घर में सूक्ष्मजीव: खाद्य प्रसंस्करण
- दही: लैक्टोबैसिलस और दूसरे लैक्टिक अम्ल जीवाणु (LAB) दूध की शर्करा को लैक्टिक अम्ल में बदलते हैं। अम्ल दूध के प्रोटीन को जमा देता है। दूध में डाला गया थोड़ा दही जामन (निवेशद्रव्य) कहलाता है क्योंकि उसमें लाखों LAB होते हैं। LAB विटामिन B12 भी बढ़ाते हैं और पेट में हानिकारक कीटाणुओं को दबाते हैं।
- डोसा और इडली का घोल: जीवाणु इसे किण्वित करते हैं और CO2 गैस से यह फूलता है।
- ब्रेड: बेकर यीस्ट सैकेरोमाइसीज़ सेरीविसी आटे को किण्वित करता है; CO2 से आटा फूलता है।
- ताड़ी: ताड़ के रस को किण्वित करके बना पारंपरिक पेय।
- पनीर/चीज़: अलग सूक्ष्मजीव अलग स्वाद और बनावट देते हैं। स्विस चीज़ के बड़े छेद प्रोपिओनिबैक्टीरियम शारमैनी की CO2 से बनते हैं। रॉकफ़ोर्ट चीज़ को खास कवक से पकाकर स्वाद दिया जाता है।
- मछली, सोयाबीन और बाँस की कोंपलें भी किण्वित करके भोजन बनाया जाता है।
उद्योग में सूक्ष्मजीव
उद्योग में सूक्ष्मजीवों को बड़े बर्तनों में उगाया जाता है जिन्हें किण्वक (फ़र्मेंटर) कहते हैं। इन्हें शर्करा और सही तापमान दिया जाता है। ये कई उत्पाद देते हैं।
पेय
यीस्ट (सैकेरोमाइसीज़ सेरीविसी, ब्रूअर यीस्ट) अनाज और फलों के रस को किण्वित करके एथेनॉल बनाता है। वाइन और बीयर बिना आसवन बनती हैं। व्हिस्की, ब्रांडी और रम किण्वित घोल का आसवन करके बनती हैं, इसलिए बहुत तेज़ होती हैं।
कार्बनिक अम्ल
| उत्पाद | सूक्ष्मजीव |
|---|---|
| सिट्रिक अम्ल | ऐस्पर्जिलस नाइगर (कवक) |
| ऐसीटिक अम्ल (सिरका) | ऐसीटोबैक्टर ऐसीटी (जीवाणु) |
| ब्यूटिरिक अम्ल | क्लॉस्ट्रिडियम ब्यूटिलिकम (जीवाणु) |
| लैक्टिक अम्ल | लैक्टोबैसिलस (जीवाणु) |
एंज़ाइम
- लाइपेज़ डिटर्जेंट में तेल के दाग हटाते हैं।
- पेक्टिनेज़ और प्रोटिएज़ बोतलबंद फलों के रस को साफ़ करते हैं।
- स्ट्रेप्टोकाइनेज़ (स्ट्रेप्टोकोकस से, अब आनुवंशिक इंजीनियरिंग से भी) हृदयाघात में रक्त के थक्के घोलता है: 'थक्का तोड़क'।
अन्य जैव-सक्रिय अणु
- साइक्लोस्पोरिन A – कवक ट्राइकोडर्मा पॉलीस्पोरम से: प्रतिरक्षा-निरोधक, प्रत्यारोपित अंग की अस्वीकृति रोकता है।
- स्टैटिन – यीस्ट मोनैस्कस परप्यूरियस से: कोलेस्ट्रॉल बनाने वाले एंज़ाइम को रोककर रक्त कोलेस्ट्रॉल घटाते हैं।
वाहित मल उपचार
वाहित मल घरों और शहरों का गंदा पानी है। इसमें बहुत कार्बनिक पदार्थ और कीटाणु होते हैं। इसे वाहित मल उपचार संयंत्र (STP) में दो मुख्य चरणों में साफ़ किया जाता है।
प्राथमिक उपचार (भौतिक)
बड़ी चीज़ें छानकर हटाई जाती हैं। ग्रिट (मिट्टी, छोटे पत्थर) बैठ जाती है। फिर ठोस नीचे प्राथमिक आपंक बनकर बैठते हैं। ऊपर का द्रव बहिःस्राव है।
द्वितीयक उपचार (जैविक)
- बहिःस्राव बड़ी वातन टंकियों में जाता है। हवा डाली और घुमाई जाती है।
- उपयोगी वायवीय सूक्ष्मजीव ऊर्णक (फ़्लॉक) बनाते हैं: कवक के धागों से बँधे जीवाणुओं के गुच्छे, छोटे जाल जैसे।
- ऊर्णक कार्बनिक पदार्थ खाते हैं। इससे BOD घटता है।
- BOD काफ़ी कम होने पर पानी अवसादन टंकी में जाता है। ऊर्णक सक्रियित आपंक बनकर बैठते हैं। इसका थोड़ा भाग जामन की तरह वातन टंकी में वापस भेजा जाता है।
- बाकी आपंक अवायवीय आपंक पाचक में जाता है। वहाँ दूसरे जीवाणु बिना हवा के इसे पचाकर बायोगैस (मेथेन, H2S, CO2) बनाते हैं।
- साफ़ पानी नदियों में छोड़ा जाता है।
BOD क्या है?
