कोशिका की रासायनिक बनावट
जीवित ऊतक और मिट्टी में एक जैसे तत्व होते हैं (कार्बन, हाइड्रोजन, ऑक्सीजन, नाइट्रोजन…), पर जीवित ऊतक में कार्बन और हाइड्रोजन बहुत ज़्यादा। कार्बन यौगिक जानने के लिए एक सरल विश्लेषण:
- जीवित ऊतक को ट्राइक्लोरोऐसीटिक अम्ल (Cl₃CCOOH) के साथ पीसकर घोल बनाइए।
- कपड़े या रुई से छानिए।
- जो द्रव निकल जाए = अम्ल-विलेय भाग (निस्यंद): अमीनो अम्ल, शर्करा, न्यूक्लियोटाइड जैसे छोटे अणु।
- जो रुक जाए = अम्ल-अविलेय भाग (अवधारित): प्रोटीन, न्यूक्लिक अम्ल, पॉलीसैकेराइड और लिपिड।
ऊतक को जलाने (भस्म) पर सारे कार्बन यौगिक उड़ जाते हैं; राख में अकार्बनिक तत्व (Ca, Mg) और सल्फ़ेट, फ़ॉस्फ़ेट जैसे यौगिक बचते हैं।
सूक्ष्म अणुओं का आणविक भार 18–800 Da, ये विलेय भाग में। वृहत् अणु 10,000 Da से ऊपर: प्रोटीन, न्यूक्लिक अम्ल, पॉलीसैकेराइड। लिपिड 800 Da से कम हैं, फिर भी अविलेय भाग में आते हैं, क्योंकि पीसने पर टूटी झिल्लियाँ अघुलनशील पुटिकाएँ बना लेती हैं।
आम कोशिका का भार: पानी 70–90%, प्रोटीन 10–15%, न्यूक्लिक अम्ल 5–7%, कार्बोहाइड्रेट 3%, लिपिड 2%, आयन 1%।
प्रोटीन: अमीनो अम्लों की शृंखला
अमीनो अम्ल में एक केंद्रीय कार्बन (α-कार्बन) चार समूह पकड़े रहता है: हाइड्रोजन, अमीनो समूह (–NH₂), कार्बॉक्सिल समूह (–COOH) और बदलता R समूह। R से अमीनो अम्ल तय होता है: R = H ग्लाइसीन, R = CH₃ ऐलानीन, R = CH₂OH सेरीन। अमीनो और कार्बॉक्सिल समूहों के आधार पर ये अम्लीय (ग्लूटैमिक अम्ल), क्षारीय (लाइसीन) या उदासीन (वैलीन); कुछ ऐरोमैटिक (टाइरोसीन, फ़ेनिलऐलानीन, ट्रिप्टोफ़ैन)। घोल में एक ख़ास pH पर अमीनो अम्ल पर + और – दोनों आवेश: ज़्विटर आयन।
अमीनो अम्ल पानी निकालकर पेप्टाइड बंध (–CO–NH–) से जुड़ते हैं और पॉलीपेप्टाइड बनाते हैं। प्रोटीन 20 तरह तक के अमीनो अम्लों का विषम-बहुलक है। आवश्यक अमीनो अम्ल भोजन से लेने पड़ते हैं; अनावश्यक शरीर ख़ुद बनाता है।
संरचना के चार स्तर
- प्राथमिक: अमीनो अम्लों का क्रम, N-सिरे (पहला) से C-सिरे (आख़िरी) तक।
- द्वितीयक: शृंखला का कुछ भाग दाहिनी ओर घूमी कुंडली में (या चादर में)।
- तृतीयक: शृंखला ऊन के गोले की तरह स्वयं पर मुड़ती है – काम के लिए ज़रूरी 3D आकार।
- चतुर्थक: दो या ज़्यादा शृंखलाएँ जुड़ती हैं। मानव हीमोग्लोबिन = 2 α + 2 β उप-इकाइयाँ।
काम: कोलेजन (जंतुओं में सबसे ज़्यादा प्रोटीन) और RuBisCO (पूरे जीवमंडल में सबसे ज़्यादा प्रोटीन); ट्रिप्सिन (एंज़ाइम), इंसुलिन (हॉर्मोन), प्रतिरक्षी (रक्षा), GLUT-4 (ग्लूकोज़ को कोशिका में ले जाता है), ग्राही (गंध, स्वाद, हॉर्मोन पहचानना)।
