पहली छपी किताबें: पूर्वी एशिया और यूरोप में मुद्रण
चीन
सबसे पहली छपाई चीन, जापान और कोरिया में हाथ से हुई: वुडब्लॉक (लकड़ी के ठप्पे) की छपाई। लगभग 594 ई. से खुदे हुए लकड़ी के ठप्पों पर स्याही लगाकर उस पर काग़ज़ रगड़कर किताबें छापी जाती थीं। पतले काग़ज़ के दोनों ओर छपाई नहीं हो सकती थी, इसलिए चीन की पारंपरिक "अकॉर्डियन किताब" मोड़कर सिली जाती थी। चीन में सिविल सेवा परीक्षा से चुने जाने वाले बड़े नौकरशाही तंत्र के लिए बहुत सी पाठ्यपुस्तकें छपती थीं। 17वीं सदी तक शहरी संस्कृति बढ़ी, तो व्यापारी, विद्वान और अमीर महिलाएँ कहानियाँ, कविता और नाटक पढ़ने लगे। 19वीं सदी के आख़िर में शंघाई पश्चिमी ढंग की छपाई का केंद्र बना।
जापान
लगभग 768–770 ई. में चीन के बौद्ध प्रचारक छपाई की तकनीक जापान लाए। जापान की सबसे पुरानी किताब 868 ई. में छपी बौद्ध डायमंड सूत्र है: छह पन्नों का पाठ और लकड़ी पर खुदे चित्र। 18वीं सदी में एदो (बाद में टोक्यो) की चित्रमय किताबों में शहर की ज़िंदगी दिखती थी; चित्रकार कितागावा उतामारो (जन्म 1753) "उकियो" ("तैरती दुनिया के चित्र") के लिए प्रसिद्ध थे।
यूरोप में छपाई
1295 में मार्को पोलो चीन से इटली लौटे और वुडब्लॉक छपाई का ज्ञान लाए। इटली और फिर दूसरे देशों में ठप्पों से छपाई होने लगी। अमीरों के लिए शानदार किताबें अब भी वेलम (जानवर की खाल) पर हाथ से लिखी जाती थीं। हाथ की पांडुलिपियाँ बढ़ती माँग पूरी नहीं कर सकती थीं: नक़ल धीमी, महँगी और नाज़ुक थी।
गुटेनबर्ग और प्रिंटिंग प्रेस
योहान गुटेनबर्ग स्ट्रासबर्ग के एक सौदागर के बेटे थे, जो बड़े खेत पर पले और शराब व जैतून की प्रेस देखते हुए बड़े हुए। 1448 तक उन्होंने पहली ज्ञात प्रिंटिंग प्रेस बनाई। इसमें धातु के चल टाइप थे (धातु में ढले अलग-अलग अक्षर, जिन्हें जोड़कर दोबारा इस्तेमाल किया जा सके)। उनकी पहली छपी किताब बाइबिल थी: लगभग तीन साल में करीब 180 प्रतियाँ, जो उस समय के लिए तेज़ था। शुरुआती छपी किताबें पांडुलिपि जैसी दिखती थीं: किनारे और चित्र हाथ से रँगे जाते। 1450 से 1550 के बीच यूरोप के ज़्यादातर देशों में प्रेस लग गईं।
मुद्रण क्रांति और उसका असर
मुद्रण क्रांति सिर्फ़ किताब बनाने का नया तरीक़ा नहीं थी; इसने लोगों की ज़िंदगी, जानकारी और ज्ञान से उनका रिश्ता, और संस्थाओं व सत्ता से उनका रिश्ता बदल दिया।
नया पाठक वर्ग
किताबें सस्ती और आम हुईं और नया पाठक वर्ग बना। पहले ज़्यादातर लोग धार्मिक ग्रंथ सुनते, गाथाएँ और लोककथाएँ सुनते थे। अब छापने वालों ने चित्रों वाली किताबें और ऐसी गाथाएँ-कहानियाँ छापीं जिन्हें गाकर या पढ़कर सुनाया जा सके, तो न पढ़ सकने वाले भी जुड़ गए। मौखिक और पढ़ने की संस्कृति आपस में मिल गई।
धार्मिक बहस और छपाई का डर
