जीव विज्ञान के पाठ
434 पाठ
- अंतःरोगी देखभाल: अस्पताल में मरीज़ की देखभाल – अंतःरोगी (इनपेशेंट) वह मरीज़ है जो कम से कम एक रात अस्पताल में रुकता है। देखभाल सहायक पेशेंट यूनिट साफ़ रखता है, परतों में कसी चादरों वाला बिस्तर बनाता है, साफ़ से गंदे और ऊपर से नीचे की ओर बेड बाथ देता है, जीवन-चिह्न (तापमान, नाड़ी, साँस, रक्तचाप) नापकर लिखता है, मरीज़ को 45–90° पर बैठाकर खिलाता है और न हिल सकने वाले मरीज़ को हर 2 घंटे में करवट दिलाता है। सामान्य से कोई भी बदलाव तुरंत नर्स को बताया जाता है।
- अंतरराष्ट्रीय नर्सिंग (International Nursing) – सेहत पूरी दुनिया का मामला है: बीमारियाँ यात्रा करती हैं और जगहों के बीच देखभाल असमान है। अंतरराष्ट्रीय नर्सिंग का मतलब है वैश्विक स्वास्थ्य (अंतर और साझा लक्ष्य) पर काम, कई देशों और संस्कृतियों के मरीज़ों की देखभाल और राहत, शिक्षण व टीकाकरण जैसा सीमाओं के पार काम।
- अनावृतबीजी पौधे: शंकुधारी और चीड़ – अनावृतबीजी (जिम्नोस्पर्म) बीज वाले पौधे हैं जिनके बीज नग्न होते हैं, यानी फल में बंद नहीं होते। चीड़, देवदार और स्प्रूस जैसे शंकुधारी पेड़ इनके जाने-पहचाने उदाहरण हैं। इनकी पत्तियाँ सुई जैसी होती हैं, इनमें नर और मादा शंकु होते हैं और परागण हवा से होता है। चीड़ के बीज में पंख होता है। इनसे लकड़ी, कागज़, राल और भोजन मिलता है।
- अन्य मत्स्य और समुद्री अभ्यास: पानी की जाँच – मछलियाँ अपने पानी में रहती हैं, इसलिए पानी की जाँच बार-बार करते हैं। चार आसान जाँचें हैं: तापमान, घुली ऑक्सीजन, खारापन और साफ़पन (सेकी डिस्क से)। गरम पानी में ऑक्सीजन कम घुलती है, समुद्री मछली को सही खारापन चाहिए और हरा पानी यानी बहुत सारे छोटे पौधे। इन संख्याओं के रिकॉर्ड से मछलियाँ स्वस्थ रहती हैं।
- आँखों की देखभाल और नशे को ना कहना – आपकी आँख कैमरे जैसी है: लेंस प्रकाश को रेटिना पर फ़ोकस करता है। बहुत पास से, बहुत देर तक पढ़ने या फ़ोन चलाने से आँख की मांसपेशियाँ थक जाती हैं और दूर की नज़र कमज़ोर (मायोपिया) होने का ख़तरा बढ़ सकता है। आँखें बचाने के लिए किताब 30 से 40 cm दूर रखिए, अच्छी रोशनी में पढ़िए, 20-20-20 नियम मानिए (हर 20 मिनट बाद 20 फ़ीट या 6 m दूर की चीज़ को 20 सेकंड देखिए), दिन की रोशनी में बाहर समय बिताइए, स्क्रीन कम कीजिए, अच्छी नींद लीजिए और समय-समय पर आँखों की जाँच कराइए। नशीले पदार्थ और तंबाकू शरीर (दिल, फेफड़े, जिगर), दिमाग़ (ध्यान, याददाश्त, मूड) और जीवन (पढ़ाई, परिवार, पैसा) को नुक़सान पहुँचाते हैं और लत लगा सकते हैं। ज़्यादातर देशों में अवैध नशीले पदार्थ बनाना, बेचना या रखना अपराध है, और दवा केवल डॉक्टर की सलाह से लेनी चाहिए। ना कहना आसान है: साफ़ मना कीजिए, बात बदलिए, वहाँ से हट जाइए और किसी भरोसेमंद बड़े को बताइए।
- आधुनिक समाज में शारीरिक शिक्षा – आज के जीवन में बहुत बैठना पड़ता है, इसलिए शारीरिक शिक्षा (PE) पहले से ज़्यादा ज़रूरी है। PE का लक्ष्य संतुलित विकास है: शरीर, मन और सामाजिक गुण साथ-साथ बढ़ें, एक दूसरे की कीमत पर नहीं। अनुकूल (adaptive) PE खेल, साधन और नियम बदलती है ताकि हर क्षमता का बच्चा भाग ले सके। बच्चों को रोज़ लगभग 60 मिनट हिलना-खेलना चाहिए।
- आनुवंशिक विकार – आनुवंशिक विकार (genetic disorder) वह बीमारी है जो किसी जीन में बदलाव या गुणसूत्रों की संख्या/बनावट में गड़बड़ी से होती है। एक-जीन विकार अप्रभावी (सिस्टिक फाइब्रोसिस, सिकल सेल एनीमिया: दो ख़राब प्रतियाँ चाहिए), प्रभावी (हंटिंगटन रोग: एक ख़राब प्रति काफ़ी) या X-लिंक्ड (हीमोफीलिया, वर्णांधता: ज़्यादातर लड़कों में) होते हैं। डाउन सिंड्रोम जैसे गुणसूत्र विकार (21वें गुणसूत्र की एक अतिरिक्त प्रति) अंडाणु या शुक्राणु बनते समय की गलती से होते हैं। पनेट वर्ग हर संतान की संभावना बताता है; आनुवंशिक जाँच, परामर्श और जीन थेरेपी परिवारों की मदद करते हैं।
- आनुवंशिकता और मेंडल के नियम – माता-पिता से बच्चों में लक्षणों का जाना आनुवंशिकता है। हर लक्षण के लिए माँ और पिता दोनों एक-एक जीन देते हैं। प्रभावी जीन अप्रभावी को छुपा देता है, इसलिए एकसंकर में 3:1 और द्विसंकर में 9:3:3:1 अनुपात आता है। जीन DNA का टुकड़ा है जो प्रोटीन बनवाता है, और प्रोटीन से लक्षण बनता है।
- आपदा नर्सिंग (Disaster Nursing) – आपदा नर्सिंग उन कई लोगों की देखभाल है जो एक साथ घायल होते हैं और जब स्टाफ़ व सामान कम हो। नर्सें ट्राइएज से सबसे ज़रूरतमंद का इलाज पहले करती हैं और चरणों के अनुसार काम बदलती हैं: तैयारी, तीव्र, उप-तीव्र और पुनर्वास। वे स्वास्थ्य, सफ़ाई और मन का भी ध्यान रखती हैं।
- आपात स्थिति में जीवित रहने के कौशल – लंबी आपात स्थिति (युद्ध, बाढ़, तूफ़ान, लंबी बिजली-कटौती) में शरीर लगभग 3 मिनट बिना हवा, 3 घंटे कठोर मौसम में बिना आश्रय, 3 दिन बिना पानी और 3 सप्ताह बिना भोजन टिकता है। इसलिए इस क्रम में ठीक कीजिए: साँस, आश्रय, पानी, फिर भोजन। घबराहट ख़तरनाक है, इसलिए STOP अपनाइए (रुको, सोचो, देखो, योजना बनाओ)। कपड़ा, रेत, कोयला और बजरी गंदे पानी को साफ़ दिखाते हैं, पर पीने से पहले उसे एक मिनट उबालिए।
- आहार संदर्भ सेवन और पोषण स्थिति का मूल्यांकन – शरीर दिन भर ऊर्जा खर्च करता है (BMR + गतिविधि + भोजन पचाना)। आहार संदर्भ सेवन (DRI) जैसे EAR, RDA, AI और UL बताते हैं कि हर पोषक तत्व कितना काफ़ी है और कितना ज़्यादा। पोषण स्थिति की जाँच शरीर की माप (BMI), रक्त जाँच, शरीर के लक्षण और खाने के रिकॉर्ड से होती है।
- इलाज करा रहे बच्चों की नर्सिंग – बीमार बच्चा छोटा वयस्क नहीं होता। इलाज में नर्स आसान शब्दों में समझाती है, खेल का सहारा लेती है, बच्चे को सुरक्षित रखती है और माता-पिता को पास रखती है। बीमारी के चरण के हिसाब से देखभाल बदलती है: तीव्र चरण में सतर्क निगरानी, दीर्घकालिक में सिखाना और दिनचर्या, और अंतिम चरण में आराम और परिवार का साथ।
- इलाज करा रहे बुज़ुर्गों की नर्सिंग – बुज़ुर्ग अलग तरह से बीमार पड़ते हैं। संकेत धीमे होते हैं, ठीक होने में समय लगता है और कई दवाएँ साथ चलती हैं। तीव्र चरण में नर्स पानी, साँस और होश पर नज़र रखती है। दीर्घकालिक चरण में वह सिखाती है और दिनचर्या बनवाती है। अंतिम चरण में वह आराम, गरिमा और परिवार का साथ देती है।
- उच्च तंत्रिका गतिविधि – उच्च तंत्रिका गतिविधि मस्तिष्क की बाहरी परत (कॉर्टेक्स) का वह काम है जिससे हम सीखते, याद रखते, बोलते, महसूस करते और सोते हैं। जन्मजात प्रतिवर्त एक प्रजाति में सबमें एक जैसे होते हैं। अनुबंधित प्रतिवर्त जीवन में सीखे जाते हैं; जब नया संकेत पुराने संकेत के साथ बार-बार आता है तब बनते हैं, और जोड़ बंद होने पर कमज़ोर पड़ जाते हैं।
- उच्च पादपों में प्रकाश-संश्लेषण – हरे पौधे प्रकाश की मदद से CO₂ और पानी से शर्करा बनाते हैं। यह क्लोरोप्लास्ट में होता है। थायलाकॉइड में प्रकाश अभिक्रिया पानी तोड़ती है, O₂ छोड़ती है और ATP व NADPH बनाती है। स्ट्रोमा में केल्विन चक्र इसी ATP और NADPH से CO₂ को शर्करा में बदलता है। C₄ पौधे CO₂ पंप करके प्रकाश-श्वसन की बर्बादी रोकते हैं। जो कारक सबसे कम हो, वही दर तय करता है।
- उत्परिवर्तन (Mutation) – उत्परिवर्तन DNA में अचानक होने वाला स्थायी बदलाव है। जीन (बिंदु) उत्परिवर्तन में एक या कुछ क्षार बदलते हैं: प्रतिस्थापन, जोड़ या विलोपन। जोड़ और विलोपन पढ़ने का ढाँचा खिसका देते हैं। गुणसूत्र उत्परिवर्तन में बड़े टुकड़े या गुणसूत्रों की संख्या बदलती है। ये संयोग से या उत्परिवर्तजनों (UV, X-किरणें, कुछ रसायन) से होते हैं। ये हानिकारक, तटस्थ या लाभदायक हो सकते हैं और हर आनुवंशिक विविधता की पहली जड़ हैं।
- उत्सर्जी उत्पाद एवं उनका निष्कासन – जीवों को नाइट्रोजन अपशिष्ट निकालना होता है। अमोनिया सबसे विषैली है और बहुत पानी माँगती है; यूरिया कम विषैला; यूरिक अम्ल को सबसे कम पानी चाहिए। मनुष्य यूरियोत्सर्जी हैं। हर वृक्क में लगभग 10 लाख वृक्काणु हैं। मूत्र तीन चरणों में बनता है: गुच्छीय निस्यंदन (लगभग 125 mL/मिनट, 180 L/दिन), पुनरवशोषण (लगभग 99% वापस) और स्रावण। हेनले लूप और वासा रेक्टा प्रतिधारा से मध्यांश को नमकीन बनाते हैं, जिससे गाढ़ा मूत्र बनता है। ADH, रेनिन-एंजियोटेंसिन-एल्डोस्टेरोन तंत्र और ANF जल व लवण नियंत्रित करते हैं। फेफड़े, यकृत, त्वचा भी मदद करते हैं। वृक्क फेल हों तो डायलिसिस या प्रत्यारोपण।
- उद्दीपन और अनुक्रिया – उद्दीपन (stimulus) आसपास या शरीर के अंदर का कोई बदलाव है। जो जीव इसे पहचानकर प्रतिक्रिया देते हैं, वे ज़्यादा बचते हैं। रास्ता हमेशा एक ही: उद्दीपन → ग्राही → समन्वयक → प्रभावक → अनुक्रिया। छोटे जीव अनुचलन (दिशा में चलना) या गतिकी (चाल बदलना) से चलते हैं। पौधे IAA की मदद से अनुवर्तन द्वारा मुड़ते हैं। जंतुओं में पैकिनी कणिका और आँख के शलाका-शंकु जैसे ग्राही होते हैं, तेज़ बचाव के लिए प्रतिवर्ती चाप, और मस्तिष्क का मेड्यूला हृदय गति बदलता है।
- उद्देश्य और लक्ष्य-समूह के अनुसार मेन्यू और पकाना – मेन्यू के नियम उद्देश्य और व्यक्ति के साथ बदलते हैं। रोज़ का खाना सरल, जल्दी बनने वाला, कम खर्च और संतुलित होता है। त्योहार और दावत का खाना मेहमानों के लिए कोर्स में बनता है। बीमारी में पहले तरल, फिर नरम हल्का खाना, थोड़ा-थोड़ा। छोटे बच्चों को छोटी, नरम, बार-बार की मात्रा और सुरक्षित आकार चाहिए। बुज़ुर्गों को थोड़ी कम ऊर्जा, उतना ही प्रोटीन, नरम खाना, कम नमक और ज़्यादा पानी चाहिए।
- उन्नत जीव विज्ञान: संरचना, ऊर्जा, रक्षा, आनुवंशिकता और जैव प्रौद्योगिकी – उन्नत जीव विज्ञान चार बड़े विचार जोड़ता है। संरचना और ऊर्जा: कोशिका के भाग होते हैं और माइटोकॉन्ड्रिया ग्लूकोज़ से ATP बनाते हैं। नियमन और रक्षा: हार्मोन और तंत्रिकाएँ शरीर को संतुलित रखती हैं और प्रतिरक्षी रोगाणुओं से लड़ते हैं। जीवन की निरंतरता: DNA अपनी नकल बनाकर निर्देश आगे देता है। जैव प्रौद्योगिकी: वैज्ञानिक जीन एक जीव से दूसरे में डालकर उपयोगी चीज़ें बनाते हैं।
- उपचार में सहायता (Assisting Medical Treatment) – जब डॉक्टर इलाज तय करता है, तब नर्स और देखभाल करने वाले उसे सुरक्षित तरीके से पूरा करने में मदद करते हैं। वे जीवन-संकेत (साँस, नब्ज़, तापमान, रक्तचाप) देखते हैं, पाँच सही नियमों से दवा देते हैं, घाव साफ़ करके ढकते हैं, जाँच और प्रक्रियाओं के लिए तैयारी कराते हैं, आपात स्थिति में CPR जैसी जान बचाने वाली मदद देते हैं और जीवन के अंतिम समय में आराम और सम्मान देते हैं।
- उपापचय: कोशिका कैसे तोड़ती, बनाती और ऊर्जा चलाती है – उपापचय (metabolism) शरीर के अंदर होने वाली सभी रासायनिक क्रियाओं का नाम है. बड़े अणुओं को छोटे टुकड़ों में तोड़ना अपचय (catabolism) है; इसमें ऊर्जा निकलती है. छोटे अणुओं को जोड़कर बड़ा बनाना उपचय (anabolism) है; इसमें ऊर्जा लगती है. ATP इन दोनों के बीच ऊर्जा ले जाता है, जैसे रिचार्ज होने वाली बैटरी. हर क्रिया का अपना एंज़ाइम होता है और क्रियाएँ जुड़कर उपापचयी पथ बनाती हैं.
- उभयचर: पानी और ज़मीन दोनों पर जीवन – उभयचर (मेंढक, भेक, न्यूट, सैलामैंडर) रीढ़ वाले जंतु हैं जिनकी त्वचा पतली, गीली और बिना बालों-शल्कों की होती है। ज़्यादातर नरम अंडे पानी में देते हैं। बच्चा (टैडपोल) गिल्स से और वयस्क फेफड़ों व त्वचा से साँस लेता है। इस बदलाव को कायांतरण (मेटामॉर्फोसिस) कहते हैं। ये शीत-रक्तीय हैं और इनके हृदय में तीन कक्ष होते हैं।
- ऊतक: पादप और जंतु ऊतक – ऊतक एक जैसी कोशिकाओं का समूह है जो मिलकर एक काम करता है। कोशिकाएँ ऊतक बनाती हैं, ऊतक अंग, अंग अंग तंत्र और तंत्र मिलकर जीव। पौधों में बँटने वाला विभज्योतक और न बँटने वाला स्थायी ऊतक होता है, जिसमें जाइलम (पानी ऊपर) और फ्लोएम (भोजन दोनों ओर) शामिल हैं। जंतुओं में उपकला, संयोजी, पेशी और तंत्रिका ऊतक होते हैं। हड्डियों, पेशियों और जोड़ों को सही मुद्रा, व्यायाम और कैल्शियम वाला भोजन चाहिए।
- ऊर्जा तंत्र: व्यायाम में मांसपेशियों को ऊर्जा कैसे मिलती है – मांसपेशी सीधे सिर्फ़ एक ईंधन इस्तेमाल करती है: ATP। ATP का भंडार 2–3 सेकंड ही चलता है, इसलिए शरीर उसे तीन तरीकों से दोबारा बनाता है। ATP-PC तंत्र क्रिएटिन फ़ॉस्फ़ेट से बहुत तेज़ ATP बनाता है, लगभग 10 सेकंड। अवायवीय ग्लाइकोलिसिस ग्लूकोज़ को बिना ऑक्सीजन तोड़ता है: तेज़, लगभग 10 सेकंड से 2 मिनट, और लैक्टेट बनता है। वायवीय (एरोबिक) तंत्र ऑक्सीजन से ग्लूकोज़ और वसा जलाता है: धीमा पर घंटों चलता है, सिर्फ़ CO₂ और पानी बनते हैं। तीनों साथ काम करते हैं; तीव्रता और समय तय करते हैं कौन आगे रहेगा। व्यायाम के बाद EPOC (अतिरिक्त ऑक्सीजन) भंडार भरती है और लैक्टेट हटाती है। ऊँचाई और गर्मी एरोबिक तंत्र पर बोझ बढ़ाते हैं।
- ऊर्जा संसाधन, जैव विविधता और टिकाऊ विकास – दुनिया की ज़्यादातर ऊर्जा आज भी जीवाश्म ईंधन (कोयला, तेल, गैस) से आती है, जो खत्म हो जाएँगे और कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ते हैं। नवीकरणीय स्रोत (सूर्य, हवा, पानी) बार-बार मिलते हैं। जैव विविधता, यानी जीवन की विविधता, पारिस्थितिक तंत्र को स्थिर रखती है और हमें भोजन, साफ़ हवा और दवाइयाँ देती है। टिकाऊ विकास आज की ज़रूरतें पूरी करता है और भविष्य के लोगों के लिए ऊर्जा और प्रकृति बचाए रखता है।
- एंजाइम (Enzymes) – एंजाइम प्रोटीन होते हैं जो जैव उत्प्रेरक (biological catalyst) का काम करते हैं: ये कोशिका की क्रियाओं को तेज़ करते हैं और ख़ुद ख़र्च नहीं होते। हर एंजाइम का एक सक्रिय स्थल (active site) होता है जिसमें सिर्फ़ एक तरह का सब्सट्रेट फिट होता है (विशिष्टता)। एंजाइम सक्रियण ऊर्जा घटाकर काम करते हैं। ये एक इष्टतम तापमान और pH पर सबसे अच्छा काम करते हैं; ज़्यादा गर्मी या ग़लत pH से इनका आकार बिगड़ जाता है (विकृतीकरण)।
- एकीकृत नर्सिंग क्लिनिकल प्रैक्टिस – असली देखभाल में नर्स कई कौशल एक चक्र में जोड़ती है: देखो और पूछो, योजना बनाओ, टीम के साथ देखभाल करो, फिर जाँचो और दोहराओ। होम नर्सिंग (घर पर देखभाल) में मरीज़ अपने घर में रहता है, इसलिए नर्स परिवार को सिखाती है, घर की चीज़ें काम में लेती है और डॉक्टर व समुदाय के सहायकों से जुड़ती है। क्लिनिकल प्रैक्टिस यानी शिक्षक की निगरानी में असली मरीज़ों के साथ यह चक्र सीखना।
- एथलेटिक्स (Athletics): दौड़, कूद और फेंक – एथलेटिक्स (ट्रैक और फ़ील्ड) वह खेल है जिसमें प्रदर्शन मापा जाता है: दौड़ का समय, कूद और फेंक की दूरी मीटर में। ट्रैक स्पर्धाओं में स्प्रिंट, मध्य और लंबी दूरी, बाधा दौड़ और रिले हैं। कूद (लंबी, त्रि, ऊँची, पोल वॉल्ट) के चार चरण: दौड़, उछाल, उड़ान और उतरना। फेंक (गोला, चक्का, भाला, हथौड़ा) सबसे ज़्यादा छोड़ने की चाल पर, फिर कोण और ऊँचाई पर निर्भर है।
- एरोबिक फ़िटनेस और हृदय गति क्षेत्र – एरोबिक फ़िटनेस का मतलब है कि लंबी मेहनत में दिल, फेफड़े और खून मांसपेशियों को कितनी अच्छी तरह ऑक्सीजन देते हैं। नाड़ी बताती है कि आप कितनी मेहनत कर रहे हैं। अधिकतम हृदय गति लगभग 220 − उम्र होती है। अधिकतम के 50–100% को पाँच क्षेत्रों में बाँटते हैं; सहनशक्ति के लिए ज़्यादातर 60–80% में रहते हैं। हफ़्ते की गतिविधि और स्क्रीन टाइम लिखकर अच्छी आदत बनाएँ।
- ऑपरेशन थिएटर: ज़ोन, व्यवस्था और मरीज़ की देखभाल – ऑपरेशन थिएटर (OT) वह कमरा है जहाँ सर्जरी होती है। सबसे बड़ा खतरा कीटाणु हैं, इसलिए OT को ज़ोन में बनाया जाता है, जो अंदर जाते-जाते ज़्यादा साफ़ होते हैं: सुरक्षात्मक (बाहरी) ज़ोन, स्वच्छ ज़ोन, जीवाणुरहित (स्टेराइल) ज़ोन, और गंदी चीज़ें बाहर ले जाने के लिए अलग निपटान ज़ोन। स्टाफ़ कपड़े बदलता है, हाथ रगड़कर धोता है (स्क्रब), और स्टेराइल गाउन व दस्ताने पहनता है। OT में ऑपरेशन टेबल, छाया-रहित लाइट, एनेस्थीसिया मशीन, मॉनिटर, सक्शन और औज़ारों की ट्रॉली होती है, और छनी हुई हवा धनात्मक दबाव पर रहती है। टीम में सर्जन, सहायक, एनेस्थेटिस्ट, स्क्रब नर्स, सर्कुलेटिंग नर्स और OT टेक्नीशियन होते हैं। ऑपरेशन से पहले मरीज़ की सहमति, जाँच, उपवास और तैयारी होती है। ऑपरेशन के बाद रिकवरी में साँस, नब्ज़, रक्तचाप, दर्द, खून बहना और घाव का संक्रमण देखा जाता है।
- ओज़ोन परत का क्षय और कचरा प्रबंधन – ऊपर आसमान में ओज़ोन (O₃) हानिकारक पराबैंगनी (UV) किरणों को रोकती है, पर CFC इसे पतला कर देते हैं; ज़मीन पर जैव निम्नीकरणीय कचरा अपने-आप टूट जाता है और अजैव निम्नीकरणीय कचरा सालों पड़ा रहता है, इसलिए कम करें, दोबारा इस्तेमाल करें, पुनः चक्रण करें और कचरा अलग-अलग रखें।
- कंकाल तंत्र – कंकाल शरीर का ढाँचा है; बड़े व्यक्ति में 206 हड्डियाँ होती हैं। इसके पाँच मुख्य कार्य हैं: सहारा और आकार, सुरक्षा, गति (मांसपेशियों के साथ), लाल अस्थि-मज्जा में रक्त कोशिकाएँ बनाना और कैल्शियम जैसे खनिज जमा करना। हड्डियाँ जोड़ों (संधि) पर मिलती हैं: कब्ज़ा जोड़ (कोहनी, घुटना) एक दिशा में मुड़ता है, कंदुक-खल्लिका जोड़ (कंधा, कूल्हा) हर दिशा में घूमता है। स्नायुबंधन हड्डी को हड्डी से, कंडरा मांसपेशी को हड्डी से जोड़ती है, उपास्थि सिरों पर गद्दी है। मांसपेशियाँ सिर्फ़ खींचती हैं, इसलिए जोड़ी में काम करती हैं, जैसे बाइसेप्स और ट्राइसेप्स।
- कवक: मशरूम, फफूँद, यीस्ट और लाइकेन – कवक (फंजाई) ऐसे जीव हैं जिनकी कोशिकाओं में केंद्रक होता है और कोशिका भित्ति काइटिन की बनी होती है। इनमें पर्णहरित (क्लोरोफ़िल) नहीं होता, इसलिए ये अपना भोजन नहीं बना सकते। ज़्यादातर कवक पतले धागों से बने होते हैं जिन्हें कवकतंतु (हाइफ़ी) कहते हैं; इनका जाल कवकजाल (माइसीलियम) है। कवक भोजन पर पाचक रस डालकर उसे बाहर ही पचाते हैं और फिर सोख लेते हैं। ये बीजाणुओं से फैलते हैं। लाइकेन एक कवक और एक शैवाल की साझेदारी है।
- कशेरुकी: रीढ़ की हड्डी वाले जंतु – कशेरुकी वे जंतु हैं जिनमें रीढ़ की हड्डी होती है। इनके पाँच वर्ग हैं: मछली, उभयचर, सरीसृप, पक्षी और स्तनधारी। ये त्वचा, साँस लेने के अंग, हृदय के कक्षों (2, 3, 3, 4, 4), रक्त के तापमान और अंडे देने या बच्चे जनने के तरीक़े में अलग हैं।
- कसरत और दिमाग़: सीखना और अपना खेल चुनना – कसरत करते समय दिल ज़ोर से धड़कता है और ऑक्सीजन तथा शर्करा वाला ज़्यादा ख़ून दिमाग़ तक पहुँचता है। नियमित कसरत से तंत्रिका कोशिकाएँ बढ़ती और आपस में जुड़ती हैं, और ऐसे रसायन निकलते हैं जो मूड सुधारते और तनाव घटाते हैं। सक्रिय विद्यार्थी अक्सर बेहतर ध्यान लगाते हैं, ज़्यादा याद रखते हैं और अच्छी नींद लेते हैं। लगभग 45 मिनट पढ़ाई के बाद 10 मिनट का सक्रिय ब्रेक ध्यान वापस ला सकता है। ऐसा खेल या शौक़ चुनिए जो आपको पसंद हो, ताकि आप उसे जारी रख सकें। टीम खेल टीमवर्क सिखाते हैं, अकेले के खेल आत्म-अनुशासन, बाहर की गतिविधियाँ हिम्मत, और योग या नृत्य जैसी मन-शरीर गतिविधियाँ शांति और संतुलन। रुचि चार क़दमों में बढ़ती है: आज़माओ, मज़ा लो, अभ्यास करो और दूसरों के साथ खेलो। छोटे लक्ष्य रखिए और आराम तथा नींद के लिए भी समय निकालिए।
- काई (मॉस / ब्रायोफ़ाइटा) – काई छोटे हरे स्थलीय पौधे हैं। इनमें सच्ची जड़ें और नलियाँ नहीं होतीं। मूलाभास इन्हें ज़मीन से पकड़े रखते हैं। शुक्राणुओं को तैरने के लिए पानी चाहिए, इसलिए काई नम जगह में रहती है। हरा पौधा (n) अंडा और शुक्राणु बनाता है। निषेचन के बाद उस पर कैप्सूल (2n) उगता है और बीजाणु छोड़ता है। दलदल की स्फ़ैग्नम काई से पीट बनता है।
- कृमि: चपटे, गोल और वलयाकार – कृमि कोमल, लंबे और बिना पैरों वाले जंतु हैं। चपटे कृमि पत्ती जैसे चपटे, गोल कृमि गोल नली जैसे और वलयाकार (केंचुआ) कृमियों का शरीर छल्लों से बना होता है। कई चपटे और गोल कृमि परजीवी हैं जिन्हें पोषी और जीवन चक्र चाहिए। केंचुआ मिट्टी को उपजाऊ बनाता है।
- कृषि के रुझान और कृषि प्रबंधन – दुनिया भर में खेती बदल रही है। खेत कम होते हैं पर बड़े, किसान बुज़ुर्ग होते हैं, मशीनें और तकनीक काम सँभालती हैं और लोग अनाज कम तथा सब्ज़ी, फल और पशु-आहार ज़्यादा खाते हैं। सरकारें नीति और कानून से खाना सुरक्षित, आपूर्ति स्थिर और गाँव जीवंत रखती हैं।
- कृषि के सहायक उद्यम – सहायक (संबद्ध) उद्यम वे काम हैं जो किसान परिवार फसल के साथ-साथ चलाता है: डेयरी, मुर्गीपालन, मधुमक्खी पालन, मशरूम उत्पादन, मछली पालन, बकरी-भेड़ पालन, रेशम कीट पालन आदि। ये साल भर आय देते हैं, खेत का कचरा काम में लाते हैं, खाद और भोजन देते हैं, परिवार को रोज़गार देते हैं और फसल खराब होने पर सहारा बनते हैं। समेकित कृषि प्रणाली में एक का कचरा दूसरे का कच्चा माल बनता है।
- कृषि प्रबंधन और प्रोजेक्ट लर्निंग – कृषि प्रबंधन का मतलब है तय करना कि क्या उगाएँ या पालें, कितना खर्च करें और उचित लाभ कैसे कमाएँ। प्रोजेक्ट लर्निंग में तुम खेती की असली समस्या चुनते हो, योजना बनाते हो, काम करते हो, नतीजा जाँचते हो और सुधार करते हो। यह चक्र बार-बार चलता है और रिकॉर्ड हर बार इसे बेहतर बनाते हैं।
- केंडो: तलवार का मार्ग, क़दम-दर-क़दम – केंडो जापान का खेल है, जिसमें दो खिलाड़ी बाँस की तलवार (शिनाई) और सुरक्षा कवच (बोगू) पहनकर खेलते हैं। इसमें सीखते हैं: शांत मुद्रा (कमाए), नीची सरकती चाल, सिर (मेन), कलाई (कोटे), शरीर (दो) पर वार और गले (त्सुकी) पर सीधा धक्का। पहले हमला करने वाली चालें शिकाके-वाज़ा और जवाब देने वाली चालें ओजी-वाज़ा हैं। सम्मान और सुरक्षा सबसे पहले हैं।
- कैंसर: जब कोशिकाएँ बँटना बंद करना भूल जाती हैं – शरीर नई कोशिकाएँ समसूत्री विभाजन (mitosis) से तभी बनाता है जब ज़रूरत हो: बढ़ने, घाव भरने या पुरानी कोशिकाएँ बदलने के लिए। DNA के जीन इसे नियंत्रित करते हैं: आद्य-ऑन्कोजीन (proto-oncogene) एक्सीलरेटर हैं, अर्बुद-दमनकारी जीन (tumour-suppressor) ब्रेक हैं, और कुछ जीन DNA की मरम्मत करते हैं या खराब कोशिका को खुद नष्ट करवाते हैं (एपोप्टोसिस)। कैंसर तब शुरू होता है जब एक कोशिका में इन जीनों में कई उत्परिवर्तन (mutation) जमा हो जाते हैं। कोशिका रुकने का संकेत नहीं मानती और बार-बार बँटती है (1, 2, 4, 8…), जिससे गाँठ बनती है: अर्बुद या ट्यूमर। सुदम्य (benign) ट्यूमर एक जगह झिल्ली में रहता है; घातक (malignant) ट्यूमर आसपास के ऊतक में घुसता है और रक्त या लसीका से दूसरे अंगों तक फैल सकता है (मेटास्टेसिस)। उत्परिवर्तन कैंसरजनों (तंबाकू का धुआँ, UV, X-किरणें, कुछ रसायन, वायु प्रदूषण), कुछ वायरसों (HPV, हेपेटाइटिस B), जीवनशैली (शराब, मोटापा, खराब भोजन), उम्र और कभी-कभी विरासत में मिले जीनों (जैसे BRCA) से होते हैं। बहुत से कैंसर रोके जा सकते हैं और जल्दी पकड़ें तो इलाज अच्छा होता है।
- कॉर्डेट के लक्षण और लैंसलेट – कॉर्डेट वे जंतु हैं जिनमें जीवन की किसी अवस्था में नोटोकॉर्ड, पृष्ठ खोखली तंत्रिका रज्जु, ग्रसनी छिद्र और गुदा-पश्च पूँछ होती है। लैंसलेट में चारों जीवन भर रहते हैं, इसलिए यह सबसे साफ़ उदाहरण है। मछली, मेंढक, पक्षी और मनुष्य कशेरुकी कॉर्डेट हैं।
- कोशिका का आकार, कक्ष और ऊर्जा: कोशिका ऐसी क्यों बनी है – कोशिकाएँ छोटी होती हैं क्योंकि उनकी सतह (कोशिका झिल्ली) को पूरे आयतन के लिए पदार्थों का लेन-देन करना होता है, और कोशिका बड़ी होने पर आयतन सतह से तेज़ बढ़ता है: पृष्ठ क्षेत्रफल-आयतन (SA:V) अनुपात घटता है। यूकैरियोटिक कोशिकाएँ झिल्ली से बने कक्षों से यह समस्या सुलझाती हैं, जो काम बाँटते हैं और झिल्ली बढ़ाते हैं। माइटोकॉन्ड्रिया और क्लोरोप्लास्ट बहुत पहले निगले गए जीवाणुओं से बने (अंतःसहजीवन)। उनकी अंदर की तहें, क्रिस्टी और थायलाकॉइड, ATP बनाने और प्रकाश पकड़ने के लिए बड़ा क्षेत्र देती हैं।
- कोशिका का चयापचय: बनाना, तोड़ना और ऊर्जा पाना – चयापचय (मेटाबोलिज़्म) कोशिका की सारी रासायनिक क्रियाएँ हैं। उपचय बड़े अणु बनाता है और ऊर्जा लेता है; अपचय भोजन के अणु तोड़ता है और ऊर्जा देता है, जो ATP में जमा होती है। स्वपोषी अपना भोजन ख़ुद बनाते हैं (प्रकाश से प्रकाश-संश्लेषण, या रासायनिक ऊर्जा से रसायन-संश्लेषण), परपोषी बना-बनाया खाते हैं, और मिश्रपोषी दोनों करते हैं। ग्लूकोज़ का टूटना तीन चरणों में होता है: तैयारी, ग्लाइकोलिसिस (ऑक्सीजन नहीं, 2 ATP) और माइटोकॉन्ड्रिया में ऑक्सीजन वाला चरण (लगभग 28 ATP और)। ऑक्सीजन के साथ एक ग्लूकोज़ से लगभग 30 ATP मिलता है; बिना ऑक्सीजन सिर्फ़ 2, और अंत में लैक्टिक अम्ल या अल्कोहल बनता है।
- कोशिका का बुढ़ापा और मृत्यु: एपोप्टोसिस – कोशिकाएँ हमेशा नहीं जीतीं। बूढ़ी होती कोशिका छोटी हो जाती है, धीमे काम करती है और कचरा जमा करती है। कोशिका दो तरह से मरती है। एपोप्टोसिस में कोशिका योजना के अनुसार मरती है: सिकुड़ती है, बंद पैकेटों में टूटती है और पड़ोसी उन्हें खा लेते हैं, इसलिए कुछ बाहर नहीं बहता। नेक्रोसिस में चोट से कोशिका फूलकर फट जाती है और अंदर का सामान बहने से सूजन आती है। एपोप्टोसिस शरीर को आकार देता है (जैसे उँगलियों के बीच की झिल्ली हटाना) और खराब कोशिकाओं को हटाकर कैंसर से बचाता है।
- कोशिका चक्र और कोशिका विभाजन – कोशिका एक तय क्रम में बढ़ती है, DNA दोहराती है और बँटती है – इसे कोशिका चक्र कहते हैं: अंतरावस्था (G1, S, G2) और M प्रावस्था। S प्रावस्था में DNA दोगुना (2C → 4C) होता है, पर गुणसूत्र संख्या वही रहती है। समसूत्री विभाजन (पूर्वावस्था, मध्यावस्था, पश्चावस्था, अंत्यावस्था) और कोशिकाद्रव्य विभाजन से जनक जैसी दो कोशिकाएँ बनती हैं – यह समीकरणीय विभाजन वृद्धि और मरम्मत के लिए है। अर्धसूत्री विभाजन में दो विभाजन होते हैं; अर्धसूत्री I में समजात गुणसूत्र जोड़ा बनाते हैं, जीन विनिमय करते हैं और अलग होते हैं, जिससे गुणसूत्र संख्या आधी (2n → n) होती है। इससे युग्मकों के लिए चार अगुणित कोशिकाएँ बनती हैं और विविधता आती है।
- कोशिका विभाजन: एक कोशिका से दो (या चार) कैसे बनती हैं – हर जीव इसलिए बढ़ता है क्योंकि उसकी कोशिकाएँ बँटती हैं। हर कोशिका किसी दूसरी कोशिका से ही बनती है (कोशिका सिद्धांत)। बँटने से पहले कोशिका अपने गुणसूत्रों की कॉपी बनाती है। समसूत्री विभाजन (माइटोसिस) से 2 एक जैसी कोशिकाएँ बनती हैं, गुणसूत्र उतने ही रहते हैं; यह वृद्धि और मरम्मत के लिए है। अर्धसूत्री विभाजन (मियोसिस) दो बार बँटकर 4 कोशिकाएँ बनाता है, हर एक में आधे गुणसूत्र; इससे युग्मक बनते हैं।
- कोशिका विभेदन और स्टेम कोशिका – आपके शरीर में 200 से ज़्यादा तरह की कोशिकाएँ हैं, पर सब एक ही कोशिका, युग्मनज, से बनी हैं। हर कोशिका में वही DNA है। विभेदन में कोशिका कुछ जीन चालू और कुछ बंद रखती है, इसलिए उसका आकार और काम अलग हो जाता है। जो कोशिकाएँ बँट सकती हैं और कई प्रकार की बन सकती हैं, उन्हें स्टेम कोशिका कहते हैं।
- कोशिका संकेतन: कोशिकाएँ आपस में बात कैसे करती हैं – कोशिकाएँ संकेत अणुओं (लिगैंड) से संदेश भेजती हैं। हर संकेत के तीन चरण होते हैं: ग्रहण (लिगैंड अपने मेल वाले ग्राही से जुड़ता है), संचरण (प्रोटीनों की रिले श्रृंखला और cAMP जैसे द्वितीय संदेशवाहक संदेश को आगे बढ़ाते और कई गुना करते हैं) और अनुक्रिया (कोशिका कोई जीन चालू करती है, चैनल खोलती है या एंजाइम बदलती है)। फीडबैक नतीजे को नियंत्रित करता है: ऋणात्मक फीडबैक मान को सामान्य पर लाता है, धनात्मक फीडबैक उसे और बढ़ाता है।
- कोशिका: जीवन की इकाई – हर सजीव कोशिकाओं से बना है और हर नई कोशिका पुरानी कोशिका से बनती है। प्रोकैरियोटी कोशिका (जीवाणु) में केंद्रक आवरण और झिल्ली वाले कोशिकांग नहीं होते; यूकैरियोटी कोशिका में असली केंद्रक और कई कोशिकांग होते हैं। झिल्ली लिपिड और प्रोटीन का तरल मोज़ेक है; पौधों में ऊपर से सेलुलोज़ की भित्ति। ER, गॉल्जी, लयनकाय और रिक्तिका मिलकर अंतःझिल्ली तंत्र बनाते हैं। माइटोकॉन्ड्रिया और लवक ऊर्जा व भोजन बनाते हैं, राइबोसोम प्रोटीन बनाते हैं, कोशिका कंकाल, पक्ष्माभ, कशाभिका और तारककेंद्र आकार व गति देते हैं, और केंद्रक में DNA रहता है।
- कोशिका: जीवन की मूल इकाई – हर सजीव कोशिकाओं से बना है। 1665 में रॉबर्ट हुक ने कॉर्क में सबसे पहले कोशिकाएँ देखीं। कोशिकाएँ प्रोकैरियोटी (असली केंद्रक नहीं, जैसे जीवाणु) या यूकैरियोटी (असली केंद्रक) होती हैं। पादप कोशिका में कोशिका भित्ति, हरितलवक और बड़ी रिक्तिका होती है, जंतु कोशिका में नहीं। हर कोशिकांग का एक काम है। पानी परासरण से कोशिका में आता-जाता है। नई कोशिकाएँ समसूत्री (वृद्धि) और अर्धसूत्री (जनन कोशिकाएँ) विभाजन से बनती हैं।