कार्बोहाइड्रेट (पॉलीसैकेराइड)
शर्करा C, H और O से बनी है। ग्लूकोज़ और राइबोज़ मोनोसैकेराइड हैं। दो ग्लाइकोसिडिक बंध से जुड़कर डाइसैकेराइड (सुक्रोज़, लैक्टोज़, माल्टोज़) बनाते हैं। लंबी शृंखलाएँ पॉलीसैकेराइड, जो अम्ल-अविलेय भाग में मिलती हैं।
- मंड (स्टार्च) – पौधों का भोजन भंडार; इसकी कुंडलियाँ आयोडीन पकड़कर नीला रंग देती हैं।
- सेलुलोज़ – पादप भित्ति में ग्लूकोज़ का सम-बहुलक (रुई, कागज़); कुंडली नहीं, इसलिए आयोडीन से नीला नहीं।
- ग्लाइकोजन – जंतुओं का भोजन भंडार, बहुत शाखित।
- इनुलिन – फ्रक्टोज़ का बहुलक।
- काइटिन – अमीनो-शर्करा (जैसे ग्लूकोसैमीन) का जटिल पॉलीसैकेराइड, कीटों के बाह्यकंकाल और कवक भित्ति में।
पॉलीसैकेराइड शृंखला का दायाँ सिरा अपचायक सिरा और बायाँ अनपचायक सिरा कहलाता है।
लिपिड
लिपिड पानी में नहीं घुलते। वसा अम्ल = कार्बॉक्सिल समूह + कार्बन शृंखला (R समूह); पामिटिक अम्ल में कार्बॉक्सिल कार्बन मिलाकर 16 कार्बन, ऐरेकिडोनिक अम्ल में 20। कोई द्विबंध नहीं = संतृप्त; एक या ज़्यादा = असंतृप्त। ग्लिसरॉल (ट्राइहाइड्रॉक्सी प्रोपेन) पर तीन तक वसा अम्ल: मोनो-, डाई- और ट्राइग्लिसराइड (वसा और तेल – तेल कम तापमान पर पिघलते हैं, जैसे तिल का तेल)। लेसिथिन जैसे फ़ॉस्फ़ोलिपिड में फ़ॉस्फ़ेट समूह होता है और ये कोशिका झिल्ली बनाते हैं। तंत्रिका ऊतक में ज़्यादा जटिल लिपिड। लिपिड सख़्ती से वृहत् अणु या बहुलक नहीं हैं।
न्यूक्लिक अम्ल
न्यूक्लियोटाइड के तीन भाग: नाइट्रोजन क्षार, पेंटोज़ शर्करा और फ़ॉस्फ़ेट। सिर्फ़ क्षार + शर्करा = न्यूक्लियोसाइड (एडीनोसिन, ग्वानोसिन, थाइमिडीन, यूरिडीन, साइटिडीन)।
- प्यूरीन (दो वलय): एडेनीन, ग्वानीन। पिरिमिडीन (एक वलय): साइटोसीन, थाइमीन, यूरेसिल।
- DNA: डीऑक्सीराइबोज़ शर्करा, क्षार A, G, C, T; द्विकुंडली – A का T से 2 हाइड्रोजन बंध, G का C से 3।
- RNA: राइबोज़ शर्करा, क्षार A, G, C, U; आमतौर पर एक सूत्र।
न्यूक्लिक अम्ल में फ़ॉस्फ़ेट एक शर्करा के 3′ कार्बन को अगली के 5′ कार्बन से जोड़ता है: फ़ॉस्फ़ोडाइएस्टर बंध। वॉटसन–क्रिक (B-DNA) मॉडल: दोनों सूत्र प्रतिसमानांतर, एक पूरे चक्कर में 10 क्षार-जोड़े, हर जोड़े पर उठान 0.34 nm, एक चक्कर 3.4 nm लंबा।
एंज़ाइम: प्रकार, गुण और क्रिया
एंज़ाइम जैव उत्प्रेरक हैं – लगभग सभी प्रोटीन; कुछ न्यूक्लिक अम्ल भी एंज़ाइम जैसे काम करते हैं, इन्हें राइबोज़ाइम कहते हैं। ये अभिक्रिया तेज़ करते हैं और बिना बदले बाहर आते हैं।
ये कैसे काम करते हैं