हर किसी ने छपाई का स्वागत नहीं किया। 1517 में धर्म सुधारक मार्टिन लूथर ने रोमन कैथोलिक चर्च की कई प्रथाओं की आलोचना करते हुए पिचानवे स्थापनाएँ लिखीं। ये बड़ी संख्या में छपीं और खूब पढ़ी गईं; इससे प्रोटेस्टेंट धर्म सुधार हुआ। लूथर ने छपाई को ईश्वर का सबसे बड़ा उपहार कहा। 16वीं सदी के इटली में मेनोकियो नाम के एक चक्की वाले ने किताबें पढ़कर ईश्वर और सृष्टि पर अपने विचार बनाए; चर्च की धर्म-अदालत (इनक्विज़िशन) ने उसे मौत की सज़ा दी। 1558 से चर्च ने प्रतिबंधित किताबों की सूची रखनी शुरू की।
पढ़ने का जुनून
17वीं और 18वीं सदी में यूरोप में साक्षरता बढ़ी। चर्चों ने गाँवों में स्कूल खोले। इंग्लैंड में फेरीवाले चैपबुक (छोटी सस्ती जेबी किताबें) बेचते; फ़्रांस में "बिब्लियोथीक ब्ल्यू" नीले कवर वाली, सस्ते काग़ज़ पर छपी छोटी किताबें थीं। पंचांग, प्रेम-कहानियाँ, गाथाएँ और अख़बार छपते। आइज़क न्यूटन जैसे वैज्ञानिकों ने खोजें छापीं, और टॉमस पेन, वॉल्तेयर और रूसो जैसे विचारक बहुत लोगों तक पहुँचे।
'ओ निरंकुश शासको, काँपो!'
बहुतों को लगा कि छपाई ज्ञानोदय के विचार फैलाकर निरंकुशता को हराएगी। 18वीं सदी के फ़्रांसीसी उपन्यासकार लुई-सेबास्टियन मर्सिए ने प्रिंटिंग प्रेस को प्रगति का सबसे ताक़तवर इंजन कहा।
मुद्रण संस्कृति और फ़्रांसीसी क्रांति
इतिहासकार तीन तरीक़े बताते हैं: (1) छपाई ने परंपरा, अंधविश्वास और निरंकुशता पर हमला करने वाले ज्ञानोदय के विचारकों के विचार फैलाए; (2) इसने संवाद और बहस की नई संस्कृति बनाई, जहाँ मूल्यों और रिवाज़ों पर सवाल उठे; (3) 1780 के दशक तक बहुत से कार्टून और लेख राजशाही का मज़ाक उड़ाते और उसे अनैतिक दिखाते थे। पर छपाई सीधे दिमाग़ नहीं बदलती; लोग चुनकर पढ़ते और अपना अर्थ निकालते थे।
उन्नीसवीं सदी
- बच्चे: 19वीं सदी के आख़िर में प्राथमिक शिक्षा अनिवार्य हुई। 1857 में फ़्रांस में बच्चों की प्रेस बनी। ग्रिम बंधुओं ने लोककथाएँ जुटाकर छापीं और जो हिस्से उन्हें ठीक न लगे, हटा दिए।
- महिलाएँ: महत्वपूर्ण पाठक और लेखक बनीं। महिलाओं के लिए पेनी पत्रिकाएँ निकलीं; जेन ऑस्टिन, ब्रॉन्टे बहनें और जॉर्ज एलियट प्रसिद्ध उपन्यासकार थीं।
- मज़दूर: किराए के पुस्तकालयों से क्लर्क, कारीगर और निम्न-मध्य वर्ग के लोग पढ़े। कुछ मज़दूरों ने राजनीतिक और आत्मकथात्मक रचनाएँ लिखीं।
और नई खोजें
18वीं सदी के आख़िर तक प्रेस धातु की बनने लगीं। 19वीं सदी के बीच न्यूयॉर्क के रिचर्ड एम. हो ने बिजली से चलने वाली बेलनाकार प्रेस बनाई, जो घंटे में लगभग 8,000 पन्ने छापती; यह अख़बारों के लिए बढ़िया थी। ऑफ़सेट प्रेस छह रंग तक छाप सकती थी। बिजली से काम और तेज़ हुआ। प्रकाशकों ने सस्ती किताबें बेचीं: किस्तों में उपन्यास, सस्ती शृंखलाएँ (शिलिंग सीरीज़), जिल्द पर कवर, और 1930 की मंदी में सस्ते पेपरबैक।
