Spain 1º Bachillerato Biology, Geology and Environmental Sciences
अध्याय: 7
1. Scientific project
Scientific questions and hypotheses · Searching and communicating science · Reliable information sources · Lab and field experiments · Analysing scientific results · Science communication · Scientists and their work · History of scientific knowledge
- वैज्ञानिक विधि – वैज्ञानिक विधि वह सावधान तरीका है जिससे वैज्ञानिक पता लगाते हैं कि दुनिया कैसे चलती है। कुछ देखो (प्रेक्षण), परखने लायक प्रश्न पूछो, परिकल्पना बनाओ (साफ़, परखने योग्य अनुमान), निष्पक्ष प्रयोग से परखो (एक चर बदलो, एक मापो, बाकी सब एक जैसा), दोहराओ और आँकड़े लिखो, विश्लेषण करो, निष्कर्ष निकालो और साझा करो ताकि दूसरे जाँच सकें। जो नतीजे परिकल्पना से मेल न खाएँ, वे भी काम के हैं: वे नई परिकल्पना की ओर ले जाते हैं।
- शोध कौशल: प्रश्न से पूरे प्रोजेक्ट तक – शोध उत्तर खोजने का सावधान तरीका है। आप एक साफ़, सीमित प्रश्न पूछते हैं, उसका उत्तर पाने की योजना बनाते हैं, जानकारी खोजते हैं और हर स्रोत पर भरोसे की जाँच करते हैं, अपने आँकड़े जुटाकर विश्लेषण करते हैं, सबूत पर टिका निष्कर्ष निकालते हैं, और हर स्रोत को श्रेय देते हुए उसे साझा करते हैं।
- डेटा विश्लेषण – डेटा विश्लेषण यानी कच्चे आँकड़ों को जवाब में बदलना। इसका एक चक्र है: सवाल पूछो, डेटा इकट्ठा करो, साफ़ करो (ग़लती, दोहराव और खाली जवाब हटाओ), व्यवस्थित करो, माध्य, माध्यिका, परास और पैटर्न से विश्लेषण करो, सही चार्ट बनाओ और सावधानी से निष्कर्ष निकालो। बाहरी मान, छोटे नमूने और पक्षपात पर नज़र रखो, और याद रखो कि दो चीज़ों का साथ बढ़ना (सहसंबंध) यह साबित नहीं करता कि एक दूसरे का कारण है। डेटा को सुरक्षित रखना और अनुमति से इस्तेमाल करना भी ज़रूरी है।
- संचार कौशल: अपनी बात साफ़ और प्यार से कैसे पहुँचाएँ – संचार यानी लोगों के बीच अर्थ बाँटना। प्रेषक (भेजने वाला) विचार को संदेश में बदलता है, उसे माध्यम से भेजता है, और प्राप्तकर्ता उसे समझकर प्रतिपुष्टि (फ़ीडबैक) देता है। शोर, कठिन शब्द, तेज़ भावनाएँ और सांस्कृतिक अंतर जैसी बाधाएँ संदेश को रोक या मोड़ सकती हैं। हम अर्थ शब्दों से (शाब्दिक), चेहरे, आँखों, हाव-भाव, मुद्रा और आवाज़ के लहजे से (अशाब्दिक), और चित्रों से (दृश्य) भेजते हैं। सक्रिय श्रवण — ध्यान, धैर्य, सवाल और अपने शब्दों में दोहराना — साबित करता है कि संदेश पहुँचा। अच्छा वक्ता संदर्भ के हिसाब से बदलता है: औपचारिक या अनौपचारिक, बोलकर या लिखकर, और विनम्र अनुरोध, सलीके से मना करना, सच्ची माफ़ी और दृढ़ (न दब्बू, न आक्रामक) भाषा अपनाता है।
