रक्त: प्लाज़्मा और संगठित पदार्थ
रक्त एक विशेष संयोजी ऊतक है: तरल आधार (प्लाज़्मा) में तैरती कोशिकाएँ (संगठित पदार्थ)।
प्लाज़्मा (लगभग 55%)
- हल्का पीला, चिपचिपा द्रव; 90–92% जल, 6–8% प्रोटीन।
- मुख्य प्रोटीन: फाइब्रिनोजन (थक्का), ग्लोबुलिन (रक्षा), एल्ब्यूमिन (जल संतुलन)।
- ग्लूकोज, अमीनो अम्ल, Na+, Ca2+, Cl− जैसे लवण और हॉर्मोन भी।
- थक्का-कारकों के बिना प्लाज़्मा को सीरम कहते हैं।
संगठित पदार्थ (लगभग 45%)
- RBC (लाल रुधिर कणिकाएँ): 50–55 लाख प्रति mm3, लाल अस्थि मज्जा में बनती हैं। स्तनधारियों में केंद्रक नहीं, उभयावतल आकार। हीमोग्लोबिन 12–16 g प्रति 100 mL। उम्र लगभग 120 दिन; प्लीहा (RBC का क़ब्रिस्तान) में नष्ट।
- WBC (श्वेत रुधिर कणिकाएँ): 6000–8000 प्रति mm3, केंद्रक वाली, रोगाणुओं से लड़ती हैं। कणिकामय: न्यूट्रोफिल (सबसे ज़्यादा 60–65%, भक्षण), इओसिनोफिल (2–3%, एलर्जी), बेसोफिल (सबसे कम 0.5–1%, हिस्टामिन, सेरोटोनिन, हिपैरिन)। कणिकाविहीन: लिम्फोसाइट (20–25%, B और T कोशिकाएँ, प्रतिरक्षा), मोनोसाइट (6–8%, भक्षण)।
- प्लेटलेट्स (बिंबाणु): मेगाकैरियोसाइट के टुकड़े, 1.5–3.5 लाख प्रति mm3। थक्का-कारक छोड़ते हैं; कम हों तो ज़्यादा ख़ून बहता है।
रक्त समूह: ABO और Rh
RBC की सतह पर प्रतिजन होते हैं। प्लाज़्मा में वे प्रतिरक्षी हो सकते हैं जो उन प्रतिजनों पर हमला करें जो ख़ुद में नहीं हैं।
| समूह | RBC पर प्रतिजन | प्लाज़्मा में प्रतिरक्षी | किससे ले सकता है |
|---|---|---|---|
| A | A | anti-B | A, O |
| B | B | anti-A | B, O |
| AB | A और B | कोई नहीं | A, B, AB, O |
| O | कोई नहीं | anti-A और anti-B | O |
O सर्वदाता, AB सर्वग्राही है।
Rh समूह
लगभग 80% लोगों पर Rh प्रतिजन होता है (Rh+)। Rh− व्यक्ति Rh+ रक्त के संपर्क के बाद ही anti-Rh प्रतिरक्षी बनाता है। Rh− माँ और Rh+ शिशु में पहली गर्भावस्था आमतौर पर सुरक्षित, पर प्रसव में माँ प्रतिरक्षी बना सकती है। अगली Rh+ गर्भावस्था में ये अपरा पार कर शिशु की RBC नष्ट करते हैं: गर्भ रक्ताणु कोरकता (एरिथ्रोब्लास्टोसिस फीटेलिस)। पहले प्रसव के तुरंत बाद माँ को anti-Rh इंजेक्शन देकर इससे बचाते हैं।
रक्त का स्कंदन (थक्का बनना)
- चोट से प्लेटलेट्स और क्षतिग्रस्त ऊतक कारक छोड़ते हैं।
- इनसे एंज़ाइम समूह थ्रोम्बोकाइनेज़ बनता है।
- थ्रोम्बोकाइनेज़ निष्क्रिय प्रोथ्रोम्बिन को सक्रिय थ्रोम्बिन बनाता है।
