इंसुलिन और टीके का उत्पादन
इंसुलिन रक्त शर्करा नियंत्रित करता है। पहले इसे मवेशियों और सुअरों के अग्न्याशय से निकाला जाता था। कुछ रोगियों को इससे एलर्जी होती थी और मात्रा भी सीमित थी।
शरीर में इंसुलिन पहले प्राक्-इंसुलिन (प्रो-इंसुलिन) के रूप में बनता है: शृंखला A, B और एक अतिरिक्त भाग C-पेप्टाइड। परिपक्व हॉर्मोन में C-पेप्टाइड हट जाता है। 1983 में अमेरिकी कंपनी एली लिली ने तरीका निकाला: A और B शृंखला के लिए दो DNA टुकड़े बनाए, हर एक को E. coli के प्लाज़्मिड में डाला, शृंखलाएँ अलग-अलग बनवाईं, शुद्ध कीं और डाइसल्फ़ाइड बंधों से जोड़ दीं। इसे ह्यूमुलिन कहते हैं। C-पेप्टाइड हटाने की ज़रूरत ही नहीं पड़ी।
पुनर्योगज टीके
टीका प्रतिरक्षा तंत्र को रोगाणु पहचानना सिखाता है। पूरे रोगाणु की जगह केवल एक सतही प्रोटीन (प्रतिजन) का जीन यीस्ट या जीवाणु में डालते हैं। वे जो प्रोटीन बनाते हैं, वही टीका है। पूरा रोगाणु नहीं, इसलिए रोग नहीं होता। यीस्ट में बना हेपेटाइटिस B टीका मुख्य उदाहरण है। ये सुरक्षित हैं और बड़ी मात्रा में बनते हैं।
दवा में अन्य उपयोग: आणविक निदान। PCR बहुत कम मात्रा में वायरस या जीवाणु (जैसे संदिग्ध एड्स रोगी में HIV) लक्षण से पहले पकड़ लेता है। ELISA प्रतिजन या प्रतिरक्षी पहचानता है। प्रोब (चिह्नित एकल-स्ट्रैंड DNA/RNA) मेल खाते क्रम से चिपककर खराब जीन बताता है।
स्टेम कोशिकाएँ
स्टेम कोशिका अभी विशेषित नहीं हुई कोशिका है। इसकी दो शक्तियाँ हैं: विभाजित होकर अपनी जैसी कोशिकाएँ बनाना (स्व-नवीकरण) और विशेष कोशिका में बदलना (विभेदन)। स्रोत:
- भ्रूणीय स्टेम कोशिका: बहुत शुरुआती भ्रूण से; लगभग कोई भी कोशिका बन सकती है।
- वयस्क स्टेम कोशिका: जैसे अस्थि मज्जा में; कम प्रकार बनाती है, जैसे सभी रक्त कोशिकाएँ।
- गर्भनाल रक्त: जन्म के समय लेकर बैंक में रखा जाता है।
उपयोग: रक्त कैंसर और थैलेसीमिया में अस्थि मज्जा प्रत्यारोपण; हृदय, तंत्रिका और त्वचा की मरम्मत पर शोध। चिंताएँ: भ्रूण के उपयोग पर नैतिक प्रश्न; शरीर दाता कोशिकाएँ अस्वीकार कर सकता है; अनियंत्रित वृद्धि से ट्यूमर का ख़तरा।
जीन थेरेपी (जीन चिकित्सा)
जीन थेरेपी यानी खराब जीन से होने वाले रोग को ठीक करने के लिए रोगी की कोशिकाओं या भ्रूण में सही जीन डालना। पहली बार 1990 में 4 साल की बच्ची में ADA (एडीनोसीन डीएमिनेज़) की कमी का इलाज हुआ। ADA के बिना प्रतिरक्षा तंत्र काम नहीं करता (SCID का एक रूप)।
- रोगी के रक्त से लिम्फोसाइट (श्वेत रक्त कोशिका) निकालकर शरीर के बाहर उगाओ।
- रेट्रोवायरस वाहक (हानिरहित किया वायरस) से उनमें सही ADA जीन डालो।
- कोशिकाएँ वापस रोगी में डालो।
लिम्फोसाइट सदा जीवित नहीं रहतीं, इसलिए बार-बार इलाज चाहिए। अगर ADA जीन शुरुआती भ्रूण अवस्था में (या अस्थि मज्जा की स्टेम कोशिकाओं में) डाला जाए तो स्थायी इलाज हो सकता है। अस्थि मज्जा प्रत्यारोपण और एंज़ाइम इंजेक्शन भी हैं, पर वे पूरा इलाज नहीं।
GM जीव, Bt फसलें और RNAi
आनुवंशिकतः रूपांतरित जीव (GMO) वह पौधा, जंतु या सूक्ष्मजीव है जिसके जीन आनुवंशिक इंजीनियरिंग से बदले गए हों। GM पौधे: सूखा, ठंड, लवण और गर्मी सह सकते हैं; रासायनिक कीटनाशक की ज़रूरत घटाते हैं; कटाई के बाद का नुकसान घटाते हैं; खनिजों का बेहतर उपयोग करते हैं; पोषण बेहतर करते हैं, जैसे विटामिन A वाला सुनहरा धान (गोल्डन राइस)।
