नर और मादा जनन तंत्र
मनुष्य जरायुज हैं: बच्चा माँ के शरीर में बढ़ता है। दोनों तंत्रों में प्राथमिक जनन अंग (जनद: वृषण या अंडाशय) होते हैं जो युग्मक और हॉर्मोन बनाते हैं, साथ में नलिकाएँ और ग्रंथियाँ।
नर तंत्र
- वृषण (एक जोड़ी) पेट के बाहर वृषणकोश में रहते हैं, क्योंकि शुक्राणु बनने के लिए शरीर से 2–2.5 °C कम तापमान चाहिए।
- नलिकाओं का रास्ता: शुक्रजनक नलिकाएँ → वृषण जालिका → शुक्रवाहिकाएँ → अधिवृषण (शुक्राणु पकते और जमा होते हैं) → शुक्रवाहक → स्खलन वाहिनी → मूत्रमार्ग, जो शिश्न से बाहर खुलता है।
- सहायक ग्रंथियाँ: शुक्राशय (ऊर्जा के लिए फ़्रक्टोज़), प्रोस्टेट और बल्बोयूरेथ्रल ग्रंथियाँ (द्रव और चिकनाई)। शुक्राणु + ये द्रव = वीर्य।
मादा तंत्र
- अंडाशय (एक जोड़ी) पेट के निचले भाग में अंडाणु और हॉर्मोन बनाते हैं।
- अंडवाहिनी (फ़ैलोपियन नलिका): उँगली जैसी झालरों (फ़िम्ब्री) वाली कीप, जो अंडाणु पकड़ती है → चौड़ी तुंबिका (यहीं निषेचन होता है) → पतला संकीर्ण पथ → गर्भाशय।
- गर्भाशय: दीवार की तीन परतें; अंदर की परत गर्भाशय अंतःस्तर (एंडोमेट्रियम) हर चक्र में बदलती है; मोटी पेशी परत गर्भाशय पेशीस्तर प्रसव में सिकुड़ती है। ग्रीवा योनि में खुलती है।
- स्तन ग्रंथियाँ (एक जोड़ी) में दूध बनाने वाला ऊतक पालियों में होता है; दूध नलिकाओं से चूचुक तक आता है।
वृषण और अंडाशय की संरचना
वृषण
हर वृषण में लगभग 250 खाने (पालिकाएँ) होते हैं। हर पालिका में 1–3 बहुत कुंडलित शुक्रजनक नलिकाएँ होती हैं। इनकी दीवार में दो तरह की कोशिकाएँ हैं:
- शुक्राणुजन: जनन कोशिकाएँ जो शुक्राणु बनाएँगी।
- सर्टोली कोशिकाएँ: बड़ी 'नर्स' कोशिकाएँ जो बनते शुक्राणुओं को पोषण देती हैं।
नलिकाओं के बीच लेडिग (अंतराली) कोशिकाएँ नर हॉर्मोन टेस्टोस्टेरॉन बनाती हैं।
अंडाशय
अंडाशय के बाहर एक पतली परत और अंदर पीठिका (स्ट्रोमा) होती है। पीठिका के बाहरी भाग में अलग-अलग अवस्था के पुटक होते हैं; हर पुटक एक अंडकोशिका है जिसके चारों ओर सहायक कोशिकाएँ हैं। द्रव से भरी बड़ी जगह वाला पका पुटक ग्राफ़ी पुटक कहलाता है।
युग्मकजनन: शुक्राणुजनन और अंडजनन
शुक्राणुजनन (यौवनारंभ से शुरू, जीवन भर)
- शुक्राणुजन (2n) बढ़कर प्राथमिक शुक्राणुकोशिका (2n) बनता है।
- अर्धसूत्री विभाजन I → 2 द्वितीयक शुक्राणुकोशिकाएँ (n)।
- अर्धसूत्री विभाजन II → 4 शुक्रप्रसू (n)।
- शुक्रप्रसू आकार बदलकर शुक्राणु बनते हैं (शुक्राणुजनन का अंतिम चरण) और नलिका में छोड़े जाते हैं।
