विषमपोषी पोषण और उसके प्रकार
विषमपोषी जीव दूसरों का बनाया भोजन लेते हैं। कैसे लेते हैं, यह भोजन और जीव पर निर्भर है:
- प्राणिसम (holozoic): पूरा भोजन निगलकर शरीर के अंदर पचाना (मनुष्य, गाय, अमीबा)।
- मृतजीवी (saprophytic): मृत, सड़ते पदार्थ को शरीर के बाहर तोड़कर सोखना (ब्रेड का फफूँद, मशरूम, कई जीवाणु)।
- परजीवी (parasitic): जीवित पोषी से भोजन लेना, अक्सर उसे नुकसान पहुँचाकर (अमरबेल/कस्कुटा, किलनी, जूँ, फीताकृमि)।
एककोशिकीय जीव भोजन कैसे लेते हैं
अमीबा भोजन के कण के चारों ओर उँगली जैसे कूटपाद (pseudopodia) फैलाता है, जो मिलकर खाद्य रिक्तिका बनाते हैं। इसके अंदर भोजन पचता है और काम का भाग कोशिकाद्रव्य में विसरित होता है; बचा हुआ सतह से बाहर फेंक दिया जाता है।
पैरामीशियम का आकार निश्चित होता है; उसके छोटे बाल जैसे पक्ष्माभ भोजन को एक ख़ास जगह (कोशिका मुख) तक बुहार लाते हैं।
मानव पाचन तंत्र: एक-एक पड़ाव
मुख
दाँत भोजन को छोटे टुकड़ों में चबाते हैं; जीभ उसे मिलाती है। लार का लार एमाइलेज़ मंड को सरल शर्करा में तोड़ता है।
ग्रसिका (भोजन नली)
पेशियों का लयबद्ध संकुचन, क्रमाकुंचन, भोजन को नीचे ले जाता है। यह पूरी आहार नाल में चलता है।
आमाशय
जठर ग्रंथियाँ हाइड्रोक्लोरिक अम्ल (अम्लीय माध्यम, कीटाणु नाश, पेप्सिन की मदद), पेप्सिन (प्रोटीन पाचन) और श्लेष्मा (अम्ल से दीवार की रक्षा) छोड़ती हैं। अवरोधिनी (sphincter) पेशी भोजन को थोड़ा-थोड़ा करके क्षुद्रांत्र में जाने देती है।
क्षुद्रांत्र
आहार नाल का सबसे लंबा भाग (लंबा और कुंडलित, ताकि समय और सतह ज़्यादा मिले)। घास खाने वालों की क्षुद्रांत्र मांसाहारियों से लंबी होती है क्योंकि सेलुलोज़ मुश्किल से पचता है।
- यकृत → पित्त: भोजन को क्षारीय बनाता है और बड़ी वसा गोलिकाओं को छोटी बूँदों में तोड़ता है (इमल्सीकरण)। पित्त में कोई एंज़ाइम नहीं होता।
- अग्न्याशय → अग्न्याशयी रस: ट्रिप्सिन (प्रोटीन), लाइपेज़ (इमल्सीकृत वसा), एमाइलेज़ (मंड)।
- आंत्र ग्रंथियाँ: अंतिम एंज़ाइम; प्रोटीन → अमीनो अम्ल, कार्बोहाइड्रेट → ग्लूकोज, वसा → वसा अम्ल व ग्लिसरॉल।
दीर्घरोम (villi), भीतरी दीवार की उँगली जैसी तहें, सोखने की सतह बहुत बढ़ा देते हैं। इनमें रक्त वाहिकाएँ भरपूर होती हैं जो भोजन हर कोशिका तक पहुँचाती हैं (स्वांगीकरण)।
बृहदांत्र और गुदा
यहाँ बचा हुआ अतिरिक्त पानी सोखा जाता है। अपशिष्ट गुदा से बाहर निकलता है (बहिःक्षेपण), जिसे गुदा अवरोधिनी नियंत्रित करती है।
एंज़ाइम सारणी और परीक्षा
| रस / ग्रंथि | एंज़ाइम या भाग | किस पर → क्या बनता है |
|---|---|---|
| लार | लार एमाइलेज़ | मंड → शर्करा (माल्टोज़) |
| जठर रस | पेप्सिन, HCl, श्लेष्मा | प्रोटीन → छोटे पेप्टाइड |
