खनिज और भारत की खनिज पेटियाँ
खनिज निश्चित रासायनिक और भौतिक बनावट वाला प्राकृतिक पदार्थ है। खनिज असमान रूप से फैले हैं। ज़्यादातर धात्विक खनिज प्रायद्वीपीय पठार की पुरानी क्रिस्टलीय चट्टानों में हैं; कोयला दामोदर, महानदी, सोन और गोदावरी घाटियों में; पेट्रोलियम असम, गुजरात और मुंबई हाई की अवसादी द्रोणियों में।
तीन खनिज पेटियाँ
- उत्तर-पूर्वी पठारी प्रदेश: छोटानागपुर (झारखंड), ओडिशा पठार, पश्चिम बंगाल और छत्तीसगढ़ के भाग। कोयला, लौह अयस्क, मैंगनीज़, अभ्रक, बॉक्साइट से समृद्ध।
- दक्षिण-पश्चिमी पठारी प्रदेश: कर्नाटक, गोवा, तमिलनाडु की उच्चभूमि और केरल। लौह अयस्क, मैंगनीज़, चूना पत्थर, कुछ बॉक्साइट; नेवेली में लिग्नाइट।
- उत्तर-पश्चिमी प्रदेश: राजस्थान में अरावली के साथ और गुजरात का भाग। ताँबा, जस्ता, बलुआ पत्थर, ग्रेनाइट, संगमरमर जैसे इमारती पत्थर; जिप्सम; गुजरात में तेल-गैस।
हिमालयी पेटी, असम घाटी और समुद्र तल के नीचे (अपतटीय) भी कुछ खनिज और तेल मिलते हैं।
धात्विक और अधात्विक खनिज
लौह अयस्क: भारत में अच्छे हेमेटाइट और मैग्नेटाइट के बड़े भंडार हैं। मुख्य क्षेत्र: ओडिशा, झारखंड, छत्तीसगढ़, कर्नाटक, गोवा। यह इस्पात उद्योग का आधार है।
मैंगनीज़: लोहे-इस्पात को कठोर बनाने और मिश्रधातु में। मुख्य क्षेत्र: ओडिशा, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र।
बॉक्साइट: एल्युमिनियम का अयस्क, पठारों की लेटराइट चट्टानों में। मुख्य क्षेत्र: ओडिशा, झारखंड, गुजरात, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र।
ताँबा: बिजली का अच्छा सुचालक, तार और इलेक्ट्रॉनिक्स में। मुख्य क्षेत्र: झारखंड (सिंहभूम), मध्य प्रदेश (बालाघाट), राजस्थान (खेतड़ी)।
अभ्रक (अधात्विक): पतली पारदर्शी परतों में टूटता है; बिजली का बढ़िया रोधक। मुख्य क्षेत्र: झारखंड, आंध्र प्रदेश, राजस्थान।
परंपरागत ऊर्जा: कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस
कोयला भारत की ज़्यादातर बिजली देता है। गोंडवाना कोयला (लगभग 20 करोड़ साल पुराना) दामोदर घाटी (झरिया, रानीगंज, बोकारो), महानदी, सोन और गोदावरी घाटियों में है। टर्शियरी कोयला (नया) उत्तर-पूर्व में है। तमिलनाडु के नेवेली में लिग्नाइट निकलता है।
पेट्रोलियम हाइड्रोकार्बनों का मिश्रण है जो अवसादी चट्टानों में, अक्सर अपनति (मोड़) के नीचे फँसा मिलता है। मुख्य क्षेत्र: असम का डिगबोई आदि, गुजरात के अंकलेश्वर और कलोल, और अपतटीय मुंबई हाई। शोधनशालाएँ कच्चे तेल से पेट्रोल, डीज़ल और कई चीज़ें बनाती हैं।
प्राकृतिक गैस तेल के साथ या अलग मिलती है और कोयले से साफ़ है। मुंबई हाई, कृष्णा-गोदावरी द्रोणी आदि से गैस पाइपलाइनों से पहुँचाई जाती है।
गैर-परंपरागत ऊर्जा स्रोत
- परमाणु: रिएक्टर में यूरेनियम और थोरियम (केरल की मोनाज़ाइट रेत से) का विखंडन। संयंत्र: तारापुर, रावतभाटा, कलपक्कम, नरोरा, कैगा, काकरापार, कुडनकुलम।
- सौर: फ़ोटोवोल्टिक पैनल से धूप बिजली बनती है या ताप मिलता है। पश्चिमी भारत (राजस्थान, गुजरात) में बड़ी संभावना।
