोलन हिंसक हो रहा है और लोगों को सत्याग्रह की और तैयारी चाहिए, इसलिए उन्होंने इसे रोक दिया।
3. सविनय अवज्ञा असहयोग से कैसे अलग था?
असहयोग में सिर्फ़ सहयोग बंद करना था: स्कूल, अदालत, सामान का बहिष्कार। सविनय अवज्ञा में कानून तोड़ना भी था: नमक बनाना, टैक्स न देना, जंगल कानून तोड़ना।
4. 1931 में अमीर किसानों का उत्साह क्यों घटा?
वे इसलिए जुड़े थे कि दाम गिरने से लगान भारी लग रहा था। 1931 में लगान घटे बिना आंदोलन रुक गया, तो वे निराश हुए और 1932 में दोबारा शुरू होने पर कई नहीं जुड़े।
आम गलतियाँ
- वर्ष मिला देना: असहयोग 1920 (नागपुर, दिसंबर 1920) में शुरू हुआ; सविनय अवज्ञा 1930 में।
- यह लिखना कि पूर्ण स्वराज मद्रास में घोषित हुआ। यह दिसंबर 1929 का लाहौर अधिवेशन था, नेहरू की अध्यक्षता में।
- यह सोचना कि सब समूह एक ही स्वराज चाहते थे। हर समूह का अपना मतलब था: कम लगान, व्यापार की आज़ादी, बाग़ान छोड़ना।
- पूना समझौते को अलग निर्वाचन कहना। इससे साझे निर्वाचन में आरक्षित सीटें मिलीं।