फ़ैक्टरी से पहले: आदि-औद्योगीकरण
औद्योगीकरण यानी फ़ैक्टरी में मशीनों से सामान बनाना। पर फ़ैक्टरी आने से पहले भी दुनिया के बाज़ारों के लिए बड़े पैमाने पर उत्पादन होता था। इसे आदि-औद्योगीकरण (proto-industrialisation) कहते हैं (आदि = शुरुआती)।
17वीं और 18वीं सदी के इंग्लैंड में सौदागर गाँवों की ओर गए, क्योंकि शहरों में ताक़तवर गिल्ड (उत्पादकों के संघ) व्यापार, दाम और नए लोगों के आने पर क़ाबू रखते थे। सौदागर गाँव के किसानों और कारीगरों को पैसा और कच्चा माल देते, और वे घर पर सामान बनाते। ग़रीब किसानों को यह अच्छा लगा: वे अपने छोटे खेत पर रहकर अतिरिक्त कमाई कर सकते थे।
एक कपड़ा कई हाथों से गुज़रता: स्टेपलर रेशों के हिसाब से ऊन ख़रीदता, कार्डर ऊन सँवारता, कातने वाले धागा बनाते, बुनकर बुनते, फ़ुलर कपड़े को चुन्नट देकर समेटता और रंगरेज़ रंगते। आख़िरी काम लंदन में होता, फिर निर्यात। सब पर सौदागर का नियंत्रण था; यही सौदागर-नियंत्रित घरेलू उत्पादन आदि-उद्योग की नींव था।
फ़ैक्टरी का आना
इंग्लैंड में सबसे पहली फ़ैक्टरियाँ 1730 के दशक तक बनीं, पर तेज़ी से 18वीं सदी के आख़िर में बढ़ीं। कपास नए दौर का निशान थी: कच्ची कपास का आयात 1760 में लगभग 25 लाख पाउंड से बढ़कर 1787 में 2.2 करोड़ पाउंड हो गया। नई खोजों ने हर चरण (कार्डिंग, ऐंठना, कताई, लपेटना) तेज़ किया। रिचर्ड आर्कराइट ने कॉटन मिल बनाई, जहाँ सारे काम एक छत के नीचे और निगरानी में होते।
बदलाव की रफ़्तार
- कपास और धातु (लोहा-इस्पात) उद्योग सबसे आगे थे; 1840 के बाद रेल से लोहा-इस्पात उद्योग बढ़ा।
- नए उद्योग पुराने उद्योगों की जगह जल्दी नहीं ले पाए। 1840 के दशक के ब्रिटेन में भी ज़्यादातर मज़दूर पारंपरिक उद्योगों में थे।
- "पारंपरिक" कामों में भी बदलाव छोटे-छोटे सुधारों से आया।
- नई तकनीक धीरे फैली। जेम्स वॉट ने मैथ्यू बोल्टन के साथ भाप इंजन को बेहतर बनाया (पेटेंट 1781), पर उद्योगपति महँगे इंजन ख़रीदने में हिचकते थे। 1871 तक भी हाथ और पानी की ताक़त आम थी।
हाथ का श्रम और भाप की ताक़त
विक्टोरियन ब्रिटेन में मज़दूरों की कमी नहीं थी। ग़रीब किसान काम की तलाश में शहर आते थे, इसलिए मज़दूरी कम थी। सस्ता हाथ का श्रम हो तो उद्योगपति महँगी मशीनें क्यों ख़रीदें?