भारत और मुद्रण की दुनिया
छपाई से पहले की पांडुलिपियाँ
भारत में संस्कृत, अरबी, फ़ारसी और भारतीय भाषाओं में हाथ से लिखी पांडुलिपियों की समृद्ध परंपरा थी, जो ताड़ के पत्तों या हाथ के बने काग़ज़ पर लिखी और अक्सर सुंदर चित्रों से सजी होतीं। पर वे महँगी और नाज़ुक थीं। बंगाल की गाँव की पाठशालाओं में बच्चे लिखना सीखते, पर ज़्यादातर बच्चे पांडुलिपियाँ नहीं पढ़ते थे।
भारत में छपाई का आना
16वीं सदी के बीच पुर्तगाली मिशनरियों के साथ पहली प्रिंटिंग प्रेस गोवा आई। जेसुइट पादरियों ने कोंकणी सीखी और पर्चे छापे; 1674 तक कोंकणी और कन्नड़ में लगभग 50 किताबें छप चुकी थीं। कैथोलिक पादरियों ने 1579 में कोचीन में पहली तमिल किताब और 1713 में पहली मलयालम किताब छापी। अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कंपनी 17वीं सदी के आख़िर से प्रेस मँगाने लगी।
1780 से जेम्स ऑगस्टस हिकी ने बंगाल गज़ट नाम का साप्ताहिक निकाला, जो ख़ुद को सबके लिए खुला पर किसी के प्रभाव से मुक्त बताता था। उसने कंपनी के अफ़सरों पर गपशप छापी; गवर्नर-जनरल वॉरेन हेस्टिंग्स ने उसे परेशान किया और सरकार-समर्थित अख़बारों को बढ़ावा दिया। पहला भारतीय अख़बार गंगाधर भट्टाचार्य का साप्ताहिक बंगाल गज़ट था, जो राममोहन राय के क़रीबी थे।
धार्मिक सुधार और सार्वजनिक बहस
19वीं सदी की शुरुआत से धर्म पर तीखी बहसें हुईं। कुछ लोगों ने सती, बाल विवाह, मूर्ति पूजा और विधवा विवाह पर रोक जैसी प्रथाओं की आलोचना की; दूसरों ने सुधारकों का विरोध किया। छपे पर्चों और अख़बारों ने आम बोलचाल की भाषा में दोनों पक्ष फैलाए। राममोहन राय ने 1821 से संवाद कौमुदी निकाला; रूढ़िवादी हिंदुओं ने समाचार चंद्रिका से जवाब दिया। 1822 में फ़ारसी अख़बार जाम-ए-जहाँ नामा और शम्सुल अख़बार और गुजराती बंबई समाचार शुरू हुए। देवबंद सेमिनरी (1867 में बनी) के मुसलमान विद्वानों ने हज़ारों फ़तवे छापे जो बताते थे कि कैसे जिएँ। हिंदुओं में तुलसीदास के रामचरितमानस (16वीं सदी का ग्रंथ) का पहला छपा संस्करण 1810 में कलकत्ता से आया और सस्ते संस्करण कई घरों तक पहुँचे। छपाई ने भारत के अलग-अलग समुदायों को भी जोड़ा।
प्रकाशन के नए रूप
उपन्यास, गीत, कहानियाँ और सामाजिक-राजनीतिक विषयों पर लेख बढ़े। चित्र-संस्कृति बढ़ी: राजा रवि वर्मा ने बड़ी संख्या में छपने वाले चित्र बनाए; सस्ते छपे चित्र और कैलेंडर घरों में टँगने लगे। 1870 के दशक तक पत्रिकाओं में कार्टून और व्यंग्य-चित्र सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर टिप्पणी करने लगे।
महिलाएँ और छपाई
