Romania Clasa a XI-a Biology (human anatomy and physiology)
अध्याय: 5
1. Structure of the human body
Body organisation
- मानव शरीर के अंग तंत्र – हमारा शरीर स्तरों में बना है: कोशिकाएँ मिलकर ऊतक, ऊतक मिलकर अंग, अंग मिलकर अंग तंत्र और सारे तंत्र मिलकर पूरा जीव यानी हम। हर तंत्र का एक मुख्य काम है: कंकाल (ढाँचा), पेशी (गति), परिसंचरण (ढुलाई), श्वसन (गैसों का लेन-देन), पाचन (भोजन), उत्सर्जन (कचरा), तंत्रिका और अंतःस्रावी (नियंत्रण), प्रतिरक्षा (बचाव), त्वचा तंत्र और जनन तंत्र। कोई तंत्र अकेले काम नहीं करता: व्यायाम में पेशियाँ, दिल, फेफड़े और नसें साथ बदलकर शरीर के अंदर का हाल स्थिर रखते हैं (समस्थिति)।
2. Relation functions
Nervous system · Sense organs (analysers) · Endocrine glands · Movement
- तंत्रिकीय नियंत्रण एवं समन्वय – समन्वय यानी अंगों का मिलकर काम करना। तंत्रिका तंत्र यह तेज़ी से तंत्रिका कोशिकाओं से करता है। तंत्रिका कोशिका में कोशिका काय, द्रुमिकाएँ और तंत्रिकाक्ष हैं; कई तंत्रिकाक्षों पर रैनवियर पर्व वाला माइलिन आच्छद है। केंद्रीय तंत्रिका तंत्र (मस्तिष्क, मेरुरज्जु) सूचना संसाधित करता है; परिधीय तंत्र (तंत्रिकाएँ) उसे ढोता है। PNS के दो भाग: कायिक (कंकाली पेशियाँ) और स्वायत्त (अनुकंपी, परानुकंपी), जो अंदर के अंगों यानी अंतरंग तंत्र को चलाता है। आराम में तंत्रिकाक्ष ध्रुवित है: अंदर −, बाहर +, लगभग −70 mV। उद्दीपन से Na+ अंदर आकर क्रिया विभव बनाता है जो आगे दौड़ता है। सिनैप्स पर तंत्रिका संचारी संकेत अगली कोशिका तक पहुँचाते हैं।
- ज्ञानेंद्रियाँ – ज्ञानेंद्रियाँ हमें आसपास के बदलाव (उद्दीपन) पहचानने देती हैं। आँख प्रकाश, कान ध्वनि और संतुलन, नाक गंध, जीभ स्वाद और त्वचा स्पर्श, दबाव, गरमी, ठंडक व दर्द पहचानती है। हर इंद्रिय में ग्राही कोशिकाएँ उद्दीपन को तंत्रिका संकेत में बदलती हैं। संकेत संवेदी तंत्रिका से मस्तिष्क या मेरुरज्जु तक जाता है, जो मांसपेशी को आदेश भेजता है: यही अनुक्रिया है।
- रासायनिक समन्वय तथा एकीकरण – हॉर्मोन रासायनिक संदेशवाहक हैं जो नलिकाविहीन (अंतःस्रावी) ग्रंथियाँ बहुत कम मात्रा में बनाती हैं। ये रक्त में चलकर सही ग्राही वाली लक्ष्य कोशिकाओं पर काम करते हैं। हाइपोथैलेमस पीयूष को, और पीयूष कई ग्रंथियों को नियंत्रित करता है; ऋणात्मक पुनर्निवेशन स्तर स्थिर रखता है। मुख्य ग्रंथियाँ: पीनियल, पीयूष, थायरॉयड, पैराथायरॉयड, थाइमस, एड्रीनल, अग्न्याशय (द्वीप), वृषण, अंडाशय। हृदय, वृक्क, आहारनाल भी हॉर्मोन बनाते हैं। प्रोटीन हॉर्मोन झिल्ली ग्राही और cAMP जैसे द्वितीयक संदेशवाहक से; स्टेरॉयड व थायरॉयड हॉर्मोन कोशिका में जाकर जीन बदलते हैं। बहुत कम (अल्पस्राव) या बहुत ज़्यादा (अतिस्राव) हॉर्मोन से बौनापन, महाकायता, गलगंड, मधुमेह, एडिसन, कुशिंग जैसे रोग होते हैं।