| पित्त (यकृत) | पित्त लवण, एंज़ाइम नहीं | वसा → छोटी बूँदें |
| अग्न्याशयी रस | ट्रिप्सिन, लाइपेज़, एमाइलेज़ | प्रोटीन, वसा, मंड |
| आंत्र रस | अंतिम एंज़ाइम | → अमीनो अम्ल, ग्लूकोज, वसा अम्ल + ग्लिसरॉल |
परीक्षा टिप: HCl, पित्त और दीर्घरोम के कार्य तथा एंज़ाइम सारणी पर 2–3 अंक के प्रश्न आते हैं; आहार नाल का नामांकित चित्र अक्सर 5 अंक वाले प्रश्न में होता है।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- मंड → (लार एमाइलेज़) → शर्करा
- प्रोटीन → (पेप्सिन, ट्रिप्सिन) → पेप्टाइड → अमीनो अम्ल
- वसा → (पित्त: इमल्सीकरण) → बूँदें → (लाइपेज़) → वसा अम्ल + ग्लिसरॉल
- क्रमाकुंचन: भोजन को आगे बढ़ाने वाली पेशियों की लहर
- दीर्घरोम: सोखने की सतह बढ़ाने वाली उँगली जैसी तहें
- प्राणिसम, मृतजीवी, परजीवी: विषमपोषी पोषण के तीन प्रकार
हल किए गए उदाहरण
1. अगर आमाशय श्लेष्मा न बनाए तो क्या होगा?
HCl धीरे-धीरे आमाशय की अपनी भीतरी परत को नुकसान पहुँचाएगा और दर्द वाले घाव (अल्सर) बनेंगे। श्लेष्मा अम्ल और दीवार के बीच सुरक्षा परत है।
2. गाय की क्षुद्रांत्र बाघ से लंबी क्यों होती है?
गाय घास खाती है जिसमें सेलुलोज़ बहुत होता है और वह धीरे पचता है। लंबी आंत से ज़्यादा समय और सतह मिलती है। बाघ मांस खाता है जो आसानी से पचता है, इसलिए छोटी आंत काफ़ी है।
3. पित्त में एंज़ाइम नहीं है, फिर यह पाचन में कैसे मदद करता है?
यह दो काम करता है: आमाशय से आए अम्लीय भोजन को क्षारीय बनाता है ताकि अग्न्याशयी एंज़ाइम काम कर सकें, और पित्त लवण बड़ी वसा गोलिकाओं को छोटी बूँदों में तोड़ते हैं। छोटी बूँदों पर लाइपेज़ को बहुत ज़्यादा सतह मिलती है।
4. पोषण का प्रकार बताइए: (क) मशरूम, (ख) अमरबेल, (ग) अमीबा।
(क) मृतजीवी: मृत पदार्थ से भोजन सोखता है। (ख) परजीवी: पोषी पौधे से भोजन लेती है। (ग) प्राणिसम: पूरा भोजन घेरकर अंदर पचाता है।
5. पनीर के टुकड़े (ज़्यादातर प्रोटीन और वसा) का पाचन क्रम से बताइए।
मुख: चबाया जाता है, रासायनिक बदलाव कम। आमाशय: अम्ल में पेप्सिन प्रोटीन तोड़ना शुरू करता है। क्षुद्रांत्र: पित्त वसा का इमल्सीकरण करता है; ट्रिप्सिन प्रोटीन पाचन आगे बढ़ाता है; लाइपेज़ वसा तोड़ता है; आंत्र एंज़ाइम अमीनो अम्ल, वसा अम्ल और ग्लिसरॉल बनाते हैं, जिन्हें दीर्घरोम सोखते हैं।
आम गलतियाँ
- यह लिखना कि पित्त में एंज़ाइम होते हैं। पित्त में पित्त लवण होते हैं, पाचक एंज़ाइम नहीं।
- यह कहना कि पाचन आमाशय में ख़त्म हो जाता है। ज़्यादातर पाचन और लगभग सारा अवशोषण क्षुद्रांत्र में होता है।
- बहिःक्षेपण (अपच भोजन गुदा से निकालना) और उत्सर्जन (यूरिया जैसे उपापचयी अपशिष्ट निकालना) को एक समझना।
- यह मानना कि पित्त पित्ताशय में बनता है। यह यकृत में बनता है और पित्ताशय में केवल जमा होता है।