CBSE कक्षा 10 सामाजिक विज्ञान (087)
अध्याय: 4
1. इतिहास: भारत और समकालीन विश्व – II
यूरोप में राष्ट्रवाद का उदय · भारत में राष्ट्रवाद · वैश्विक दुनिया का बनना · औद्योगीकरण का युग · मुद्रण संस्कृति और आधुनिक दुनिया
- यूरोप में राष्ट्रवाद का उदय – 1789 से पहले यूरोप कई छोटे राज्यों में बँटा था और लोग राजा के वफ़ादार थे। फ़्रांसीसी क्रांति ने कहा कि सत्ता जनता की है और जनता मिलकर एक राष्ट्र है। नेपोलियन ने बराबरी वाले कानून फैलाए। 1815 में राजा लौटे, पर उदारवादी, लेखक और भूखे आम लोग 1830 और 1848 में उठ खड़े हुए। कई छोटे राज्य जोड़कर इटली (1861) और जर्मनी (1871) बने। राष्ट्र को मारियान और जर्मेनिया जैसी स्त्री-आकृतियों से दिखाया गया। 1914 तक राष्ट्रवाद साम्राज्यवाद से जुड़ गया और बाल्कन का तनाव पहले विश्व युद्ध तक ले गया।
- भारत में राष्ट्रवाद – पहले विश्व युद्ध से भारत में टैक्स, महँगाई और ज़बरदस्ती भर्ती बढ़ी। गांधीजी के सत्याग्रह (सच और अहिंसा) ने चंपारण, खेड़ा और अहमदाबाद में जीत पाई। रॉलट एक्ट और जलियाँवाला बाग़ के बाद कांग्रेस ने ख़िलाफ़त का साथ दिया और 1920 में असहयोग शुरू किया; शहर, किसान, आदिवासी और बाग़ान मज़दूर अपने-अपने तरीक़े से जुड़े। चौरी चौरा के बाद 1922 में यह रुका। 1930 में नमक यात्रा से सविनय अवज्ञा शुरू हुई: अमीर-ग़रीब किसान, व्यापारी, मज़दूर और महिलाएँ जुड़े, पर कई दलित और मुसलमान दूर रहे। गीतों, भारत माता, लोककथाओं, झंडों और इतिहास ने सामूहिक अपनेपन का भाव बनाया।
- वैश्विक दुनिया का बनना – लोग, सामान, विचार और बीमारियाँ हज़ारों साल से दुनिया में घूम रहे हैं: रेशम मार्ग पर, आलू-मक्का जैसी फ़सलों के साथ और चेचक जैसी बीमारियों के साथ। 1815 से 1914 के बीच विश्व अर्थव्यवस्था तीन धाराओं से बढ़ी: माल, मज़दूर और पूँजी; रेल, भाप के जहाज़ और ठंडे जहाज़ों ने मदद की। उपनिवेशों ने क़ीमत चुकाई: अफ़्रीका में रिंडरपेस्ट और भारत से गिरमिटिया मज़दूर। पहले विश्व युद्ध के बाद अमेरिका में बड़े पैमाने पर उत्पादन और फिर 1929 की महामंदी आई, जिसने भारत के किसानों को बहुत चोट पहुँचाई। 1945 के बाद ब्रेटन वुड्स व्यवस्था, IMF और विश्व बैंक ने दुनिया की अर्थव्यवस्था फिर से खड़ी की।
- औद्योगीकरण का युग – फ़ैक्टरी से पहले सौदागर गाँव के परिवारों को कच्चा माल देते थे और वे घर पर कातते-बुनते थे (आदि-औद्योगीकरण)। 1760 के दशक से ब्रिटेन में कॉटन मिलें, स्पिनिंग जेनी जैसी मशीनें और जेम्स वॉट का बेहतर भाप इंजन आए। बदलाव धीमा था: हाथ का श्रम सस्ता और आम रहा। भारत के बुनकर पहले दुनिया भर को कपड़ा देते थे; ईस्ट इंडिया कंपनी ने गुमाश्तों के ज़रिए उन पर क़ब्ज़ा किया और बाद में मैनचेस्टर का कपड़ा भारत में भर गया। 1854 से बंबई और दूसरी जगहों पर भारतीय मिलें बनीं और छोटे कारख़ाने भी बढ़े। सामान बेचने के लिए लेबल, कैलेंडर और विज्ञापन आए, और स्वदेशी विज्ञापनों ने देशप्रेम जगाया।
