National Year 12 Biology
अध्याय: 4
1. 3.1 Biological molecules
3.1.1 Monomers and polymers · 3.1.2 Carbohydrates · 3.1.3 Lipids · 3.1.4 Proteins · 3.1.5 Nucleic acids · 3.1.6 ATP · 3.1.7 Water · 3.1.8 Inorganic ions
- जैव अणु – कोशिका में ज़्यादातर पानी है, और कार्बन यौगिकों के चार बड़े परिवार: प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, लिपिड और न्यूक्लिक अम्ल। ऊतक को अम्ल में पीसने से छोटे अणु (अम्ल-विलेय भाग) बड़े अणुओं – प्रोटीन, पॉलीसैकेराइड, न्यूक्लिक अम्ल (अम्ल-अविलेय भाग) – से अलग हो जाते हैं। प्रोटीन अमीनो अम्लों की शृंखलाएँ हैं जो चार स्तरों में मुड़ती हैं। पॉलीसैकेराइड शर्करा की शृंखलाएँ हैं; लिपिड ग्लिसरॉल पर वसा अम्ल; न्यूक्लिक अम्ल न्यूक्लियोटाइड की शृंखलाएँ। एंज़ाइम प्रोटीन उत्प्रेरक हैं जो सक्रिय स्थल पर क्रियाधार पकड़ते हैं, सक्रियण ऊर्जा घटाते हैं, और तापमान, pH, क्रियाधार मात्रा व संदमकों से प्रभावित होते हैं।
- वंशागति का आणविक आधार – ज़्यादातर जीवों में DNA आनुवंशिक पदार्थ है (कुछ वायरस में RNA)। यह द्विकुंडली है: न्यूक्लियोटाइड के दो प्रतिसमांतर सूत्र; A–T दो हाइड्रोजन बंध से, G–C तीन से। लंबा DNA हिस्टोन पर लिपटकर न्यूक्लियोसोम और फिर क्रोमैटिन बनाता है। DNA अर्धसंरक्षी ढंग से प्रतिकृति बनाता है (मेसेल्सन–स्टाल)। केंद्रीय सिद्धांत: DNA → RNA → प्रोटीन। अनुलेखन एक सूत्र से RNA बनाता है; यूकैरियोट में hnRNA पर कैप, पूँछ और स्प्लाइसिंग होती है। आनुवंशिक कूट त्रिक है, 64 कोडॉन (61 अमीनो अम्ल, 3 समापन), AUG से शुरू, लगभग सार्वत्रिक और अपह्रासित। राइबोसोम tRNA की मदद से mRNA को प्रोटीन में बदलता है। जीन चालू-बंद होते हैं; लैक ओपेरॉन इसका उदाहरण है। मानव और चावल जीनोम परियोजनाओं ने पूरा जीनोम पढ़ा, और DNA फिंगरप्रिंटिंग दोहराव वाले DNA (VNTR) से व्यक्ति की पहचान करती है।
- ATP: कोशिका की ऊर्जा मुद्रा – ATP (एडिनोसिन ट्राइफॉस्फेट) एक न्यूक्लियोटाइड है जिसमें एडेनिन क्षार, राइबोज़ शर्करा और तीन फॉस्फेट समूह होते हैं। ATP हाइड्रोलेज़ एंज़ाइम पानी की मदद से आख़िरी फॉस्फेट अलग करता है (जल-अपघटन): ATP + H₂O → ADP + Pi, और लगभग 30 kJ प्रति मोल ऊर्जा छोटे, काम के हिस्सों में निकलती है। श्वसन और प्रकाश-संश्लेषण के समय ATP सिंथेज़ ADP और Pi को संघनन से फिर जोड़ता है। कोशिका ATP जमा नहीं करती, लगातार बनाती और खर्च करती है। एक ग्लूकोज से वायवीय श्वसन में लगभग 30–32 ATP, पर अवायवीय में सिर्फ़ 2 ATP मिलते हैं।
- जल: छोटा-सा अणु जो जीवन संभव बनाता है – जल का अणु (H₂O) मुड़ा हुआ और ध्रुवीय है: ऑक्सीजन थोड़ा ऋण आवेशित और हाइड्रोजन थोड़े धन आवेशित। इसी कारण जल के अणु हाइड्रोजन बंध से आपस में चिपकते हैं। इन्हीं बंधों से जल बहुत-से पदार्थ घोलता है, बहुत ऊष्मा जमा करता है, भाप बनने में बहुत ऊर्जा लेता है, आपस में (संसंजन) और सतहों से (आसंजन) चिपकता है, और बर्फ़ तैरती है। जीव जल को अभिक्रियाओं, परिवहन और कोशिकाओं को कसा रखने में भी इस्तेमाल करते हैं। जल में घुले खनिज लवण Na⁺, K⁺, Ca²⁺, Fe²⁺ और फ़ॉस्फ़ेट जैसे आयन देते हैं।