BOD (जैव रासायनिक ऑक्सीजन माँग) वह ऑक्सीजन है जो जीवाणु एक लीटर पानी के सारे कार्बनिक पदार्थ को तोड़ने में खर्च करते हैं। ज़्यादा गंदगी → जीवाणुओं को ज़्यादा भोजन → ज़्यादा ऑक्सीजन खर्च → ज़्यादा BOD। इसलिए BOD बताता है पानी कितना प्रदूषित है। साफ़ पानी का BOD कम होता है।
भारत के पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने गंगा कार्य योजना और यमुना कार्य योजना शुरू कीं, ताकि कई STP बनें और इन नदियों में सिर्फ़ उपचारित पानी जाए।
बायोगैस
बायोगैस सूक्ष्मजीवों द्वारा बना गैस ईंधन है। इसमें ज़्यादातर मेथेन, साथ में CO2 और थोड़ी H2S और H2 होती है।
मेथेन बनाने वाले जीवाणु मेथेनोजन कहलाते हैं, जैसे मेथेनोबैक्टीरियम। ये सिर्फ़ बिना ऑक्सीजन (अवायवीय) वाली जगह रहते हैं: आपंक पाचक में और मवेशियों के रूमेन (पेट का पहला भाग) में, जहाँ ये सेलुलोज़ पचाने में मदद करते हैं। इसलिए गोबर में मेथेनोजन भरपूर होते हैं।
बायोगैस संयंत्र कैसे काम करता है:
- लगभग 10–15 फ़ुट गहरी कंक्रीट टंकी में गोबर और पानी का घोल भरा जाता है।
- ऊपर तैरता ढक्कन होता है। गैस बनने पर ढक्कन ऊपर उठता है।
- पाइप से गैस घरों में खाना पकाने और रोशनी के लिए जाती है।
- इस्तेमाल हुआ घोल दूसरे रास्ते से निकलता है और खाद बनता है।
भारत में यह तकनीक मुख्य रूप से IARI (भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान) और KVIC (खादी और ग्रामोद्योग आयोग) के प्रयासों से विकसित हुई।
जैव नियंत्रण कारक के रूप में सूक्ष्मजीव
जैव नियंत्रण का मतलब रासायनिक ज़हर की जगह जीवों से कीट और पौधों के रोग नियंत्रित करना। ज़हर उपयोगी कीटों को भी मारते हैं, मिट्टी-पानी दूषित करते हैं और भोजन में पहुँचते हैं।
जैविक किसान संतुलन रखते हैं: हर कीट को नहीं मारते, शिकारी कीटों को कीट संख्या कम रखने देते हैं।
- लेडीबर्ड भृंग एफ़िड खाता है; ड्रैगनफ़्लाई मच्छर खाती है।
- बैसिलस थुरिंजिएंसिस (Bt): इसके बीजाणु पौधों पर छिड़के जाते हैं। इल्लियाँ इन्हें खाती हैं, आँत में विष निकलता है और वे मर जाती हैं। दूसरे कीटों को नुकसान नहीं। Bt विष के जीन पौधों में भी डाले गए हैं, जैसे Bt कपास।
- ट्राइकोडर्मा: जड़ों में रहने वाला मुक्तजीवी कवक; रोग करने वाले कई कवकों से लड़ता है।
- बैकुलोवायरस (वंश न्यूक्लियोपॉलीहाइड्रोवायरस): सिर्फ़ कीटों और कुछ संधिपादों पर हमला करते हैं। पौधों, पक्षियों, स्तनधारियों या उपयोगी कीटों को नुकसान नहीं। समेकित कीट प्रबंधन (IPM) के लिए अच्छे।
जैव उर्वरक के रूप में सूक्ष्मजीव
जैव उर्वरक वे जीव हैं जो मिट्टी में पोषक बढ़ाते हैं। इनसे रासायनिक उर्वरक कम लगते हैं।
- राइज़ोबियम: दलहनी पौधों (मटर, चना, सेम) की जड़ ग्रंथिकाओं में रहकर हवा की नाइट्रोजन को पौधे के उपयोग लायक बनाता है (सहजीवी)।
