ज्ञानेंद्रिय क्या है?
उद्दीपन हमारे आसपास या शरीर के अंदर होने वाला बदलाव है, जैसे प्रकाश, ध्वनि या गरमी। ज्ञानेंद्रिय वह अंग है जो एक तरह का उद्दीपन पकड़ता है। इसके अंदर ग्राही (receptor) होते हैं: खास कोशिकाएँ जो उद्दीपन को विद्युत तंत्रिका संकेत में बदलती हैं।
इंद्रिय, उसकी तंत्रिका और मस्तिष्क का वह भाग जो संकेत पढ़ता है, एक टीम की तरह काम करते हैं। कुछ किताबें इसे विश्लेषक (analyser) कहती हैं। असल में देखता मस्तिष्क है, आँख नहीं।
आँख और देखना
प्रकाश पारदर्शी कॉर्निया और पुतली (काला छेद) से अंदर जाता है। रंगीन परितारिका (iris) पुतली का आकार बदलती है: तेज़ रोशनी में छोटा, कम रोशनी में बड़ा। लेंस प्रकाश को मोड़कर पीछे रेटिना पर छोटा, उल्टा प्रतिबिंब बनाता है।
रेटिना में दो तरह के ग्राही हैं। शलाकाएँ (rods) कम रोशनी में काम करती हैं। शंकु (cones) अच्छी रोशनी में रंग देखते हैं। दृक् तंत्रिका संकेत मस्तिष्क तक ले जाती है, जो चित्र को सीधा समझता है।
आँख की आम समस्याएँ
निकट दृष्टि दोष (दूर की चीज़ें धुँधली) और दूर दृष्टि दोष (पास की चीज़ें धुँधली) चश्मे के लेंस से ठीक होते हैं। ज़्यादा स्क्रीन और कम रोशनी आँखों पर ज़ोर डालते हैं।
कान: सुनना और संतुलन
बाहरी कान ध्वनि इकट्ठा करके कान की नली में भेजता है। ध्वनि कर्णपटह (eardrum) को कँपाती है। मध्य कर्ण में तीन छोटी हड्डियाँ (मुग्दरक, निहाई, वलयक — शरीर की सबसे छोटी हड्डियाँ) कंपन को आगे बढ़ाती और तेज़ करती हैं। आंतरिक कर्ण में घोंघे जैसी कॉक्लिया में द्रव और रोम-कोशिकाएँ हैं। रोम-कोशिकाएँ झुककर श्रवण तंत्रिका से संकेत भेजती हैं।
कॉक्लिया के पास तीन छल्ले हैं, अर्धवृत्ताकार नलिकाएँ। सिर घुमाने पर इनका द्रव हिलता है, इसलिए ये संतुलन पहचानती हैं।
बहुत तेज़ आवाज़ (लंबे समय तक लगभग 85 डेसिबल से ज़्यादा) रोम-कोशिकाओं को हमेशा के लिए नुकसान पहुँचा सकती है। ईयरफ़ोन की आवाज़ धीमी रखें।
नाक, जीभ और त्वचा
गंध और स्वाद रासायनिक इंद्रियाँ हैं। खाने या फूल के छोटे अणु नाक में जाकर ऊपर के ग्राहियों से जुड़ते हैं। जीभ पर स्वाद कलिकाएँ पाँच मूल स्वाद पहचानती हैं: मीठा, नमकीन, खट्टा, कड़वा और उमामी (टमाटर, पनीर जैसा चटपटा स्वाद)। जिसे हम ज़ायका कहते हैं, वह स्वाद और गंध मिलकर बनता है।
त्वचा सबसे बड़ी ज्ञानेंद्रिय है। इसमें हल्के स्पर्श, दबाव, गरमी, ठंडक और दर्द के अलग-अलग ग्राही हैं। उँगलियों के सिरों और होंठों में सबसे ज़्यादा ग्राही हैं, इसलिए वे सबसे संवेदनशील हैं।
उद्दीपन से अनुक्रिया तक, और इंद्रियों की देखभाल
