CBSE कक्षा 11 जीव विज्ञान
अध्याय: 6
1. जीव जगत में विविधता
जीव जगत · जीव जगत का वर्गीकरण · वनस्पति जगत · प्राणि जगत
- जीव जगत – धरती पर लाखों तरह के जीव हैं; इसी विविधता को जैव विविधता कहते हैं। इन्हें पढ़ने के लिए हम इन्हें समूहों में बाँटते हैं। वर्गिकी (टैक्सोनॉमी) में पहचान, नामकरण, वर्णन और वर्गीकरण आता है; सिस्टेमैटिक्स इसके साथ यह भी देखती है कि समूह आपस में कैसे जुड़े हैं। सारा जीवन तीन डोमेन में है: बैक्टीरिया, आर्किया और यूकेरिया। जीवों को जगत से जाति तक 7 मुख्य स्तरों में रखते हैं और हर जाति को दो शब्दों का लैटिन नाम मिलता है, जैसे Mangifera indica।
- जीव जगत का वर्गीकरण – व्हिटेकर (1969) ने जीवों को पाँच जगत में बाँटा: मोनेरा, प्रोटिस्टा, कवक, पादप और जंतु। आधार थे: कोशिका का प्रकार, कोशिका भित्ति, शरीर की बनावट, पोषण का तरीका, जनन और आपसी संबंध। मोनेरा प्रोकैरियोट हैं (बैक्टीरिया, आर्कीबैक्टीरिया, सायनोबैक्टीरिया, माइकोप्लाज़्मा)। प्रोटिस्टा एककोशिकी यूकैरियोट हैं, पाँच समूहों में। कवक काइटिन भित्ति वाले परपोषी हैं, चार वर्गों में। लाइकेन शैवाल और कवक की साझेदारी है। वायरस, विरोइड और प्रायन किसी जगत में नहीं।
- वनस्पति जगत – वनस्पति जगत नए गुणों की सीढ़ी चढ़ता है। शैवाल सरल, ज़्यादातर पानी के पौधे हैं, बिना जड़-तने के। ब्रायोफ़ाइटा (मॉस) नम ज़मीन पर रहते हैं पर संवहन ऊतक नहीं। टेरिडोफ़ाइटा (फ़र्न) में पहली बार जाइलम और फ़्लोएम आते हैं। अनावृतबीजी के बीज खुले (नग्न) होते हैं। आवृतबीजी में फूल होते हैं और बीज फल के अंदर ढके रहते हैं। सब में अगुणित युग्मकोद्भिद और द्विगुणित बीजाणुद्भिद बारी-बारी आते हैं: पीढ़ी एकांतरण।
- प्राणि जगत – जंतुओं को शरीर की बनावट से जुड़े कुछ सवालों से बाँटते हैं: संगठन का स्तर, सममिति, जनन स्तर (भ्रूणीय परतें), देहगुहा (प्रगुहा), खंडीभवन और पृष्ठरज्जु। इनसे 11 मुख्य संघ बनते हैं: पोरीफ़ेरा, सीलेंटरेटा, टीनोफ़ोरा, प्लेटीहेल्मिंथीज़, ऐस्केल्मिंथीज़, ऐनेलिडा, आर्थ्रोपोडा, मोलस्का, इकाइनोडर्मेटा, हेमीकॉर्डेटा और कॉर्डेटा। रज्जुकी में किसी न किसी अवस्था में पृष्ठरज्जु, पीठ की ओर खोखली तंत्रिका रज्जु और क्लोम छिद्र होते हैं; इनमें कशेरुकी सात वर्गों में हैं, जबड़ा-रहित मछली से स्तनधारी तक।
2. पादप एवं प्राणियों में संरचनात्मक संगठन
पुष्पी पादपों की आकारिकी · पुष्पी पादपों का शारीर · प्राणियों में संरचनात्मक संगठन
- पुष्पी पादपों की आकारिकी – आकारिकी का मतलब है पौधे का बाहरी रूप। फूल वाले पौधे के दो भाग हैं: मिट्टी के नीचे मूल तंत्र (जड़ें) और ऊपर प्ररोह तंत्र (तना, पत्ती, फूल, फल)। हर भाग का एक सामान्य रूप होता है और खास काम के लिए बदला हुआ रूप (रूपांतरण) भी। फूल को पुष्प सूत्र से लिखते हैं; सोलेनेसी (आलू, बैंगन, टमाटर) हमारा उदाहरण कुल है।
- पुष्पी पादपों का शारीर – शारीर (एनाटॉमी) का मतलब है पौधे की अंदरूनी बनावट, जो पतली काट (सेक्शन) काटकर देखी जाती है। कोशिकाएँ मिलकर ऊतक बनाती हैं और ऊतक तीन ऊतक तंत्र: बाह्यत्वचीय (त्वचा), भरण (भराव) और संवहनी (जाइलम-फ्लोएम की नलियाँ)। द्विबीजपत्री और एकबीजपत्री की जड़, तने और पत्ती में ये तंत्र अलग ढंग से सजे होते हैं।