- कई उद्योग मौसमी थे (गैस कारख़ाने, शराब कारख़ाने, जिल्दसाज़ी, जहाज़ मरम्मत), तो मालिक मौसम भर के लिए मज़दूर रखते थे।
- कई सामान में हाथ का हुनर चाहिए था: 19वीं सदी के बीच ब्रिटेन में 500 तरह के हथौड़े और 45 तरह की कुल्हाड़ियाँ बनती थीं।
- ऊँचे वर्ग के लोग हाथ का बना सामान शान की निशानी मानते थे; मशीन का सामान उपनिवेशों को भेजा जाता।
मज़दूरों की ज़िंदगी
नौकरी दोस्तों और रिश्तेदारों की पहचान से मिलती। कई लोग हफ़्तों पुलों के नीचे या रैन-बसेरों में इंतज़ार करते। मौसमी काम से लंबे समय बेरोज़गारी रहती। 19वीं सदी की शुरुआत में असली मज़दूरी थोड़ी बढ़ी, पर बुरे सालों में शहरों के लगभग 10% लोग बहुत ग़रीब थे। जब स्पिनिंग जेनी (जेम्स हारग्रीव्ज़, 1764) आई, तो हाथ से कातकर जीने वाली महिलाओं ने काम छिनने के डर से मशीनों पर हमला किया। 1840 के बाद सड़क, रेल और स्टेशन बनने से ज़्यादा काम मिला।
उपनिवेशों में औद्योगीकरण
भारतीय कपड़े का दौर
मशीन उद्योग से पहले भारत का रेशमी और सूती माल दुनिया के बाज़ारों पर छाया था। मोटा सूती कपड़ा कई देशों में बनता था, पर भारत का महीन कपड़ा हर जगह चाहा जाता। आर्मेनियाई और फ़ारसी सौदागर पंजाब से अफ़ग़ानिस्तान और मध्य एशिया तक सामान ले जाते; सूरत (गुजरात), मसूलीपट्टनम (कोरोमंडल) और हुगली (बंगाल) जैसे बंदरगाह खाड़ी, लाल सागर और दक्षिण-पूर्व एशिया से व्यापार करते। 1750 के दशक तक भारतीय सौदागरों का यह जाल यूरोपीय कंपनियों की बढ़ती ताक़त से टूटने लगा।
बुनकरों का क्या हुआ
1760–70 के दशक में राजनीतिक ताक़त मिलने के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी बुनकरों पर सीधा क़ाबू चाहती थी। उसने वेतन पर गुमाश्ते रखे, जो बुनकरों की निगरानी करते, कपड़ा इकट्ठा करते और गुणवत्ता जाँचते। बुनकरों को पेशगी (एडवांस) दी जाती और फिर उन्हें सिर्फ़ कंपनी को कम दाम पर बेचना पड़ता। कई गुमाश्ते बाहरी थे और बुनकरों को सज़ा देते। कर्नाटक और बंगाल में बुनकर गाँव छोड़कर भागे या विद्रोह किया।
मैनचेस्टर भारत आया
1800 की शुरुआत तक भारत का कपड़ा निर्यात तेज़ी से गिरा (सूती कपड़े का हिस्सा लगभग 1811–12 में 33% से 1850–51 तक लगभग 3%)। ब्रिटिश निर्माताओं ने सरकार पर दबाव डाला कि ब्रिटेन में भारतीय कपड़े पर टैक्स लगे और उनका कपड़ा भारत में बिके। बुनकरों पर दोहरी मार पड़ी: निर्यात बाज़ार ढह गया और घरेलू बाज़ार में सस्ता मैनचेस्टर कपड़ा भर गया। कच्ची कपास ब्रिटेन जाती थी, तो अच्छी कपास महँगी हो गई। 1860 के दशक में अमेरिकी गृहयुद्ध से कपास और महँगी हुई। बाद में भारतीय फ़ैक्टरियों ने भी उनसे मुक़ाबला किया।
भारत में फ़ैक्टरियाँ
बंबई में पहली कॉटन मिल 1854 में बनी; 1862 तक चार मिलें चल रही थीं। बंगाल में पहली जूट मिल 1855 में लगी। 1860 के दशक में कानपुर में एल्गिन मिल और अहमदाबाद की पहली कॉटन मिल बनी; 1874 तक मद्रास में पहली कताई-बुनाई मिल चालू हुई।
शुरुआती उद्योगपति
कई ने चीन व्यापार (चीन को अफ़ीम, इंग्लैंड को चाय) से पैसा कमाया। बंगाल में द्वारकानाथ टैगोर ने 1830–40 के दशक में संयुक्त उद्यम कंपनियाँ बनाईं। बंबई में दिनशॉ पेटिट और जमशेदजी नुसरवानजी टाटा जैसे पारसियों ने बड़े उद्योग खड़े किए; टाटा ने 1912 में जमशेदपुर में लोहा-इस्पात कारख़ाना लगाया। मारवाड़ी सेठ हुकुमचंद ने 1917 में कलकत्ता में पहली भारतीय जूट मिल लगाई। पर बहुत सा उद्योग यूरोपीय मैनेजिंग एजेंसियों (बर्ड हीगलर्स, एंड्रयू यूल, जार्डीन स्किनर) के हाथ में था।
मज़दूर कहाँ से आए?
