National Year 13 Environmental Science
अध्याय: 4
1. 3.4 Pollution
3.4.1 Properties of pollutants · 3.4.2 Environmental features and pollution severity · 3.4.3 Pollution control strategies
- प्रदूषण: वायु, जल, भूमि और ध्वनि – प्रदूषण यानी हवा, पानी या ज़मीन में हानिकारक पदार्थ या ऊर्जा इतनी तेज़ी से डालना कि प्रकृति उसे हटा न सके। मुख्य वायु प्रदूषक हैं कण (PM), कार्बन मोनोऑक्साइड, सल्फ़र डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड और ओज़ोन; इनसे अम्लीय वर्षा और स्मॉग बनते हैं। पोषक तत्व, सीवेज और ज़हरीले रसायन पानी में सुपोषण और जैव आवर्धन करते हैं। स्रोत पर उत्सर्जन घटाकर, कचरा छोड़ने से पहले साफ़ करके और 3R से प्रदूषण घटता है।
- चयनित मुद्दों और समस्याओं पर भौगोलिक परिप्रेक्ष्य (कक्षा 12) – प्रदूषण का मतलब है हवा, पानी, ज़मीन या आवाज़ में हानिकारक चीज़ें मिलना। वायु प्रदूषण ईंधन जलाने, कारख़ानों और गाड़ियों से; जल प्रदूषण सीवेज, उद्योग और खेत के रसायनों से; भूमि प्रदूषण कूड़े और रसायनों से; ध्वनि प्रदूषण ट्रैफ़िक और लाउडस्पीकर से होता है। शहर बहुत ठोस कचरा बनाते हैं जिसे अलग करना, पुनर्चक्रित करना और सुरक्षित निपटाना चाहिए। लोग प्रतिकर्ष कारकों (गरीबी, काम नहीं) और अपकर्ष कारकों (नौकरी, सुविधाएँ) से गाँव से शहर जाते हैं; बहुत से गंदी बस्तियों में रहते हैं। कटाव, जलाक्रांति, लवणता, खनन और अति चराई से हुआ भूमि निम्नीकरण ठीक हो सकता है, जैसा झाबुआ के जलसंभर कार्य ने दिखाया।
2. 3.5 Biological resources
3.5.1 Agriculture · 3.5.2 Aquatic food production systems · 3.5.3 Forest resources
- कृषि और पर्यावरण: कृषि-पारितंत्र, हरित क्रांति और टिकाऊपन – खेत एक कृषि-पारितंत्र है: सरल किया हुआ पारितंत्र जहाँ लोग कम प्रजातियाँ उगाते हैं और उपज बढ़ाने के लिए ऊर्जा व सामग्री (उर्वरक, पानी, ईंधन, कीटनाशक) जोड़ते हैं। बेहतर फसल व पशु आनुवंशिकी और हरित क्रांति के पैकेज (HYV बीज, सिंचाई, उर्वरक, कीटनाशक, मशीनें) ने अनाज कई गुना बढ़ाया। पर सघन खेती से सुपोषण, लवणीकरण, मिट्टी का कटाव, कीटों में प्रतिरोध, जैव-विविधता की हानि और ग्रीनहाउस गैसें बढ़ सकती हैं। सामाजिक-आर्थिक ताक़तें भी खेती तय करती हैं। टिकाऊ तरीक़े (फसल चक्र, IPM, कम जुताई, कुशल सिंचाई, कृषि-वानिकी) उपज ऊँची रखते हुए ज़मीन और पानी बचाते हैं।
- जलीय खाद्य उत्पादन: उत्पादकता, मत्स्यन और जल-कृषि – समुद्र वहाँ उपजाऊ होता है जहाँ धूप और पोषक तत्व साथ हों: उथले महाद्वीपीय मग्नतट, उत्प्रवाह (upwelling) क्षेत्र, ज्वारनदमुख और प्रवाल भित्तियाँ। खुले महासागर में पोषक तत्व कम हैं। हर पोषी स्तर पर लगभग 90% ऊर्जा खो जाती है, इसलिए निचले स्तर का भोजन (शैवाल, सीप, छोटी मछली) ज़्यादा कुशल है। मछली पकड़ने के तरीक़े bycatch और समुद्र-तल को नुक़सान में अलग-अलग हैं। अगर पकड़ स्टॉक की बढ़त से ज़्यादा हो, तो स्टॉक ढह जाता है (अति-मत्स्यन)। अधिकतम टिकाऊ उपज (MSY) वह सबसे बड़ी पकड़ है जो हर साल ली जा सके; यह लगभग आधे स्टॉक पर मिलती है। जल-कृषि आज आधी से ज़्यादा मछली देती है; यह जंगली मछलियों पर दबाव घटाती है, पर प्रदूषण, रोग, भागी मछलियाँ और आवास-हानि भी लाती है।
- वन संसाधन – वन पृथ्वी की लगभग 31% भूमि पर हैं। ये लकड़ी, जलावन, काग़ज़ की लुगदी, भोजन, दवाएँ और रेशे देते हैं, और हवा साफ़ करते हैं, कार्बन जमा रखते हैं, मिट्टी थामते हैं, बाढ़ रोकते हैं और ज़्यादातर थलीय जीवों का घर हैं। वानिकी (forestry), यानी वनों का प्रबंधन और कटाई, प्राथमिक क्षेत्र का हिस्सा है। जब पेड़ उगने से तेज़ कटते हैं, तो वनोन्मूलन से मिट्टी का कटाव, बाढ़, जीवों का नुकसान और हवा में ज़्यादा कार्बन डाइऑक्साइड होता है। टिकाऊ वानिकी हर साल उतना ही काटती है जितना जंगल बढ़ता है और दोबारा पेड़ लगाती है; संरक्षित क्षेत्र, सामुदायिक वन और कृषि-वानिकी भी वन बचाते हैं।