- क्लबमॉस, हॉर्सटेल और फ़र्न – क्लबमॉस, हॉर्सटेल और फ़र्न में नलियाँ (जाइलम और फ़्लोएम) होती हैं और ये बीज से नहीं, बीजाणुओं से प्रजनन करते हैं। फ़र्न पत्तियों के नीचे सोराई में बीजाणु बनाता है। बीजाणु से छोटा दिल जैसा प्रोथैलस (n) बनता है। शुक्राणु अंडे तक तैरते हैं और नया फ़र्न (2n) उगता है। बहुत पहले के विशाल फ़र्न दबकर धीरे-धीरे कोयला बन गए।
- क्लोनिंग: वैज्ञानिक किसी जीव की प्रतिलिपि कैसे बनाते हैं – क्लोन ऐसा जीव है जिसके जीन किसी दूसरे जीव जैसे हों। प्रकृति हर समय क्लोन बनाती है: एक जैसे जुड़वाँ, बँटते जीवाणु, पौधे की कलम। प्रयोगशाला में वैज्ञानिक जंतु कोशिकाओं को थाली में उगाते हैं, दो कोशिकाओं को जोड़कर एक करते हैं, और शरीर कोशिका का केंद्रक ऐसे अंड में डालते हैं जिसका अपना केंद्रक निकाल दिया गया हो। यह केंद्रक स्थानांतरण है। अंड बँटकर भ्रूण बनता है जो सरोगेट माँ के भीतर बढ़ता है। बच्चे में केंद्रक दाता के जीन होते हैं। डॉली भेड़ (1996) वयस्क शरीर कोशिका से इस तरह बना पहला स्तनधारी था।
- क्षेत्र के अनुसार क्लिनिकल अभ्यास (Clinical Practice by Nursing Field) – छात्र नर्सें पाँच मुख्य क्षेत्रों में अभ्यास करती हैं: वयस्क नर्सिंग (बीमारी, सर्जरी, लंबी बीमारियाँ), बुज़ुर्ग नर्सिंग (गिरना, याददाश्त, सम्मान), बाल नर्सिंग (खेल, वज़न से मात्रा, परिवार), मातृत्व नर्सिंग (गर्भावस्था, प्रसव, शिशु) और मानसिक स्वास्थ्य नर्सिंग (सुनना, सुरक्षा, स्वस्थ होना)।
- खाद्य उत्पादन – खाद्य उत्पादन यानी इंसान पर्याप्त भोजन कैसे उगाता, पालता और पकड़ता है। खाद्य सुरक्षा का मतलब है हर व्यक्ति को हमेशा पर्याप्त, सुरक्षित और पौष्टिक भोजन मिले। बढ़ती आबादी, बदलता खान-पान, नए कीट, जलवायु परिवर्तन, युद्ध और लागत इसके लिए ख़तरा हैं। हम खेती के तरीक़ों (उर्वरक, कीट नियंत्रण, सिंचाई, गहन पशुपालन), जाल के छेद और कोटा के नियमों और जैव प्रौद्योगिकी (माइकोप्रोटीन, GM फ़सलें) से उत्पादन बढ़ाते हैं।
- खाद्य एलर्जी और उससे बचाव – खाद्य एलर्जी तब होती है जब शरीर की रोग-प्रतिरोधक प्रणाली खाने के एक हानिरहित प्रोटीन को गलती से दुश्मन समझ लेती है। पहली बार एंटीबॉडी (IgE) बनती हैं, अगली बार मास्ट कोशिकाएँ हिस्टामिन छोड़ती हैं और खुजली, सूजन, उल्टी या साँस में तकलीफ़ होती है। ज़्यादातर एलर्जी का इलाज नहीं है, इसलिए बचाव ज़रूरी है: एलर्जन पहचानो, लेबल पढ़ो, क्रॉस-संपर्क रोको और आपातकालीन दवा साथ रखो।
- खाद्य नियंत्रण का परिचय – खाद्य नियंत्रण नियमों, जाँचों और रिकॉर्ड का वह तंत्र है जो समुद्र या खेत से थाली तक खाने को सुरक्षित, ईमानदार और अच्छी गुणवत्ता का रखता है। सरकारें क़ानून बनाती और निरीक्षण करती हैं, कंपनियाँ अपनी जाँच चलाती हैं, और कोडेक्स जैसे साझा मानक देशों को सहमत होने में मदद करते हैं। नियम धीरे-धीरे बने: बाज़ार के स्थानीय नियम, 1800 के दशक में मिलावट पकड़े जाने के बाद पहले खाद्य क़ानून, 1960 के दशक से विश्व मानक, और आज HACCP तथा खाने को उसके स्रोत तक खोज पाना। कोई एक जाँच पूरी नहीं होती, इसलिए बहुत-सी जाँचें साथ मिलकर सबसे अच्छा काम करती हैं।
- खाद्य निर्माण और प्रोजेक्ट लर्निंग – खाद्य निर्माण में प्रोजेक्ट लर्निंग का अर्थ है पूरा चक्र चलाकर असली खाद्य उत्पाद बनाते हुए सीखना: असली समस्या खोजें (जैसे टमाटर सड़ना), कच्चा माल और विधि की योजना बनाएँ, उत्पाद चरण-दर-चरण बनाएँ (धोना, पकाना, पैक करना), गुणवत्ता और सुरक्षा जाँचें (बीच में लगभग 75 °C या अधिक गर्मी, साफ़ हाथ, साफ़ औज़ार, सही लेबल), और जो सीखा साझा करें ताकि अगली बार सुधार हो। आप विज्ञान, सुरक्षा, टीमवर्क और रिकॉर्ड सीखते हैं, सिर्फ़ विधि नहीं।
- खाद्य निर्माण का अभ्यास: कच्चे माल से उत्पाद तक – खाद्य निर्माण में खेत के कच्चे माल को कुछ सरल चरणों की लाइन में सुरक्षित, स्वादिष्ट और टिकाऊ भोजन बनाया जाता है। अनाज साफ़ होकर पिसता और छनकर आटा बनता है। सोयाबीन भिगोकर, पीसकर, उबालकर और जमाकर टोफ़ू बनता है; आलू से चिप्स या स्टार्च बनता है। फल और सब्ज़ियाँ धोकर, काटकर पकाई या अचार में डाली जाती हैं। दूध को लगभग 72 °C पर पाश्चरीकृत करके मित्र जीवाणुओं से दही या चीज़ जमाया जाता है। मिसो, सोया सॉस, इडली और ब्रेड जैसे किण्वित भोजन में सूक्ष्मजीव नया स्वाद बनाते हैं। साफ़ हाथ, साफ़ औज़ार और सही तापमान हर उत्पाद को सुरक्षित रखते हैं।
- खाद्य निर्माण का परिचय और आज का समुद्री भोजन – खाद्य निर्माण खेतों और समुद्र से आए कच्चे भोजन को धोने, पकाने, पैक करने जैसे चरणों से सुरक्षित, स्वादिष्ट और देर तक टिकने वाले उत्पाद बनाता है। इससे बर्बादी घटती है, खाना ले जाना आसान होता है और रोज़गार मिलता है। भोजन शिक्षा सुरक्षित और संतुलित भोजन चुनना सिखाती है। आज खाई जाने वाली लगभग आधी मछली पाली हुई है और लगभग एक तिहाई मछली खराब या बेकार जाती है, इसलिए पूरी मछली का उपयोग और अच्छे उत्पाद ज़रूरी हैं।
- खाद्य परिरक्षण, प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन – भोजन तब खराब होता है जब उसमें सूक्ष्मजीव बढ़ते हैं और उसके अपने एंज़ाइम, हवा, रोशनी व कीट उसे नुकसान पहुँचाते हैं। परिरक्षण सूक्ष्मजीवों की ज़रूरत की चीज़ हटा देता है: पानी (सुखाना, नमक, चीनी), गर्माहट (फ्रिज, फ्रीज़र), हल्का pH (अम्ल, किण्वन) या स्वयं सूक्ष्मजीव (गर्मी, कैनिंग, पाश्चरीकरण, अनुमत परिरक्षक)। भोजन शीघ्र नाशवान, अर्ध-नाशवान या अनाशवान होते हैं, और कम, मध्यम या अधिक प्रसंस्कृत होते हैं। अच्छा भंडारण और प्रसंस्करण नुकसान घटाते हैं और मूल्य बढ़ाते हैं, जिससे किसान और खाद्य उद्योग ज़्यादा कमाते हैं।
- खाद्य योजक (फ़ूड एडिटिव): उद्देश्य, सीमा और लेबल – खाद्य योजक वह पदार्थ है जो खाने में जानबूझकर, थोड़ी मात्रा में, किसी काम के लिए मिलाया जाता है। काम ये हैं: खाने को सुरक्षित और ताज़ा रखना (परिरक्षक, प्रति-ऑक्सीकारक), रूप सुधारना (रंग), स्वाद सुधारना (मिठास, सुगंध), बनावट ठीक करना (इमल्सीकारक, गाढ़ा करने वाले) और पोषण जोड़ना (विटामिन)। हर योजक को सुरक्षा जाँच पास करनी होती है और उसे सिर्फ़ कानूनी सीमा तक डाला जा सकता है, जो स्वीकार्य दैनिक सेवन (ए.डी.आई.) पर टिकी होती है। लेबल पर योजक का वर्ग और नाम या संख्या लिखना ज़रूरी है ताकि ख़रीदार जान सके कि खाने में क्या है।
- खाद्य संदूषण और परजीवी – खाद्य संदूषण का मतलब है साफ़ होने वाले खाने में कुछ हानिकारक पहुँच जाना। हानिकारक पदार्थों में कीटनाशक के अवशेष, भारी धातुएँ (पारा, सीसा, कैडमियम) और एफ्लाटॉक्सिन जैसे फफूँद के विष आते हैं। भारी धातुएँ आहार शृंखला में जमा होती जाती हैं, इसलिए बड़ी मछली में सबसे ज़्यादा होती हैं। परजीवी वे जीव हैं जो दूसरे के शरीर में या ऊपर रहते हैं। कच्ची मछली, सूअर या गाय के मांस में कृमि और बिना धुली सब्ज़ियों पर कृमि के अंडे हमारी आँत तक पहुँच सकते हैं। रोकथाम: खेत के रसायन तय सीमा में डालें, कारख़ाने का कचरा पानी में न जाए, अनाज सुखाकर रखें, मांस-मछली अंदर तक पकाएँ, मछली जमाएँ, सब्ज़ियाँ धोएँ और छीलें, साफ़ पानी और शौचालय इस्तेमाल करें, हाथ धोएँ।
- खाद्य सुरक्षा और स्वच्छता – खाने में बहुत छोटे जीव (जीवाणु, विषाणु, फफूँद) हो सकते हैं जो हमें बीमार करते हैं। चार आदतें खाना सुरक्षित रखती हैं: साफ़ रखो (हाथ, बर्तन, जगह), अलग रखो (कच्चा और खाने को तैयार), अच्छी तरह पकाओ (बीच में कम से कम 75 °C) और ठंडा रखो (5 °C या कम)। 5–60 °C के ख़तरे के क्षेत्र में जीवाणु सबसे तेज़ बढ़ते हैं, हर 20 मिनट में दोगुने तक। खाद्य उद्योग HACCP योजना और सफ़ाई के नियम अपनाते हैं।
- खाद्य सुरक्षा प्रबंधन – खाद्य कारखाना साफ़ आदतों और योजना से नुकसान रोकता है। वह कच्चे और साफ़ क्षेत्र अलग रखता है, हाथ धोता है, खतरे खोजता है, पकाने जैसे क्रांतिक बिंदु पर 75 °C जैसी सीमा से उन्हें रोकता है (HACCP), और खाद्य योजक केवल थोड़ी, कानूनी मात्रा में डालकर लेबल पर लिखता है।
- खाद्य सुरक्षा, पैकेजिंग और गुणवत्ता लेबल – खाद्य सुरक्षा का मतलब है कि खाने में कोई ऐसा ख़तरा न हो जो हमें नुकसान पहुँचाए। ख़तरे (हैज़र्ड) जैविक (कीटाणु), रासायनिक और भौतिक (कंकड़, काँच) होते हैं। इन्हें स्वच्छता, ठंड या ताप, परिरक्षण और सुरक्षित पैकिंग से रोकते हैं। पैक खाने को बचाता है और लेबल बताता है कि अंदर क्या है: नाम, सामग्री (भारी पहले), एलर्जी, मात्रा, पोषण, रखने का तरीका और तारीख़, यानी यूज़-बाय (सुरक्षा) या बेस्ट-बिफ़ोर (गुणवत्ता)।
- खाद्य सूक्ष्मजीवों के प्रकार – खाद्य सूक्ष्मजीवों के तीन मुख्य समूह हैं: फफूँदी (धागे), ख़मीर (गोल, कली वाली कोशिकाएँ) और जीवाणु (छड़, गोल, सर्पिल)। वे पोषक लेते हैं, दो में बँटकर बढ़ते हैं, एंज़ाइम बनाकर भोजन तोड़ते हैं और उपापचय से शर्करा को अल्कोहल, कार्बन डाइऑक्साइड या लैक्टिक अम्ल जैसे पदार्थों में बदलते हैं। जीन तय करते हैं कि सूक्ष्मजीव क्या कर सकता है और उत्परिवर्तन से बदल सकते हैं।
- खाद्य सूक्ष्मजैविकी प्रयोग – सूक्ष्मजैविकी प्रयोगों में साफ़, जीवाणुरहित (एसेप्टिक) तकनीक चाहिए ताकि सिर्फ़ वही सूक्ष्मजीव उगे जो तुम चाहते हो। फफूँदी आलू डेक्सट्रोज़ अगार पर, ख़मीर शर्करा अगार पर, जीवाणु न्यूट्रिएंट अगार पर और मशरूम पाश्चुरीकृत भूसे पर उगते हैं। अलग-अलग कॉलोनी और शुद्ध कल्चर पाने के लिए फैलाने, डाइल्यूशन या धारियाँ खींचने का तरीका अपनाते हैं।
- खाने और उपभोग के रुझान: आहार और सेहत – दुनिया में खिलाने के लिए लोग बढ़ रहे हैं और खाने का तरीका बदल रहा है: ज़्यादा पैकेट और तैयार खाना, ज़्यादा बाहर खाना और घर मँगवाना, और ज़्यादा चीनी, नमक और तेल। संतुलित आहार शरीर को सब कुछ देता है, पर चीनी, नमक और तला-भुना कम रखता है। रुझान जानकर हम सही चुनाव कर सकते हैं और खाद्य व्यवसाय योजना बना सकते हैं।
- खाने में सूक्ष्मजीव: प्रयोग और सूक्ष्मजीवी जाँच – कुछ सूक्ष्मजीव खाना बनाते हैं (दही, ब्रेड, इडली का घोल) और कुछ खाना बिगाड़ते हैं। प्रयोग में हम अच्छे सूक्ष्मजीवों का उपयोग करते हैं और जाँच में हानिकारक सूक्ष्मजीव गिनते हैं। गिनने के लिए नमूने को पतला करते हैं, प्लेट पर फैलाते हैं, हर सूक्ष्मजीव एक कॉलोनी बन जाता है। कॉलोनी की संख्या को तनुकरण से गुणा करने पर प्रति mL या ग्राम CFU मिलता है।
- खेती और रोज़मर्रा का जीवन – खेत हमें भोजन देते हैं और खेत धूप, बारिश और मिट्टी पर निर्भर हैं। लापरवाह खेती से मिट्टी नदी में बह जाती है और प्रकृति को नुकसान होता है; सावधान खेती प्रकृति को बचाती है। खेती हमारे त्योहारों और खान-पान को भी बनाती है। आज किसान कम और बुज़ुर्ग होते जा रहे हैं, जलवायु बदल रही है और ड्रोन जैसे नए औज़ार आ रहे हैं।
- खेती का अभ्यास: सब्ज़ी उगाना और छोटे पशु पालना – सब्ज़ी उगाने के लिए मिट्टी ढीली करो, बीज अपनी चौड़ाई से लगभग दोगुनी गहराई पर बोओ, ज़रूरत भर पानी और धूप दो, खरपतवार निकालो और समय पर तोड़ो। मुर्गी जैसे छोटे पशुओं के लिए साफ़ दाना, ताज़ा पानी, सूखा सुरक्षित आश्रय, नियमित सफ़ाई और स्वास्थ्य जाँच ज़रूरी है।
- खेती के वातावरण का निदान और प्रयोग – अच्छा किसान डॉक्टर की तरह काम करता है: खेत का सर्वेक्षण और निरीक्षण, पत्तों और मिट्टी के सुरागों से समस्या का निदान, फिर निष्पक्ष प्रयोग से अनुमान की जाँच, जिसमें एक बार में सिर्फ़ एक चीज़ बदली जाती है। मापो, लिखो, नियंत्रण से तुलना करो और दोहराकर तभी फ़ैसला लो।
- खेल उपकरण: प्रॉप्स, देखभाल और उपयोग – खेल प्रॉप्स खेल और फ़िटनेस में काम आने वाले छोटे औज़ार हैं: कोन, हर्डल, रस्सी, मेडिसिन बॉल, डम्बल और मैट। इन्हें अच्छी तरह इस्तेमाल करने के लिए सही आकार और वज़न चुनिए, इस्तेमाल से पहले खराबी जाँचिए, साफ़ सुरक्षित जगह बनाइए और बाद में पोंछकर, सुखाकर सलीके से रखिए। अच्छी देखभाल चोटें रोकती है और सामान लंबा चलता है।
- खेल क्षेत्र स्वच्छता: खेल सुविधाओं को साफ़ और सुरक्षित रखना – खेल क्षेत्र वह कोई भी जगह है जहाँ लोग खेलते या अभ्यास करते हैं: खेल का मैदान, कोर्ट, जिम या स्विमिंग पूल। वहाँ स्वच्छता का मतलब है जगह को इतना साफ़ रखना कि कीटाणु न फैलें, और सुरक्षा का मतलब है चोट पहुँचाने वाली चीज़ें हटाना। मुख्य काम हैं: कचरा ढके कूड़ेदान में डालकर रोज़ खाली करना; रुका पानी बहाना ताकि मच्छर न पनपें; ज़मीन पर काँच, पत्थर, गड्ढे और ढीले खंभे जाँचना; मैट, गेंद और हैंडल साफ़ और कीटाणुरहित करना; और साफ़ पीने का पानी, साबुन वाले शौचालय, प्राथमिक उपचार किट, छाया और रोशनी देना। खिलाड़ी भी मदद करें: हाथ धोएँ, अपनी बोतल और तौलिया रखें, घाव ढकें।
- खेल चोटें: कैसे लगती हैं, कैसे बचें, कैसे ठीक करें – खेल या व्यायाम से शरीर को हुआ नुकसान खेल चोट है। तीव्र (acute) चोट अचानक लगती है (टखना मुड़ना); दीर्घकालिक या अति-उपयोग चोट धीरे-धीरे बनती है (शिन स्प्लिंट)। कोमल ऊतक चोट मांसपेशी (खिंचाव), स्नायुबंधन (मोच) और त्वचा की होती है; कठोर ऊतक चोट हड्डी (अस्थिभंग) और जोड़ (विस्थापन) की। जोखिम अंदर से (फ़िटनेस, पुरानी चोट) और बाहर से (मौसम, उपकरण) आता है। वार्म-अप, सही तकनीक, सही सामान, नियम और समझदारी से बढ़ता अभ्यास ज़्यादातर चोटें रोकते हैं। मोच-खिंचाव पर RICE, फिर धीरे-धीरे पुनर्वास।
- खेल पोषण: ऊर्जा, आहार और जल-संतुलन – खिलाड़ी को सही समय पर सही खाना और पानी चाहिए। वज़न स्थिर रखने के लिए ऊर्जा अंदर (खाना) और ऊर्जा बाहर (कसरत + शरीर का काम) बराबर होनी चाहिए। कार्बोहाइड्रेट मुख्य ईंधन है और ग्लाइकोजन बनकर जमा होता है; प्रोटीन मांसपेशी की मरम्मत करता है; वसा लंबी धीमी कसरत का ईंधन है; विटामिन, खनिज और रेशे शरीर चलाते हैं। पसीने से शरीर के वज़न का 2% पानी जाते ही प्रदर्शन गिरता है। अच्छे आहार के साथ ज़्यादातर सप्लीमेंट ज़रूरी नहीं, और प्रतिबंधित दवाएँ (डोपिंग) ख़तरनाक और नियम के ख़िलाफ़ हैं।
- खेल प्रशिक्षण: सिद्धांत और विधियाँ – खेल प्रशिक्षण योजना बनाकर किया गया व्यायाम है, जो शरीर को खेल के लिए फ़िट बनाता है। हर सत्र में वार्म-अप (धड़कन, शरीर का तापमान और लचीलापन धीरे-धीरे बढ़ाना), मुख्य अभ्यास और कूल-डाउन (धड़कन धीरे कम करना, लैक्टिक अम्ल जैसे अपशिष्ट हटाना) होते हैं। अच्छा प्रशिक्षण सिद्धांतों पर चलता है: विशिष्टता (अपने खेल के लिए अभ्यास), प्रगति और अधिभार (धीरे-धीरे ज़्यादा, ताकि शरीर ढल जाए), उलटाव (अभ्यास छोड़ा तो फ़िटनेस घटती है), ऊब से बचना (अभ्यास बदलते रहो), साथ में आराम। FITT मात्रा तय करता है: कितनी बार, कितना तेज़, कितनी देर, कौन-सा अभ्यास। तीव्रता हृदय गति से मापी जाती है: अधिकतम ≈ 220 − उम्र; 60–80% एरोबिक, 80–90% एनारोबिक। मुख्य विधियाँ: लगातार, अंतराल, फ़ार्टलेक, सर्किट, वज़न, प्लायोमेट्रिक और लचीलापन। साल को तैयारी, प्रतियोगिता और विश्राम चरणों में बाँटा जाता है (अवधिकरण)।
- खेल रणनीति: जीतने में मदद करने वाली योजनाएँ – रणनीति (टैक्टिक) अपनी ताक़त और विरोधी की कमज़ोरी का उपयोग करने की योजना है। यह SMART लक्ष्यों से शुरू होती है। रिकॉर्ड खेलों में गति बाँटना, तकनीक खेलों में कठिनाई और जोखिम का संतुलन, मुकाबला खेलों में दूरी और समय, और गेंद खेलों में जगह बनाना और बंद करना मुख्य है। अच्छे खिलाड़ी हालात पढ़ते हैं, चुनते हैं और योजना बदलते हैं।
- खेल विज्ञान और तकनीक – खेल विज्ञान माप, आँकड़ों और नए उपकरणों से खिलाड़ी को बेहतर बनाता है और खेल को निष्पक्ष रखता है। हम प्रदर्शन देखते हैं, मापते हैं (समय, चाल, हृदय गति), वीडियो और डेटा का विश्लेषण करते हैं, योजना बनाते हैं, और जाँचते हैं कि नई तकनीक निष्पक्ष है या नहीं। इससे कई नौकरियाँ बनती हैं: कोच, एनालिस्ट, फिजियोथेरेपिस्ट, खेल वैज्ञानिक।
- खेल विश्लेषण (Sport Game Analysis) – खेल विश्लेषण का मतलब है मैच के तथ्य इकट्ठा करना, उन्हें साफ़ दिखाना और उनसे बेहतर खेल की योजना बनाना। तरीकों में हाथ की टैली शीट, वीडियो, GPS ट्रैकिंग, हीट मैप, पास नेटवर्क और शॉट-मौका मॉडल आते हैं। रणनीति उसके बाद की योजना है: फ़ॉर्मेशन चुनना, मज़बूत जगहों का इस्तेमाल करना, कमज़ोर जगहों को बचाना और अगले मैच में जाँचना।
- खेल सीखने के असरदार तरीके – खेल सीखने के तीन आधार हैं: फ़ीडबैक और आराम के साथ कौशल का अभ्यास, रणनीति की समझ (खेल में चतुर निर्णय), और सुरक्षित खेल: वार्म-अप, सही सामान और अपने शरीर के हिसाब से मेहनत। नियमित खेल हृदय, माँसपेशियों और हड्डियों को मज़बूत करता है और मन को भी हल्का और एकाग्र बनाता है।
- खेलों के प्रकार: खेलों को कैसे बाँटते हैं – खेलों को इस आधार पर बाँटते हैं कि जीत कैसे होती है। रिकॉर्ड खेल नापे जाते हैं (समय, दूरी, वज़न)। तकनीक खेलों में जज अंक देते हैं। मुकाबला खेल एक बनाम एक होते हैं। गेंद वाले खेल आक्रमण, नेट/दीवार या मारना-फ़ील्डिंग के होते हैं। बाहरी (आउटडोर) और रणनीति खेल दो और समूह हैं। हर परिवार का अपना इतिहास, नियम और संस्कृति है।
- गतिशील संतुलन: प्रतिपुष्टि, टिपिंग पॉइंट और लचीलापन – कोई तंत्र गतिशील संतुलन में तब है जब वह लगातार बदलता है, पर उसकी औसत अवस्था स्थिर रहती है, क्योंकि अंदर आने वाला और बाहर जाने वाला बराबर है। ऋणात्मक प्रतिपुष्टि (negative feedback) बदलाव के बाद तंत्र को वापस सामान्य की ओर धकेलती है, जैसे शिकारी-शिकार की संख्या। धनात्मक प्रतिपुष्टि (positive feedback) बदलाव को और बढ़ाती है, जैसे बर्फ़ पिघलने से गहरी सतह ज़्यादा गर्मी सोखती है। अगर कोई झटका तंत्र को टिपिंग पॉइंट के पार धकेल दे, तो धनात्मक प्रतिपुष्टि हावी हो जाती है और तंत्र एक नई अवस्था में पलट जाता है, जिसे लौटाना कठिन है। ज़्यादा प्रजातियों वाले विविध तंत्र आम तौर पर ज़्यादा लचीले होते हैं।
- गमन एवं संचलन – संचलन यानी शरीर के किसी भाग की स्थिति बदलना; गमन यानी पूरे शरीर का एक जगह से दूसरी जगह जाना। कोशिकाएँ तीन तरह चलती हैं: अमीबीय, पक्ष्माभी और कशाभिकीय। मनुष्य पेशीय गति करता है। पेशियाँ कंकाली, अंतरंग या हृद होती हैं। कंकाली पेशी तंतुओं से बनी है; हर तंतु में पेशी तंतुक हैं जो एक्टिन-मायोसिन वाले सार्कोमियरों की श्रृंखला हैं। तंत्रिका संकेत से Ca2+ छूटता है, मायोसिन सिर ATP से एक्टिन खींचते हैं और सार्कोमियर छोटा होता है (सर्पी तंतु सिद्धांत)। कंकाल में 206 हड्डियाँ हैं। संधियाँ रेशेदार, उपास्थिल या साइनोवियल (कंदुक-खल्लिका, कब्ज़ा, धुराग्र, विसर्पी, सैडल) होती हैं। रोग: मायस्थेनिया ग्रेविस, अपतानिका, पेशीय दुष्पोषण, संधिशोथ, अस्थि सुषिरता, गाउट।
- गुणसूत्र, जीन, एलील और बहुजीनी वंशागति – हर कोशिका के केंद्रक में DNA से बने गुणसूत्र होते हैं। किसी जीव का सारा DNA उसका जीनोम है। जीन DNA का वह टुकड़ा है जो गुणसूत्र पर तय जगह पर होता है; उसके अलग रूप एलील हैं। गुणसूत्र जोड़ों में होते हैं, एक माता से और एक पिता से। अर्धसूत्री विभाजन में हर जोड़ी का एक गुणसूत्र हर युग्मक में जाता है और निषेचन में जोड़ियाँ लौट आती हैं। लंबाई जैसे गुण कई जीनों पर निर्भर (बहुजीनी) होते हैं, इसलिए उनमें सहज बदलाव दिखता है। सब जीव एक ही चार-अक्षरी DNA कोड इस्तेमाल करते हैं।
- गुणसूत्र: जहाँ हमारे जीन रहते हैं – गुणसूत्र (क्रोमोसोम) केंद्रक के अंदर डीएनए का धागे जैसा पैकेट है। जीन उसी डीएनए के छोटे टुकड़े हैं जो एक के बाद एक कतार में लगे होते हैं। इंसान की हर शरीर-कोशिका में 46 गुणसूत्र, यानी 23 जोड़े होते हैं: हर जोड़े में एक माँ से और एक पिता से। अंडाणु और शुक्राणु में सिर्फ़ 23-23 होते हैं, इसलिए बच्चे में फिर 46 हो जाते हैं। सटन ने देखा कि गुणसूत्र मेंडल के कारकों जैसा व्यवहार करते हैं और मॉर्गन ने दिखाया कि जीन उन पर कतार में होते हैं।
- गृह नर्सिंग की विशेषताएँ – गृह नर्सिंग व्यक्ति के अपने घर में दी जाने वाली देखभाल है, ताकि वह जितना हो सके घर में रह सके। नर्स देखभाल करती है, परिवार को सिखाती है, डॉक्टर और सामुदायिक सेवाओं को जोड़ती है और ख़तरे पर नज़र रखती है। सेवा पाने वालों में वृद्ध, लंबी बीमारी या दिव्यांगता वाले लोग, बीमार बच्चे और जीवन के अंतिम समय के लोग आते हैं। सम्मान, निजता और सहमति मुख्य नैतिकता हैं।
- गोताखोरी का शरीर-विज्ञान – पानी का दाब शरीर के हवा वाले स्थानों पर पड़ता है: कान, साइनस, मास्क और फेफड़े। गोताखोर को कान इक्वलाइज़ करने हैं और ऊपर आते समय कभी साँस नहीं रोकनी। गहराई पर खून में ज़्यादा नाइट्रोजन घुलती है, इसलिए धीरे ऊपर आना है वरना बुलबुले बनते हैं (डीकंप्रेशन सिकनेस)। अन्य खतरे: नाइट्रोजन नार्कोसिस, ठंड और थकान। प्राथमिक उपचार: पानी से निकालें, साँस जाँचें, ऑक्सीजन दें, लिटाकर गर्म रखें और मदद बुलाएँ।
- गोल वाले खेल (इन्वेज़न गेम्स) – गोल वाले खेलों में दो टीमें गेंद को विरोधी के गोल या बास्केट में पहुँचाने की कोशिश करती हैं और अपना गोल बचाती हैं। फुटबॉल, हॉकी, बास्केटबॉल, हैंडबॉल और रग्बी सब ऐसे ही हैं। जीतने के लिए तीन बातें चाहिए: अच्छा गेंद संभालना (पास, ड्रिबल, शॉट), बिना गेंद के खाली जगह में समझदारी से दौड़ना और आक्रमण-रक्षा की टीम योजना।
- घर पर देखभाल को सहारा देने वाली व्यवस्थाएँ (Systems Supporting Home Care) – आज बहुत लोग घर पर ही ठीक होते हैं या बुज़ुर्ग होते हैं। चार व्यवस्थाएँ इसे संभव बनाती हैं: समुदाय आधारित समग्र देखभाल (मोहल्ले की टीम), गृह-भ्रमण नर्सिंग (नर्स घर आती है), स्वास्थ्य बीमा (इलाज का खर्च) और दीर्घकालिक देखभाल बीमा (रोज़ की देखभाल की मदद का खर्च)।
- घर पर मरीज़ और परिवार को सहारा (Supporting Home-Care Patients and Families) – घर की देखभाल में नर्स मरीज़, परिवार और घर तीनों की मदद करती है। वह रोज़ की ज़रूरतों (खाना, सफ़ाई, चलना, नींद, शौच) में सहारा देती है, घर पर सुरक्षित इलाज (दवा, ऑक्सीजन, इंजेक्शन, घाव) सिखाती है, हर स्थिति के हिसाब से देखभाल बदलती है और परिवार के देखभालकर्ता का ध्यान रखती है।
- घर में स्वास्थ्य देखभाल और सुरक्षा – स्वस्थ घर के लिए दो कौशल चाहिए। पहला, सरल उपकरण (थर्मामीटर, बीपी मशीन, नब्ज़) चलाना और सामान्य सीमा जानना: शरीर का तापमान लगभग 36.1–37.2 °C, रक्तचाप लगभग 120/80 mmHg, नब्ज़ 60–100 प्रति मिनट। दूसरा, खतरे पहचानकर ठीक करना: गीला फ़र्श, गर्म बर्तन, खुले सॉकेट और बच्चे की पहुँच में दवा। प्राथमिक उपचार पेटी और आपातकालीन नंबर तैयार रखिए।
- चपटे कृमि, गोल कृमि और एनेलिड – चपटे, गोल और खंडित कृमि तीन अलग शरीर-योजनाएँ हैं। प्लेनेरिया चपटा है, शाखाओं वाली एक छिद्र की आँत है और गुहा नहीं। एस्केरिस गोल है, सीधी आँत और झूठी गुहा है। केंचुआ खंडित है, असली गुहा, बंद रक्त परिसंचरण और वृक्कक हैं।
- चयापचय रोग: डायबिटीज़ और रक्त शुगर – चयापचय रोग तब होते हैं जब शरीर ऊर्जा और पोषक तत्वों को ठीक से संभाल नहीं पाता। डायबिटीज़ (मधुमेह) में रक्त में ग्लूकोज़ बहुत ज़्यादा रहता है, या तो इंसुलिन कम बनता है (टाइप 1) या कोशिकाएँ इंसुलिन की बात नहीं मानतीं (टाइप 2)। खान-पान, कसरत और दवा से शुगर काबू में रहती है।
- चिकित्सा तकनीकें: डॉक्टर शरीर को कैसे मापते, जाँचते और अंदर से देखते हैं – डॉक्टर सबसे पहले चार जीवन-संकेत देखते हैं: तापमान, नाड़ी, श्वसन दर और रक्तचाप। हर एक की सामान्य सीमा होती है। रक्त जाँच और सूक्ष्मदर्शी से लाल कोशिकाएँ, सफ़ेद कोशिकाएँ और प्लेटलेट्स दिखते हैं। थर्मामीटर, स्टेथोस्कोप, BP मॉनिटर और पल्स ऑक्सीमीटर जल्दी डेटा देते हैं। X-ray, CT, अल्ट्रासाउंड और MRI शरीर के अंदर दिखाते हैं। हर तकनीक के फ़ायदे, लागत और जोखिम होते हैं।
- चिकित्सा रिकॉर्ड: क्यों, क्या और कैसे रखें – चिकित्सा रिकॉर्ड मरीज़ की देखभाल का लिखित या इलेक्ट्रॉनिक ब्योरा है। इससे टीम सुरक्षित और लगातार इलाज करती है, यह क़ानूनी सबूत है, बिल और बीमे में काम आता है, और शोध व जन-स्वास्थ्य के लिए आँकड़े देता है। इसमें पहचान, इतिहास, जाँच और जीवन-चिह्न, टेस्ट, निदान, इलाज, प्रगति नोट, सहमति और छुट्टी का ब्योरा होता है। अच्छा रिकॉर्ड सही, पूरा, समय पर, साफ़, तारीख़-समय-हस्ताक्षर सहित और गोपनीय होता है। इसे अनोखे नंबर से रखते हैं, तय समय तक सुरक्षित रखकर फिर सुरक्षित ढंग से नष्ट करते हैं।
- चिकित्सीय देखभाल: सक्शन और ट्यूब से भोजन – कुछ लोगों को घर या देखभाल केंद्र में चिकित्सीय देखभाल चाहिए, जैसे सक्शन से बलगम निकालना या नली से भोजन देना। प्रशिक्षित देखभाल कर्मी इन्हें सिर्फ़ डॉक्टर के आदेश, नर्स के साथ और व्यक्ति की सहमति से, सीमित तरीके से कर सकते हैं (सक्शन सिर्फ़ मुँह या नाक में; भोजन सीधा बैठाकर धीमे), और चेतावनी के संकेत पर रुककर नर्स को बुलाना चाहिए।
- जंगल उगाने और उपयोग करने का व्यवहार – संचालित जंगल एक चक्र में चलता है: रोपण, देखभाल, छँटाई, कटाई, उपयोग, फिर रोपण। हर काम पेड़ की उम्र के हिसाब से होता है। लकड़ी का उपयोग घर और फर्नीचर के लिए इमारती लकड़ी, कागज़ के लिए लुगदी और ईंधन के रूप में होता है; सबसे अच्छा तरीका क्रमिक उपयोग है (पहले टिकाऊ चीज़ें, फिर पुनर्चक्रण, आख़िर में जलाना)। जंगल का उपयोग तब टिकाऊ है जब हर साल कटी लकड़ी उगी लकड़ी से ज़्यादा न हो।
- जंतु कोशिका संवर्धन: शरीर के बाहर जंतु कोशिकाएँ उगाना – जंतु कोशिका संवर्धन का मतलब है जंतु या मनुष्य की कोशिकाओं को शरीर के बाहर, एक साफ़ फ्लास्क में तरल भोजन (माध्यम) के साथ उगाना। कोशिकाओं को 37 °C पर और 5% कार्बन डाइऑक्साइड में गरम रखा जाता है। वे फ्लास्क से चिपकती हैं, विभाजित होती हैं और तल को भर देती हैं। फिर हम उन्हें नई फ्लास्कों में बाँटते हैं। संवर्धित कोशिकाओं से टीके, प्रतिरक्षी (एंटीबॉडी) और दवाएँ बनती हैं, दवाओं की जाँच होती है और जले हुए लोगों के लिए त्वचा उगाई जाती है। स्टेम कोशिकाएँ, जो कई तरह की कोशिकाएँ बन सकती हैं, भी इसी तरह उगाई जाती हैं।
- जंतु व्यवहार: जानवर जो करते हैं, वह क्यों करते हैं – व्यवहार वह सब है जो जानवर किसी उद्दीपन के जवाब में करता है: बाहर का उद्दीपन (शिकारी, रोशनी, आवाज़) या अंदर का (भूख, हॉर्मोन)। कुछ व्यवहार जन्मजात होता है (सहज प्रवृत्ति); कुछ सीखा जाता है (अभ्यस्तता, अनुबंधन, छापन, अंतर्दृष्टि)। व्यवहार का एक काम होता है: ज़िंदा रहने और प्रजनन में मदद, अक्सर समूह में रहकर। कई जानवर संवेदनशील (सचेतन) होते हैं: वे दर्द, डर और ख़ुशी महसूस करते हैं।
- जंतुओं के लक्षण (जंतु विज्ञान) – जंतु विज्ञान (Zoology) जंतुओं का अध्ययन है। जंतु अपना भोजन ख़ुद नहीं बना सकते, इसलिए दूसरे जीवों को खाते हैं। ज़्यादातर चल सकते हैं और उनके शरीर में बहुत सी कोशिकाएँ होती हैं। शरीर की आकृति में सममिति नहीं, अरीय सममिति (तारामछली) या द्विपार्श्व सममिति (मछली) हो सकती है।
- जंतुओं के शरीर के आवरण – त्वचा शरीर को ढकती है और कीटाणुओं, पानी की कमी, चोट और गर्मी-सर्दी से बचाती है। त्वचा से कुछ अतिरिक्त अंग बनते हैं, जिन्हें व्युत्पन्न कहते हैं: शल्क, पंख, बाल, नाखून, पंजे और सींग। हर जंतु का आवरण उसके रहने की जगह के अनुसार अलग होता है।
- जंतुओं में जनन – जंतु दो तरह से बच्चे पैदा करते हैं। अलैंगिक जनन में एक ही जनक अपनी प्रति बनाता है (हाइड्रा में मुकुलन, टूटकर बढ़ना, या बिना निषेचन वाले अंडे)। लैंगिक जनन में नर युग्मक (शुक्राणु) मादा युग्मक (अंडाणु) से मिलकर युग्मनज बनाता है; इससे जीन मिलते हैं और विविधता आती है। निषेचन शरीर के बाहर पानी में (मेंढक, मछली) या शरीर के अंदर (कीट, सरीसृप, पक्षी, स्तनधारी) होता है। ज़मीन के जंतु खोल वाले अंडे देते हैं या बच्चे को अंदर रखते हैं। कई जंतुओं में कायांतरण होता है: पूर्ण (अंडा, लार्वा, प्यूपा, वयस्क) या अपूर्ण (अंडा, निम्फ, वयस्क)।
- जंतुओं में देह-गुहा, परिवहन और श्वसन – छोटे जंतु त्वचा से ही खाते-साँस लेते हैं। शरीर मोटा होने पर देह-गुहा, दो छिद्रों वाली आँत, रक्त और विशेष श्वसन अंग चाहिए। जैसे-जैसे जंतु बड़े हुए और ज़मीन पर आए, गिल, श्वासनली और फेफड़े बने।
- जंतुओं में पोषण – जंतु अपना भोजन खुद नहीं बना सकते, इसलिए खाते हैं। एक कोशिका वाले जीव और स्पंज भोजन कोशिका के अंदर पचाते हैं (अंतःकोशिकीय पाचन)। ज़्यादातर जंतु भोजन आहारनाल में, शरीर की कोशिकाओं के बाहर पचाते हैं (बाह्यकोशिकीय पाचन)। आहारनाल भोजन के हिसाब से बनी होती है: मांस के लिए छोटी, पौधों के लिए लंबी।
- जंतुओं में श्वसन: त्वचा, गिल, श्वासनली, फेफड़े – हर जंतु को ऑक्सीजन चाहिए और कार्बन डाइऑक्साइड बाहर निकालनी होती है। केंचुआ नम त्वचा से, मछली गिल से, कीट श्वासनली (ट्रैकिया) नामक वायु-नलियों से और स्थलीय कशेरुकी फेफड़ों से साँस लेते हैं। इन सब अंगों की सतह पतली और नम होती है।
