Ukraine 10 клас Biology and Ecology (profile level)
अध्याय: 6
1. Introduction
Life and the scientific method
- वैज्ञानिक विधि – वैज्ञानिक विधि वह सावधान तरीका है जिससे वैज्ञानिक पता लगाते हैं कि दुनिया कैसे चलती है। कुछ देखो (प्रेक्षण), परखने लायक प्रश्न पूछो, परिकल्पना बनाओ (साफ़, परखने योग्य अनुमान), निष्पक्ष प्रयोग से परखो (एक चर बदलो, एक मापो, बाकी सब एक जैसा), दोहराओ और आँकड़े लिखो, विश्लेषण करो, निष्कर्ष निकालो और साझा करो ताकि दूसरे जाँच सकें। जो नतीजे परिकल्पना से मेल न खाएँ, वे भी काम के हैं: वे नई परिकल्पना की ओर ले जाते हैं।
2. Biodiversity
Systematics and phylogeny · Levels of biodiversity · Domains of life · Ecosystem biodiversity
- जीव जगत – धरती पर लाखों तरह के जीव हैं; इसी विविधता को जैव विविधता कहते हैं। इन्हें पढ़ने के लिए हम इन्हें समूहों में बाँटते हैं। वर्गिकी (टैक्सोनॉमी) में पहचान, नामकरण, वर्णन और वर्गीकरण आता है; सिस्टेमैटिक्स इसके साथ यह भी देखती है कि समूह आपस में कैसे जुड़े हैं। सारा जीवन तीन डोमेन में है: बैक्टीरिया, आर्किया और यूकेरिया। जीवों को जगत से जाति तक 7 मुख्य स्तरों में रखते हैं और हर जाति को दो शब्दों का लैटिन नाम मिलता है, जैसे Mangifera indica।
- जीव जगत का वर्गीकरण – व्हिटेकर (1969) ने जीवों को पाँच जगत में बाँटा: मोनेरा, प्रोटिस्टा, कवक, पादप और जंतु। आधार थे: कोशिका का प्रकार, कोशिका भित्ति, शरीर की बनावट, पोषण का तरीका, जनन और आपसी संबंध। मोनेरा प्रोकैरियोट हैं (बैक्टीरिया, आर्कीबैक्टीरिया, सायनोबैक्टीरिया, माइकोप्लाज़्मा)। प्रोटिस्टा एककोशिकी यूकैरियोट हैं, पाँच समूहों में। कवक काइटिन भित्ति वाले परपोषी हैं, चार वर्गों में। लाइकेन शैवाल और कवक की साझेदारी है। वायरस, विरोइड और प्रायन किसी जगत में नहीं।
3. Metabolism and energy
Nutrition and transport · Digestion · Enzymes and respiration · Protein synthesis · Photosynthesis and chemosynthesis · Excretion and osmoregulation
- मानव पाचन तंत्र और विषमपोषी पोषण – विषमपोषी जीव दूसरे जीवों से बना-बनाया भोजन लेते हैं। मनुष्य प्राणिसम (holozoic) पोषण करता है: पूरा भोजन खाकर एक लंबी नली, आहार नाल, में उसे तोड़ता है। दाँत, लार, आमाशय का अम्ल, एंज़ाइम, पित्त और अग्न्याशयी रस बड़े अणुओं को छोटा करते हैं, जिन्हें क्षुद्रांत्र के दीर्घरोम रक्त में सोख लेते हैं।
- पादप में श्वसन – श्वसन में ग्लूकोज़ जैसा भोजन टूटता है और ऊर्जा ATP के रूप में जमा होती है। पौधे रंध्रों और वातरंध्रों से O₂ लेते हैं। कोशिका-द्रव्य में ग्लाइकोलिसिस ग्लूकोज़ को दो पाइरुवेट में तोड़ता है। O₂ न हो तो पाइरुवेट का किण्वन होकर एथेनॉल या लैक्टिक अम्ल बनता है। O₂ हो तो पाइरुवेट माइटोकॉन्ड्रिया में जाता है, क्रेब्स चक्र चलता है और इलेक्ट्रॉन परिवहन तंत्र O₂ की मदद से सबसे ज़्यादा ATP बनाता है: एक ग्लूकोज़ से 38 तक। यही पथ अणु बनाता भी है (उभयचयी)। RQ = निकली CO₂ ÷ ली गई O₂।
- प्रोटीन संश्लेषण: जीन से प्रोटीन तक – जीन DNA का एक हिस्सा है जिसमें एक प्रोटीन बनाने की विधि लिखी होती है। अनुलेखन (transcription) में केंद्रक के अंदर जीन की नकल mRNA में बनती है; T की जगह U आता है। mRNA कोशिकाद्रव्य में राइबोसोम तक जाता है। स्थानांतरण (translation) में राइबोसोम mRNA को 3-3 क्षार (कोडॉन) करके पढ़ता है। हर कोडॉन एक अमीनो अम्ल से मेल खाता है जिसे tRNA लाता है। अमीनो अम्ल जुड़कर श्रृंखला बनाते हैं, जो मुड़कर प्रोटीन बनती है। DNA में बदलाव (उत्परिवर्तन) से प्रोटीन बदल सकता है।
