भारत में भूमि उपयोग और उसमें बदलाव
भूमि उपयोग का मतलब है कि ज़मीन किस काम में लगी है। राजस्व रिकॉर्ड में नौ वर्ग हैं: वन, गैर-कृषि उपयोग की भूमि, बंजर और व्यर्थ भूमि, स्थायी चरागाह, वृक्ष फ़सलों और बाग़ों की भूमि, कृषि योग्य व्यर्थ भूमि, वर्तमान परती, पुरातन परती (अन्य परती) और निवल बोया क्षेत्र।
दो ज़रूरी शब्द
वर्तमान परती ज़मीन एक साल या उससे कम खाली छोड़ी जाती है ताकि उर्वरता लौट आए। अन्य परती 1 से 5 साल खाली रहती है। इससे ज़्यादा खाली रहे तो वह कृषि योग्य व्यर्थ भूमि बन जाती है।
बदलाव क्यों होता है
अर्थव्यवस्था का आकार, उसकी बनावट (उद्योग और सेवाएँ बढ़ना) और बढ़ती आबादी का दबाव भूमि उपयोग बदलते हैं। 1950 से वन और गैर-कृषि भूमि बढ़ी है; बंजर भूमि, व्यर्थ भूमि और चरागाह घटे हैं; निवल बोया क्षेत्र थोड़ा बढ़ा है। वन क्षेत्र का बढ़ना कुछ हद तक बेहतर सर्वे का असर भी है।
सामुदायिक संसाधन (साझा संपत्ति संसाधन)
जो ज़मीन किसी एक व्यक्ति की नहीं, पूरे समुदाय की होती है, वह सामुदायिक संपत्ति संसाधन है। जैसे गाँव का चरागाह, तालाब, गाँव का जंगल और खलिहान। हर परिवार को इसके उपयोग का हक़ है।
इनसे पशुओं का चारा, जलावन लकड़ी, फल, मछली और पानी मिलता है। भूमिहीन मज़दूर, छोटे किसान और महिलाएँ इन पर सबसे ज़्यादा निर्भर हैं। इनकी रक्षा गरीबों को और गरीब होने से बचाती है।
भारत की फ़सल ऋतुएँ
- खरीफ़ (जून से सितंबर): मानसून के साथ बुआई। उत्तर: चावल, कपास, बाजरा, मक्का, ज्वार, अरहर। दक्षिण: चावल, मक्का, रागी, ज्वार, मूँगफली।
- रबी (अक्टूबर से मार्च): सर्दी की फ़सलें। उत्तर: गेहूँ, चना, सरसों, जौ। दक्षिण: चावल, मक्का, रागी, मूँगफली, ज्वार।
- ज़ायद (अप्रैल से जून): गर्मी की छोटी ऋतु, सब्ज़ियाँ, फल, चारा, अक्सर सिंचाई से।
दक्षिण में पूरे साल तापमान ऊँचा रहता है, इसलिए वहाँ चावल एक से ज़्यादा बार उगाया जा सकता है।
कृषि के प्रकार
पानी के मुख्य स्रोत के आधार पर खेती दो तरह की है।
सिंचित कृषि
रक्षात्मक सिंचाई फ़सल को सूखे से बचाती है। उत्पादक सिंचाई इतना पानी देती है कि उपज ज़्यादा हो।
वर्षा-आधारित कृषि
शुष्क भूमि कृषि वहाँ होती है जहाँ सालाना वर्षा 75 सेमी से कम हो; रागी, बाजरा, मूँग, चना, ग्वार जैसी सख़्त फ़सलें उगती हैं और नमी बचाई जाती है। आर्द्र भूमि कृषि वहाँ होती है जहाँ पौधों की ज़रूरत से ज़्यादा वर्षा हो; चावल, जूट, गन्ना उगते हैं और बाढ़ व मिट्टी कटाव का ख़तरा रहता है।
भारत की मुख्य फ़सलें
खाद्यान्न कुल फ़सल क्षेत्र का लगभग दो-तिहाई हैं। अनाज: चावल (उत्तर में खरीफ़, दक्षिण में तीन बार तक), गेहूँ (रबी, ठंडी सर्दी चाहिए), ज्वार, बाजरा, मक्का। दालें जैसे चना, अरहर प्रोटीन देती हैं और मिट्टी में नाइट्रोजन जोड़ती हैं। तिलहन: मूँगफली, सरसों, सोयाबीन, सूरजमुखी। रेशेदार फ़सलें: कपास (काली मिट्टी, पाला-रहित दिन) और जूट (गर्म, नम डेल्टा)। अन्य: गन्ना, चाय (भारी वर्षा वाली पहाड़ी ढलानें), कॉफ़ी (दक्षिण की छायादार ढलानें)।