- जंतुओं में हॉर्मोन: अंतःस्रावी ग्रंथियाँ और पुनर्भरण – अंतःस्रावी ग्रंथियाँ हॉर्मोन नाम के रासायनिक संदेशवाहक सीधे रक्त में छोड़ती हैं। रक्त उन्हें पूरे शरीर में ले जाता है, पर वे केवल लक्ष्य कोशिकाओं पर असर करते हैं। हॉर्मोन वृद्धि, उपापचय, आपातकालीन प्रतिक्रिया, रक्त शर्करा और यौवनारंभ नियंत्रित करते हैं, और उनकी मात्रा पुनर्भरण (फ़ीडबैक) से ठीक रहती है।
- जड़ और मिट्टी: जड़ के क्षेत्र, मूल दाब, खनिज और उर्वरक – जड़ के पाँच क्षेत्र हैं: जड़-टोपी, विभाजन, दीर्घन, मूल-रोम और संवहन क्षेत्र। मूल-रोम मिट्टी से पानी और खनिज सोखते हैं। मूल दाब पानी को तने में ऊपर धकेलता है। पौधों को वृहत् तत्व (N, P, K आदि) ज़्यादा मात्रा में और सूक्ष्म तत्व (Fe, Zn, Mn आदि) बहुत कम मात्रा में चाहिए। दोकुचाएव ने दिखाया कि मिट्टी परतों वाला जीवंत प्राकृतिक पिंड है। उर्वरक फसलों द्वारा निकाले गए खनिज लौटाते हैं, पर ज़्यादा डालने से जड़ें जल जाती हैं।
- जन पोषण और स्वास्थ्य: भूख और छिपी भूख से मिलकर लड़ाई – जन पोषण एक व्यक्ति नहीं, पूरे समुदाय के भोजन और स्वास्थ्य को देखता है। भारत सहित कई देशों की बड़ी समस्याएँ हैं: प्रोटीन-ऊर्जा कुपोषण (PEM: बौनापन, दुबलापन, कम वज़न), आयरन की कमी से एनीमिया, विटामिन A की कमी और आयोडीन की कमी। आखिरी तीन को छिपी भूख कहते हैं, क्योंकि पेट भरा हो फिर भी सूक्ष्म पोषक तत्व कम हो सकते हैं। इनसे लड़ने के उपाय: विविध आहार, खाद्य संवर्धन (आयोडीन युक्त नमक, फ़ोर्टिफ़ाइड आटा, चावल, तेल), पूरक (आयरन-फ़ोलिक एसिड गोली, विटामिन A खुराक), पोषण शिक्षा, स्तनपान, साफ़ पानी और स्वच्छता, कृमि-नाशन और टीकाकरण। सरकारें छोटे बच्चों और माताओं को पूरक आहार, स्कूल भोजन, अनाज वितरण और एनीमिया नियंत्रण जैसे कार्यक्रम चलाती हैं। स्वास्थ्य सेवा तीन स्तरों पर है: प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक।
- जन स्वास्थ्य – जन स्वास्थ्य पूरे समुदाय को स्वस्थ रखने का काम है: रोग रोकना, स्वस्थ जीवन को बढ़ावा देना और सबको इलाज पहुँचाना। संक्रामक रोग हवा, पानी, भोजन, स्पर्श और कीड़ों से फैलते हैं; स्वच्छता, साफ़ पानी, शौचालय और टीकाकरण यह कड़ी तोड़ते हैं। जब काफ़ी लोग प्रतिरक्षित हों, सामूहिक प्रतिरक्षा बाकी लोगों को बचाती है। स्वास्थ्य तंत्र स्तरों (प्राथमिक, द्वितीयक, तृतीयक) में काम करता है और निगरानी के आँकड़ों से महामारी को जल्दी पहचानता है।
- जनन स्वास्थ्य – जनन स्वास्थ्य का मतलब है जनन से जुड़ी हर बात में शरीर, मन, व्यवहार और समाज, चारों से ठीक होना। इसके लिए सही जानकारी, सुरक्षित और साफ़-सुथरी आदतें, यौन संचारित रोगों (STI) से बचाव, और सुरक्षित गर्भनिरोध, कानूनी गर्भ समापन (MTP) व बांझपन के इलाज की सुविधा चाहिए। गर्भनिरोधक उपाय अलग जगह काम करते हैं: प्राकृतिक उपाय उपजाऊ दिनों से बचते हैं, अवरोधक शुक्राणु रोकते हैं, IUD शुक्राणु और अंतर्रोपण रोकते हैं, गोलियाँ अंडोत्सर्ग रोकती हैं और शल्य क्रिया नलिका काटती है। IVF-ET, ZIFT, IUT, GIFT, ICSI और IUI जैसी सहायक जनन तकनीकें संतान न होने वाले दंपतियों की मदद करती हैं।
- जनसंख्या पारिस्थितिकी: r और K जातियाँ, उत्तरजीविता और मानव जनसंख्या – हर जाति की जीवन-योजना अलग होती है। r-चयनित जातियाँ बहुत सारे छोटे बच्चे पैदा करती हैं और देखभाल नहीं करतीं; K-चयनित जातियाँ कम पर बड़े बच्चे पैदा करती हैं और उनकी देखभाल करती हैं। उत्तरजीविता वक्र बताते हैं कि मौत किस उम्र में ज़्यादा होती है (टाइप I देर से, टाइप II बराबर, टाइप III जल्दी)। सामान्यवादी बहुत से संसाधन इस्तेमाल करते हैं, विशेषज्ञ एक ही पर निर्भर रहते हैं। मनुष्यों में आयु पिरामिड, कुल प्रजनन दर (प्रतिस्थापन लगभग 2.1) और जनसांख्यिकीय संक्रमण के चार चरण बताते हैं कि जनसंख्या कैसे बढ़ती, थमती या घटती है।
- जल: छोटा-सा अणु जो जीवन संभव बनाता है – जल का अणु (H₂O) मुड़ा हुआ और ध्रुवीय है: ऑक्सीजन थोड़ा ऋण आवेशित और हाइड्रोजन थोड़े धन आवेशित। इसी कारण जल के अणु हाइड्रोजन बंध से आपस में चिपकते हैं। इन्हीं बंधों से जल बहुत-से पदार्थ घोलता है, बहुत ऊष्मा जमा करता है, भाप बनने में बहुत ऊर्जा लेता है, आपस में (संसंजन) और सतहों से (आसंजन) चिपकता है, और बर्फ़ तैरती है। जीव जल को अभिक्रियाओं, परिवहन और कोशिकाओं को कसा रखने में भी इस्तेमाल करते हैं। जल में घुले खनिज लवण Na⁺, K⁺, Ca²⁺, Fe²⁺ और फ़ॉस्फ़ेट जैसे आयन देते हैं।
- जलकृषि प्रबंधन और कानून – जलकृषि यानी मछली, शंख-सीप और शैवाल की खेती। फ़ार्म तभी लाभ कमाता है जब आमदनी खर्च से ज़्यादा हो, और मछलियों की संख्या, चारा तथा पानी की गुणवत्ता संतुलित हों। कानून और नियम (लाइसेंस, स्थान की अनुमति, पानी व कचरे की सीमा, बीमारी नियंत्रण, खाद्य सुरक्षा, संरक्षित प्रजातियाँ) फ़ार्म को इंसान और प्रकृति के लिए सुरक्षित रखते हैं।
- जलीय खाद्य उत्पादन: उत्पादकता, मत्स्यन और जल-कृषि – समुद्र वहाँ उपजाऊ होता है जहाँ धूप और पोषक तत्व साथ हों: उथले महाद्वीपीय मग्नतट, उत्प्रवाह (upwelling) क्षेत्र, ज्वारनदमुख और प्रवाल भित्तियाँ। खुले महासागर में पोषक तत्व कम हैं। हर पोषी स्तर पर लगभग 90% ऊर्जा खो जाती है, इसलिए निचले स्तर का भोजन (शैवाल, सीप, छोटी मछली) ज़्यादा कुशल है। मछली पकड़ने के तरीक़े bycatch और समुद्र-तल को नुक़सान में अलग-अलग हैं। अगर पकड़ स्टॉक की बढ़त से ज़्यादा हो, तो स्टॉक ढह जाता है (अति-मत्स्यन)। अधिकतम टिकाऊ उपज (MSY) वह सबसे बड़ी पकड़ है जो हर साल ली जा सके; यह लगभग आधे स्टॉक पर मिलती है। जल-कृषि आज आधी से ज़्यादा मछली देती है; यह जंगली मछलियों पर दबाव घटाती है, पर प्रदूषण, रोग, भागी मछलियाँ और आवास-हानि भी लाती है।
- जलीय प्रजनन और जैव प्रौद्योगिकी – प्रजनक सबसे अच्छी मछलियों (तेज़ बढ़ने वाली, रोग-प्रतिरोधी) को माता-पिता चुनते हैं, इसलिए हर पीढ़ी औसतन बेहतर होती है। जैव प्रौद्योगिकी के औज़ार: संकरण, गुणसूत्र-सेट बदलना (ट्रिप्लॉइड मछली प्रजनन नहीं करती और बड़ी बढ़ती है), लिंग नियंत्रण, शुक्राणु को जमाना (क्रायोप्रिज़र्वेशन), DNA मार्कर और जीन संपादन। चयन का प्रभाव R = h² × S, जहाँ h² आनुवंशिकता और S चयन-अंतर है।
- जहाज़ पर सुरक्षा और सफ़ाई – जहाज़ मदद से दूर होता है, इसलिए दल को हादसे रोकने, आग जल्दी बुझाने, प्राथमिक उपचार देने और जहाज़ साफ़ रखने की ज़रूरत है। आग के त्रिकोण (ईंधन, गरमी, हवा) का एक हिस्सा हटाइए, आग बुझ जाती है। साँस न लेने वाले को 30 बार छाती दबाएँ और 2 साँसें दें। सफ़ाई और कीटाणुनाशन से कीटाणु, चूहे और कीड़े रुकते हैं।
- जानवर, इंसान और संरक्षण – इंसान हज़ारों साल से जानवरों का जीवन बदल रहा है: हम शिकार करते हैं, मछली पकड़ते हैं, जंगली जानवरों को पालतू बनाकर नस्लें बनाते हैं, कीटों से लड़ते हैं और शहरों में जानवरों के साथ रहते हैं। जब हम प्रकृति की भरपाई से ज़्यादा ले लेते हैं, तो जातियाँ घटती हैं और विलुप्त हो सकती हैं। संरक्षण का मतलब है जानवरों का समझदारी से उपयोग और उनकी रक्षा: रेड बुक ख़तरे वाली जातियों की सूची है, राष्ट्रीय उद्यान ज़मीन बचाते हैं, और समुद्री संरक्षित क्षेत्र व मछली पकड़ने के नियम समुद्र बचाते हैं।
- जिम्नास्टिक: उपकरण, बुनियादी कौशल, संतुलन और सुरक्षा – जिम्नास्टिक शरीर को काबू में रखकर हिलाने का खेल है: रोल, संतुलन, कूद, झूलना और वॉल्ट, फ़र्श पर और उपकरणों पर। मुख्य प्रकार हैं आर्टिस्टिक, रिदमिक, ट्रैम्पोलिन और एक्रोबैटिक। दो वैज्ञानिक बातें ज़्यादातर कौशल समझाती हैं: गुरुत्व केंद्र आधार के ऊपर हो तो संतुलन बना रहता है, और शरीर सिकोड़ने (टक) पर आप तेज़ घूमते हैं। हर कौशल वार्म-अप के बाद, मैट पर और स्पॉटर के साथ धीरे-धीरे सीखा जाता है।
- जीन की संरचना: एक जीन के अंदर क्या है? – जीन DNA का वह हिस्सा है जिसमें एक काम का उत्पाद, आमतौर पर प्रोटीन (कभी-कभी RNA), बनाने की सूचना होती है। एक सामान्य जीन में प्रमोटर (जहाँ RNA पॉलिमरेज़ जुड़कर अनुलेखन शुरू करता है), कोडिंग भाग (संदेश) और टर्मिनेटर (जहाँ अनुलेखन रुकता है) होते हैं। टेम्पलेट रज्जुक पढ़ा जाता है; कोडिंग रज्जुक का क्रम mRNA जैसा होता है (T की जगह U)। प्रोकैरियोट में जीन लगातार होते हैं (इंट्रॉन नहीं) और जुड़े जीन अक्सर एक प्रमोटर वाले ऑपेरॉन में होते हैं, जिससे एक बहुसिस्ट्रॉनी mRNA बनती है। यूकैरियोट में जीन विभक्त होते हैं: कोडिंग एक्सॉन के बीच अकोडिंग इंट्रॉन। पूरा जीन पहले प्री-mRNA में बदलता है; फिर इंट्रॉन हटते हैं, एक्सॉन जुड़ते हैं (स्प्लाइसिंग), कैप और पॉली-A पूँछ लगती है। वैकल्पिक स्प्लाइसिंग से एक जीन कई प्रोटीन बना सकता है। जीनोम किसी जीव का पूरा DNA है; मनुष्य में सिर्फ़ 1–2% प्रोटीन के लिए कोड करता है।
- जीन नियमन: कोशिका जीन को चालू और बंद कैसे करती है – हर कोशिका में एक जैसा DNA है, पर वह कुछ ही जीन इस्तेमाल करती है। नियंत्रण ज़्यादातर अनुलेखन (transcription) की शुरुआत पर होता है। बैक्टीरिया में लैक ऑपेरॉन कई जीनों का एक समूह है जिसका एक प्रमोटर और एक ऑपरेटर है: लैक्टोज़ न हो तो रिप्रेसर उसे बंद रखता है; लैक्टोज़ रिप्रेसर को हटा देता है और जीन पढ़े जाते हैं (प्रेरणीय ऑपेरॉन)। यूकैरियोट में ट्रांसक्रिप्शन फ़ैक्टर, एन्हांसर और साइलेंसर हर जीन को नियंत्रित करते हैं, और एपिजेनेटिक निशान (DNA मिथाइलेशन, हिस्टोन पैकिंग) DNA का क्रम बदले बिना जीन बंद रख सकते हैं। अलग-अलग चालू/बंद पैटर्न से अलग कोशिकाएँ बनती हैं (विभेदन)।
- जीनोम का विकास: जीनोम जटिल कैसे बनते हैं – जीनोम सिर्फ़ छोटे उत्परिवर्तनों से नहीं बदलते। वे पूरे जीन भी पा सकते हैं। क्षैतिज जीन स्थानांतरण असंबंधित कोशिकाओं के बीच जीन ले जाता है, जैसे जीवाणुओं के बीच। विषाणु एक कोशिका से दूसरी में जीन ले जा सकते हैं और मेज़बान DNA में प्रतियाँ छोड़ सकते हैं। अंतःसहजीविता से माइटोकॉन्ड्रिया और क्लोरोप्लास्ट बने: निगले गए जीवाणु मेज़बान कोशिका में ही रुक गए और अपना कुछ DNA रखा। जीन और जीनोम द्विगुणन अतिरिक्त प्रतियाँ देते हैं जो बदलने और नया काम सीखने के लिए आज़ाद होती हैं। ये घटनाएँ जीन तेज़ी से जोड़ती हैं और नए कार्यों का बड़ा स्रोत हैं।
- जीव और समष्टियाँ: वृद्धि और पारस्परिक क्रिया – समष्टि (population) यानी एक ही जाति के वे सब जीव जो एक समय पर एक जगह रहते हैं। समष्टि के ऐसे गुण होते हैं जो अकेले जीव में नहीं होते: घनत्व, जन्म दर, मृत्यु दर, लिंग अनुपात और आयु संरचना। जन्म और आप्रवासन से N बढ़ता है, मृत्यु और उत्प्रवासन से घटता है। भोजन असीमित हो तो तेज़ वृद्धि (J-वक्र, dN/dt = rN); सीमित हो तो वृद्धि धीमी होकर वहन क्षमता K पर रुकती है (S-वक्र, dN/dt = rN(1 − N/K))। जातियाँ एक-दूसरे पर असर डालती हैं: सहोपकारिता (+/+), स्पर्धा (−/−), परभक्षण और परजीविता (+/−), सहभोजिता (+/0), असहभोजिता (−/0)।
- जीव जगत – धरती पर लाखों तरह के जीव हैं; इसी विविधता को जैव विविधता कहते हैं। इन्हें पढ़ने के लिए हम इन्हें समूहों में बाँटते हैं। वर्गिकी (टैक्सोनॉमी) में पहचान, नामकरण, वर्णन और वर्गीकरण आता है; सिस्टेमैटिक्स इसके साथ यह भी देखती है कि समूह आपस में कैसे जुड़े हैं। सारा जीवन तीन डोमेन में है: बैक्टीरिया, आर्किया और यूकेरिया। जीवों को जगत से जाति तक 7 मुख्य स्तरों में रखते हैं और हर जाति को दो शब्दों का लैटिन नाम मिलता है, जैसे Mangifera indica।
- जीव जगत का वर्गीकरण – व्हिटेकर (1969) ने जीवों को पाँच जगत में बाँटा: मोनेरा, प्रोटिस्टा, कवक, पादप और जंतु। आधार थे: कोशिका का प्रकार, कोशिका भित्ति, शरीर की बनावट, पोषण का तरीका, जनन और आपसी संबंध। मोनेरा प्रोकैरियोट हैं (बैक्टीरिया, आर्कीबैक्टीरिया, सायनोबैक्टीरिया, माइकोप्लाज़्मा)। प्रोटिस्टा एककोशिकी यूकैरियोट हैं, पाँच समूहों में। कवक काइटिन भित्ति वाले परपोषी हैं, चार वर्गों में। लाइकेन शैवाल और कवक की साझेदारी है। वायरस, विरोइड और प्रायन किसी जगत में नहीं।
- जीव जनन कैसे करते हैं? DNA प्रतिकृति और अलैंगिक जनन – जनन में DNA की प्रतिकृति (कॉपी) बनती है। कॉपी कभी पूरी तरह एक जैसी नहीं होती; यही छोटे बदलाव (विभिन्नताएँ) बदलते माहौल में प्रजाति को बचाते हैं। अलैंगिक जनन में एक ही जनक विखंडन, खंडन, पुनरुद्भवन, मुकुलन, कायिक प्रवर्धन या बीजाणु से नए जीव बनाता है।
- जीव विज्ञान की सोच के कौशल – जीव विज्ञानी पाँच तरह से सोचते हैं: प्रकृति को ध्यान से देखना, रूप को काम से जोड़ना, जीवों की एक-दूसरे पर निर्भरता (पारिस्थितिकी), पीढ़ियों में बदलाव (विकास), और जुड़े हुए हिस्सों का पूरा तंत्र देखना।
- जीवन के चरणों में महिला स्वास्थ्य की समस्याएँ – महिला के शरीर और स्वास्थ्य की ज़रूरतें किशोरावस्था से प्रौढ़ अवस्था, रजोनिवृत्ति और वृद्धावस्था तक बदलती रहती हैं। नर्स हर चरण में सिखाती, जाँच करती और सहारा देती है: किशोरावस्था में स्वच्छता और आयरन, वयस्कता में सुरक्षित गर्भ और जाँच, रजोनिवृत्ति में लक्षणों में राहत, और बुढ़ापे में मज़बूत हड्डियाँ और आत्मविश्वास।
- जीवन के लक्षण (सजीवों की विशेषताएँ) – सजीवों में कुछ साझा लक्षण होते हैं: वे कोशिकाओं से बने होते हैं, ऊर्जा का उपयोग करते हैं (उपापचय), आसपास के बदलाव पर प्रतिक्रिया करते हैं, अपने अंदर की हालत स्थिर रखते हैं (समस्थापन), बढ़ते हैं, प्रजनन करते हैं, और समूह के रूप में पीढ़ियों में अनुकूलित होते हैं। जिसमें ये सब हों, वही सजीव है। वायरस सीमा पर है, क्योंकि वह केवल किसी कोशिका के अंदर ही अपनी प्रतियाँ बनाता है।
- जीवन के हर पड़ाव में स्वास्थ्य – जैसे-जैसे हम बड़े होते हैं, सेहत की ज़रूरतें बदलती हैं। किशोर यौवनारंभ और तेज़ बढ़त से गुज़रते हैं, उन्हें नींद, आयरन और सहारा चाहिए। वयस्क परिवार की योजना बना सकते हैं और गर्भावस्था में देखभाल ज़रूरी है। बुज़ुर्गों में मांसपेशियों और हड्डियों की ताक़त धीरे-धीरे घटती है, पर कसरत, अच्छा भोजन और साथ उन्हें मज़बूत रखते हैं।
- जीवन भर की सेहत: आपकी सेहत किससे बनती है और वेलनेस कैसे बढ़ाएँ – आपकी सेहत कई निर्धारकों से बनती है: निजी (जीन, लचीलापन, आदतें, जानकारी), सामाजिक (परिवार, दोस्त, आय, शिक्षा, लिंग) और पर्यावरण (हवा, पानी, स्कूल या काम की जगह)। वेलनेस के छह आयाम हैं: शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक, सामाजिक, आध्यात्मिक और पर्यावरणीय। आदत बदलना पाँच चरणों में होता है: सोचा नहीं, सोच रहे, तैयारी, कदम उठाना और बनाए रखना। अपनी वेलनेस योजना में SMART लक्ष्य और जाँच के साधन काम आते हैं। स्वस्थ समुदाय साफ़ पानी, अस्पताल, पार्क, स्कूल और सहायता सेवाएँ देता है।
- जीवन: मानव शरीर की क्रियाएँ और उपयोगी सूक्ष्मजीव – जीवित चीज़ें भोजन और हवा लेती हैं, ऊर्जा छोड़ती हैं, बढ़ती हैं और प्रतिक्रिया करती हैं। मानव शरीर में फेफड़े ऑक्सीजन लाते हैं, हृदय रक्त पंप करता है और पेट भोजन तोड़ता है। व्यायाम में धड़कन और साँस तेज़ हो जाती है। सूक्ष्मजीव बहुत छोटे जीव हैं जो बार-बार दुगुने होते हैं; यीस्ट और दही के जीवाणु जैसे कई उपयोगी हैं।
- जीवनशैली रोग: रोज़ की आदतें सेहत कैसे बनाती या बिगाड़ती हैं – जीवनशैली रोग लंबे समय तक चलने वाली बीमारियाँ हैं जो हमारे जीने के तरीके से जुड़ी हैं: क्या खाते हैं, कितना चलते-फिरते हैं, कैसे सोते हैं, और तंबाकू या शराब लेते हैं या नहीं। मुख्य उदाहरण: दिल की बीमारी, लकवा (स्ट्रोक), हाई ब्लड प्रेशर, टाइप 2 मधुमेह, मोटापा और कई कैंसर। ये सालों में धीरे-धीरे बनते हैं, इसलिए कम उम्र से अच्छी आदतें और नियमित जाँच ज़्यादातर को रोक देती हैं। बीमारी के बाद इलाज और अच्छी आदतें ठीक होने में मदद करती हैं।
- जीवों का उपयोग और प्रोजेक्ट लर्निंग – प्रोजेक्ट लर्निंग यानी कई हफ्तों तक कोई असली काम करके सीखना। जब काम में जीव हों, जैसे पौधा उगाना या जानवर पालना, तो पाँच कदम चलते हैं: योजना, उगाना या पालना, देखना, लिखना और बताना। फिर चक्र बेहतर विचार के साथ दोबारा चलता है।
- जीवों की मदद से थेरेपी – जीवों से थेरेपी का मतलब है कि प्रशिक्षित सहायक पौधों या जानवरों के साथ गतिविधियाँ तय करता है ताकि व्यक्ति की सेहत में मदद हो, एक लक्ष्य, सुरक्षा नियम और प्रगति की जाँच के साथ। बागवानी थेरेपी में बागवानी के काम होते हैं। पशु-सहायता थेरेपी में प्रशिक्षित शांत पशु होते हैं। दोनों मन अच्छा करते, कौशल बढ़ाते और तनाव घटाते हैं।
- जीवों के उपयोग का अर्थ और स्वास्थ्य में भूमिका – लोग पौधों और जानवरों का उपयोग केवल भोजन के लिए नहीं, सेहत और खुशी के लिए भी करते हैं। हरियाली और बागवानी मन शांत करती है और शरीर को चलाती है। साथी पशु साथ देते हैं और हमें सक्रिय रखते हैं। सावधानी से हो तो यही गतिविधियाँ थेरेपी में भी काम आती हैं।
- जीवों में अकार्बनिक आयन – अकार्बनिक आयन ऐसे आवेशित कण हैं जिनमें कार्बन शृंखला नहीं होती, और जो कोशिका व शरीर के द्रवों के पानी में घुले रहते हैं। ये कम मात्रा में चाहिए, पर हर एक का ख़ास काम है। आयरन आयन (Fe²⁺) हीमोग्लोबिन के हीम समूहों में ऑक्सीजन जोड़ते हैं। सोडियम आयन (Na⁺) ग्लूकोज़ और अमीनो अम्ल का सह-परिवहन कराते हैं और तंत्रिका आवेग के लिए ज़रूरी हैं। फ़ॉस्फ़ेट आयन (PO₄³⁻) ATP, DNA, RNA और फ़ॉस्फ़ोलिपिड बनाते हैं। हाइड्रोजन आयन (H⁺) pH तय करते हैं: ज़्यादा H⁺ = कम pH, जिससे एंज़ाइम विकृत हो सकते हैं और हीमोग्लोबिन ऑक्सीजन छोड़ता है।
- जीवों में पोषण और परिवहन – हर कोशिका को भोजन, ऑक्सीजन और कचरा बाहर निकालने का रास्ता चाहिए। पौधे अपना भोजन बनाते हैं (स्वपोषी), जंतु भोजन खाते हैं (विषमपोषी)। पदार्थ झिल्ली से विसरण, परासरण या सक्रिय परिवहन द्वारा आते-जाते हैं। गैसों की अदला-बदली पतली गीली सतह पर होती है। बड़े शरीर में पंप के साथ नलियाँ होती हैं: जंतुओं में खून और हृदय, पौधों में जाइलम और फ्लोएम।
- जीवों में विभिन्नता – एक ही जाति के जीवों के बीच के अंतर को विभिन्नता कहते हैं। सतत विभिन्नता में किसी सीमा के भीतर हर मान हो सकता है (लंबाई, भार); असतत विभिन्नता साफ़ समूहों में बँटी होती है (रक्त समूह, फूल का रंग)। विभिन्नता जीन से, वातावरण से या दोनों से आती है। सिर्फ जीन वाले बदलाव ही अगली पीढ़ी में जाते हैं। मनुष्य चयनात्मक और संकर प्रजनन में विभिन्नता का उपयोग करता है, और आनुवंशिक संशोधन (GM) सीधे एक उपयोगी जीन जोड़ देता है।
- जीवों में विविधता और वर्गीकरण – धरती पर लाखों तरह के जीव हैं, और भारत सबसे समृद्ध जगहों में है। इन्हें पढ़ने के लिए हम आसान सवाल पूछकर समूह बनाते हैं: केंद्रक है या नहीं? एक कोशिका या कई? भोजन खुद बनाता है? इससे पाँच जगत बनते हैं: मोनेरा, प्रोटिस्टा, कवक, पादप और जंतु। जंतु अकशेरुकी और कशेरुकी में बँटते हैं। हर जाति का दो शब्दों का वैज्ञानिक नाम होता है। वायरस कोशिका नहीं है, इसलिए किसी जगत में नहीं आता।
- जूडो: सुरक्षित गिरना, चतुराई से फेंकना, मज़बूती से पकड़ना – जूडो का अर्थ है "कोमल मार्ग"। इसे 1882 में जापान में कानो जिगोरो ने बनाया। इसमें तीन बातें सीखते हैं: सुरक्षित गिरना (उकेमी), साथी का संतुलन तोड़कर फेंकना (नागे-वाज़ा) और साथी को पीठ के बल दबाकर रखना (ओसाएकोमी-वाज़ा)। पूरा अंक इप्पोन कहलाता है। सम्मान, झुककर नमस्ते और सुरक्षित मैट सबसे पहले हैं।
- जैव अणु – कोशिका में ज़्यादातर पानी है, और कार्बन यौगिकों के चार बड़े परिवार: प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, लिपिड और न्यूक्लिक अम्ल। ऊतक को अम्ल में पीसने से छोटे अणु (अम्ल-विलेय भाग) बड़े अणुओं – प्रोटीन, पॉलीसैकेराइड, न्यूक्लिक अम्ल (अम्ल-अविलेय भाग) – से अलग हो जाते हैं। प्रोटीन अमीनो अम्लों की शृंखलाएँ हैं जो चार स्तरों में मुड़ती हैं। पॉलीसैकेराइड शर्करा की शृंखलाएँ हैं; लिपिड ग्लिसरॉल पर वसा अम्ल; न्यूक्लिक अम्ल न्यूक्लियोटाइड की शृंखलाएँ। एंज़ाइम प्रोटीन उत्प्रेरक हैं जो सक्रिय स्थल पर क्रियाधार पकड़ते हैं, सक्रियण ऊर्जा घटाते हैं, और तापमान, pH, क्रियाधार मात्रा व संदमकों से प्रभावित होते हैं।
- जैव प्रक्रम और प्रकाश संश्लेषण – जैव प्रक्रम वे काम हैं जो ज़िंदा रहने के लिए शरीर को लगातार करने पड़ते हैं: पोषण, श्वसन, परिवहन और उत्सर्जन। हरे पौधे प्रकाश संश्लेषण से पोषण करते हैं: सूर्य के प्रकाश और क्लोरोफिल की मदद से वे कार्बन डाइऑक्साइड और जल से ग्लूकोज बनाते हैं और ऑक्सीजन छोड़ते हैं।
- जैव प्रौद्योगिकी एवं उसके उपयोग – आनुवंशिक इंजीनियरिंग के औज़ार दवा, खेती और शोध में काम आते हैं। जीवाणु मानव इंसुलिन बनाते हैं; यीस्ट सुरक्षित टीका-प्रोटीन बनाता है। स्टेम कोशिकाएँ कई प्रकार की कोशिकाओं में बदल सकती हैं। जीन थेरेपी रोगी की कोशिकाओं में सही जीन डालती है। Bt कपास जैसी GM फसलों में कीट मारने वाले प्रोटीन का जीन होता है। पारजीनी जंतु रोग समझने या दवा बनाने में मदद करते हैं। ये शक्तिशाली हैं, इसलिए भारत में GEAC इन पर नज़र रखती है और कानून बायोपायरेसी व अनुचित पेटेंट से बचाते हैं।
- जैव प्रौद्योगिकी: सिद्धांत व प्रक्रम (पुनर्योगज DNA तकनीक) – आनुवंशिक इंजीनियरिंग यानी किसी जीव के जीन जान-बूझकर बदलना। चाहा गया जीन प्रतिबंधन एंज़ाइम (आणविक कैंची) से काटते हैं, DNA लाइगेज़ (आणविक गोंद) से वाहक DNA में जोड़ते हैं, परपोषी कोशिका में डालते हैं, सही कोशिकाएँ चुनते हैं और बड़े टैंक (बायोरिएक्टर) में उगाकर उत्पाद निकालते हैं। PCR जीन की लाखों प्रतियाँ बनाता है और जेल वैद्युतकणसंचलन DNA टुकड़ों को आकार के हिसाब से अलग करता है।
- जैव विविधता एवं संरक्षण – जैव विविधता यानी जीवन की विविधता, तीन स्तरों पर: आनुवंशिक, जातीय और पारिस्थितिक। यह भूमध्य रेखा के पास सबसे ज़्यादा है और क्षेत्र के साथ बढ़ती है (log S = log C + Z log A)। हर जाति ज़रूरी है, जैसे हवाई जहाज़ की कीलें। 'दुष्ट चौकड़ी' के कारण जातियाँ तेज़ी से खो रही हैं: आवास हानि और विखंडन, अति-दोहन, विदेशी जातियों का आक्रमण और सह-विलुप्ति। IUCN रेड लिस्ट (रेड डेटा बुक) जातियों को 'कम चिंता' से 'विलुप्त' तक बाँटती है। संरक्षण स्व-स्थाने (हॉटस्पॉट, राष्ट्रीय उद्यान, अभयारण्य, जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र, पवित्र उपवन, रामसर आर्द्रभूमि) और बाह्य-स्थाने (चिड़ियाघर, वानस्पतिक उद्यान, बीज बैंक) होता है।
- जैव विविधता और पारितंत्र पर मानव गतिविधियों का प्रभाव – जैव विविधता यानी धरती पर या एक पारितंत्र में अलग-अलग प्रजातियों की विविधता। ज़्यादा जैव विविधता पारितंत्र को स्थिर बनाती है, क्योंकि जीव भोजन, आश्रय और स्थिर पर्यावरण के लिए एक-दूसरे पर निर्भर हैं, और हमें भोजन, दवाएँ, साफ़ हवा-पानी देती है। बढ़ती आबादी ज़्यादा संसाधन लेती है और ज़्यादा कचरा बनाती है। पानी, ज़मीन और हवा का प्रदूषण, निर्माण-खेती-खदान-कचरा स्थल के लिए ज़मीन, पीट खुदाई, वनों की कटाई और वैश्विक तापन जैव विविधता घटाते हैं। प्रजनन कार्यक्रम, आवास की बहाली, खेतों की बाड़ और किनारे, कम कटाई व कम CO₂, और रीसाइक्लिंग से इसे बचा सकते हैं।
- जैव विविधता और विकास – जैव विविधता यानी जीवन की विविधता। इसके तीन स्तर हैं: प्रजाति विविधता (कई तरह के जीव), आनुवंशिक विविधता (एक जाति के भीतर अंतर) और पारिस्थितिकी-तंत्र विविधता (कई तरह के आवास)। यह विविधता विकास से बनी: जीव कई पीढ़ियों में बदलते हैं और प्राकृतिक चयन उपयोगी बदलाव बचा लेता है, इसलिए एक पूर्वज से कई जातियाँ बन सकती हैं।
- जैव सूचना विज्ञान: जीव विज्ञान में कंप्यूटर – जैव सूचना विज्ञान (bioinformatics) कंप्यूटर से जैविक डेटा को सहेजता, खोजता और मिलाता है। लैब के नतीजे स्प्रेडशीट में; DNA और प्रोटीन अनुक्रम ऑनलाइन डेटाबेस में; संरेखण टूल अनुक्रमों में मिलान, अंतर (जैसे SNP) और रिश्तेदारी खोजते हैं; सॉफ़्टवेयर सूक्ष्मदर्शी कैमरे के चित्र मापता है। लोगों का डेटा गोपनीय और न्यायपूर्ण तरीके से इस्तेमाल होना चाहिए।
- जैव-औषधियाँ: जीवित कोशिकाओं से बनी दवाएँ – जैव-औषधि वह दवा है जिसे जीवित कोशिकाएँ बनाती हैं, आमतौर पर कोई प्रोटीन जैसे इंसुलिन, टीका या प्रतिरक्षी। वैज्ञानिक मानव जीन को जीवाणु, ख़मीर या जंतु कोशिकाओं में डालते हैं, उन्हें किण्वक में उगाते हैं और फिर दवा को शुद्ध करते हैं। हर चरण पर सुरक्षा जाँच होती है।
- जैवनैतिकता: जीवविज्ञान और चिकित्सा में सही क्या है – जैवनैतिकता पूछती है कि जीवविज्ञान और चिकित्सा जो करने देते हैं, क्या हमें वह करना चाहिए। इसके चार सिद्धांत हैं: स्वायत्तता (पसंद का सम्मान), हितकारिता (भला करो), अहानिकारिता (नुक़सान न करो) और न्याय (बराबरी)। मानव गरिमा का अर्थ है कि इंसान कभी सिर्फ़ साधन नहीं, इसलिए सूचित सहमति ज़रूरी है। चिकित्सीय क्लोनिंग सख़्त नियमों से कहीं-कहीं मान्य है; इंसान की प्रजनन क्लोनिंग ज़्यादातर देशों में प्रतिबंधित है। जीवन की शुरुआत और अंत के सवाल फ़ायदों बनाम जोखिमों और मूल्यों पर तौले जाते हैं।
- जैवमंडल (Biosphere) – जैवमंडल पृथ्वी का वह भाग है जहाँ जीवन है। यह एक पतली परत है जहाँ स्थलमंडल (चट्टान और मिट्टी), जलमंडल (पानी) और वायुमंडल (हवा) मिलते हैं, समुद्र तल से लगभग 10 km ऊपर से लगभग 11 km नीचे तक। पृथ्वी के सभी पारितंत्र मिलकर जैवमंडल बनाते हैं। इसमें ऊर्जा एक ही दिशा में बहती है: सूर्य → पौधे → जंतु → ऊष्मा, जबकि कार्बन, पानी, नाइट्रोजन जैसे पदार्थ चक्र में घूमते हैं। जीव बाकी मंडलों को भी बदलते हैं: ऑक्सीजन बनाते हैं, मिट्टी बनाते हैं, कार्बन जमा करते हैं। आज मनुष्य इसे तेज़ी से बदल रहा है, इसलिए इसकी रक्षा ज़रूरी है।
- जैविक खेती और उन्नत फसल उत्पादन पद्धतियाँ – जैविक खेती में रासायनिक उर्वरक, रासायनिक कीटनाशक और जीन-संशोधित (GM) बीज इस्तेमाल नहीं होते। मिट्टी को कम्पोस्ट, गोबर की खाद, वर्मीकम्पोस्ट, हरी खाद और जैव उर्वरकों से पोषण मिलता है; कीटों को मित्र कीट, नीम और जाल से रोका जाता है; और फसल चक्र व मिश्रित खेती से मिट्टी उपजाऊ रहती है। ड्रिप सिंचाई, मल्चिंग, संरक्षित खेती और सटीक खेती जैसी उन्नत पद्धतियाँ पानी और लागत बचाती हैं। प्रमाणित जैविक भोजन तय नियमों से उगाया और जाँचा जाता है।
- जैविक लय और प्रकाशकालिता – जीव अपने काम एक समय-सारणी से दोहराते हैं: दैनिक (सर्कैडियन, लगभग 24 घंटे), ज्वारीय, मासिक और वार्षिक (मौसमी) लय। भीतरी घड़ी ताल रखती है और प्रकाश उसे ठीक करता है। प्रकाशकालिता दिन की लंबाई के प्रति प्रतिक्रिया है: यह पौधों को बताती है कि कब फूल देना है (दीर्घ-दिवसीय, लघु-दिवसीय, दिवस-उदासीन) और जंतुओं को कि कब प्रजनन, मोटे बाल या प्रवास करना है।
- जैविक हथियारों पर प्रतिबंध: दुनिया ने रोगाणु युद्ध को क्यों ना कहा – जैविक हथियार में रोगाणु या उनके विष जानबूझकर लोगों, पशुओं या फसलों को नुक़सान पहुँचाने के लिए इस्तेमाल होते हैं। रोगाणु अपने आप फैलते हैं, किसी एक समूह पर निशाना नहीं बनाए जा सकते और यात्रा से सारी सीमाएँ पार करते हैं, इसलिए कोई सुरक्षित नहीं, प्रयोग करने वाला भी नहीं। 1925 के जिनेवा प्रोटोकॉल ने युद्ध में इनके प्रयोग पर रोक लगाई। 1972 का जैविक हथियार अभिसमय, जो 1975 से लागू है, इन्हें विकसित करने, बनाने और जमा करने पर रोक लगाता है। चूँकि वही जीवविज्ञान टीके और दवाएँ भी बनाता है, प्रयोगशालाएँ जैव-सुरक्षा और जैव-संरक्षा नियम मानती हैं और वैज्ञानिक दुरुपयोग की सूचना देते हैं।
- ज्ञानेंद्रियाँ – ज्ञानेंद्रियाँ हमें आसपास के बदलाव (उद्दीपन) पहचानने देती हैं। आँख प्रकाश, कान ध्वनि और संतुलन, नाक गंध, जीभ स्वाद और त्वचा स्पर्श, दबाव, गरमी, ठंडक व दर्द पहचानती है। हर इंद्रिय में ग्राही कोशिकाएँ उद्दीपन को तंत्रिका संकेत में बदलती हैं। संकेत संवेदी तंत्रिका से मस्तिष्क या मेरुरज्जु तक जाता है, जो मांसपेशी को आदेश भेजता है: यही अनुक्रिया है।
- झिल्ली परिवहन: कोशिका में चीज़ें अंदर-बाहर कैसे जाती हैं – कोशिका झिल्ली वसा जैसे अणुओं की पतली दोहरी परत है जिसमें प्रोटीन लगे होते हैं. यह कुछ पदार्थों को जाने देती है और कुछ को रोकती है (चयनात्मक पारगम्य). विसरण में कण ज़्यादा सांद्रता से कम सांद्रता की ओर बिना ऊर्जा जाते हैं. सुसाध्य विसरण यही काम प्रोटीन चैनल से करता है. परासरण आंशिक पारगम्य झिल्ली से पानी का विसरण है. सक्रिय परिवहन ATP और प्रोटीन पंप से कणों को कम से ज़्यादा सांद्रता की ओर ले जाता है. बहुत बड़ी चीज़ें बुलबुलों में आती-जाती हैं (एंडोसाइटोसिस, एक्सोसाइटोसिस).