- थ्रोम्बिन घुलनशील फाइब्रिनोजन को अघुलनशील फाइब्रिन धागों में बदलता है।
- फाइब्रिन जाल कोशिकाएँ फँसाकर थक्का बनाता है।
कई चरणों में कैल्शियम आयन ज़रूरी हैं। छिले घुटने पर दिखने वाला गहरा लाल ढेला यही जाल है।
लसीका (ऊतक द्रव)
केशिकाओं से गुज़रते समय कुछ जल और छोटे अणु कोशिकाओं के बीच की जगह में रिस जाते हैं; बड़े प्रोटीन और ज़्यादातर कोशिकाएँ रक्त में रहती हैं। यह ऊतक द्रव है, जिसमें प्लाज़्मा जैसे ही लवण हैं।
ऊतक द्रव कोशिकाओं को भोजन-गैस देता है और अपशिष्ट लेता है। फिर पतली लसीका वाहिकाएँ इसे इकट्ठा करती हैं; अब इसे लसीका कहते हैं। लसीका बड़ी शिराओं में लौट जाती है।
- लसीका रंगहीन है और इसमें प्रतिरक्षा के लिए लिम्फोसाइट हैं।
- आंत्र रसांकुरों की लैक्टियल वसा सोखकर लसीका में डालती हैं।
- लसीका पर्व रोगाणु छानते हैं।
परिसंचरण पथ और मानव हृदय
परिसंचरण खुला (रक्त वाहिकाओं से निकलकर खुली जगह भरता है, जैसे आर्थ्रोपोडा, मोलस्का) या बंद (रक्त हमेशा वाहिकाओं में, जैसे ऐनेलिडा, कॉर्डेटा) होता है। बंद ज़्यादा सटीक है।
मछली में 2 कक्षीय, उभयचर व ज़्यादातर सरीसृप में 3 कक्षीय (मगरमच्छ में 4), पक्षी व स्तनधारी में 4 कक्षीय हृदय।
मानव हृदय
- हृद पेशी से बना, फेफड़ों के बीच थोड़ा बाईं ओर, बंद मुट्ठी जितना। दोहरी झिल्ली वाले थैले हृदयावरण में, बीच में द्रव।
- चार कक्ष: ऊपर दो अलिंद (रक्त लेते) और नीचे दो मोटी दीवार वाले निलय (पंप करते)। पट दाएँ-बाएँ को अलग करता है।
- कपाट रक्त एक ही दिशा में भेजते हैं: त्रिवलनी (दायाँ अलिंद → दायाँ निलय), द्विवलनी या मिट्रल (बायाँ अलिंद → बायाँ निलय), और फुप्फुसीय धमनी व महाधमनी के मुँह पर अर्धचंद्र कपाट।
- पर्वीय ऊतक हृदय को स्वयं उत्तेजित करता है: SA पर्व (दाएँ अलिंद में ऊपर) गति प्रेरक (पेसमेकर) है, मिनट में 70–75 बार संकेत देता है। AV पर्व संकेत हिस के बंडल और पुरकिंजे तंतुओं तक पहुँचाता है।
रक्त वाहिकाएँ
धमनियाँ रक्त हृदय से दूर ले जाती हैं (मोटी दीवार, ज़्यादा दाब)। शिराएँ वापस लाती हैं (पतली दीवार, कपाट)। केशिकाएँ एक कोशिका मोटी, इनमें विनिमय होता है।
हृद चक्र और हृद निकास
अलिंदों और निलयों के एक पूरे संकुचन (प्रकुंचन) और शिथिलन (अनुशिथिलन) को हृद चक्र कहते हैं। 72 धड़कन/मिनट पर यह 60 ÷ 72 ≈ 0.8 s का है।
- संयुक्त अनुशिथिलन: चारों कक्ष ढीले; त्रिवलनी-द्विवलनी खुले, रक्त शिराओं से अलिंद होकर निलय में। अर्धचंद्र कपाट बंद।
