National Year 13 Geography
अध्याय: 7
1. 3.2.1 Global systems and global governance (compulsory)
Globalisation · Global systems · International trade and access to markets · Global governance · The 'global commons' · Globalisation critique · Quantitative and qualitative skills
- वैश्वीकरण और वैश्विक शासन – वैश्वीकरण यानी सामान, पूँजी, सूचना और श्रम के प्रवाह का बढ़ना, जो जगहों को आपस में जोड़ता है। तकनीक, परिवहन और व्यापार समझौते इसे चलाते हैं। प्रवाह असमान हैं: अमीर देशों के पास ज़्यादा ताक़त है, ग़रीब देशों की बाज़ार तक पहुँच कमज़ोर है। TNC एक ही चीज़ को कई जगह बनवाती हैं। UN, WTO, IMF और विश्व बैंक जैसी संस्थाएँ इन प्रवाहों को संभालने की कोशिश करती हैं, और संधियाँ अंटार्कटिका जैसे साझा क्षेत्रों को बचाती हैं। वैश्वीकरण विकास और सस्ता सामान लाता है, पर असमानता, टकराव और पर्यावरण का नुक़सान भी।
2. 3.2.2 Changing places (compulsory)
The nature and importance of places · Changing places - relationships, connections, meaning and representation · Quantitative and qualitative skills · Place studies
- स्थान-बोध: खाली स्थान जगह कैसे बनता है – कोई खाली स्थान (space) तब जगह (place) बनता है जब लोग उसे अर्थ देते हैं। हर जगह की एक अवस्थिति (कहाँ है), एक परिवेश या locale (वहाँ जीवन कैसा है) और एक स्थान-बोध (लोग उसके बारे में क्या महसूस करते हैं) होता है। अंदर वाले और बाहर वाले एक ही जगह को अलग ढंग से देखते हैं। जगहें अंतर्जात (अंदरूनी) कारकों जैसे उच्चावच, भूमि उपयोग, जनसंख्या से और बहिर्जात (बाहरी) रिश्तों जैसे लोगों, पैसे, सामान और विचारों के प्रवाह से बनती हैं। जगहें समय के साथ बदलती हैं और जनगणना के आँकड़ों से लेकर गीतों-फ़िल्मों तक कई तरह से दिखाई जाती हैं।
3. 3.2.3 Contemporary urban environments (Section C option: choose one of urban, population, resources)
Urbanisation · Urban forms · Social and economic issues associated with urbanisation · Urban climate · Urban drainage · Urban waste and its disposal · Other contemporary urban environmental issues · Sustainable urban development · Case studies
- मानव बस्तियाँ: ग्रामीण और नगरीय प्रकार, नगरों का विकास, नगरीकरण और स्मार्ट सिटी – बस्ती वह जगह है जहाँ लोग घर बनाकर रहते हैं, एक झोपड़ी से लेकर बड़े नगर तक। ग्रामीण बस्तियाँ खेती और दूसरे प्राथमिक कामों पर टिकी हैं; नगरीय बस्तियाँ उद्योग, व्यापार और सेवाओं पर। गाँव गुच्छित, अर्ध-गुच्छित, पल्ली या परिक्षिप्त हो सकते हैं। भारतीय नगर तीन कालों में बढ़े: प्राचीन, मध्यकालीन और आधुनिक। नगरीय हिस्सा 1901 में 11% से 2011 में 31% हुआ। नगरों को मुख्य काम से पहचानते हैं: प्रशासनिक, औद्योगिक, परिवहन, वाणिज्यिक, खनन, छावनी, शैक्षिक, धार्मिक और पर्यटन। स्मार्ट सिटी मिशन (2015) 100 नगरों को साफ़, सुरक्षित और रहने में आसान बनाना चाहता है।