- टारगेट-टाइप खेल (निशाने वाले खेल) – टारगेट-टाइप खेल में आप गेंद, पत्थर या तीर को निशाने की ओर भेजते हैं और इस आधार पर अंक पाते हैं कि वह निशाने के कितना पास रुका। विरोधी को छूना नहीं पड़ता। कौशल निशाना, ताकत और दिशा से आता है। आप खिलाड़ी, रणनीतिकार, स्कोरर, रेफरी, कोच या दर्शक बनकर भाग ले सकते हैं।
- टीम खेल (Team Sports): आक्रमण, रक्षा और खेल भावना – टीम खेलों के तीन परिवार हैं: आक्रमण खेल, नेट और दीवार खेल, और मारना-फ़ील्डिंग खेल। जब गेंद आपकी टीम के पास हो तो आक्रमण करें: चौड़ाई और गहराई में फैलें, खाली जगह में जाएँ और जल्दी पास दें। जब विरोधी के पास हो तो रक्षा करें: पास-पास रहें, गोल की तरफ़ खड़े हों, खिलाड़ी को मार्क करें या क्षेत्र संभालें और सही तरीके से गेंद जीतें। हर खिलाड़ी की भूमिका है, टीम लगातार बात करती है और अधिकारी नियम लागू करते हैं।
- डिजिटल स्वास्थ्य: हेल्थ ऐप का समझदारी से उपयोग – डिजिटल स्वास्थ्य का मतलब है फ़ोन, ऐप, स्मार्ट घड़ी और इंटरनेट से अपनी सेहत का ध्यान रखना। ऐप कदम, नींद और नब्ज़ गिन सकते हैं और आदतें बनाने में मदद करते हैं। पर उनके नंबर लगभग सही होते हैं, पक्के नहीं, और वे डॉक्टर की जगह नहीं ले सकते। इंटरनेट पर झूठे स्वास्थ्य दावे बहुत तेज़ी से फैलते हैं। चार जाँचें (स्रोत, सबूत, तारीख, विशेषज्ञ) बताती हैं कि किस पर भरोसा करें। अपना स्वास्थ्य डेटा निजी रखना भी ज़रूरी है।
- तंत्रिका तंत्र, प्रतिवर्ती क्रिया और मानव मस्तिष्क – तंत्रिका कोशिकाएँ (न्यूरॉन) संदेश को विद्युत आवेग के रूप में ले जाती हैं और सिनैप्स नाम के छोटे अंतर को रसायनों से पार करती हैं। झटपट बचाव वाली क्रियाएँ (प्रतिवर्ती क्रिया) मेरुरज्जु सँभालता है; सोचना और नियंत्रण मस्तिष्क करता है, जिसे खोपड़ी और तरल की गद्दी बचाती है।
- तंत्रिका विज्ञान: मस्तिष्क मन को कैसे बनाता है – तंत्रिका विज्ञान (neuroscience) मस्तिष्क और तंत्रिकाओं का अध्ययन है। मस्तिष्क के तीन मुख्य भाग हैं: प्रमस्तिष्क (सोचना, इंद्रियाँ, गति), अनुमस्तिष्क (संतुलन) और मस्तिष्क स्तंभ (साँस, धड़कन)। यह लगभग 86 अरब न्यूरॉनों से बना है, जो विद्युत संदेश भेजते हैं और सिनैप्स पर रसायनों से बात करते हैं। हर पालि का अपना मुख्य काम है; ब्रोका और वर्निके क्षेत्र बोलने-समझने का काम करते हैं; दर्पण न्यूरॉन काम करते समय और दूसरों को देखते समय भी सक्रिय होते हैं। हिप्पोकैम्पस यादें बनाता है और एमिग्डाला भावना जोड़ता है। EEG मस्तिष्क तरंगें, ECG हृदय और स्पाइरोग्राम साँस को दर्ज करता है।
- तंत्रिका-पेशी तंत्र (Neuromuscular System) – तंत्रिका-पेशी तंत्र यानी तंत्रिकाएँ और पेशियाँ एक टीम की तरह काम करती हैं। मोटर यूनिट एक मोटर तंत्रिका कोशिका और उसके सारे पेशी तंतुओं से बनती है। मोटर यूनिट सब-या-कुछ-नहीं नियम मानती है: पूरा खिंचाव या कुछ नहीं। ज़्यादा बल के लिए दिमाग़ ज़्यादा यूनिट चालू करता है (रिक्रूटमेंट) और संकेत तेज़ भेजता है (वेव समेशन, टिटेनस तक)। पेशी में धीमे टाइप I (सहनशक्ति) और तेज़ टाइप IIa, IIx (ताक़त) तंतु होते हैं। PNF स्ट्रेचिंग पेशी के अपने सेंसर से उसे ढीला करके ज़्यादा खिंचाव देती है।
- तंत्रिकीय नियंत्रण एवं समन्वय – समन्वय यानी अंगों का मिलकर काम करना। तंत्रिका तंत्र यह तेज़ी से तंत्रिका कोशिकाओं से करता है। तंत्रिका कोशिका में कोशिका काय, द्रुमिकाएँ और तंत्रिकाक्ष हैं; कई तंत्रिकाक्षों पर रैनवियर पर्व वाला माइलिन आच्छद है। केंद्रीय तंत्रिका तंत्र (मस्तिष्क, मेरुरज्जु) सूचना संसाधित करता है; परिधीय तंत्र (तंत्रिकाएँ) उसे ढोता है। PNS के दो भाग: कायिक (कंकाली पेशियाँ) और स्वायत्त (अनुकंपी, परानुकंपी), जो अंदर के अंगों यानी अंतरंग तंत्र को चलाता है। आराम में तंत्रिकाक्ष ध्रुवित है: अंदर −, बाहर +, लगभग −70 mV। उद्दीपन से Na+ अंदर आकर क्रिया विभव बनाता है जो आगे दौड़ता है। सिनैप्स पर तंत्रिका संचारी संकेत अगली कोशिका तक पहुँचाते हैं।
- तनाव के हार्मोन: एड्रेनालिन, कॉर्टिसोल और पुनर्भरण – ख़तरा दिमाग़ के अलार्म केंद्र को जगाता है। तेज़ तंत्रिका संकेत (स्वायत्त तंत्रिका तंत्र) अधिवृक्क ग्रंथियों से एड्रेनालिन छुड़वाता है, जिससे दिल ज़्यादा रक्त पंप करता है। धीमी हार्मोन-कड़ी कॉर्टिसोल छोड़ती है, जो शर्करा ऊँची रखता है। फिर कॉर्टिसोल दिमाग़ में लौटकर ऋणात्मक पुनर्भरण से अलार्म बंद कर देता है। अगर तनाव कभी न रुके तो ब्रेक कमज़ोर होता है, कॉर्टिसोल ऊँचा रहता है और शरीर व याददाश्त को नुक़सान होता है।
- तैराकी के स्ट्रोक, पानी की सुरक्षा, स्केटिंग और स्कीइंग – तैराकी के चार स्ट्रोक हैं: फ्रीस्टाइल, बैकस्ट्रोक, ब्रेस्टस्ट्रोक और बटरफ्लाई। हर स्ट्रोक में हाथ-पैर का अलग तरीका होता है। पानी की सुरक्षा का मतलब है तैरना जानना, अकेले न तैरना और डूबते को किनारे से मदद देना। स्केटिंग और स्कीइंग में ब्लेड या स्की बर्फ पर बहुत कम घर्षण से फिसलते हैं।
- दैनिक जीवन में सहायता – दैनिक जीवन यानी रोज़ की वे ज़रूरतें जो हमें स्वस्थ रखती हैं: आरामदायक जगह, भोजन-पानी, शौच, चलना-फिरना, नींद, सफ़ाई और साफ़ कपड़े। नर्स हर ज़रूरत जाँचती है, उतनी ही मदद करती है जितनी ज़रूरी है, निजता रखती है और मरीज़ को ज़्यादा से ज़्यादा आत्मनिर्भर रखती है।
- दैनिक जीवन सहायता के लिए ज़रूरी मन और शरीर – हर रोज़ का काम मन और शरीर के मिलकर चलने से होता है। सजने-पहनने के लिए इच्छा, हाथ और स्वस्थ त्वचा चाहिए। चलने के लिए माँसपेशी, जोड़, संतुलन और आराम। खाने के लिए देखना-सूँघना, चबाना, सुरक्षित निगलना और पाचन। नहाने के लिए साफ़ त्वचा और गर्माहट। शौच के लिए संकेत और समय पर शौचालय। नींद के लिए थकान, अँधेरा और शांति। आपात स्थिति में शांत रहकर मदद बुलाइए। जीवन के अंत में आराम दीजिए, दर्द कम कीजिए और परिवार को पास रखिए। मदद सिर्फ़ वहीं दीजिए जहाँ कोई चरण कमज़ोर है।
- द्विस्तरीय और त्रिस्तरीय जंतु (निडेरिया) – निडेरियन (हाइड्रा, जेलीफ़िश, समुद्री एनीमोन, प्रवाल) का शरीर दो कोशिका परतों का होता है: बाहर बाह्यचर्म और अंदर अंतश्चर्म, बीच में जेली। इनमें एक छिद्र वाली आँत, दंश कोशिकाएँ और अरीय सममिति होती है। इनसे ऊपर के जंतुओं में तीसरी परत, मध्यजनस्तर, और द्विपार्श्व सममिति होती है।
- नए खेल: रोलर स्केटिंग, क्लाइंबिंग, ओरिएंटियरिंग और रस्सी कूद – ये चार नए खेल अब कई स्कूलों में सिखाए जाते हैं। रोलर स्केटिंग में पहले धक्का, फिर फिसलना। क्लाइंबिंग में तीन अंग दीवार पर टिके रहते हैं और एक चलता है। ओरिएंटियरिंग में नक्शे और कम्पास से नियंत्रण-बिंदु खोजते हैं। रस्सी कूद में कलाई से रस्सी घुमाकर हल्की छलाँग लगाते हैं। हर खेल संतुलन, ताकत और सोच बढ़ाता है, और सबके सुरक्षा नियम सरल हैं।
- नर्सिंग का सार – नर्सिंग का मतलब है हर उम्र के लोगों की देखभाल, स्वस्थ हों या बीमार, ताकि वे अच्छे से जी सकें। नर्स देखभाल करती है, निगरानी रखती है, सिखाती है और मरीज़ की बात रखती है। वह डॉक्टर, फ़ार्मासिस्ट, आहार-विशेषज्ञ, चिकित्सक और परिवार के साथ टीम में काम करती है और सम्मान, गोपनीयता, ईमानदारी और सुरक्षा की नैतिकता निभाती है।
- नर्सिंग के आम कौशल – हर नर्स पाँच मुख्य कौशल इस्तेमाल करती है: साफ़ संवाद, संक्रमण से बचाव (हाथ धोना, साफ़ उपकरण), सुरक्षा (रेलिंग, पहचान की जाँच, घंटी), शारीरिक जाँच (तापमान, नब्ज़, साँस, रक्तचाप) और नर्सिंग प्रक्रिया: जाँच, समस्या पहचान, योजना, करना, मूल्यांकन, जो चक्र की तरह दोहराई जाती है।
- नर्सिंग प्रबंधन (Management in Nursing) – नर्सिंग प्रबंधन का मतलब देखभाल को सुरक्षित, अच्छा और निष्पक्ष चलाना है। नर्स PDCA चक्र से गुणवत्ता सुधारती हैं, जाँच और रिपोर्ट से नुक़सान रोकती हैं, कामों को प्राथमिकता से छाँटती हैं, दूसरे पेशेवरों के साथ टीम में काम करती हैं और क़ानून व अस्पताल नीति मानती हैं।
- नर्सिंग में समस्या-समाधान – नर्स समस्या तीन चालों में हल करती है। पहले कई जगह से तथ्य जुटाती है (देखो, पूछो, रिकॉर्ड पढ़ो)। फिर विश्लेषण करती है: काम के तथ्य रखो, बाक़ी हटाओ और हल चुनो। अंत में हल को सही लोगों तक छोटे, साफ़ और निजी संदेश में भेजती है। यही नर्सिंग इन्फॉर्मेटिक्स का मूल है: जानकारी को अच्छे और सुरक्षित तरीक़े से इस्तेमाल करना।
- नवीकरणीय संसाधन के रूप में लकड़ी – लकड़ी पेड़ों से मिलती है और पेड़ फिर उग जाते हैं। अगर हम जितना काटें उतना ही जंगल वापस उगने दें, तो लकड़ी नवीकरणीय है। लकड़ी हल्की है, अपने वज़न के हिसाब से मज़बूत है, आसानी से ढलती है और गर्मी रोकती है। वह हवा से लिया कार्बन जमा रखती है। पुरानी लकड़ी को दोबारा इस्तेमाल, रीसायकल या ऊर्जा के लिए जलाया जा सकता है।
- निडेरिया (आंत्रगुहीय जंतु): हाइड्रा, जेलीफ़िश और मूँगा – निडेरिया पानी में रहने वाले जंतु हैं। इनका शरीर कोमल थैली जैसा होता है, जिसके चारों ओर स्पर्शक और दंश कोशिकाएँ होती हैं। शरीर की दीवार में दो कोशिका परतें होती हैं और एक आहार-गुहा जिसका एक ही छेद होता है। हाइड्रा टुकड़ों से दोबारा बन सकता है (पुनर्जनन)। मूँगा कई छोटे पॉलिपों का समूह है जो प्रवाल भित्ति बनाता है।
- निदान और उपचार (Diagnosis and Treatment) – डॉक्टर कदम-दर-कदम पता लगाते हैं कि गड़बड़ी क्या है। वे इतिहास (लक्षण) सुनते हैं, शरीर की जाँच (संकेत) करते हैं, नैदानिक परीक्षण कराते हैं, नतीजों को सामान्य सीमा से मिलाते हैं, संभावित रोगों की सूची बनाते हैं और जो सबसे ठीक बैठे वह चुनते हैं। फिर उपचार के मुख्य तरीकों से इलाज करते हैं: दवा, सर्जरी, विकिरण, आहार और जीवनशैली, और पुनर्वास, अक्सर साथ-साथ।
- नेट वाले खेल (Net-Type Games) – नेट वाले खेलों में एक नेट कोर्ट को दो हिस्सों में बाँटता है और हर पक्ष गेंद को नेट के ऊपर से इस तरह भेजता है कि वह विरोधी के कोर्ट के अंदर गिरे और वापस न लौट सके। वॉलीबॉल टीम का उदाहरण है; बैडमिंटन, टेनिस और टेबल टेनिस रैकेट वाले उदाहरण हैं। रैली का क्रम होता है: सर्व, रिसीव, सेट और अटैक। खिलाड़ी अच्छी पोज़िशन में खड़े होकर और बातचीत करके कोर्ट ढकते हैं।
- नैदानिक पोषण और आहारिकी: इलाज का हिस्सा है भोजन – नैदानिक पोषण में भोजन से बीमारी के इलाज और बचाव में मदद की जाती है। आहार चिकित्सा का मतलब है व्यक्ति के सामान्य आहार को उसकी बीमारी के अनुसार बदलना। रूपांतरित (चिकित्सीय) आहार में तीन चीज़ें बदल सकती हैं: गाढ़ापन (साफ़ तरल, पूर्ण तरल, नरम, सामान्य), पोषक तत्व (कम नमक, कम चीनी, कम वसा, ज़्यादा रेशा, ज़्यादा या कम प्रोटीन) और भोजन का ढंग (थोड़ा-थोड़ा कई बार)। ऑपरेशन या पेट की बीमारी के बाद मरीज़ अक्सर साफ़ तरल से सामान्य खाने तक सीढ़ी चढ़ता है। उच्च रक्तचाप में नमक कम, मधुमेह में कार्बोहाइड्रेट की मात्रा और प्रकार पर नियंत्रण, और दिल के रोग में संतृप्त और ट्रांस वसा कम। रोज़ की अच्छी आदतें पुराने रोगों से बचाती हैं। डाइटीशियन अस्पताल, क्लिनिक, खेल, खाद्य उद्योग, शोध और जन-स्वास्थ्य में काम करते हैं।
- पक्षी: उड़ान के लिए बने जीव – पक्षी गर्म-रक्तीय कशेरुकी हैं जिनके पर, पंख और चोंच होती है और दाँत नहीं होते। ये कठोर खोल वाले अंडे देते हैं और फेफड़ों व वायु-कोशों से साँस लेते हैं। उड़ने के लिए हल्का, धारारेखित शरीर चाहिए: खोखली हड्डियाँ, मज़बूत छाती की माँसपेशियाँ, पर और पंख। भोजन और रहने की जगह के अनुसार चोंच और पंजे अलग होते हैं, जिससे पारिस्थितिक समूह बनते हैं।
- परजीवी और रोग वाहक – परजीवी वह जीव है जो किसी दूसरे जीव (पोषी) के ऊपर या अंदर रहकर उससे भोजन लेता है और उसे नुकसान पहुँचाता है। परजीवी जीवाणु, प्रोटोज़ोआ, कवक, कृमि या किलनी और जूँ जैसे संधिपाद हो सकते हैं। वाहक, जैसे मच्छर, परजीवी को एक पोषी से दूसरे तक ले जाता है। साफ़ पानी, जाली, सफ़ाई और अच्छी तरह पकाना इस कड़ी को तोड़ देते हैं।
- परासरण और उत्सर्जन: धानी से वृक्क तक – परासरण में पानी झिल्ली से होकर उस ओर जाता है जहाँ घुला पदार्थ ज़्यादा है। जंतुओं को पानी का संतुलन बनाना और अपशिष्ट निकालना पड़ता है। इसका साधन समय के साथ बदला: संकुचनशील धानी, ज्वाला कोशिका, वृक्कक, फिर वृक्क।
- पर्यावरणीय स्वास्थ्य – पर्यावरणीय स्वास्थ्य यह देखता है कि हमारा परिवेश — हवा, पानी, भोजन, मिट्टी, रसायन, शोर, गर्मी और जिन इमारतों में रहते हैं — हमारी सेहत पर कैसे असर डालता है। नुक़सान शरीर में चार रास्तों से आता है: साँस, पीना, खाना और छूना। ख़तरा मात्रा (dose) और संपर्क के समय पर निर्भर है। कुछ विष खाद्य शृंखला में जमा होते जाते हैं। One Health (एक स्वास्थ्य) का विचार कहता है कि इंसान, जानवर और पर्यावरण की सेहत जुड़ी है, इसलिए तीनों को साथ बचाना होता है।
- पशु कल्याण – पशु कल्याण यानी कोई जानवर अपने जीवन में कितना अच्छा महसूस कर रहा है: उसका शरीर, उसकी भावनाएँ और स्वाभाविक व्यवहार की आज़ादी। जानवर संवेदनशील हैं: वे दर्द, डर और ख़ुशी महसूस करते हैं। पाँच स्वतंत्रताएँ बताती हैं कि हमारी देखरेख में हर जानवर को क्या चाहिए: भोजन-पानी, आराम, स्वास्थ्य, स्वाभाविक व्यवहार और डर से मुक्ति। पालतू, खेत या प्रयोगशाला के जानवर रखने वालों का कर्तव्य है कि ये ज़रूरतें पूरी करें।
- पशुपालन और प्रोजेक्ट लर्निंग – पशुधन हमें दूध, अंडे, ऊन और मांस देता है। प्रोजेक्ट लर्निंग में विद्यार्थी असली पशुओं की देखभाल करके असली समस्या हल करते हैं। वे लक्ष्य की योजना बनाते हैं, देखभाल करते हैं, रोज़ संख्या लिखते हैं, नतीजा जाँचते हैं, सुधारते हैं और साझा करते हैं। पशु का आराम सबसे पहले।
- पशुपालन की भूमिका और नए रुझान – पशुपालन में हम गाय, मुर्गी, भेड़ जैसे पशु दूध, अंडे, मांस, ऊन, काम और खाद के लिए पालते हैं। ये चीज़ें एक श्रृंखला से घर पहुँचती हैं: फार्म, संग्रह केंद्र, दुकान, घर। दाम आपूर्ति (कितना बना) और माँग (लोग कितना चाहते हैं) पर निर्भर है। आज फार्म बड़े, साफ़ और ठंडी श्रृंखला से जुड़े हो रहे हैं।
- पशुपालन, प्रबंधन और मूल्यांकन – अच्छा पशुफ़ार्म सही नस्ल चुनता है, चयन या संकरण से झुंड सुधारता है, प्रजनन ऐसे तय करता है कि हर साल बछड़ा हो, आहार संतुलित रखता है, टीके और साफ़ बाड़े से रोग रोकता है, उत्पादों का मूल्यांकन करता है और अच्छा बाड़ा व मशीनें उपयोग करता है।
- पशुपालन: खेत के पशुओं की देखभाल – पशुपालन खेत के पशुओं के प्रजनन, आहार, आवास और स्वास्थ्य देखभाल का विज्ञान है। पशुधन (गाय, भैंस, बकरी, भेड़, सूअर, मुर्गी) से दूध, अंडे, मांस, ऊन, खेती की ताक़त और खाद मिलती है, और छोटे किसानों को रोज़ की आय। अच्छे प्रबंधन में सही नस्ल, साफ़ हवादार बाड़ा, साफ़ पानी और संतुलित आहार, समय पर टीका और कृमिनाशन, और गोबर जैसे जैव-अपशिष्ट से बायोगैस, कंपोस्ट और खाद बनाना शामिल है। सरकारें नस्ल सुधार, बीमा, ऋण और पशु-चिकित्सा सेवाओं से किसानों की मदद करती हैं।
- पहाड़ों और खेती वाले पहाड़ी गाँवों का संरक्षण – पेड़ों की जड़ें पहाड़ की मिट्टी पकड़ती हैं और पत्तियाँ बारिश को धीमा करती हैं। पेड़ कटने पर बारिश मिट्टी बहा ले जाती है (कटाव) और ढलान खिसक सकती है। चेक डैम, सीढ़ीदार खेत और पेड़ों की कतारें जैसे कटाव रोकने के काम ढलान को थामते हैं। पहाड़ के नीचे बसे खेती वाले गाँव सुरक्षित ढलान पर निर्भर हैं, और उन्हें खेतों और जंगलों की देखभाल करने वाले लोग भी चाहिए।
- पाचन और अवशोषण: एंज़ाइम, मिसेल और सह-परिवहन – बड़े भोजन-अणु एंज़ाइमों से छोटे बनते हैं: कार्बोहाइड्रेज़ (एमाइलेज़, फिर झिल्ली पर लगे डाइसैकेराइडेज़) से मोनोसैकेराइड, प्रोटिएज़ (एंडोपेप्टिडेज़, एक्सोपेप्टिडेज़, झिल्ली के डाइपेप्टिडेज़) से अमीनो अम्ल, और पित्त लवण द्वारा इमल्सीकरण के बाद लाइपेज़ से मोनोग्लिसराइड व वसा अम्ल। ग्लूकोज़ और अमीनो अम्ल Na⁺ के साथ सह-परिवहन से इलियम की कोशिकाओं में जाते हैं। वसा के भाग मिसेल में चलते हैं, कोशिका में विसरित होते हैं, फिर ट्राइग्लिसराइड बनकर काइलोमाइक्रॉन के रूप में लैक्टियल में जाते हैं।
- पादप ऊतक संवर्धन: छोटे टुकड़े से बहुत सारे पौधे – पादप ऊतक संवर्धन यानी पौधे की कोशिकाएँ, ऊतक या अंग को बंद काँच के जार में साफ़ जेली भोजन पर उगाना। पौधे का एक छोटा टुकड़ा (कर्तोतक) साफ़ करके शर्करा, लवण, विटामिन और पादप हॉर्मोन वाले माध्यम पर रखते हैं। इसकी कोशिकाएँ बँटकर मुलायम ढेला बनाती हैं, जिसे कैलस कहते हैं। हॉर्मोन का मिश्रण तय करता है कि प्ररोह उगेंगे या जड़ें। हर नया प्ररोह काटकर फिर उगाया जा सकता है, इसलिए एक टुकड़े से हज़ारों एक जैसे पौधे बनते हैं। यही सूक्ष्मप्रवर्धन है।
- पादप जैव-प्रौद्योगिकी का अभ्यास: हाथ से करने वाला प्रोजेक्ट – अच्छा पादप जैव-प्रौद्योगिकी प्रोजेक्ट छह चरणों में चलता है: एक साफ़ सवाल पूछें, निष्पक्ष परीक्षण की योजना बनाएँ (एक चीज़ बदलें, बाक़ी वही रखें, नियंत्रण जोड़ें), साफ़ जार और औज़ार तैयार करें, एसेप्टिक तरीक़े से टुकड़े लगाएँ, कुछ दिन पर वृद्धि देखें (टुकड़ा, फिर कैलस, फिर प्ररोह), और परिणाम लिखें, तुलना करें और साझा करें। बिगड़े जार भी आँकड़े हैं: वे बताते हैं कि क्या ग़लत हुआ। हमेशा शिक्षक के साथ सुरक्षित काम करें।
- पादप जैव-प्रौद्योगिकी की संभावनाएँ – पादप जैव-प्रौद्योगिकी तीन दिशाओं में बढ़ रही है। पहली, पौधों की आनुवंशिक जानकारी का उपयोग: पौधों के जीन (जीनोम) पढ़ना, उपयोगी जीन चुनना, और सूखा, कीट, पोषण और उपज के लिए फ़सलें जल्दी तैयार करना। दूसरी, बायोमास ऊर्जा: फ़सल का कचरा, लकड़ी और ऊर्जा-फ़सलों से बायोगैस, इथेनॉल और बायोडीज़ल बनते हैं, जो जीवाश्म ईंधन कम करते हैं क्योंकि उनसे निकला कार्बन पौधों ने हाल ही में लिया होता है। तीसरी, उद्योग के रुझान: पौधों और पादप कोशिकाओं से भोजन, दवा, सामग्री और रसायन बनाना, जहाँ सुरक्षा, जनता का भरोसा और निष्पक्षता मुख्य सवाल हैं।
- पादप जैवप्रौद्योगिकी और प्रोजेक्ट-आधारित सीखना: योजना, परीक्षण, दर्ज करना और प्रस्तुति – प्रोजेक्ट-आधारित सीखने का मतलब है कि आप अपने ही सवाल का जवाब करके ढूँढते हैं। पादप जैवप्रौद्योगिकी में आप ऊतक संवर्धन, हॉर्मोन, बीज उपचार, खाद या किण्वन परख सकते हैं। चरण हैं: एक साफ़ सवाल पूछें, अनुमान (परिकल्पना) लगाएँ, निष्पक्ष परीक्षण की योजना बनाएँ जिसमें केवल एक चीज़ बदले और कंट्रोल रहे, सुरक्षित तरीक़े से करें, संख्याएँ तालिका में लिखें, आलेख बनाएँ, औसत निकालें, निष्कर्ष निकालें और प्रस्तुत करें। अच्छा प्रोजेक्ट यह भी बताता है कि आगे क्या परखें।
- पादप प्रजनन: बेहतर फ़सलें बनाना – पादप प्रजनन = फ़सल के जीन जान-बूझकर बदलकर बेहतर क़िस्में बनाना: अधिक उपज, बेहतर गुणवत्ता, रोग-कीट प्रतिरोध, और सूखा, लवण, गर्मी या ठंड सहनशीलता। सबसे पुरानी विधि कृत्रिम चयन है: पीढ़ी दर पीढ़ी केवल अच्छे पौधों के बीज रखना। संकरण दो जनकों को मिलाता है ताकि संतान को दोनों के अच्छे गुण मिलें। अंतःप्रजनन (निकट संबंधी या स्व-परागण) शुद्ध वंश बनाता है; ज़्यादा हो तो अंतःप्रजनन अवसाद। बहिःप्रजनन असंबंधित वंशों को मिलाता है; दो शुद्ध वंशों का F1 संकर अक्सर दोनों से बेहतर होता है (संकर ओज)। अंतरजातीय संकरण (गेहूँ × राई = ट्रिटिकेल) में गुणसूत्र दोगुने करने पड़ते हैं। आधुनिक औज़ार: उत्परिवर्तन, बहुगुणिता, ऊतक संवर्धन, DNA मार्कर और जीन संपादन। वाविलोव ने बताया कि फ़सलों के उत्पत्ति केंद्र होते हैं और संबंधित प्रजातियों में विविधता की समजात श्रेणी होती है।
- पादप में श्वसन – श्वसन में ग्लूकोज़ जैसा भोजन टूटता है और ऊर्जा ATP के रूप में जमा होती है। पौधे रंध्रों और वातरंध्रों से O₂ लेते हैं। कोशिका-द्रव्य में ग्लाइकोलिसिस ग्लूकोज़ को दो पाइरुवेट में तोड़ता है। O₂ न हो तो पाइरुवेट का किण्वन होकर एथेनॉल या लैक्टिक अम्ल बनता है। O₂ हो तो पाइरुवेट माइटोकॉन्ड्रिया में जाता है, क्रेब्स चक्र चलता है और इलेक्ट्रॉन परिवहन तंत्र O₂ की मदद से सबसे ज़्यादा ATP बनाता है: एक ग्लूकोज़ से 38 तक। यही पथ अणु बनाता भी है (उभयचयी)। RQ = निकली CO₂ ÷ ली गई O₂।
- पादप रोग और पौधों का बचाव – पौधे भी बीमार होते हैं। रोग के लक्षण: रुकी हुई बढ़त, पत्तियों पर धब्बे, सड़न, गाँठें, टेढ़े-मेढ़े तने या पत्तियाँ, रंग बदलना और दिखने वाले कीट। कारण: रोगाणु (वायरस, जीवाणु, कवक), एफ़िड जैसे कीट, और खनिज आयनों की कमी: नाइट्रेट कम हो तो बढ़त रुकती है, मैग्नीशियम कम हो तो पत्तियाँ पीली (क्लोरोसिस)। रोग की पहचान गाइड या वेबसाइट, लैब जाँच या एंटीबॉडी वाली टेस्ट किट से होती है। पौधे भौतिक (मोमी परत, सेलुलोज़ भित्ति, छाल), रासायनिक (जीवाणुरोधी रसायन, ज़हर) और यांत्रिक (काँटे, रोएँ, पत्ते मुड़ना, नक़ल) तरीक़ों से बचाव करते हैं।
- पादप वृद्धि एवं परिवर्धन – वृद्धि आकार में स्थायी बढ़त है। बीज पानी, ऑक्सीजन और सही ताप पाकर अंकुरित होता है। जड़ और तने की नोक पर कोशिकाएँ बँटती हैं, फिर लंबी होती हैं, फिर परिपक्व होती हैं। वृद्धि अंकगणितीय (हर दिन उतनी ही) या ज्यामितीय (जितना है उसका हिस्सा) हो सकती है, जो S-वक्र बनाती है। कोशिकाएँ ख़ास बनती हैं (विभेदन), फिर बँटने लग सकती हैं (निर्विभेदन) और फिर ख़ास बनती हैं (पुनर्विभेदन)। पाँच हार्मोन, ऑक्सिन, जिबरेलिन, साइटोकाइनिन, एथिलीन और ABA, यह सब नियंत्रित करते हैं।
- पादप समुदाय – पादप समुदाय एक जगह साथ रहने वाली पौधों की कई प्रजातियों का समूह है। प्रजाति-संघटन बताता है कि कौन-सी प्रजातियाँ हैं और कितनी; सबसे ज़्यादा वाली प्रभावी प्रजाति कहलाती है। समुदाय परतों (वृक्ष, झाड़ी, शाक, ज़मीन) में बँटा है, मौसम के साथ बदलता है और सालों में अनुक्रमण से बदलता रहता है।
- पादपों में परिवहन: जाइलम, फ्लोएम और वाष्पोत्सर्जन – पौधों में दो नली तंत्र होते हैं। जाइलम पानी और खनिज जड़ों से पत्तियों तक ऊपर ले जाता है, मुख्यतः वाष्पोत्सर्जन (पत्तियों से जलवाष्प का निकलना) के खिंचाव से, और थोड़ा मूल दाब के धक्के से। फ्लोएम पत्तियों में बना भोजन हर भाग तक, ऊपर या नीचे, ATP की ऊर्जा से पहुँचाता है। इसे स्थानांतरण कहते हैं।
- पारंपरिक खेल और मार्शल आर्ट – पारंपरिक खेल सरल चीज़ों और पीढ़ी-दर-पीढ़ी चले नियमों से खेले जाते हैं, जैसे लट्टू, कंचे, गिल्ली-डंडा, रस्साकशी, कबड्डी और खो-खो। ये संस्कृति को ज़िंदा रखते हैं और फिटनेस व खेल-भावना बनाते हैं। मार्शल आर्ट और युद्ध-खेल (जूडो, ताइक्वांडो, कराटे, कुश्ती, कलारीपयट्टु, मुक्केबाज़ी) आत्म-नियंत्रण, सम्मान और तकनीक सिखाते हैं। हर युद्ध-खेल की नींव एक जैसी है: सम्मान का नमन, स्थिर स्टांस (गुरुत्व केंद्र चौड़े आधार के ऊपर), सुरक्षित गिरना, साफ नियम और सुरक्षा उपकरण।
- पारितंत्र गहराई से: बायोम, पोषक चक्र और गड़बड़ी – बायोम बड़े क्षेत्र हैं जिनकी जलवायु और जीवन मिलते-जुलते हैं। ज़मीन पर तापमान और वर्षा बायोम तय करते हैं; पानी में खारापन, गहराई, रोशनी और बहाव क्षेत्र तय करते हैं। पदार्थ पारितंत्र में घूमता है: नाइट्रोजन स्थिरीकरण, नाइट्रीकरण, स्वांगीकरण, अमोनीकरण और विनाइट्रीकरण से हवा, मिट्टी, जीवों के बीच घूमकर लौटती है; फ़ॉस्फ़ोरस चट्टान, मिट्टी, पानी, जीव और तलछट के बीच धीरे घूमता है, बिना गैस चरण के। अपघटक ऑक्सीजन के साथ (वायवीय) या बिना (अवायवीय) पदार्थ लौटाते हैं। उर्वरक बहाव, आवास-नाश, आक्रामक प्रजातियाँ और जलवायु परिवर्तन इन तंत्रों को बिगाड़ते हैं; पारितंत्र प्रतिरोध और लचीलेपन से जवाब देते हैं।
- पारितंत्र में सूचना संचरण – पारितंत्र के जीव एक-दूसरे को लगातार संदेश भेजते हैं। संदेश तीन तरह के होते हैं। भौतिक सूचना में ध्वनि, प्रकाश और रंग काम आते हैं। रासायनिक सूचना में गंध और फेरोमोन जैसे पदार्थ काम आते हैं। व्यवहार सूचना में नृत्य और हाव-भाव जैसी क्रियाएँ आती हैं। इनसे जीव भोजन और साथी ढूँढते हैं, खतरे की चेतावनी देते हैं और आबादी संतुलित रहती है। ऊर्जा के उलट, सूचना दोनों दिशाओं में जा सकती है।
- पारितंत्र सेवाएँ: प्रकृति का मुफ़्त काम – पारितंत्र सेवाएँ वे लाभ हैं जो मनुष्य को प्रकृति से मिलते हैं। ये चार प्रकार की होती हैं। प्रावधान सेवाएँ वे चीज़ें देती हैं जो हम लेते हैं (भोजन, पानी, लकड़ी)। नियमन सेवाएँ परिस्थितियाँ संभालती हैं (साफ़ हवा-पानी, बाढ़ नियंत्रण, परागण, जलवायु)। सहायक सेवाएँ आधार का काम करती हैं (मिट्टी बनना, पोषक चक्र, प्रकाश संश्लेषण)। सांस्कृतिक सेवाएँ सुंदरता, मनोरंजन, शिक्षा और आध्यात्मिक अर्थ देती हैं। इन सेवाओं का असली मूल्य है: पारितंत्र बिगड़ने पर इन्हें बदलने के लिए बाँध, फ़िल्टर, खाद या हाथ से परागण पर खर्च करना पड़ता है, और कई बार पूरी तरह बदला नहीं जा सकता। सुरक्षा करना अक्सर नुकसान सुधारने से सस्ता होता है।
- पारितंत्र, आहार श्रृंखला और ऊर्जा प्रवाह – किसी जगह के सभी जीव और उनके आस-पास की निर्जीव चीज़ें मिलकर पारितंत्र बनाते हैं। ऊर्जा सूर्य से आती है, आहार श्रृंखला में एक ही दिशा में ऊपर जाती है, और हर अगले स्तर तक सिर्फ़ लगभग 10% पहुँचती है।
- पारितंत्र: संरचना, उत्पादकता, ऊर्जा प्रवाह और पिरामिड – पारितंत्र प्रकृति की एक कार्यशील इकाई है जहाँ जैविक (जीवित) और अजैविक (निर्जीव) घटक आपस में मिलकर काम करते हैं। पौधे जिस दर से भोजन बनाते हैं वह उत्पादकता है: सकल (GPP) में से श्वसन घटाओ तो शुद्ध (NPP = GPP − R)। मृत पदार्थ पाँच चरणों में टूटता है: खंडन, निक्षालन, अपचय, ह्यूमीकरण और खनिजीकरण। ऊर्जा धूप से आती है, पोषी स्तरों में एक ही दिशा में बहती है और हर बार लगभग 10% ही आगे जाती है। संख्या और जीवभार के पिरामिड उल्टे हो सकते हैं, पर ऊर्जा का पिरामिड हमेशा सीधा होता है।
- पारिस्थितिक अन्वेषण की विधियाँ – आवास का अध्ययन करने के लिए हम उसकी जगह (बायोटोप: तापमान, नमी, वर्षा) नापते हैं, प्रजातियों की सूची बनाते हैं और क्वाड्रेट में गिनती करते हैं। बारंबारता = प्रजाति वाले क्वाड्रेट ÷ कुल क्वाड्रेट × 100; बहुलता = जीव ÷ क्वाड्रेट; प्रभाविता = उसके जीव ÷ सभी जीव × 100। सुरक्षा सबसे पहले।
- पारिस्थितिक अभियांत्रिकी – पारिस्थितिक अभियांत्रिकी का मतलब है इंसानी गतिविधियों को ऐसे बनाना कि वे प्रकृति के पारितंत्रों के साथ मिलकर चलें, उनके खिलाफ़ नहीं। इसके मुख्य सिद्धांत हैं: प्रकृति की खुद को साफ़ और संतुलित करने की ताकत का उपयोग, कचरे का पुनर्चक्रण ताकि कुछ बेकार न जाए, कई तरह के जीवों को साथ रखना, और इंसान की ज़रूरतों व पारितंत्र की सेहत में संतुलन। उदाहरण हैं शहतूत-बाँध मछली तालाब, गंदा पानी साफ़ करने वाली बनावटी आर्द्रभूमि, अपशिष्ट जल के मछली तालाब और मैंग्रोव का दोबारा रोपण।
- पारिस्थितिक असंतुलन – जब किसी पारितंत्र में जीवों की संख्या स्थिर रहती है तो वह संतुलित होता है। प्राकृतिक घटनाओं या मानव के कामों, जैसे वनों की कटाई, प्रदूषण, अति-शिकार और बाहरी प्रजातियों से यह संतुलन टूटता है। इसका असर खाद्य शृंखला और मनुष्य पर पड़ता है। आवास की रक्षा, क़ानून और सतत उपयोग से इसे रोका जा सकता है।
- पारिस्थितिक निकेत – हर जीव एक आवास (उसका पता) में रहता है और उसका एक निकेत होता है (उसकी भूमिका: क्या खाता है, कहाँ और कब सक्रिय है, दूसरों पर क्या असर डालता है)। उसके जीवन पर अजैविक कारक (तापमान, प्रकाश, पानी, pH) और जैविक कारक (भोजन, शिकारी, प्रतिस्पर्धी) असर डालते हैं। हर कारक के लिए उसकी एक सहनशीलता सीमा होती है, जिसके बीच में इष्टतम होता है। संभावित (मौलिक) निकेत वह सब है जो वह इस्तेमाल कर सकता है; वास्तविक निकेत वह छोटा हिस्सा है जो प्रतिस्पर्धियों और शिकारियों के रहते वह सच में इस्तेमाल करता है। दो जातियों के निकेत पूरे मेल खाएँ तो एक दूसरी को बाहर कर देती है (प्रतिस्पर्धी अपवर्जन); आंशिक मेल वाली जातियाँ संसाधन बाँटकर साथ रह सकती हैं। संकरी सहनशीलता वाली जातियाँ जैव-सूचक का काम करती हैं।
- पारिस्थितिक सुरक्षा: आक्रामक प्रजातियाँ और प्रकृति की रक्षा – पारिस्थितिक सुरक्षा का मतलब है पारितंत्रों को स्वस्थ रखना ताकि वे हमें साफ़ पानी, भोजन और हवा देते रहें। आक्रामक प्रजातियाँ, जो दूसरी जगह से आकर तेज़ी से फैलती हैं क्योंकि उनके प्राकृतिक शत्रु नहीं होते, बड़ा खतरा हैं। हम प्रकृति को उसके घर में (आरक्षित क्षेत्र, उद्यान: स्व-स्थाने), घर से दूर (बीज बैंक, चिड़ियाघर: बाह्य-स्थाने) और शिकार व व्यापार के खिलाफ़ कानूनों से बचाते हैं।