उदार परिवारों ने महिलाओं को पढ़ाया; कुछ रूढ़िवादी इससे डरते थे। पूर्वी बंगाल की गृहिणी राशसुंदरी देवी ने रसोई में छिपकर पढ़ना सीखा और अपनी आत्मकथा आमार जीबन (1876) लिखी, जो बांग्ला में पहली पूरी आत्मकथा थी। 1860 के दशक से कैलाशबाशिनी देवी जैसी महिलाओं ने महिलाओं की तकलीफ़ों पर लिखा। महाराष्ट्र में ताराबाई शिंदे और पंडिता रमाबाई ने ऊँची जाति की हिंदू महिलाओं, ख़ासकर विधवाओं, की दुखभरी ज़िंदगी पर लिखा। 1870 के दशक से हिंदी छपाई बढ़ी; राम चड्ढा की इस्त्री धर्म विचार ने महिलाओं को आज्ञाकारी पत्नी बनना सिखाया। बंगाल में मध्य कलकत्ता का बटाला इलाक़ा सस्ती किताबें छापता था, जिनमें से कई महिलाओं के लिए थीं।
छपाई और ग़रीब लोग
19वीं सदी में मद्रास के शहरों के चौराहों पर बहुत सस्ती छोटी किताबें बिकती थीं; सार्वजनिक पुस्तकालय खुले। मराठा सुधारक ज्योतिबा फुले ने गुलामगिरी (1871) में जाति के अन्याय पर लिखा। 20वीं सदी में महाराष्ट्र में बी.आर. आंबेडकर और मद्रास में ई.वी. रामास्वामी नायकर (पेरियार) ने जाति पर ज़ोरदार लिखा। कानपुर के मिल मज़दूर काशीबाबा ने छोटे और बड़े का सवाल (1938) में जाति और वर्ग के शोषण पर लिखा। बंबई और दूसरी जगहों पर मज़दूरों ने पुस्तकालय बनाए।
छपाई और सेंसरशिप
1798 से पहले कंपनी सेंसरशिप से ज़्यादा चिंतित नहीं थी। 1857 के विद्रोह के बाद रवैया बदला। 1878 में आयरलैंड के प्रेस कानूनों जैसा वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट बना, जिससे सरकार को भारतीय भाषाओं के अख़बारों की ख़बरें और संपादकीय सेंसर करने के बड़े अधिकार मिले। अख़बार राजद्रोही लगे तो प्रेस ज़ब्त हो सकती थी और मशीनें छीनी जा सकती थीं। फिर भी राष्ट्रवादी अख़बार बढ़े। 1907 में पंजाब के क्रांतिकारियों को देश निकाला मिला तो बाल गंगाधर तिलक ने अपने अख़बार केसरी में उनके प्रति सहानुभूति से लिखा; 1908 में उन्हें जेल हुई, जिससे पूरे देश में विरोध हुआ।
ख़ुद करके देखो
आलू की छपाई करो: एक आलू आधा काटो, उस पर कोई आसान अक्षर या आकार खोदो (चाकू के लिए किसी बड़े की मदद लो), स्याही या रंग में डुबोकर काग़ज़ पर पाँच बार दबाओ। देखो: खोदने में समय लगता है, पर उसके बाद हर प्रति जल्दी बनती है। यही वुडब्लॉक छपाई का विचार है। याद रखो: सीधा खोदा अक्षर उल्टा छपता है! 3D के आख़िरी चरण में स्लाइडर खिसकाने से पहले अंदाज़ा लगाओ कि प्रेस 8 घंटे में कितने पन्ने छापेगी।
परीक्षा के लिए सुझाव
अक्सर पूछे जाते हैं: 1295 के बाद वुडब्लॉक छपाई यूरोप कैसे पहुँची, गुटेनबर्ग की प्रेस, धर्म सुधार पर छपाई का असर, कुछ लोग छपाई से क्यों डरते थे, छपाई ने फ़्रांसीसी क्रांति में कैसे मदद की, वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट, भारत में सुधार-बहस और महिलाओं को छपाई से मदद, और पांडुलिपियाँ ज़्यादा क्यों नहीं चलीं। हर बात के साथ एक उदाहरण दो।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- वुडब्लॉक छपाई: चीन लगभग 594 ई. से; डायमंड सूत्र, जापान, 868 ई.