कृषि विकास और समस्याएँ
1960 के बाद हरित क्रांति में अधिक उपज वाले बीज, रासायनिक खाद, कीटनाशक और सिंचाई आई। गेहूँ और चावल की उपज कई गुना बढ़ी और भारत अनाज में आत्मनिर्भर बना। बाद में विकास दूसरी फ़सलों और इलाक़ों तक फैला।
मुख्य समस्याएँ
- अनिश्चित मानसून पर निर्भरता।
- दूसरे देशों की तुलना में कम उत्पादकता।
- छोटी और बिखरी जोतें।
- भूमि सुधार की कमी और किसानों पर कर्ज़।
- कम व्यावसायीकरण और गाँवों में अल्प-रोज़गार।
- भूमि निम्नीकरण: ज़्यादा सिंचाई से लवणीय और जलाक्रांत मिट्टी, गिरता भूजल।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- निवल बोया क्षेत्र: जहाँ साल में कम से कम एक बार फ़सल बोई और काटी जाए
- सकल बोया क्षेत्र = निवल बोया क्षेत्र + एक से अधिक बार बोया गया क्षेत्र
- शस्य गहनता = (सकल बोया क्षेत्र ÷ निवल बोया क्षेत्र) × 100
- वर्तमान परती: ≤ 1 साल; अन्य परती: 1–5 साल; इससे ज़्यादा = कृषि योग्य व्यर्थ भूमि
- शुष्क भूमि: वर्षा < 75 सेमी; आर्द्र भूमि: ज़रूरत से ज़्यादा वर्षा
- सामुदायिक संसाधन = पूरे समुदाय द्वारा उपयोग की जाने वाली ज़मीन (चरागाह, तालाब, गाँव का जंगल)
हल किए गए उदाहरण
1. एक गाँव में निवल बोया क्षेत्र 400 हेक्टेयर है। 100 हेक्टेयर में दो बार बुआई होती है। सकल बोया क्षेत्र निकालिए।
सकल बोया क्षेत्र = 400 + 100 = 500 हेक्टेयर।
2. उसी गाँव की शस्य गहनता निकालिए।
शस्य गहनता = 500 ÷ 400 × 100 = 125%।
3. किसान ने एक खेत दो साल खाली छोड़ा। वह किस वर्ग में है?
अन्य परती, क्योंकि वह एक साल से ज़्यादा पर पाँच साल से कम खाली है।
4. गाँव का चरागाह बिकने पर भूमिहीन परिवारों को नुकसान क्यों होता है?
चरागाह सामुदायिक संसाधन था, जिससे मुफ़्त चारा और ईंधन मिलता था। अब उन्हें ये खरीदने पड़ेंगे या पशु बेचने पड़ेंगे, इसलिए आमदनी घटेगी।
5. किसी इलाक़े में सालाना 50 सेमी वर्षा होती है। कौन-सी खेती और फ़सलें ठीक रहेंगी?
शुष्क भूमि कृषि, क्योंकि वर्षा 75 सेमी से कम है। बाजरा, रागी, चना, ग्वार जैसी फ़सलें, नमी बचाने के तरीक़ों के साथ।
6. उपज ज़्यादा होने पर भी पंजाब की मिट्टी लवणीय क्यों हो रही है?
बिना जल-निकासी के भारी नहर सिंचाई से भौम जल स्तर ऊपर आया। पानी भाप बनकर उड़ा और नमक ऊपर छोड़ गया। इसलिए उपज पहले बढ़ी पर अब मिट्टी ख़राब हो रही है।
आम गलतियाँ
- निवल बोया क्षेत्र और सकल बोया क्षेत्र को एक समझना। सकल में दो बार बोई ज़मीन दो बार गिनी जाती है।
- वर्तमान परती और कृषि योग्य व्यर्थ भूमि को एक मानना। व्यर्थ भूमि पाँच साल से ज़्यादा खाली रहती है।
- यह कहना कि चावल सिर्फ़ खरीफ़ फ़सल है। दक्षिण में रबी में और साल में तीन बार भी उगता है।
- हर सिंचित खेत को 'उत्पादक' कहना। रक्षात्मक सिंचाई सिर्फ़ सूखे से बचाती है।