- मुद्रण संस्कृति और आधुनिक दुनिया – छपाई चीन में लकड़ी के ठप्पों से शुरू हुई और जापान व कोरिया पहुँची। यूरोप में गुटेनबर्ग की धातु के चल टाइप वाली प्रेस (1430 का दशक) ने किताबें तेज़ और सस्ती बनाईं। इस मुद्रण क्रांति से नए पाठक बने, लूथर का विरोध और ज्ञानोदय के विचार फैले और फ़्रांसीसी क्रांति का माहौल बना; चर्च और राजाओं ने सेंसर लगाने की कोशिश की। 19वीं सदी में बच्चे, महिलाएँ और मज़दूर पाठक बने। भारत में छपाई गोवा में पुर्तगाली मिशनरियों के साथ आई; 1780 से अख़बार, धार्मिक बहस, सुधार, महिलाओं का लेखन और जाति-विरोध सामने आए, और अंग्रेज़ों ने 1878 के वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट से प्रेस पर क़ाबू की कोशिश की।
2. भूगोल: समकालीन भारत – II
संसाधन एवं विकास · वन और वन्य जीव संसाधन · जल संसाधन · कृषि · खनिज तथा ऊर्जा संसाधन · विनिर्माण उद्योग · राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की जीवन रेखाएँ
- संसाधन एवं विकास – संसाधन प्रकृति की वह चीज़ है जिसे लोग तकनीक की मदद से उपयोग कर सकें। संसाधनों को उत्पत्ति, ख़त्म होने, स्वामित्व और विकास के आधार पर बाँटा जाता है। भारत को संसाधनों का नियोजन करना, ज़मीन की देखभाल करना और मिट्टी को बहने से बचाना ज़रूरी है।
- वन और वन्य जीव संसाधन – वन बहुत सारे पौधों और जानवरों (जैव विविधता) का घर हैं और इंसानों का जीवन भी चलाते हैं। खेती, खनन, बाँध और उद्योगों से बहुत वन कटे और कई जातियाँ ख़त्म होने लगीं। भारत क़ानूनों, राष्ट्रीय उद्यानों और प्रोजेक्ट टाइगर से इनकी रक्षा करता है, और चिपको, पवित्र उपवन और संयुक्त वन प्रबंधन जैसे कामों में समुदायों की बड़ी भूमिका है।
- जल संसाधन – धरती का लगभग सारा पानी खारा समुद्री पानी है; उपयोग लायक मीठा पानी बहुत थोड़ा है। बढ़ती आबादी, खेती, उद्योग और प्रदूषण से जल दुर्लभता होती है। बहुउद्देशीय बाँध कई कामों के लिए पानी रोकते हैं पर समस्याएँ भी लाते हैं। वर्षा जल संग्रहण पानी बचाने का पुराना और आसान तरीका है।
- कृषि – कृषि यानी फ़सलें उगाना और पशु पालना। भारत में छोटे पारिवारिक खेतों से लेकर बड़े वाणिज्यिक खेत और बाग़ान तक हैं। फ़सलें तीन ऋतुओं में उगती हैं: ख़रीफ़, रबी और ज़ायद। हर मुख्य फ़सल को अपनी बारिश, तापमान और मिट्टी चाहिए। सरकार ने किसानों की मदद के लिए सुधार किए हैं।
- खनिज तथा ऊर्जा संसाधन – खनिज चट्टानों में मिलने वाले प्राकृतिक पदार्थ हैं। ये धात्विक (लौह या अलौह), अधात्विक या ऊर्जा खनिज होते हैं। ऊर्जा पारंपरिक स्रोतों (कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस, बिजली) और गैर-पारंपरिक स्रोतों (सूर्य, पवन, परमाणु, बायोगैस, ज्वार, भूतापीय) से मिलती है। दोनों का संरक्षण ज़रूरी है।
