प्रदूषण के प्रकार
प्रदूषण पर्यावरण में ऐसे हानिकारक पदार्थ या ऊर्जा छोड़ना है जिन्हें प्रकृति साफ़ न कर सके। जिस माध्यम पर असर हो, उसके आधार पर प्रकार होते हैं।
जल प्रदूषण
शहरों का सीवेज, कारख़ानों का कचरा (रसायन, भारी धातुएँ), खेतों के उर्वरक और कीटनाशक, और नदियों में नहाना व चीज़ें विसर्जित करना जैसी सांस्कृतिक गतिविधियाँ पानी गंदा करती हैं। बड़े शहरों के पास गंगा और यमुना के हिस्से बहुत प्रदूषित हैं। गंदा पानी दस्त, पेट के कीड़े, हेपेटाइटिस करता है और मछलियाँ मारता है।
वायु प्रदूषण
कोयला, तेल, लकड़ी जलाना, कारख़ाने, गाड़ियाँ और पराली जलाना हवा में सल्फ़र डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड, धूल और धुआँ मिलाते हैं। इससे साँस और दिल के रोग, धूम-कोहरा और अम्ल वर्षा होती है। भोपाल गैस त्रासदी (1984) ने दिखाया कि औद्योगिक वायु प्रदूषण कितना घातक हो सकता है।
ध्वनि प्रदूषण
ट्रैफ़िक, कारख़ाने, निर्माण, लाउडस्पीकर और पटाखों की अनचाही तेज़ आवाज़, डेसिबल (dB) में मापी जाती है। इससे तनाव, नींद की कमी और बहरापन होता है।
भूमि प्रदूषण
कूड़ा, प्लास्टिक और औद्योगिक कचरा फेंकना और खेत के रसायनों का ज़्यादा उपयोग मिट्टी और भौम जल को बिगाड़ता है।
नगरीय अपशिष्ट निपटान
बढ़ते शहर बहुत ठोस अपशिष्ट बनाते हैं: खाने का बचा, कागज़, प्लास्टिक, काँच, धातु, कपड़ा और ई-कचरा। इसका बड़ा हिस्सा खुले में फेंका या जलाया जाता है। इससे मक्खियाँ और चूहे पनपते हैं, बीमारी फैलती है, बदबू और हानिकारक गैसें निकलती हैं और भौम जल गंदा होता है। औद्योगिक और अस्पताल का कचरा ख़ास तौर पर हानिकारक है।
बेहतर तरीक़े
- घर पर ही गीला (जैव-निम्नीकरणीय), सूखा (पुनर्चक्रण योग्य) और ख़तरनाक कचरा अलग करें।
- गीले कचरे की खाद बनाएँ; कागज़, प्लास्टिक, काँच, धातु का पुनर्चक्रण करें।
- कचरे से ऊर्जा (बायोगैस, बिजली) बनाएँ।
- वैज्ञानिक भराव क्षेत्र (लैंडफ़िल) और प्लास्टिक का कम उपयोग।
ग्रामीण–नगरीय प्रवास
ग्रामीण–नगरीय प्रवास गाँवों से क़स्बों और शहरों की ओर लोगों का जाना है। शहरों के तेज़ी से बढ़ने का यह बड़ा कारण है।
- प्रतिकर्ष कारक (गाँव में): गरीबी, कम काम, कम या बिना ज़मीन, कम मज़दूरी, ख़राब स्कूल और अस्पताल, सूखा और बाढ़।
- अपकर्ष कारक (शहर में): ज़्यादा नौकरियाँ, ऊँची मज़दूरी, बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और मनोरंजन।
ज़्यादातर प्रवासी युवा पुरुष होते हैं जो घर पैसे भेजते हैं; अक्सर महिलाएँ, बच्चे और बुज़ुर्ग गाँव में रहते हैं। शहरों में प्रवासी अक्सर असंगठित क्षेत्र में काम करते और ख़राब घरों में रहते हैं। प्रवास शहर के पानी, परिवहन, आवास और सफ़ाई पर दबाव डालता है।
गंदी बस्तियाँ: गरीब नगरीय बस्तियों की समस्याएँ
गंदी बस्ती भीड़ भरा, बिना योजना का रिहायशी इलाक़ा है जहाँ घर कमज़ोर और बुनियादी सुविधाएँ बहुत कम होती हैं। ये सबसे कम उपयोगी ज़मीन पर बसती हैं: रेल लाइन, नाले, कारख़ानों और कूड़े के ढेर के पास।
समस्याएँ
- मिट्टी, टीन या प्लास्टिक के छोटे, कमज़ोर घर; एक कमरे में बहुत लोग।
- साफ़ पानी कम, शौचालय कम, खुली नालियाँ, कूड़ा उठाने की कमी।
- दस्त, मलेरिया, तपेदिक जैसी बीमारियाँ आसानी से फैलती हैं।
- कम और अनिश्चित आय, कमज़ोर शिक्षा, बेदख़ली का डर।