- उच्च पादपों में प्रकाश-संश्लेषण – हरे पौधे प्रकाश की मदद से CO₂ और पानी से शर्करा बनाते हैं। यह क्लोरोप्लास्ट में होता है। थायलाकॉइड में प्रकाश अभिक्रिया पानी तोड़ती है, O₂ छोड़ती है और ATP व NADPH बनाती है। स्ट्रोमा में केल्विन चक्र इसी ATP और NADPH से CO₂ को शर्करा में बदलता है। C₄ पौधे CO₂ पंप करके प्रकाश-श्वसन की बर्बादी रोकते हैं। जो कारक सबसे कम हो, वही दर तय करता है।
- उत्सर्जी उत्पाद एवं उनका निष्कासन – जीवों को नाइट्रोजन अपशिष्ट निकालना होता है। अमोनिया सबसे विषैली है और बहुत पानी माँगती है; यूरिया कम विषैला; यूरिक अम्ल को सबसे कम पानी चाहिए। मनुष्य यूरियोत्सर्जी हैं। हर वृक्क में लगभग 10 लाख वृक्काणु हैं। मूत्र तीन चरणों में बनता है: गुच्छीय निस्यंदन (लगभग 125 mL/मिनट, 180 L/दिन), पुनरवशोषण (लगभग 99% वापस) और स्रावण। हेनले लूप और वासा रेक्टा प्रतिधारा से मध्यांश को नमकीन बनाते हैं, जिससे गाढ़ा मूत्र बनता है। ADH, रेनिन-एंजियोटेंसिन-एल्डोस्टेरोन तंत्र और ANF जल व लवण नियंत्रित करते हैं। फेफड़े, यकृत, त्वचा भी मदद करते हैं। वृक्क फेल हों तो डायलिसिस या प्रत्यारोपण।
4. Heredity and variation
Gene structure and genome · Inheritance · Variation
- जीन की संरचना: एक जीन के अंदर क्या है? – जीन DNA का वह हिस्सा है जिसमें एक काम का उत्पाद, आमतौर पर प्रोटीन (कभी-कभी RNA), बनाने की सूचना होती है। एक सामान्य जीन में प्रमोटर (जहाँ RNA पॉलिमरेज़ जुड़कर अनुलेखन शुरू करता है), कोडिंग भाग (संदेश) और टर्मिनेटर (जहाँ अनुलेखन रुकता है) होते हैं। टेम्पलेट रज्जुक पढ़ा जाता है; कोडिंग रज्जुक का क्रम mRNA जैसा होता है (T की जगह U)। प्रोकैरियोट में जीन लगातार होते हैं (इंट्रॉन नहीं) और जुड़े जीन अक्सर एक प्रमोटर वाले ऑपेरॉन में होते हैं, जिससे एक बहुसिस्ट्रॉनी mRNA बनती है। यूकैरियोट में जीन विभक्त होते हैं: कोडिंग एक्सॉन के बीच अकोडिंग इंट्रॉन। पूरा जीन पहले प्री-mRNA में बदलता है; फिर इंट्रॉन हटते हैं, एक्सॉन जुड़ते हैं (स्प्लाइसिंग), कैप और पॉली-A पूँछ लगती है। वैकल्पिक स्प्लाइसिंग से एक जीन कई प्रोटीन बना सकता है। जीनोम किसी जीव का पूरा DNA है; मनुष्य में सिर्फ़ 1–2% प्रोटीन के लिए कोड करता है।
- आनुवंशिकता और मेंडल के नियम – माता-पिता से बच्चों में लक्षणों का जाना आनुवंशिकता है। हर लक्षण के लिए माँ और पिता दोनों एक-एक जीन देते हैं। प्रभावी जीन अप्रभावी को छुपा देता है, इसलिए एकसंकर में 3:1 और द्विसंकर में 9:3:3:1 अनुपात आता है। जीन DNA का टुकड़ा है जो प्रोटीन बनवाता है, और प्रोटीन से लक्षण बनता है।
- उत्परिवर्तन (Mutation) – उत्परिवर्तन DNA में अचानक होने वाला स्थायी बदलाव है। जीन (बिंदु) उत्परिवर्तन में एक या कुछ क्षार बदलते हैं: प्रतिस्थापन, जोड़ या विलोपन। जोड़ और विलोपन पढ़ने का ढाँचा खिसका देते हैं। गुणसूत्र उत्परिवर्तन में बड़े टुकड़े या गुणसूत्रों की संख्या बदलती है। ये संयोग से या उत्परिवर्तजनों (UV, X-किरणें, कुछ रसायन) से होते हैं। ये हानिकारक, तटस्थ या लाभदायक हो सकते हैं और हर आनुवंशिक विविधता की पहली जड़ हैं।
