Poland Liceum ogólnokształcące, klasa IV Biology (extended level)
अध्याय: 6
1. XIII. Expression of genetic information
Gene expression
- वंशागति का आणविक आधार – ज़्यादातर जीवों में DNA आनुवंशिक पदार्थ है (कुछ वायरस में RNA)। यह द्विकुंडली है: न्यूक्लियोटाइड के दो प्रतिसमांतर सूत्र; A–T दो हाइड्रोजन बंध से, G–C तीन से। लंबा DNA हिस्टोन पर लिपटकर न्यूक्लियोसोम और फिर क्रोमैटिन बनाता है। DNA अर्धसंरक्षी ढंग से प्रतिकृति बनाता है (मेसेल्सन–स्टाल)। केंद्रीय सिद्धांत: DNA → RNA → प्रोटीन। अनुलेखन एक सूत्र से RNA बनाता है; यूकैरियोट में hnRNA पर कैप, पूँछ और स्प्लाइसिंग होती है। आनुवंशिक कूट त्रिक है, 64 कोडॉन (61 अमीनो अम्ल, 3 समापन), AUG से शुरू, लगभग सार्वत्रिक और अपह्रासित। राइबोसोम tRNA की मदद से mRNA को प्रोटीन में बदलता है। जीन चालू-बंद होते हैं; लैक ओपेरॉन इसका उदाहरण है। मानव और चावल जीनोम परियोजनाओं ने पूरा जीनोम पढ़ा, और DNA फिंगरप्रिंटिंग दोहराव वाले DNA (VNTR) से व्यक्ति की पहचान करती है।
2. XIV. Classical genetics
Inheritance · Variation
- वंशागति तथा विविधता के सिद्धांत – जीन जोड़ों में होते हैं (अलील)। हर माता-पिता हर जोड़े से एक अलील बच्चे को देता है। मेंडल ने प्रभाविता (3 : 1), पृथक्करण और स्वतंत्र अपव्यूहन (9 : 3 : 3 : 1) दिखाया। असली जीवन में मोड़ भी हैं: अपूर्ण प्रभाविता (1 : 2 : 1), सहप्रभाविता (AB रक्त), बहुविकल्पी अलील, बहुप्रभाविता (एक जीन, कई असर) और बहुजीनी लक्षण (कई जीन, एक लक्षण)। जीन गुणसूत्रों पर होते हैं, इसलिए एक ही गुणसूत्र के जीन सहलग्न रहते हैं और केवल जीन विनिमय से अलग होते हैं। लिंग गुणसूत्र लिंग तय करते हैं (मनुष्य XX-XY, पक्षी ZW, मधुमक्खी अगुणित-द्विगुणित) और लिंग-सहलग्न जीन रखते हैं (हीमोफीलिया, वर्णांधता)। जीन की गड़बड़ी से मेंडलीय विकार (थैलेसीमिया, सिकल-सेल) और गुणसूत्र संख्या की गड़बड़ी से डाउन, टर्नर, क्लाइनफेल्टर सिंड्रोम होते हैं।
- उत्परिवर्तन (Mutation) – उत्परिवर्तन DNA में अचानक होने वाला स्थायी बदलाव है। जीन (बिंदु) उत्परिवर्तन में एक या कुछ क्षार बदलते हैं: प्रतिस्थापन, जोड़ या विलोपन। जोड़ और विलोपन पढ़ने का ढाँचा खिसका देते हैं। गुणसूत्र उत्परिवर्तन में बड़े टुकड़े या गुणसूत्रों की संख्या बदलती है। ये संयोग से या उत्परिवर्तजनों (UV, X-किरणें, कुछ रसायन) से होते हैं। ये हानिकारक, तटस्थ या लाभदायक हो सकते हैं और हर आनुवंशिक विविधता की पहली जड़ हैं।
3. XV. Biotechnology and genetic engineering basics
Tools and techniques · GMOs, cloning, stem cells, ethics