- प्राणियों में संरचनात्मक संगठन: मेंढक – प्राणियों में कोशिकाएँ मिलकर ऊतक, ऊतक मिलकर अंग और अंग मिलकर अंग तंत्र बनाते हैं। भारतीय मेंढक (राना टिग्रिना, अब हॉप्लोबैट्रेकस टाइगरिनस) इसका अच्छा उदाहरण है: शरीर में सिर और धड़, और अंदर पाचन, श्वसन, परिसंचरण, तंत्रिका, उत्सर्जन, अंतःस्रावी और जनन तंत्र। यह त्वचा और फेफड़े दोनों से साँस लेता है, इसका हृदय 3 कोष्ठ का है और यह पानी में अंडे देता है।
3. कोशिका: संरचना एवं कार्य
कोशिका: जीवन की इकाई · जैव अणु · कोशिका चक्र और कोशिका विभाजन
- कोशिका: जीवन की इकाई – हर सजीव कोशिकाओं से बना है और हर नई कोशिका पुरानी कोशिका से बनती है। प्रोकैरियोटी कोशिका (जीवाणु) में केंद्रक आवरण और झिल्ली वाले कोशिकांग नहीं होते; यूकैरियोटी कोशिका में असली केंद्रक और कई कोशिकांग होते हैं। झिल्ली लिपिड और प्रोटीन का तरल मोज़ेक है; पौधों में ऊपर से सेलुलोज़ की भित्ति। ER, गॉल्जी, लयनकाय और रिक्तिका मिलकर अंतःझिल्ली तंत्र बनाते हैं। माइटोकॉन्ड्रिया और लवक ऊर्जा व भोजन बनाते हैं, राइबोसोम प्रोटीन बनाते हैं, कोशिका कंकाल, पक्ष्माभ, कशाभिका और तारककेंद्र आकार व गति देते हैं, और केंद्रक में DNA रहता है।
- जैव अणु – कोशिका में ज़्यादातर पानी है, और कार्बन यौगिकों के चार बड़े परिवार: प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, लिपिड और न्यूक्लिक अम्ल। ऊतक को अम्ल में पीसने से छोटे अणु (अम्ल-विलेय भाग) बड़े अणुओं – प्रोटीन, पॉलीसैकेराइड, न्यूक्लिक अम्ल (अम्ल-अविलेय भाग) – से अलग हो जाते हैं। प्रोटीन अमीनो अम्लों की शृंखलाएँ हैं जो चार स्तरों में मुड़ती हैं। पॉलीसैकेराइड शर्करा की शृंखलाएँ हैं; लिपिड ग्लिसरॉल पर वसा अम्ल; न्यूक्लिक अम्ल न्यूक्लियोटाइड की शृंखलाएँ। एंज़ाइम प्रोटीन उत्प्रेरक हैं जो सक्रिय स्थल पर क्रियाधार पकड़ते हैं, सक्रियण ऊर्जा घटाते हैं, और तापमान, pH, क्रियाधार मात्रा व संदमकों से प्रभावित होते हैं।
- कोशिका चक्र और कोशिका विभाजन – कोशिका एक तय क्रम में बढ़ती है, DNA दोहराती है और बँटती है – इसे कोशिका चक्र कहते हैं: अंतरावस्था (G1, S, G2) और M प्रावस्था। S प्रावस्था में DNA दोगुना (2C → 4C) होता है, पर गुणसूत्र संख्या वही रहती है। समसूत्री विभाजन (पूर्वावस्था, मध्यावस्था, पश्चावस्था, अंत्यावस्था) और कोशिकाद्रव्य विभाजन से जनक जैसी दो कोशिकाएँ बनती हैं – यह समीकरणीय विभाजन वृद्धि और मरम्मत के लिए है। अर्धसूत्री विभाजन में दो विभाजन होते हैं; अर्धसूत्री I में समजात गुणसूत्र जोड़ा बनाते हैं, जीन विनिमय करते हैं और अलग होते हैं, जिससे गुणसूत्र संख्या आधी (2n → n) होती है। इससे युग्मकों के लिए चार अगुणित कोशिकाएँ बनती हैं और विविधता आती है।
4. पादप कार्यिकी
उच्च पादपों में प्रकाश-संश्लेषण · पादप में श्वसन · पादप वृद्धि एवं परिवर्धन