- ऐज़ोस्पिरिलम और ऐज़ोटोबैक्टर: मिट्टी में मुक्त रहते हैं; ये भी नाइट्रोजन स्थिर करते हैं।
- कवकमूल (माइकोराइज़ा): पौधे की जड़ों के साथ रहने वाले कवक (जैसे ग्लोमस)। ये मिट्टी से फ़ॉस्फ़ोरस लेकर पौधे को देते हैं, और जड़ के रोगों, लवणता और सूखे से भी बचाते हैं।
- सायनोबैक्टीरिया (नील-हरित शैवाल) जैसे ऐनाबीना, नॉस्टॉक, ऑसिलेटोरिया: खासकर धान के खेतों में नाइट्रोजन स्थिर करते हैं और कार्बनिक पदार्थ जोड़ते हैं।
भारत में बाज़ार में कई जैव उर्वरक मिलते हैं और किसान इनका नियमित उपयोग करते हैं।
प्रतिजैविक और उनका सावधानी से उपयोग
प्रतिजैविक (एंटीबायोटिक) ('जीवन के विरुद्ध') कुछ सूक्ष्मजीवों द्वारा बने रसायन हैं जो रोग करने वाले सूक्ष्मजीवों (मुख्यतः जीवाणुओं) को मारते हैं या उनकी वृद्धि रोकते हैं।
पहला प्रतिजैविक पेनिसिलिन था। अलेक्ज़ेंडर फ़्लेमिंग स्टैफ़िलोकोकस जीवाणु उगा रहे थे। उन्होंने देखा कि एक प्लेट पर फफूँद पेनिसिलियम नोटेटम उग आई और उसके चारों ओर जीवाणु नहीं उगे। उन्होंने रसायन का नाम पेनिसिलिन रखा। बाद में अर्नेस्ट चेन और हॉवर्ड फ़्लोरे ने इसे काम की दवा बनाया; द्वितीय विश्व युद्ध में इससे कई सैनिक बचे। तीनों को 1945 का नोबेल पुरस्कार मिला।
प्रतिजैविकों ने प्लेग, काली खाँसी, डिप्थीरिया और कुष्ठ जैसे रोगों से मौतें बहुत घटाई हैं।
सावधानी से प्रयोग करें
- प्रतिजैविक वायरस (ज़ुकाम, फ़्लू, डेंगू) पर काम नहीं करते।
- सिर्फ़ डॉक्टर की सलाह पर, सही खुराक में लें।
- पूरा कोर्स करें। जल्दी छोड़ने पर सबसे मज़बूत जीवाणु बचते हैं, बढ़ते हैं और प्रतिरोध आगे देते हैं।
- ज़्यादा और गलत उपयोग से प्रतिजैविक-प्रतिरोधी जीवाणु ('सुपरबग') बनते हैं, जिनका इलाज बहुत कठिन है।
आज़माएँ: दही जमाइए और बदलाव देखिए
एक कप गुनगुना दूध (शरीर के तापमान जितना) लें। एक चम्मच दही मिलाकर हिलाएँ। ढककर गरम जगह रखें। 2, 4 और 8 घंटे बाद देखें और एक बूँद चखें। लिखें कब गाढ़ा और खट्टा हुआ। फिर ठंडे दूध से आज़माएँ: बहुत ज़्यादा समय लगेगा, क्योंकि ठंड में LAB धीरे बढ़ते हैं।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- दूध --(LAB)--> दही (लैक्टिक अम्ल; ज़्यादा विटामिन B12)
- शर्करा --(यीस्ट)--> एथेनॉल + CO₂
- ज़्यादा BOD = ज़्यादा कार्बनिक प्रदूषण; द्वितीयक उपचार BOD घटाता है
- बायोगैस = CH₄ (ज़्यादातर) + CO₂ + H₂S + H₂; मेथेनोजन बिना O₂ के बनाते हैं
- राइज़ोबियम, ऐज़ोटोबैक्टर, ऐज़ोस्पिरिलम, सायनोबैक्टीरिया → नाइट्रोजन; कवकमूल (ग्लोमस) → फ़ॉस्फ़ोरस
- पेनिसिलिन: फ़्लेमिंग (पेनिसिलियम नोटेटम); चेन और फ़्लोरे ने दवा बनाया
हल किए गए उदाहरण
1. जामन डालने के बाद गुनगुना दूध ठंडे दूध से जल्दी दही क्यों बनता है?