- विनिर्माण उद्योग – विनिर्माण कच्चे माल को ज़्यादा क़ीमती चीज़ों में बदलता है। यह रोज़गार देता है, खेती पर निर्भरता घटाता है और निर्यात से पैसा कमाता है। उद्योगों को कच्चे माल, भूमिका, पूँजी, स्वामित्व और भार के आधार पर बाँटा जाता है। उनकी जगह कच्चे माल, बिजली, श्रम, पूँजी, परिवहन और बाज़ार पर निर्भर है। उद्योग हवा, पानी, ज़मीन को प्रदूषित करते और शोर करते हैं, पर इसे रोका जा सकता है।
- राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की जीवन रेखाएँ – परिवहन, संचार और व्यापार उत्पादकों को उपभोक्ताओं से जोड़ते हैं और देश को एक करते हैं, जैसे शरीर में नसें। भारत में सड़कें, रेल, पाइपलाइन, जलमार्ग, पत्तन और वायुमार्ग हैं। संचार संदेश पहुँचाता है; व्यापार देश के अंदर और देशों के बीच सामान का लेन-देन है। पर्यटन भी एक व्यापार है जो पैसा और रोज़गार देता है।
3. राजनीति विज्ञान: लोकतांत्रिक राजनीति – II
सत्ता की साझेदारी · संघवाद · जाति, धर्म और लैंगिक मसले · राजनीतिक दल · लोकतंत्र के परिणाम
- सत्ता की साझेदारी – सत्ता की साझेदारी का मतलब है कि सारी ताकत किसी एक व्यक्ति या समूह के पास न हो। बेल्जियम ने भाषा-समूहों में सत्ता बाँटी और देश एक रहा। श्रीलंका में बहुसंख्यक समूह ने सत्ता पर कब्ज़ा किया और गृहयुद्ध हुआ। लोकतंत्र में सत्ता सरकार के अंगों, स्तरों, सामाजिक समूहों और दलों में बँटती है।
- संघवाद – संघवाद वह व्यवस्था है जिसमें सत्ता केंद्र सरकार और राज्य (व स्थानीय) सरकारों में बँटी होती है और हर स्तर के अधिकार संविधान तय करता है। भारत में कानून के विषय तीन सूचियों में बँटे हैं, सब भाषाओं का सम्मान है और 1992 से पंचायतों व नगरपालिकाओं को असली अधिकार मिले।
- जाति, धर्म और लैंगिक मसले – लिंग, धर्म और जाति के सामाजिक अंतर राजनीति में दिखते हैं। राजनीति अन्याय से लड़ने में मदद कर सकती है, जैसे महिलाओं के लिए आरक्षित सीटें। पर जब धर्म या जाति से लोगों को बाँटा जाता है, जैसे सांप्रदायिकता में, तो लोकतंत्र को नुकसान होता है। हमारा संविधान राज्य को धर्मनिरपेक्ष बनाता है और भेदभाव रोकता है।
- राजनीतिक दल – राजनीतिक दल ऐसे लोगों का समूह है जो चुनाव लड़ने और सत्ता पाने के लिए साथ आते हैं। दल सात मुख्य काम करते हैं, चुनाव लड़ने से लेकर लोगों को सरकारी योजनाओं से जोड़ने तक। भारत में राष्ट्रीय और राज्य दलों वाली बहुदलीय व्यवस्था है। दलों के सामने अंदरूनी लोकतंत्र की कमी, धनबल जैसी चुनौतियाँ हैं और कुछ सुधार हुए हैं।
- लोकतंत्र के परिणाम – लोकतंत्र को उसके नतीजों से परखते हैं। यह जवाबदेह, उत्तरदायी और वैध सरकार देता है और गरिमा व आज़ादी की रक्षा में सबसे अच्छा है। आर्थिक वृद्धि में यह तानाशाही जितना ही है। असमानता और गरीबी घटाने में इसने काफ़ी नहीं किया। जब बहुमत और अल्पमत बदलते रहें, तो यह सामाजिक मतभेद अच्छे से सँभालता है।
4. अर्थशास्त्र: आर्थिक विकास की समझ
विकास · भारतीय अर्थव्यवस्था के क्षेत्रक · मुद्रा और साख · वैश्वीकरण और भारतीय अर्थव्यवस्था · उपभोक्ता अधिकार (परियोजना)