- विज्ञान की प्रकृति: वैज्ञानिक ज्ञान कैसे बनता और बदलता है – विज्ञान जानने का एक तरीका है जो ऐसे साक्ष्य पर टिका है जिसे कोई भी जाँच सकता है। वैज्ञानिक प्रेक्षण करते हैं, अनुमान लगाते हैं, ऐसे विचार परखते हैं जो गलत भी साबित हो सकें, और दूसरे विशेषज्ञों से अपना काम जँचवाते हैं। नियम बताते हैं क्या होता है; सिद्धांत बताते हैं क्यों। वैज्ञानिक ज्ञान भरोसेमंद है पर हमेशा बदलाव के लिए खुला, और कभी-कभी देखने का पूरा ढाँचा (प्रतिमान) ही बदल जाता है।
2. Ecology and sustainability
Environment, economy and One Health · Sustainability of daily activities · Initiatives for sustainable development · Ecosystem dynamics · Climate change and carbon cycle · Biodiversity loss · Waste and xenobiotics
- पर्यावरणीय स्वास्थ्य – पर्यावरणीय स्वास्थ्य यह देखता है कि हमारा परिवेश — हवा, पानी, भोजन, मिट्टी, रसायन, शोर, गर्मी और जिन इमारतों में रहते हैं — हमारी सेहत पर कैसे असर डालता है। नुक़सान शरीर में चार रास्तों से आता है: साँस, पीना, खाना और छूना। ख़तरा मात्रा (dose) और संपर्क के समय पर निर्भर है। कुछ विष खाद्य शृंखला में जमा होते जाते हैं। One Health (एक स्वास्थ्य) का विचार कहता है कि इंसान, जानवर और पर्यावरण की सेहत जुड़ी है, इसलिए तीनों को साथ बचाना होता है।
- संधारणीयता (Sustainability) – संधारणीयता यानी आज अपनी ज़रूरतें ऐसे पूरी करना कि आने वाली पीढ़ियाँ भी अपनी ज़रूरतें पूरी कर सकें। यह तीन स्तंभों पर टिकी है — पर्यावरण, समाज और अर्थव्यवस्था। कोई संसाधन तभी टिकाऊ ढंग से इस्तेमाल होता है जब हम उसे उसके नवीकरण से तेज़ न लें। आज मानवता हर साल लगभग 1.7 पृथ्वी जितना इस्तेमाल करती है, और यह इस्तेमाल बहुत असमान है। देखभाल (stewardship), समझदार योजना और GIS जैसे औज़ार हमें संधारणीयता की ओर ले जाते हैं।
- पर्यावरण और धारणीय विकास – पर्यावरण हमें संसाधन देता है, हमारा कचरा सोखता है, जीवन चलाता है और सुंदरता देता है। जब हम संसाधन प्रकृति के नवीकरण से तेज़ लेते हैं, या कचरा उसकी सोखने की क्षमता से ज़्यादा फेंकते हैं, तो धारण क्षमता पार होती है और पर्यावरण संकट आता है। भारत में भूमि अपक्षय, वायु-जल प्रदूषण, वन और जैव-विविधता की हानि है। जीवाश्म ईंधन जलाने से गर्मी फँसती है और वैश्विक उष्णता होती है; CFC ओज़ोन परत पतली करते हैं। धारणीय विकास आज की ज़रूरतें पूरी करता है बिना भावी पीढ़ियों की क्षमता घटाए।