- अलिंद प्रकुंचन: SA पर्व संकेत देता है; अलिंद सिकुड़कर लगभग 30% और रक्त निलयों में डालते हैं।
- निलय प्रकुंचन: संकेत AV पर्व → हिस बंडल → पुरकिंजे तंतु। निलय सिकुड़ते, AV कपाट बंद (पहली ध्वनि लब), दाब बढ़ता, अर्धचंद्र कपाट खुलते, रक्त फुप्फुसीय धमनी व महाधमनी में।
- निलय अनुशिथिलन: निलय ढीले, अर्धचंद्र कपाट बंद (दूसरी ध्वनि डब)। AV कपाट फिर खुलते, चक्र दोहराता है।
प्रवाह आयतन: हर धड़कन में एक निलय से निकला रक्त, लगभग 70 mL। हृद निकास = प्रवाह आयतन × हृदय दर ≈ 70 × 72 ≈ 5 L प्रति मिनट। खिलाड़ियों में यह बहुत बढ़ सकता है।
विद्युत हृद लेख (ECG)
ECG हृद चक्र में हृदय की विद्युत गतिविधि का ग्राफ़ है। तार कलाइयों, टखने और छाती पर लगते हैं।
- P तरंग: अलिंदों का विध्रुवण → अलिंद संकुचन।
- QRS सम्मिश्र: निलयों का विध्रुवण → निलय संकुचन की शुरुआत।
- T तरंग: निलयों का पुनर्ध्रुवण (आराम में लौटना) → प्रकुंचन का अंत।
तय समय में QRS गिनकर हृदय दर मिलती है। तरंगों के आकार या दूरी में बदलाव से डॉक्टर हृदय रोग पहचानते हैं।
दोहरा परिसंचरण
- फुप्फुसीय परिसंचरण: दायाँ निलय → फुप्फुसीय धमनी → फेफड़े (O2 मिलती है) → फुप्फुसीय शिराएँ → बायाँ अलिंद।
- दैहिक परिसंचरण: बायाँ निलय → महाधमनी → धमनियाँ → ऊतकों की केशिकाएँ → शिराएँ → महाशिराएँ → दायाँ अलिंद।
एक पूरे चक्कर में रक्त हृदय से दो बार गुज़रता है, इसलिए दोहरा परिसंचरण। शुद्ध और अशुद्ध रक्त नहीं मिलते, ऊतकों को ज़्यादा O2 मिलती है।
यकृत निवाहिका तंत्र: यकृत निवाहिका शिरा आंत से रक्त पहले यकृत ले जाती है। हृदय (कोरोनरी) परिसंचरण हृद पेशी को ख़ुद रक्त देता है।
हृदय क्रिया का नियमन
- सामान्य धड़कन पर्वीय ऊतक से स्वयं नियंत्रित है, इसलिए हृदय पेशीजनक (मायोजेनिक) है।
- मेडुला ऑब्लांगेटा का एक केंद्र स्वायत्त तंत्रिका तंत्र से इसे बदल सकता है।
- अनुकंपी तंत्रिकाएँ हृदय दर, धड़कन की ताक़त और हृद निकास बढ़ाती हैं।
- परानुकंपी तंत्रिकाएँ (वेगस) हृदय दर और हृद निकास घटाती हैं।
- एड्रीनल मेडुला के हॉर्मोन (एड्रीनेलिन) भी हृद निकास बढ़ाते हैं।
परिसंचरण तंत्र के रोग
- उच्च रक्तचाप (हाइपरटेंशन): सामान्य BP 120/80 mm Hg (प्रकुंचन/अनुशिथिलन)। बार-बार 140/90 या ऊपर हो तो उच्च रक्तचाप; यह हृदय, मस्तिष्क, वृक्क को नुकसान करता है।
- कोरोनरी धमनी रोग (CAD) / एथेरोस्क्लेरोसिस: हृद पेशी को रक्त देने वाली वाहिकाओं में वसा, कैल्शियम, कोलेस्टेरॉल और रेशे जमा होकर नली संकरी करते हैं।