ज़्यादातर पास के ज़िलों से; बंबई में बहुत से रत्नागिरि से। नौकरी पाना मुश्किल था। उद्योगपति एक जॉबर रखते, आमतौर पर पुराना भरोसेमंद मज़दूर, जो अपने गाँव से लोग लाता, उन्हें बसाता, और बाद में पैसे व तोहफ़े माँगता और उनकी ज़िंदगी पर क़ाबू रखता।
औद्योगिक विकास की ख़ास बातें
शुरुआती भारतीय मिलें कपड़े की बजाय मोटा धागा (चीन को निर्यात के लिए) बनाती थीं। 1905 से स्वदेशी आंदोलन में राष्ट्रवादियों ने विदेशी कपड़े के बहिष्कार को कहा। पहले विश्व युद्ध में ब्रिटिश मिलें युद्ध का सामान बनाने में लगी थीं, तो भारतीय मिलों ने देश के बाज़ार और सेना को माल दिया; इसके बाद मैनचेस्टर भारत में अपनी पुरानी जगह कभी नहीं पा सका। छोटे उद्योग भी बढ़े: 20वीं सदी में हथकरघा उत्पादन बढ़ा, क्योंकि फ़्लाई शटल (एक रस्सी खींचने से धागे को करघे के आर-पार ले जाने वाला यंत्र) से एक बुनकर ज़्यादा कपड़ा बना पाता।
वस्तुओं के लिए बाज़ार
नए सामान को ख़रीदार चाहिए थे। निर्माताओं ने विज्ञापनों से सामान को ज़रूरी और चाहने लायक़ दिखाया।
- लेबल: मैनचेस्टर के कपड़े के गट्ठरों पर "MADE IN MANCHESTER" लिखा होता, जो गुणवत्ता दिखाता। लेबल पर कृष्ण, सरस्वती जैसे भारतीय देवी-देवताओं की तस्वीरें भी होतीं, ताकि सामान जाना-पहचाना और शुभ लगे।
- कैलेंडर: देवताओं, राजाओं या बड़े लोगों की तस्वीरों वाले कैलेंडर घरों, दुकानों और चाय की दुकानों पर पूरे साल टँगे रहते, तो पढ़ न सकने वाले भी रोज़ ब्रांड देखते।
- राष्ट्रवादी संदेश: भारतीय निर्माताओं ने लिखा: "अगर तुम्हें देश की परवाह है, तो भारतीयों का बनाया सामान ख़रीदो"। विज्ञापन स्वदेशी संदेश का ज़रिया बने।
इस तरह उद्योग के साथ बेचने का नया तरीक़ा आया: सिर्फ़ सामान नहीं, तस्वीरें और विचार भी।
ख़ुद करके देखो
एक पेंसिल और धागा लो। 30 सेकंड उँगलियों से धागा ऐंठो: यह एक तकुआ है। अब सोचो कि एक पहिये से 8 या 16 पेंसिलें एक साथ घूमें: यही स्पिनिंग जेनी है। 3D के आख़िरी चरण में अंदाज़ा लगाओ कि 12 तकुए घंटे में कितने धागे देंगे, फिर स्लाइडर से जाँचो। अपने शहर में बने कपड़े के लिए एक लेबल भी बनाओ।
परीक्षा के लिए सुझाव
