अमोनियोत्सर्जन, यूरियोत्सर्जन और यूरिकोत्सर्जन
कोशिकाएँ प्रोटीन तोड़ें तो नाइट्रोजन अपशिष्ट बनता है। जीव इसे अमोनिया, यूरिया या यूरिक अम्ल के रूप में निकालते हैं।
| प्रकार | मुख्य अपशिष्ट | विषैलापन | पानी | उदाहरण |
|---|---|---|---|---|
| अमोनियोत्सर्जी | अमोनिया | सबसे ज़्यादा | सबसे ज़्यादा | अस्थिल मछलियाँ, जलीय उभयचर, जलीय कीट |
| यूरियोत्सर्जी | यूरिया | कम | मध्यम | स्तनधारी, कई स्थलीय उभयचर, समुद्री मछलियाँ |
| यूरिकोत्सर्जी | यूरिक अम्ल (लेई/गोली) | सबसे कम | सबसे कम | पक्षी, सरीसृप, स्थलीय घोंघे, कीट |
अमोनिया आसानी से घुलकर जलीय जीवों की त्वचा या क्लोम से निकल जाती है। स्तनधारियों में यकृत अमोनिया को यूरिया बनाता है (यूरिया चक्र), वृक्क उसे निकालता है। कुछ यूरिया मध्यांश में रुककर उसे नमकीन रखता है।
दूसरे जीवों के उत्सर्जी अंग
- चपटे कृमि (प्लेनेरिया): ज्वाला कोशिकाओं वाले आदिवृक्कक।
- केंचुआ: वृक्कक (नेफ्रीडिया)।
- कीट (तिलचट्टा): मैलपीगी नलिकाएँ।
- झींगा: शृंगिक या हरित ग्रंथियाँ।
- कशेरुकी: वृक्क।
मानव उत्सर्जन तंत्र और वृक्क की संरचना
मनुष्य में दो वृक्क, दो मूत्रवाहिनियाँ, एक मूत्राशय और एक मूत्रमार्ग है। वृक्क लाल-भूरे, सेम जैसे, 10–12 cm लंबे, रीढ़ के दोनों ओर अंतिम वक्षीय से तीसरी कटि कशेरुका तक।
- अंदर के मोड़ पर खाँचा हाइलम है, जहाँ से मूत्रवाहिनी, रक्त वाहिकाएँ और तंत्रिकाएँ आती-जाती हैं।
- हाइलम के अंदर कीप जैसी वृक्क श्रोणि, जिसकी शाखाएँ कैलिक्स हैं।
- बाहर मज़बूत संपुट। अंदर बाहरी वल्कुट और भीतरी मध्यांश। मध्यांश में शंकु जैसे पिरामिड; पिरामिडों के बीच वल्कुट की पट्टियाँ बर्तिनी के स्तंभ।
वृक्काणु: काम की इकाई
हर वृक्क में लगभग 10 लाख वृक्काणु। दो भाग:
- केशिकागुच्छ (ग्लोमेरुलस): अभिवाही धमनिका (चौड़ी, रक्त लाती) से बना केशिकाओं का गुच्छा, जिसे अपवाही धमनिका (संकरी, रक्त ले जाती) ख़ाली करती है।
- वृक्क नलिका: गुच्छ के चारों ओर प्याली, बोमन संपुट (दोनों मिलकर मैलपीगी काय)। फिर कुंडलित समीपस्थ संवलित नलिका (PCT), हेयरपिन जैसा हेनले लूप (अवरोही व आरोही भुजा), दूरस्थ संवलित नलिका (DCT) और संग्राहक नलिका।
ज़्यादातर वृक्काणु वल्कुटीय (छोटा लूप), कुछ मध्यांश-सन्निकट (लंबा लूप, गहरे मध्यांश तक)। अपवाही धमनिका नलिका के चारों ओर केशिका जाल बनाती है; लूप के साथ U-आकार की पतली वाहिका वासा रेक्टा है।
मूत्र निर्माण: निस्यंदन, पुनरवशोषण, स्रावण
1. गुच्छीय निस्यंदन