भारत के कई शहरों में बड़ी बस्तियाँ हैं; मुंबई की धारावी एशिया की सबसे बड़ी बस्तियों में है और मिट्टी के बर्तन, चमड़ा और पुनर्चक्रण जैसे छोटे उद्योगों का व्यस्त केंद्र भी। समाधान: उसी जगह सुधार, सस्ते आवास की योजनाएँ, बुनियादी सुविधाएँ और कौशल प्रशिक्षण।
भूमि निम्नीकरण और केस स्टडी
भूमि निम्नीकरण ज़मीन की उत्पादन क्षमता का अस्थायी या स्थायी रूप से घटना है। कारण प्राकृतिक (अवनालिकाएँ, मरुस्थल, बाढ़ग्रस्त ज़मीन) या मानवकृत हो सकते हैं: ज़्यादा सिंचाई से जलाक्रांति और लवणता, खनन, वन कटाई, अति चराई और झूम खेती। मनुष्य की बनाई व्यर्थ भूमि को सुधारना कठिन है पर संभव है।
केस स्टडी: झाबुआ ज़िला (मध्य प्रदेश)
मध्य प्रदेश के पश्चिम में झाबुआ ज़्यादातर जनजातीय (मुख्यतः भील) ज़िला है। वन कटाई और अति चराई से इसकी पहाड़ियाँ नंगी और कटी हुई थीं। जलसंभर कार्यक्रमों (ग्रामीण विकास मंत्रालय और राज्य द्वारा) में गाँव वालों ने चेक डैम, समोच्च खाइयाँ और छोटे तालाब बनाए, पेड़ लगाए और सामुदायिक नियमों से चरागाह बचाए। कई नंगी पहाड़ियाँ हरी हुईं, भौम जल उठा और लोगों को ज़्यादा चारा, ईंधन और आय मिली। यह दिखाता है कि लोगों की भागीदारी से भूमि निम्नीकरण उलटा जा सकता है।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- प्रदूषण के प्रकार: वायु, जल, भूमि, ध्वनि
- ध्वनि डेसिबल (dB) में मापी जाती है
- कचरा अलग करना: गीला (खाद) + सूखा (पुनर्चक्रण) + ख़तरनाक (सुरक्षित निपटान)
- प्रवास = प्रतिकर्ष कारक (गाँव) + अपकर्ष कारक (शहर)
- गंदी बस्ती: ख़राब घर और सुविधाओं वाला भीड़ भरा, बिना योजना का इलाक़ा
- भूमि निम्नीकरण: ज़मीन की उत्पादकता का प्राकृतिक या मानवकृत रूप से घटना
हल किए गए उदाहरण
1. एक क़स्बा रोज़ 100 टन कचरा बनाता है; 55% गीला और 30% सूखा पुनर्चक्रण योग्य। कितनी खाद बनेगी और कितना पुनर्चक्रण?
खाद = 55 टन; पुनर्चक्रण = 30 टन। सिर्फ़ 15 टन भराव क्षेत्र में जाएगा।
2. अलग करने से भराव वाला कचरा 100 से 15 टन रोज़ हो गया। कितने प्रतिशत घटा?
(100 − 15) ÷ 100 × 100 = 85% कम।
3. 1 एकड़ वाला युवा किसान गाँव छोड़कर सूरत में कारख़ाने की नौकरी करने जाता है। एक प्रतिकर्ष और एक अपकर्ष कारक बताइए।
प्रतिकर्ष: गाँव में कम ज़मीन और कम आय। अपकर्ष: शहर में ज़्यादा वेतन वाली पक्की नौकरी।
4. गंदी बस्तियाँ अक्सर रेल पटरियों और नालों के पास क्यों बसती हैं?
वह ज़मीन ख़ाली पड़ी रहती है और काम की जगह के पास होती है, इसलिए किराया न दे पाने वाले गरीब प्रवासी वहीं बस जाते हैं, भले वह असुरक्षित और अस्वस्थ हो।
5. ज़्यादा सिंचाई से भूमि निम्नीकरण क्यों होता है?
भौम जल स्तर ऊपर आता है; पानी भाप बनकर मिट्टी पर नमक छोड़ता है (लवणता) और ज़मीन जलाक्रांत रहती है, इसलिए फ़सल नहीं होती।
6. झाबुआ का जलसंभर कार्य सफल क्यों रहा?
गाँव वालों ने ख़ुद चेक डैम और खाइयाँ बनाईं, पेड़ लगाए और नए पौधों पर चराई रोकने के नियम बनाए, इसलिए पहाड़ियाँ ठीक हो गईं।
आम गलतियाँ
- प्रदूषण को सिर्फ़ धुआँ समझना। जल, भूमि और ध्वनि प्रदूषण भी होते हैं।
- कचरे से 'छुटकारा' पाने के लिए उसे जलाना। इससे प्रदूषण बस हवा में चला जाता है।
- यह कहना कि लोग सिर्फ़ अपकर्ष कारकों से जाते हैं। गाँव के प्रतिकर्ष कारक भी उतने ही ज़रूरी हैं।
- यह मानना कि निम्नीकृत ज़मीन कभी ठीक नहीं हो सकती। झाबुआ दिखाता है कि जलसंभर कार्य से हो सकती है।