Bt कपास: विष कैसे काम करता है
मिट्टी का जीवाणु बैसिलस थुरिंजिएंसिस (Bt) Cry प्रोटीन बनाता है जो कुछ कीटों को मारता है: लेपिडोप्टेरा (बॉलवर्म, तंबाकू बडवर्म), कोलिओप्टेरा (भृंग) और डिप्टेरा (मक्खी, मच्छर)। जीवाणु इसे निष्क्रिय प्राक्-विष (प्रोटॉक्सिन) क्रिस्टल के रूप में रखता है, इसलिए ख़ुद को नुकसान नहीं होता। कीट की आँत के क्षारीय pH में क्रिस्टल घुलता है और प्रोटीन सक्रिय हो जाता है। यह आँत की कोशिकाओं से जुड़कर छिद्र बनाता है, कोशिकाएँ फूलकर फट जाती हैं और कीट मर जाता है। जीन को cry कहते हैं: cryIAc और cryIIAb कपास के बॉलवर्म को, cryIAb मक्के के छेदक (कॉर्न बोरर) को नियंत्रित करते हैं। मनुष्य और मवेशी का पेट अम्लीय है और उनमें मेल खाते ग्राही नहीं, इसलिए हमें नुकसान नहीं।
RNAi से पीड़क-प्रतिरोधी पौधे
सूत्रकृमि मेलॉइडोगाइनी इनकॉग्निटा तंबाकू की जड़ों को संक्रमित करता है। वैज्ञानिकों ने एग्रोबैक्टीरियम की मदद से सूत्रकृमि के जीन पौधे में डाले, ताकि पौधा सेंस और एंटी-सेंस RNA दोनों बनाए। ये जुड़कर द्वि-स्ट्रैंडी RNA बनाते हैं, जो RNA अंतरक्षेप (RNAi) शुरू करता है: सूत्रकृमि का मेल खाता mRNA चुप हो जाता है और परजीवी जड़ में जीवित नहीं रहता। RNAi सभी यूकैरियोट में प्राकृतिक रक्षा तरीका है।
पारजीनी जंतु
जिस जंतु के DNA में बाहरी जीन डालकर उसे व्यक्त कराया गया हो, वह पारजीनी है। चूहे, खरगोश, सुअर, भेड़, गाय और मछली बनाए गए हैं; 95% से ज़्यादा चूहे हैं। क्यों?
- सामान्य शरीर-क्रिया और विकास: जीन वृद्धि को कैसे नियंत्रित करते हैं, जैसे इंसुलिन-जैसा वृद्धि कारक।
- रोग का अध्ययन: कैंसर, सिस्टिक फ़ाइब्रोसिस, रूमेटॉइड संधिशोथ, अल्ज़ाइमर के मॉडल।
- जैविक उत्पाद: जैसे एम्फ़ाइसीमा के लिए α-1-एंटीट्रिप्सिन। 1997 में पहली पारजीनी गाय रोज़ी के दूध में मानव α-लैक्टैल्बुमिन (2.4 ग्राम प्रति लीटर) था, जो सामान्य गाय के दूध से बच्चों के लिए बेहतर है।
- टीका सुरक्षा: पोलियो टीका बंदरों से पहले पारजीनी चूहों पर जाँचा गया।
- रासायनिक सुरक्षा (विषाक्तता परीक्षण): संवेदनशील जीन वाले जंतु जल्दी परिणाम देते हैं।
जैव सुरक्षा, बायोपायरेसी और पेटेंट
नैतिकता और जैव सुरक्षा: जीवों को बदलने से पर्यावरण और स्वास्थ्य पर अनजाने असर हो सकते हैं। भारत ने GEAC (जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रेज़ल कमेटी) बनाई, जो तय करती है कि GM शोध सही है या नहीं और GM जीवों को जनता के उपयोग के लिए छोड़ना सुरक्षित है या नहीं।
पेटेंट: सरकार द्वारा आविष्कारक को दिया गया कानूनी अधिकार, ताकि तय समय तक दूसरे उसकी नकल न करें। समस्या तब होती है जब कंपनियाँ पारंपरिक ज्ञान या किसी देश के जैव संसाधनों पर पेटेंट लेने की कोशिश करती हैं।
बायोपायरेसी (जैव-दस्युता): किसी देश के जैव संसाधन या पारंपरिक ज्ञान का बिना अनुमति और बिना उचित भुगतान के उपयोग। उदाहरण: एक अमेरिकी कंपनी को 1997 में भारतीय बासमती को अर्ध-बौनी किस्मों से संकरित कर बने चावल पर पेटेंट मिला; हल्दी और नीम के उपयोगों पर भी पेटेंट की कोशिश हुई। भारत ने इन्हें चुनौती दी और 2002 में पेटेंट विधेयक में संशोधन किया। अमीर देशों के पास पैसा और तकनीक है; भारत जैसे देशों के पास जैव विविधता और पारंपरिक ज्ञान। लाभ का न्यायपूर्ण बँटवारा ज़रूरी है।
करके देखो: GM है या नहीं?