केशिकागुच्छ में रक्तदाब द्रव को तीन परतों (केशिका दीवार, आधार झिल्ली, बोमन संपुट की छिद्र वाली पोडोसाइट कोशिकाएँ) से धकेलता है। लगभग हर छोटी चीज़ छनती है, पर रक्त कोशिकाएँ और प्लाज़्मा प्रोटीन रुकते हैं। यह परानिस्यंदन है।
वृक्क हर मिनट लगभग 1100–1200 mL रक्त छानते हैं (हृद निकास का पाँचवाँ भाग)। गुच्छीय निस्यंदन दर (GFR) लगभग 125 mL/मिनट यानी 180 L प्रतिदिन।
जहाँ DCT अभिवाही धमनिका को छूती है, वहाँ सन्निगुच्छ उपकरण (JGA) है; GFR घटे तो यह रेनिन छोड़ता है।
2. पुनरवशोषण
रोज़ मूत्र सिर्फ़ लगभग 1.5 L, यानी लगभग 99% निस्यंद वापस सोखा जाता है। ग्लूकोज, अमीनो अम्ल, Na+ सक्रिय परिवहन से; जल और नाइट्रोजन अपशिष्ट निष्क्रिय रूप से।
3. नलिका स्रावण
नलिका कोशिकाएँ H+, K+ और अमोनिया निस्यंद में डालती हैं। इससे शरीर द्रवों का pH और आयन संतुलन बना रहता है।
हर भाग का काम
- PCT: लगभग सारा ग्लूकोज, अमीनो अम्ल, 70–80% लवण और जल वापस; H+, अमोनिया, K+ का स्रावण; HCO3− वापस।
- अवरोही भुजा: जल बाहर जाने देती है, लवण नहीं; निस्यंद गाढ़ा होता है।
- आरोही भुजा: जल के लिए अपारगम्य; लवण बाहर; निस्यंद पतला होता है।
- DCT: ज़रूरत पर Na+ व जल वापस; H+, K+, NH3 का स्रावण।
- संग्राहक नलिका: (ADH के साथ) बहुत जल वापस, गाढ़ा मूत्र; थोड़ा यूरिया मध्यांश में जाने देती है।
मूत्र को गाढ़ा करना: प्रतिधारा क्रियाविधि
स्तनधारी रक्त से कहीं ज़्यादा गाढ़ा मूत्र बना सकते हैं। तरीका: दो U-आकार की धाराएँ पास-पास उल्टी दिशा में बहती हैं, हेनले लूप और वासा रेक्टा। इसे प्रतिधारा कहते हैं।
- आरोही भुजा से निकला NaCl और संग्राहक नलिका से रिसा यूरिया मध्यांश में जमा होता है।
- लूप के आसपास का द्रव वल्कुट में लगभग 300 mOsm/L से गहरे मध्यांश में लगभग 1200 mOsm/L तक पहुँचता है।
- वासा रेक्टा लवण को घुमाकर ढलान को बहने नहीं देता।
- संग्राहक नलिका इस नमकीन क्षेत्र से गुज़रती है तो परासरण से जल बाहर निकलता है; मूत्र निस्यंद से लगभग चार गुना तक गाढ़ा हो सकता है।
परासरण नियमन यानी शरीर में जल और लवण की सही मात्रा बनाए रखना। वृक्क यह जल रोकने की मात्रा बदलकर करता है।
वृक्क कार्य का नियमन: ADH, RAAS और ANF
ADH (प्रतिमूत्रल हॉर्मोन, वैसोप्रेसिन)
हाइपोथैलेमस के ग्राही पहचानते हैं कि रक्त ज़्यादा गाढ़ा हुआ (पानी घटा)। पश्च पीयूष ADH छोड़ता है। ADH से DCT और संग्राहक नलिका ज़्यादा जल वापस लेती हैं, मूत्र कम बनता है। यह वाहिकाएँ भी थोड़ी संकरी कर BP बढ़ाता है। ज़्यादा पानी पीने पर ADH घटता है, मूत्र ज़्यादा।
रेनिन-एंजियोटेंसिन-एल्डोस्टेरोन तंत्र (RAAS)
- रक्त प्रवाह, BP या GFR घटे तो JG कोशिकाएँ रेनिन छोड़ती हैं।