- नगरीकरण: शहर क्यों बढ़ते हैं और उन्हें बेहतर कैसे बनाएँ – नगरीकरण किसी देश या दुनिया के उन लोगों के हिस्से का बढ़ना है जो कस्बों और शहरों में रहते हैं। 1950 में दुनिया के लगभग 30% लोग नगरीय थे; 2007 से आधे से ज़्यादा हैं, और 2050 तक लगभग 68% होने का अनुमान है। शहर ग्रामीण-नगरीय प्रवास (गाँव से धक्का देने वाले और शहर की ओर खींचने वाले कारक) और प्राकृतिक वृद्धि से बढ़ते हैं। आज सबसे तेज़ बढ़त एशिया और अफ़्रीका के कम आय वाले और उभरते देशों में है, जहाँ 1 करोड़ से ज़्यादा के महानगर बन रहे हैं; कई अमीर देशों में बढ़त धीमी है और लोग उपनगरों या गाँवों की ओर भी जाते हैं (उपनगरीकरण और प्रति-नगरीकरण)। तेज़ बढ़त से अवसर (रोज़गार, सेवाएँ) और समस्याएँ (अनौपचारिक बस्तियाँ, ट्रैफ़िक, प्रदूषण, कचरा, बाढ़, नगरीय ऊष्मा द्वीप) आती हैं। टिकाऊ नगरीय विकास इन्हें सार्वजनिक परिवहन, हरी जगहों, साफ़ पानी, पुनर्चक्रण, सस्ते घरों और नवीकरणीय ऊर्जा से सुधारता है।
4. 3.2.4 Population and the environment (Section C option)
Introduction · Environment and population · Environment, health and well-being · Population change · Principles of population ecology and their application to human populations · Global population futures · Case studies
- जनसंख्या और पर्यावरण – लोग वहाँ रहते हैं जहाँ भौतिक स्थिति साथ दे: समतल ज़मीन, पानी, उपजाऊ मिट्टी और सुहावनी जलवायु। जनसंख्या जन्म, मृत्यु और प्रवास से बदलती है; जनसांख्यिकीय संक्रमण मॉडल दिखाता है कि विकास के साथ दरें गिरती हैं, और आयु-लिंग पिरामिड उसका नतीजा दिखाते हैं। भोजन जलवायु, मिट्टी और खेती के तंत्र पर निर्भर है, और खाद्य सुरक्षा के लिए कई उपाय चाहिए। स्वास्थ्य संक्रामक रोगों से गैर-संचारी रोगों की ओर बढ़ता है (महामारी-विज्ञान संक्रमण), और पर्यावरण रोगों को आकार देता है, जैसे मलेरिया। माल्थस को डर था कि आबादी भोजन से आगे निकल जाएगी; बोसरप और साइमन ने कहा कि लोग नए उपाय खोजते हैं। वहन क्षमता, पारिस्थितिक पदचिह्न और भविष्य के अनुमान बताते हैं कि वृद्धि टिकाऊ है या नहीं।
5. 3.2.5 Resource security (Section C option)
Resource development · Natural resource issues · Water security · Energy security · Mineral security · Resource futures · Case studies
- संसाधन सुरक्षा और भूमि व जल का टिकाऊ उपयोग – प्राकृतिक संसाधन प्रकृति की वे चीज़ें हैं जिन्हें लोग इस्तेमाल करते हैं: पानी, मिट्टी, जंगल, मछली, खनिज और ऊर्जा। अनवीकरणीय संसाधन (कोयला, तेल, धातु अयस्क) ऐसे भंडार हैं जो घटते जाते हैं; नवीकरणीय संसाधन (पानी, जंगल, मछली) फिर भरते हैं, पर एक सीमित रफ़्तार से। संसाधन सुरक्षा का मतलब है भरोसे से, सही दाम पर, पर्याप्त संसाधन होना। साझे संसाधन अक्सर "साझी चीज़ों की त्रासदी" झेलते हैं: हर उपयोगकर्ता थोड़ा ज़्यादा लेता है और संसाधन खत्म हो जाता है। जल सुरक्षा और ऊर्जा सुरक्षा सबसे बड़ी चिंताएँ हैं; खेती लगभग 70% मीठा पानी लेती है, और दुनिया की लगभग 80% ऊर्जा अब भी जीवाश्म ईंधन से आती है। टपक सिंचाई, एकीकृत कीट प्रबंधन, चुनकर कटाई, सावधानी से मछली पालन, मछली पकड़ने का कोटा, खदान की ज़मीन को फिर हरा करना और शहर का बहता पानी घटाना जैसे टिकाऊ तरीके आज के उपयोग के साथ भविष्य के लिए भी बचाते हैं। पारिस्थितिक पदचिह्न (ecological footprint) बताता है कि हमारी जीवनशैली को कितनी ज़मीन और पानी चाहिए।