हर एंज़ाइम में एक सक्रिय स्थल होता है, एक जेब जिसमें क्रियाधार फ़िट होता है। E + S → ES (एंज़ाइम–क्रियाधार संकुल) → EP → E + P। किसी भी अभिक्रिया को शुरू करने के लिए ऊर्जा चाहिए – सक्रियण ऊर्जा। एंज़ाइम इसे घटाता है, इसलिए अभिक्रिया बहुत तेज़ होती है। उदाहरण: कार्बोनिक एनहाइड्रेज़ CO₂ + H₂O → H₂CO₃ को लगभग 1 करोड़ गुना तेज़ करता है (घंटे में लगभग 200 की जगह हर सेकंड लगभग 6 लाख अणु)।
एंज़ाइम क्रिया को प्रभावित करने वाले कारक
- तापमान और pH: हर एंज़ाइम का एक इष्टतम। कम तापमान कुछ समय के लिए निष्क्रिय करता है; ज़्यादा तापमान विकृतीकरण करता है (आकार नष्ट)।
- क्रियाधार सांद्रता: दर बढ़ती है फिर Vmax पर स्थिर हो जाती है जब सारे सक्रिय स्थल भरे हों। Km = वह क्रियाधार सांद्रता जिस पर दर Vmax की आधी।
- संदमक: प्रतिस्पर्धी संदमक क्रियाधार जैसा दिखता है और सक्रिय स्थल घेर लेता है – जैसे मैलोनेट सक्सिनिक डीहाइड्रोजिनेज़ को रोकता है। ऐसे संदमक जीवाणु रोगाणुओं को नियंत्रित करने में इस्तेमाल होते हैं।
छह वर्ग
- ऑक्सीडोरिडक्टेज़/डीहाइड्रोजिनेज़ – दो क्रियाधारों के बीच H या इलेक्ट्रॉन ले जाते हैं।
- ट्रांसफ़रेज़ – कोई समूह (H नहीं) एक क्रियाधार से दूसरे में ले जाते हैं।
- हाइड्रोलेज़ – पानी से एस्टर, ईथर, पेप्टाइड, ग्लाइकोसिडिक, C–C या P–N बंध तोड़ते हैं।
- लायेज़ – बिना पानी के समूह हटाते हैं, द्विबंध छोड़ते हैं।
- आइसोमरेज़ – एक समावयवी को दूसरे में बदलते हैं।
- लाइगेज़ – दो यौगिकों को जोड़ते हैं (जैसे C–O, C–S, C–N, P–O बंध)।
सहकारक
प्रोटीन भाग = एपोएंज़ाइम। कई को ग़ैर-प्रोटीन सहायक चाहिए: प्रोस्थेटिक समूह (कसकर जुड़ा, जैसे पेरॉक्सीडेज़ और कैटेलेज़ में हीम), सह-एंज़ाइम (ढीला जुड़ा, अक्सर विटामिन से, जैसे NAD और NADP में नियासिन) या धातु आयन (जैसे कार्बोक्सीपेप्टिडेज़ के लिए ज़िंक)। सहकारक हटाओ तो एंज़ाइम काम बंद।
करके देखिए: एंज़ाइम काम करते हुए
सादी रोटी या उबले चावल का छोटा टुकड़ा दो मिनट तक बिना निगले चबाइए – मीठा लगने लगेगा, क्योंकि लार का एमाइलेज़ मंड को शर्करा में तोड़ता है। अब गर्मी का असर: कच्चे आलू के टुकड़े पर आयोडीन की बूँद डालिए (नीला-काला = मंड)। फिर एक कच्चा और एक उबला आलू काटकर दोनों पर हाइड्रोजन परऑक्साइड (केमिस्ट से) की बूँद डालिए – कच्चे में झाग बनता है क्योंकि उसका कैटेलेज़ एंज़ाइम काम करता है; उबले में लगभग नहीं, क्योंकि गर्मी ने एंज़ाइम को विकृत कर दिया। इसे 3D के चरण 6 से मिलाइए।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- अम्ल-विलेय भाग: सूक्ष्म अणु (18–800 Da); अम्ल-अविलेय भाग: प्रोटीन, न्यूक्लिक अम्ल, पॉलीसैकेराइड (> 10,000 Da) + लिपिड
