कोशिका से अंग तंत्र तक
बहुकोशिकीय जंतुओं में एक जैसी कोशिकाएँ मिलकर ऊतक बनाती हैं। जंतुओं में चार मूल ऊतक हैं: उपकला (ढकने वाला), संयोजी (जोड़ना और सहारा, जैसे हड्डी और रक्त), पेशी (गति) और तंत्रिका (संदेश)। ऊतक मिलकर अंग (आमाशय, हृदय) बनाते हैं और अंग मिलकर अंग तंत्र (जैसे पाचन तंत्र)। कोशिका → ऊतक → अंग → अंग तंत्र, यही जंतु का संरचनात्मक संगठन है। इसे हम मेंढक से समझते हैं।
मेंढक: आवास और शरीर का रूप (आकारिकी)
मेंढक पानी और ज़मीन दोनों पर रहते हैं, इसलिए उभयचर हैं। भारत का आम मेंढक राना टिग्रिना (अब हॉप्लोबैट्रेकस टाइगरिनस) है। मेंढक असमतापी (ठंडे ख़ून वाले) हैं: उनका शरीर-तापमान आसपास के साथ बदलता है। वे रंग बदलकर पत्तों-कीचड़ में छिप जाते हैं (छद्मावरण)। तेज़ गर्मी में ज़मीन के अंदर छिपते हैं (ग्रीष्म निष्क्रियता) और कड़ी सर्दी में भी (शीत निष्क्रियता)।
- त्वचा: चिकनी, फिसलन भरी, श्लेष्मा से नम; पीठ जैतूनी हरी और काले धब्बे, नीचे हल्की पीली। मेंढक कभी पानी नहीं पीता; त्वचा से सोखता है।
- शरीर: केवल सिर और धड़। गर्दन और पूँछ नहीं।
- सिर: मुँह, उसके ऊपर दो नासाद्वार, उभरी आँखें जिन पर पतली निमेषक झिल्ली पानी में उनकी रक्षा करती है, और आँखों के पीछे दोनों ओर गोल कर्णपटह जो आवाज़ पकड़ता है।
- पाद: छोटे अगले पैर कूदने के बाद उतरने में मदद करते हैं; लंबे पिछले पैर कूदने और तैरने में। हाथ में 4 उँगलियाँ, पैर में 5 बड़ी उँगलियाँ और तैरने के लिए झिल्ली।
- लैंगिक द्विरूपता: नर में वाक्-कोष (टर्राने के लिए) और अगले पैर की पहली उँगली पर मैथुन अंगुली-गद्दी; मादा में दोनों नहीं।
पाचन तंत्र
मेंढक मांसाहारी है (कीड़े, केंचुए), इसलिए आहारनाल छोटी है। वह आगे से जुड़ी चिपचिपी द्विपालित (दोफाँकी) जीभ से शिकार पकड़ता है।
भोजन का रास्ता: मुँह → मुखगुहा → ग्रसनी → ग्रासनली (छोटी नली) → आमाशय → आँत → मलाशय → अवस्कर से बाहर।
- आमाशय की दीवार HCl और जठर रस बनाती है जो भोजन को कुछ पचाते हैं; मथा हुआ भोजन काइम कहलाता है।
- यकृत पित्त बनाता है जो पित्ताशय में जमा होता है। पित्त वसा को छोटी बूँदों में तोड़ता है (इमल्सीकरण)।
- अग्न्याशय कार्बोहाइड्रेट और प्रोटीन के एंज़ाइम वाला अग्न्याशयी रस बनाता है।
- पाचन आँत में पूरा होता है। आँत की भीतरी दीवार पर उँगली जैसे अंकुर (विलाई) और सूक्ष्मांकुर पचा भोजन सोखते हैं।
- बिना पचा भाग अवस्कर से बाहर निकलता है।
श्वसन तंत्र
मेंढक दो तरह से साँस लेता है:
- पानी में: त्वचीय श्वसन। पानी में घुली ऑक्सीजन नम त्वचा से सीधे रक्त में जाती है (विसरण)।
- ज़मीन पर: मुखगुहा, त्वचा और फेफड़ों से। फेफड़ों से साँस = फुप्फुसीय श्वसन। फेफड़े धड़ के ऊपरी भाग (वक्ष) में लंबी, गुलाबी, थैली जैसी जोड़ी हैं। हवा नासाद्वार से मुखगुहा और फिर फेफड़ों में जाती है।
- ग्रीष्म और शीत निष्क्रियता में गैसों का लेन-देन केवल त्वचा से होता है।
परिसंचरण तंत्र
