श्वसन क्या है?
श्वसन वह प्रक्रम है जिसमें कोशिकाओं के अंदर भोजन (मुख्यतः ग्लूकोज) टूटकर ऊर्जा देता है। यह साँस लेना नहीं है: साँस लेना (श्वास) केवल हवा का अंदर-बाहर आना-जाना है, श्वसन हर जीवित कोशिका के अंदर होता है।
यह ऊर्जा ATP (एडिनोसिन ट्राइफ़ॉस्फ़ेट) अणु में जमा होती है, जिसे कोशिका की ऊर्जा मुद्रा कहते हैं। ATP टूटकर ADP बनता है तो ऊर्जा निकलती है, जो पेशी सिकोड़ने, प्रोटीन बनाने या तंत्रिका संदेश भेजने में लगती है।
ग्लूकोज का विखंडन: वायवीय और अवायवीय श्वसन
पहला चरण (सबमें एक जैसा): कोशिकाद्रव्य में ग्लूकोज (6 कार्बन) → 2 पाइरुवेट (3-3 कार्बन) + थोड़ी ऊर्जा।
- वायवीय (ऑक्सीजन के साथ), माइटोकॉन्ड्रिया में: पाइरुवेट → कार्बन डाइऑक्साइड + जल + बहुत ऊर्जा। अधिकांश पौधे और जंतु।
- यीस्ट में अवायवीय (ऑक्सीजन नहीं): पाइरुवेट → एथेनॉल + कार्बन डाइऑक्साइड + थोड़ी ऊर्जा। इसे किण्वन कहते हैं।
- हमारी पेशियों में ऑक्सीजन की कमी: पाइरुवेट → लैक्टिक अम्ल + थोड़ी ऊर्जा। लैक्टिक अम्ल जमने से ऐंठन होती है।
| वायवीय | अवायवीय |
|---|---|
| ऑक्सीजन चाहिए | ऑक्सीजन नहीं |
| कोशिकाद्रव्य + माइटोकॉन्ड्रिया | केवल कोशिकाद्रव्य |
| पूरा विखंडन → CO₂ + H₂O | अधूरा → एथेनॉल + CO₂ या लैक्टिक अम्ल |
| बहुत ऊर्जा (≈ 38 ATP प्रति ग्लूकोज) | कम ऊर्जा (2 ATP) |
मानव श्वसन तंत्र
- नासाद्वार और नासा मार्ग: महीन बाल और श्लेष्मा धूल और कीटाणु रोकते हैं।
- ग्रसनी और कंठ (स्वर यंत्र)।
- श्वासनली (trachea): उपास्थि के वलय इसे दबने नहीं देते जब अंदर हवा कम हो।
- श्वसनी → श्वसनिकाएँ → कूपिकाएँ: नलियाँ छोटी-छोटी शाखाओं में बँटकर गुब्बारे जैसी थैलियों पर ख़त्म होती हैं।
- डायाफ्राम और पसलियों की पेशियाँ: साँस लेते समय पसलियाँ ऊपर उठती हैं और डायाफ्राम चपटा होता है, वक्ष गुहा बड़ी होती है और हवा अंदर आती है; साँस छोड़ते समय ये ढीली होकर हवा बाहर धकेलती हैं।
फेफड़ों में हमेशा कुछ हवा बची रहती है (अवशिष्ट आयतन), ताकि ऑक्सीजन और CO₂ के आदान-प्रदान के लिए समय मिले।
कूपिकाएँ और गैसों का परिवहन
कूपिकाओं की दीवार एक कोशिका जितनी पतली होती है और केशिकाओं से ढकी रहती है। एक वयस्क की सारी कूपिकाएँ फैला दें तो लगभग 80 m² सतह बनेगी, करीब एक बैडमिंटन कोर्ट जितनी। इतनी बड़ी सतह से गैसों का आदान-प्रदान तेज़ होता है।
लाल रक्त कणिकाओं का लाल वर्णक हीमोग्लोबिन ऑक्सीजन से बहुत जुड़ता है और उसे ऊतकों तक ले जाता है। कार्बन डाइऑक्साइड पानी में घुलनशील है, इसलिए ज़्यादातर रक्त प्लाज़्मा में घुलकर जाती है।