- गमन एवं संचलन – संचलन यानी शरीर के किसी भाग की स्थिति बदलना; गमन यानी पूरे शरीर का एक जगह से दूसरी जगह जाना। कोशिकाएँ तीन तरह चलती हैं: अमीबीय, पक्ष्माभी और कशाभिकीय। मनुष्य पेशीय गति करता है। पेशियाँ कंकाली, अंतरंग या हृद होती हैं। कंकाली पेशी तंतुओं से बनी है; हर तंतु में पेशी तंतुक हैं जो एक्टिन-मायोसिन वाले सार्कोमियरों की श्रृंखला हैं। तंत्रिका संकेत से Ca2+ छूटता है, मायोसिन सिर ATP से एक्टिन खींचते हैं और सार्कोमियर छोटा होता है (सर्पी तंतु सिद्धांत)। कंकाल में 206 हड्डियाँ हैं। संधियाँ रेशेदार, उपास्थिल या साइनोवियल (कंदुक-खल्लिका, कब्ज़ा, धुराग्र, विसर्पी, सैडल) होती हैं। रोग: मायस्थेनिया ग्रेविस, अपतानिका, पेशीय दुष्पोषण, संधिशोथ, अस्थि सुषिरता, गाउट।
3. Nutrition functions
Digestion and absorption · Circulation · Respiration · Excretion · Metabolism
- मानव पाचन तंत्र और विषमपोषी पोषण – विषमपोषी जीव दूसरे जीवों से बना-बनाया भोजन लेते हैं। मनुष्य प्राणिसम (holozoic) पोषण करता है: पूरा भोजन खाकर एक लंबी नली, आहार नाल, में उसे तोड़ता है। दाँत, लार, आमाशय का अम्ल, एंज़ाइम, पित्त और अग्न्याशयी रस बड़े अणुओं को छोटा करते हैं, जिन्हें क्षुद्रांत्र के दीर्घरोम रक्त में सोख लेते हैं।
- शरीर द्रव तथा परिसंचरण – रक्त और लसीका शरीर के परिवहन द्रव हैं। रक्त = प्लाज़्मा (लगभग 55%) + संगठित पदार्थ: RBC, WBC और प्लेटलेट्स। रक्त समूह (ABO, Rh) RBC पर लगे प्रतिजनों से तय होते हैं। फाइब्रिनोजन से फाइब्रिन धागे बनकर थक्का बनाते हैं। मानव हृदय में चार कक्ष हैं और रक्त दो परिपथों में जाता है: फेफड़ों तक और शरीर तक (दोहरा परिसंचरण)। SA पर्व हर धड़कन शुरू करता है; एक धड़कन लगभग 0.8 s का हृद चक्र है, जिसे ECG में P, QRS, T तरंगों में देखा जाता है। हृद निकास = प्रवाह आयतन × हृदय दर ≈ 5 L/मिनट।
- श्वसन और गैसों का विनिमय – साँस लेने से हवा फेफड़ों में आती-जाती है। हवा का रास्ता: नाक → श्वासनली → श्वसनी → श्वसनिकाएँ → कूपिकाएँ। जब डायाफ्राम और बाहरी पसली-पेशियाँ सिकुड़ती हैं तो छाती बड़ी होती है, अंदर का दाब घटता है और हवा अंदर आती है। कूपिकाओं में O2 रक्त में जाती है और CO2 बाहर आती है, हमेशा ज़्यादा आंशिक दाब से कम की ओर। रक्त O2 ज़्यादातर हीमोग्लोबिन पर और CO2 ज़्यादातर बाइकार्बोनेट बनाकर ले जाता है। मस्तिष्क का एक केंद्र साँस की लय तय करता है। ज्वारीय आयतन, जैव क्षमता जैसे आयतन जोड़कर निकाले जाते हैं।
