कृषि के प्रकार
आदिम निर्वाह कृषि
छोटे टुकड़ों पर कुदाल और खुदाई की छड़ी जैसे सादे औज़ारों से। परिवार सिर्फ़ अपने लिए उगाता है। कर्तन-दहन (स्थानांतरी) कृषि में जंगल साफ़ करके जलाया जाता है; मिट्टी की उर्वरता घटने पर परिवार आगे बढ़ जाता है। उत्तर-पूर्व में इसे झूम कहते हैं।
गहन निर्वाह कृषि
जहाँ लोग ज़्यादा और ज़मीन कम। किसान ज़्यादा मेहनत, खाद और सिंचाई से छोटे खेतों से ज़्यादा उपज लेते हैं। ज़मीन बच्चों में बँटती रहती है, खेत छोटे होते जाते हैं।
वाणिज्यिक कृषि
फ़सल बेचने के लिए उगाई जाती है। अधिक उपज वाले बीज, रासायनिक खाद, कीटनाशक और मशीनें। चावल पंजाब-हरियाणा में वाणिज्यिक पर ओडिशा में निर्वाह फ़सल है।
रोपण कृषि
बड़े बाग़ान में एक फ़सल, बहुत मज़दूर और पूँजी, अक्सर अपना संसाधन कारखाना: चाय, कॉफी, रबड़, गन्ना, केला।
फ़सल ऋतुएँ
- रबी: अक्टूबर–दिसंबर में बुआई, अप्रैल–जून में कटाई। गेहूँ, जौ, मटर, चना, सरसों। पश्चिमी विक्षोभ की सर्दी की बारिश मदद करती है।
- ख़रीफ़: मानसून के साथ (जून–जुलाई) बुआई, सितंबर–अक्टूबर में कटाई। चावल, मक्का, ज्वार, बाजरा, अरहर, मूँग, उड़द, कपास, जूट, मूँगफली, सोयाबीन।
- ज़ायद: रबी और ख़रीफ़ के बीच की छोटी गर्मी। तरबूज़, खरबूज़ा, खीरा, सब्ज़ियाँ, चारा।
मुख्य फ़सलें और उनकी ज़रूरतें
- चावल: ख़रीफ़; 25°C से ज़्यादा, 100 सेमी से ज़्यादा बारिश; जलोढ़ मिट्टी; पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, पंजाब (नहरों से)।
- गेहूँ: रबी; ठंडा मौसम, पकते समय तेज़ धूप; 50–75 सेमी बारिश; गंगा-सतलुज मैदान, दक्कन की काली मिट्टी।
- मोटे अनाज (ज्वार, बाजरा, रागी): बहुत पौष्टिक; कम बारिश वाले सूखे क्षेत्र; रेतीली या काली मिट्टी।
- मक्का: 21–27°C; पुरानी जलोढ़ मिट्टी।
- दालें: अरहर, उड़द, मूँग, मसूर, मटर, चना; मिट्टी में नाइट्रोजन बढ़ाती हैं, इसलिए फ़सल चक्र में उगाई जाती हैं।
- गन्ना: गर्म और नम, 21–27°C, 75–100 सेमी बारिश; बहुत मेहनत।
- तिलहन: मूँगफली (ख़रीफ़), सरसों (रबी), तिल, सोयाबीन।
- चाय: गर्म, नम, पाला-रहित; साल भर बारिश; ढलान वाली, पानी न रुके ऐसी ज़मीन; असम, दार्जिलिंग, नीलगिरि।
- कॉफी: अरेबिका, नीलगिरि और कर्नाटक की पहाड़ियाँ।
- रबड़: भूमध्यरेखीय फ़सल; 25°C से ज़्यादा और 200 सेमी से ज़्यादा बारिश; केरल।
- रेशे: कपास काली मिट्टी पर, 210 पाला-रहित दिन; जूट पश्चिम बंगाल के बाढ़ मैदानों में ("सुनहरा रेशा")। रेशम के कीड़े पालना रेशम उत्पादन कहलाता है।
तकनीकी और संस्थागत सुधार
आज़ादी के बाद पहले भूमि सुधार हुए (ज़मींदारी ख़त्म, छोटे खेतों की चकबंदी)। हरित क्रांति (अधिक उपज वाले बीज, खाद, सिंचाई) से गेहूँ-चावल बढ़े; श्वेत क्रांति (ऑपरेशन फ़्लड) से दूध बढ़ा। किसान क्रेडिट कार्ड, फ़सल बीमा, न्यूनतम समर्थन मूल्य, रेडियो-टीवी पर मौसम की जानकारी भी मदद करते हैं। विनोबा भावे के भूदान–ग्रामदान ने ज़मींदारों से भूमिहीनों को ज़मीन देने को कहा।
करके देखें
3D के आख़िरी चरण में बारिश 200 सेमी और तापमान 28°C रखिए। कौन-सी फ़सलें लंबी हुईं? अब 60 सेमी और 15°C रखिए। पहले अनुमान लगाइए, फिर जाँचिए। घर पर: किसी बड़े से पूछिए आपके इलाक़े में सर्दी और बरसात में कौन-सी फ़सलें उगती हैं, और उन्हें रबी-ख़रीफ़ में बाँटिए।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- ख़रीफ़: मानसून (जून–अक्टूबर): चावल, कपास, मक्का, जूट
- रबी: सर्दी (अक्टूबर–मार्च, कटाई जून तक): गेहूँ, चना, सरसों
- ज़ायद: छोटी गर्मी (मार्च–जून): तरबूज़, खीरा, चारा
- चावल: >25°C, >100 सेमी · गेहूँ: ठंडा, 50–75 सेमी · रबड़: >25°C, >200 सेमी
हल किए गए उदाहरण
1. किसी जगह 150 सेमी बारिश और 30°C गर्मी है। गेहूँ या चावल?
चावल। उसे 25°C से ज़्यादा और 100 सेमी से ज़्यादा बारिश चाहिए; गेहूँ को ठंडा मौसम और 50–75 सेमी।
2. कपास दक्कन पठार पर क्यों उगती है?
वहाँ की काली मिट्टी नमी रोकती है, और गर्मी, हल्की बारिश और लंबा पाला-रहित मौसम कपास को चाहिए।
3. किसान अनाज की फ़सलों के बीच दालें क्यों उगाते हैं?
दालें फलीदार हैं; ये मिट्टी में नाइट्रोजन बढ़ाकर उर्वरता लौटाती हैं।
आम गलतियाँ
- गेहूँ को ख़रीफ़ फ़सल कहना। गेहूँ रबी (सर्दी) की फ़सल है।
- सोचना कि वाणिज्यिक कृषि सिर्फ़ बाग़ान है। रोपण कृषि वाणिज्यिक कृषि का एक प्रकार है।
- कहना कि कम बारिश वाले पंजाब में चावल नहीं हो सकता। नहरों और नलकूपों से होता है।
- जूट (सुनहरा रेशा) और कपास (काली मिट्टी) को मिलाना।