LAB जीवित कोशिकाएँ हैं। गुनगुने दूध (लगभग 30–40 °C) में ये तेज़ी से बढ़ती और बँटती हैं, इसलिए जल्दी लैक्टिक अम्ल बनता है। ठंडे दूध में ये धीरे बढ़ती हैं, इसलिए ज़्यादा समय लगता है।
2. नमूना A का BOD 20 mg/L और नमूना B का 400 mg/L है। कौन ज़्यादा प्रदूषित है और क्यों?
नमूना B। ज़्यादा BOD का मतलब जीवाणुओं के खाने को ज़्यादा कार्बनिक पदार्थ, इसलिए ज़्यादा ऑक्सीजन खर्च। B का BOD, A का 20 गुना है, इसलिए यह कहीं ज़्यादा प्रदूषित है।
3. एक संयंत्र में वाहित मल का BOD 300 mg/L है। वातन के बाद 30 mg/L रह गया। BOD कितने प्रतिशत घटा?
कमी = 300 − 30 = 270 mg/L। प्रतिशत = 270 / 300 × 100 = 90%। ऊर्णकों ने लगभग नौ-दसवाँ कार्बनिक पदार्थ खा लिया।
4. बायोगैस संयंत्र को हवाबंद क्यों रखना चाहिए?
मेथेनोजन अवायवीय हैं; ऑक्सीजन उनका काम रोक देती है। साथ ही हवा और मेथेन मिलकर विस्फोटक मिश्रण बना सकते हैं। इसलिए टंकी बंद होनी चाहिए।
5. एक किसान पहले मटर और फिर उसी खेत में गेहूँ उगाता है। गेहूँ को कम यूरिया क्यों लगता है?
मटर दलहन है। इसकी जड़ ग्रंथिकाओं में राइज़ोबियम हवा की नाइट्रोजन मिट्टी में स्थिर करता है। कुछ नाइट्रोजन अगली फ़सल के लिए बची रहती है, इसलिए गेहूँ को कम रासायनिक उर्वरक चाहिए।
6. एक मरीज़ ठीक महसूस होने पर दूसरे दिन प्रतिजैविक छोड़ देता है। एक हफ़्ते बाद संक्रमण लौटता है और वही दवा काम नहीं करती। समझाइए।
दो दिन में कमज़ोर जीवाणु मरे, मज़बूत नहीं। बचे हुए जीवाणु बढ़ गए। अब वे उस प्रतिजैविक के प्रति प्रतिरोधी हैं, इसलिए दवा काम नहीं करती। पूरा कोर्स उन्हें भी मार देता।
आम गलतियाँ
- यह कहना कि प्रतिजैविक वायरस मारते हैं। ये जीवाणुओं पर काम करते हैं; ज़ुकाम और फ़्लू वायरस रोग हैं।
- सोचना कि ज़्यादा BOD मतलब साफ़ पानी। ज़्यादा BOD = ज़्यादा कार्बनिक प्रदूषण।
- उत्पाद मिलाने में गड़बड़ी: सिट्रिक अम्ल – ऐस्पर्जिलस नाइगर; ऐसीटिक अम्ल – ऐसीटोबैक्टर ऐसीटी; स्टैटिन – मोनैस्कस परप्यूरियस; साइक्लोस्पोरिन A – ट्राइकोडर्मा पॉलीस्पोरम।
- कहना कि वाइन और बीयर आसवित होती हैं। नहीं; व्हिस्की, ब्रांडी और रम आसवित होती हैं।