हर इंद्रिय एक ही रास्ता अपनाती है: उद्दीपन → ग्राही → संवेदी तंत्रिका → मस्तिष्क या मेरुरज्जु → प्रेरक तंत्रिका → मांसपेशी या ग्रंथि (अनुक्रिया)। अचानक ख़तरे में मेरुरज्जु खुद जवाब दे देती है: इसे प्रतिवर्त क्रिया कहते हैं, जैसे गरम तवे से हाथ हटाना।
प्रत्यक्षण (perception) यानी मस्तिष्क का स्मृति और ध्यान की मदद से संकेतों को समझना। इसीलिए दृष्टि-भ्रम हमें धोखा दे सकता है: आँख ठीक है, मस्तिष्क ग़लत अंदाज़ा लगाता है।
इंद्रियों और मस्तिष्क का ख़याल रखें: पढ़ते समय अच्छी रोशनी, स्क्रीन के लिए 20-20-20 नियम (हर 20 मिनट पर 20 फ़ुट दूर 20 सेकंड देखें), धीमी आवाज़, कान में नुकीली चीज़ नहीं, पूरी नींद (किशोरों के लिए 8–10 घंटे) और साइकिल-बाइक पर हेलमेट।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- उद्दीपन: वह बदलाव जिसे शरीर पहचान सके (प्रकाश, ध्वनि, रसायन, स्पर्श, ताप)
- ग्राही: वह कोशिका जो उद्दीपन को तंत्रिका संकेत में बदले
- शलाकाएँ: कम रोशनी · शंकु: रंग
- कॉक्लिया: सुनना · अर्धवृत्ताकार नलिकाएँ: संतुलन
- पाँच स्वाद: मीठा, नमकीन, खट्टा, कड़वा, उमामी
- रास्ता: उद्दीपन → ग्राही → संवेदी तंत्रिका → मस्तिष्क / मेरुरज्जु → प्रेरक तंत्रिका → प्रभावक
हल किए गए उदाहरण
1. तेज़ धूप से अँधेरे सिनेमा हॉल में जाते ही कुछ नहीं दिखता; एक मिनट बाद सीटें दिखने लगती हैं। क्यों?
चरण 1: तेज़ रोशनी में परितारिका ने पुतली छोटी रखी थी। चरण 2: अँधेरे में पुतली धीरे-धीरे बड़ी होकर ज़्यादा प्रकाश लेती है। चरण 3: कम रोशनी में काम करने वाली शलाकाएँ धीरे-धीरे ज़्यादा संवेदनशील होती हैं। इसलिए थोड़ी देर बाद दिखने लगता है।
2. नाक बंद होने पर खाना फीका क्यों लगता है?
चरण 1: ज़ायका = स्वाद + गंध। चरण 2: जीभ केवल पाँच मूल स्वाद पहचानती है। चरण 3: ज़्यादातर ज़ायका गंध के अणुओं से आता है। नाक बंद → गंध नहीं → खाना फीका।
3. मच्छर के काटने पर आप थप्पड़ मारते हैं। रास्ता बताइए।
उद्दीपन: काटना। ग्राही: त्वचा के स्पर्श और दर्द ग्राही। संवेदी तंत्रिका संकेत मस्तिष्क तक ले जाती है। मस्तिष्क मारने का निर्णय लेता है। प्रेरक तंत्रिका आदेश हाथ की मांसपेशियों तक ले जाती है। अनुक्रिया: थप्पड़।
आम गलतियाँ
- यह सोचना कि आँख देखती है। आँख सिर्फ़ प्रकाश इकट्ठा करके संकेत बनाती है; देखता मस्तिष्क है।
- जीभ पर हर स्वाद का अलग हिस्सा मानना (पुराना 'जीभ का नक्शा')। पाँचों स्वादों की कलिकाएँ पूरी जीभ पर फैली हैं।
- भूल जाना कि कान अर्धवृत्ताकार नलिकाओं से संतुलन भी सँभालता है।
- शलाका और शंकु में उलझना: शलाका कम रोशनी के लिए, शंकु रंग के लिए।