- जीवों में अकार्बनिक आयन – अकार्बनिक आयन ऐसे आवेशित कण हैं जिनमें कार्बन शृंखला नहीं होती, और जो कोशिका व शरीर के द्रवों के पानी में घुले रहते हैं। ये कम मात्रा में चाहिए, पर हर एक का ख़ास काम है। आयरन आयन (Fe²⁺) हीमोग्लोबिन के हीम समूहों में ऑक्सीजन जोड़ते हैं। सोडियम आयन (Na⁺) ग्लूकोज़ और अमीनो अम्ल का सह-परिवहन कराते हैं और तंत्रिका आवेग के लिए ज़रूरी हैं। फ़ॉस्फ़ेट आयन (PO₄³⁻) ATP, DNA, RNA और फ़ॉस्फ़ोलिपिड बनाते हैं। हाइड्रोजन आयन (H⁺) pH तय करते हैं: ज़्यादा H⁺ = कम pH, जिससे एंज़ाइम विकृत हो सकते हैं और हीमोग्लोबिन ऑक्सीजन छोड़ता है।
2. 3.2 Cells
3.2.1 Cell structure · 3.2.2 Cell division (all cells arise from other cells) · 3.2.3 Transport across cell membranes · 3.2.4 Cell recognition and the immune system
- कोशिका: जीवन की इकाई – हर सजीव कोशिकाओं से बना है और हर नई कोशिका पुरानी कोशिका से बनती है। प्रोकैरियोटी कोशिका (जीवाणु) में केंद्रक आवरण और झिल्ली वाले कोशिकांग नहीं होते; यूकैरियोटी कोशिका में असली केंद्रक और कई कोशिकांग होते हैं। झिल्ली लिपिड और प्रोटीन का तरल मोज़ेक है; पौधों में ऊपर से सेलुलोज़ की भित्ति। ER, गॉल्जी, लयनकाय और रिक्तिका मिलकर अंतःझिल्ली तंत्र बनाते हैं। माइटोकॉन्ड्रिया और लवक ऊर्जा व भोजन बनाते हैं, राइबोसोम प्रोटीन बनाते हैं, कोशिका कंकाल, पक्ष्माभ, कशाभिका और तारककेंद्र आकार व गति देते हैं, और केंद्रक में DNA रहता है।
- कोशिका चक्र और कोशिका विभाजन – कोशिका एक तय क्रम में बढ़ती है, DNA दोहराती है और बँटती है – इसे कोशिका चक्र कहते हैं: अंतरावस्था (G1, S, G2) और M प्रावस्था। S प्रावस्था में DNA दोगुना (2C → 4C) होता है, पर गुणसूत्र संख्या वही रहती है। समसूत्री विभाजन (पूर्वावस्था, मध्यावस्था, पश्चावस्था, अंत्यावस्था) और कोशिकाद्रव्य विभाजन से जनक जैसी दो कोशिकाएँ बनती हैं – यह समीकरणीय विभाजन वृद्धि और मरम्मत के लिए है। अर्धसूत्री विभाजन में दो विभाजन होते हैं; अर्धसूत्री I में समजात गुणसूत्र जोड़ा बनाते हैं, जीन विनिमय करते हैं और अलग होते हैं, जिससे गुणसूत्र संख्या आधी (2n → n) होती है। इससे युग्मकों के लिए चार अगुणित कोशिकाएँ बनती हैं और विविधता आती है।
- झिल्ली परिवहन: कोशिका में चीज़ें अंदर-बाहर कैसे जाती हैं – कोशिका झिल्ली वसा जैसे अणुओं की पतली दोहरी परत है जिसमें प्रोटीन लगे होते हैं. यह कुछ पदार्थों को जाने देती है और कुछ को रोकती है (चयनात्मक पारगम्य). विसरण में कण ज़्यादा सांद्रता से कम सांद्रता की ओर बिना ऊर्जा जाते हैं. सुसाध्य विसरण यही काम प्रोटीन चैनल से करता है. परासरण आंशिक पारगम्य झिल्ली से पानी का विसरण है. सक्रिय परिवहन ATP और प्रोटीन पंप से कणों को कम से ज़्यादा सांद्रता की ओर ले जाता है. बहुत बड़ी चीज़ें बुलबुलों में आती-जाती हैं (एंडोसाइटोसिस, एक्सोसाइटोसिस).