- पारितंत्र: संरचना, उत्पादकता, ऊर्जा प्रवाह और पिरामिड – पारितंत्र प्रकृति की एक कार्यशील इकाई है जहाँ जैविक (जीवित) और अजैविक (निर्जीव) घटक आपस में मिलकर काम करते हैं। पौधे जिस दर से भोजन बनाते हैं वह उत्पादकता है: सकल (GPP) में से श्वसन घटाओ तो शुद्ध (NPP = GPP − R)। मृत पदार्थ पाँच चरणों में टूटता है: खंडन, निक्षालन, अपचय, ह्यूमीकरण और खनिजीकरण। ऊर्जा धूप से आती है, पोषी स्तरों में एक ही दिशा में बहती है और हर बार लगभग 10% ही आगे जाती है। संख्या और जीवभार के पिरामिड उल्टे हो सकते हैं, पर ऊर्जा का पिरामिड हमेशा सीधा होता है।
- जलवायु परिवर्तन और हरितगृह प्रभाव – जलवायु किसी जगह का लगभग 30 साल का औसत मौसम है। कार्बन डाइऑक्साइड और मीथेन जैसी हरितगृह गैसें पृथ्वी से निकलने वाली कुछ ऊष्मा रोक लेती हैं। मनुष्यों ने ईंधन जलाकर और जंगल काटकर ये गैसें बहुत बढ़ा दी हैं, इसलिए पृथ्वी गर्म हो रही है। इससे बर्फ़ पिघलती है, समुद्र तल बढ़ता है और मौसम उग्र होता है। हम गैसें घटा सकते हैं (शमन) और बदलाव के लिए तैयार हो सकते हैं (अनुकूलन)।
- जैव विविधता एवं संरक्षण – जैव विविधता यानी जीवन की विविधता, तीन स्तरों पर: आनुवंशिक, जातीय और पारिस्थितिक। यह भूमध्य रेखा के पास सबसे ज़्यादा है और क्षेत्र के साथ बढ़ती है (log S = log C + Z log A)। हर जाति ज़रूरी है, जैसे हवाई जहाज़ की कीलें। 'दुष्ट चौकड़ी' के कारण जातियाँ तेज़ी से खो रही हैं: आवास हानि और विखंडन, अति-दोहन, विदेशी जातियों का आक्रमण और सह-विलुप्ति। IUCN रेड लिस्ट (रेड डेटा बुक) जातियों को 'कम चिंता' से 'विलुप्त' तक बाँटती है। संरक्षण स्व-स्थाने (हॉटस्पॉट, राष्ट्रीय उद्यान, अभयारण्य, जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र, पवित्र उपवन, रामसर आर्द्रभूमि) और बाह्य-स्थाने (चिड़ियाघर, वानस्पतिक उद्यान, बीज बैंक) होता है।
- चयनित मुद्दों और समस्याओं पर भौगोलिक परिप्रेक्ष्य (कक्षा 12) – प्रदूषण का मतलब है हवा, पानी, ज़मीन या आवाज़ में हानिकारक चीज़ें मिलना। वायु प्रदूषण ईंधन जलाने, कारख़ानों और गाड़ियों से; जल प्रदूषण सीवेज, उद्योग और खेत के रसायनों से; भूमि प्रदूषण कूड़े और रसायनों से; ध्वनि प्रदूषण ट्रैफ़िक और लाउडस्पीकर से होता है। शहर बहुत ठोस कचरा बनाते हैं जिसे अलग करना, पुनर्चक्रित करना और सुरक्षित निपटाना चाहिए। लोग प्रतिकर्ष कारकों (गरीबी, काम नहीं) और अपकर्ष कारकों (नौकरी, सुविधाएँ) से गाँव से शहर जाते हैं; बहुत से गंदी बस्तियों में रहते हैं। कटाव, जलाक्रांति, लवणता, खनन और अति चराई से हुआ भूमि निम्नीकरण ठीक हो सकता है, जैसा झाबुआ के जलसंभर कार्य ने दिखाया।
3. History of Earth and life
Geological time and dating · Major events in Earth history · Reading the geological record · History of life on Earth · Main taxonomic groups
