कृषि-पारितंत्र: खेत एक सरल पारितंत्र
कृषि-पारितंत्र (agroecosystem) भोजन, रेशे या ईंधन के लिए चलाया गया पारितंत्र है। प्राकृतिक पारितंत्र की तुलना में इसमें:
- कम जैव-विविधता: अक्सर एकल फसल (monoculture); खरपतवार, कीट और प्रतियोगी हटाए जाते हैं।
- छोटी खाद्य शृंखला: फसल → मनुष्य, या फसल → पशु → मनुष्य। हर ऊपरी स्तर पर लगभग 90% ऊर्जा खो जाती है, इसलिए प्रति हेक्टेयर अनाज, मांस से ज़्यादा लोगों का पेट भरता है।
- अतिरिक्त इनपुट: जीवाश्म ईंधन की ऊर्जा (मशीनें, उर्वरक बनाना), पानी, पोषक तत्व और कीटनाशक। ऊर्जा दक्षता = भोजन की ऊर्जा ÷ लगाई गई ऊर्जा; सघन खेती अक्सर पारंपरिक से ज़्यादा ऊर्जा लगाती है।
- खुला पोषक चक्र: कटाई से पोषक तत्व निकल जाते हैं, उन्हें वापस डालना पड़ता है।
खेती विस्तृत (extensive) (प्रति हेक्टेयर कम इनपुट, जैसे घुमंतू पशुपालन) से सघन (intensive) (ज़्यादा इनपुट, ज़्यादा उपज) तक, और जीविका (subsistence) से व्यापारिक (commercial) तक होती है।
फसल और पशुओं की आनुवंशिकी सुधारना
- चयनात्मक प्रजनन: उपयोगी गुणों (ज़्यादा उपज, छोटा तना, रोग-प्रतिरोध, ज़्यादा दूध) वाले माता-पिता चुनकर कई पीढ़ियों तक प्रजनन।
- अधिक उपज वाली किस्में (HYV): छोटे तने वाले गेहूँ-धान जो ज़्यादा ऊर्जा दानों में लगाते हैं और भारी खाद पर भी गिरते नहीं।
- आनुवंशिक संशोधन (GM): दूसरी प्रजाति से जीन डालना, जैसे Bt कपास अपना कीटनाशक ख़ुद बनाता है; गोल्डन राइस विटामिन A बनाता है।
- जीन बैंक और बीज बैंक जंगली रिश्तेदार और पुरानी किस्में उपयोगी जीनों के स्रोत के रूप में सँभालते हैं।
चिंताएँ: आनुवंशिक विविधता घटना (एक ही किस्म हर जगह हो तो एक रोग सबको मार सकता है), हर साल बीज ख़रीदने की निर्भरता, जंगली पौधों में जीन का जाना, और GM सुरक्षा व कंपनियों के नियंत्रण पर बहस।
हरित क्रांति
हरित क्रांति (1940 के दशक में मेक्सिको से, 1960–70 के दशक में एशिया और लैटिन अमेरिका में फैली) एक पैकेज थी:
- गेहूँ, धान और मक्का के HYV बीज
- सिंचाई (नहरें, ट्यूबवेल)
- रासायनिक उर्वरक (ख़ासकर नाइट्रोजन)
- कीटनाशक और खरपतवारनाशक
- मशीनीकरण (ट्रैक्टर, थ्रेशर)
लाभ: अनाज की उपज लगभग दो-तीन गुना, अकाल कम, खाना सस्ता, और भारत जैसे देश अनाज में आत्मनिर्भर। उसी ज़मीन से ज़्यादा अनाज ने जंगल काटने का दबाव भी घटाया।
समस्याएँ: पानी और क़र्ज़ तक पहुँच वाले अमीर किसानों को ज़्यादा फ़ायदा; छोटे किसान क़र्ज़ में; भोजन कुछ अनाजों तक सिमटा; भूजल गिरा; मिट्टी का जैविक पदार्थ घटा; प्रदूषण और कीटों में प्रतिरोध बढ़ा।