- उच्च पादपों में प्रकाश-संश्लेषण – हरे पौधे प्रकाश की मदद से CO₂ और पानी से शर्करा बनाते हैं। यह क्लोरोप्लास्ट में होता है। थायलाकॉइड में प्रकाश अभिक्रिया पानी तोड़ती है, O₂ छोड़ती है और ATP व NADPH बनाती है। स्ट्रोमा में केल्विन चक्र इसी ATP और NADPH से CO₂ को शर्करा में बदलता है। C₄ पौधे CO₂ पंप करके प्रकाश-श्वसन की बर्बादी रोकते हैं। जो कारक सबसे कम हो, वही दर तय करता है।
- पादप में श्वसन – श्वसन में ग्लूकोज़ जैसा भोजन टूटता है और ऊर्जा ATP के रूप में जमा होती है। पौधे रंध्रों और वातरंध्रों से O₂ लेते हैं। कोशिका-द्रव्य में ग्लाइकोलिसिस ग्लूकोज़ को दो पाइरुवेट में तोड़ता है। O₂ न हो तो पाइरुवेट का किण्वन होकर एथेनॉल या लैक्टिक अम्ल बनता है। O₂ हो तो पाइरुवेट माइटोकॉन्ड्रिया में जाता है, क्रेब्स चक्र चलता है और इलेक्ट्रॉन परिवहन तंत्र O₂ की मदद से सबसे ज़्यादा ATP बनाता है: एक ग्लूकोज़ से 38 तक। यही पथ अणु बनाता भी है (उभयचयी)। RQ = निकली CO₂ ÷ ली गई O₂।
- पादप वृद्धि एवं परिवर्धन – वृद्धि आकार में स्थायी बढ़त है। बीज पानी, ऑक्सीजन और सही ताप पाकर अंकुरित होता है। जड़ और तने की नोक पर कोशिकाएँ बँटती हैं, फिर लंबी होती हैं, फिर परिपक्व होती हैं। वृद्धि अंकगणितीय (हर दिन उतनी ही) या ज्यामितीय (जितना है उसका हिस्सा) हो सकती है, जो S-वक्र बनाती है। कोशिकाएँ ख़ास बनती हैं (विभेदन), फिर बँटने लग सकती हैं (निर्विभेदन) और फिर ख़ास बनती हैं (पुनर्विभेदन)। पाँच हार्मोन, ऑक्सिन, जिबरेलिन, साइटोकाइनिन, एथिलीन और ABA, यह सब नियंत्रित करते हैं।
5. मानव कार्यिकी
श्वसन और गैसों का विनिमय · शरीर द्रव तथा परिसंचरण · उत्सर्जी उत्पाद एवं उनका निष्कासन · गमन एवं संचलन · तंत्रिकीय नियंत्रण एवं समन्वय · रासायनिक समन्वय तथा एकीकरण
- श्वसन और गैसों का विनिमय – साँस लेने से हवा फेफड़ों में आती-जाती है। हवा का रास्ता: नाक → श्वासनली → श्वसनी → श्वसनिकाएँ → कूपिकाएँ। जब डायाफ्राम और बाहरी पसली-पेशियाँ सिकुड़ती हैं तो छाती बड़ी होती है, अंदर का दाब घटता है और हवा अंदर आती है। कूपिकाओं में O2 रक्त में जाती है और CO2 बाहर आती है, हमेशा ज़्यादा आंशिक दाब से कम की ओर। रक्त O2 ज़्यादातर हीमोग्लोबिन पर और CO2 ज़्यादातर बाइकार्बोनेट बनाकर ले जाता है। मस्तिष्क का एक केंद्र साँस की लय तय करता है। ज्वारीय आयतन, जैव क्षमता जैसे आयतन जोड़कर निकाले जाते हैं।
- शरीर द्रव तथा परिसंचरण – रक्त और लसीका शरीर के परिवहन द्रव हैं। रक्त = प्लाज़्मा (लगभग 55%) + संगठित पदार्थ: RBC, WBC और प्लेटलेट्स। रक्त समूह (ABO, Rh) RBC पर लगे प्रतिजनों से तय होते हैं। फाइब्रिनोजन से फाइब्रिन धागे बनकर थक्का बनाते हैं। मानव हृदय में चार कक्ष हैं और रक्त दो परिपथों में जाता है: फेफड़ों तक और शरीर तक (दोहरा परिसंचरण)। SA पर्व हर धड़कन शुरू करता है; एक धड़कन लगभग 0.8 s का हृद चक्र है, जिसे ECG में P, QRS, T तरंगों में देखा जाता है। हृद निकास = प्रवाह आयतन × हृदय दर ≈ 5 L/मिनट।