हॉर्मोन: हाइपोथैलेमस से GnRH → पीयूष ग्रंथि से LH (लेडिग कोशिकाओं पर → टेस्टोस्टेरॉन) और FSH (सर्टोली कोशिकाओं पर)।
शुक्राणु में सिर (केंद्रक + अंडे में घुसने के एंज़ाइम वाला एक्रोसोम), गर्दन, माइटोकॉन्ड्रिया से भरा मध्य भाग (ऊर्जा) और पूँछ (तैरना) होते हैं।
अंडजनन (जन्म से पहले शुरू)
- भ्रूण के अंडाशय में अंडजन बनते हैं। कई प्राथमिक अंडकोशिकाएँ (2n) बनकर विभाजन I शुरू करती हैं और सालों तक रुकी रहती हैं।
- यौवन के बाद हर चक्र में एक प्राथमिक अंडकोशिका विभाजन I पूरा करती है → बड़ी द्वितीयक अंडकोशिका (n) + छोटा पहला ध्रुवीय पिंड।
- अंडोत्सर्ग में द्वितीयक अंडकोशिका निकलती है। विभाजन II केवल शुक्राणु के घुसने पर पूरा होता है → अंडाणु + दूसरा ध्रुवीय पिंड।
पुटक की अवस्थाएँ: प्राथमिक → द्वितीयक → तृतीयक (द्रव गुहा) → ग्राफ़ी पुटक।
मुख्य अंतर
एक शुक्राणुजन → 4 शुक्राणु। एक अंडजन → 1 अंडाणु (+ 2 या 3 ध्रुवीय पिंड)। असमान बँटवारे से लगभग सारा भोजन अंडाणु को मिलता है।
आर्तव (मासिक) चक्र
आर्तव चक्र अंडाशय और गर्भाशय में बार-बार होने वाला बदलाव है, लगभग 28 दिन का। यह रजोदर्शन (पहली माहवारी) से लगभग 50 वर्ष (रजोनिवृत्ति) तक चलता है।
- रजोधर्म प्रावस्था (दिन 1–5): गर्भ न हो तो एंडोमेट्रियम टूटकर खून के साथ बाहर निकलता है।
- पुटकीय (प्रचुरोद्भवन) प्रावस्था (दिन 6–13): FSH और LH से एक पुटक बढ़कर ग्राफ़ी पुटक बनता है। पुटक एस्ट्रोजन बनाता है, जो एंडोमेट्रियम फिर से बनाता है।
- अंडोत्सर्ग (लगभग दिन 14): LH की अचानक बड़ी बढ़त (LH सर्ज) ग्राफ़ी पुटक को फोड़ देती है और द्वितीयक अंडकोशिका निकलती है।
- पीत (स्रावी) प्रावस्था (दिन 15–28): खाली पुटक पीले पीत पिंड (कॉर्पस ल्यूटियम) में बदलता है, जो प्रोजेस्टेरॉन बनाता है। प्रोजेस्टेरॉन एंडोमेट्रियम को मोटा और तैयार रखता है। निषेचन न हो तो पीत पिंड सिकुड़ता है, प्रोजेस्टेरॉन घटता है और फिर माहवारी आती है।
गर्भावस्था में चक्र रुक जाता है क्योंकि पीत पिंड काम करता रहता है।
निषेचन से ब्लास्टोसिस्ट तक
- शुक्राणु तैरकर अंडवाहिनी की तुंबिका तक पहुँचते हैं। केवल एक शुक्राणु द्वितीयक अंडकोशिका में घुसता है। फिर अंडे की बाहरी परत (ज़ोना पेलुसिडा) बदलकर बाकी शुक्राणुओं को रोक देती है।