- मानव स्वास्थ्य तथा रोग – स्वास्थ्य का मतलब है शरीर, मन और सामाजिक जीवन तीनों ठीक हों। रोग कई बार कीटाणुओं (रोगजनक) से होते हैं: जीवाणु, वायरस, प्रोटोज़ोआ, कृमि और कवक। शरीर दो तरह की प्रतिरक्षा से लड़ता है: सहज (जन्म से) और उपार्जित (सीखी हुई, याद रखने वाली)। टीके इसी याददाश्त का उपयोग करते हैं। HIV सहायक T कोशिकाओं को नष्ट करके एड्स करता है। कैंसर में कोशिकाएँ बिना रुके बँटती हैं। नशा और शराब किशोरों के शरीर और मन को नुकसान पहुँचाते हैं।
3. 3.3 Organisms exchange substances with their environment
3.3.1 Surface area to volume ratio · 3.3.2 Gas exchange · 3.3.3 Digestion and absorption · 3.3.4 Mass transport
- पृष्ठीय क्षेत्रफल और आयतन का अनुपात – पृष्ठीय क्षेत्रफल (SA) बाहर का कुल क्षेत्रफल है, आयतन (V) अंदर की जगह। SA : V बताता है कि आयतन की हर इकाई के लिए कितनी सतह है। भुजा L वाले घन में SA = 6L², V = L³ और SA : V = 6 ÷ L, यानी आकार बढ़ने पर अनुपात घटता है। जीव ऑक्सीजन, भोजन, अपशिष्ट और गर्मी का लेन-देन सतह से करते हैं, जबकि ज़रूरत पूरे आयतन को होती है। छोटे जीवों में अनुपात बड़ा और विसरण दूरी कम, तो विसरण काफ़ी है। बड़े जीवों में अनुपात छोटा, इसलिए वे चपटा आकार, तहों वाली विनिमय सतहें (कूपिकाएँ, रसांकुर, गलफड़े, मूल रोम) और परिवहन तंत्र इस्तेमाल करते हैं। छोटे स्तनधारी जल्दी गर्मी खोते हैं और उन्हें प्रति ग्राम ऊँची उपापचय दर चाहिए।
- श्वसन और गैसों का विनिमय – साँस लेने से हवा फेफड़ों में आती-जाती है। हवा का रास्ता: नाक → श्वासनली → श्वसनी → श्वसनिकाएँ → कूपिकाएँ। जब डायाफ्राम और बाहरी पसली-पेशियाँ सिकुड़ती हैं तो छाती बड़ी होती है, अंदर का दाब घटता है और हवा अंदर आती है। कूपिकाओं में O2 रक्त में जाती है और CO2 बाहर आती है, हमेशा ज़्यादा आंशिक दाब से कम की ओर। रक्त O2 ज़्यादातर हीमोग्लोबिन पर और CO2 ज़्यादातर बाइकार्बोनेट बनाकर ले जाता है। मस्तिष्क का एक केंद्र साँस की लय तय करता है। ज्वारीय आयतन, जैव क्षमता जैसे आयतन जोड़कर निकाले जाते हैं।
- पाचन और अवशोषण: एंज़ाइम, मिसेल और सह-परिवहन – बड़े भोजन-अणु एंज़ाइमों से छोटे बनते हैं: कार्बोहाइड्रेज़ (एमाइलेज़, फिर झिल्ली पर लगे डाइसैकेराइडेज़) से मोनोसैकेराइड, प्रोटिएज़ (एंडोपेप्टिडेज़, एक्सोपेप्टिडेज़, झिल्ली के डाइपेप्टिडेज़) से अमीनो अम्ल, और पित्त लवण द्वारा इमल्सीकरण के बाद लाइपेज़ से मोनोग्लिसराइड व वसा अम्ल। ग्लूकोज़ और अमीनो अम्ल Na⁺ के साथ सह-परिवहन से इलियम की कोशिकाओं में जाते हैं। वसा के भाग मिसेल में चलते हैं, कोशिका में विसरित होते हैं, फिर ट्राइग्लिसराइड बनकर काइलोमाइक्रॉन के रूप में लैक्टियल में जाते हैं।
