उत्परिवर्तन क्या है?
उत्परिवर्तन DNA में ऐसा बदलाव है जो टिक जाता है। DNA कोशिका की निर्देश-पुस्तिका है। यह चार अक्षरों, यानी क्षारों (A, T, G, C) से लिखी है।
कोशिका जीन को तीन-तीन क्षार करके पढ़ती है। तीन का हर समूह कोडॉन है। हर कोडॉन बताता है कि प्रोटीन में कौन-सा अमीनो अम्ल जुड़ेगा। अक्षर बदले तो प्रोटीन बदल सकता है।
शरीर की कोशिकाओं के उत्परिवर्तन सिर्फ़ उसी व्यक्ति पर असर डालते हैं। जनन कोशिकाओं (शुक्राणु, अंडाणु) के उत्परिवर्तन बच्चों तक जा सकते हैं।
जीन उत्परिवर्तन (बिंदु उत्परिवर्तन)
प्रतिस्थापन (Substitution)
एक क्षार की जगह दूसरा आ जाता है। तीन नतीजे हो सकते हैं:
- मौन (Silent): नया कोडॉन वही अमीनो अम्ल बताता है, प्रोटीन नहीं बदलता। ऐसा इसलिए क्योंकि ज़्यादातर अमीनो अम्लों के एक से ज़्यादा कोडॉन हैं।
- मिसेंस (Missense): एक अमीनो अम्ल बदलता है। उदाहरण: सिकल-सेल एनीमिया (GAG → GTG, ग्लूटामिक अम्ल → वैलीन)।
- नॉनसेंस (Nonsense): कोडॉन STOP बन जाता है, प्रोटीन अधूरा रह जाता है।
जोड़ (Insertion) और विलोपन (Deletion)
एक क्षार जुड़ता या हटता है। कोशिका तीन-तीन पढ़ती है, इसलिए उसके बाद हर कोडॉन गलत पढ़ा जाता है। इसे फ्रेमशिफ्ट कहते हैं; प्रोटीन प्रायः बेकार हो जाता है। ठीक तीन क्षार जुड़ें या हटें तो ढाँचा बना रहता है, बस एक अमीनो अम्ल बढ़ता या घटता है।
गुणसूत्र उत्परिवर्तन
इनमें गुणसूत्र के बड़े टुकड़े या गुणसूत्रों की संख्या बदलती है।
- विलोपन: टुकड़ा खो जाता है।
- द्विगुणन: टुकड़ा दो बार बन जाता है।
- प्रतिलोमन: टुकड़ा टूटकर उलटा जुड़ जाता है।
- स्थानांतरण: टुकड़ा दूसरे गुणसूत्र पर चला जाता है।
संख्या में बदलाव: एक गुणसूत्र ज़्यादा या कम (असुगुणिता, aneuploidy), जैसे डाउन सिंड्रोम (गुणसूत्र 21 की तीन प्रतियाँ) या टर्नर सिंड्रोम (सिर्फ़ एक X)। पूरा अतिरिक्त सेट हो तो बहुगुणिता (polyploidy); गेहूँ और केले जैसी फ़सलों में आम है।
उत्परिवर्तन के कारण और प्रभाव
कारण
स्वतः उत्परिवर्तन कोशिका विभाजन से पहले DNA की नकल बनते समय संयोग से होते हैं। उत्परिवर्तजन (mutagens) इनकी दर बढ़ाते हैं: UV प्रकाश, X-किरणें, गामा किरणें और तंबाकू के धुएँ जैसे रसायन। कुछ वायरस भी DNA बदल सकते हैं।
प्रभाव
- हानिकारक: आनुवंशिक रोग (सिकल-सेल एनीमिया, सिस्टिक फ़ाइब्रोसिस, हीमोफ़ीलिया) और कैंसर, जब कोशिका-विभाजन नियंत्रित करने वाले जीन बिगड़ते हैं।
- तटस्थ: ज़्यादातर उत्परिवर्तनों का कोई दिखने वाला असर नहीं होता।
- लाभदायक: कुछ जीने में मदद करते हैं, जैसे बैक्टीरिया में एंटीबायोटिक प्रतिरोध।
उत्परिवर्तन ही नए युग्मविकल्पों (alleles) का एकमात्र स्रोत है। अर्धसूत्री विभाजन और निषेचन उन्हें मिलाते हैं। प्राकृतिक चयन इसी विविधता पर काम करता है, इसलिए उत्परिवर्तन विकास का कच्चा माल है।
करके देखें
वाक्य लिखो: RAM KA DAM BAN (तीन-तीन अक्षर)। एक अक्षर बदलो (प्रतिस्थापन), फिर एक अक्षर हटाकर दोबारा तीन-तीन में बाँटो (विलोपन)। किससे पूरा वाक्य बिगड़ता है?