- शुक्राणु के घुसते ही अंडकोशिका विभाजन II पूरा करती है। दोनों केंद्रक मिलते हैं → युग्मनज (2n)। बच्चे का लिंग यहीं तय होता है: X वाला शुक्राणु → लड़की (XX), Y वाला → लड़का (XY)। यानी लिंग पिता का शुक्राणु तय करता है।
- अंडवाहिनी से नीचे जाते हुए युग्मनज समसूत्री विभाजन (विदलन) करता है: 2, 4, 8, 16 कोशिकाएँ। 8–16 कोशिकाओं की गेंद मोरुला है।
- मोरुला से ब्लास्टोसिस्ट बनता है: बाहरी परत (पोषकोरक, ट्रोफोब्लास्ट) और अंदर कोशिकाओं का समूह (आंतरिक कोशिका समूह) जो बच्चा बनेगा।
अंतर्रोपण
पोषकोरक एंडोमेट्रियम से चिपक जाता है। गर्भाशय की कोशिकाएँ ब्लास्टोसिस्ट के ऊपर बढ़ती हैं और वह दीवार में दब जाता है। यह अंतर्रोपण है, और यहीं से गर्भावस्था शुरू होती है। आंतरिक कोशिका समूह तीन जनन स्तर (बाह्यत्वचा, मध्यत्वचा, अंतस्त्वचा) बनाता है; इन्हीं से हर अंग बनता है। ये अंदरूनी कोशिकाएँ स्टेम कोशिकाएँ हैं जो कोई भी ऊतक बन सकती हैं।
गर्भावस्था, अपरा, प्रसव और दुग्धस्रवण
अपरा (प्लेसेंटा)
भ्रूण की उँगली जैसी जरायु अंकुरें गर्भाशय की दीवार में फँस जाती हैं। दोनों मिलकर अपरा बनाते हैं। अपरा नाभि रज्जु से भ्रूण से जुड़ा होता है। यह भोजन और ऑक्सीजन अंदर देता है, CO₂ और अपशिष्ट बाहर निकालता है, और हॉर्मोन (hCG, hPL, एस्ट्रोजन, प्रोजेस्टेरॉन) भी बनाता है। माँ और बच्चे का खून सीधे नहीं मिलता।
महीनों में बढ़त (लगभग)
- पहला महीना: हृदय बनता है। दूसरा: हाथ-पैर और उँगलियाँ। तीसरे महीने के अंत तक: ज़्यादातर मुख्य अंग बन जाते हैं।
- पाँचवाँ महीना: पहली हलचल, सिर पर बाल। छठे के अंत तक: पलकें, शरीर पर बारीक बाल। लगभग 9 महीने: जन्म के लिए तैयार।
प्रसव
पूरा बढ़ा भ्रूण और अपरा संकेत भेजते हैं जिससे हल्के संकुचन शुरू होते हैं। इनसे पीयूष ग्रंथि ऑक्सीटोसिन छोड़ती है, जो गर्भाशय की पेशियों को और ज़ोर से सिकोड़ता है, जिससे और ऑक्सीटोसिन निकलता है: धनात्मक पुनर्भरण, जो बच्चे को बाहर धकेलता है।
दुग्धस्रवण
गर्भावस्था के अंत के पास स्तन ग्रंथियाँ दूध बनाने लगती हैं। पहले कुछ दिनों का दूध खीस (कोलोस्ट्रम) है, जिसमें नवजात की रक्षा करने वाले एंटीबॉडी भरपूर होते हैं।
करके देखो: 28 दिन का चक्र बनाओ
- 28 खानों की एक लाइन बनाओ। दिन 1–5 लाल, 6–13 पीला, दिन 14 नीला, 15–28 हरा रंगो।
- 3D में दिन 10, 14 और 21 पर जाओ। हर बार लिखो कौन-सी हॉर्मोन पट्टी सबसे ऊँची है।
- पहले अनुमान, फिर जाँच: चक्र 32 दिन का हो, तो भी अंडोत्सर्ग अगली माहवारी से लगभग 14 दिन पहले होता है। वह कौन-सा दिन है?