- शरीर द्रव तथा परिसंचरण – रक्त और लसीका शरीर के परिवहन द्रव हैं। रक्त = प्लाज़्मा (लगभग 55%) + संगठित पदार्थ: RBC, WBC और प्लेटलेट्स। रक्त समूह (ABO, Rh) RBC पर लगे प्रतिजनों से तय होते हैं। फाइब्रिनोजन से फाइब्रिन धागे बनकर थक्का बनाते हैं। मानव हृदय में चार कक्ष हैं और रक्त दो परिपथों में जाता है: फेफड़ों तक और शरीर तक (दोहरा परिसंचरण)। SA पर्व हर धड़कन शुरू करता है; एक धड़कन लगभग 0.8 s का हृद चक्र है, जिसे ECG में P, QRS, T तरंगों में देखा जाता है। हृद निकास = प्रवाह आयतन × हृदय दर ≈ 5 L/मिनट।
4. 3.4 Genetic information, variation and relationships
3.4.1 DNA, genes and chromosomes · 3.4.2 DNA and protein synthesis · 3.4.3 Genetic diversity from mutation and meiosis · 3.4.4 Genetic diversity and adaptation · 3.4.5 Species and taxonomy · 3.4.6 Biodiversity within a community · 3.4.7 Investigating diversity
- वंशागति का आणविक आधार – ज़्यादातर जीवों में DNA आनुवंशिक पदार्थ है (कुछ वायरस में RNA)। यह द्विकुंडली है: न्यूक्लियोटाइड के दो प्रतिसमांतर सूत्र; A–T दो हाइड्रोजन बंध से, G–C तीन से। लंबा DNA हिस्टोन पर लिपटकर न्यूक्लियोसोम और फिर क्रोमैटिन बनाता है। DNA अर्धसंरक्षी ढंग से प्रतिकृति बनाता है (मेसेल्सन–स्टाल)। केंद्रीय सिद्धांत: DNA → RNA → प्रोटीन। अनुलेखन एक सूत्र से RNA बनाता है; यूकैरियोट में hnRNA पर कैप, पूँछ और स्प्लाइसिंग होती है। आनुवंशिक कूट त्रिक है, 64 कोडॉन (61 अमीनो अम्ल, 3 समापन), AUG से शुरू, लगभग सार्वत्रिक और अपह्रासित। राइबोसोम tRNA की मदद से mRNA को प्रोटीन में बदलता है। जीन चालू-बंद होते हैं; लैक ओपेरॉन इसका उदाहरण है। मानव और चावल जीनोम परियोजनाओं ने पूरा जीनोम पढ़ा, और DNA फिंगरप्रिंटिंग दोहराव वाले DNA (VNTR) से व्यक्ति की पहचान करती है।
- कोशिका चक्र और कोशिका विभाजन – कोशिका एक तय क्रम में बढ़ती है, DNA दोहराती है और बँटती है – इसे कोशिका चक्र कहते हैं: अंतरावस्था (G1, S, G2) और M प्रावस्था। S प्रावस्था में DNA दोगुना (2C → 4C) होता है, पर गुणसूत्र संख्या वही रहती है। समसूत्री विभाजन (पूर्वावस्था, मध्यावस्था, पश्चावस्था, अंत्यावस्था) और कोशिकाद्रव्य विभाजन से जनक जैसी दो कोशिकाएँ बनती हैं – यह समीकरणीय विभाजन वृद्धि और मरम्मत के लिए है। अर्धसूत्री विभाजन में दो विभाजन होते हैं; अर्धसूत्री I में समजात गुणसूत्र जोड़ा बनाते हैं, जीन विनिमय करते हैं और अलग होते हैं, जिससे गुणसूत्र संख्या आधी (2n → n) होती है। इससे युग्मकों के लिए चार अगुणित कोशिकाएँ बनती हैं और विविधता आती है।