- पारिस्थितिकी की बुनियाद: पारिस्थितिक कारक – पारिस्थितिकी यह पढ़ती है कि जीव और उनका परिवेश एक-दूसरे पर कैसे असर डालते हैं। यह असर पारिस्थितिक कारकों से होता है: अजैविक (निर्जीव), जैविक (सजीव) और मानवजनित। हर जीव हर कारक की एक सीमा में ही जी पाता है (सहनशीलता का नियम), और वृद्धि सबसे कम मिलने वाले कारक से रुकती है (न्यूनतम का नियम)। संकरी सीमा वाले जीव स्टेनो, चौड़ी सीमा वाले यूरी कहलाते हैं।
- पारिस्थितिकी: पारितंत्र, पदार्थ के चक्र, ऊर्जा स्रोत और नए पदार्थ – पारिस्थितिकी (Ecology) यह अध्ययन है कि जीव आपस में और अपने परिवेश के साथ कैसे जुड़े हैं। पारितंत्र में उत्पादक (धूप से भोजन बनाने वाले पौधे), उपभोक्ता (जंतु) और अपघटक (कवक और जीवाणु) होते हैं। ऊर्जा सूर्य से आती है और खाद्य शृंखला में एक ही दिशा में चलती है: अगले स्तर तक केवल लगभग 10% पहुँचती है, बाक़ी काम में आती है या ऊष्मा बनकर खो जाती है। पदार्थ इसके उलट जैव-भू-रासायनिक चक्रों में दोबारा इस्तेमाल होता है, जैसे कार्बन, जल, नाइट्रोजन और फ़ॉस्फ़ोरस चक्र। मनुष्य को ऊर्जा चाहिए, और मुख्य चुनाव जीवाश्म ईंधन (सीमित, कार्बन डाइऑक्साइड बढ़ाते हैं) और सूर्य, पवन, बहते जल जैसे नवीकरणीय स्रोतों के बीच है। संयोजन, स्मार्ट पदार्थ, नैनो-पदार्थ और पौध-आधारित प्लास्टिक जैसे नए पदार्थ किसी काम के लिए बनाए जाते हैं और ऊर्जा व कचरा घटा सकते हैं।
- पालन तकनीकें, प्रबंधन और मूल्यांकन – अच्छे पालन में बढ़त को लक्ष्य से मिलाया जाता है, आहार-रूपांतरण नापा जाता है, सही प्रोटीन वाला आहार दिया जाता है, बाड़े का तापमान आरामदायक रखा जाता है, और सबसे अच्छे पशुओं के गुण फैलाने के लिए कृत्रिम गर्भाधान और भ्रूण-प्रत्यारोपण जैसी तकनीकें अपनाई जाती हैं।
- पीई में स्वच्छता और सुरक्षा – खेलने से पसीना आता है और हम साझा उपकरण छूते हैं, इसलिए पाँच आदतें चाहिए: साफ़, हल्के खेल-कपड़े पहनो; पकड़ वाले जूते पहनो; उपकरण इस्तेमाल से पहले जाँचो; खेल के बाद हाथ और शरीर धोओ; और पानी पियो। हर आदत एक ख़तरा हटाती है: बदबू, त्वचा की दिक़्क़त, फिसलना, चोट, कीटाणु या थकावट।
- पुष्पी पादपों का शारीर – शारीर (एनाटॉमी) का मतलब है पौधे की अंदरूनी बनावट, जो पतली काट (सेक्शन) काटकर देखी जाती है। कोशिकाएँ मिलकर ऊतक बनाती हैं और ऊतक तीन ऊतक तंत्र: बाह्यत्वचीय (त्वचा), भरण (भराव) और संवहनी (जाइलम-फ्लोएम की नलियाँ)। द्विबीजपत्री और एकबीजपत्री की जड़, तने और पत्ती में ये तंत्र अलग ढंग से सजे होते हैं।
- पुष्पी पादपों की आकारिकी – आकारिकी का मतलब है पौधे का बाहरी रूप। फूल वाले पौधे के दो भाग हैं: मिट्टी के नीचे मूल तंत्र (जड़ें) और ऊपर प्ररोह तंत्र (तना, पत्ती, फूल, फल)। हर भाग का एक सामान्य रूप होता है और खास काम के लिए बदला हुआ रूप (रूपांतरण) भी। फूल को पुष्प सूत्र से लिखते हैं; सोलेनेसी (आलू, बैंगन, टमाटर) हमारा उदाहरण कुल है।
- पुष्पी पादपों में लैंगिक जनन – फूल पौधे का जनन अंग है। पुंकेसर परागकण (नर युग्मकोद्भिद) बनाता है। बीजांड के अंदर भ्रूणकोष (मादा युग्मकोद्भिद) होता है, जिसमें 7 कोशिकाएँ और 8 केंद्रक होते हैं। परागण से परागकण वर्तिकाग्र तक पहुँचता है, स्त्रीकेसर उसकी जाँच करता है, और पराग नली दो नर युग्मक भ्रूणकोष तक लाती है। एक अंड से मिलकर युग्मनज (2n) बनाता है, दूसरा दो ध्रुवीय केंद्रकों से मिलकर प्राथमिक भ्रूणपोष केंद्रक (3n) बनाता है। यही दोहरा निषेचन है। बीजांड बीज बनता है और अंडाशय फल।
- पुष्पी पादपों में लैंगिक जनन – लैंगिक जनन में नर और मादा युग्मक मिलते हैं, जिससे दो जनकों का DNA मिलता है और विभिन्नता बढ़ती है। फूल में परागकोश का पराग वर्तिकाग्र पर पहुँचता है (परागण), परागनलिका बीजांड तक बढ़ती है और नर युग्मक अंडकोशिका से मिलता है (निषेचन)। युग्मनज भ्रूण बनता है, बीजांड बीज और अंडाशय फल।
- पुष्पी पौधों के कुल – एक जैसे फूल, फल और दूसरे लक्षणों वाले पुष्पी पौधे एक कुल में रखे जाते हैं। सरसों कुल: 4 पंखुड़ियाँ क्रॉस में, 6 पुंकेसर, फली। मटर कुल: तितली जैसा फूल, फली, जड़ की गाँठें। गुलाब कुल: 5 पंखुड़ियाँ, बहुत पुंकेसर। आलू कुल: जुड़ी पंखुड़ियाँ, बेरी। सूरजमुखी कुल: छोटे पुष्पकों का मुंड। लिली और घास कुल एकबीजपत्री हैं।
- पृष्ठीय क्षेत्रफल और आयतन का अनुपात – पृष्ठीय क्षेत्रफल (SA) बाहर का कुल क्षेत्रफल है, आयतन (V) अंदर की जगह। SA : V बताता है कि आयतन की हर इकाई के लिए कितनी सतह है। भुजा L वाले घन में SA = 6L², V = L³ और SA : V = 6 ÷ L, यानी आकार बढ़ने पर अनुपात घटता है। जीव ऑक्सीजन, भोजन, अपशिष्ट और गर्मी का लेन-देन सतह से करते हैं, जबकि ज़रूरत पूरे आयतन को होती है। छोटे जीवों में अनुपात बड़ा और विसरण दूरी कम, तो विसरण काफ़ी है। बड़े जीवों में अनुपात छोटा, इसलिए वे चपटा आकार, तहों वाली विनिमय सतहें (कूपिकाएँ, रसांकुर, गलफड़े, मूल रोम) और परिवहन तंत्र इस्तेमाल करते हैं। छोटे स्तनधारी जल्दी गर्मी खोते हैं और उन्हें प्रति ग्राम ऊँची उपापचय दर चाहिए।
- पेशी शरीर क्रिया: पेशियाँ कैसे सिकुड़ती हैं – कंकाल पेशी लंबी कोशिकाओं से बनी है जिन्हें पेशी तंतु कहते हैं। हर तंतु में सार्कोमियर नाम की छोटी इकाइयों की कतारें होती हैं। सार्कोमियर में पतले एक्टिन और मोटे मायोसिन तंतु एक दूसरे पर चढ़े रहते हैं। तंत्रिका संकेत आने पर कैल्शियम छूटता है, मायोसिन के सिर एक्टिन को पकड़कर बीच की ओर खींचते हैं और पेशी छोटी हो जाती है। हर खिंचाव में ATP लगता है। ATP आता है क्रिएटिन फॉस्फेट (कुछ सेकंड), किण्वन (लगभग दो मिनट तक, लैक्टेट बनता है) और वायवीय श्वसन (लंबी कसरत) से। ATP कम होने पर पेशी थकती है।
- पोषक चक्र: नाइट्रोजन और फॉस्फोरस बार-बार कैसे काम आते हैं – जीवों को नाइट्रोजन (अमीनो अम्ल, प्रोटीन, DNA और ATP के लिए) और फॉस्फोरस (DNA, ATP और फॉस्फोलिपिड के लिए) चाहिए। पृथ्वी पर इनकी मात्रा तय है, इसलिए ये बार-बार घूमते हैं। मृतजीवी (अपघटक कवक और जीवाणु) मृत पदार्थ को कोशिका के बाहर पचाकर खनिज आयन छोड़ते हैं। नाइट्रोजन चक्र में स्थिरीकरण N₂ गैस को अमोनियम बनाता है, अमोनीकरण मृत पदार्थ से अमोनियम छोड़ता है, नाइट्रीकरण अमोनियम को पहले नाइट्राइट फिर नाइट्रेट बनाता है (ऑक्सीजन चाहिए), और विनाइट्रीकरण नाइट्रेट को फिर N₂ बना देता है (ऑक्सीजन नहीं)। फॉस्फोरस चक्र में गैस अवस्था नहीं है: फॉस्फेट घिसी चट्टान से आता है, भोजन-शृंखला से गुज़रता है, अपघटकों से लौटता है, और बहुत लंबे समय में तलछट व नई चट्टान बनता है। माइकोराइज़ा कवक अतिरिक्त जड़ों की तरह पानी और फॉस्फेट सोखने में मदद करते हैं। खाद फ़सल कटने से खोए आयन लौटाती है, पर ज़्यादा खाद मिट्टी से बह सकती है (निक्षालन) और सुपोषण कर सकती है, जिससे पानी की ऑक्सीजन घटकर मछलियाँ मरती हैं।
- पोषण (Nutrition) – पोषण वह तरीक़ा है जिससे हम भोजन के पदार्थ पाते और इस्तेमाल करते हैं। शरीर को छह तरह के पोषक तत्व चाहिए: कार्बोहाइड्रेट और वसा (मुख्य रूप से ऊर्जा), प्रोटीन (वृद्धि और मरम्मत), विटामिन और खनिज (थोड़ी मात्रा, शरीर को सही चलाने के लिए), और पानी; साथ में पाचन के लिए रेशा। कार्बोहाइड्रेट और प्रोटीन लगभग 17 kJ प्रति ग्राम, वसा लगभग 37 kJ प्रति ग्राम देते हैं। संतुलित आहार सब पोषक तत्व सही मात्रा में देता है, और अंदर आई ऊर्जा लगभग ख़र्च ऊर्जा के बराबर होनी चाहिए।
- पोस्चर (शारीरिक मुद्रा) और शारीरिक विकास – पोस्चर यानी खड़े होते, बैठते या चलते समय शरीर को रखने का तरीका। सही खड़े पोस्चर में कान, कंधा, कूल्हा, घुटना और टखना एक ही सीधी खड़ी रेखा (गुरुत्व रेखा) पर होते हैं। रीढ़ में तीन हल्के मोड़ होते हैं (गर्दन, ऊपरी पीठ, निचली पीठ) जो नरम S बनाते हैं और स्प्रिंग की तरह झटके सहते हैं। आम दोष हैं: गोल पीठ (कुब्जता/kyphosis), धँसी कमर (lordosis), सपाट पीठ, बगल का मोड़ (scoliosis) और आगे झुका सिर (टेक्स्ट नेक)। हल्के दोष स्ट्रेचिंग, मज़बूती, एरोबिक और हल्के प्रतिरोध वाले व्यायाम, अच्छी आदतों और विकास (लंबाई, भार, BMI) व शरीर के कार्यों (नाड़ी, साँस, रक्तचाप, रिकवरी) की नियमित जाँच से रोके और सुधारे जा सकते हैं।
- पौधे और मनुष्य: पौधों का विकास और उनकी रक्षा – पौधों की शुरुआत पानी में रहने वाले शैवाल से हुई। बहुत लंबे समय में वे ज़मीन पर आए: पहले छोटा मॉस, फिर नलियों वाले फर्न, फिर शंकुधारी जैसे बीज वाले पौधे और अंत में फल-फूल वाले पौधे। हर कदम पर ज़मीन पर जीने का एक नया औज़ार मिला। मनुष्य भोजन, लकड़ी, दवाइयों, कपड़ों और हवा की ऑक्सीजन के लिए पौधों पर निर्भर है। जंगल कटना, आग, प्रदूषण और ज़्यादा दोहन पौधों को खतरे में डालते हैं। हम उन्हें अभयारण्यों, नए वृक्षारोपण, बीज बैंकों और समझदारी से उपयोग द्वारा बचाते हैं।
- पौधे की संरचना और कार्य – पौधे के हर भाग का एक काम है। जड़ें पानी लेती हैं, तना उसे ऊपर पहुँचाता है और पत्ती प्रकाश, पानी और कार्बन डाइऑक्साइड से प्रकाश संश्लेषण द्वारा भोजन बनाती है। पौधे की सभी जीवित कोशिकाएँ दिन-रात श्वसन करके शर्करा से ऊर्जा निकालती हैं। पानी रंध्र नाम के छोटे द्वारों से वाष्प बनकर निकलता है, इसे वाष्पोत्सर्जन कहते हैं, और यह तने में पानी को ऊपर खींचता है। एक ही रंध्र तीनों कामों को नियंत्रित करता है।
- पौधे की संरचना और पादप जैव-प्रौद्योगिकी के मूल कार्य – पादप जैव-प्रौद्योगिकी में दो बातें सबसे पहले आती हैं। पहली, पौधे को जानना: जड़ पानी और खनिज लेती है, तना उन्हें ऊपर ले जाता है, पत्तियाँ भोजन बनाती हैं, और लगभग हर जीवित कोशिका में पूरे पौधे के जीन होते हैं, इसलिए एक कोशिका से पूरा पौधा बन सकता है। दूसरी, हर चीज़ कीटाणु-रहित रखना (एसेप्टिक तकनीक): हाथ और मेज़ साफ़, औज़ार लौ या अल्कोहल से जीवाणुरहित, साफ़ हवा में तेज़ काम और ढक्कन बंद। कीटाणु पौधे के टुकड़े से तेज़ बढ़ते हैं और जार ख़राब कर देते हैं।
- पौधों और जानवरों के उपयोग का अभ्यास: भलाई के लिए – पौधे और जानवर मूड सुधार सकते हैं, मन शांत कर सकते हैं और लोगों को जोड़ सकते हैं। अच्छे अभ्यास के चार कदम हैं: व्यक्ति को समझो, सुरक्षित गतिविधि की योजना बनाओ, ध्यान से करो और बदलाव जाँचो। मज़े और आदान-प्रदान की गतिविधि उपचार से अलग है, जिसे प्रशिक्षित लोग सेहत के लक्ष्य के लिए चलाते हैं।
- पौधों में समन्वय: अनुवर्तन गतियाँ और पादप हॉर्मोन – पौधों में न तंत्रिका है न पेशी, फिर भी वे प्रतिक्रिया करते हैं। कुछ प्रतिक्रियाएँ तुरंत होती हैं और वृद्धि से नहीं जुड़ीं (छुईमुई की पत्तियाँ पानी हटने से मुड़ती हैं)। कुछ धीमी, दिशा वाली वृद्धि गतियाँ हैं जिन्हें अनुवर्तन कहते हैं, और इन्हें ऑक्सिन, जिबरेलिन, साइटोकाइनिन और एब्सिसिक अम्ल जैसे हॉर्मोन नियंत्रित करते हैं।
- प्रजनन-क्षमता और माता-पिता बनना – प्रजनन-क्षमता यानी गर्भधारण शुरू कर पाने की क्षमता। यह उम्र, स्वास्थ्य, जीवनशैली और संक्रमणों पर निर्भर है। अगर जोड़ा लगभग एक साल कोशिश करके गर्भधारण न कर पाए, तो डॉक्टर कारण ढूँढ सकते हैं, जो महिला में, पुरुष में, दोनों में या अज्ञात हो सकता है, और इलाज बता सकते हैं। गर्भावस्था लगभग नौ महीने चलती है और नियमित जाँच माँगती है। जन्म के बाद शिशु को माँ का दूध, टीके और प्यार भरी देखभाल चाहिए, और माता-पिता को भी देखभाल और अधिकार।
- प्रजनन: इंसान ने फ़सलें और पशु कैसे सुधारे – प्रजनन का मतलब है यह चुनना कि कौन से पौधे या पशु संतान पैदा करें, ताकि काम के गुण पीढ़ी-दर-पीढ़ी मज़बूत हों। इसकी शुरुआत पालतूकरण से हुई। चयन, संकरण और उत्परिवर्तन इसके तरीके हैं। वाविलोव ने बताया कि हर फ़सल का एक उत्पत्ति केंद्र होता है जहाँ सबसे ज़्यादा किस्में मिलती हैं।
- प्रतिरक्षा तंत्र: शरीर रोगाणुओं से कैसे लड़ता है – रोगाणु (रोगजनक) संक्रामक रोग करते हैं। शरीर में रक्षा की तीन पंक्तियाँ हैं: अवरोध (त्वचा, श्लेष्मा, अम्ल), तेज़ सामान्य (सहज) प्रतिरक्षा (सूजन, बुखार, भक्षक कोशिकाएँ) और धीमी पर विशिष्ट (उपार्जित) प्रतिरक्षा (B कोशिकाएँ एंटीबॉडी बनाती हैं, T कोशिकाएँ संक्रमित कोशिकाएँ मारती हैं)। स्मृति कोशिकाएँ दूसरे हमले को जल्दी रोकती हैं। टीका सुरक्षित रूप से स्मृति बनाता है। गड़बड़ी: एलर्जी, स्व-प्रतिरक्षी रोग, प्रतिरक्षा की कमी (जैसे HIV)।
- प्रतिवर्त, सीखना, प्रेरणा और आवश्यकताएँ – प्रतिवर्त एक तेज़, अपने-आप होने वाली, जन्मजात क्रिया है जो मस्तिष्क का इंतज़ार किए बिना मेरुरज्जु से होकर प्रतिवर्त चाप में चलती है। जब कोई सामान्य संकेत बार-बार असली संकेत के साथ जोड़ा जाए तो अनुबंधित प्रतिवर्त सीखा जाता है। प्रेरणा काम करने की भीतरी शक्ति है, जो आवश्यकताओं से बनती है: पहले शरीर की ज़रूरतें, फिर सुरक्षा, अपनापन और आगे बढ़ना।
- प्रदूषित हवा और सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल – वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) हवा में महीन धूल (PM2.5, PM10) और गैसों की मात्रा को एक संख्या में बदल देता है: संख्या जितनी बड़ी, हवा उतनी गंदी। कसरत में आप कई गुना ज़्यादा हवा लेते हैं, इसलिए प्रदूषित दिनों में कई गुना ज़्यादा धूल भी साँस में जाती है। ख़राब हवा के दिनों में AQI देखिए, कसरत घर के अंदर कीजिए, उसे हल्का और छोटा रखिए, भीड़ वाली सड़कों से बचिए, और बाहर जाना ही पड़े तो ठीक से फिट होने वाला N95 या FFP2 मास्क पहनिए। सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल वह अचानक प्रकोप है जो बहुत लोगों को बीमार कर सकता है। संक्रमण एक श्रृंखला में फैलता है: स्रोत, फैलने का रास्ता और नया व्यक्ति। हाथ धोना, साफ़ पानी, मास्क, बीमार को अलग रखना और टीके इस श्रृंखला को तोड़ते हैं। स्वास्थ्यकर्मी मामलों को पहचानकर बताते हैं, जाँच और संपर्क-खोज करते हैं, सही जानकारी देते हैं, अलग करते, इलाज और टीका लगाते हैं, फिर समीक्षा करते हैं। आप स्वास्थ्य सलाह मानकर, बीमार होने पर घर रहकर और अफ़वाहें न फैलाकर मदद करते हैं।
- प्ररोह, कली और तना – प्ररोह (शूट) तना, पत्तियाँ और कलियाँ मिलकर बनता है। पत्तियाँ तने पर जिस जगह जुड़ती हैं, वह पर्व-संधि (नोड) है और दो नोड के बीच की दूरी पर्व (इंटरनोड)। शीर्ष कली तने को लंबा करती है और कक्षीय कली शाखा बनाती है। तने के अंदर जाइलम पानी और खनिज ऊपर ले जाता है, फ्लोएम शर्करा नीचे। कटे तने, जड़ या पत्ती से भी नया पौधा उग सकता है। इसे वानस्पतिक प्रवर्धन कहते हैं।
- प्रसवकालीन नर्सिंग (Perinatal Nursing) – प्रसवकाल-समीप अवधि गर्भ के लगभग 22वें सप्ताह से जन्म के 7 दिन बाद तक चलती है। सामान्य क्रम में नर्स नियमित जाँच करती है, प्रसव में सहारा देती है और माँ व शिशु की देखभाल त्वचा से त्वचा के स्पर्श और जल्दी दूध पिलाने से करती है। जब ज़्यादा ख़ून बहना या ऊँचा रक्तचाप जैसे चेतावनी के संकेत दिखें, नर्स तुरंत कदम उठाती है और डॉक्टर को बुलाती है।
- प्राणि जगत – जंतुओं को शरीर की बनावट से जुड़े कुछ सवालों से बाँटते हैं: संगठन का स्तर, सममिति, जनन स्तर (भ्रूणीय परतें), देहगुहा (प्रगुहा), खंडीभवन और पृष्ठरज्जु। इनसे 11 मुख्य संघ बनते हैं: पोरीफ़ेरा, सीलेंटरेटा, टीनोफ़ोरा, प्लेटीहेल्मिंथीज़, ऐस्केल्मिंथीज़, ऐनेलिडा, आर्थ्रोपोडा, मोलस्का, इकाइनोडर्मेटा, हेमीकॉर्डेटा और कॉर्डेटा। रज्जुकी में किसी न किसी अवस्था में पृष्ठरज्जु, पीठ की ओर खोखली तंत्रिका रज्जु और क्लोम छिद्र होते हैं; इनमें कशेरुकी सात वर्गों में हैं, जबड़ा-रहित मछली से स्तनधारी तक।
- प्राणि विज्ञान: जानवरों का अध्ययन – प्राणि विज्ञान (zoology) जीव विज्ञान की वह शाखा है जो जंतुओं का अध्ययन करती है: वे कैसे दिखते, रहते, बढ़ते और व्यवहार करते हैं और आपस में कैसे जुड़े हैं। इसकी शुरुआत जानवरों को ध्यान से देखने से हुई, फिर नामकरण, सूक्ष्मदर्शी और विकास के विचार से यह आगे बढ़ा, और अब DNA व कैमरों का भी उपयोग होता है। प्राणि विज्ञानी देखते, नापते, लिखते, तुलना करते, समूह बनाते और विचारों को परखते हैं। यह इसलिए ज़रूरी है कि जानवर हमें भोजन देते हैं, दवा में मदद करते हैं, खेती में काम आते हैं और प्रकृति का संतुलन रखते हैं।
- प्राणियों में संरचनात्मक संगठन: मेंढक – प्राणियों में कोशिकाएँ मिलकर ऊतक, ऊतक मिलकर अंग और अंग मिलकर अंग तंत्र बनाते हैं। भारतीय मेंढक (राना टिग्रिना, अब हॉप्लोबैट्रेकस टाइगरिनस) इसका अच्छा उदाहरण है: शरीर में सिर और धड़, और अंदर पाचन, श्वसन, परिसंचरण, तंत्रिका, उत्सर्जन, अंतःस्रावी और जनन तंत्र। यह त्वचा और फेफड़े दोनों से साँस लेता है, इसका हृदय 3 कोष्ठ का है और यह पानी में अंडे देता है।
- प्राथमिक चिकित्सा: आपात स्थिति में क्या करें – प्राथमिक चिकित्सा वह मदद है जो प्रशिक्षित मदद आने तक घायल या बीमार व्यक्ति को दी जाती है। लक्ष्य: जान बचाना, हालत बिगड़ने से रोकना, ठीक होने में मदद। DRABC अपनाएँ: ख़तरा, प्रतिक्रिया, श्वास मार्ग, साँस, CPR/कॉल। बेहोश पर साँस चल रही → करवट स्थिति। सामान्य साँस नहीं → CPR 30:2, प्रति मिनट 100-120 दबाव, 5-6 सेमी गहरा, और AED। ख़ून → सीधा दबाव। जलना → 20 मिनट बहता पानी। गला अटकना → पीठ थपकी और पेट धक्के। मोच → RICE।
- प्रोजेक्ट: जानवर पालने का उपकरण बनाएँ – रेशमकीट या मछली जैसे छोटे जानवर को पालने के लिए ऐसा घर बनाते हैं जिसमें हवा, सुरक्षित दीवारें, सही तापमान, साफ़ पानी या जगह और सही भोजन हो। फिर हर एक-दो दिन में उसकी वृद्धि नापकर लिखते हैं और एक बार में एक स्थिति बदलकर जानते हैं कि उसे क्या चाहिए।
- प्रोजेक्ट: पौधे की कलम या ग्राफ्टिंग – कलम तने, जड़ या पत्ती का वह टुकड़ा है जो नया पौधा बन जाता है। ग्राफ्ट में एक पौधे का टुकड़ा (वंशज) दूसरे पौधे के जड़ वाले भाग (मूलवृंत) पर जोड़ा जाता है। दोनों बीज के बिना पैतृक पौधे की प्रति बनाते हैं। स्वस्थ सामग्री चुनिए, साफ़ काटिए, सही पत्तियाँ रखिए, ग्राफ्ट में कैम्बियम मिलाइए और लिखिए कि कितने जीवित रहे और क्यों।
- प्रोजेक्ट: बंद पारिस्थितिक बोतल – बंद पारिस्थितिक बोतल एक छोटा बंद पारितंत्र है। पौधे रोशनी से भोजन और ऑक्सीजन बनाते हैं। जंतु ऑक्सीजन और भोजन लेते हैं और कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ते हैं। मिट्टी के सूक्ष्मजीव कचरा दोबारा उपयोगी बनाते हैं। सिर्फ़ रोशनी भीतर आती है। पौधे, जंतु और रोशनी संतुलित हों तो बोतल हफ़्तों या महीनों तक जीवित रह सकती है।
- प्रोजेक्ट: स्वास्थ्य जागरूकता प्रस्तुति – स्वास्थ्य जागरूकता प्रस्तुति दूसरों को स्वस्थ आदत सिखाती है। तीन चरणों में काम करें: एक साफ़ स्वास्थ्य विषय चुनें, भरोसेमंद स्रोतों से सच्चे तथ्य जुटाएँ, और उन्हें छोटे, साफ़ और रोचक ढंग से दर्शकों के सामने रखें। फिर देखें कि दर्शकों ने क्या सीखा।
- प्रोटिस्ट: एक कोशिका, असली केंद्रक – प्रोटिस्ट ज़्यादातर एक कोशिका वाले जीव हैं जिनकी कोशिका में असली केंद्रक होता है (यानी ये यूकैरियोट हैं)। जंतु जैसे प्रोटिस्ट (प्रोटोजोआ) जैसे अमीबा, पैरामीशियम भोजन पकड़ते हैं; पौधे जैसे यूग्लीना, डायटम रोशनी में भोजन बनाते हैं; कवक जैसे स्लाइम मोल्ड भोजन सोखते हैं। ये कूटपाद, पक्ष्माभ या कशाभ से चलते हैं, संकुचनशील रिक्तिका से पानी बाहर निकालते हैं, बँटकर बढ़ते हैं और बुरे समय में पुटी बनाते हैं। कुछ रोग फैलाते हैं: मलेरिया, जियार्डियासिस, टॉक्सोप्लाज़्मोसिस, ट्राइकोमोनिएसिस।
- प्रोटीन इंजीनियरिंग: बेहतर प्रोटीन बनाना – प्रोटीन अमीनो अम्लों की श्रृंखलाएँ हैं जो एक सटीक 3D आकार में मुड़ती हैं, और आकार तय करता है कि प्रोटीन क्या करेगा। प्राकृतिक प्रोटीन हमेशा इंसानों के काम के लिए ठीक नहीं होते: कोई एंज़ाइम गर्म होने पर काम बंद कर देता है, कोई हॉर्मोन धीरे असर करता है। प्रोटीन इंजीनियरिंग बदले हुए (या बिल्कुल नए) प्रोटीन डिज़ाइन करके बनाती है। प्रोटीन जीन के निर्देशों से बनते हैं, इसलिए यह उल्टी चलती है: पहले चाहा गया काम, फिर उस काम के लिए ज़रूरी संरचना, फिर अमीनो अम्ल क्रम, और आख़िर में उसे बनाने वाला DNA (जीन) बदलना या बनाना। बदला जीन जीवाणु या यीस्ट जैसी कोशिकाओं में डाला जाता है, जो परखने के लिए नया प्रोटीन बनाती हैं। दो मुख्य तरीक़े: तर्कसंगत डिज़ाइन (योजनाबद्ध बदलाव, जैसे स्थल-निर्देशित उत्परिवर्तन) और निर्देशित विकास (बहुत से बेतरतीब बदलाव, फिर चयन)। जेनेटिक इंजीनियरिंग मौजूदा जीन से प्राकृतिक प्रोटीन बनाती है; प्रोटीन इंजीनियरिंग ऐसे प्रोटीन बनाती है जो प्रकृति में नहीं हैं, इसलिए इसे दूसरी पीढ़ी की जेनेटिक इंजीनियरिंग भी कहते हैं।
- प्रोटीन संश्लेषण: जीन से प्रोटीन तक – जीन DNA का एक हिस्सा है जिसमें एक प्रोटीन बनाने की विधि लिखी होती है। अनुलेखन (transcription) में केंद्रक के अंदर जीन की नकल mRNA में बनती है; T की जगह U आता है। mRNA कोशिकाद्रव्य में राइबोसोम तक जाता है। स्थानांतरण (translation) में राइबोसोम mRNA को 3-3 क्षार (कोडॉन) करके पढ़ता है। हर कोडॉन एक अमीनो अम्ल से मेल खाता है जिसे tRNA लाता है। अमीनो अम्ल जुड़कर श्रृंखला बनाते हैं, जो मुड़कर प्रोटीन बनती है। DNA में बदलाव (उत्परिवर्तन) से प्रोटीन बदल सकता है।
- प्लवक: समुद्र के नन्हे बहने वाले जीव – प्लवक छोटे जीव हैं जो पानी के साथ बहते हैं, क्योंकि वे धारा के विरुद्ध तैर नहीं सकते। पादप प्लवक पौधे जैसे हैं और रोशनी से भोजन बनाते हैं; जंतु प्लवक जानवर जैसे हैं और उन्हें खाते हैं। प्लवक ही लगभग सारे समुद्री जीवों का भोजन है और हमारी आधी ऑक्सीजन बनाते हैं।
- फल उत्पादन और प्रबंधन का अभ्यास: योजना-काम-जाँच-सुधार प्रोजेक्ट – फल का प्रायोगिक प्रोजेक्ट एक चक्र में चलता है: योजना (लक्ष्य, काम, तारीखें), काम (करना और रिकॉर्ड लिखना), जाँच (उपज की लक्ष्य से तुलना), सुधार (कारण ढूँढना और सुधार चुनना)। अगला मौसम बेहतर योजना से शुरू होता है। रिकॉर्ड और छोटी रिपोर्ट से सीख पक्की होती है।
- फल उत्पादन और प्रबंधन: लक्ष्य, खर्च और बिक्री – बाग़ एक छोटा कारोबार है। पहले उपज का लक्ष्य रखें, फिर पेड़ और उपज की योजना बनाएँ। आमदनी = उपज × दाम और मुनाफ़ा = आमदनी − खर्च। सालाना काम क्रम से होते हैं और दर्ज किए जाते हैं। बिक्री का रास्ता दाम बदलता है। घास की परत, मधुमक्खियाँ और कम छिड़काव जैसे तरीके ज़मीन बचाते हैं और खर्च घटा सकते हैं।
- फल उत्पादन और प्रोजेक्ट लर्निंग – फलदार पेड़ कई साल जीता है और साल भर का चक्र चलता है: सर्दी में आराम, वसंत में फूल, गर्मी में छोटे फल, पतझड़ में पके फल। प्रोजेक्ट लर्निंग यानी असली फल प्रोजेक्ट चलाकर सीखना: योजना, देखभाल, समीक्षा। एक पेड़ साल में एक ही फ़सल देता है, इसलिए रिकॉर्ड और धैर्य ज़रूरी हैं।
- फल उत्पादन की भूमिका और रुझान – फल की खेती से भोजन, विटामिन और आमदनी मिलती है। फल ताज़ा खाया जाता है या जूस, जैम और सुखाकर बनता है। यह बाग़ से घर तक वितरण की कड़ी से पहुँचता है। आपूर्ति माँग से ज़्यादा हो तो दाम गिरता है, कम हो तो दाम चढ़ता है।
- फलदार पेड़ों की खेती, प्रबंधन और मूल्यांकन – फलदार पेड़ कई साल चलते हैं, इसलिए किस्म और मूलवृंत सोच-समझकर चुनें, दूरी की योजना बनाएँ, हर साल छँटाई और फल पतला करें, फल को थैली या जाल से बचाएँ, आकार और मिठास से ग्रेड करें, और नुक़सान घटाने के लिए जाल व मशीनें लगाएँ।
- फलदार पौधे: प्रकार, वृद्धि, छँटाई और कलम बाँधना – फलदार पौधे पेड़, बेल या झाड़ी होते हैं। हर साल ये आराम, फूल, फल बढ़ना और पकना इन अवस्थाओं से गुज़रते हैं। मौसम (ठंड, गर्मी, रोशनी, पानी) और छँटाई वृद्धि को नियंत्रित करते हैं। नए पौधे प्रजनन (नई किस्म) और प्रवर्धन (कटिंग, दाब, कलम) से बनते हैं। कलम बाँधने में कलम (scion) को मूलवृंत (rootstock) से जोड़ते हैं।
- फसल उत्पादन और प्रबंधन – खेत भी एक छोटा कारोबार है। किसान उत्पादन का लक्ष्य और व्यापार योजना बनाता है, हर काम (बुवाई, सिंचाई, निराई, कटाई) समय पर सँभालता है, उपज अच्छे रास्ते से बेचता है और मुनाफ़ा = आमदनी − लागत निकालता है। खाद-कम्पोस्ट, फसल चक्र और कम रसायन जैसी पर्यावरण-हितैषी आदतें मिट्टी, पानी और मित्र कीटों को आगे के लिए बचाती हैं।
- फसल उत्पादन की भूमिका और रुझान – फसल उत्पादन से हमें भोजन, पशुओं का चारा, रेशा और ईंधन मिलता है। कटाई के बाद फसल खेत से बाज़ार और फिर घर तक पहुँचती है (वितरण)। आपूर्ति माँग से ज़्यादा हो तो दाम गिरता है, माँग ज़्यादा हो तो दाम चढ़ता है। इन रुझानों से किसान तय करते हैं कि क्या उगाएँ।
- फसल पौधे और पर्यावरण कारक – फसल का पौधा तभी अच्छा बढ़ता है जब आसपास की चीज़ें उसके अनुकूल हों: पर्याप्त रोशनी, पानी, हवा, गर्मी और मिट्टी का भोजन। सबसे कमज़ोर कारक सीमा तय करता है। कार्बन, पानी और पोषक तत्व पौधे, मिट्टी और हवा के बीच घूमते रहते हैं। किसान सिंचाई, मल्च, दूरी और छाया से वातावरण सुधारते हैं।
- फसल पौधों का उगाने का वातावरण – किसान फसल के उगने की जगह को ढालता है: हवा, पाले और गर्मी से बचाव; सही pH और बनावट वाली मिट्टी; सही मात्रा में खाद; सावधानी से कीट नियंत्रण; और ग्रीनहाउस में नियंत्रित जलवायु। हर फ़ैसला सबसे कमज़ोर कारक को ठीक करे, बिना लोगों या प्रकृति को नुकसान पहुँचाए।
- फसल प्रोजेक्ट लर्निंग: फसल प्रोजेक्ट की योजना और संचालन – प्रोजेक्ट अधिगम में छात्र या समूह एक असली सवाल को फसल शुरू से अंत तक उगाकर हल करता है। चरण हैं: सवाल चुनना, योजना बनाना, उगाना और लिखना, नतीजे (उपज, लागत, लाभ) जाँचना और दूसरों से साझा करना। इससे फसल विज्ञान, खेत प्रबंधन और टीमवर्क एक साथ सीखे जाते हैं।
- फसलों का पालतूकरण: जंगली पौधे से फसल तक – पालतूकरण (domestication) का मतलब है: लोगों ने हर बार सबसे अच्छे पौधों के बीज रखकर जंगली पौधों को धीरे-धीरे फसल बना दिया। चुने गए गुण: बीज पौधे पर टिके रहें, दाने बड़े हों, कड़वाहट कम हो, फसल साथ पके। इसकी कीमत है आनुवंशिक विविधता का घटना: एक किस्म वाले खेत को एक बीमारी पूरा नष्ट कर सकती है। संकरण दो पौधों के अच्छे गुण जोड़ता है, और आनुवंशिक इंजीनियरी एक जीन फसल में डाल देती है।
- फसलों की विशेषताएँ और खेती की तकनीकें – फसलों को अनाज, दलहन, तिलहन, जड़ वाली फसल, सब्ज़ी, फल और रेशा फसलों में बाँटा जाता है। पौधा बीज, अंकुर, फूल और फल के चरणों से गुज़रता है। प्रकाश संश्लेषण से भोजन बनता है और श्वसन से ऊर्जा मिलती है। तापमान, प्रकाश, पानी और पोषक तत्व वृद्धि तय करते हैं, और किसान उन्हें सँभालते हैं (ग्रीनहाउस, सिंचाई, छँटाई)। नई किस्में प्रजनन से बनती हैं और कलम से पौधे की हू-ब-हू नकल मिलती है।
- फिटनेस टेस्ट (Fitness Testing): फिटनेस के हर भाग को कैसे मापें – फिटनेस टेस्ट फिटनेस के एक घटक को मापकर एक संख्या देता है। हर घटक का अपना टेस्ट है: दम के लिए बीप टेस्ट, शक्ति के लिए हैंड ग्रिप, लचीलेपन के लिए सिट एंड रीच, गति के लिए 30 मी दौड़, फुर्ती के लिए इलिनॉय दौड़, विस्फोटक शक्ति के लिए कूद, संतुलन के लिए स्टॉर्क स्टैंड, प्रतिक्रिया के लिए रूलर ड्रॉप और शरीर संरचना के लिए BMI। अच्छा टेस्ट वैध और विश्वसनीय होता है। नतीजों की तुलना मानकों और अपने पिछले स्कोर से की जाती है।
- फ़ीनोलॉजी: फूल खिलने का बदलता समय – फ़ीनोलॉजी (ऋतु-जैविकी) यह अध्ययन है कि हर साल प्राकृतिक घटनाएँ कब होती हैं, जैसे पहला फूल, पत्ते झड़ना, चिड़ियों का आना। वैज्ञानिक हर साल तारीख़ लिखकर ग्राफ़ बनाते हैं। ग्राफ़ दिखाता है कि वसंत गर्म होने से कई पौधे जल्दी खिल रहे हैं, जिससे वे मधुमक्खियों और चिड़ियों से बेमेल हो सकते हैं।
- फ़ूड डिज़ाइन के तत्व: अच्छे भोजन की पाँच बातें – फ़ूड डिज़ाइन पूरे भोजन की योजना बनाता है ताकि वह सेहतमंद, स्वादिष्ट और सुंदर हो। इसके पाँच तत्व हैं: पोषण (सही पोषक तत्व), खाद्य सामग्री (ताज़ी, उपयुक्त चीज़ें), भोजन-शैली और व्यंजन-सूची (व्यंजन और उनका क्रम), पकाना (आँच, समय और विधि) और मेज़ की सजावट (चटाई, बर्तन, फूल और परोसना)। अच्छा फ़ूड डिज़ाइन पाँचों को जोड़ता है।