- उत्सर्जी उत्पाद एवं उनका निष्कासन – जीवों को नाइट्रोजन अपशिष्ट निकालना होता है। अमोनिया सबसे विषैली है और बहुत पानी माँगती है; यूरिया कम विषैला; यूरिक अम्ल को सबसे कम पानी चाहिए। मनुष्य यूरियोत्सर्जी हैं। हर वृक्क में लगभग 10 लाख वृक्काणु हैं। मूत्र तीन चरणों में बनता है: गुच्छीय निस्यंदन (लगभग 125 mL/मिनट, 180 L/दिन), पुनरवशोषण (लगभग 99% वापस) और स्रावण। हेनले लूप और वासा रेक्टा प्रतिधारा से मध्यांश को नमकीन बनाते हैं, जिससे गाढ़ा मूत्र बनता है। ADH, रेनिन-एंजियोटेंसिन-एल्डोस्टेरोन तंत्र और ANF जल व लवण नियंत्रित करते हैं। फेफड़े, यकृत, त्वचा भी मदद करते हैं। वृक्क फेल हों तो डायलिसिस या प्रत्यारोपण।
- उपापचय: कोशिका कैसे तोड़ती, बनाती और ऊर्जा चलाती है – उपापचय (metabolism) शरीर के अंदर होने वाली सभी रासायनिक क्रियाओं का नाम है. बड़े अणुओं को छोटे टुकड़ों में तोड़ना अपचय (catabolism) है; इसमें ऊर्जा निकलती है. छोटे अणुओं को जोड़कर बड़ा बनाना उपचय (anabolism) है; इसमें ऊर्जा लगती है. ATP इन दोनों के बीच ऊर्जा ले जाता है, जैसे रिचार्ज होने वाली बैटरी. हर क्रिया का अपना एंज़ाइम होता है और क्रियाएँ जुड़कर उपापचयी पथ बनाती हैं.
4. Reproduction
Reproductive system and health
- मानव जनन – मनुष्य लैंगिक जनन करते हैं और जरायुज हैं (बच्चा माँ के शरीर के अंदर बढ़ता है)। वृषण की शुक्रजनक नलिकाओं में शुक्राणु बनते हैं, अंडाशय के पुटकों में अंडाणु। युग्मकजनन में अर्धसूत्री विभाजन होता है: 1 शुक्राणुजन से 4 शुक्राणु, पर 1 अंडजन से केवल 1 अंडाणु और ध्रुवीय पिंड। लगभग 28 दिन का आर्तव चक्र FSH, LH, एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरॉन से चलता है; दिन 14 के आसपास LH की अचानक बढ़त से अंडोत्सर्ग होता है। तुंबिका में निषेचन से युग्मनज बनता है, जो मोरुला और फिर ब्लास्टोसिस्ट बनकर गर्भाशय में धँस जाता है। अपरा भ्रूण को पोषण देता है; लगभग 9 महीने बाद प्रसव और फिर स्तनपान।
5. The organism as a whole
Homeostasis
- समस्थापन (Homeostasis) – समस्थापन वह तरीका है जिससे शरीर अपना आंतरिक वातावरण (रक्त और ऊतक द्रव) स्थिर रखता है, चाहे बाहर का मौसम बदले। यह शरीर का ताप (लगभग 37 °C), रक्त ग्लूकोज़ (लगभग 4–6 mmol/L), पानी-लवण और रक्त pH (लगभग 7.4) नियंत्रित करता है। ज़्यादातर यह ऋणात्मक पुनर्भरण से होता है: ग्राही बदलाव पहचानता है, नियंत्रण केंद्र तय करता है, और प्रभावक स्तर को निर्धारित बिंदु पर लौटाता है।