यह अध्याय आवधिक मूल्यांकन के लिए है। अक्सर पूछे जाते हैं: आदि-औद्योगीकरण का अर्थ, उद्योगपति हाथ का श्रम क्यों पसंद करते थे, गुमाश्ते और जॉबर की भूमिका, भारतीय बुनकरों की परेशानी, पहले विश्व युद्ध से भारतीय उद्योग को मदद, और विज्ञापनों की भूमिका। हर बात को कारण के साथ समझाओ।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- आदि-औद्योगीकरण = फ़ैक्टरी से पहले, सौदागर के नियंत्रण में गाँव के घरों में उत्पादन
- स्पिनिंग जेनी (1764, हारग्रीव्ज़): 1 पहिया → कई तकुए
- भाप इंजन: जेम्स वॉट ने बेहतर बनाया (पेटेंट 1781), मैथ्यू बोल्टन के साथ बेचा
- गुमाश्ता = बुनकरों पर नज़र रखने वाला कंपनी का वेतनभोगी; जॉबर = मिल मज़दूर लाने वाला
- बंबई की पहली कॉटन मिल 1854; बंगाल की पहली जूट मिल 1855
हल किए गए उदाहरण
1. 17वीं सदी के इंग्लैंड में सौदागर गाँवों की ओर क्यों गए?
शहरों में गिल्ड उत्पादन, दाम और नए लोगों के आने पर क़ाबू रखते थे, इसलिए सौदागर वहाँ काम नहीं बढ़ा सकते थे। गाँवों में ग़रीब किसान और कारीगर अतिरिक्त कमाई के लिए घर पर काम करने को तैयार थे।
2. 19वीं सदी के यूरोप में कुछ उद्योगपति मशीन की बजाय हाथ का श्रम क्यों पसंद करते थे?
1) मज़दूर सस्ते और बहुत थे। 2) मशीनें महँगी थीं और उनकी मरम्मत मुश्किल थी। 3) मौसमी काम में साल के कुछ हिस्से में ही मज़दूर चाहिए थे। 4) कई सामान में हुनर चाहिए था और ऊँचे वर्ग हाथ का बना सामान पसंद करते थे।
3. ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारतीय बुनकरों पर क़ाबू कैसे किया?
उसने बुनकरों की निगरानी और कपड़ा इकट्ठा करने के लिए गुमाश्ते रखे; पेशगी दी ताकि बुनकर सिर्फ़ कंपनी को तय कम दाम पर बेचें; और दूसरे व्यापारियों को उनसे ख़रीदने से रोका।
4. पहले विश्व युद्ध से भारतीय उद्योग को कैसे मदद मिली?
ब्रिटिश मिलें युद्ध का सामान बनाने में लगीं, तो मैनचेस्टर कपड़े का आयात घटा। भारतीय मिलों ने देश का बाज़ार और सेना का सामान (वर्दी, जूट के बोरे, तंबू) सँभाला। मैनचेस्टर भारत में अपनी पुरानी पकड़ कभी वापस नहीं पा सका।
आम गलतियाँ
- यह सोचना कि फ़ैक्टरियों ने हाथ का काम तुरंत ख़त्म कर दिया। बदलाव धीमा था; हाथ का श्रम लंबे समय तक आम रहा।
- गुमाश्ता (बुनकरों पर कंपनी का एजेंट) और जॉबर (मिल मज़दूर लाने वाला) को मिलाना।
- यह लिखना कि बंबई की पहली कॉटन मिल 1917 में बनी। वह 1854 में बनी; 1917 में सेठ हुकुमचंद की कलकत्ता जूट मिल बनी।
- यह सोचना कि विज्ञापन सिर्फ़ सामान के बारे में बताते थे। वे तस्वीरों और देशप्रेम से सामान की चाह भी जगाते थे।