- फ़ूड पॉइज़निंग (खाद्य विषाक्तता) और उससे बचाव – फ़ूड पॉइज़निंग वह बीमारी है जो हानिकारक कीटाणु या ज़हर वाला खाना खाने से होती है। इसके चार मुख्य प्रकार हैं। जीवाणु (बैक्टीरिया) खाने पर बढ़ते हैं (साल्मोनेला, स्टैफ़ाइलोकोकस, ई. कोलाई, क्लॉस्ट्रिडियम)। विषाणु (वायरस) खाने पर नहीं बढ़ते, वे हाथों या पानी से आते हैं। रसायन (सफ़ाई का तरल, धातु, ज़्यादा कीटनाशक) बाहर से मिल जाते हैं। प्राकृतिक विष कुछ पौधों और मछलियों के अंदर ही होता है (ज़हरीले मशरूम, हरा आलू, पफ़र मछली)। हर प्रकार का अपना बचाव है: तापमान और समय पर नियंत्रण, हाथ धोना, रसायन दूर रखना और जो खा रहे हैं उसे पहचानना।
- फूल उत्पादन और प्रबंधन का अभ्यास – फूलों का प्रोजेक्ट करके सीखना है। इसे चक्र की तरह चलाइए: योजना (लक्ष्य और काम), करना (काम और रिकॉर्ड), जाँच (नतीजे की लक्ष्य से तुलना), सुधार (कमी ठीक करना), फिर दोहराना और साझा करना। हर दौर में नतीजा बेहतर होना चाहिए।
- फूल उत्पादन की भूमिका और रुझान – फूल त्योहार, उपहार, घर की सजावट, इत्र और खाने में काम आते हैं। वे खेत से बाज़ार तक एक आपूर्ति श्रृंखला से पहुँचते हैं। फूल कम हों और खरीदार ज़्यादा, तो दाम बढ़ता है। आज ग्रीनहाउस और कोल्ड स्टोरेज से पूरे साल फूल मिलते हैं।
- फूल और प्रोजेक्ट लर्निंग: उगाओ, परखो, सुधारो – प्रोजेक्ट लर्निंग यानी करके सीखना: असली समस्या को हल करना। फूल उगाने में कदम हैं: समस्या ढूँढना, लक्ष्य और अनुमान, निष्पक्ष परीक्षण की योजना, काम, नापकर जाँच और प्रस्तुति। निष्पक्ष परीक्षण में सिर्फ़ एक चीज़ बदलते हैं, जैसे धूप के घंटे, और मिट्टी, पानी, गमला वही रखते हैं।
- फूल वाला पौधा कैसे काम करता है – फूल वाला पौधा चल नहीं सकता, इसलिए उसका शरीर इकट्ठा करने के लिए बना है: लाखों बालों वाली जड़ें मिट्टी से पानी और खनिज लेती हैं, चौड़ी पत्तियाँ कार्बन डाइऑक्साइड और रोशनी लेती हैं। जाइलम कच्चा रस (पानी + खनिज) ऊपर ले जाता है, पत्तियों से भाप उड़ने का खिंचाव इसे चलाता है। फ्लोएम तैयार रस (चीनी) पत्तियों से जड़, फल और कलियों तक ले जाता है। हार्मोन बढ़वार चलाते हैं, रक्षा के तरीक़े पौधे को बचाते हैं, और जगह के हिसाब से उसकी बनावट बदलती है।
- फूल वाले पौधे (आवृतबीजी) – आवृतबीजी वे पौधे हैं जिनमें फूल आते हैं और बीज फल के अंदर बनते हैं। इनके दो समूह हैं। द्विबीजपत्री में 2 बीजपत्र, मूसला जड़, जालीदार नसों वाली पत्ती और 4 या 5 के गुणज में पंखुड़ियाँ होती हैं। एकबीजपत्री में 1 बीजपत्र, रेशेदार जड़, समानांतर नसें और 3 के गुणज में पंखुड़ियाँ होती हैं।
- फूलों की खेती, प्रबंधन और मूल्यांकन – फूल उगाने वाले उत्पाद (गमले का पौधा या कट-फ़्लावर) के हिसाब से किस्म चुनते हैं, बिक्री के दिन फूल खिलें इस हिसाब से बुवाई करते हैं, पिंचिंग और कली तोड़कर पौधे को आकार देते हैं, कटे डंठल को ठंडा और गीला रखकर फूल की उम्र बढ़ाते हैं, और गरमी रोकने के लिए शेड नेट और ग्रीनहाउस लगाते हैं।
- फूलों की विशेषताएँ और खेती की तकनीकें – फूल वाले पौधे एकवर्षीय, बहुवर्षीय या कंद वाले होते हैं। वे बीज से फूल तक चरणों में बढ़ते हैं। दिन की लंबाई और तापमान कई पौधों को बताते हैं कि कब खिलना है, इसलिए किसान ग्रीनहाउस में इन्हें काबू करते हैं। नए पौधे बीज, कलम या कंद बाँटकर बनते हैं और नई किस्में प्रजनन से।
- बचपन के हर चरण की स्वास्थ्य समस्याएँ और नर्सिंग – बचपन के चार चरण हैं और हर चरण की अपनी मुख्य स्वास्थ्य समस्याएँ हैं। नवजात और शिशु को दूध, गर्माहट, सुरक्षित नींद और टीके चाहिए। प्रारंभिक बचपन दुर्घटनाओं और संक्रमणों की उम्र है। स्कूल की उम्र में दाँत, आँखें, वज़न और सड़क की सुरक्षा मायने रखती है। किशोरावस्था में तेज़ बढ़त, आयरन की ज़रूरत और मन के बदलाव आते हैं। नर्सिंग देखभाल उसी के अनुसार बदलती है।
- बाग़ के पौधे: पेड़, भू-आवरण और फूल – बाग़ बनाने वाले तीन तरह के पौधे इस्तेमाल करते हैं। पेड़ ऊँचे होते हैं, छाया और ढाँचा देते हैं। भू-आवरण पौधे नीचे फैलकर मिट्टी ढकते हैं। फूल रंग देते हैं और मौसम बताते हैं। अच्छा बाग़ तीनों को परतों में मिलाता है।
- बागवानी फसलें उगाना और उपयोग करना – बागवानी फसलें बगीचे के पौधे हैं: फूल, सब्ज़ी, फल और जड़ी-बूटी। हर एक किसी उपयोग के लिए उगाई जाती है: सुंदरता, भोजन या स्वाद और दवा। अच्छा बगीचा ऐसे बनता है कि ऊँचे पौधे छोटों की धूप न रोकें। सुरक्षा का मतलब है सावधानी से छिड़काव, हाथों की सुरक्षा और खाने से पहले धोना।
- बाल देखभाल, शेविंग और पुरुषों के हेयरकट – अच्छी निजी देखभाल सेवा साफ़ औज़ारों और साफ़ हाथों से शुरू होती है। बाल उँगलियों की हल्की मालिश से धोइए; गर्म सेंक के बाद बालों की दिशा में शेव कीजिए; हर ग्राहक के बीच औज़ार कीटाणु-रहित या निर्जीव कीजिए; छोटे कट पर साफ़ पैड से दबाकर एंटीसेप्टिक लगाइए; और बुनियादी कट (कैंची, क्लिपर, उस्तरा) को ग्राहक के सिर और स्टाइल के हिसाब से ढालिए।
- बाल स्वास्थ्य और नर्सिंग – बच्चे छोटे बड़े नहीं होते। वे तेज़ी से बढ़ते हैं, जल्दी संक्रमित होते हैं और बड़ों पर निर्भर रहते हैं। बाल कल्याण का मतलब है टीके, भोजन, सुरक्षित घर, स्कूल और सुरक्षा। बाल नर्सिंग शब्द, खेल, खुराक और सुरक्षा को बच्चे के हिसाब से ढालती है, परिवार को पास रखती है और नैतिकता निभाती है: बच्चे का हित, सहमति व उसकी बात सुनना, निजता और सुरक्षा।
- बाहरी गतिविधियाँ: ओरिएंटियरिंग, चढ़ाई और सुरक्षित रहना – बाहरी और साहसिक गतिविधियाँ, जैसे ओरिएंटियरिंग, ट्रेकिंग, चढ़ाई और पानी के खेल, बदलती प्राकृतिक जगहों पर की जाती हैं। इनमें कौशल (नक्शा पढ़ना, कम्पास चलाना, चढ़ने की तकनीक), सही फ़ैसले (रास्ता चुनना, अपनी सीमा जानना) और सुरक्षा की आदतें (योजना, सामान, टीमवर्क) चाहिए। साथ ही कोई निशान न छोड़कर प्रकृति की रक्षा करनी होती है।
- बीजाणु पौधे: मॉस (काई), क्लब मॉस, हॉर्सटेल और फर्न – बीजाणु पौधों (मॉस, क्लब मॉस, हॉर्सटेल और फर्न) में फूल और बीज नहीं होते। ये बीजाणु (स्पोर) से फैलते हैं। बीजाणु एक छोटी कोशिका है। यह नम ज़मीन पर गिरकर एक छोटा चपटा हरा पौधा बनाता है, जो अंडाणु और शुक्राणु बनाता है। शुक्राणु पानी की परत में तैरकर अंडाणु तक जाते हैं और नया पौधा बनता है। इसलिए ये पौधे नम जगहों में रहते हैं।
- बुज़ुर्गों की आम स्वास्थ्य समस्याएँ और नर्सिंग देखभाल – बाद की उम्र में छह समस्याएँ आम हैं: संक्रमण, फ्रैक्चर, पार्किंसन, डिमेंशिया, अवसाद और डेलीरियम। हर एक के संकेत और नर्सिंग का तरीका अलग है। सबसे ज़रूरी हुनर है धीमे बदलाव (डिमेंशिया) और अचानक बदलाव (डेलीरियम) में फ़र्क करना, और हर बदलाव को बुढ़ापा न कहना।
- बुज़ुर्गों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी में सहायक नर्सिंग – बुज़ुर्गों को आठ रोज़ की बातों में मदद चाहिए: जाँच, बातचीत, भोजन और पोषण, शौच, सफ़ाई, चलना-फिरना, नींद और उद्देश्य वाली गतिविधि। अच्छी नर्सिंग वह सब बचाती है जो व्यक्ति खुद कर सकता है, ज़रूरत पर ही सुरक्षित मदद देती है और हर बुज़ुर्ग का सम्मान करती है।
- बुज़ुर्गों की विशेषताएँ और वृद्ध-देखभाल नर्सिंग – बुज़ुर्गों (आमतौर पर 65 और ऊपर) के अंग धीमे होते हैं, अक्सर एक से ज़्यादा लंबी बीमारी होती है और क्षमताएँ हर व्यक्ति में बहुत अलग होती हैं। कल्याण परिवार, पड़ोसी, स्वास्थ्य सेवाओं और पेंशन या बीमा से मिलता है। वृद्ध-देखभाल नर्सिंग सही मात्रा में मदद देकर व्यक्ति की अपनी क्षमता बचाती है, और उसकी नैतिकता गरिमा, पसंद और सुरक्षा की रक्षा करती है।
- बुनियादी नर्सिंग क्लिनिकल अभ्यास (Fundamental Nursing Clinical Practice) – क्लिनिकल अभ्यास वह जगह है जहाँ छात्र नर्स निगरानी में असली लोगों की देखभाल करके सीखती है। बुनियादी बातें: संस्था और नर्स की भूमिका समझना, पूरे ग्राहक को जानना, अच्छा संवाद, रोज़ की मदद और नर्सिंग प्रक्रिया (आकलन, निदान, योजना, कार्य, मूल्यांकन)।
- बेस वाले खेल (बैट-और-बॉल खेल) – बेस वाले खेलों में बल्लेबाज़ गेंद को मैदान में मारकर बेसों के चक्कर लगाता है और क्षेत्ररक्षक टीम धावक के पहुँचने से पहले गेंद को बेस तक पहुँचाने की कोशिश करती है। बेसबॉल, सॉफ्टबॉल और राउंडर्स इसके उदाहरण हैं; क्रिकेट में भी यही बैट-बॉल की सोच है। जीतने के लिए तीन कौशल चाहिए: गेंद को खाली जगह (गैप) में मारना, समझदारी से बेस दौड़ना और तेज़ थ्रो व टीम तालमेल से क्षेत्ररक्षण।
- बैक्टीरिया (जीवाणु): छोटी कोशिकाएँ, बड़ा काम – बैक्टीरिया एक-कोशिकीय प्रोकैरियोट हैं: इनमें केंद्रक और झिल्ली से घिरे अंगक नहीं होते। इनका DNA एक गोल लूप (न्यूक्लिऑइड) है, अक्सर साथ में छोटे छल्ले प्लाज़्मिड। इनमें 70S राइबोसोम, कोशिका झिल्ली, पेप्टिडोग्लाइकन की कोशिका भित्ति, और कभी-कभी कैप्सूल, पिलि और कशाभ होते हैं। आकार: कोकस, बैसिलस, स्पिरिलम, विब्रियो। ये द्विखंडन से जनन करते हैं और संयुग्मन, रूपांतरण और पारक्रमण से जीन बगल में बाँट सकते हैं। ये प्रकाश-संश्लेषण, रसायन-संश्लेषण, अपघटन, सहजीविता या परजीविता से भोजन लेते हैं और कार्बन व नाइट्रोजन चक्र चलाते हैं। आर्किया दिखने में मिलते-जुलते हैं पर उनकी भित्ति और झिल्ली का रसायन अलग है और वे अक्सर कठिन जगहों पर रहते हैं।
- बॉडी मास इंडेक्स (BMI) और शरीर के माप – बॉडी मास इंडेक्स (BMI) यानी तुम्हारा द्रव्यमान (किलोग्राम) ÷ लंबाई (मीटर) का वर्ग। इस एक संख्या से वयस्कों को कम वज़न, स्वस्थ, अधिक वज़न या मोटापा में बाँटा जाता है। कोच कमर-कूल्हा अनुपात, त्वचा की तह (स्किनफोल्ड) और शरीर का प्रकार (सोमैटोटाइप) भी देखते हैं। ये सब परीक्षण और मापन हैं; संख्या का मतलब तय करना मूल्यांकन है।
- भूदृश्य रोपण: अर्थ, भूमिका और दृश्य-रचना – भूदृश्य रोपण का मतलब है सोच-समझकर पौधे चुनना और सही जगह लगाना। पौधे छाया और ठंडक देते हैं, मिट्टी पकड़ते हैं, शोर घटाते हैं, हवा साफ़ करते हैं, पक्षियों-कीड़ों को घर देते हैं और जगह को सुंदर बनाते हैं। अच्छे रोपण में परतें (ऊँचे, मध्यम, नीचे), एक खास केंद्र-बिंदु और हर मौसम का रंग होता है।
- भोजन और सूक्ष्मजीव, और प्रोजेक्ट से सीखना – सूक्ष्मजीव (जीवाणु, ख़मीर और फफूँदी) हर भोजन में और उस पर होते हैं। लाभदायक सूक्ष्मजीव दही, ब्रेड, पनीर, इडली और अचार बनाते हैं। हानिकारक सूक्ष्मजीव भोजन ख़राब करते हैं या बीमारी फैलाते हैं। प्रोजेक्ट सीखने में तुम सवाल चुनते हो, निष्पक्ष जाँच की योजना बनाते हो, करते हो, नतीजे जाँचते हो और जो पाया वह बताते हो।
- भोजन का वर्गीकरण और उनकी विशेषताएँ – भोजन को उसके स्रोत से बाँटा जाता है: पौधों के भोजन, जानवरों के भोजन, उनसे निकाले गए अंश (तेल, चीनी, स्टार्च, प्रोटीन), और मसाले, मीठे पदार्थ व पेय। हर भोजन में कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, वसा, विटामिन, खनिज और पानी होते हैं, बस मात्रा अलग होती है।
- भोजन के कार्य – भोजन तीन तरह के काम करता है। पोषण कार्य में ऊर्जा देना, शरीर बनाना-मरम्मत करना, और सुरक्षा व नियंत्रण आते हैं। संवेदी कार्य है रंग, खुशबू और स्वाद जो खाने को आनंददायक बनाते हैं। शरीर-नियंत्रक कार्य रेशे और एंटीऑक्सीडेंट जैसे उपयोगी हिस्सों से आता है जो सामान्य पोषण से आगे सेहत बनाए रखते हैं।
- भ्रूण अभियांत्रिकी: भ्रूण को शरीर के बाहर बढ़ने में मदद – भ्रूण अभियांत्रिकी का मतलब है आरंभिक भ्रूण के साथ काम करना। शुक्राणु अंड से जुड़कर (निषेचन) युग्मनज बनाता है। युग्मनज बार-बार बँटता है (विदलन) और गेंद बनता है, फिर खोखला ब्लास्टोसिस्ट जिसकी भीतरी कोशिकाएँ शिशु बनाती हैं। IVF में अंड और शुक्राणु प्रयोगशाला की थाली में मिलते हैं। छोटे भ्रूण को गर्भाशय में रखा जाता है (भ्रूण स्थानांतरण), बाद के लिए जमाया जाता है, या दो में बाँटकर एक जैसे जुड़वाँ बनाए जाते हैं। किसान यही विचार उपयोग करके एक उत्तम गाय से कई बछड़े पाते हैं।
- मछली का भोजन और पोषण – मछली और शंख-जीवों को प्रोटीन, वसा, कार्बोहाइड्रेट, विटामिन और खनिज चाहिए। नन्ही मछलियों (लार्वा) को रोटिफ़र और आर्टेमिया जैसा छोटा जीवित भोजन चाहिए; बड़ी मछलियाँ मछली चूरा, पौधों का आटा, तेल और विटामिन से बना मिश्रित दाना खाती हैं। अच्छे भोजन का मतलब है कम FCR (FCR = दिया दाना ÷ बढ़ा वज़न) और साफ़ पानी।
- मछली के रोग और कीट नियंत्रण – मछली तब बीमार होती है जब रोगाणु (वायरस, जीवाणु, फफूँद या परजीवी), कमज़ोर मछली और बुरी परिस्थितियाँ मिलती हैं। रोग पानी, संपर्क और उपकरणों से फैलते हैं। पालक व्यवहार, शरीर के लक्षण और लैब जाँच से रोग पहचानता है, फिर पहले रोकथाम (साफ़ पानी, कम मछली, क्वारंटीन, टीका) और ज़रूरत पर ही दवा से नियंत्रण करता है।
- मछली पकड़ना (एंगलिंग) – एंगलिंग में छड़ी, डोरी, फ़्लोट, सिंकर, काँटे और चारे से एक-एक मछली पकड़ी जाती है। फ़्लोट बताता है कि मछली ने चारा खींचा, सिंकर चारे को नीचे ले जाता है और चारा उसी गहराई पर होना चाहिए जहाँ मछलियाँ तैरती हैं। समुद्र में लहरें, ज्वार और ताक़तवर मछलियाँ हैं; नदी में धारा। स्थानीय नियम, न्यूनतम आकार और सुरक्षा मानिए।
- मछली पकड़ने की तकनीक – मछली पकड़ने के उपकरण अलग-अलग ढंग से काम करते हैं: काँटा-डोरी, फँसाने वाला जाल (गिल जाल), घेरने वाला जाल (पर्स सीन) और खींचकर समेटने वाला जाल (ट्रॉल)। जाली का आकार तय करता है कौन सी मछली रुकेगी। जाल मज़बूत, हल्के कृत्रिम रेशे (नायलॉन, पॉलीएथिलीन) से बनते हैं और उनमें तैराक व बोझ लगते हैं। नावों में विंच, इको साउंडर और रेडियो होते हैं और पकड़ को बर्फ़ या प्रशीतन से ताज़ा रखा जाता है। हैचरी से बच्चे छोड़ना और कृत्रिम भित्ति जैसे संवर्धन उपाय भंडार की मदद करते हैं।
- मछली: उपास्थिल और अस्थिल – मछलियाँ शीत-रक्त वाली कशेरुकी हैं जो पानी में रहती हैं, गिल से साँस लेती हैं, पंखों से तैरती हैं और उनका शरीर धारा-रेखित होता है। उपास्थिल मछलियों (शार्क, रे) का कंकाल नरम उपास्थि का होता है। अस्थिल मछलियों (रोहू, कतला, टूना) का कंकाल हड्डी का, गिल पर ढक्कन और वायु-कोष होता है। मनुष्य जाल से और मत्स्य पालन से मछली पाते हैं।
- मत्स्य अभ्यास की बुनियाद: जमा करना, पालना, प्रसंस्करण और समुद्र में काम – मत्स्य अभ्यास के चार काम हैं। जमा करना: जाल अपने छेद से बड़े जीव रोकता है। पालना: मछली को प्रति लीटर कम से कम 5 mg ऑक्सीजन चाहिए; 3 mg से कम हो तो ख़तरा है। प्रसंस्करण: ठंडी मछली बहुत देर ताज़ी रहती है, इसलिए तुरंत ठंडा करो। समुद्री काम: मौसम देखो, लाइफ़ जैकेट पहनो और बड़ी लहरों में छोटी नाव बंदरगाह में रखो।
- मत्स्य पालन और समुद्री पर्यावरण – मत्स्य पालन का मतलब है खाने और कमाई के लिए पानी के जीव पकड़ना या पालना। समुद्र में भोजन की शृंखला धूप और प्लवक से शुरू होती है। जहाँ गहराई से पोषक तत्व ऊपर आते हैं (अपवेलिंग) या जहाँ उथला महाद्वीपीय मग्नतट होता है, वहाँ अच्छे मत्स्य क्षेत्र बनते हैं। इको साउंडर, परीक्षण जाल और पानी की जाँच से मछली खोजी जाती है। साफ़ पानी, सुरक्षित आवास और समझदारी से शिकार समुद्र को उपजाऊ रखते हैं।
- मत्स्य संसाधन और मत्स्य प्रबंधन – मत्स्य भंडार किसी एक समुद्री क्षेत्र में एक प्रकार की सारी मछलियाँ हैं। यह हर साल दोबारा बढ़ता है, इसलिए नवीकरणीय संसाधन है। जब सालाना शिकार सालाना बढ़त से बड़ा नहीं होता, भंडार स्वस्थ रहता है। बढ़त से बड़ा शिकार भंडार घटाता है (अति-मत्स्यन) और वह ढह सकता है। प्रबंधन में शिकार की सीमा, बंद मौसम, जाली और औज़ार के नियम, सुरक्षित नर्सरी क्षेत्र और भंडार की निगरानी आती है।
- मन और शरीर की बुनियादी समझ – मन वह है जिससे हम सोचते, महसूस करते और चाहते हैं। मन की ज़रूरतें होती हैं: सुरक्षा और भोजन, अपनापन, सम्मान और आगे बढ़ना। शरीर तंत्र नाम की टीमों में काम करता है, जैसे मस्तिष्क और नसें, हृदय और फेफड़े, हड्डी और माँसपेशी, पेट और गुर्दे। उम्र के साथ माँसपेशियाँ कमज़ोर, हड्डियाँ पतली, इंद्रियाँ धुँधली और याददाश्त धीमी होती है। यह सामान्य है। मन और शरीर एक-दूसरे पर असर डालते हैं: चिंता से धड़कन तेज़ होती है और नींद बिगड़ती है। अच्छा देखभालकर्ता पूरे व्यक्ति को देखता है, सिर्फ़ बीमारी को नहीं।
- मनुष्य और पौधों में उत्सर्जन: वृक्क, वृक्काणु और अधिक – उत्सर्जन शरीर में बने हानिकारक नाइट्रोजनी अपशिष्ट को बाहर निकालना है। दोनों वृक्कों में लगभग दस-दस लाख वृक्काणु रक्त छानते हैं: कोशिकागुच्छ छानता है, नलिका उपयोगी ग्लूकोज, अमीनो अम्ल, लवण और जल वापस लेती है, और बचा यूरिया व अतिरिक्त जल मूत्र बनता है। पौधे रंध्रों, गिरती पत्तियों, छाल, रेज़िन और गोंद से अपशिष्ट निकालते हैं।
- मनुष्य में परिवहन: हृदय, रुधिर वाहिकाएँ, रुधिर और लसीका – हृदय चार कक्षों वाला मांसपेशी पंप है। एक पूरे चक्कर में रुधिर हृदय से दो बार गुज़रता है: एक बार फेफड़ों से ऑक्सीजन लेने, और एक बार पूरे शरीर तक। यही दोहरा परिसंचरण है। धमनियाँ रुधिर को हृदय से दूर ले जाती हैं, शिराएँ वापस लाती हैं और केशिकाएँ आदान-प्रदान करती हैं। रुधिर (प्लाज़्मा, लाल व श्वेत कणिकाएँ, प्लेटलेट्स) और लसीका मिलकर भोजन, गैसें, हॉर्मोन और अपशिष्ट ढोते हैं।
- मनोभ्रंश (डिमेंशिया) की समझ – डिमेंशिया एक बीमारी है जिसमें मस्तिष्क की कोशिकाएँ क्षतिग्रस्त होती हैं, इसलिए याददाश्त, सोच और रोज़ के कौशल धीरे-धीरे घटते हैं। यह सामान्य बुढ़ापा नहीं है। आम प्रकार हैं अल्ज़ाइमर, रक्तवाहिका, लुई बॉडी और फ्रंटोटेम्पोरल डिमेंशिया। संकेतों में नई बातें भूलना, समय-जगह का भ्रम, शब्द ढूँढने में कठिनाई और कमज़ोर निर्णय शामिल हैं। ग़ुस्सा या चिंता अक्सर दर्द, डर या अधूरी ज़रूरत का संदेश होती है। अच्छी देखभाल शांत, सरल और सम्मानपूर्ण होती है। परिवार, पड़ोसी, डॉक्टर और सामुदायिक सेवाएँ मिलकर डिमेंशिया-अनुकूल समाज बनाते हैं।
- मातृ स्वास्थ्य और नर्सिंग – मातृत्व का मतलब है उस महिला की देखभाल और स्वास्थ्य जो माँ है या बनने वाली है, और उसके शिशु की, गर्भावस्था से जन्म और उसके बाद के हफ़्तों तक। दशकों में बेहतर देखभाल से माँओं और शिशुओं की मौतें घटी हैं। प्रजनन अधिकार का मतलब है जानकारी, मुक्त चुनाव और सुरक्षित देखभाल। मातृ-नर्सिंग माँ, शिशु और परिवार की देखभाल करती है और सहमति, निजता व सम्मान जैसी नैतिकता निभाती है।
- मानव और स्वास्थ्य: चिकित्सा कैसे बदली – समय के साथ स्वास्थ्य की सोच बदली है: पहले "गंदी हवा" को दोष देते थे, अब जानते हैं कि कई रोग जीवाणु-विषाणु से होते हैं। टीके, स्कैन और दवाएँ जान बचाती हैं, पर हर एक के लाभ और हानि दोनों हैं, जिन्हें तौलकर चुनना चाहिए।
- मानव कल्याण में सूक्ष्मजीव – सूक्ष्मजीव बहुत छोटे जीव हैं: जीवाणु, कवक, कुछ प्रोटोज़ोआ, शैवाल और वायरस। इनमें से बहुत से हमारी मदद करते हैं। ये दूध को दही बनाते हैं, आटा फुलाते हैं, और बड़े कारखानों में पेय, अम्ल, एंज़ाइम और दवाएँ बनाते हैं। ये गंदा पानी साफ़ करते हैं, बायोगैस ईंधन बनाते हैं, फ़सल के कीट सुरक्षित ढंग से मारते हैं और मिट्टी को पोषक देते हैं। पेनिसिलिन जैसे प्रतिजैविक सूक्ष्मजीवों से मिलते हैं, पर इन्हें सावधानी से लेना चाहिए ताकि कीटाणु प्रतिरोधी न बनें।
- मानव जनन – मनुष्य लैंगिक जनन करते हैं और जरायुज हैं (बच्चा माँ के शरीर के अंदर बढ़ता है)। वृषण की शुक्रजनक नलिकाओं में शुक्राणु बनते हैं, अंडाशय के पुटकों में अंडाणु। युग्मकजनन में अर्धसूत्री विभाजन होता है: 1 शुक्राणुजन से 4 शुक्राणु, पर 1 अंडजन से केवल 1 अंडाणु और ध्रुवीय पिंड। लगभग 28 दिन का आर्तव चक्र FSH, LH, एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरॉन से चलता है; दिन 14 के आसपास LH की अचानक बढ़त से अंडोत्सर्ग होता है। तुंबिका में निषेचन से युग्मनज बनता है, जो मोरुला और फिर ब्लास्टोसिस्ट बनकर गर्भाशय में धँस जाता है। अपरा भ्रूण को पोषण देता है; लगभग 9 महीने बाद प्रसव और फिर स्तनपान।
- मानव त्वचा: परतें, काम और धूप से सुरक्षा – त्वचा शरीर का सबसे बड़ा अंग है। इसकी तीन परतें हैं: बाह्यत्वचा (बाहरी, जलरोधी, मेलानिन वाली), अंतःत्वचा (रक्त नलिकाएँ, तंत्रिकाएँ, ग्रंथियाँ, बालों की जड़ें) और नीचे चर्बी की परत। यह रक्षा करती है, छूना और दर्द महसूस कराती है, पसीने और रक्त प्रवाह से शरीर का तापमान सँभालती है और धूप में विटामिन D बनाती है। बहुत ज़्यादा UV त्वचा की कोशिकाओं को नुकसान पहुँचाता है, बुढ़ापा जल्दी लाता है और मेलेनोमा जैसा त्वचा कैंसर कर सकता है।
- मानव पाचन तंत्र और विषमपोषी पोषण – विषमपोषी जीव दूसरे जीवों से बना-बनाया भोजन लेते हैं। मनुष्य प्राणिसम (holozoic) पोषण करता है: पूरा भोजन खाकर एक लंबी नली, आहार नाल, में उसे तोड़ता है। दाँत, लार, आमाशय का अम्ल, एंज़ाइम, पित्त और अग्न्याशयी रस बड़े अणुओं को छोटा करते हैं, जिन्हें क्षुद्रांत्र के दीर्घरोम रक्त में सोख लेते हैं।
- मानव प्रदर्शन: प्रशिक्षण, शरीर, भोजन और साधन कैसे असर डालते हैं – काइनेसियोलॉजी (kinesiology) मानव गति का विज्ञान है। प्रदर्शन तब सुधरता है जब प्रशिक्षण सिद्धांतों पर चले: प्रगतिशील अधिभार, विशिष्टता, व्यक्तिगत भिन्नता, उत्क्रमणीयता, विविधता और पुनर्प्राप्ति (FITT से योजना)। इस पर आंतरिक कारक (जीन, आयु, लिंग, शरीर-प्रकार, तंतु प्रकार, प्रेरणा) और बाहरी कारक (कोच, मौसम, ऊँचाई, उपकरण, नींद, पैसा) असर डालते हैं। अच्छा पोषण (कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, वसा, पानी) ईंधन देता है। एर्गोजेनिक साधन प्रदर्शन बढ़ाने की कोशिश हैं: कुछ अनुमत, कुछ प्रतिबंधित।
- मानव में जनन और जनन स्वास्थ्य – यौवनारंभ पर मस्तिष्क के हॉर्मोन वृषण और अंडाशय को सक्रिय करते हैं। नर तंत्र शुक्राणु बनाता और ले जाता है; मादा तंत्र अंडाणु बनाता है और गर्भाशय में शिशु के बढ़ने की जगह देता है। निषेचन अंडवाहिनी में होता है और भ्रूण को प्लेसेंटा से पोषण मिलता है। जनन स्वास्थ्य में सुरक्षित निर्णय, गर्भनिरोध, भ्रूण हत्या पर रोक और HIV/AIDS जैसे रोगों से बचाव शामिल हैं।
- मानव में लिंग निर्धारण – मानव कोशिका में 23 जोड़ी गुणसूत्र होते हैं: 22 जोड़ी अलिंग गुणसूत्र और 1 जोड़ी लिंग गुणसूत्र। स्त्री XX, पुरुष XY। हर अंडाणु में X होता है; आधे शुक्राणुओं में X और आधों में Y। X + X = लड़की, X + Y = लड़का। संभावना 50:50 है और पिता का शुक्राणु तय करता है।
- मानव शरीर के अंग तंत्र – हमारा शरीर स्तरों में बना है: कोशिकाएँ मिलकर ऊतक, ऊतक मिलकर अंग, अंग मिलकर अंग तंत्र और सारे तंत्र मिलकर पूरा जीव यानी हम। हर तंत्र का एक मुख्य काम है: कंकाल (ढाँचा), पेशी (गति), परिसंचरण (ढुलाई), श्वसन (गैसों का लेन-देन), पाचन (भोजन), उत्सर्जन (कचरा), तंत्रिका और अंतःस्रावी (नियंत्रण), प्रतिरक्षा (बचाव), त्वचा तंत्र और जनन तंत्र। कोई तंत्र अकेले काम नहीं करता: व्यायाम में पेशियाँ, दिल, फेफड़े और नसें साथ बदलकर शरीर के अंदर का हाल स्थिर रखते हैं (समस्थिति)।
- मानव शरीर के अनुकूलन – बाहर बदलता रहता है, पर शरीर अपना भीतर स्थिर रखता है। गर्मी में पसीना आता है; ठंड में काँपना होता है और त्वचा की नलिकाएँ सिकुड़ती हैं। ऊँचाई पर साँस तेज़ चलती है और फिर लाल रक्त कोशिकाएँ बढ़ती हैं। भोजन न मिले तो शरीर पहले शर्करा, फिर वसा, फिर पेशी जलाता है। 24 घंटे की शारीरिक घड़ी नींद और सतर्कता तय करती है। अभ्यास पेशी और हड्डी बनाता है, भारहीनता उन्हें कमज़ोर करती है।
- मानव से जुड़े विज्ञान: शरीर-रचना, शरीर-क्रिया और स्वच्छता – शरीर-रचना (anatomy) बताती है कि शरीर कैसे बना है, शरीर-क्रिया विज्ञान (physiology) बताता है कि वह कैसे काम करता है और स्वच्छता (hygiene) बताती है कि स्वस्थ कैसे रहें। वैज्ञानिक अवलोकन, मापन और प्रयोग से सीखते हैं। डॉक्टर, सर्जन, फिज़ियोलॉजिस्ट, खेल-वैज्ञानिक और पोषण-विशेषज्ञ इन्हीं विज्ञानों का उपयोग करते हैं।
- मानव स्वास्थ्य तथा रोग – स्वास्थ्य का मतलब है शरीर, मन और सामाजिक जीवन तीनों ठीक हों। रोग कई बार कीटाणुओं (रोगजनक) से होते हैं: जीवाणु, वायरस, प्रोटोज़ोआ, कृमि और कवक। शरीर दो तरह की प्रतिरक्षा से लड़ता है: सहज (जन्म से) और उपार्जित (सीखी हुई, याद रखने वाली)। टीके इसी याददाश्त का उपयोग करते हैं। HIV सहायक T कोशिकाओं को नष्ट करके एड्स करता है। कैंसर में कोशिकाएँ बिना रुके बँटती हैं। नशा और शराब किशोरों के शरीर और मन को नुकसान पहुँचाते हैं।
- मुख्य जलकृषि और स्टॉक-संवर्धन तकनीकें – जल-जीव चार मुख्य तरीक़ों से उगाए जाते हैं: समुद्री जानवर पिंजरों, बेड़ों और तालाबों में (मछली, झींगा, सीप, एबलोन), समुद्री पौधे जैसे शैवाल रस्सियों और जालों पर, विदेशों में प्रयुक्त तंत्र जैसे झींगा तालाब, सैल्मन पेन और पुनर्चक्रण टंकियाँ, और सजावटी मछली एक्वेरियम में। स्टॉक संवर्धन में हैचरी के बच्चे समुद्र में छोड़े जाते हैं ताकि जंगली संख्या बढ़े।
- मेन्यू योजना और पोषण की गणना – मेन्यू हर भोजन के व्यंजनों की योजना है। अच्छा मेन्यू संतुलित (पाँचों खाद्य समूह), ऊर्जा में पर्याप्त, खर्च में ठीक और मौसम, स्वाद व समय के अनुसार होता है। जाँचने के लिए खाद्य तालिका लें: मात्रा का पोषक = ग्राम ÷ 100 × 100 ग्राम का मान, फिर पूरे दिन का जोड़ करके शरीर की ज़रूरत से मिलाएँ।
- मोटर कौशल (Motor Skills) – मोटर कौशल वह हरकत है जिसे हम सीखकर अच्छे से करते हैं, एक साफ़ लक्ष्य के साथ, जैसे दौड़ना, पकड़ना, लिखना या कार्टव्हील। स्थूल कौशल बड़ी मांसपेशियों से होते हैं (दौड़, कूद); सूक्ष्म कौशल छोटी मांसपेशियों से, बारीकी के साथ (लिखना, कैरम का शॉट)। कौशल के तीन परिवार हैं: चलने-फिरने वाले (locomotor), वस्तु संभालने वाले (manipulative) और संतुलन वाले (stability)। कौशल खुले (आसपास बदलता रहे, जैसे फ़ुटबॉल पास) या बंद (आसपास स्थिर, जैसे फ़्री थ्रो), सरल या जटिल भी होते हैं। हर हरकत एक चक्र है: इंद्रियाँ जानकारी लेती हैं, दिमाग़ तय करता है, मांसपेशियाँ काम करती हैं, और प्रतिपुष्टि (feedback) बताती है कैसा हुआ। प्रतिक्रिया समय = देखने और हिलना शुरू करने के बीच का समय। हम तीन चरणों में सीखते हैं: संज्ञानात्मक (समझना, कई ग़लतियाँ), साहचर्य (अभ्यास, कम ग़लतियाँ) और स्वायत्त (अपने-आप, सहज)। गति, ताक़त, सहनशक्ति, समन्वय, संतुलन, फुर्ती और लचीलापन जैसी मोटर क्षमताएँ हर कौशल की नींव हैं।
- मोनोक्लोनल एंटीबॉडी – एंटीबॉडी Y आकार का प्रोटीन है जो सिर्फ़ एक एंटीजन से जुड़ता है। मोनोक्लोनल एंटीबॉडी एक ही एंटीबॉडी की ढेर सारी एक जैसी प्रतियाँ हैं, जो कोशिकाओं के एक क्लोन से बनती हैं। चूहे को एंटीजन का इंजेक्शन देकर उसकी लिम्फोसाइट ली जाती हैं और तेज़ी से बँटने वाली ट्यूमर कोशिकाओं से जोड़कर हाइब्रिडोमा बनाया जाता है। हाइब्रिडोमा का क्लोन एक जैसी एंटीबॉडी बनाता है। इनका उपयोग प्रेगनेंसी टेस्ट, लैब जाँच, थक्के या कैंसर कोशिका ढूँढने और कैंसर कोशिका तक दवा पहुँचाने में होता है। ये बहुत विशिष्ट हैं, पर दुष्प्रभाव और ऊँची लागत भी है।
- मोलस्क: घोंघा, सीप और स्क्विड – मोलस्क नरम शरीर वाले जीव हैं। इनमें पेशीय पाद (foot) और प्रावार (mantle) होता है। ज़्यादातर कवच बनाते हैं। तीन बड़े समूह हैं: गैस्ट्रोपॉड (घोंघा, एक कवच), द्विकपाटी (सीप, दो कवच) और सेफैलोपॉड (स्क्विड, ऑक्टोपस, कवच अंदर या नहीं)।
- योग: शरीर, साँस और मन का मेल – योग का अर्थ है जोड़ना: यह शरीर, साँस और मन को जोड़ता है। अष्टांग योग के 8 अंग हैं: यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि। आसन स्थिर और सुखद मुद्राएँ हैं; प्राणायाम साँस पर नियंत्रण (पूरक–कुंभक–रेचक) है; षट्कर्म छह शुद्धि क्रियाएँ हैं। नियमित योग से लचीलापन, ताक़त, संतुलन, एकाग्रता और मनोदशा सुधरती है, तनाव घटता है, और मोटापा, मधुमेह, दमा, उच्च रक्तचाप, कमर दर्द व गठिया जैसे जीवनशैली रोगों से बचाव और नियंत्रण में मदद मिलती है।