- विकास – विकास का मतलब हर किसी के लिए अलग है: ज़्यादा आय, पर बराबरी, आज़ादी, सुरक्षा और सम्मान भी। देशों की तुलना प्रति व्यक्ति आय से होती है, पर औसत असमानता छिपा लेता है, इसलिए स्वास्थ्य और शिक्षा भी देखते हैं। मानव विकास सूचकांक इन्हें जोड़ता है। विकास धारणीय भी होना चाहिए ताकि संसाधन आने वाली पीढ़ियों तक बचें।
- भारतीय अर्थव्यवस्था के क्षेत्रक – आर्थिक गतिविधियाँ तीन क्षेत्रकों में बँटती हैं: प्राथमिक (प्रकृति का उपयोग), द्वितीयक (वस्तुएँ बनाना) और तृतीयक (सेवाएँ)। GDP अंतिम वस्तुओं और सेवाओं का मूल्य गिनता है। भारत में सबसे ज़्यादा उत्पादन तृतीयक क्षेत्रक का है, पर सबसे ज़्यादा रोज़गार प्राथमिक में, जहाँ छिपी बेरोज़गारी बहुत है। गतिविधियाँ संगठित-असंगठित और सार्वजनिक-निजी में भी बँटती हैं।
- मुद्रा और साख – मुद्रा विनिमय का माध्यम है जो आवश्यकताओं के दोहरे संयोग की ज़रूरत ख़त्म करती है। बैंक जमा लेते और कर्ज़ देते हैं। साख (ऋण) शर्तों के हिसाब से आगे बढ़ा भी सकती है या कर्ज़ में फँसा भी सकती है। बैंक और सहकारी समितियों के औपचारिक ऋण सस्ते और नियंत्रित हैं; साहूकारों के अनौपचारिक ऋण महँगे हैं। स्वयं सहायता समूह गरीब महिलाओं तक सस्ता ऋण पहुँचाते हैं।
- वैश्विक दुनिया का बनना – लोग, सामान, विचार और बीमारियाँ हज़ारों साल से दुनिया में घूम रहे हैं: रेशम मार्ग पर, आलू-मक्का जैसी फ़सलों के साथ और चेचक जैसी बीमारियों के साथ। 1815 से 1914 के बीच विश्व अर्थव्यवस्था तीन धाराओं से बढ़ी: माल, मज़दूर और पूँजी; रेल, भाप के जहाज़ और ठंडे जहाज़ों ने मदद की। उपनिवेशों ने क़ीमत चुकाई: अफ़्रीका में रिंडरपेस्ट और भारत से गिरमिटिया मज़दूर। पहले विश्व युद्ध के बाद अमेरिका में बड़े पैमाने पर उत्पादन और फिर 1929 की महामंदी आई, जिसने भारत के किसानों को बहुत चोट पहुँचाई। 1945 के बाद ब्रेटन वुड्स व्यवस्था, IMF और विश्व बैंक ने दुनिया की अर्थव्यवस्था फिर से खड़ी की।
- वैश्वीकरण और भारतीय अर्थव्यवस्था – वैश्वीकरण यानी व्यापार, निवेश, तकनीक और लोगों की आवाजाही से देशों की अर्थव्यवस्थाओं का तेज़ी से जुड़ना। बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ कई देशों में उत्पादन फैलाती हैं। नई तकनीक और उदारीकरण (व्यापार अवरोध हटाना, भारत में 1991 से) ने इसे संभव बनाया। WTO व्यापार के नियम बनाता है। वैश्वीकरण से कुछ को फ़ायदा, कुछ को नुकसान हुआ, इसलिए न्यायसंगत वैश्वीकरण चाहिए।
- उपभोक्ता अधिकार – उपभोक्ता वह है जो इस्तेमाल के लिए वस्तुएँ और सेवाएँ ख़रीदता है। विक्रेता कम तौल, मिलावट, ज़्यादा दाम या झूठे विज्ञापन से उपभोक्ता को ठग सकते हैं। उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम छह अधिकार देता है: सुरक्षा, सूचना, चुनाव, सुनवाई, निवारण और उपभोक्ता शिक्षा। गुणवत्ता चिह्न और तीन स्तर के उपभोक्ता आयोग न्याय दिलाने में मदद करते हैं।