- जैव प्रौद्योगिकी: सिद्धांत व प्रक्रम (पुनर्योगज DNA तकनीक) – आनुवंशिक इंजीनियरिंग यानी किसी जीव के जीन जान-बूझकर बदलना। चाहा गया जीन प्रतिबंधन एंज़ाइम (आणविक कैंची) से काटते हैं, DNA लाइगेज़ (आणविक गोंद) से वाहक DNA में जोड़ते हैं, परपोषी कोशिका में डालते हैं, सही कोशिकाएँ चुनते हैं और बड़े टैंक (बायोरिएक्टर) में उगाकर उत्पाद निकालते हैं। PCR जीन की लाखों प्रतियाँ बनाता है और जेल वैद्युतकणसंचलन DNA टुकड़ों को आकार के हिसाब से अलग करता है।
- जैव प्रौद्योगिकी एवं उसके उपयोग – आनुवंशिक इंजीनियरिंग के औज़ार दवा, खेती और शोध में काम आते हैं। जीवाणु मानव इंसुलिन बनाते हैं; यीस्ट सुरक्षित टीका-प्रोटीन बनाता है। स्टेम कोशिकाएँ कई प्रकार की कोशिकाओं में बदल सकती हैं। जीन थेरेपी रोगी की कोशिकाओं में सही जीन डालती है। Bt कपास जैसी GM फसलों में कीट मारने वाले प्रोटीन का जीन होता है। पारजीनी जंतु रोग समझने या दवा बनाने में मदद करते हैं। ये शक्तिशाली हैं, इसलिए भारत में GEAC इन पर नज़र रखती है और कानून बायोपायरेसी व अनुचित पेटेंट से बचाते हैं।
4. XVI. Evolution
Mechanisms of evolution · Population genetics and speciation · Human evolution
- विकास: जीवन की उत्पत्ति, क्रियाविधि और मानव विकास – शुरुआती पृथ्वी पर सरल रसायनों से जीवन शुरू हुआ: ओपेरिन और हाल्डेन ने कहा और मिलर ने फ्लास्क में अमीनो अम्ल बनाए। विकास के प्रमाण जीवाश्म, समजात और समरूप अंग, भ्रूण, अणु और आज दिखने वाले बदलाव (औद्योगिक मेलानिनता, दवा प्रतिरोध) से मिलते हैं। डार्विन ने इसे आबादी की विभिन्नता पर प्राकृतिक वरण से समझाया; आधुनिक संश्लेषित सिद्धांत जीन जोड़ता है: उत्परिवर्तन, पुनर्योजन, जीन प्रवाह, आनुवंशिक विचलन और प्राकृतिक वरण अलील आवृत्ति बदलते हैं। अगर इनमें से कुछ न हो, आवृत्तियाँ स्थिर रहती हैं: हार्डी–वाइनबर्ग, p² + 2pq + q² = 1। वरण स्थायीकारी, दिशात्मक या विदारक होता है। एक पूर्वज का कई आवासों में फैलकर कई जातियाँ बनाना अनुकूली विकिरण है (डार्विन की फिंच, ऑस्ट्रेलियाई शिशुधानी)। मनुष्य ड्रायोपिथेकस जैसे कपियों से ऑस्ट्रेलोपिथेकस, होमो हैबिलिस, होमो इरेक्टस और निएंडरथल होते हुए होमो सेपियंस बना।
- समष्टि आनुवंशिकी: जीन पूल, हार्डी-वाइनबर्ग और नई जातियाँ – समष्टि आनुवंशिकी (population genetics) पढ़ती है कि किसी आबादी में एलील आवृत्तियाँ कैसे बदलती हैं। सभी जीवों के सारे एलील मिलकर जीन पूल बनाते हैं। A और a एलील के लिए p + q = 1। अगर आबादी बड़ी हो, संगम यादृच्छिक हो, और प्रवास, उत्परिवर्तन व चयन न हो, तो हार्डी-वाइनबर्ग सिद्धांत कहता है कि आवृत्तियाँ नहीं बदलतीं और जीनोटाइप p² (AA) + 2pq (Aa) + q² (aa) = 1 होते हैं। इससे हटना यानी विकास हो रहा है, जिसके कारण हैं आनुवंशिक विचलन (बॉटलनेक, संस्थापक प्रभाव), जीन प्रवाह, उत्परिवर्तन, प्राकृतिक चयन या चुनकर संगम। जैविक जाति अवधारणा में जाति वह समूह है जो आपस में प्रजनन कर सके, यानी एक जीन पूल। नई जातियाँ तब बनती हैं जब जीन पूल प्रजनन पृथक्करण से कट जाते हैं: एलोपैट्रिक (भौगोलिक बाधा) या सिम्पैट्रिक (एक ही जगह, जैसे बहुगुणिता)। एक पूर्वज कई रूपों में फैल सकता है (अनुकूली विकिरण, अपसरण), और असंबंधित जीव एक जैसे बन सकते हैं (अभिसरण)।
5. XVII. Ecology
Organism and population ecology · Ecosystem ecology
- जीव और समष्टियाँ: वृद्धि और पारस्परिक क्रिया – समष्टि (population) यानी एक ही जाति के वे सब जीव जो एक समय पर एक जगह रहते हैं। समष्टि के ऐसे गुण होते हैं जो अकेले जीव में नहीं होते: घनत्व, जन्म दर, मृत्यु दर, लिंग अनुपात और आयु संरचना। जन्म और आप्रवासन से N बढ़ता है, मृत्यु और उत्प्रवासन से घटता है। भोजन असीमित हो तो तेज़ वृद्धि (J-वक्र, dN/dt = rN); सीमित हो तो वृद्धि धीमी होकर वहन क्षमता K पर रुकती है (S-वक्र, dN/dt = rN(1 − N/K))। जातियाँ एक-दूसरे पर असर डालती हैं: सहोपकारिता (+/+), स्पर्धा (−/−), परभक्षण और परजीविता (+/−), सहभोजिता (+/0), असहभोजिता (−/0)।
- पारितंत्र: संरचना, उत्पादकता, ऊर्जा प्रवाह और पिरामिड – पारितंत्र प्रकृति की एक कार्यशील इकाई है जहाँ जैविक (जीवित) और अजैविक (निर्जीव) घटक आपस में मिलकर काम करते हैं। पौधे जिस दर से भोजन बनाते हैं वह उत्पादकता है: सकल (GPP) में से श्वसन घटाओ तो शुद्ध (NPP = GPP − R)। मृत पदार्थ पाँच चरणों में टूटता है: खंडन, निक्षालन, अपचय, ह्यूमीकरण और खनिजीकरण। ऊर्जा धूप से आती है, पोषी स्तरों में एक ही दिशा में बहती है और हर बार लगभग 10% ही आगे जाती है। संख्या और जीवभार के पिरामिड उल्टे हो सकते हैं, पर ऊर्जा का पिरामिड हमेशा सीधा होता है।
6. XVIII. Biodiversity, threats and protection
Biodiversity and conservation
- जैव विविधता एवं संरक्षण – जैव विविधता यानी जीवन की विविधता, तीन स्तरों पर: आनुवंशिक, जातीय और पारिस्थितिक। यह भूमध्य रेखा के पास सबसे ज़्यादा है और क्षेत्र के साथ बढ़ती है (log S = log C + Z log A)। हर जाति ज़रूरी है, जैसे हवाई जहाज़ की कीलें। 'दुष्ट चौकड़ी' के कारण जातियाँ तेज़ी से खो रही हैं: आवास हानि और विखंडन, अति-दोहन, विदेशी जातियों का आक्रमण और सह-विलुप्ति। IUCN रेड लिस्ट (रेड डेटा बुक) जातियों को 'कम चिंता' से 'विलुप्त' तक बाँटती है। संरक्षण स्व-स्थाने (हॉटस्पॉट, राष्ट्रीय उद्यान, अभयारण्य, जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र, पवित्र उपवन, रामसर आर्द्रभूमि) और बाह्य-स्थाने (चिड़ियाघर, वानस्पतिक उद्यान, बीज बैंक) होता है।