- यौन और प्रजनन स्वास्थ्य: हर किशोर के लिए ज़रूरी बातें – यौन स्वास्थ्य का मतलब है रिश्तों में सुरक्षित, सम्मानित और स्वस्थ रहना। सहमति (consent) एक साफ़, अपनी मर्ज़ी की 'हाँ' है जो कभी भी वापस ली जा सकती है; चुप्पी, दबाव, नशा या क़ानूनी उम्र से कम होना मतलब सहमति नहीं। गर्भनिरोध गर्भ ठहरने से रोकता है; लंबे चलने वाले तरीके (इम्प्लांट, IUD) सबसे असरदार हैं, और सिर्फ़ कंडोम यौन संचारित संक्रमण (STI) से भी बचाता है। STI अक्सर बिना लक्षण के फैलते हैं, इसलिए जाँच ज़रूरी है; ज़्यादातर का इलाज या नियंत्रण हो सकता है। गर्भ लगभग 40 सप्ताह का होता है; माहवारी रुकना अक्सर पहला संकेत है। विकल्प हैं: बच्चे को पालना, गोद देना या गर्भपात, और क़ानून हर देश में अलग है। डॉक्टर, नर्स और क्लिनिक से गोपनीय मदद मिलती है।
- यौन स्वास्थ्य: सुरक्षित और जानकार होकर बड़े होना – यौन स्वास्थ्य का मतलब है यौनिकता से जुड़ी शारीरिक, भावनात्मक और सामाजिक भलाई, सिर्फ़ बीमारी न होना नहीं। किशोरावस्था (लगभग 8–14 साल, हर किसी में अलग) हॉर्मोन से शुरू होती है और शरीर व भावनाओं में बदलाव लाती है। यौनिकता बचपन से बुढ़ापे तक जीवन का हिस्सा है और इसमें पहचान, भावनाएँ, रिश्ते और मूल्य आते हैं। स्वस्थ शरीर-छवि का मतलब है मानना कि असली शरीर अलग-अलग होते हैं और मीडिया की तस्वीरें अक्सर एडिट होती हैं। सहमति आज़ाद, साफ़, समझकर दी गई होनी चाहिए और वापस ली जा सकती है; हर किसी को जानकारी, सुरक्षा, निजता और स्वास्थ्य सेवा का अधिकार है। STI यौन संपर्क और कुछ शरीर के द्रवों से फैलते हैं; कई में लक्षण नहीं होते; बचाव में संयम, कंडोम, टीके (HPV, हेपेटाइटिस B), जाँच और जल्दी इलाज आते हैं। जानकारी भरोसेमंद स्रोतों और भरोसेमंद बड़ों से लो।
- यौवनारंभ और किशोरावस्था: शरीर और मन कैसे बड़े होते हैं – किशोरावस्था (adolescence) बचपन और बड़े होने के बीच का समय है, लगभग 10 से 19 साल। इसका वह हिस्सा जब शरीर बच्चे पैदा करने लायक बनता है, यौवनारंभ (puberty) कहलाता है। यह हॉर्मोन से शुरू होता है: दिमाग़ की पीयूष ग्रंथि संदेश भेजती है, और अंडाशय एस्ट्रोजन व वृषण टेस्टोस्टेरोन बनाते हैं। लंबाई तेज़ी से बढ़ती है, नए बाल आते हैं, पसीना और मुँहासे होते हैं; लड़कियों में स्तन और माहवारी, लड़कों में भारी आवाज़ और दाढ़ी-मूँछ। हर किसी का समय अलग होता है, और यह सब सामान्य है।
- रक्त: यह किससे बना है और क्या काम करता है – रक्त एक तरल ऊतक है। इसका लगभग 55% प्लाज़्मा (ज़्यादातर पानी) और लगभग 45% कोशिकाएँ हैं। लाल कोशिकाएँ ऑक्सीजन ले जाती हैं, श्वेत कोशिकाएँ कीटाणुओं से लड़ती हैं और प्लेटलेट थक्का जमाने में मदद करते हैं। ABO और Rh समूह लाल कोशिकाओं के ऊपर लगे चिह्नों (एंटीजन) पर निर्भर हैं। ग़लत रक्त मिलाने से कोशिकाएँ चिपक जाती हैं। रक्त कोशिकाएँ लाल अस्थि मज्जा में बनती हैं।
- रज्जुकी (कॉर्डेट): लांसलेट और कशेरुकी – रज्जुकी जंतु वे हैं जिनमें जीवन की किसी अवस्था में नोटोकॉर्ड, पीठ पर खोखली तंत्रिका नली, गले में क्लोम छिद्र और आहार नली के बाद पूँछ होती है। लांसलेट में ये चारों जीवन भर रहते हैं। कशेरुकियों में नोटोकॉर्ड की जगह रीढ़ की हड्डी आ जाती है।
- रसोइये के कर्तव्य और समाज में भूमिका – रसोइया सिर्फ़ स्वादिष्ट खाना नहीं बनाता। वह खाना सुरक्षित रखता है, संतुलित भोजन की योजना बनाता है, बच्चों, बुज़ुर्गों, मरीज़ों और कामगारों के हिसाब से खाना बदलता है, अपनी सेहत और सफ़ाई का ध्यान रखता है, और खाद्य सुरक्षा व स्वास्थ्य संवर्धन के क़ानून मानता है। इस तरह रसोइया पूरे समाज की सेहत की रक्षा करता है।
- रासायनिक समन्वय तथा एकीकरण – हॉर्मोन रासायनिक संदेशवाहक हैं जो नलिकाविहीन (अंतःस्रावी) ग्रंथियाँ बहुत कम मात्रा में बनाती हैं। ये रक्त में चलकर सही ग्राही वाली लक्ष्य कोशिकाओं पर काम करते हैं। हाइपोथैलेमस पीयूष को, और पीयूष कई ग्रंथियों को नियंत्रित करता है; ऋणात्मक पुनर्निवेशन स्तर स्थिर रखता है। मुख्य ग्रंथियाँ: पीनियल, पीयूष, थायरॉयड, पैराथायरॉयड, थाइमस, एड्रीनल, अग्न्याशय (द्वीप), वृषण, अंडाशय। हृदय, वृक्क, आहारनाल भी हॉर्मोन बनाते हैं। प्रोटीन हॉर्मोन झिल्ली ग्राही और cAMP जैसे द्वितीयक संदेशवाहक से; स्टेरॉयड व थायरॉयड हॉर्मोन कोशिका में जाकर जीन बदलते हैं। बहुत कम (अल्पस्राव) या बहुत ज़्यादा (अतिस्राव) हॉर्मोन से बौनापन, महाकायता, गलगंड, मधुमेह, एडिसन, कुशिंग जैसे रोग होते हैं।
- रिकवरी और खुद की तैयारी: फ़िटनेस मानक (GTO) समझदारी से – व्यायाम पहले थकाता है और बाद में मज़बूत बनाता है। शरीर आराम में खुद को दोबारा बनाता है और कभी-कभी पुराने स्तर से थोड़ा ऊपर पहुँच जाता है। इसे सुपरकम्पेनसेशन कहते हैं। रिकवरी के लिए नींद (किशोरों को 8 से 10 घंटे), पानी, संतुलित भोजन, कूल-डाउन और हल्के सक्रिय आराम के दिन चाहिए। बिना आराम रोज़ अभ्यास से ओवरट्रेनिंग होती है। GTO जैसे फ़िटनेस-मानक कार्यक्रम की तैयारी के लिए खुद को परखें, लक्ष्य रखें, कठिन दिनों के बीच आराम वाली साप्ताहिक योजना बनाएँ, हर मद का अभ्यास करें, परिणाम लिखें और दोहराएँ।
- रोग और दवाएँ – दवा एक रसायन है जो शरीर के काम को बदलती है। यह रिसेप्टर पर ताले में चाबी की तरह बैठकर असर करती है। मात्रा बढ़ने से असर बढ़ता है, पर एक सीमा तक। दवा-चिकित्सा में सही दवा, मात्रा, तरीका और समय चाहिए। ग़लत उपयोग से दुष्प्रभाव, विषाक्तता, प्रतिरोध या लत हो सकती है।
- रोग के कारण और शरीर का स्वस्थ होना – रोग वह बदलाव है जिससे शरीर ठीक से काम नहीं कर पाता। इसके कारण बाहर से आ सकते हैं (कीटाणु, चोट, ज़हर, गर्मी, सर्दी, विकिरण) या भीतर से (जीन, उम्र, कमज़ोर प्रतिरक्षा, जीवनशैली)। बचाव रोग को शुरू होने से पहले रोकता है और जल्दी पहचान उसे तब पकड़ती है जब वह छोटा और आसानी से ठीक होने वाला होता है। नुकसान होने पर शरीर खुद मरम्मत करता है: हानिकारक चीज़ हटाता है, उससे लड़ता है, खराब हिस्सा दोबारा बनाता है और आराम करता है। कुछ ऊतक पूरी तरह वापस उग आते हैं, कुछ निशान के साथ ठीक होते हैं।
- रोगी देखभाल: पंजीकरण, OPD में सहायता और मरीज़ को ले जाना – अच्छी रोगी देखभाल काउंटर से ही शुरू होती है। पंजीकरण में मरीज़ की जानकारी लिखी जाती है और एक अलग अस्पताल ID व टोकन मिलता है। OPD (बाह्य रोगी विभाग) में मरीज़ पंजीकरण, जीवन संकेत, डॉक्टर, जाँच या फ़ार्मेसी और बिल से होकर गुज़रता है। सहायक जीवन संकेत नापते हैं, कमरा तैयार रखते हैं और गोपनीयता बचाते हैं। जो मरीज़ चल नहीं सकते उन्हें व्हीलचेयर या स्ट्रेचर से ले जाते हैं: ब्रेक, टीमवर्क और सही शरीर यांत्रिकी के साथ, यानी घुटने मुड़े, पीठ सीधी, पैरों से उठाएँ।
- रोगों के बुनियादी कारण (Basic Causes of Disease) – ज़्यादातर रोग सात बुनियादी प्रक्रियाओं से बनते हैं। रक्त संचार की गड़बड़ी (खून का रास्ता रुकना या रिसना), सूजन (चोट पर शरीर की प्रतिक्रिया), संक्रमण (शरीर में कीटाणुओं का बढ़ना), प्रतिरक्षा की गड़बड़ी (रक्षा बहुत कमज़ोर, बहुत तेज़ या अपने ही ख़िलाफ़), ट्यूमर (बिना नियम बँटने वाली कोशिकाएँ), चयापचय की गड़बड़ी (शरीर की रसायनिक क्रियाएँ बिगड़ना) और आनुवंशिकता या जन्मजात दोष (जीन या जन्म से पहले के विकास में गड़बड़ी)।
- रोपाई निर्माण – रोपाई निर्माण यानी पौधों को ज़मीन में लगाने का काम। पेड़ के लिए: चौड़ा और ज़्यादा गहरा नहीं गड्ढा खोदें, जड़ का उभार ज़मीन के बराबर रखें, मिट्टी भरें, पानी और मल्च दें। लॉन और भू-आवरण के लिए मिट्टी तैयार करके टर्फ बिछाएँ या बीज बोएँ। क्यारी के लिए मिट्टी ढीली करके खाद मिलाएँ और पंक्तियों में पौधे लगाएँ।
- रोपाई योजना – रोपाई योजना बताती है कि कौन सा पौधा कहाँ लगेगा। हर पौधे को उसकी जगह की धूप, मिट्टी और पानी से मिलाएँ, ऊँचे पौधे पीछे और नीचे आगे रखें, और दूरी पौधे के बड़े होने के आकार से तय करें, न कि ख़रीदते समय के आकार से।
- लकड़ी की कटाई – लकड़ी की कटाई कई चरणों में होती है। पहले कार्य प्रणाली तय होती है (कौन-सी मशीन और लट्ठे कहाँ बनेंगे)। ट्रकों के लिए वन सड़क और मशीनों के लिए कार्य पथ बनते हैं। फिर पेड़ गिराया (फेलिंग) जाता है, लट्ठों में काटा (बकिंग) जाता है और लट्ठे सड़क किनारे लैंडिंग तक खींचे (यार्डिंग) जाते हैं। लकड़ी कटाई खतरनाक है, इसलिए मज़दूर सुरक्षा-सामान पहनते हैं, गिरते पेड़ से पेड़ की दो लंबाई दूर रहते हैं और सुरक्षा नियम मानते हैं।
- लत: कैसे शुरू होती है और कैसे बचें – लत (addiction) यानी किसी पदार्थ या आदत पर नियंत्रण खो देना, नुकसान होने पर भी। यह पदार्थों (तंबाकू, शराब, ड्रग्स, ग़लत दवाएँ) की हो सकती है या व्यवहार (गेमिंग, जुआ, सोशल मीडिया) की। हर बार दिमाग़ में डोपामिन की उछाल उसे काम दोहराना सिखाती है; समय के साथ सहनशीलता बढ़ती है और ज़्यादा चाहिए होता है। चेतावनी संकेत: तलब, नियंत्रण खोना, मजबूरी और नुकसान के बाद भी जारी रखना। बचाव: 'ना' कहने का हुनर, अच्छे इनाम, नींद-दिनचर्या और जल्दी मदद माँगना। लत का इलाज संभव है।
- लिंग सहलग्न वंशागति – कुछ जीन X गुणसूत्र पर होते हैं और छोटे Y गुणसूत्र पर उनकी कोई जोड़ी नहीं होती। ऐसे X-सहलग्न जीन माता-पिता से बच्चों में एक खास तरीके से जाते हैं। पुरुष (XY) के पास एक ही X होता है, इसलिए एक अप्रभावी खराब एलील भी उसमें दिख जाता है। स्त्री (XX) को दो खराब प्रतियाँ चाहिए; एक हो तो वह स्वस्थ वाहक रहती है। लाल-हरी वर्णांधता और हीमोफीलिया इसी तरह चलते हैं।
- लिपिड: वसा, तेल और अन्य – लिपिड वे जैव-अणु हैं जो पानी में नहीं घुलते। मुख्य हैं वसा और तेल (ट्राइग्लिसराइड): एक ग्लिसरॉल से तीन वसीय अम्ल एस्टर बंध से जुड़े। संतृप्त वसीय अम्लों की पूँछ सीधी होती है और ठोस वसा बनती है; असंतृप्त में C=C द्विबंध, मुड़ी पूँछ और द्रव तेल। फ़ॉस्फ़ोलिपिड कोशिका झिल्ली बनाते हैं और कोलेस्ट्रॉल जैसे स्टेरॉयड हार्मोन बनाते हैं।
- लैंडस्केप रोपाई परियोजना – रोपाई परियोजना के छह चरण हैं: जगह की जाँच, योजना, पौधे लाना, रोपाई, देखभाल और नतीजे की समीक्षा। चरणों को क्रम से, सरल नाप और नोट के साथ करने से ज्ञान जीते-जागते बाग़ में बदल जाता है।
- लैंडस्केप रोपाई प्रबंधन – पौधे लगाना सिर्फ़ शुरुआत है। पौधों को लगातार देखभाल चाहिए: पेड़ की छँटाई, लॉन की कटाई, सिंचाई, मल्च, खाद, निराई और कीटों पर नज़र। सरल देखभाल-कैलेंडर बाग़ को स्वस्थ और सुरक्षित रखता है।
- वंशागति का आणविक आधार – ज़्यादातर जीवों में DNA आनुवंशिक पदार्थ है (कुछ वायरस में RNA)। यह द्विकुंडली है: न्यूक्लियोटाइड के दो प्रतिसमांतर सूत्र; A–T दो हाइड्रोजन बंध से, G–C तीन से। लंबा DNA हिस्टोन पर लिपटकर न्यूक्लियोसोम और फिर क्रोमैटिन बनाता है। DNA अर्धसंरक्षी ढंग से प्रतिकृति बनाता है (मेसेल्सन–स्टाल)। केंद्रीय सिद्धांत: DNA → RNA → प्रोटीन। अनुलेखन एक सूत्र से RNA बनाता है; यूकैरियोट में hnRNA पर कैप, पूँछ और स्प्लाइसिंग होती है। आनुवंशिक कूट त्रिक है, 64 कोडॉन (61 अमीनो अम्ल, 3 समापन), AUG से शुरू, लगभग सार्वत्रिक और अपह्रासित। राइबोसोम tRNA की मदद से mRNA को प्रोटीन में बदलता है। जीन चालू-बंद होते हैं; लैक ओपेरॉन इसका उदाहरण है। मानव और चावल जीनोम परियोजनाओं ने पूरा जीनोम पढ़ा, और DNA फिंगरप्रिंटिंग दोहराव वाले DNA (VNTR) से व्यक्ति की पहचान करती है।
- वंशागति तथा विविधता के सिद्धांत – जीन जोड़ों में होते हैं (अलील)। हर माता-पिता हर जोड़े से एक अलील बच्चे को देता है। मेंडल ने प्रभाविता (3 : 1), पृथक्करण और स्वतंत्र अपव्यूहन (9 : 3 : 3 : 1) दिखाया। असली जीवन में मोड़ भी हैं: अपूर्ण प्रभाविता (1 : 2 : 1), सहप्रभाविता (AB रक्त), बहुविकल्पी अलील, बहुप्रभाविता (एक जीन, कई असर) और बहुजीनी लक्षण (कई जीन, एक लक्षण)। जीन गुणसूत्रों पर होते हैं, इसलिए एक ही गुणसूत्र के जीन सहलग्न रहते हैं और केवल जीन विनिमय से अलग होते हैं। लिंग गुणसूत्र लिंग तय करते हैं (मनुष्य XX-XY, पक्षी ZW, मधुमक्खी अगुणित-द्विगुणित) और लिंग-सहलग्न जीन रखते हैं (हीमोफीलिया, वर्णांधता)। जीन की गड़बड़ी से मेंडलीय विकार (थैलेसीमिया, सिकल-सेल) और गुणसूत्र संख्या की गड़बड़ी से डाउन, टर्नर, क्लाइनफेल्टर सिंड्रोम होते हैं।
- वंशावली विश्लेषण: मानव में आनुवंशिकता – वंशावली (पेडिग्री) परिवार का एक पेड़ है जो एक गुण को पीढ़ी-दर-पीढ़ी दिखाता है। चौकोर पुरुष, गोला महिला और गहरा रंग गुण वाले व्यक्ति को दिखाता है। अगर दो सामान्य माता-पिता का बच्चा गुण वाला हो, तो गुण अप्रभावी है और दोनों माता-पिता वाहक (Aa) हैं। अगर गुण हर पीढ़ी में दिखे और हर प्रभावित बच्चे का कोई माता/पिता प्रभावित हो, तो गुण प्रभावी है।
- वन उत्पाद और प्रोजेक्ट अधिगम – वन उत्पाद वे चीज़ें हैं जो हमें जंगल से मिलती हैं: इमारती लकड़ी, जलावन, बाँस, राल, मशरूम, शहद, फल और जड़ी-बूटियाँ। प्रोजेक्ट अधिगम का मतलब है असली काम करके सीखना: सवाल पूछो, योजना बनाओ, बनाओ, जाँचो और नतीजा बताओ। अच्छा प्रोजेक्ट संख्याएँ लिखता है, सुरक्षा रखता है, टीम में काम करता है और जो ग़लत हुआ उसे ईमानदारी से बताता है।
- वन उत्पादों का उपयोग – वन उत्पाद वे चीज़ें हैं जो हमें पेड़ों और जंगलों से मिलती हैं। लट्ठे को चीरकर तख़्ते बनाते हैं, सुखाते (सीझते) हैं ताकि वह सीधा रहे, बिना हवा के गरम करके कोयला बनाते हैं, या उस पर मशरूम उगाते हैं। हर उपयोग का सही तरीका होता है और समझदारी से उपयोग जंगल को स्वस्थ रखता है।
- वन और वानिकी की संस्थाएँ और नीति – संस्था एक नियम या निकाय है जो बताता है कि लोग जंगल का उपयोग कैसे करें। नीति एक लक्ष्य है जिसके साथ योजना और औज़ार होते हैं। वन के नियम परतों में होते हैं: कानून, राष्ट्रीय योजना, क्षेत्रीय योजना और मालिक की अपनी योजना। पक्षों में राष्ट्रीय और क्षेत्रीय सरकार, मालिकों की सहकारी संस्थाएँ और नागरिक आते हैं। नीति पहले लकड़ी की आपूर्ति पर थी, फिर कई लाभों पर और अब जलवायु और स्थानीय लकड़ी पर।
- वन के कार्य, लक्ष्य वन-प्रकार और ज़ोनिंग – जंगल हमें कई लाभ देता है जिन्हें पारिस्थितिक सेवाएँ कहते हैं: चीज़ें (लकड़ी), संतुलन (पानी, कार्बन), संस्कृति (सैर) और आधार (मिट्टी, घर)। प्रबंधक भविष्य का चाहा हुआ जंगल यानी लक्ष्य वन-प्रकार चुनते हैं, जैसे सुरक्षा, उत्पादन, संरक्षण या मनोरंजन वन। ज़ोनिंग से ज़मीन बँटती है ताकि हर हिस्से को ढलान, मिट्टी और बस्ती की दूरी के हिसाब से मुख्य काम मिले।
- वन पारिस्थितिकी तंत्र की संरचना और बहुआयामी कार्य – जंगल परतों में बना होता है: ऊपरी छत्र, झाड़ियाँ, ज़मीन की घास-पत्तियाँ और मिट्टी। खाली ज़मीन धीरे-धीरे जंगल बन जाती है (उत्तराधिकार), और पेड़ों का झुंड (स्टैंड) नन्हे पौधे से बूढ़े पेड़ तक कई अवस्थाओं से गुज़रता है। जंगल की बनावट तय करती है कि वह कितना पानी रोके, कितना कार्बन जमा करे और कितने जीवों को घर दे।
- वन प्रबंधन और परियोजना शिक्षण – परियोजना शिक्षण का अर्थ है असली जगह पर असली सवाल हल करके सीखना। वन प्रबंधन में आप पेड़ नाप सकते हैं, प्रजातियाँ गिन सकते हैं, नाले का अध्ययन कर सकते हैं या छँटाई की योजना बना सकते हैं। अच्छी परियोजना चरणों में चलती है: साफ़ प्रश्न पूछें, योजना बनाएँ कि कौन क्या करेगा, काम करें और नापें, आँकड़े जाँचें (औसत और ग्राफ़), परिणाम साझा करें, और अगली बार सुधारें। सुरक्षित काम करें और वन-मालिक से अनुमति लें।
- वन प्रबंधन का व्यवहार (काम करने के तरीके) – वन का काम पेड़ों के एक झुंड के जीवन के साथ चलता है: कतारों में पौधे लगाओ, छोटे रहते निराई करो, सबसे अच्छे पेड़ों को जगह देने के लिए छँटाई करो, साफ़ लकड़ी के लिए नीचे की डालियाँ काटो, तैयार होने पर कटाई करो और फिर रोपो। इस चक्र को रोटेशन (चक्रण) कहते हैं। छँटाई बहुत कम हो तो तने पतले रहते हैं; बहुत ज़्यादा हो तो जगह बेकार जाती है; बीच का चुनाव सबसे ज़्यादा अच्छी लकड़ी देता है।
- वन प्रबंधन के लक्ष्य और संगठन – वन प्रबंधन का मतलब है जंगल की सोच-समझकर देखभाल करना, ताकि लंबे समय तक लकड़ी, साफ़ पानी, सुरक्षित ज़मीन और प्रकृति मिलती रहे। जितना जंगल में वापस उगता है उससे ज़्यादा न लेना टिकाऊपन है। मालिक लक्ष्य तय करता है, प्रबंधक योजना बनाता है और मज़दूर मैदान का काम करते हैं। योजना एक चक्र है: योजना, करो, जाँचो, सुधारो।
- वन मापन और मूल्यांकन – वनकर्मी पेड़ को उसके सीने की ऊँचाई (1.3 मी) पर व्यास (DBH), उसकी ऊँचाई और आयतन (लगभग 0.785 x d x d x h x रूप-गुणक) से नापते हैं। जंगल को छोटे नमूना प्लॉट नापकर और गुणा करके नापा जाता है, और रिमोट सेंसिंग (ड्रोन, उपग्रह, लेज़र) ऊपर से उसका नक्शा बनाती है। मूल्यांकन इन संख्याओं से फ़ैसला निकालता है: कितनी लकड़ी और दूसरे लाभ हैं, और आगे क्या करना है।
- वन संवर्धन और प्रबंधन की तकनीकें – वन संवर्धन का मतलब है जंगल को सोच-समझकर उगाना। सामान्य तकनीकें पूरी योजना तय करती हैं (प्राकृतिक या रोपित, एक उम्र या मिश्रित उम्र)। विशेष तकनीकें अलग-अलग काम हैं: भूमि तैयारी, रोपण, निराई, सफाई, छँटाई, शाखा कटाई और अंतिम कटाई। उत्पादन वन लकड़ी के लिए चलता है, इसलिए पेड़ कतार में लगते हैं और छाँटे जाते हैं। पर्यावरण वन पानी, मिट्टी, वन्यजीव और सुंदरता के लिए चलता है, इसलिए उसे मिश्रित, पुराना और कम छेड़ा हुआ रखते हैं।
- वनस्पति जगत – वनस्पति जगत नए गुणों की सीढ़ी चढ़ता है। शैवाल सरल, ज़्यादातर पानी के पौधे हैं, बिना जड़-तने के। ब्रायोफ़ाइटा (मॉस) नम ज़मीन पर रहते हैं पर संवहन ऊतक नहीं। टेरिडोफ़ाइटा (फ़र्न) में पहली बार जाइलम और फ़्लोएम आते हैं। अनावृतबीजी के बीज खुले (नग्न) होते हैं। आवृतबीजी में फूल होते हैं और बीज फल के अंदर ढके रहते हैं। सब में अगुणित युग्मकोद्भिद और द्विगुणित बीजाणुद्भिद बारी-बारी आते हैं: पीढ़ी एकांतरण।
- वयस्क स्वास्थ्य और नर्सिंग – वयस्क जीवन के तीन चरण हैं: युवा, प्रौढ़ और वृद्धावस्था-पूर्व। हर चरण में ताकत, ज़िम्मेदारियाँ और स्वास्थ्य के ख़तरे अलग हैं। वयस्क नर्सिंग बीमारी, काम-परिवार की भूमिका और स्व-देखभाल, तीनों में मदद करती है और वयस्क के फ़ैसले के अधिकार का सम्मान करती है। मुख्य नैतिक बातें हैं सहमति, गोपनीयता, ईमानदारी और निष्पक्षता।
- वानिकी की बुनियाद: पेड़, मिट्टी, जलवायु और वन उत्पाद – वानिकी जंगलों का विज्ञान और देखभाल है। शुरुआत पेड़ों से होती है (वृक्ष विज्ञान): काष्ठीय पौधे के हिस्से और दो बड़े समूह, शंकुधारी (अनावृतबीजी) और चौड़ी पत्ती वाले (आवृतबीजी)। हर प्रजाति की पसंद की ऊँचाई, तापमान और मिट्टी होती है। वन-मिट्टी परतों (O, A, B, C) में बनती है। मौसम के तत्वों को यंत्रों से मापा जाता है। जंगल गैर-काष्ठ उत्पाद भी देता है: शहद, खुम्भी, बेरियाँ, औषधीय पौधे और वन्य जीव, जिन्हें नियमों से सँभाला जाता है।
- वायु गुणवत्ता, गर्मी और कसरत – हम जो हवा लेते हैं और मौसम, दोनों कसरत की सुरक्षा बदल देते हैं। कसरत में हम कई गुना ज़्यादा हवा लेते हैं, इसलिए प्रदूषित हवा में कई गुना ज़्यादा धूल भी साँस में जाती है। AQI बताता है कि हवा कितनी साफ़ है। खराब हवा वाले दिन घर के अंदर जाइए या हल्की कसरत कीजिए। गर्मी में पानी पिएँ और सुबह जल्दी या शाम को कसरत करें। ठंड में देर तक वार्म-अप करें और परतों में कपड़े पहनें।
- विकास: एक कोशिका से पूरा शरीर – विकास (व्यक्तिवृत्त, ontogenesis) एक जीव की जीवन कहानी है। युग्मनज विदलन से बँटकर कोशिकाओं की गेंद (कोरकपुटी) बनाता है। कंदुकन में कोशिकाएँ अंदर जाती हैं और तीन जनन स्तर बनते हैं: बाह्यत्वचा, मध्यजनस्तर, अंतर्जनस्तर। फिर कोशिकाएँ विभेदित होती हैं: सबमें एक जैसे जीन, पर हर प्रकार अलग जीन चालू करता है। कोशिकाओं के संकेत (प्रेरण) और Hox जैसे मुख्य जीन तय करते हैं कि कौन-सा अंग कहाँ बने। जन्म के बाद जीव बढ़ता है, सीधे या कायांतरण से विकसित होता है, बूढ़ा होता है और कभी-कभी अंग दोबारा उगा सकता है।
- विकास: जीवन की उत्पत्ति, क्रियाविधि और मानव विकास – शुरुआती पृथ्वी पर सरल रसायनों से जीवन शुरू हुआ: ओपेरिन और हाल्डेन ने कहा और मिलर ने फ्लास्क में अमीनो अम्ल बनाए। विकास के प्रमाण जीवाश्म, समजात और समरूप अंग, भ्रूण, अणु और आज दिखने वाले बदलाव (औद्योगिक मेलानिनता, दवा प्रतिरोध) से मिलते हैं। डार्विन ने इसे आबादी की विभिन्नता पर प्राकृतिक वरण से समझाया; आधुनिक संश्लेषित सिद्धांत जीन जोड़ता है: उत्परिवर्तन, पुनर्योजन, जीन प्रवाह, आनुवंशिक विचलन और प्राकृतिक वरण अलील आवृत्ति बदलते हैं। अगर इनमें से कुछ न हो, आवृत्तियाँ स्थिर रहती हैं: हार्डी–वाइनबर्ग, p² + 2pq + q² = 1। वरण स्थायीकारी, दिशात्मक या विदारक होता है। एक पूर्वज का कई आवासों में फैलकर कई जातियाँ बनाना अनुकूली विकिरण है (डार्विन की फिंच, ऑस्ट्रेलियाई शिशुधानी)। मनुष्य ड्रायोपिथेकस जैसे कपियों से ऑस्ट्रेलोपिथेकस, होमो हैबिलिस, होमो इरेक्टस और निएंडरथल होते हुए होमो सेपियंस बना।
- विकास: नए प्रकार के जीव कैसे बनते हैं – जनन के समय विविधताएँ आती हैं। प्रकृति उन विविधताओं को चुनती है जो जीवित रहने में मदद करें, और कई पीढ़ियों में आबादी बदल जाती है: यही विकास है। सिर्फ़ वंशागत (DNA वाले) बदलाव आगे जाते हैं, उपार्जित नहीं। अलग हुई आबादियाँ नई जातियाँ बन सकती हैं। समजात अंग, समरूप अंग और जीवाश्म बताते हैं कि कौन किससे संबंधित है, और जटिल अंग चरण-दर-चरण बने।
- विविधता की जाँच: आनुवंशिक विविधता, नमूना और मानक विचलन – किसी जाति के अंदर या जातियों के बीच आनुवंशिक विविधता को दिखने वाले लक्षणों, DNA बेस क्रम, mRNA बेस क्रम या अमीनो अम्ल क्रम की तुलना से नापते हैं: जितने कम अंतर, उतना निकट संबंध। हर जीव को नापना संभव नहीं, इसलिए पर्याप्त बड़ा यादृच्छिक नमूना लेते हैं और उसे माध्य और मानक विचलन (SD) से बताते हैं। SD माध्य के आस-पास फैलाव दिखाता है; सामान्य वितरण में लगभग 68% मान ±1 SD के अंदर होते हैं।
- विशेष वन-उत्पादों का उत्पादन और प्रसंस्करण – विशेष वन-उत्पाद वे चीज़ें हैं जो जंगल से लकड़ी के अलावा मिलती हैं। मशरूम लट्ठों पर उगाए जा सकते हैं: छेद करो, स्पॉन डालो, इंतज़ार करो। चारकोल बहुत कम हवा में लकड़ी गर्म करके बनता है, इसलिए वह काला और हल्का होता है पर जलावन से ज़्यादा गर्म जलता है। अन्य विशेष उत्पाद हैं शहद, बाँस के कल्ले, रेज़िन, मेवे और जड़ी-बूटियाँ।
- वृद्ध और शिशु देखभाल: बदलाव, ज़रूरतें और रोज़ की देखभाल – बहुत छोटे और बूढ़े, दोनों को ज़्यादा देखभाल चाहिए। उम्र के साथ शरीर बदलता है: इंद्रियाँ कमज़ोर, हड्डियाँ-मांसपेशियाँ कम ताक़तवर, दिल-फेफड़े कम सक्षम, त्वचा पतली, याददाश्त धीमी। बुज़ुर्गों को पोषण, सुरक्षा, जाँच और दवा, साथ, सम्मान, पैसे की सुरक्षा और भूमिका चाहिए। आम समस्याएँ: गिरना, गठिया, मधुमेह, उच्च रक्तचाप, कम दिखना-सुनना, डिमेंशिया, पेशाब पर नियंत्रण न रहना, अकेलापन और अवसाद। बच्चों को माँ का दूध फिर संतुलित भोजन, टीके, सफ़ाई, नींद, खेल, वृद्धि की जाँच, सुरक्षित घर और प्यार चाहिए।
- व्यवहार पारिस्थितिकी: जानवर ऐसा क्यों करते हैं – व्यवहार पारिस्थितिकी यह पूछती है कि कोई व्यवहार जानवर को जीने और संतान छोड़ने में कैसे मदद करता है। जब किसी व्यवहार का लाभ उसकी कीमत से बड़ा हो, तब वह फैलता है। फ़िटनेस के दो हिस्से हैं: प्रत्यक्ष (अपने बच्चे) और अप्रत्यक्ष (रिश्तेदारों के बच्चे, रिश्ते r से तौले हुए); दोनों मिलकर समावेशी फ़िटनेस हैं। इष्टतम चारा खोज वह समय चुनती है जिसमें प्रति मिनट सबसे ज़्यादा भोजन मिले। दूसरों की मदद (परोपकार) तब विकसित हो सकती है जब r × B > C। खतरे की पुकार, नाच और प्रदर्शन जैसे संकेत सूचना पहुँचाते हैं।
- व्यायाम शरीर क्रिया विज्ञान – व्यायाम शरीर क्रिया विज्ञान यह पढ़ता है कि व्यायाम के दौरान और बाद में शरीर कैसे काम करता है। व्यायाम में माँसपेशियों को ज़्यादा ATP और ऑक्सीजन चाहिए, इसलिए धड़कन, स्ट्रोक आयतन, साँस की दर और गहराई बढ़ती है। ATP तीन ऊर्जा तंत्र दोबारा बनाते हैं: ATP-PC (लगभग 10 s), अवायवीय ग्लाइकोलिसिस (लगभग 2 min तक, लैक्टेट बनता है) और वायवीय (लंबे प्रयास, ऑक्सीजन से)। हृदय निकास = धड़कन दर × स्ट्रोक आयतन। नियमित ट्रेनिंग से हृदय, फेफड़े, माँसपेशियाँ और हड्डियाँ मज़बूत होती हैं; उम्र इन्हें धीरे-धीरे घटाती है, पर व्यायाम यह गिरावट धीमी करता है।
- व्यावसायिक स्वास्थ्य: काम सेहत पर कैसे असर डालता है और कामगारों को कैसे बचाएँ – व्यावसायिक स्वास्थ्य का मतलब है काम करने वालों को स्वस्थ और सुरक्षित रखना। काम की जगह पर भौतिक, रासायनिक, जैविक, एर्गोनॉमिक और मानसिक-सामाजिक ख़तरे हो सकते हैं। लंबे समय तक संपर्क से सिलिकोसिस, शोर से बहरापन और कमर की चोट जैसे व्यावसायिक रोग होते हैं। बचाव के दो रास्ते: काम का माहौल सुधारना (बचाव की सीढ़ी) और कामगारों की सेहत की देखभाल (जाँच, संपर्क की सीमा, प्रशिक्षण)।
- शरीर की जागरूकता: शरीर कैसे चलता, खड़ा होता और साँस लेता है – हड्डियाँ शरीर का ढाँचा हैं और जोड़ों पर मिलती हैं (कोहनी-घुटने जैसे कब्ज़ा जोड़, कंधे-कूल्हे जैसे गेंद-खाँचा जोड़)। मांसपेशियाँ हड्डियों को खींचती हैं और जोड़ी में काम करती हैं: एक सिकुड़ती है तो उसकी साथी ढीली होती है। अच्छी मुद्रा में कान, कंधा, कूल्हा, घुटना और टखना एक सीध में रहते हैं। प्रोप्रियोसेप्शन शरीर के अंगों की स्थिति का एहसास है, जो मांसपेशियों और जोड़ों के संवेदकों से मिलता है। साँस में डायाफ्राम नीचे जाता है और पसलियाँ फैलती हैं, तो फेफड़े भरते हैं।
- शरीर के हर कार्य की गड़बड़ियाँ – शरीर का हर कार्य बिगड़ सकता है। यह पाठ ग्यारह कार्यों को उनकी आम बीमारियों से जोड़ता है: साँस (दमा, निमोनिया), रक्त संचार (उच्च रक्तचाप, दिल का दौरा), भोजन, पाचन और चयापचय (अल्सर, दस्त, कुपोषण), आंतरिक नियंत्रण (मधुमेह, थायरॉइड), खून बनना (एनीमिया, ल्यूकेमिया), रक्षा (एलर्जी, प्रतिरक्षा की कमी), तंत्रिका (स्ट्रोक, मिर्गी), गति (फ्रैक्चर, गठिया), कचरा निकालना (पथरी, गुर्दे की विफलता), प्रजनन (बाँझपन, संक्रमण) और मन (अवसाद, चिंता)।
- शरीर को ढीला करने वाले व्यायाम (Body-Relaxation Exercises) – शरीर को ढीला करने वाले व्यायाम आसान हरकतें और धीमी साँस हैं, जिनसे कसी हुई मांसपेशियाँ नरम होती हैं और मन शांत होता है। पहले पहचानो कि तनाव कहाँ है (कंधे, जबड़ा, मुट्ठियाँ), फिर उसे छोड़ो: कंधे उठाओ-छोड़ो, खिंचाव, पेट से साँस (4 गिनती अंदर, 6 बाहर)। साथी के साथ शीशे जैसे खेल से भरोसा और जुड़ाव भी बढ़ता है।
- शरीर द्रव तथा परिसंचरण – रक्त और लसीका शरीर के परिवहन द्रव हैं। रक्त = प्लाज़्मा (लगभग 55%) + संगठित पदार्थ: RBC, WBC और प्लेटलेट्स। रक्त समूह (ABO, Rh) RBC पर लगे प्रतिजनों से तय होते हैं। फाइब्रिनोजन से फाइब्रिन धागे बनकर थक्का बनाते हैं। मानव हृदय में चार कक्ष हैं और रक्त दो परिपथों में जाता है: फेफड़ों तक और शरीर तक (दोहरा परिसंचरण)। SA पर्व हर धड़कन शुरू करता है; एक धड़कन लगभग 0.8 s का हृद चक्र है, जिसे ECG में P, QRS, T तरंगों में देखा जाता है। हृद निकास = प्रवाह आयतन × हृदय दर ≈ 5 L/मिनट।
- शरीर-कार्य विकार वाले मरीज़ों की नर्सिंग – शरीर के 12 मुख्य कार्य हैं: साँस, रक्त संचार, पाचन, पोषण व चयापचय, तरल संतुलन, हार्मोन, रक्षा, मस्तिष्क व नसें, इंद्रियाँ, गति, पेशाब, और प्रजनन व स्तन। जब कोई कार्य बिगड़ता है, नर्सिंग देखती है कि क्या नज़र रखनी है, समस्या कैसे कम करनी है और व्यक्ति को खुद सँभालना कैसे सिखाना है।
- शारीरिक गतिविधि और स्वास्थ्य – शारीरिक गतिविधि शरीर की कोई भी हरकत है जिसमें ऊर्जा लगती है: चलना, खेलना, साइकिल चलाना, नाचना, घर का काम। बच्चों और किशोरों को रोज़ लगभग 60 मिनट मध्यम से तीव्र गतिविधि चाहिए; बड़ों को हफ़्ते में लगभग 150 से 300 मिनट। तीव्रता हल्की, मध्यम या तीव्र होती है, और बात-परीक्षण से पता चलता है। अच्छी योजना FITT (आवृत्ति, तीव्रता, समय, प्रकार) से बनती है, और स्टेप काउंटर व नक्शा ऐप जैसी तकनीक मदद करती है। गतिविधि शरीर, मन और सामाजिक जीवन को स्वस्थ बनाती है। बहुत कम (गतिहीन जीवन) और बिना आराम बहुत ज़्यादा (अति-प्रशिक्षण), दोनों नुक़सानदेह हैं, इसलिए गतिविधि, आराम और नींद में संतुलन रखें।