मेंढक में विकसित बंद परिसंचरण तंत्र है: ख़ून हमेशा हृदय और नलियों के अंदर रहता है। साथ में लसीका तंत्र भी है (लसीका, लसीका नलियाँ, लसीका ग्रंथियाँ)।
- हृदय: शरीर-गुहा के ऊपरी भाग में पेशीय अंग, हृदयावरण झिल्ली से ढका। इसमें तीन कोष्ठ: दो अलिंद और एक निलय।
- त्रिकोणीय शिरा कोटर शरीर का ख़ून महाशिरा से लेकर दाएँ अलिंद में डालता है। बायाँ अलिंद फेफड़ों से (फुप्फुस शिराएँ) ख़ून लेता है।
- निलय ख़ून को धमनी शंकु नाम की थैली में पंप करता है, जहाँ से धमनियाँ उसे हर भाग तक ले जाती हैं (धमनी तंत्र)। शिराएँ वापस लाती हैं (शिरा तंत्र)।
- खास जोड़: यकृत निवाहिका तंत्र (यकृत और आँत के बीच) और वृक्क निवाहिका तंत्र (वृक्क और शरीर के निचले भाग के बीच)।
- रक्त = प्लाज़्मा + कोशिकाएँ: लाल रक्त कणिकाएँ (RBC, जिनमें केंद्रक होता है और लाल हीमोग्लोबिन), श्वेत रक्त कणिकाएँ और प्लेटलेट्स।
उत्सर्जन तंत्र
नाइट्रोजन वाला कचरा एक जोड़ी वृक्कों से निकलता है: गहरे लाल, सेम जैसे, कसे हुए अंग जो शरीर के बीच से थोड़ा पीछे रीढ़ के पास हैं। हर वृक्क में बहुत सी छोटी छन्नी इकाइयाँ हैं: मूत्रजन नलिकाएँ (नेफ्रॉन)। दो मूत्रवाहिनियाँ मूत्र को अवस्कर तक ले जाती हैं; पतली दीवार वाला मूत्राशय मलाशय के आगे है और अवस्कर में खुलता है।
नर में मूत्रवाहिनी मूत्र और शुक्राणु दोनों ले जाती है, इसलिए मूत्रजनन नलिका कहलाती है। मादा में मूत्रवाहिनी और अंडवाहिनी अवस्कर में अलग-अलग खुलती हैं। मेंढक यूरिया निकालता है, इसलिए यूरिया-उत्सर्जी है।
नियंत्रण और समन्वय: तंत्रिका और अंतःस्रावी तंत्र
नियंत्रण तंत्रिकाएँ (तेज़) और हॉर्मोन (धीमे) करते हैं।
अंतःस्रावी ग्रंथियाँ
पीयूष, अवटु (थायरॉइड), परावटु, थाइमस, पिनियल काय, अग्न्याशयी द्वीप, अधिवृक्क और जनद।
तंत्रिका तंत्र
- केंद्रीय तंत्रिका तंत्र: मस्तिष्क + मेरुरज्जु। मस्तिष्क हड्डी के डिब्बे कपाल (ब्रेन बॉक्स) में सुरक्षित है। इसके भाग: अग्रमस्तिष्क (घ्राण पालि, जोड़ी प्रमस्तिष्क गोलार्ध, डाइएनसेफ़ेलॉन), मध्यमस्तिष्क (एक जोड़ी दृक् पालि) और पश्चमस्तिष्क (अनुमस्तिष्क और मेडुला ऑब्लॉन्गेटा)। मेडुला महारंध्र से निकलकर कशेरुक दंड के अंदर मेरुरज्जु बनता है।
- परिधीय तंत्रिका तंत्र: मस्तिष्क से 10 जोड़ी कपाल तंत्रिकाएँ, और मेरु तंत्रिकाएँ।
- स्वायत्त तंत्रिका तंत्र: अनुकंपी और परानुकंपी, जो अंगों को बिना हमारी इच्छा के चलाते हैं।
संवेदी अंग
स्पर्श (त्वचा पर संवेदी अंकुरक), स्वाद (स्वाद कलिकाएँ), गंध (नासा उपकला), दृष्टि (आँखें) और सुनना (कर्णपटह और आंतरिक कान)। आँख और आंतरिक कान अच्छी तरह बने हैं; बाकी सरल तंत्रिका-सिरे हैं। आँखें हड्डी के गड्ढों में एक जोड़ी सरल, गोल आँखें हैं।
जनन तंत्र और विकास
नर और मादा मेंढक अलग होते हैं और उनके जनन अंग अच्छी तरह बने होते हैं।
नर
एक जोड़ी पीले, अंडाकार वृषण, जो पेरिटोनियम की दोहरी तह वृषणधर (मीज़ोर्कियम) से वृक्क के ऊपरी भाग से चिपके रहते हैं। वृषणों से 10–12 शुक्रवाहिकाएँ निकलकर वृक्क में घुसती हैं और बिडर नाल में खुलती हैं, जो मूत्रजनन नलिका से मिलती है। यह नलिका अवस्कर में खुलती है; अवस्कर एक छोटा कक्ष है जिससे मल, मूत्र और शुक्राणु बाहर जाते हैं।
