सूक्ष्मजीव संवर्ध क्या है?
संवर्ध (कल्चर) यानी थोड़े सूक्ष्मजीवों से जान-बूझकर उगाए गए बहुत सारे सूक्ष्मजीव। एक-एक सूक्ष्मजीव बहुत छोटा होता है। जब लाखों साथ उगते हैं तो हम उन्हें देख, गिन और जाँच सकते हैं।
सूक्ष्मजीवों को चाहिए: भोजन (कार्बन स्रोत जैसे शर्करा, नाइट्रोजन स्रोत जैसे प्रोटीन, खनिज लवण), पानी, सही तापमान और pH, और कई को ऑक्सीजन। कुछ ऑक्सीजन में मर जाते हैं (अवायवीय)। इनके भोजन के मिश्रण को संवर्धन माध्यम कहते हैं।
- द्रव माध्यम (ब्रॉथ): फ़्लास्क या नली में। बहुत कोशिकाएँ उगाने के लिए।
- ठोस माध्यम: ब्रॉथ + अगर, समुद्री शैवाल से बनी जेली। सूक्ष्मजीव अगर नहीं खाते; यह बस माध्यम को ठोस बनाता है ताकि कॉलोनियाँ अपनी जगह रहें।
- चयनात्मक माध्यम: सिर्फ़ कुछ सूक्ष्मजीव उगने देता है (जैसे ज़्यादा नमक)।
- विभेदक माध्यम: अलग सूक्ष्मजीवों की कॉलोनियाँ अलग रंग की दिखती हैं।
निर्जर्मीकरण: पहले हर कीटाणु मारना
निर्जर्मीकरण (स्टेरिलाइज़ेशन) यानी हर जीवित चीज़ को मारना, कठोर बीजाणुओं को भी। अगर यह छोड़ दें तो अनचाहे सूक्ष्मजीव (संदूषक) उगकर नतीजा बिगाड़ देते हैं।
- ऑटोक्लेव: दबाव में भाप, 121 °C पर 15–20 मिनट। माध्यम और ज़्यादातर औज़ारों के लिए। बड़े प्रेशर कुकर जैसा।
- गर्म हवा ओवन: सूखी गर्मी, लगभग 160 °C पर 2 घंटे। काँच और धातु के लिए।
- लौ: तार का लूप लौ में तब तक रखते हैं जब तक लाल न चमके।
- छनन (फ़िल्ट्रेशन): बहुत बारीक छेद (0.2 µm) वाला फ़िल्टर जीवाणुओं को रोकता है। गर्मी से बिगड़ने वाले द्रव, जैसे विटामिन, के लिए।
- विकिरण और रसायन: प्लास्टिक और मेज़ के लिए UV प्रकाश या गामा किरणें; पोंछने के लिए 70% अल्कोहल (यह विसंक्रमण है, सारे बीजाणु शायद न मरें)।
पाश्चरीकरण (जैसे दूध को 72 °C पर 15 सेकंड) निर्जर्मीकरण नहीं है। यह ज़्यादातर हानिकारक कीटाणु मारता है, सब नहीं।
अपूतिक तकनीक और स्ट्रीक प्लेट
अपूतिक (एसेप्टिक) तकनीक यानी ऐसे काम करना कि नए कीटाणु अंदर न आएँ: हाथ धोएँ, मेज़ पोंछें, लौ के पास काम करें (गर्म हवा ऊपर उठकर धूल दूर ले जाती है), ढक्कन थोड़ा और थोड़ी देर ही खोलें, और लूप को इस्तेमाल से पहले और बाद में लौ में गर्म करें।
संरोपण (इनोकुलेशन) यानी माध्यम में सूक्ष्मजीव डालना। स्ट्रीक प्लेट विधि में लूप क्षेत्र 1 में ज़िग-ज़ैग रेखाओं में नमूना फैलाता है, फिर लौ में गर्म होता है, फिर क्षेत्र 1 से थोड़ी कोशिकाएँ क्षेत्र 2 में खींचता है, और ऐसे आगे। हर क्षेत्र में कोशिकाएँ कम होती जाती हैं। आख़िरी क्षेत्र में एक-एक कोशिका दूर-दूर बैठती है।
ऊष्मायन (इनक्यूबेशन) (प्लेट को गर्म रखना, प्रायः 25–37 °C, उल्टा ताकि बूँदें न गिरें) के बाद हर कोशिका एक कॉलोनी बनती है। एक कॉलोनी की सारी कोशिकाएँ एक ही कोशिका से आती हैं, इसलिए एक जैसी होती हैं। एक कॉलोनी उठाने से शुद्ध संवर्ध मिलता है। अन्य विधियाँ: स्प्रेड प्लेट (पतली बूँद काँच के स्प्रेडर से फैलाना) और पोर प्लेट (नमूना गर्म अगर में मिलाना)।
गिनती: नमूने को 10, 100, 1000 गुना पतला करके कॉलोनियाँ गिनने से पता चलता है कि शुरू में कितनी जीवित कोशिकाएँ थीं (कॉलोनी बनाने वाली इकाइयाँ, CFU)।
जीवाणु वृद्धि वक्र
जीवाणु दो में बँटते हैं (द्विविभाजन)। दुगुना होने में लगा समय पीढ़ी काल (जनरेशन टाइम) है; 37 °C पर कुछ आँत जीवाणुओं का लगभग 20 मिनट। बंद फ़्लास्क में वृद्धि के चार चरण होते हैं:
- लैग: कोशिकाएँ नए भोजन की आदत डालती हैं और एंज़ाइम बनाती हैं; संख्या लगभग नहीं बदलती।
- लॉग (घातांकी): कोशिकाएँ बार-बार दुगुनी होती हैं; संख्या बहुत तेज़ी से बढ़ती है।
- स्थिर: भोजन कम होता है, अपशिष्ट बढ़ता है; नई कोशिकाएँ = मरती कोशिकाएँ।
- मृत्यु: जितनी बनती हैं उससे ज़्यादा मरती हैं।
वृद्धि को कॉलोनियाँ गिनकर, धुंधलापन (वर्णमापी में प्रकाशिक घनत्व) नापकर, या कोशिकाएँ तौलकर मापते हैं। सूत्र: N = N₀ × 2ⁿ, जहाँ n = पीढ़ियों की संख्या = समय ÷ पीढ़ी काल।
उपयोग और सुरक्षा
संवर्ध के उपयोग: पता लगाना कि रोग किस कीटाणु से है और कौन-सा प्रतिजैविक उसे मारता है; बड़े टैंकों, यानी किण्वक (बायोरिएक्टर), में उत्पाद बनाना – दही, चीज़, ब्रेड, प्रतिजैविक, एंज़ाइम, इंसुलिन, टीके; पानी और भोजन की सुरक्षा जाँचना; और बेहतर नस्ल (स्ट्रेन) चुनना (जैसे ज़्यादा ऐल्कोहॉल बनाने वाला यीस्ट, या उत्परिवर्तन या जेनेटिक इंजीनियरिंग से सुधरा स्ट्रेन)। किण्वन के बाद उत्पाद को अलग और शुद्ध करते हैं: इसे अनुप्रवाह संसाधन (डाउनस्ट्रीम प्रोसेसिंग) कहते हैं।
स्कूल में सुरक्षा: सिर्फ़ 25 °C या कम पर उगाएँ, प्लेटों पर टेप लगाएँ, ऊष्मायन के बाद कभी न खोलें, और फेंकने से पहले निर्जर्मित करवाएँ। हवा या त्वचा के कुछ सूक्ष्मजीव लोगों को बीमार कर सकते हैं।
घर पर करके देखें
दही परीक्षण: तीन छोटी कटोरियों में गुनगुना दूध लें। दो में एक-एक चम्मच दही डालें। इनमें से एक फ़्रिज में और एक गर्म जगह रखें। तीसरी में दही न डालें। 8 घंटे बाद देखें। कौन-सा जमा? इससे संरोप और तापमान का असर दिखता है। 3D के चरण 6 में तापमान सूची से यही विचार जाँचें।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- कोशिकाओं की संख्या: N = N₀ × 2ⁿ
- पीढ़ियाँ: n = समय ÷ पीढ़ी काल
- ऑटोक्लेव: 121 °C, 15–20 मिनट (दबाव में भाप)
- गर्म हवा ओवन: 160 °C, लगभग 2 घंटे
- नमूने में कोशिकाएँ = गिनी कॉलोनियाँ × तनुता गुणक ÷ डाला गया आयतन
हल किए गए उदाहरण
1. एक जीवाणु हर 20 मिनट में दुगुना होता है। 1 कोशिका से शुरू करें तो लॉग चरण में 2 घंटे बाद कितनी कोशिकाएँ?
2 घंटे = 120 मिनट। n = 120 ÷ 20 = 6 पीढ़ियाँ। N = 1 × 2⁶ = 64 कोशिकाएँ।
2. फ़्लास्क में 1000 कोशिकाएँ हैं। पीढ़ी काल 30 मिनट है। 3 घंटे बाद कितनी कोशिकाएँ?
n = 180 ÷ 30 = 6। N = 1000 × 2⁶ = 1000 × 64 = 64 000 कोशिकाएँ।
3. 1000 गुना पतले नमूने का 0.1 mL डालने पर 50 कॉलोनियाँ बनीं। मूल नमूने के प्रति mL में कितनी जीवित कोशिकाएँ थीं?
कोशिकाएँ = 50 × 1000 ÷ 0.1 = 500 000 = 5 × 10⁵ CFU प्रति mL।
4. विटामिन विलयन को ऑटोक्लेव के बजाय फ़िल्टर से निर्जर्मित क्यों करते हैं?
विटामिन गर्मी में टूट जाते हैं। 0.2 µm फ़िल्टर बिना गर्म किए जीवाणु हटा देता है, इसलिए विटामिन सक्रिय रहते हैं।
आम गलतियाँ
- अगर को सूक्ष्मजीवों का भोजन समझना। यह बस माध्यम को ठोस बनाने वाली जेली है; भोजन तो शर्करा, प्रोटीन और लवण हैं।
- पाश्चरीकरण को निर्जर्मीकरण कहना। पाश्चरीकरण ज़्यादातर हानिकारक कीटाणु मारता है, निर्जर्मीकरण बीजाणुओं समेत सब कुछ।
- स्ट्रीक क्षेत्रों के बीच लूप को लौ में गर्म न करना। तब बहुत कोशिकाएँ आगे चली जाती हैं और अलग कॉलोनियाँ नहीं बनतीं।
- चरण उलझाना: संख्या सबसे तेज़ लॉग चरण में बढ़ती है, लैग में नहीं।