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- उत्परिवर्तन – DNA के क्षार-क्रम में स्थायी बदलाव
- कोडॉन – 3 क्षार = 1 अमीनो अम्ल
- प्रतिस्थापन – एक क्षार बदला (मौन, मिसेंस या नॉनसेंस)
- जोड़ / विलोपन – क्षार जुड़ा / हटा → फ्रेमशिफ्ट
- गुणसूत्र उत्परिवर्तन – विलोपन, द्विगुणन, प्रतिलोमन, स्थानांतरण
- असुगुणिता – एक गुणसूत्र ज़्यादा या कम (जैसे ट्राइसोमी 21)
- बहुगुणिता – गुणसूत्रों के पूरे अतिरिक्त सेट
- उत्परिवर्तजन – उत्परिवर्तन की दर बढ़ाने वाला कारक (UV, X-किरणें, रसायन)
हल किए गए उदाहरण
1. DNA कोडॉन GAG ग्लूटामिक अम्ल बताता है। यह GTG (वैलीन) बन गया। उत्परिवर्तन का प्रकार और असर बताओ।
एक क्षार बदला, तो प्रतिस्थापन। एक अमीनो अम्ल बदला, तो मिसेंस। हीमोग्लोबिन में इससे सिकल-सेल एनीमिया होता है।
2. जीन ATG-GAG-GTG-CAC है। 5वाँ क्षार (A) हट गया। नए कोडॉन लिखो।
नया क्रम ATGGGGTGCAC → ATG-GGG-TGC-AC… हटने के बाद हर कोडॉन बदल गया: यह फ्रेमशिफ्ट है।
3. प्रतिस्थापन से CTT, CTC बन गया। दोनों ल्यूसीन बताते हैं। यह कौन-सा उत्परिवर्तन है?
मौन उत्परिवर्तन: क्षार बदला पर अमीनो अम्ल नहीं।
4. तीन क्षार हटाना प्रायः एक क्षार हटाने से कम नुकसानदायक क्यों है?
तीन क्षार = एक कोडॉन। ढाँचा वही रहता है, सिर्फ़ एक अमीनो अम्ल कम होता है; बाकी प्रोटीन ठीक रहता है।
आम गलतियाँ
- यह मानना कि हर उत्परिवर्तन हानिकारक है। ज़्यादातर तटस्थ होते हैं और कुछ लाभदायक।
- प्रतिस्थापन और फ्रेमशिफ्ट को मिलाना। सिर्फ़ जोड़ और विलोपन (3 के गुणज के अलावा) ढाँचा खिसकाते हैं।
- यह सोचना कि त्वचा कोशिका का उत्परिवर्तन बच्चों में जाएगा। सिर्फ़ जनन कोशिकाओं के उत्परिवर्तन वंशागत होते हैं।
- यह सोचना कि जीव को "ज़रूरत" है इसलिए उत्परिवर्तन होता है। उत्परिवर्तन यादृच्छिक है; चयन बाद में होता है।