मादा
एक जोड़ी अंडाशय वृक्क के पास, पर उससे जुड़े नहीं। एक जोड़ी अंडवाहिनियाँ अवस्कर में अलग से खुलती हैं। वयस्क मादा एक बार में 2500 से 3000 अंडे देती है।
निषेचन और विकास
निषेचन बाहरी है: पानी में होता है। विकास में एक लार्वा अवस्था टैडपोल होती है, जो कायांतरण से वयस्क मेंढक बनती है।
मेंढक क्यों ज़रूरी
ये कीड़े खाकर फ़सल बचाते हैं, खाद्य शृंखला की कड़ी बनकर पारितंत्र का संतुलन रखते हैं, और कुछ देशों में इनकी टाँगें भोजन हैं।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- कोशिका → ऊतक → अंग → अंग तंत्र → जीव
- मेंढक का हृदय: 2 अलिंद + 1 निलय (3 कोष्ठ) + शिरा कोटर + धमनी शंकु
- भोजन का रास्ता: मुँह → मुखगुहा → ग्रसनी → ग्रासनली → आमाशय → आँत → मलाशय → अवस्कर
- साँस: पानी में त्वचा (त्वचीय); ज़मीन पर मुखगुहा + त्वचा + फेफड़े (फुप्फुसीय)
- नर शुक्राणु रास्ता: वृषण → शुक्रवाहिकाएँ → बिडर नाल → मूत्रजनन नलिका → अवस्कर
- नाइट्रोजन कचरा = यूरिया → यूरिया-उत्सर्जी; 10 जोड़ी कपाल तंत्रिकाएँ
हल किए गए उदाहरण
1. एक मेंढक पूरी गर्मी कीचड़ में दबा रहता है। वह कैसे साँस लेता है, और इस नींद का नाम क्या है?
यह गर्मी की नींद ग्रीष्म निष्क्रियता है। फेफड़े काम नहीं करते; मेंढक केवल नम त्वचा से गैसों का लेन-देन करता है (त्वचीय श्वसन)।
2. नर मेंढक में शुक्राणु का रास्ता वृषण से बाहर तक बताओ।
वृषण → शुक्रवाहिकाएँ → वृक्क → बिडर नाल → मूत्रजनन नलिका (मूत्रवाहिनी) → अवस्कर → बाहर।
3. दो मेंढकों में से एक में वाक्-कोष और अगले पैर की पहली उँगली पर गद्दी है। नर कौन है और क्यों?
वाक्-कोष और मैथुन गद्दी वाला नर है। ये केवल नर के लक्षण हैं (लैंगिक द्विरूपता); मादा में दोनों नहीं।
4. कौन सा कोष्ठ (क) शरीर से और (ख) फेफड़ों से ख़ून लेता है, और कौन बाहर भेजता है?
(क) शरीर का ख़ून → शिरा कोटर → दायाँ अलिंद। (ख) फेफड़ों का ख़ून → फुप्फुस शिराएँ → बायाँ अलिंद। एक निलय धमनी शंकु से ख़ून बाहर पंप करता है।
5. मेंढक को पानी पीने की ज़रूरत क्यों नहीं?
उसकी त्वचा पतली और नम है, इसलिए पानी सीधे त्वचा से शरीर में सोख लिया जाता है। मेंढक के लिए इतना काफ़ी है।
6. तीन अंग बताओ जिनके उत्पाद अवस्कर में आते हैं।
मलाशय (बिना पचा भोजन), वृक्क मूत्रवाहिनी और मूत्राशय से (मूत्र), और जनद (नर में मूत्रजनन नलिका से शुक्राणु; मादा में अंडवाहिनी से अंडे)।
आम गलतियाँ
- कहना कि मेंढक के हृदय में 4 कोष्ठ हैं। 3 हैं: दो अलिंद और एक निलय (शिरा कोटर और धमनी शंकु कोष्ठ नहीं गिने जाते)।
- मानना कि अंडाशय वृक्क से जुड़े हैं। वृषण जुड़े हैं (वृषणधर से); अंडाशय केवल पास में हैं।
- 12 जोड़ी कपाल तंत्रिकाएँ लिखना (वह मनुष्य में है)। मेंढक में 10 जोड़ी।
- कहना कि मेंढक केवल फेफड़ों से साँस लेता है। पानी में और निष्क्रियता में केवल त्वचा से।