- विकास: नए प्रकार के जीव कैसे बनते हैं – जनन के समय विविधताएँ आती हैं। प्रकृति उन विविधताओं को चुनती है जो जीवित रहने में मदद करें, और कई पीढ़ियों में आबादी बदल जाती है: यही विकास है। सिर्फ़ वंशागत (DNA वाले) बदलाव आगे जाते हैं, उपार्जित नहीं। अलग हुई आबादियाँ नई जातियाँ बन सकती हैं। समजात अंग, समरूप अंग और जीवाश्म बताते हैं कि कौन किससे संबंधित है, और जटिल अंग चरण-दर-चरण बने।
- जीव जगत का वर्गीकरण – व्हिटेकर (1969) ने जीवों को पाँच जगत में बाँटा: मोनेरा, प्रोटिस्टा, कवक, पादप और जंतु। आधार थे: कोशिका का प्रकार, कोशिका भित्ति, शरीर की बनावट, पोषण का तरीका, जनन और आपसी संबंध। मोनेरा प्रोकैरियोट हैं (बैक्टीरिया, आर्कीबैक्टीरिया, सायनोबैक्टीरिया, माइकोप्लाज़्मा)। प्रोटिस्टा एककोशिकी यूकैरियोट हैं, पाँच समूहों में। कवक काइटिन भित्ति वाले परपोषी हैं, चार वर्गों में। लाइकेन शैवाल और कवक की साझेदारी है। वायरस, विरोइड और प्रायन किसी जगत में नहीं।
4. Earth dynamics and composition
The atmosphere · The hydrosphere · The geosphere · Internal processes and plate tectonics · External geological processes · Soil formation · Natural hazards · Classifying rocks and the rock cycle · Mineral classification · Uses of minerals and rocks · Geological heritage
- वायुमंडल का संघटन तथा संरचना – वायुमंडल पृथ्वी के चारों ओर हवा की मोटी चादर है, जिसे गुरुत्व पकड़े रखता है। इसमें ज़्यादातर नाइट्रोजन (78%) और ऑक्सीजन (21%) है; थोड़ी आर्गन, कार्बन डाइऑक्साइड, ओज़ोन, जलवाष्प और धूल भी है। इसकी पाँच परतें हैं: क्षोभमंडल (मौसम यहीं), समतापमंडल (ओज़ोन परत), मध्यमंडल (सबसे ठंडा), तापमंडल (आयनमंडल) और बहिर्मंडल। मौसम थोड़े समय की हालत है, जलवायु लगभग 30 साल का औसत। दोनों के तत्व एक ही हैं: तापमान, दाब, पवन, आर्द्रता, बादल और वर्षण।
- वायुमंडल में जल – हवा में हमेशा कुछ पानी अदृश्य वाष्प के रूप में होता है; इसकी मात्रा आर्द्रता है। निरपेक्ष आर्द्रता हवा के आयतन में वाष्प का असली वज़न है; सापेक्ष आर्द्रता बताती है कि उस तापमान पर जितनी वाष्प रख सकती है उसकी तुलना में हवा कितनी भरी है। पानी वाष्पीकरण से वाष्प बनता है (गर्मी लेता है) और हवा ओसांक तक ठंडी होने पर संघनन से फिर पानी (गर्मी देता है)। ज़मीन के पास संघनन से ओस, तुषार, कुहासा और कोहरा; ऊपर बादल बनते हैं: पक्षाभ, कपासी, स्तरी और वर्षा मेघ। बूँदें भारी होकर वर्षण बनकर गिरती हैं: बारिश, हिम, सहिम वृष्टि या ओले। वर्षा तीन तरह से होती है: संवहनीय, पर्वतीय और चक्रवाती (वाताग्री)। वर्षा विषुवत और पवनमुखी तटों पर सबसे ज़्यादा, और उपोष्ण मरुस्थलों, महाद्वीपों के भीतर और ध्रुवों पर सबसे कम है।