- हृदयशूल (एंजाइना पेक्टोरिस): हृद पेशी को पूरी O2 न मिलने पर छाती में तेज़ दर्द; अधेड़ और बुज़ुर्गों में ज़्यादा।
- हृदपात (हार्ट फ़ेल्योर): हृदय शरीर की ज़रूरत जितना रक्त पंप नहीं कर पाता; फेफड़ों में द्रव भर सकता है। यह हृद अवरोध (कार्डियक अरेस्ट), जिसमें धड़कन रुकती है, या हृदयाघात (हार्ट अटैक), जिसमें रक्त न मिलने से हृद पेशी अचानक क्षतिग्रस्त होती है, से अलग है।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- हृद निकास = प्रवाह आयतन × हृदय दर
- हृद चक्र का समय = 60 ÷ हृदय दर (s)
- सामान्य BP = 120/80 mm Hg
- थक्का: थ्रोम्बोकाइनेज़ → प्रोथ्रोम्बिन → थ्रोम्बिन → फाइब्रिनोजन → फाइब्रिन
- प्लाज़्मा = सीरम + थक्का-कारक
हल किए गए उदाहरण
1. प्रवाह आयतन = 70 mL, हृदय दर = 72/मिनट। हृद निकास निकालें।
CO = 70 × 72 = 5040 mL/मिनट ≈ 5.04 L/मिनट।
2. हृदय मिनट में 75 बार धड़कता है। एक हृद चक्र कितने समय का है?
समय = 60 ÷ 75 = 0.8 s।
3. एक धावक का हृद निकास 25 L/मिनट है और हृदय दर 180। प्रवाह आयतन निकालें।
SV = CO ÷ HR = 25000 mL ÷ 180 ≈ 139 mL।
4. ECG में 15 सेकंड में 18 QRS दिखे। हृदय दर निकालें।
धड़कन/मिनट = 18 × (60 ÷ 15) = 18 × 4 = 72।
5. शरीर में 5 L रक्त है और हृद निकास 5 L/मिनट। सारा रक्त बाएँ निलय से एक बार गुज़रने में कितना समय?
समय = 5 L ÷ 5 L/मिनट = 1 मिनट।
6. हृदय दर 70 से 120 और प्रवाह आयतन 70 से 100 mL हो गया। हृद निकास कितने गुना बढ़ा?
पहले: 70 × 70 = 4900 mL/मिनट। बाद में: 120 × 100 = 12000 mL/मिनट। अनुपात = 12000 ÷ 4900 ≈ 2.4 गुना।
7. B समूह वाले व्यक्ति को रक्त चाहिए। वह किन समूहों से ले सकता है?
B में anti-A प्रतिरक्षी हैं। इसलिए B और O से ले सकता है; A या AB से नहीं।
8. Rh− माँ के गर्भ में दूसरा Rh+ शिशु है और पहले प्रसव के बाद anti-Rh इंजेक्शन नहीं लगा। क्या हो सकता है?
पहले प्रसव के बाद माँ anti-Rh प्रतिरक्षी बना चुकी हो सकती है। ये अपरा पार कर शिशु की RBC नष्ट कर सकते हैं: एरिथ्रोब्लास्टोसिस फीटेलिस (शिशु में गंभीर रक्ताल्पता, पीलिया)।
आम गलतियाँ
- कहना कि हर धमनी शुद्ध रक्त ले जाती है। फुप्फुसीय धमनी अशुद्ध रक्त फेफड़ों तक ले जाती है।
- सीरम और प्लाज़्मा को एक समझना। सीरम = थक्का-कारक रहित प्लाज़्मा।
- AB को सर्वदाता कहना। O सर्वदाता है, AB सर्वग्राही।
- सोचना कि मस्तिष्क हर धड़कन शुरू करता है। SA पर्व करता है; तंत्रिकाएँ सिर्फ़ तेज़ या धीमा करती हैं।