अगली बार सूती कमीज़ देखो तो याद करो कि कपास शायद Bt कपास थी। घर पर दो कॉलम बनाओ: "GM फसलों के लाभ" और "GM फसलों की चिंताएँ"। हर कॉलम में कम से कम चार बातें लिखो (जैसे कम छिड़काव बनाम कीटों में प्रतिरोध)। फिर 3D मेनू से हर उपयोग देखो और लिखो कि कौन सा तुम्हें सबसे उपयोगी लगा।
बोर्ड परीक्षा टिप: अक्सर पूछा जाता है: Bt विष कीट को कैसे मारता है और पौधे को क्यों नहीं; एली लिली का इंसुलिन उत्पादन; तंबाकू में RNAi; पहली जीन थेरेपी; पारजीनी जंतुओं के उपयोग; बायोपायरेसी भारतीय उदाहरण सहित; GEAC की भूमिका।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- इंसुलिन = शृंखला A (21 अमीनो अम्ल) + शृंखला B (30), डाइसल्फ़ाइड बंधों से जुड़ीं; प्रो-इंसुलिन में C-पेप्टाइड भी
- पुनर्योगज टीका = केवल प्रतिजन प्रोटीन, यीस्ट/जीवाणु में बना (जैसे हेपेटाइटिस B)
- स्टेम कोशिका = स्व-नवीकरण + विभेदन
- जीन थेरेपी (ADA, 1990): लिम्फोसाइट बाहर → रेट्रोवायरस से ADA जीन → कोशिकाएँ वापस
- Bt: cry जीन → प्रोटॉक्सिन → क्षारीय आँत → सक्रिय विष → छिद्र → मृत्यु (cryIAc, cryIIAb कपास; cryIAb मक्का)
- RNAi: द्वि-स्ट्रैंडी RNA मेल खाते mRNA को चुप करता है (तंबाकू बनाम मेलॉइडोगाइनी इनकॉग्निटा)
- GEAC = जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रेज़ल कमेटी
- बायोपायरेसी = बिना अनुमति/उचित भुगतान के जैव संसाधन या पारंपरिक ज्ञान का उपयोग
हल किए गए उदाहरण
1. Bt विष बैसिलस जीवाणु या कपास के पौधे को क्यों नहीं मारता?
यह निष्क्रिय प्रोटॉक्सिन के रूप में रहता है। केवल कीट की क्षारीय आँत में सक्रिय होता है। पौधे और जीवाणु में न वह क्षारीय आँत है, न ग्राही।
2. मानव इंसुलिन बनाने में C-पेप्टाइड की समस्या कैसे टली?
A और B शृंखलाएँ अलग DNA से E. coli में अलग-अलग बनीं और फिर डाइसल्फ़ाइड बंधों से जुड़ीं। प्रो-इंसुलिन बना ही नहीं, तो C-पेप्टाइड हटाना नहीं पड़ा।
3. लिम्फोसाइट द्वारा ADA जीन थेरेपी में बार-बार इलाज क्यों?
लिम्फोसाइट की आयु सीमित है। वे मरती हैं तो डाला गया जीन भी खो जाता है, इसलिए नई कोशिकाएँ फिर देनी पड़ती हैं।
4. पुनर्योगज हेपेटाइटिस B टीके में वायरस नहीं, फिर भी रक्षा कैसे?
इसमें वायरस का सतही प्रोटीन (प्रतिजन) है। प्रतिरक्षा तंत्र इसे पहचानना सीखता है और स्मृति कोशिकाएँ बनाता है, जो बाद में असली वायरस से लड़ती हैं।
5. RNAi तंबाकू को सूत्रकृमि से कैसे बचाता है?
सूत्रकृमि के जीन पौधे में डालकर सेंस और एंटी-सेंस RNA बनवाते हैं। ये द्वि-स्ट्रैंडी RNA बनाकर सूत्रकृमि का mRNA चुप कर देते हैं। सूत्रकृमि जड़ में जीवित नहीं रहता।
6. कोई कंपनी घाव भरने में हल्दी के पारंपरिक भारतीय उपयोग पर पेटेंट ले। क्या यह बायोपायरेसी है?
हाँ। यह भारत में पहले से मौजूद पारंपरिक ज्ञान का बिना अनुमति और बिना उचित लाभ-बँटवारे के उपयोग है।
आम गलतियाँ
- Bt विष को पौधे में सक्रिय बताना। यह क्षारीय कीट-आँत तक निष्क्रिय प्रोटॉक्सिन है।
- लिखना कि ह्यूमुलिन E. coli में प्रो-इंसुलिन से बना। A और B अलग बने और जोड़े गए।
- लिम्फोसाइट वाली जीन थेरेपी को स्थायी इलाज समझना। केवल भ्रूण या स्टेम कोशिका स्तर पर डालना स्थायी हो सकता है।
- बायोपायरेसी और पेटेंट को एक समझना। पेटेंट कानूनी अधिकार है; बायोपायरेसी बिना अनुमति का अनुचित उपयोग।