उत्सर्जन क्या है?
काम करते समय कोशिकाएँ हानिकारक उप-उत्पाद बनाती हैं। प्रोटीन टूटने से अमोनिया, यूरिया और यूरिक अम्ल जैसे नाइट्रोजनी अपशिष्ट बनते हैं। इन हानिकारक उपापचयी अपशिष्टों को शरीर से बाहर निकालने के जैव प्रक्रम को उत्सर्जन कहते हैं।
एककोशिकीय जीव अपशिष्ट को सतह से पानी में विसरित कर देते हैं। जटिल जंतुओं को ख़ास अंग चाहिए।
उत्सर्जन बनाम बहिःक्षेपण: बहिःक्षेपण अपच भोजन को गुदा से निकालना है, जो कोशिकाओं का बनाया अपशिष्ट नहीं है।
मानव उत्सर्जन तंत्र
- दो वृक्क (गुर्दे): सेम के आकार के, उदर में रीढ़ के दोनों ओर। ये रक्त छानते हैं।
- दो मूत्रवाहिनियाँ: वृक्क से मूत्राशय तक मूत्र ले जाने वाली नलियाँ।
- मूत्राशय: मूत्र जमा करने वाली पेशीय थैली। यह तंत्रिका नियंत्रण में है, इसलिए हम कुछ देर मूत्र रोक सकते हैं।
- मूत्रमार्ग: जिस नली से मूत्र शरीर से बाहर जाता है।
रक्त हर वृक्क में वृक्क धमनी से आता है और साफ़ रक्त वृक्क शिरा से बाहर जाता है।
वृक्काणु: संरचना और मूत्र निर्माण
हर वृक्क में लगभग दस लाख छोटी छन्नी इकाइयाँ होती हैं, जिन्हें वृक्काणु (नेफ्रॉन) कहते हैं। वृक्काणु में होते हैं:
- कोशिकागुच्छ (ग्लोमेरुलस): केशिकाओं का घना गुच्छा।
- बोमन संपुट: कोशिकागुच्छ के चारों ओर प्याले जैसा भाग जो छना द्रव इकट्ठा करता है।
- नलिका (बीच में लूप के साथ) जो संग्राहक वाहिनी तक जाती है।
तीन चरण
- निस्यंदन: रक्त दाब कोशिकागुच्छ से पानी, ग्लूकोज, अमीनो अम्ल, लवण और यूरिया को बोमन संपुट में धकेलता है। कोशिकाएँ और बड़े प्रोटीन पीछे रह जाते हैं।
- वरणात्मक पुनः अवशोषण: नलिका में आगे ग्लूकोज, अमीनो अम्ल, लवण और पानी का बड़ा भाग नलिका के आसपास के रक्त में वापस ले लिया जाता है। कितना पानी वापस लिया जाए, यह शरीर में अतिरिक्त पानी की मात्रा पर निर्भर है।
- मूत्र: बचा यूरिया, कुछ लवण और अतिरिक्त पानी संग्राहक वाहिनी → मूत्रवाहिनी → मूत्राशय तक जाता है।
वृक्क रोज़ लगभग 180 लीटर द्रव छानते हैं, पर केवल लगभग 1–2 लीटर मूत्र बनता है, क्योंकि ज़्यादातर वापस सोख लिया जाता है।
कृत्रिम वृक्क (अपोहन या डायलिसिस)
संक्रमण, चोट या रक्त प्रवाह कम होने से वृक्क ख़राब हो सकते हैं। वृक्क काम करना बंद करें तो ज़हरीले अपशिष्ट जमा होकर जान ले सकते हैं। कृत्रिम वृक्क नाइट्रोजनी अपशिष्ट को अपोहन (डायलिसिस) से हटाता है: रोगी का रक्त अर्धपारगम्य दीवार वाली लंबी नलियों से गुज़ारा जाता है, जो ऐसे द्रव में डूबी रहती हैं जिसका परासरण दाब रक्त जैसा हो पर नाइट्रोजनी अपशिष्ट न हों। अपशिष्ट रक्त से द्रव में चले जाते हैं और साफ़ रक्त रोगी को लौटा दिया जाता है।
असली वृक्क के विपरीत, अपोहन में कुछ भी वापस नहीं सोखा जाता। लंबे समय की वृक्क विफलता में मेल खाते दाता (अक्सर संबंधी) से वृक्क प्रत्यारोपण एक विकल्प है।
पौधों में उत्सर्जन
पौधों में उत्सर्जी अंग नहीं होते; वे अलग तरीके अपनाते हैं:
- गैसें: ऑक्सीजन (प्रकाश संश्लेषण से) और CO₂ (श्वसन से) रंध्रों से निकलती हैं।
- अतिरिक्त पानी: वाष्पोत्सर्जन से।
- गिरती पत्तियाँ: बहुत से अपशिष्ट पत्तियों में जमा होते हैं जो बाद में झड़ जाती हैं।
- कोशिका रिक्तिकाएँ: कुछ अपशिष्ट रिक्तिकाओं में जमा रहते हैं।
- छाल: पुराने जाइलम और छाल में जमा अपशिष्ट, जो उतर जाती है।
- रेज़िन और गोंद: ख़ासकर पुराने जाइलम में जमा।
- मिट्टी में: कुछ अपशिष्ट जड़ों के आसपास छोड़ दिए जाते हैं।
परीक्षा टिप: वृक्काणु का चित्र और मूत्र निर्माण (5 अंक), अपोहन, और पौधों में उत्सर्जन के तरीके अक्सर पूछे जाते हैं।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- उत्सर्जन: हानिकारक नाइट्रोजनी अपशिष्ट (यूरिया, यूरिक अम्ल, अमोनिया) हटाना
- वृक्क → मूत्रवाहिनी → मूत्राशय → मूत्रमार्ग
- वृक्काणु = कोशिकागुच्छ + बोमन संपुट + नलिका + संग्राहक वाहिनी
- मूत्र निर्माण: निस्यंदन → वरणात्मक पुनः अवशोषण → मूत्र
- अपोहन: अर्धपारगम्य झिल्ली से रक्त की सफ़ाई
- पौधों में उत्सर्जन: रंध्र, वाष्पोत्सर्जन, गिरती पत्तियाँ, छाल, रेज़िन, गोंद, रिक्तिकाएँ
हल किए गए उदाहरण
1. सामान्य मूत्र में ग्लूकोज क्यों नहीं होता?
ग्लूकोज कोशिकागुच्छ में छन तो जाता है, पर वरणात्मक पुनः अवशोषण में नलिका उसे पूरा रक्त में वापस ले लेती है। मूत्र में ग्लूकोज दिखे तो रक्त शर्करा इतनी ज़्यादा है कि नलिका सब वापस नहीं ले पाती, जैसे मधुमेह में।
2. गर्मियों में मूत्र कम क्यों बनता है?
गर्मी में शरीर पसीने से बहुत पानी खोता है। पानी बचाने के लिए वृक्काणु छने द्रव से ज़्यादा पानी वापस लेते हैं, इसलिए मूत्र कम और गाढ़ा बनता है।
3. असली वृक्क और अपोहन मशीन में क्या अंतर है?
दोनों छानकर नाइट्रोजनी अपशिष्ट हटाते हैं। असली वृक्क ग्लूकोज, लवण और पानी जैसे उपयोगी पदार्थ वापस भी लेता है; अपोहन मशीन कुछ वापस नहीं लेती।
4. सामान्य मूत्र में रक्त कोशिकाएँ क्यों नहीं मिलतीं?
वे इतनी बड़ी हैं कि कोशिकागुच्छ की दीवार से बोमन संपुट में नहीं जा पातीं, इसलिए रक्त में ही रहती हैं। मूत्र में रक्त दिखे तो वृक्क या मूत्र मार्ग में कोई नुकसान हो सकता है।
5. पौधों के अपशिष्ट निकालने के तीन तरीके बताइए।
रंध्रों से (गैसें), अपशिष्ट से भरी पत्तियाँ और छाल गिराकर, और पुराने जाइलम में रेज़िन व गोंद जमा करके। अतिरिक्त पानी वाष्पोत्सर्जन से निकलता है।
आम गलतियाँ
- मल त्याग को 'उत्सर्जन' कहना। वह बहिःक्षेपण है; उत्सर्जन यूरिया जैसे उपापचयी अपशिष्ट का होता है।
- यह लिखना कि मूत्र मूत्राशय में बनता है। मूत्र वृक्क के वृक्काणुओं में बनता है, मूत्राशय में केवल जमा होता है।
- यह कहना कि छना हुआ सारा पानी मूत्र बन जाता है। ज़्यादातर नलिका में वापस सोख लिया जाता है।
- मूत्रवाहिनी (वृक्क → मूत्राशय) और मूत्रमार्ग (मूत्राशय → बाहर) में गड़बड़ करना।