- गुटेनबर्ग प्रेस (1448 तक): धातु के चल टाइप; बाइबिल ~180 प्रतियाँ
- मुद्रण क्रांति = सस्ती किताबें + नए पाठक + नए विचार + बहस
- लूथर की 95 स्थापनाएँ (1517) → धर्म सुधार; चर्च की प्रतिबंधित किताबों की सूची (1558)
- भारत: गोवा प्रेस (16वीं सदी) → बंगाल गज़ट (1780) → वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट (1878)
हल किए गए उदाहरण
1. पांडुलिपियाँ किताबों की बढ़ती माँग क्यों पूरी नहीं कर सकीं?
हाथ से नक़ल धीमी, मेहनत वाली और महँगी थी। पांडुलिपियाँ नाज़ुक थीं, सँभालने में मुश्किल थीं और आसानी से ले जाई नहीं जा सकती थीं। इसलिए बहुत से पाठकों के लिए बड़ी संख्या में नहीं बन सकती थीं।
2. छपाई ने प्रोटेस्टेंट धर्म सुधार में कैसे मदद की?
लूथर की पिचानवे स्थापनाएँ (1517) बड़ी संख्या में छपीं और खूब पढ़ी गईं। उनके न्यू टेस्टामेंट अनुवाद की 5,000 प्रतियाँ कुछ हफ़्तों में बिक गईं। इससे चर्च की आलोचना तेज़ी से फैली और चर्च में फूट पड़ी।
3. कुछ लोग छपाई के फैलने से क्यों डरते थे?
धार्मिक सत्ता और राजाओं को डर था कि छपाई पर क़ाबू न रहा तो विद्रोही और अधार्मिक विचार फैलेंगे और क़ीमती साहित्य नष्ट होगा। चर्च ने प्रतिबंधित किताबों की सूची रखी और मेनोकियो जैसे लोगों को सज़ा दी।
4. वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट क्या था?
1878 का कानून, आयरलैंड के प्रेस कानूनों पर आधारित, जिससे अंग्रेज़ी सरकार को भारतीय भाषाओं के अख़बार सेंसर करने के बड़े अधिकार मिले। कोई ख़बर राजद्रोही लगी तो अख़बार को चेतावनी और उसकी प्रेस व मशीनें ज़ब्त हो सकती थीं।
आम गलतियाँ
- यह कहना कि गुटेनबर्ग ने छपाई का आविष्कार किया। छपाई चीन में शुरू हुई; गुटेनबर्ग ने यूरोप में धातु के चल टाइप वाली प्रेस बनाई।
- हिकी के बंगाल गज़ट (1780, अंग्रेज़ी) को गंगाधर भट्टाचार्य के बंगाल गज़ट (पहला भारतीय अख़बार) से मिलाना।
- यह सोचना कि छपाई ने सीधे क्रांतियाँ कर दीं। इसने विचार और बहस फैलाई; लोग चुनकर पढ़ते थे।
- वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट का वर्ष 1857 लिखना। वह 1878 था; 1857 विद्रोह का वर्ष है।