- पवन: चलती हवा टरबाइन घुमाती है। गुजरात, तमिलनाडु, राजस्थान, महाराष्ट्र, कर्नाटक।
- ज्वारीय और तरंग: समुद्र का चढ़ना-उतरना टरबाइन घुमाता है। पश्चिमी तट (खंभात, कच्छ की खाड़ी) और सुंदरबन में संभावना।
- भूतापीय: पृथ्वी के अंदर की गर्मी; हिमाचल के मणिकरण में प्रायोगिक परियोजना, लद्दाख के गर्म झरने।
- जैव-ऊर्जा: खेती का कचरा, गोबर, शहरी और औद्योगिक कूड़ा; बिजली और गैस देता है और कूड़ा घटाता है।
ये स्रोत नवीकरणीय, हर जगह उपलब्ध और साफ़ हैं और आयातित तेल पर निर्भरता घटाते हैं, पर शुरू में खर्च ज़्यादा है।
खनिज संसाधनों का संरक्षण
खनिज अनवीकरणीय हैं: बनने में लाखों साल लगते हैं। सततपोषणीय विकास के लिए भविष्य के लिए बचाना ज़रूरी है।
- कोयले और तेल की जगह सौर, पवन, ज्वारीय ऊर्जा।
- लोहा, एल्युमिनियम, ताँबा जैसी धातुओं के कबाड़ का पुनर्चक्रण।
- दुर्लभ धातुओं के विकल्प।
- खनन और प्रसंस्करण में बर्बादी घटाने वाली बेहतर तकनीक।
- दुर्लभ सामरिक खनिजों का निर्यात कम करना।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- खनिज: निश्चित रासायनिक और भौतिक बनावट वाला प्राकृतिक पदार्थ
- धात्विक: लौह अयस्क, मैंगनीज़, बॉक्साइट, ताँबा; अधात्विक: अभ्रक, चूना पत्थर
- परंपरागत ऊर्जा: कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस (समाप्य)
- गैर-परंपरागत: परमाणु, सौर, पवन, ज्वारीय, भूतापीय, जैव-ऊर्जा
- भंडार कितने साल चलेगा ≈ भंडार ÷ शुद्ध सालाना उपयोग
- शुद्ध उपयोग = उपयोग × (1 − पुनर्चक्रण का भाग)
हल किए गए उदाहरण
1. खदान में 1,000 इकाई अयस्क है और हर साल 10 इकाई निकलती है। कितने साल चलेगी?
1,000 ÷ 10 = 100 साल।
2. अगर 50% धातु का पुनर्चक्रण हो तो शुद्ध उपयोग और अवधि क्या होगी?
शुद्ध उपयोग = 10 × 0.5 = 5 इकाई। 1,000 ÷ 5 = 200 साल। पुनर्चक्रण से अवधि दुगुनी।
3. छोटानागपुर पठार को खनिजों का भंडार क्यों कहते हैं?
इसकी बहुत पुरानी क्रिस्टलीय चट्टानों में कोयला, लौह अयस्क, मैंगनीज़, अभ्रक और बॉक्साइट पास-पास हैं, जो इस्पात जैसे भारी उद्योगों को सहारा देते हैं।
4. राजस्थान सौर ऊर्जा के लिए उपयुक्त क्यों है?
यहाँ साफ़ धूप वाले दिन ज़्यादा, तेज़ धूप और बड़ी खुली ज़मीन है।
5. पेट्रोलियम दक्कन लावा में क्यों नहीं, अवसादी चट्टानों में क्यों मिलता है?
तेल परतदार अवसादों में दबे समुद्री जीवों से बनता है; लावा चट्टानें पिघली चट्टान से बनीं, उनमें ऐसे अवशेष नहीं।
6. भारत पवन और सौर ऊर्जा क्यों बढ़ा रहा है? दो कारण।
ये कभी ख़त्म नहीं होते और प्रदूषण नहीं करते; तेल-कोयले का आयात घटाते हैं और ग्रिड से दूर गाँवों में लग सकते हैं।
आम गलतियाँ
- अभ्रक को धात्विक खनिज कहना। यह अधात्विक है।
- परमाणु ऊर्जा को जीवाश्म ईंधन कहना। यह यूरेनियम/थोरियम के परमाणु तोड़ने से मिलती है।
- गोंडवाना और टर्शियरी कोयले को मिलाना। गोंडवाना पुराना, प्रायद्वीप की नदी घाटियों में; टर्शियरी उत्तर-पूर्व में।
- गैर-परंपरागत का मतलब 'मुफ़्त' समझना। ईंधन बचता है पर शुरुआती निवेश ज़्यादा है।