- पृथ्वी की आंतरिक संरचना: भूकंपीय तरंगें, परतें और ज्वालामुखी – कोई पृथ्वी के केंद्र तक खोद नहीं सकता, इसलिए हम अंदर की जानकारी प्रत्यक्ष स्रोतों (खानों की चट्टान, गहरी खुदाई, लावा) और अप्रत्यक्ष स्रोतों (गहराई के साथ ताप और दबाव, उल्कापिंड, गुरुत्व, चुंबकत्व और सबसे बढ़कर भूकंपीय तरंगें) से लेते हैं। P-तरंगें ठोस और तरल दोनों से गुज़रती हैं; S-तरंगें सिर्फ़ ठोस से। जहाँ तरंगें नहीं पहुँचतीं, वहाँ छाया क्षेत्र बनता है, जो बताता है कि बाहरी क्रोड तरल है। भूकंप परिमाण (रिक्टर) और तीव्रता (मरकैली) से मापा जाता है। पृथ्वी में पतली भूपर्पटी, नरम दुर्बलतामंडल वाला मोटा मैंटल, तरल बाहरी क्रोड और ठोस आंतरिक क्रोड है। सतह तक पहुँचा मैग्मा ज्वालामुखी बनाता है; अंदर ठंडा हुआ मैग्मा बैथोलिथ, सिल, डाइक जैसी अंतर्वेधी आकृतियाँ बनाता है।
- महासागरों और महाद्वीपों का वितरण: विस्थापन, विस्तार और प्लेटें – 1912 में अल्फ्रेड वेगनर ने कहा कि सारे महाद्वीप कभी एक भूखंड पैंजिया थे, जो एक महासागर पैंथालासा से घिरा था, और वे धीरे-धीरे अलग हुए। मिलते तट, चट्टानें, जीवाश्म, हिमनद जमाव और प्लेसर सोना उनके पक्ष में थे, पर वे बल नहीं समझा सके। समुद्र तल के मानचित्रण से कटक, मैदान और खाइयाँ मिलीं; फिर हैरी हेस ने सागरीय अधस्तल विस्तार दिया: मध्य-महासागरीय कटक पर नई भूपर्पटी बनती है और खाइयों में पुरानी डूबती है। इससे प्लेट विवर्तनिकी बनी: स्थलमंडल कठोर प्लेटों में टूटा है जो नरम दुर्बलतामंडल पर चलती हैं और अपसारी, अभिसारी और रूपांतर सीमाओं पर मिलती हैं। भारतीय प्लेट दक्षिण से अलग होकर उत्तर बढ़ी और एशिया से टकराकर हिमालय उठाया।
- मृदा: कैसे बनती है, उसकी परतें और उसे कैसे बचाएँ – मृदा (मिट्टी) ज़मीन की ऊपरी, ढीली और पतली परत है जिसमें पौधे उगते हैं। इसमें लगभग 45% चट्टान के कण, 5% जैविक पदार्थ (ह्यूमस), 25% पानी और 25% हवा होती है। जब अपक्षय जनक चट्टान को तोड़ता है और जीव ह्यूमस जोड़ते हैं, तब बहुत धीरे-धीरे मृदा बनती है। इसके पाँच कारक हैं: जनक चट्टान, जलवायु, जीव, उच्चावच (ढाल) और समय। ज़मीन को काटकर देखें तो परतें दिखती हैं, जिन्हें संस्तर कहते हैं: O (पत्तियाँ और ह्यूमस), A (ऊपरी मृदा), B (अवमृदा), C (टूटी चट्टान) और R (आधार शैल)। मृदा का गठन रेत, गाद और चिकनी मिट्टी के हिस्से पर निर्भर है। मृदा भोजन उगाती है, पानी जमा और साफ़ करती है, कार्बन रखती है और अनगिनत जीवों का घर है, पर अपरदन, लवण और प्रदूषण इसे बनने से कहीं तेज़ी से नष्ट कर सकते हैं।