- अमीनो अम्ल: α-कार्बन + H + –NH₂ + –COOH + R समूह
- पेप्टाइड बंध: –CO–NH–; ग्लाइकोसिडिक बंध (शर्करा); एस्टर बंध (वसा); फ़ॉस्फ़ोडाइएस्टर बंध (न्यूक्लिक अम्ल)
- प्रोटीन संरचना: प्राथमिक → द्वितीयक → तृतीयक → चतुर्थक
- न्यूक्लियोटाइड = क्षार + पेंटोज़ शर्करा + फ़ॉस्फ़ेट; न्यूक्लियोसाइड = क्षार + शर्करा
- E + S ⇌ ES → EP → E + P
- एंज़ाइम वर्ग: ऑक्सीडोरिडक्टेज़, ट्रांसफ़रेज़, हाइड्रोलेज़, लायेज़, आइसोमरेज़, लाइगेज़
- होलोएंज़ाइम = एपोएंज़ाइम + सहकारक (प्रोस्थेटिक समूह / सह-एंज़ाइम / धातु आयन)
हल किए गए उदाहरण
1. यकृत ऊतक को ट्राइक्लोरोऐसीटिक अम्ल में पीसकर छाना गया। (a) ग्लूकोज़, (b) DNA, (c) फ़ॉस्फ़ोलिपिड किस भाग में मिलेंगे?
(a) ग्लूकोज़ छोटा → निस्यंद (अम्ल-विलेय)। (b) DNA वृहत् अणु → अवधारित (अम्ल-अविलेय)। (c) फ़ॉस्फ़ोलिपिड छोटे हैं, पर टूटी झिल्लियाँ पुटिकाएँ बनाती हैं, इसलिए ये भी अम्ल-अविलेय भाग में।
2. एक DNA खंड में 20 क्षार-जोड़े हैं। यह द्विकुंडली के कितने पूरे चक्कर बनाता है और कितना लंबा है?
एक चक्कर = 10 bp, इसलिए 20 ÷ 10 = 2 चक्कर। लंबाई = 20 × 0.34 nm = 6.8 nm।
3. एक DNA में 30% एडेनीन है। ग्वानीन कितने प्रतिशत?
A = T, इसलिए T = 30%। A + T = 60%, तो G + C = 40%। G = C, इसलिए G = 20%।
4. प्रोटीन संरचना का स्तर बताइए: (a) अमीनो अम्लों का क्रम, (b) हीमोग्लोबिन की 4 शृंखलाएँ, (c) कुंडली।
(a) प्राथमिक, (b) चतुर्थक, (c) द्वितीयक।
5. एक एंज़ाइम P–O बंध बनाकर DNA के दो टुकड़े जोड़ता है। यह किस वर्ग का है?
नया बंध बनाकर दो अणु जोड़ता है → लाइगेज़ (DNA लाइगेज़)।
6. एक एंज़ाइम का Vmax = 100 इकाई है। जब क्रियाधार सांद्रता Km के बराबर हो, तो दर कितनी?
Km वह सांद्रता है जिस पर दर Vmax की आधी होती है: 100 ÷ 2 = 50 इकाई।
आम गलतियाँ
- लिपिड को वृहत् अणु कहना। ये 800 Da से कम हैं; अम्ल-अविलेय भाग में सिर्फ़ इसलिए आते हैं कि झिल्लियाँ पुटिकाएँ बनाती हैं।
- यह सोचना कि कम तापमान एंज़ाइम को विकृत कर देता है। ठंड सिर्फ़ कुछ समय के लिए निष्क्रिय करती है; ज़्यादा गर्मी आकार नष्ट करती है।
- न्यूक्लियोसाइड और न्यूक्लियोटाइड मिलाना: न्यूक्लियोसाइड में फ़ॉस्फ़ेट नहीं; न्यूक्लियोटाइड = न्यूक्लियोसाइड + फ़ॉस्फ़ेट।
- यह कहना कि सेलुलोज़ आयोडीन से नीला होता है। सिर्फ़ मंड होता है, क्योंकि उसकी कुंडलियाँ आयोडीन पकड़ती हैं; सेलुलोज़ में कुंडली नहीं।