- शारीरिक फिटनेस (Physical Fitness) – शारीरिक फिटनेस शरीर की वह क्षमता है जिससे रोज़ का काम, खेल और स्पर्धा ऊर्जा बचाकर की जा सके। इसके पाँच स्वास्थ्य संबंधी घटक (हृदय-श्वसन सहनशक्ति, पेशीय शक्ति, पेशीय सहनशक्ति, लचीलापन, शरीर संरचना) और छह कौशल संबंधी घटक (गति, फुर्ती, विस्फोटक शक्ति, संतुलन, तालमेल, प्रतिक्रिया समय) हैं। इसे FITT (आवृत्ति, तीव्रता, समय, प्रकार) और अधिभार, प्रगति, विशिष्टता, विश्राम, उत्क्रमणीयता जैसे सिद्धांतों वाली योजना से बढ़ाते हैं।
- शारीरिक शिक्षा: कौशल सीखो, परखो और सुधारो – शारीरिक शिक्षा (PE) अच्छी तरह चलना-फिरना, जीवनभर सक्रिय रहना और अपना प्रदर्शन समझना सिखाती है। हर खेल कौशल के तीन चरण हैं: तैयारी, क्रियान्वयन और अनुसरण। सुधार के लिए कौशल देखो, मॉडल से तुलना करो, ताकत और कमज़ोरी पहचानो, प्रतिक्रिया लो और अभ्यास की योजना बनाओ: योजना → अभ्यास → समीक्षा → प्रतिक्रिया। लोग स्वास्थ्य, फ़िटनेस, मज़े, दोस्ती, प्रतियोगिता और मन की शांति के लिए खेलते हैं। नए खेल, क्लब, सुरक्षा और उपकरण की देखभाल जीवनभर खेलने में मदद करते हैं।
- शिशुओं और बच्चों का पोषण – बच्चे बहुत तेज़ बढ़ते हैं, इसलिए शरीर के आकार के हिसाब से उन्हें बड़ों से ज़्यादा पोषण चाहिए। शिशु (0–1 वर्ष) को पहले 6 महीने केवल माँ का दूध; 6 महीने पर नरम, मसला ऊपरी आहार (complementary food) शुरू होता है और स्तनपान चलता रहता है। टीकाकरण गंभीर बीमारियों से बचाता है। पूर्व-विद्यालय बच्चों (1–6 वर्ष) का पेट छोटा होता है, इसलिए 3 भोजन और 2 नाश्ते चाहिए, जैसे भुना चना, फल या अंकुरित अनाज। स्कूली बच्चों (6–12 वर्ष) को संतुलित आहार, अच्छा नाश्ता, पौष्टिक टिफ़िन और पानी चाहिए; आम समस्याएँ हैं नाश्ता छोड़ना, जंक फ़ूड, एनीमिया, पेट के कीड़े, दाँतों की सड़न और मोटापा। विशेष ज़रूरत वाले बच्चों (बीमारी, विकलांगता) का भोजन उनकी स्थिति के अनुसार बनता है।
- शीतकालीन खेल: स्कीइंग और स्केटिंग – शीतकालीन खेल बर्फ़ या बर्फ़ीली सतह पर खेले जाते हैं, जहाँ घर्षण कम होता है। स्कीइंग में क्लासिक चाल (धक्का और फिसलन), स्केटिंग चाल (V आकार) या ढलान पर फिसलना आता है। आइस स्केट में पतला ब्लेड होता है। तीन परतें पहनो, वार्म-अप करो और सुरक्षित गिरना सीखो।
- शैवाल (Algae) – शैवाल सरल जीव हैं जो ज़्यादातर पानी में रहते हैं और धूप से खाना बनाते हैं। इनमें असली जड़, तना या पत्ती नहीं होती। ये एक कोशिका के भी हो सकते हैं और बहुत लंबे भी। हरे, भूरे और लाल शैवाल में अलग-अलग वर्णक होते हैं। ये ऑक्सीजन बनाते हैं और जल-जीवों को भोजन देते हैं।
- श्वसन और गैसों का विनिमय – साँस लेने से हवा फेफड़ों में आती-जाती है। हवा का रास्ता: नाक → श्वासनली → श्वसनी → श्वसनिकाएँ → कूपिकाएँ। जब डायाफ्राम और बाहरी पसली-पेशियाँ सिकुड़ती हैं तो छाती बड़ी होती है, अंदर का दाब घटता है और हवा अंदर आती है। कूपिकाओं में O2 रक्त में जाती है और CO2 बाहर आती है, हमेशा ज़्यादा आंशिक दाब से कम की ओर। रक्त O2 ज़्यादातर हीमोग्लोबिन पर और CO2 ज़्यादातर बाइकार्बोनेट बनाकर ले जाता है। मस्तिष्क का एक केंद्र साँस की लय तय करता है। ज्वारीय आयतन, जैव क्षमता जैसे आयतन जोड़कर निकाले जाते हैं।
- श्वसन: वायवीय, अवायवीय और मानव फेफड़े – श्वसन वह प्रक्रम है जिसमें कोशिका के अंदर भोजन (ज़्यादातर ग्लूकोज) टूटकर ऊर्जा देता है, जो ATP में जमा होती है। ऑक्सीजन के साथ (वायवीय) ग्लूकोज पूरा टूटकर CO₂ और जल बनता है और बहुत ऊर्जा मिलती है; ऑक्सीजन के बिना (अवायवीय) थोड़ी ऊर्जा मिलती है और एथेनॉल (यीस्ट) या लैक्टिक अम्ल (पेशी) बनता है। फेफड़ों की लाखों कूपिकाएँ रक्त तक ऑक्सीजन पहुँचाती हैं।
- संक्रमण नियंत्रण और सुरक्षित कार्यस्थल – संक्रमण छह कड़ियों की ज़ंजीर से फैलता है: कीटाणु, भंडार, निकास द्वार, फैलने का तरीका, प्रवेश द्वार और कमज़ोर मेज़बान। किसी एक कड़ी को तोड़ने से फैलाव रुक जाता है। स्वास्थ्यकर्मी यह पाँच मौकों पर हाथों की सफ़ाई, सही क्रम में PPE पहनने-उतारने, सफ़ाई और स्टरलाइज़ेशन, और जैव-चिकित्सा कचरे को रंग वाले डिब्बों में डालकर करते हैं। सुरक्षित कार्यस्थल फिसलने, सुई चुभने, आग और पीठ की चोट से भी बचाता है।
- संक्रामक रोग: रोगाणु कैसे फैलते हैं और हम उन्हें कैसे रोकें – संक्रामक (संचारी) रोग एक बहुत छोटे जीव से होता है, जिसे रोगाणु (pathogen) कहते हैं: बैक्टीरिया, वायरस, कवक या प्रोटिस्ट। यह हवा, पानी-खाना, छूने या मच्छर जैसे वाहक से एक व्यक्ति से दूसरे में जाता है। शरीर त्वचा, बलगम, पेट के अम्ल और श्वेत रक्त कोशिकाओं से लड़ता है। टीका प्रतिरक्षा तंत्र को पहले से तैयार कर देता है। हाथ धोना, साफ पानी, अच्छी तरह पका खाना, मच्छरदानी और बीमार होने पर घर रहना फैलाव कम करते हैं।
- संगठन के स्तर: कोशिका से जीवमंडल तक – जीवन सीढ़ी की तरह स्तरों में बना है, जैसे डिब्बे के अंदर डिब्बा। कोशिकाएँ मिलकर ऊतक बनाती हैं, ऊतक मिलकर अंग, अंग मिलकर अंग तंत्र और अंग तंत्र मिलकर पूरा जीव। एक जाति के जीव मिलकर समष्टि बनाते हैं; कई समष्टियाँ मिलकर समुदाय; समुदाय और उसके आस-पास की निर्जीव चीज़ें मिलकर पारितंत्र; और धरती के सारे पारितंत्र मिलकर जीवमंडल। हर स्तर अपने नीचे वाले स्तर से बनता है और कुछ नया कर सकता है।
- संधिपाद: कीट, मकड़ी और केकड़ा – संधिपाद ऐसे जीव हैं जिनके पैर जोड़ वाले, बाहर कठोर कंकाल और शरीर खंडों में बँटा होता है। बढ़ने के लिए ये निर्मोचन करते हैं। कीट के 6 पैर और 3 भाग, अरैक्निड (मकड़ी, किलनी, बिच्छू) के 8 पैर और 2 भाग, और क्रस्टेशियन (केकड़ा, झींगा) के आम तौर पर 10 पैर और 4 शृंगिकाएँ होती हैं।
- संसाधन वृद्धि अभ्यास: हैचरी से समुद्र तक – संसाधन वृद्धि का मतलब है जंगली मछलियों की संख्या फिर बढ़ाने में मदद करना। हैचरी में जनक मछलियाँ रखते हैं, अंडे लेते हैं, लार्वा और बाल मछलियाँ साफ़ टैंक में पालते हैं, कुछ पर टैग लगाते हैं और सही आकार पर छोड़ देते हैं। हर चरण में कुछ मछलियाँ कम होती हैं, इसलिए गिनती, सही खाना और साफ़ पानी ज़रूरी है।
- सफ़ाई और स्वच्छता – सफ़ाई का मतलब गंदगी हटाना है। स्वच्छता यानी वे आदतें जो कीटाणुओं को फैलने से रोकती हैं। साबुन से 20 सेकंड हाथ धोओ, कमरा ऊपर से नीचे और सूखे से गीले की ओर साफ़ करो, नाखून छोटे रखो, खाँसी ढको और कचरा सही डिब्बे में डालो।
- सब्ज़ी उत्पादन और प्रबंधन का अभ्यास – छोटा असली सब्ज़ी प्रोजेक्ट चलाकर सीखो। चक्र: योजना, काम, जाँच, सुधार। योजना में फ़सल, क्यारी, तारीख़ें और लागत; काम में बुवाई, पानी, निराई और बचाव; जाँच में नापना और डायरी लिखना; सुधार में कमी ठीक करके फिर दोहराना।
- सब्ज़ी की खेती, प्रबंधन और मूल्यांकन – अच्छी सब्ज़ी फ़सल के लिए सही किस्म चुनें, सही महीने में बोएँ, देखभाल करें (पानी, निराई, छँटाई, सहारा), कटाई के बाद ग्रेडिंग और पैकिंग करें, और मौसम या काम कठिन हो तो सुरंग या मशीन का उपयोग करें।
- सब्ज़ी की विशेषताएँ और खेती की तकनीकें – सब्ज़ियाँ खाए जाने वाले भाग से बाँटी जाती हैं: पत्ती, तना, जड़, फूल, फल या बीज। वृद्धि के लिए सही तापमान, रोशनी, पानी और मिट्टी चाहिए। किसान छाया, ढक्कन, मल्च और सिंचाई से इन्हें सँभालते हैं। नए पौधे बीज, कलम या ग्राफ़्टिंग से बनते हैं; प्रजनक बेहतर किस्में और संकर बनाते हैं।
- समष्टि आनुवंशिकी: जीन पूल, हार्डी-वाइनबर्ग और नई जातियाँ – समष्टि आनुवंशिकी (population genetics) पढ़ती है कि किसी आबादी में एलील आवृत्तियाँ कैसे बदलती हैं। सभी जीवों के सारे एलील मिलकर जीन पूल बनाते हैं। A और a एलील के लिए p + q = 1। अगर आबादी बड़ी हो, संगम यादृच्छिक हो, और प्रवास, उत्परिवर्तन व चयन न हो, तो हार्डी-वाइनबर्ग सिद्धांत कहता है कि आवृत्तियाँ नहीं बदलतीं और जीनोटाइप p² (AA) + 2pq (Aa) + q² (aa) = 1 होते हैं। इससे हटना यानी विकास हो रहा है, जिसके कारण हैं आनुवंशिक विचलन (बॉटलनेक, संस्थापक प्रभाव), जीन प्रवाह, उत्परिवर्तन, प्राकृतिक चयन या चुनकर संगम। जैविक जाति अवधारणा में जाति वह समूह है जो आपस में प्रजनन कर सके, यानी एक जीन पूल। नई जातियाँ तब बनती हैं जब जीन पूल प्रजनन पृथक्करण से कट जाते हैं: एलोपैट्रिक (भौगोलिक बाधा) या सिम्पैट्रिक (एक ही जगह, जैसे बहुगुणिता)। एक पूर्वज कई रूपों में फैल सकता है (अनुकूली विकिरण, अपसरण), और असंबंधित जीव एक जैसे बन सकते हैं (अभिसरण)।
- समष्टि और संसाधन (Populations and Resources) – समष्टि (population) एक ही जाति के उन सभी जीवों का समूह है जो एक समय में एक जगह रहते हैं। जब जन्म (और बाहर से आने वाले) मृत्यु (और बाहर जाने वालों) से ज़्यादा हों, तब यह बढ़ती है। भोजन, पानी, जगह और आश्रय जैसे संसाधन सीमित हैं, इसलिए वृद्धि धीमी होकर वहन क्षमता (carrying capacity) पर रुक जाती है। जो भी चीज़ समष्टि को बढ़ने से रोके, वह सीमाकारी कारक है: संसाधनों की कमी, शिकारी, प्रतिस्पर्धा, रोग या ख़राब मौसम।
- समस्थापन (Homeostasis) – समस्थापन वह तरीका है जिससे शरीर अपना आंतरिक वातावरण (रक्त और ऊतक द्रव) स्थिर रखता है, चाहे बाहर का मौसम बदले। यह शरीर का ताप (लगभग 37 °C), रक्त ग्लूकोज़ (लगभग 4–6 mmol/L), पानी-लवण और रक्त pH (लगभग 7.4) नियंत्रित करता है। ज़्यादातर यह ऋणात्मक पुनर्भरण से होता है: ग्राही बदलाव पहचानता है, नियंत्रण केंद्र तय करता है, और प्रभावक स्तर को निर्धारित बिंदु पर लौटाता है।
- समुदाय के प्रकार: मरुस्थल, घास का मैदान और वन – समुदाय (community) एक जगह साथ रहने वाले अलग-अलग जातियों के सारे जीवों (पौधे, जानवर, कवक, सूक्ष्मजीव) का समूह है। समुदाय का प्रकार मुख्य रूप से जलवायु, खासकर पानी पर निर्भर है। सूखे स्थान पर मरुस्थल, मध्यम नमी में घास का मैदान और ज़्यादा बारिश में वन समुदाय बनता है।
- समुदाय में महत्त्व मान और प्रभुत्व – किसी पादप समुदाय में कौन-सी प्रजाति सबसे ज़रूरी है, यह जानने के लिए वैज्ञानिक वर्ग (क्वाड्रेट) से नमूना लेते हैं। हर प्रजाति का सापेक्ष घनत्व (कितने), सापेक्ष बारंबारता (कितनी दूर तक फैली) और सापेक्ष प्रभुत्व (तने कितनी जगह घेरते हैं) निकालते हैं। तीनों का जोड़ महत्त्व मान (IV) है। सबसे बड़े IV वाली प्रजाति प्रमुख प्रजाति कहलाती है।
- समुद्र का उपयोग और पर्यावरण संरक्षण – समुद्र हमें भोजन, परिवहन, ऊर्जा, नमक, रोज़गार और मनोरंजन देता है। ज़्यादा लेने या प्रदूषण करने पर वह सँभल नहीं पाता। सोच-समझकर उपयोग यानी मछलियों की सालाना बढ़त से कम पकड़ना, जगह साझा करना और प्रवाल भित्ति, मैंग्रोव व प्रजनन क्षेत्रों को बचाना।
- समुद्र का विकास और पर्यावरण सुधार – हम समुद्र को मछली पकड़ने और रहने के लिए बेहतर बना सकते हैं। मछली के ठिकाने बनाते हैं (कृत्रिम रीफ़, समुद्री घास, उथली गीली ज़मीन), तट विकसित करते हैं (ब्रेकवाटर, घाट, मछली बंदरगाह) और समुद्र को साफ़ करते हैं (गंदे पानी का उपचार, तेल-घेरा, गाद निकालना)। हर काम में समुद्री जीवन की रक्षा ज़रूरी है।
- समुद्री जंतु: समुद्र में कौन रहता है? – समुद्री जंतु खारे पानी में तीन तरह से रहते हैं: तैराक (नेक्टन) जैसे मछली और व्हेल, बहने वाले (प्लवक) जैसे जेलीफ़िश, और तल के निवासी (बेंथोस) जैसे केकड़ा, सीप और तारा मछली। मुख्य समूह हैं: मछली, स्तनधारी, क्रस्टेशियन, मोलस्क, जेलीफ़िश (सीलेंटरेट) और एकाइनोडर्म।
- समुद्री जीव विज्ञान: समुद्र में जीवन – समुद्री जीव विज्ञान समुद्र के जीवन का अध्ययन है। समुद्री जीवों को उनके जीने के ढंग से बाँटते हैं: प्लवक बहते हैं, तरणक तैरते हैं और नितलक तल पर रहते हैं। गहराई के साथ प्रकाश घटता है, इसलिए भोजन बनाने वाले पादप प्लवक सतह के पास रहते हैं और लगभग हर समुद्री खाद्य शृंखला को भोजन देते हैं। प्रवाल भित्ति, मैंग्रोव, खुला समुद्र और गहरा समुद्र मुख्य पारितंत्र हैं। समुद्र भोजन, दवाएँ और विलवणीकरण से मीठा पानी देता है, पर उसे अति-मत्स्यन, प्रदूषण और गर्मी से ख़तरा है।
- समुद्री जीवों पर प्रयोग – समुद्री जीव प्रयोग यह जाँचते हैं कि सागर के जीव अपने माहौल पर कैसे प्रतिक्रिया करते हैं। जंतु प्रयोग: गर्म पानी में मछली तेज़ साँस लेती है। पादप प्रयोग: ज़्यादा रोशनी में शैवाल ज़्यादा बढ़ता है। प्लवक प्रयोग: जाल खींचो, जार में गिनो। हमेशा निष्पक्ष परीक्षण करो (एक ही चीज़ बदलो), नियंत्रण रखो, दोहराओ और जीवों का ध्यान रखो।
- समुद्री पौधे: धूप वाले उथले पानी का जीवन – समुद्री पौधे और शैवाल प्रकाश-संश्लेषण से भोजन बनाते हैं, इसलिए वे वहीं रहते हैं जहाँ रोशनी पहुँचती है: किनारे के पास और ऊपरी 200 मीटर में। सी-ग्रास जड़ों वाला फूल वाला पौधा है। समुद्री शैवाल में जड़ नहीं, होल्डफास्ट होता है। हरे शैवाल उथले में, भूरे बीच में, लाल सबसे गहरे रहते हैं।
- समुद्री भोजन प्रसंस्करण अभ्यास – मछली जल्दी ख़राब होती है, क्योंकि उसके नरम, गीले और प्रोटीन वाले गूदे में कीटाणु तेज़ी से बढ़ते हैं। प्रसंस्करण से मछली सुरक्षित रहती है: तुरंत ठंडा करना, साफ़ पानी और साफ़ औज़ारों से सफ़ाई, फ़िलेट काटना, फिर सुखाकर, नमक लगाकर, पकाकर या डिब्बे में बंद करके रखना। ठंड और सफ़ाई दो बड़े नियम हैं।
- सरीसृप: सूखी त्वचा, खोल वाले अंडे, शीत-रक्त – सरीसृप (छिपकली, साँप, कछुआ, मगरमच्छ) शीत-रक्तीय कशेरुकी जंतु हैं। इनकी त्वचा सूखी और शल्कों से ढकी होती है। ये फेफड़ों से साँस लेते हैं और ज़्यादातर चमड़े जैसे खोल वाले अंडे ज़मीन पर देते हैं। इनके शरीर का ताप आसपास पर निर्भर है, इसलिए ये धूप सेंकते हैं।
- सह-विकास और जैव विविधता का निर्माण – सह-विकास तब होता है जब दो या ज़्यादा तरह के जीव कई पीढ़ियों तक प्राकृतिक चयन से एक-दूसरे को बदलते हैं। गहरी नली वाला फूल और लंबी जीभ वाला पतंगा, तेज़ शिकारी और तेज़ शिकार, परजीवी और मेज़बान इसके जाने-माने जोड़े हैं। हर साथी दूसरे के वातावरण का हिस्सा है, इसलिए एक में बदलाव दूसरे में मेल खाने वाले बदलाव को बढ़ावा देता है। अलगाव, उत्परिवर्तन और अलग आवासों में प्राकृतिक चयन के साथ मिलकर सह-विकास नई प्रजातियाँ और पक्के साझेदारी रिश्ते बनाता है। इसी से जीवन की भारी विविधता यानी जैव विविधता (जीन, प्रजातियाँ, पारितंत्र) बनती है।
- साथी पशु पालना और उनका उपयोग – साथी पशु को भोजन, साफ पानी, बिस्तर, कसरत, इनाम से प्रशिक्षण और स्वास्थ्य देखभाल चाहिए। लोग साथी पशुओं का उपयोग साथ, कसरत, मदद और थेरेपी के लिए करते हैं। सुरक्षा और स्वच्छता का मतलब है टीके, नहलाना, साफ कटोरे, सुरक्षित पकड़ और हाथ धोना, क्योंकि कुछ कीटाणु पशुओं से इंसानों में आ जाते हैं।
- सुपोषण (यूट्रोफिकेशन) और शैवाल प्रस्फुटन – जब किसी जलाशय में पोषक तत्त्व (नाइट्रोजन और फ़ॉस्फ़ोरस) ज़रूरत से बहुत ज़्यादा आ जाते हैं, तो उसे सुपोषण (यूट्रोफिकेशन) कहते हैं। शैवाल (algae) बेहिसाब बढ़कर सतह ढक लेते हैं, धूप रोकते हैं, और मरने पर उनके सड़ने में सारी ऑक्सीजन ख़त्म हो जाती है। मछलियाँ दम घुटने से मर जाती हैं।
- सुरक्षित मछली और साफ़ पानी – फ़ार्म की मछली खाने में सुरक्षित होनी चाहिए और फ़ार्म को पानी को नुक़सान नहीं पहुँचाना चाहिए। सुरक्षा का मतलब है साफ़ संभाल, मछली में दवा न बचना (निकासी अवधि), हर खेप का ट्रेस होने वाला टैग, और लगभग 0 से 4 डिग्री सेल्सियस की कोल्ड चेन। पर्यावरण की देखभाल का मतलब है दाने का कचरा घटाना, एक जगह बहुत मछलियाँ न रखना (वहन क्षमता), जगह को आराम देना, और मछली के साथ शैवाल व सीप उगाना।
- सूक्ष्मजीव संवर्धन: लैब में सूक्ष्मजीव कैसे उगाते हैं – किसी सूक्ष्मजीव को पढ़ने के लिए हम कुछ कोशिकाओं से बहुत सारी कोशिकाएँ उगाते हैं। इसे संवर्ध (कल्चर) कहते हैं। पहले औज़ारों और भोजन के सारे कीटाणु मारते हैं (निर्जर्मीकरण)। फिर प्लेट में सूक्ष्मजीवों को भोजन देते हैं (संवर्धन माध्यम)। गर्म करके ठंडा किए तार के लूप से थोड़ी कोशिकाएँ फैलाते हैं (स्ट्रीकिंग) और प्लेट को गर्म जगह रखते हैं। हर कोशिका एक दिखने वाला बिंदु बन जाती है, जिसे कॉलोनी कहते हैं। फ़्लास्क में कोशिकाओं की संख्या चार चरणों में बढ़ती है: लैग, लॉग, स्थिर और मृत्यु।
- सूक्ष्मजीव-विज्ञान: उगाना, पहचानना और गिनना – सूक्ष्मजीव-विज्ञान की प्रयोगशाला में हम अगर पर सूक्ष्मजीव उगाते हैं, चयनात्मक माध्यम से मनचाहा जीव छाँटते हैं, उस पर दवाओं का असर जाँचते हैं (एंटीबायोग्राम), आकार, ग्राम अभिरंजन और उपापचयी परीक्षणों से पहचानते हैं, और सूक्ष्मदर्शी या प्लेट-गिनती से गिनते हैं (CFU/mL = बस्तियाँ × तनुता-गुणक ÷ फैलाया आयतन)।
- सूक्ष्मजीव: हमारे चारों ओर के नन्हे जीव – सूक्ष्मजीव (माइक्रोब) वे जीव हैं जो इतने छोटे हैं कि बिना सूक्ष्मदर्शी के नहीं दिखते। मुख्य समूह हैं जीवाणु, कवक, प्रोटोज़ोआ और शैवाल; वायरस भी इनके साथ पढ़े जाते हैं पर वे कोशिका नहीं हैं। जीवाणु में केंद्रक नहीं होता (प्रोकैरियोट), बाकी में होता है (यूकैरियोट)। जीवाणु दो में बँटकर बढ़ते हैं, इसलिए उनकी संख्या बार-बार दोगुनी होती है। ज़्यादातर सूक्ष्मजीव हानिरहित या उपयोगी हैं: आँत के जीवाणु पाचन में मदद करते हैं, सूक्ष्मजीव दही और ब्रेड बनाते हैं, मरी चीज़ें सड़ाते हैं और नाइट्रोजन स्थिर करते हैं। कुछ रोगाणु रोग फैलाते हैं। एंटीबायोटिक जीवाणुओं को मारते हैं, वायरस को नहीं, और इनका गलत इस्तेमाल प्रतिरोधी जीवाणु पैदा करता है।
- सूक्ष्मदर्शी और सूक्ष्मदर्शिकी – सूक्ष्मदर्शी बहुत छोटी चीज़ों को बड़ा दिखाता है। कुल आवर्धन = नेत्रिका × अभिदृश्यक। विभेदन (रिज़ॉल्यूशन) यानी दो पास-पास के बिंदुओं को अलग-अलग दिखा पाना। प्रकाश सूक्ष्मदर्शी लगभग 200 nm तक, इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी लगभग 0.1 nm तक दिखाता है। अच्छी स्लाइड पतली, रंगी हुई और तिरछी रखी कवर स्लिप वाली होती है।
- सूमो: नीचे कूल्हे, मज़बूत पैर, रिंग से बाहर धक्का – सूमो जापान की कुश्ती है। दो पहलवान एक-दूसरे को गोल रिंग (दोह्यो) से बाहर धकेलने या फेंकने की कोशिश करते हैं, या पैरों के तलवों के सिवा किसी अंग को ज़मीन से छुआने की। बुनियादी चालें हैं शिको (टाँग उठाकर पटकना) और सुरिआशी (सरकता क़दम)। मुख्य जीतने की चालें हैं धक्का (ओशी), पट्टा-पकड़ (योरी) और फेंक (नागे)।
- सेहत और खान-पान: भोजन क्या करता है और कहाँ गड़बड़ होती है – भोजन ऊर्जा देता है, बढ़ने में मदद करता है, सेहत की रक्षा करता है और लोगों को साथ लाता है। नियमित भोजन और ऐसी थाली, जिसमें ज़्यादातर सब्ज़ी-फल, कुछ अनाज, थोड़ा प्रोटीन और बहुत कम चीनी-नमक-तेल हो, सेहत के लिए अच्छी है। आज की आम समस्याएँ हैं: भोजन छोड़ना, चीनी-नमक-तेल ज़्यादा, सब्ज़ी कम, अकेले या स्क्रीन के सामने खाना, और खाने की बर्बादी।
- सेहत सुधारने वाली जिम्नास्टिक्स: ताकत, एरोबिक्स और मुद्रा – सेहत सुधारने वाली जिम्नास्टिक्स का मतलब है सरल कसरतें जो मेडल के लिए नहीं, तंदुरुस्ती के लिए की जाती हैं। एथलेटिक जिम्नास्टिक्स में अपने शरीर के वज़न से ताकत बढ़ती है (स्क्वैट, पुश-अप, प्लैंक)। एरोबिक जिम्नास्टिक्स में संगीत की ताल पर कसरत होती है, जिससे दिल और फेफड़े देर तक काम करते हैं। अच्छे सत्र में वार्म-अप, मुख्य कसरत और कूल-डाउन होता है। सही मुद्रा और सुरक्षित, नियमित योजना कठिन चालों से ज़्यादा ज़रूरी है।
- स्कूल स्वास्थ्य – स्कूल स्वास्थ्य का मतलब है स्कूल में बच्चों की सेहत का ध्यान रखना। इसके दो बड़े भाग हैं। पहला, स्कूल स्वास्थ्य प्रबंधन: स्वास्थ्य जाँच, इलाज और फॉलो-अप, प्राथमिक उपचार, टीके, साफ़-सुरक्षित जगह और रिकॉर्ड। दूसरा, स्वास्थ्य शिक्षा: बच्चों को जानकारी, सही सोच और रोज़ की आदतें (हाथ धोना, खाना, नींद, कसरत, सुरक्षा) सिखाना।
- स्ट्रेचिंग और शेपिंग: सुरक्षित लचीलापन और शरीर की टोनिंग – स्ट्रेचिंग में मांसपेशी को हल्के से लंबा किया जाता है, जिससे लचीलापन (जोड़ पर गति की सीमा) बढ़ता है। पहले वार्म-अप करें, फिर स्टैटिक स्ट्रेच करें: हल्का तनाव आने तक धीरे खींचें, 20 से 30 सेकंड रुकें, धीरे साँस लें, झटका न दें, दर्द तक न जाएँ। शेपिंग लयबद्ध व्यायामों का समूह है, जिसे दोहराव (रेप) और दौर (सेट) में करते हैं। इससे मांसपेशियाँ कसती हैं और शरीर का आकार व मुद्रा सुधरती है। दोनों हफ़्ते में कई बार नियमित करें।
- स्तनधारी: फर, दूध और जीवन शुरू करने के तीन तरीक़े – स्तनधारी गर्म-रक्तीय कशेरुकी हैं जिनके बाल या फर, चार कक्ष वाला हृदय और बच्चों के लिए दूध बनाने वाली स्तन-ग्रंथियाँ होती हैं। तीन समूह हैं: मोनोट्रीम अंडे देते हैं, मार्सुपियल बहुत छोटे बच्चे जनते हैं जो थैली में बढ़ते हैं, और अपरा वाले स्तनधारी बच्चे को गर्भाशय में पोषण देते हैं। मुख्य गणों में कृंतक, माँसाहारी, नरवानर, खुरवाले, चमगादड़ और ह्वेल शामिल हैं।
- स्वच्छता और सफ़ाई (Hygiene and Sanitation) – स्वास्थ्य का मतलब सिर्फ़ बीमारी न होना नहीं, बल्कि शरीर, मन और सामाजिक जीवन तीनों में ठीक रहना है। स्वास्थ्य के संकेत (indicators) हैं: उम्र के हिसाब से वज़न, ऊर्जा, अच्छी नींद और कम बीमार पड़ना। ग़लत खान-पान से कुपोषण होता है: अल्पपोषण (कम खाना या पोषक तत्व) या अतिपोषण (बहुत ज़्यादा, जिससे मोटापा)। स्वच्छता (hygiene) यानी साफ़ आदतें जो कीटाणु रोकें: व्यक्तिगत, भोजन और पर्यावरण स्वच्छता। सफ़ाई व्यवस्था (sanitation) यानी कचरे और गंदे पानी को सुरक्षित हटाना। पीने का पानी उबालकर, छानकर, क्लोरीन या दूसरे तरीकों से सुरक्षित बनाना चाहिए।
- स्वस्थ जीवनशैली: रोज़ की आदतें जो तुम्हें ठीक रखें – स्वस्थ जीवनशैली रोज़ की अच्छी आदतों का नाम है: पाँच भोजन-समूहों वाला संतुलित आहार, भरपूर पानी, स्कूली बच्चों के लिए 9–11 घंटे और किशोरों के लिए लगभग 8–10 घंटे नींद, रोज़ कम से कम 60 मिनट खेल-कूद, सही मुद्रा, साफ-सुरक्षित भोजन, और तंबाकू, शराब व नशे से दूरी। इनसे टाइप 2 मधुमेह, हृदय रोग और कुछ कैंसर जैसे जीवनशैली रोगों का खतरा घटता है।
- स्वास्थ्य और दैनिक जीवन: स्वास्थ्य का अर्थ, जीवन-चरण, घरेलू सेवा – स्वास्थ्य का अर्थ है शरीर, मन और सामाजिक जीवन तीनों का ठीक रहना, केवल बीमारी न होना नहीं। जीवन के चरणों (शिशु, बच्चा, किशोर, वयस्क, बुज़ुर्ग) में ज़रूरतें बदलती हैं, पर चार रोज़ के खंभे वही रहते हैं: भोजन, नींद, गतिविधि और जाँच। घर में बीमार की सेवा में बुखार नापना, आराम, तरल पदार्थ, साफ़ हाथ, साफ़ आरामदेह कमरा और ख़तरे के लक्षणों पर नज़र रखना शामिल है।
- स्वास्थ्य और रोग – स्वास्थ्य का मतलब है शरीर, मन और सामाजिक जीवन तीनों में पूरी तरह ठीक होना, केवल बीमार न होना नहीं। संक्रामक रोग रोगाणुओं (जीवाणु, विषाणु, कवक, प्रोटिस्ट) से होते हैं और हवा, पानी, भोजन, छूने या जानवरों से एक से दूसरे में फैलते हैं। हृदय रोग, मधुमेह, कई कैंसर और उच्च रक्तचाप जैसे असंक्रामक रोग नहीं फैलते; ये जीन, उम्र और जीवनशैली से जुड़े हैं। बचाव: स्वच्छता, साफ़ पानी, टीके, संतुलित आहार, व्यायाम, नींद, धूम्रपान से दूरी, नियमित जाँच और स्व-जाँच। एंटीबायोटिक जीवाणु मारते हैं, विषाणु नहीं; इनके ग़लत उपयोग से प्रतिरोधी जीवाणु पनपते हैं। दवा पर्चे या डॉक्टर के कहे अनुसार ही लें।
- स्वास्थ्य गतिविधियाँ और सामाजिक उपाय – समुदाय टीकाकरण शिविर, जाँच, जागरूकता अभियान और साफ़ पानी से मिलकर सेहत बचाता है। रक्तदान और अंगदान स्वस्थ लोगों के ऐसे उपहार हैं जो मरीज़ों की जान बचाते हैं। एक रक्तदान तीन लोगों तक की मदद कर सकता है, और अंगदान में सहमति हमेशा ज़रूरी है।
- स्वास्थ्य देखभाल: वाइटल साइन, चिकित्सा शब्द और देखभाल कौशल – स्वास्थ्य देखभाल लोगों को स्वस्थ रखने और बीमार होने पर उनकी देखभाल का काम है। स्वास्थ्यकर्मी मूल, उपसर्ग और प्रत्यय से बनी साझा चिकित्सा भाषा बोलते हैं। वे चार जीवन-चिह्न जाँचते हैं: तापमान (सामान्य लगभग 36.5–37.5 °C), नाड़ी (वयस्क 60–100 प्रति मिनट), साँस की दर (वयस्क 12–20 प्रति मिनट) और रक्तचाप (स्वस्थ 120/80 mmHg से कम)। वे थर्मामीटर, स्टेथोस्कोप, बीपी कफ़ जैसे उपकरण इस्तेमाल करते हैं, हाथों की सफ़ाई और PPE से संक्रमण रोकते हैं, जानकारी साफ़ और गोपनीय रूप से लिखते-बताते हैं, और लोगों को स्वस्थ आदतें चुनने में मदद करते हैं।
- स्वास्थ्य सेवा प्रणाली: कहाँ जाएँ, आपके अधिकार और खर्च कौन दे – स्वास्थ्य सेवा प्रणाली वे लोग, जगहें और पैसा हैं जो पूरी आबादी को स्वस्थ रखते हैं। देखभाल के स्तर होते हैं: छोटी समस्या के लिए स्व-देखभाल और फ़ार्मेसी, पहला दरवाज़ा प्राथमिक चिकित्सक, रेफ़रल से विशेषज्ञ और जाँच, गंभीर बीमारी में अस्पताल, और जान का खतरा हो तो 112 से आपातकालीन विभाग। मरीज़ के अधिकार हैं: जानकारी, सहमति, गोपनीयता, सम्मान और शिकायत। ई-हेल्थ (ऑनलाइन रिकॉर्ड, ई-पर्ची, टेलीमेडिसिन) पहुँच आसान बनाती है। पैसा कर, बीमा किश्त और जेब से भुगतान से आता है और एक कोष में जुड़कर सेवाओं को मिलता है।
- स्वास्थ्य स्तर और विकलांगता के अनुसार नर्सिंग – व्यक्ति स्वास्थ्य रेखा पर जहाँ है, नर्सिंग उसी के अनुसार बदलती है। तीव्र चरण में नर्स कड़ी निगरानी रखती हैं और तुरंत काम करती हैं। दीर्घकालिक चरण में रोज़ की स्व-देखभाल सिखाती हैं। पुनर्वास में रोज़ का जीवन धीरे-धीरे लौटाती हैं। अंतिम चरण में दर्द कम करती हैं और गरिमा बचाती हैं। कैंसर नर्सिंग सभी चरणों में हो सकती है।
- हरित उद्योग: पौधे उगाना और ज़मीन की देखभाल – हरित उद्योग पौधे उगाते हैं और ज़मीन की देखभाल करते हैं: बागवानी, कृषि, वानिकी, भूदृश्य निर्माण, घास-मैदान और फूलों का काम। पौधों को प्रकाश, पानी, सही तापमान, पोषक तत्व, CO₂ और अच्छी मिट्टी चाहिए; सबसे कम मिलने वाला कारक वृद्धि सीमित करता है। उत्पादक बीज, कलम, दाब, विभाजन और ग्राफ़्टिंग से पौधे बनाते हैं, अक्सर ग्रीनहाउस में। भूदृश्य डिज़ाइनर जगह का अध्ययन करके पैमाने वाला नक्शा बनाते हैं। गणित (क्षेत्रफल, दर, अनुपात), रिकॉर्ड, तकनीक और सुरक्षा रोज़ के कौशल हैं।
- ATP: कोशिका की ऊर्जा मुद्रा – ATP (एडिनोसिन ट्राइफॉस्फेट) एक न्यूक्लियोटाइड है जिसमें एडेनिन क्षार, राइबोज़ शर्करा और तीन फॉस्फेट समूह होते हैं। ATP हाइड्रोलेज़ एंज़ाइम पानी की मदद से आख़िरी फॉस्फेट अलग करता है (जल-अपघटन): ATP + H₂O → ADP + Pi, और लगभग 30 kJ प्रति मोल ऊर्जा छोटे, काम के हिस्सों में निकलती है। श्वसन और प्रकाश-संश्लेषण के समय ATP सिंथेज़ ADP और Pi को संघनन से फिर जोड़ता है। कोशिका ATP जमा नहीं करती, लगातार बनाती और खर्च करती है। एक ग्लूकोज से वायवीय श्वसन में लगभग 30–32 ATP, पर अवायवीय में सिर्फ़ 2 ATP मिलते हैं।
- DNA आनुवंशिक पदार्थ है: वे प्रयोग जिन्होंने यह सिद्ध किया – जीन जीवन के निर्देश हैं, पर वे किस चीज़ के बने हैं? 1928 में ग्रिफ़िथ ने देखा कि मरे हुए रोगकारक जीवाणु का कोई पदार्थ हानिरहित जीवाणुओं को हानिकारक बना देता है। 1944 में एवरी और साथियों ने दिखाया कि यह पदार्थ DNA है, क्योंकि केवल DNA-नाशक एंज़ाइम ने बदलाव रोका। 1952 में हर्शी और चेज़ ने विषाणु के DNA पर रेडियोधर्मी फ़ॉस्फ़ोरस और प्रोटीन पर रेडियोधर्मी सल्फ़र लगाया और पाया कि केवल DNA जीवाणु में घुसा। इसलिए अधिकतर जीवों में DNA आनुवंशिक पदार्थ है। कुछ विषाणुओं में RNA होता है।
- DNA की संरचना: दोहरी कुंडली – DNA एक मुड़ी हुई सीढ़ी है जिसे दोहरी कुंडली (double helix) कहते हैं। हर किनारे की पटरी एक स्ट्रैंड है जो न्यूक्लियोटाइडों से बनी है; न्यूक्लियोटाइड में फ़ॉस्फ़ेट, शर्करा और एक क्षार (A, T, G या C) होता है। डंडियाँ क्षार-युग्म हैं: बड़ा क्षार हमेशा छोटे क्षार से जुड़ता है, A से T (2 हाइड्रोजन बंध) और G से C (3 हाइड्रोजन बंध)। दोनों स्ट्रैंड उलटी दिशाओं में चलते हैं। कुंडली हर 10 क्षार-युग्म (3.4 nm) पर एक घुमाव लेती है और 2 nm चौड़ी है। जोड़ी-नियम के कारण दोहरे स्ट्रैंड वाले DNA में A = T और G = C होता है (चारगाफ़ का नियम)।
- DNA प्रतिकृति: कोशिका अपने DNA की कॉपी कैसे बनाती है – कोशिका बँटने से पहले अपने DNA की हूबहू कॉपी बनाती है, ताकि हर नई कोशिका को पूरे निर्देश मिलें। हेलिकेज़ दोहरी कुंडली को खोलता है। हर पुराना स्ट्रैंड साँचा (टेम्पलेट) बनता है। DNA पॉलिमरेज़ जोड़ीदार क्षार लगाता है (A के साथ T, G के साथ C)। अंत में दो DNA बनते हैं, हर एक में एक पुराना और एक नया स्ट्रैंड (अर्ध-संरक्षी)। पॉलिमरेज़ अपना काम जाँचता है, इसलिए गलती बहुत कम होती है; जो गलती रह जाए वह उत्परिवर्तन (म्यूटेशन) है।