5. Reproduction
DNA replication and viruses · Cell division · Reproduction of organisms
- DNA प्रतिकृति: कोशिका अपने DNA की कॉपी कैसे बनाती है – कोशिका बँटने से पहले अपने DNA की हूबहू कॉपी बनाती है, ताकि हर नई कोशिका को पूरे निर्देश मिलें। हेलिकेज़ दोहरी कुंडली को खोलता है। हर पुराना स्ट्रैंड साँचा (टेम्पलेट) बनता है। DNA पॉलिमरेज़ जोड़ीदार क्षार लगाता है (A के साथ T, G के साथ C)। अंत में दो DNA बनते हैं, हर एक में एक पुराना और एक नया स्ट्रैंड (अर्ध-संरक्षी)। पॉलिमरेज़ अपना काम जाँचता है, इसलिए गलती बहुत कम होती है; जो गलती रह जाए वह उत्परिवर्तन (म्यूटेशन) है।
- कोशिका चक्र और कोशिका विभाजन – कोशिका एक तय क्रम में बढ़ती है, DNA दोहराती है और बँटती है – इसे कोशिका चक्र कहते हैं: अंतरावस्था (G1, S, G2) और M प्रावस्था। S प्रावस्था में DNA दोगुना (2C → 4C) होता है, पर गुणसूत्र संख्या वही रहती है। समसूत्री विभाजन (पूर्वावस्था, मध्यावस्था, पश्चावस्था, अंत्यावस्था) और कोशिकाद्रव्य विभाजन से जनक जैसी दो कोशिकाएँ बनती हैं – यह समीकरणीय विभाजन वृद्धि और मरम्मत के लिए है। अर्धसूत्री विभाजन में दो विभाजन होते हैं; अर्धसूत्री I में समजात गुणसूत्र जोड़ा बनाते हैं, जीन विनिमय करते हैं और अलग होते हैं, जिससे गुणसूत्र संख्या आधी (2n → n) होती है। इससे युग्मकों के लिए चार अगुणित कोशिकाएँ बनती हैं और विविधता आती है।
- मानव में जनन और जनन स्वास्थ्य – यौवनारंभ पर मस्तिष्क के हॉर्मोन वृषण और अंडाशय को सक्रिय करते हैं। नर तंत्र शुक्राणु बनाता और ले जाता है; मादा तंत्र अंडाणु बनाता है और गर्भाशय में शिशु के बढ़ने की जगह देता है। निषेचन अंडवाहिनी में होता है और भ्रूण को प्लेसेंटा से पोषण मिलता है। जनन स्वास्थ्य में सुरक्षित निर्णय, गर्भनिरोध, भ्रूण हत्या पर रोक और HIV/AIDS जैसे रोगों से बचाव शामिल हैं।
- जीव जनन कैसे करते हैं? DNA प्रतिकृति और अलैंगिक जनन – जनन में DNA की प्रतिकृति (कॉपी) बनती है। कॉपी कभी पूरी तरह एक जैसी नहीं होती; यही छोटे बदलाव (विभिन्नताएँ) बदलते माहौल में प्रजाति को बचाते हैं। अलैंगिक जनन में एक ही जनक विखंडन, खंडन, पुनरुद्भवन, मुकुलन, कायिक प्रवर्धन या बीजाणु से नए जीव बनाता है।
- पुष्पी पादपों में लैंगिक जनन – लैंगिक जनन में नर और मादा युग्मक मिलते हैं, जिससे दो जनकों का DNA मिलता है और विभिन्नता बढ़ती है। फूल में परागकोश का पराग वर्तिकाग्र पर पहुँचता है (परागण), परागनलिका बीजांड तक बढ़ती है और नर युग्मक अंडकोशिका से मिलता है (निषेचन)। युग्मनज भ्रूण बनता है, बीजांड बीज और अंडाशय फल।
6. Development
Embryonic development · Post-embryonic development and growth
- विकास: एक कोशिका से पूरा शरीर – विकास (व्यक्तिवृत्त, ontogenesis) एक जीव की जीवन कहानी है। युग्मनज विदलन से बँटकर कोशिकाओं की गेंद (कोरकपुटी) बनाता है। कंदुकन में कोशिकाएँ अंदर जाती हैं और तीन जनन स्तर बनते हैं: बाह्यत्वचा, मध्यजनस्तर, अंतर्जनस्तर। फिर कोशिकाएँ विभेदित होती हैं: सबमें एक जैसे जीन, पर हर प्रकार अलग जीन चालू करता है। कोशिकाओं के संकेत (प्रेरण) और Hox जैसे मुख्य जीन तय करते हैं कि कौन-सा अंग कहाँ बने। जन्म के बाद जीव बढ़ता है, सीधे या कायांतरण से विकसित होता है, बूढ़ा होता है और कभी-कभी अंग दोबारा उगा सकता है।