- प्राकृतिक संकट (Natural Hazards) – प्राकृतिक संकट (hazard) ऐसी प्राकृतिक घटना है जो लोगों और चीज़ों को नुकसान पहुँचा सकती है, जैसे भूकंप, ज्वालामुखी, भूस्खलन, बाढ़, सूखा या चक्रवात। जब यह ऐसे लोगों पर पड़ती है जो तैयार नहीं हैं, तब यह आपदा (disaster) बन जाती है। भूगर्भीय संकट धरती के अंदर से आते हैं, मौसमी संकट हवा और पानी से। जोखिम = संकट × सुभेद्यता ÷ क्षमता, इसलिए चेतावनी, मज़बूत मकान और प्रशिक्षित लोग नुकसान घटाते हैं।
- चट्टानें और खनिज – खनिज एक प्राकृतिक, निर्जीव ठोस है जिसकी रासायनिक बनावट तय होती है और क्रिस्टल आकार नियमित होता है, जैसे क्वार्ट्ज़ या हेलाइट (नमक)। चट्टान एक या अधिक खनिजों का मिश्रण है। चट्टानें तीन तरह की हैं: आग्नेय (ठंडे मैग्मा या लावा से), अवसादी (दबे हुए कणों की परतों से) और कायांतरित (गरमी और दबाव से बदली)। शैल चक्र लाखों वर्षों में हर प्रकार को दूसरे में बदलता रहता है।
- भारत के खनिज तथा ऊर्जा संसाधन (कक्षा 12) – खनिज निश्चित बनावट वाला प्राकृतिक पदार्थ है। भारत के ज़्यादातर खनिज पुरानी पठारी चट्टानों में तीन पेटियों में हैं: उत्तर-पूर्वी पठार, दक्षिण-पश्चिमी पठार और उत्तर-पश्चिमी पेटी। लौह अयस्क, मैंगनीज़, बॉक्साइट और ताँबा धात्विक हैं; अभ्रक अधात्विक है। कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस परंपरागत ऊर्जा हैं जो ख़त्म हो जाएँगी। परमाणु, सौर, पवन, ज्वारीय, भूतापीय और जैव-ऊर्जा गैर-परंपरागत और साफ़ हैं। खनिज अनवीकरणीय हैं, इसलिए कम उपयोग, पुनर्चक्रण और विकल्प ज़रूरी हैं।
- सांस्कृतिक विरासत – सांस्कृतिक विरासत वह सब है जो किसी समुदाय को अतीत से मिला, जिसे वह आज महत्व देता है और आगे सौंपना चाहता है: इमारतें और स्मारक, संग्रहालय की चीज़ें, भाषाएँ, संगीत, नृत्य, त्योहार, हुनर, खाना और ज्ञान। मूर्त विरासत छू सकते हैं (अचल जैसे मंदिर और पुल, चल जैसे सिक्के और पांडुलिपियाँ); अमूर्त विरासत जी और निभाई जाती है; प्राकृतिक विरासत में ख़ास भू-दृश्य और जीव हैं। विरासत पहचान देती है, इतिहास सिखाती है, पर्यटन से कमाई लाती है और संस्कृतियों को जोड़ती है। मौसम, प्रदूषण, भीड़, लापरवाह निर्माण, उपेक्षा और संघर्ष इसे ख़तरे में डालते हैं; संरक्षण, कानून, संग्रहालय, विरासत सूचियाँ, शिक्षा और स्थानीय लोग इसे बचाते हैं।
5. Animal physiology and histology
Animal nutrition · Animal coordination · Animal reproduction
- जैव प्रक्रम और प्रकाश संश्लेषण – जैव प्रक्रम वे काम हैं जो ज़िंदा रहने के लिए शरीर को लगातार करने पड़ते हैं: पोषण, श्वसन, परिवहन और उत्सर्जन। हरे पौधे प्रकाश संश्लेषण से पोषण करते हैं: सूर्य के प्रकाश और क्लोरोफिल की मदद से वे कार्बन डाइऑक्साइड और जल से ग्लूकोज बनाते हैं और ऑक्सीजन छोड़ते हैं।