- भारत के खनिज तथा ऊर्जा संसाधन (कक्षा 12) – खनिज निश्चित बनावट वाला प्राकृतिक पदार्थ है। भारत के ज़्यादातर खनिज पुरानी पठारी चट्टानों में तीन पेटियों में हैं: उत्तर-पूर्वी पठार, दक्षिण-पश्चिमी पठार और उत्तर-पश्चिमी पेटी। लौह अयस्क, मैंगनीज़, बॉक्साइट और ताँबा धात्विक हैं; अभ्रक अधात्विक है। कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस परंपरागत ऊर्जा हैं जो ख़त्म हो जाएँगी। परमाणु, सौर, पवन, ज्वारीय, भूतापीय और जैव-ऊर्जा गैर-परंपरागत और साफ़ हैं। खनिज अनवीकरणीय हैं, इसलिए कम उपयोग, पुनर्चक्रण और विकल्प ज़रूरी हैं।
6. 3.3 Geography fieldwork investigation (NEA)
Individual investigation
- भौगोलिक जाँच और क्षेत्र कार्य – भौगोलिक जाँच (enquiry) किसी असली जगह के बारे में एक छोटा शोध प्रोजेक्ट है। इसके साफ़ कदम हैं: सवाल पूछो और परिकल्पना लिखो; सही नमूना विधि से प्राथमिक आँकड़े (अपने माप और सर्वे) और द्वितीयक आँकड़े (जनगणना, नक्शे, वेबसाइट) जुटाओ; आँकड़ों को सही ग्राफ़ और नक्शों में दिखाओ; ढाँचा समझो और निष्कर्ष निकालो; फिर जाँचो कि नतीजे कितने भरोसेमंद हैं। यही कौशल फ़ैसले लेने में काम आते हैं: सबूतों से विकल्प तौलो और सबसे अच्छे को कारण सहित चुनो। बड़ी कक्षाओं में छात्र अपने सवाल, प्राथमिक-द्वितीयक आँकड़ों, विश्लेषण और निष्कर्ष के साथ एक लंबी स्वतंत्र जाँच लिखते हैं।
7. 3.4 Geographical skills
Core, cartographic and graphical skills · Statistical and ICT skills
- आँकड़ों का आलेखी निरूपण (कक्षा 12 भूगोल प्रायोगिक) – आलेख, आरेख और विषयक मानचित्र सारणियों को चित्रों में बदलते हैं, जिससे प्रतिरूप तुरंत दिखता है। रेखा आलेख और बहुरेखी आलेख समय के साथ बदलाव दिखाते हैं। दंड आरेख (सरल, बहुदंड, मिश्रित) मदों की तुलना करते हैं। वृत्त आरेख कोणों से पूरे के भाग दिखाता है। प्रवाह मानचित्र गतिविधि दिखाते हैं, तीर की चौड़ाई मापनी के अनुसार। विषयक मानचित्र एक क्षेत्र पर एक विषय दिखाते हैं: बिंदु मानचित्र (1 बिंदु = तय संख्या), वर्णमात्री मानचित्र (मान के अनुसार रंगे क्षेत्र) और सममान रेखा मानचित्र (समान मान वाली रेखाएँ)।
- आँकड़ों का प्रक्रमण: माध्य, माध्यिका और बहुलक (कक्षा 12 भूगोल प्रायोगिक) – आँकड़ों का प्रक्रमण लंबी संख्या-सूची को कुछ उपयोगी संख्याओं में बदलता है। केंद्रीय प्रवृत्ति की तीन मापें हैं: माध्य (बराबर बाँटना: योग ÷ संख्या), माध्यिका (क्रम में रखने पर बीच का मान) और बहुलक (सबसे अधिक बार आने वाला मान)। हर एक की अवर्गीकृत और वर्गीकृत आँकड़ों के लिए विधि है। संतुलित आँकड़ों में तीनों पास-पास होते हैं; कुछ बहुत बड़े या छोटे मान हों तो माध्यिका अधिक उचित औसत है।