- उत्सर्जी उत्पाद एवं उनका निष्कासन – जीवों को नाइट्रोजन अपशिष्ट निकालना होता है। अमोनिया सबसे विषैली है और बहुत पानी माँगती है; यूरिया कम विषैला; यूरिक अम्ल को सबसे कम पानी चाहिए। मनुष्य यूरियोत्सर्जी हैं। हर वृक्क में लगभग 10 लाख वृक्काणु हैं। मूत्र तीन चरणों में बनता है: गुच्छीय निस्यंदन (लगभग 125 mL/मिनट, 180 L/दिन), पुनरवशोषण (लगभग 99% वापस) और स्रावण। हेनले लूप और वासा रेक्टा प्रतिधारा से मध्यांश को नमकीन बनाते हैं, जिससे गाढ़ा मूत्र बनता है। ADH, रेनिन-एंजियोटेंसिन-एल्डोस्टेरोन तंत्र और ANF जल व लवण नियंत्रित करते हैं। फेफड़े, यकृत, त्वचा भी मदद करते हैं। वृक्क फेल हों तो डायलिसिस या प्रत्यारोपण।
- गमन एवं संचलन – संचलन यानी शरीर के किसी भाग की स्थिति बदलना; गमन यानी पूरे शरीर का एक जगह से दूसरी जगह जाना। कोशिकाएँ तीन तरह चलती हैं: अमीबीय, पक्ष्माभी और कशाभिकीय। मनुष्य पेशीय गति करता है। पेशियाँ कंकाली, अंतरंग या हृद होती हैं। कंकाली पेशी तंतुओं से बनी है; हर तंतु में पेशी तंतुक हैं जो एक्टिन-मायोसिन वाले सार्कोमियरों की श्रृंखला हैं। तंत्रिका संकेत से Ca2+ छूटता है, मायोसिन सिर ATP से एक्टिन खींचते हैं और सार्कोमियर छोटा होता है (सर्पी तंतु सिद्धांत)। कंकाल में 206 हड्डियाँ हैं। संधियाँ रेशेदार, उपास्थिल या साइनोवियल (कंदुक-खल्लिका, कब्ज़ा, धुराग्र, विसर्पी, सैडल) होती हैं। रोग: मायस्थेनिया ग्रेविस, अपतानिका, पेशीय दुष्पोषण, संधिशोथ, अस्थि सुषिरता, गाउट।
- तंत्रिकीय नियंत्रण एवं समन्वय – समन्वय यानी अंगों का मिलकर काम करना। तंत्रिका तंत्र यह तेज़ी से तंत्रिका कोशिकाओं से करता है। तंत्रिका कोशिका में कोशिका काय, द्रुमिकाएँ और तंत्रिकाक्ष हैं; कई तंत्रिकाक्षों पर रैनवियर पर्व वाला माइलिन आच्छद है। केंद्रीय तंत्रिका तंत्र (मस्तिष्क, मेरुरज्जु) सूचना संसाधित करता है; परिधीय तंत्र (तंत्रिकाएँ) उसे ढोता है। PNS के दो भाग: कायिक (कंकाली पेशियाँ) और स्वायत्त (अनुकंपी, परानुकंपी), जो अंदर के अंगों यानी अंतरंग तंत्र को चलाता है। आराम में तंत्रिकाक्ष ध्रुवित है: अंदर −, बाहर +, लगभग −70 mV। उद्दीपन से Na+ अंदर आकर क्रिया विभव बनाता है जो आगे दौड़ता है। सिनैप्स पर तंत्रिका संचारी संकेत अगली कोशिका तक पहुँचाते हैं।
- रासायनिक समन्वय तथा एकीकरण – हॉर्मोन रासायनिक संदेशवाहक हैं जो नलिकाविहीन (अंतःस्रावी) ग्रंथियाँ बहुत कम मात्रा में बनाती हैं। ये रक्त में चलकर सही ग्राही वाली लक्ष्य कोशिकाओं पर काम करते हैं। हाइपोथैलेमस पीयूष को, और पीयूष कई ग्रंथियों को नियंत्रित करता है; ऋणात्मक पुनर्निवेशन स्तर स्थिर रखता है। मुख्य ग्रंथियाँ: पीनियल, पीयूष, थायरॉयड, पैराथायरॉयड, थाइमस, एड्रीनल, अग्न्याशय (द्वीप), वृषण, अंडाशय। हृदय, वृक्क, आहारनाल भी हॉर्मोन बनाते हैं। प्रोटीन हॉर्मोन झिल्ली ग्राही और cAMP जैसे द्वितीयक संदेशवाहक से; स्टेरॉयड व थायरॉयड हॉर्मोन कोशिका में जाकर जीन बदलते हैं। बहुत कम (अल्पस्राव) या बहुत ज़्यादा (अतिस्राव) हॉर्मोन से बौनापन, महाकायता, गलगंड, मधुमेह, एडिसन, कुशिंग जैसे रोग होते हैं।
6. केवल रचनात्मक आकलन हेतु विषय
पाचन एवं अवशोषण
जल्द आ रहा है