- तंत्रिका तंत्र, प्रतिवर्ती क्रिया और मानव मस्तिष्क – तंत्रिका कोशिकाएँ (न्यूरॉन) संदेश को विद्युत आवेग के रूप में ले जाती हैं और सिनैप्स नाम के छोटे अंतर को रसायनों से पार करती हैं। झटपट बचाव वाली क्रियाएँ (प्रतिवर्ती क्रिया) मेरुरज्जु सँभालता है; सोचना और नियंत्रण मस्तिष्क करता है, जिसे खोपड़ी और तरल की गद्दी बचाती है।
- जंतुओं में जनन – जंतु दो तरह से बच्चे पैदा करते हैं। अलैंगिक जनन में एक ही जनक अपनी प्रति बनाता है (हाइड्रा में मुकुलन, टूटकर बढ़ना, या बिना निषेचन वाले अंडे)। लैंगिक जनन में नर युग्मक (शुक्राणु) मादा युग्मक (अंडाणु) से मिलकर युग्मनज बनाता है; इससे जीन मिलते हैं और विविधता आती है। निषेचन शरीर के बाहर पानी में (मेंढक, मछली) या शरीर के अंदर (कीट, सरीसृप, पक्षी, स्तनधारी) होता है। ज़मीन के जंतु खोल वाले अंडे देते हैं या बच्चे को अंदर रखते हैं। कई जंतुओं में कायांतरण होता है: पूर्ण (अंडा, लार्वा, प्यूपा, वयस्क) या अपूर्ण (अंडा, निम्फ, वयस्क)।
6. Plant physiology and histology
Photosynthesis · Xylem and phloem sap · Plant responses and hormones · Plant reproduction · Plant adaptations
- जैव प्रक्रम और प्रकाश संश्लेषण – जैव प्रक्रम वे काम हैं जो ज़िंदा रहने के लिए शरीर को लगातार करने पड़ते हैं: पोषण, श्वसन, परिवहन और उत्सर्जन। हरे पौधे प्रकाश संश्लेषण से पोषण करते हैं: सूर्य के प्रकाश और क्लोरोफिल की मदद से वे कार्बन डाइऑक्साइड और जल से ग्लूकोज बनाते हैं और ऑक्सीजन छोड़ते हैं।
- फूल वाला पौधा कैसे काम करता है – फूल वाला पौधा चल नहीं सकता, इसलिए उसका शरीर इकट्ठा करने के लिए बना है: लाखों बालों वाली जड़ें मिट्टी से पानी और खनिज लेती हैं, चौड़ी पत्तियाँ कार्बन डाइऑक्साइड और रोशनी लेती हैं। जाइलम कच्चा रस (पानी + खनिज) ऊपर ले जाता है, पत्तियों से भाप उड़ने का खिंचाव इसे चलाता है। फ्लोएम तैयार रस (चीनी) पत्तियों से जड़, फल और कलियों तक ले जाता है। हार्मोन बढ़वार चलाते हैं, रक्षा के तरीक़े पौधे को बचाते हैं, और जगह के हिसाब से उसकी बनावट बदलती है।
- पौधों में समन्वय: अनुवर्तन गतियाँ और पादप हॉर्मोन – पौधों में न तंत्रिका है न पेशी, फिर भी वे प्रतिक्रिया करते हैं। कुछ प्रतिक्रियाएँ तुरंत होती हैं और वृद्धि से नहीं जुड़ीं (छुईमुई की पत्तियाँ पानी हटने से मुड़ती हैं)। कुछ धीमी, दिशा वाली वृद्धि गतियाँ हैं जिन्हें अनुवर्तन कहते हैं, और इन्हें ऑक्सिन, जिबरेलिन, साइटोकाइनिन और एब्सिसिक अम्ल जैसे हॉर्मोन नियंत्रित करते हैं।