- रेनिन यकृत के एंजियोटेंसिनोजन को एंजियोटेंसिन I, फिर एंजियोटेंसिन II बनाता है।
- एंजियोटेंसिन II वाहिकाएँ संकरी करता है (BP ↑) और एड्रीनल वल्कुट से एल्डोस्टेरोन छुड़वाता है।
- एल्डोस्टेरोन से DCT Na+ और जल वापस लेती है; BP और GFR बढ़ते हैं।
ANF (अलिंद नेट्रियूरेटिक कारक)
अलिंदों में रक्त ज़्यादा आए तो उनकी दीवारें ANF छोड़ती हैं। यह वाहिकाएँ चौड़ी कर BP घटाता है। इसलिए ANF, RAAS पर रोक है।
मूत्रण और दूसरे उत्सर्जी अंग
मूत्र मूत्राशय में जमा होता है। भरकर फैलने पर ग्राही CNS को संकेत भेजते हैं; मूत्राशय की पेशियाँ सिकुड़ती हैं, मूत्रमार्ग की संकोचिनी ढीली होती है और मूत्र निकलता है: मूत्रण (एक प्रतिवर्त)। वयस्क रोज़ 1–1.5 L मूत्र निकालता है, जिसमें लगभग 25–30 g यूरिया। सामान्य मूत्र हल्का पीला और थोड़ा अम्लीय (pH लगभग 6) है।
मदद करने वाले अंग
- फेफड़े: मिनट में लगभग 200 mL CO2 और कुछ जल।
- यकृत: बिलीरुबिन, बिलीवर्डिन, कोलेस्टेरॉल, पुराने स्टेरॉयड हॉर्मोन, विटामिन और दवाएँ पित्त में डालता है, जो मल से निकलता है।
- त्वचा: स्वेद ग्रंथियाँ जल, NaCl, थोड़ा यूरिया, लैक्टिक अम्ल (मुख्यतः ठंडक के लिए); तैल ग्रंथियाँ स्टेरॉल, मोम।
- लार भी थोड़ा नाइट्रोजन अपशिष्ट निकाल सकती है।
उत्सर्जन तंत्र के रोग
- यूरेमिया: वृक्क ठीक न चलें तो रक्त में यूरिया जमा होता है; बहुत हानिकारक, वृक्क पात तक ले जा सकता है।
- वृक्क पथरी (रीनल कैल्कुलाई): वृक्क में क्रिस्टलों (जैसे कैल्शियम ऑक्सलेट) के कठोर ढेले।
- ग्लोमेरुलोनेफ्राइटिस: केशिकागुच्छों में सूजन।
- ग्लाइकोसूरिया (मूत्र में ग्लूकोज) और कीटोनूरिया (मूत्र में कीटोन काय) मधुमेह के संकेत हैं।
रुधिर अपोहन (हीमोडायलिसिस)
धमनी से रक्त निकालकर उसमें हिपैरिन जैसा थक्कारोधी मिलाते हैं और अपोहन इकाई (कृत्रिम वृक्क) से पंप करते हैं। इसमें पतली सेलोफ़ेन नली ऐसे द्रव में है जो प्लाज़्मा जैसा है पर नाइट्रोजन अपशिष्ट रहित। विसरण से अपशिष्ट रक्त से बाहर जाता है। साफ़ रक्त में प्रति-हिपैरिन मिलाकर शिरा में लौटाते हैं।
वृक्क प्रत्यारोपण
वृक्क पात का अंतिम अच्छा इलाज। दाता, अच्छा हो तो नज़दीकी रिश्तेदार, का वृक्क लगाते हैं ताकि प्रतिरक्षा तंत्र उसे अस्वीकार न करे। रोगी प्रतिरक्षा दबाने वाली दवाएँ लेता है।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- GFR ≈ 125 mL/मिनट ≈ 180 L/दिन
- रोज़ मूत्र ≈ निस्यंद × (1 − वापस सोखा भाग)
- वृक्क रक्त प्रवाह ≈ हृद निकास का 1/5 ≈ 1100–1200 mL/मिनट
- मध्यांश ढलान: 300 → 1200 mOsm/L
- RAAS: रेनिन → एंजियोटेंसिनोजन → एंजियोटेंसिन I → एंजियोटेंसिन II → एल्डोस्टेरोन