(उत्तर: दिन 18। पीत प्रावस्था लगभग 14 दिन की ही रहती है।)
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- शुक्राणुजन (2n) → प्राथमिक शुक्राणुकोशिका (2n) → 2 द्वितीयक शुक्राणुकोशिकाएँ (n) → 4 शुक्रप्रसू (n) → 4 शुक्राणु
- अंडजन (2n) → प्राथमिक अंडकोशिका (2n) → द्वितीयक अंडकोशिका (n) + पहला ध्रुवीय पिंड → अंडाणु (n) + दूसरा ध्रुवीय पिंड
- चक्र: रजोधर्म (1–5) → पुटकीय (6–13) → अंडोत्सर्ग (~14, LH सर्ज) → पीत (15–28, प्रोजेस्टेरॉन)
- युग्मनज → विदलन → मोरुला (8–16 कोशिकाएँ) → ब्लास्टोसिस्ट (पोषकोरक + आंतरिक कोशिका समूह) → अंतर्रोपण
- अपरा के हॉर्मोन: hCG, hPL, एस्ट्रोजन, प्रोजेस्टेरॉन; प्रसव: ऑक्सीटोसिन (धनात्मक पुनर्भरण)
- मानव कोशिका: 2n = 46; शुक्राणु और अंडाणु: n = 23
हल किए गए उदाहरण
1. 25 प्राथमिक शुक्राणुकोशिकाओं से कितने शुक्राणु बनेंगे?
हर प्राथमिक शुक्राणुकोशिका से 4 शुक्राणु। 25 × 4 = 100 शुक्राणु।
2. 25 प्राथमिक अंडकोशिकाओं से (सब विभाजन पूरा करें तो) कितने अंडाणु बनेंगे?
हर प्राथमिक अंडकोशिका से केवल 1 अंडाणु। 25 × 1 = 25 अंडाणु (बाकी ध्रुवीय पिंड हैं)।
3. मनुष्य में शुक्राणुजन, द्वितीयक शुक्राणुकोशिका, शुक्रप्रसू और युग्मनज में गुणसूत्र संख्या बताओ।
शुक्राणुजन 46 (2n); द्वितीयक शुक्राणुकोशिका 23 (विभाजन I के बाद n); शुक्रप्रसू 23; युग्मनज 46।
4. किसी महिला का चक्र नियमित 30 दिन का है। अंडोत्सर्ग किस दिन होने की संभावना है?
पीत प्रावस्था लगभग 14 दिन की होती है। अंडोत्सर्ग ≈ 30 − 14 = दिन 16।
5. युग्मनज के 4 बार विदलन के बाद कितनी कोशिकाएँ होंगी?
हर बार दोगुनी: 1 → 2 → 4 → 8 → 16। 4 बार के बाद 2⁴ = 16 कोशिकाएँ, यानी मोरुला।
6. गर्भावस्था में माहवारी क्यों नहीं होती? हॉर्मोन से समझाओ।
अंतर्रोपण के बाद भ्रूण का hCG पीत पिंड को जीवित रखता है। वह प्रोजेस्टेरॉन बनाता रहता है (बाद में अपरा भी)। ऊँचा प्रोजेस्टेरॉन एंडोमेट्रियम को मोटा रखता है, इसलिए वह टूटता नहीं और माहवारी नहीं आती।
आम गलतियाँ
- यह कहना कि अंडोत्सर्ग में अंडाणु निकलता है। निकलती है द्वितीयक अंडकोशिका; शुक्राणु घुसने और विभाजन II के बाद ही वह अंडाणु बनती है।
- यह सोचना कि निषेचन गर्भाशय में होता है। निषेचन अंडवाहिनी की तुंबिका में होता है; फिर भ्रूण गर्भाशय तक जाता है।
- लेडिग कोशिकाओं को शुक्राणु बनाने वाली मान लेना। वे टेस्टोस्टेरॉन बनाती हैं; शुक्राणु नलिकाओं के अंदर शुक्राणुजन से बनते हैं और सर्टोली कोशिकाएँ उन्हें पोषण देती हैं।
- मोरुला और ब्लास्टोसिस्ट में उलझना। मोरुला ठोस गेंद है; ब्लास्टोसिस्ट खोखली है जिसमें आंतरिक कोशिका समूह होता है।