- पुष्पी पादपों में लैंगिक जनन – फूल पौधे का जनन अंग है। पुंकेसर परागकण (नर युग्मकोद्भिद) बनाता है। बीजांड के अंदर भ्रूणकोष (मादा युग्मकोद्भिद) होता है, जिसमें 7 कोशिकाएँ और 8 केंद्रक होते हैं। परागण से परागकण वर्तिकाग्र तक पहुँचता है, स्त्रीकेसर उसकी जाँच करता है, और पराग नली दो नर युग्मक भ्रूणकोष तक लाती है। एक अंड से मिलकर युग्मनज (2n) बनाता है, दूसरा दो ध्रुवीय केंद्रकों से मिलकर प्राथमिक भ्रूणपोष केंद्रक (3n) बनाता है। यही दोहरा निषेचन है। बीजांड बीज बनता है और अंडाशय फल।
7. Microorganisms and acellular forms
Bacteria and archaea · Bacterial metabolism · Microbes and infectious disease · Culturing microorganisms · Horizontal gene transfer · Viruses, viroids and prions
- बैक्टीरिया (जीवाणु): छोटी कोशिकाएँ, बड़ा काम – बैक्टीरिया एक-कोशिकीय प्रोकैरियोट हैं: इनमें केंद्रक और झिल्ली से घिरे अंगक नहीं होते। इनका DNA एक गोल लूप (न्यूक्लिऑइड) है, अक्सर साथ में छोटे छल्ले प्लाज़्मिड। इनमें 70S राइबोसोम, कोशिका झिल्ली, पेप्टिडोग्लाइकन की कोशिका भित्ति, और कभी-कभी कैप्सूल, पिलि और कशाभ होते हैं। आकार: कोकस, बैसिलस, स्पिरिलम, विब्रियो। ये द्विखंडन से जनन करते हैं और संयुग्मन, रूपांतरण और पारक्रमण से जीन बगल में बाँट सकते हैं। ये प्रकाश-संश्लेषण, रसायन-संश्लेषण, अपघटन, सहजीविता या परजीविता से भोजन लेते हैं और कार्बन व नाइट्रोजन चक्र चलाते हैं। आर्किया दिखने में मिलते-जुलते हैं पर उनकी भित्ति और झिल्ली का रसायन अलग है और वे अक्सर कठिन जगहों पर रहते हैं।
- मानव स्वास्थ्य तथा रोग – स्वास्थ्य का मतलब है शरीर, मन और सामाजिक जीवन तीनों ठीक हों। रोग कई बार कीटाणुओं (रोगजनक) से होते हैं: जीवाणु, वायरस, प्रोटोज़ोआ, कृमि और कवक। शरीर दो तरह की प्रतिरक्षा से लड़ता है: सहज (जन्म से) और उपार्जित (सीखी हुई, याद रखने वाली)। टीके इसी याददाश्त का उपयोग करते हैं। HIV सहायक T कोशिकाओं को नष्ट करके एड्स करता है। कैंसर में कोशिकाएँ बिना रुके बँटती हैं। नशा और शराब किशोरों के शरीर और मन को नुकसान पहुँचाते हैं।
- सूक्ष्मजीव संवर्धन: लैब में सूक्ष्मजीव कैसे उगाते हैं – किसी सूक्ष्मजीव को पढ़ने के लिए हम कुछ कोशिकाओं से बहुत सारी कोशिकाएँ उगाते हैं। इसे संवर्ध (कल्चर) कहते हैं। पहले औज़ारों और भोजन के सारे कीटाणु मारते हैं (निर्जर्मीकरण)। फिर प्लेट में सूक्ष्मजीवों को भोजन देते हैं (संवर्धन माध्यम)। गर्म करके ठंडा किए तार के लूप से थोड़ी कोशिकाएँ फैलाते हैं (स्ट्रीकिंग) और प्लेट को गर्म जगह रखते हैं। हर कोशिका एक दिखने वाला बिंदु बन जाती है, जिसे कॉलोनी कहते हैं। फ़्लास्क में कोशिकाओं की संख्या चार चरणों में बढ़ती है: लैग, लॉग, स्थिर और मृत्यु।