हल किए गए उदाहरण
1. GFR 125 mL/मिनट है। एक दिन में कितना निस्यंद?
दिन में मिनट = 1440। निस्यंद = 125 × 1440 = 1,80,000 mL = 180 L।
2. 180 L निस्यंद में से 1.5 L मूत्र बनता है। कितना प्रतिशत वापस सोखा गया?
वापस = 178.5 L। प्रतिशत = 178.5 ÷ 180 × 100 ≈ 99.2%।
3. हृद निकास 5.5 L/मिनट है और वृक्कों को पाँचवाँ भाग मिलता है। वृक्क रक्त प्रवाह?
5.5 ÷ 5 = 1.1 L/मिनट = 1100 mL/मिनट।
4. रोग से GFR 60 mL/मिनट हो गई। रोज़ कितना निस्यंद?
60 × 1440 = 86,400 mL ≈ 86.4 L, सामान्य के आधे से कम।
5. वल्कुट में निस्यंद 300 mOsm/L और अंतिम मूत्र 1200 mOsm/L। मूत्र कितने गुना गाढ़ा?
1200 ÷ 300 = 4 गुना।
6. 1.5 L मूत्र में 25 g यूरिया है। प्रति लीटर कितना?
25 ÷ 1.5 ≈ 16.7 g प्रति लीटर।
7. गरम दिन में कोई बहुत कम पानी पीता है। गाढ़े मूत्र तक के चरण लिखें।
पानी घटा → रक्त गाढ़ा → हाइपोथैलेमस पहचानता है → पश्च पीयूष ज़्यादा ADH छोड़ता है → DCT व संग्राहक नलिका ज़्यादा जल वापस लेती हैं → कम, गाढ़ा मूत्र।
8. ज़्यादा ख़ून बहने से BP गिर गया। वृक्क BP कैसे बढ़ाता है?
कम BP → GFR घटी → JG कोशिकाएँ रेनिन छोड़ती हैं → एंजियोटेंसिन II → वाहिकाएँ संकरी और एल्डोस्टेरोन → Na⁺ व जल रुकते हैं → रक्त आयतन व BP बढ़ते हैं।
आम गलतियाँ
- कहना कि वृक्क सिर्फ़ अपशिष्ट छानता है। यह लगभग हर छोटी चीज़ (ग्लूकोज भी) छानता है, फिर काम की चीज़ें वापस लेता है।
- सोचना कि निस्यंद में प्लाज़्मा प्रोटीन होते हैं। प्रोटीन और रक्त कोशिकाएँ बड़े हैं, गुच्छ में ही रहते हैं।
- हेनले लूप की भुजाएँ उलटना: अवरोही भुजा जल निकालती है; आरोही भुजा लवण निकालती है, जल नहीं।
- कहना कि ADH से मूत्र ज़्यादा बनता है। ADH जल रोकता है, इसलिए मूत्र कम।