खेती के पर्यावरणीय प्रभाव
- सुपोषण (eutrophication): अतिरिक्त नाइट्रेट और फ़ॉस्फ़ेट झीलों-नदियों में → शैवाल प्रस्फुटन → शैवाल मरते हैं → बैक्टीरिया ऑक्सीजन ख़त्म करते हैं → मछलियाँ मरती हैं।
- लवणीकरण (salinisation): गर्म, सूखे इलाक़ों में सिंचाई का पानी भाप बनकर ऊपरी मिट्टी में नमक छोड़ देता है, फसलें मुरझाती हैं।
- जलभराव और गिरता जल-स्तर: ज़्यादा सिंचाई और ज़्यादा पंपिंग से।
- मिट्टी का कटाव और क्षरण: जुताई, नंगे खेत, अति-चराई और बाड़ हटाने से हवा-पानी ऊपरी मिट्टी बहा ले जाते हैं; भारी मशीनें मिट्टी दबाती हैं; जैविक पदार्थ घटता है।
- कीटनाशक की समस्याएँ: कीटों में प्रतिरोध, मधुमक्खियों जैसे दूसरे जीवों को नुक़सान, खाद्य शृंखला में जैव-संचयन और जैव-आवर्धन।
- जैव-विविधता और आवास की हानि: जंगल-आर्द्रभूमि साफ़ करना, एकल फसलें।
- ग्रीनहाउस गैसें: ईंधन और ज़मीन साफ़ करने से CO₂, मवेशियों और पानी भरे धान के खेतों से मीथेन, उर्वरक से नाइट्रस ऑक्साइड।
खेती पर सामाजिक और आर्थिक प्रभाव
किसान क्या और कैसे उगाते हैं, यह सिर्फ़ मिट्टी और जलवायु से तय नहीं होता:
- बाज़ार और दाम: किसी नक़दी फसल के ऊँचे दाम किसानों को उसकी ओर खींचते हैं।
- सरकारी नीति: सब्सिडी, न्यूनतम समर्थन मूल्य, सस्ती बिजली या उर्वरक पानी या एक ही फसल के ज़्यादा इस्तेमाल को बढ़ा सकते हैं।
- ज़मीन का मालिकाना: बहुत छोटे या किराए के खेत मिट्टी की लंबी देखभाल को हतोत्साहित करते हैं।
- क़र्ज़, तकनीक और जानकारी तक पहुँच।
- खान-पान और माँग: मांस की बढ़ती माँग को अनाज से कहीं ज़्यादा ज़मीन और पानी चाहिए।
- व्यापार और सुपरमार्केट: एक-जैसी, सस्ती उपज की माँग।
खेती को टिकाऊ बनाना
- फसल चक्र और दलहन (चना, मसूर, मटर) नाइट्रोजन स्थिर करते हैं और कीट-चक्र तोड़ते हैं।
- समेकित कीट प्रबंधन (IPM): कीटों पर नज़र; प्राकृतिक शिकारी, प्रतिरोधी किस्में और जाल; छिड़काव सिर्फ़ ज़रूरत पर।
- संरक्षण जुताई / बिना जुताई, आवरण फसलें, मल्चिंग, समोच्च जुताई और सीढ़ीदार खेत कटाव घटाते हैं।
- कुशल सिंचाई: बाढ़ की जगह ड्रिप और स्प्रिंकलर; मिट्टी की नमी देखकर पानी।
- सटीक खेती: GPS और सेंसर से उर्वरक सिर्फ़ ज़रूरत की जगह।
- कृषि-वानिकी और बाड़: पेड़ मिट्टी को ढँकते, कार्बन जमा करते और जीवों को घर देते हैं।
- जैविक खेती: रासायनिक उर्वरक-कीटनाशक नहीं; उपज अक्सर कम पर मिट्टी का जीवन बेहतर।