- विकास: जीवन की उत्पत्ति, क्रियाविधि और मानव विकास – शुरुआती पृथ्वी पर सरल रसायनों से जीवन शुरू हुआ: ओपेरिन और हाल्डेन ने कहा और मिलर ने फ्लास्क में अमीनो अम्ल बनाए। विकास के प्रमाण जीवाश्म, समजात और समरूप अंग, भ्रूण, अणु और आज दिखने वाले बदलाव (औद्योगिक मेलानिनता, दवा प्रतिरोध) से मिलते हैं। डार्विन ने इसे आबादी की विभिन्नता पर प्राकृतिक वरण से समझाया; आधुनिक संश्लेषित सिद्धांत जीन जोड़ता है: उत्परिवर्तन, पुनर्योजन, जीन प्रवाह, आनुवंशिक विचलन और प्राकृतिक वरण अलील आवृत्ति बदलते हैं। अगर इनमें से कुछ न हो, आवृत्तियाँ स्थिर रहती हैं: हार्डी–वाइनबर्ग, p² + 2pq + q² = 1। वरण स्थायीकारी, दिशात्मक या विदारक होता है। एक पूर्वज का कई आवासों में फैलकर कई जातियाँ बनाना अनुकूली विकिरण है (डार्विन की फिंच, ऑस्ट्रेलियाई शिशुधानी)। मनुष्य ड्रायोपिथेकस जैसे कपियों से ऑस्ट्रेलोपिथेकस, होमो हैबिलिस, होमो इरेक्टस और निएंडरथल होते हुए होमो सेपियंस बना।
- जीव जगत का वर्गीकरण – व्हिटेकर (1969) ने जीवों को पाँच जगत में बाँटा: मोनेरा, प्रोटिस्टा, कवक, पादप और जंतु। आधार थे: कोशिका का प्रकार, कोशिका भित्ति, शरीर की बनावट, पोषण का तरीका, जनन और आपसी संबंध। मोनेरा प्रोकैरियोट हैं (बैक्टीरिया, आर्कीबैक्टीरिया, सायनोबैक्टीरिया, माइकोप्लाज़्मा)। प्रोटिस्टा एककोशिकी यूकैरियोट हैं, पाँच समूहों में। कवक काइटिन भित्ति वाले परपोषी हैं, चार वर्गों में। लाइकेन शैवाल और कवक की साझेदारी है। वायरस, विरोइड और प्रायन किसी जगत में नहीं।
- जैव विविधता एवं संरक्षण – जैव विविधता यानी जीवन की विविधता, तीन स्तरों पर: आनुवंशिक, जातीय और पारिस्थितिक। यह भूमध्य रेखा के पास सबसे ज़्यादा है और क्षेत्र के साथ बढ़ती है (log S = log C + Z log A)। हर जाति ज़रूरी है, जैसे हवाई जहाज़ की कीलें। 'दुष्ट चौकड़ी' के कारण जातियाँ तेज़ी से खो रही हैं: आवास हानि और विखंडन, अति-दोहन, विदेशी जातियों का आक्रमण और सह-विलुप्ति। IUCN रेड लिस्ट (रेड डेटा बुक) जातियों को 'कम चिंता' से 'विलुप्त' तक बाँटती है। संरक्षण स्व-स्थाने (हॉटस्पॉट, राष्ट्रीय उद्यान, अभयारण्य, जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र, पवित्र उपवन, रामसर आर्द्रभूमि) और बाह्य-स्थाने (चिड़ियाघर, वानस्पतिक उद्यान, बीज बैंक) होता है।
- विविधता की जाँच: आनुवंशिक विविधता, नमूना और मानक विचलन – किसी जाति के अंदर या जातियों के बीच आनुवंशिक विविधता को दिखने वाले लक्षणों, DNA बेस क्रम, mRNA बेस क्रम या अमीनो अम्ल क्रम की तुलना से नापते हैं: जितने कम अंतर, उतना निकट संबंध। हर जीव को नापना संभव नहीं, इसलिए पर्याप्त बड़ा यादृच्छिक नमूना लेते हैं और उसे माध्य और मानक विचलन (SD) से बताते हैं। SD माध्य के आस-पास फैलाव दिखाता है; सामान्य वितरण में लगभग 68% मान ±1 SD के अंदर होते हैं।