3. 3.6 Sustainability
3.6.1 Dynamic equilibria · 3.6.2 Energy in natural systems · 3.6.3 Material cycles · 3.6.4 The circular economy
- गतिशील संतुलन: प्रतिपुष्टि, टिपिंग पॉइंट और लचीलापन – कोई तंत्र गतिशील संतुलन में तब है जब वह लगातार बदलता है, पर उसकी औसत अवस्था स्थिर रहती है, क्योंकि अंदर आने वाला और बाहर जाने वाला बराबर है। ऋणात्मक प्रतिपुष्टि (negative feedback) बदलाव के बाद तंत्र को वापस सामान्य की ओर धकेलती है, जैसे शिकारी-शिकार की संख्या। धनात्मक प्रतिपुष्टि (positive feedback) बदलाव को और बढ़ाती है, जैसे बर्फ़ पिघलने से गहरी सतह ज़्यादा गर्मी सोखती है। अगर कोई झटका तंत्र को टिपिंग पॉइंट के पार धकेल दे, तो धनात्मक प्रतिपुष्टि हावी हो जाती है और तंत्र एक नई अवस्था में पलट जाता है, जिसे लौटाना कठिन है। ज़्यादा प्रजातियों वाले विविध तंत्र आम तौर पर ज़्यादा लचीले होते हैं।
- संधारणीयता (Sustainability) – संधारणीयता यानी आज अपनी ज़रूरतें ऐसे पूरी करना कि आने वाली पीढ़ियाँ भी अपनी ज़रूरतें पूरी कर सकें। यह तीन स्तंभों पर टिकी है — पर्यावरण, समाज और अर्थव्यवस्था। कोई संसाधन तभी टिकाऊ ढंग से इस्तेमाल होता है जब हम उसे उसके नवीकरण से तेज़ न लें। आज मानवता हर साल लगभग 1.7 पृथ्वी जितना इस्तेमाल करती है, और यह इस्तेमाल बहुत असमान है। देखभाल (stewardship), समझदार योजना और GIS जैसे औज़ार हमें संधारणीयता की ओर ले जाते हैं।
- पदार्थ चक्र: रैखिक मानव तंत्र और प्रकृति के चक्र – ज़्यादातर मानव तंत्र रैखिक हैं: कच्चा माल लो, सामान बनाओ, इस्तेमाल करो और फेंक दो। इससे संसाधन घटते हैं और कचरा जमा होता है। प्राकृतिक तंत्र चक्र में चलते हैं: कार्बन, नाइट्रोजन, पानी और फ़ॉस्फ़ोरस उत्पादकों से उपभोक्ताओं, फिर अपघटकों और वापस मिट्टी, हवा या पानी में जाते हैं, इसलिए कुछ बेकार नहीं जाता। प्राकृतिक कचरा (CO₂, O₂, गोबर, सूखे पत्ते) प्राकृतिक मात्रा में ज़हरीला नहीं होता और दूसरे जीवों का संसाधन है। कई मानव कचरे ज़हरीले या टिकाऊ हैं (प्लास्टिक, भारी धातुएँ, कीटनाशक, CFC), क्योंकि कोई जीव उन्हें तोड़ नहीं पाता। टिकाऊ तंत्र प्रकृति की नक़ल करके चक्र बंद करते हैं: कम उपयोग, पुनः उपयोग, मरम्मत, पुनर्चक्रण और खाद।
4. 3.7 Research methods
3.7.1 Scientific methodologies · 3.7.2 Sampling techniques
- वैज्ञानिक विधि – वैज्ञानिक विधि वह सावधान तरीका है जिससे वैज्ञानिक पता लगाते हैं कि दुनिया कैसे चलती है। कुछ देखो (प्रेक्षण), परखने लायक प्रश्न पूछो, परिकल्पना बनाओ (साफ़, परखने योग्य अनुमान), निष्पक्ष प्रयोग से परखो (एक चर बदलो, एक मापो, बाकी सब एक जैसा), दोहराओ और आँकड़े लिखो, विश्लेषण करो, निष्कर्ष निकालो और साझा करो ताकि दूसरे जाँच सकें। जो नतीजे परिकल्पना से मेल न खाएँ, वे भी काम के हैं: वे नई परिकल्पना की ओर ले जाते हैं।
- प्रतिचयन: प्रतिदर्श से पूरी समष्टि को जानना – समष्टि (population) वह पूरा समूह है जिसके बारे में हम जानना चाहते हैं; प्रतिदर्श (sample) उसका छोटा भाग है जिसे हम सच में जाँचते हैं। अच्छा प्रतिदर्श यादृच्छिक रूप से चुना जाता है ताकि वह पूरी समष्टि जैसा दिखे। सरल यादृच्छिक प्रतिचयन में सबको बराबर मौका; स्तरीकृत में हर समूह से सही हिस्सा; क्रमबद्ध में हर k-वाँ सदस्य। अलग-अलग प्रतिदर्श थोड़े अलग उत्तर देते हैं (प्रतिचयन-विचलन), पर बड़े प्रतिदर्श कम डगमगाते हैं (बड़ी संख्याओं का नियम)। पक्षपाती प्रतिदर्श कितना भी बड़ा हो, ग़लत उत्तर देता है।