लक्ष्य है टिकाऊ सघनीकरण: उसी ज़मीन से ज़्यादा भोजन, कम नुक़सान के साथ।
करके देखो: उर्वरक का प्रयोग
चार कप मिट्टी में सरसों या हालिम के बीज बोओ। एक को सादा पानी दो, बाक़ी को पानी में थोड़ी, मध्यम और ज़्यादा चुटकी खाद मिलाकर। 10 दिन बाद ऊँचाई मिलाओ: बढ़त पहले बढ़ती है, फिर थम जाती है (घटता प्रतिफल), और बहुत ज़्यादा खाद जड़ें जला सकती है। 3D के आख़िरी चरण में वह उर्वरक मात्रा ढूँढो जहाँ उपज ऊँची हो और तालाब साफ़ रहे।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- कृषि-पारितंत्र = मानव इनपुट वाला, सरल किया हुआ, प्रबंधित पारितंत्र
- खेती की ऊर्जा दक्षता = भोजन की ऊर्जा ÷ लगाई गई ऊर्जा
- हरित क्रांति पैकेज: HYV बीज + सिंचाई + उर्वरक + कीटनाशक + मशीनें
- सुपोषण: पोषक तत्व → शैवाल प्रस्फुटन → अपघटन → कम ऑक्सीजन → मछलियाँ मरती हैं
- लवणीकरण: सिंचाई का पानी भाप बनता है → ऊपरी मिट्टी में नमक बचता है
हल किए गए उदाहरण
1. समझाओ कि छोटे तने वाला HYV गेहूँ भारी उर्वरक के लिए क्यों ठीक था।
उर्वरक से बालियाँ भारी होती हैं। लंबा पारंपरिक गेहूँ गिर जाता (लॉजिंग) और दाने सड़ जाते। छोटा, मज़बूत तना भारी बाली सँभालता है और पौधा ज़्यादा ऊर्जा डंठल की जगह दानों में लगाता है।
2. खेतों के नीचे की नदी गर्मी में हरी हो जाती है और मछलियाँ मरती हैं। घटनाओं की कड़ी समझाओ।
बारिश खेतों से अतिरिक्त नाइट्रेट और फ़ॉस्फ़ेट नदी में बहाती है। शैवाल तेज़ी से बढ़ते हैं और रोशनी रोकते हैं। मरने पर बैक्टीरिया उन्हें सड़ाते हुए घुली ऑक्सीजन ख़त्म कर देते हैं। मछलियाँ दम घुटने से मरती हैं। यही सुपोषण है।
3. भारत में हरित क्रांति का मूल्यांकन करो।
सकारात्मक: गेहूँ-धान का उत्पादन कई गुना बढ़ा, अकाल टला और भारत आत्मनिर्भर हुआ। नकारात्मक: लाभ सिंचित इलाक़ों और अमीर किसानों तक सिमटा; पंजाब में भूजल तेज़ी से गिरा; मिट्टी नमकीन और जैविक पदार्थ में कमज़ोर हुई; कीटनाशक बढ़े। कुल मिलाकर इसने करोड़ों को भूख से बचाया, पर टिकाऊपन की ऐसी समस्याएँ पैदा कीं जिनके लिए आज नए तरीक़े चाहिए।
आम गलतियाँ
- कहना कि उर्वरक हमेशा उपज बढ़ाता है। उपज थम जाती है (घटता प्रतिफल), और अतिरिक्त ज़्यादातर प्रदूषण बनता है।
- लवणीकरण (भाप बने सिंचाई जल का छोड़ा नमक) और जलभराव (मिट्टी में बहुत ज़्यादा पानी) में गड़बड़।
- हरित क्रांति के सिर्फ़ लाभ या सिर्फ़ हानि लिखना। परीक्षा में संतुलित मूल्यांकन चाहिए।
- सामाजिक-आर्थिक कारक भूलना। नीति, दाम और ज़मीन का मालिकाना भी उतना ही असर डालते हैं जितना जलवायु।