ज़मीनी जंतु मछली से धीमी साँस क्यों लेते हैं? पानी में घुली ऑक्सीजन हवा की तुलना में बहुत कम होती है, इसलिए मछली को गलफड़ों पर तेज़ी से पानी गुज़ारना पड़ता है।
पौधों में श्वसन और परीक्षा
पौधे पत्तियों के रंध्रों और तनों व जड़ों के वातरंध्रों (lenticels) से विसरण द्वारा गैसें बदलते हैं। रात में केवल श्वसन होता है, इसलिए CO₂ निकलती है। दिन में प्रकाश संश्लेषण तेज़ होने से कुल मिलाकर ऑक्सीजन निकलती है।
परीक्षा टिप: ग्लूकोज विखंडन का प्रवाह चार्ट (तीन रास्ते), वायवीय बनाम अवायवीय सारणी, कूपिका और उपास्थि वलयों का कार्य, और 'जलीय जंतु तेज़ साँस क्यों लेते हैं' लगभग हर साल पूछे जाते हैं।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- ग्लूकोज → (कोशिकाद्रव्य) → पाइरुवेट + थोड़ी ऊर्जा
- पाइरुवेट + O₂ → (माइटोकॉन्ड्रिया) → CO₂ + H₂O + बहुत ऊर्जा
- पाइरुवेट → (यीस्ट, O₂ नहीं) → एथेनॉल + CO₂ + ऊर्जा
- पाइरुवेट → (पेशी, O₂ कम) → लैक्टिक अम्ल + ऊर्जा
- ATP: कोशिका की ऊर्जा मुद्रा (ATP → ADP + ऊर्जा)
- हवा का रास्ता: नासाद्वार → ग्रसनी → कंठ → श्वासनली → श्वसनी → श्वसनिकाएँ → कूपिकाएँ
हल किए गए उदाहरण
1. रात भर रखने पर इडली का घोल क्यों फूल जाता है?
घोल में यीस्ट और जीवाणु अवायवीय श्वसन करते हैं। यीस्ट शर्करा को एथेनॉल और कार्बन डाइऑक्साइड में बदलता है; CO₂ के बुलबुले घोल को फुलाकर नरम बनाते हैं।
2. साँस लेते समय श्वासनली पिचक क्यों नहीं जाती?
इसकी दीवार में C आकार के उपास्थि वलय होते हैं जो अंदर हवा का दाब घटने पर भी इसे खुला रखते हैं।
3. तेज़ दौड़ के बाद धावक के पैरों में ऐंठन क्यों होती है?
तेज़ दौड़ में पैरों की पेशियों तक ऑक्सीजन पूरी नहीं पहुँचती। पेशी कोशिकाएँ अवायवीय श्वसन करने लगती हैं और पाइरुवेट लैक्टिक अम्ल बन जाता है। लैक्टिक अम्ल जमने से ऐंठन होती है; आराम करने पर ऑक्सीजन लौटती है और यह ठीक हो जाती है।
4. गैसों के आदान-प्रदान की सतह बढ़ाने के लिए फेफड़े कैसे बने हैं?
हवा की नलियाँ बार-बार शाखाओं में बँटकर लाखों कूपिकाओं पर ख़त्म होती हैं। इनकी कुल सतह लगभग 80 m² है; दीवारें बहुत पतली हैं और केशिकाओं से ढकी हैं, इसलिए गैसें जल्दी विसरित होती हैं।
5. जलीय जंतु ज़मीनी जंतुओं से बहुत तेज़ साँस क्यों लेते हैं?
पानी में घुली ऑक्सीजन हवा की ऑक्सीजन से बहुत कम होती है। पर्याप्त ऑक्सीजन पाने के लिए मछली को गलफड़ों पर तेज़ी से पानी गुज़ारना पड़ता है।
आम गलतियाँ
- साँस लेने (श्वास) और श्वसन को एक मानना। श्वास हवा का आना-जाना है; श्वसन कोशिका में भोजन का रासायनिक विखंडन है।
- यह कहना कि अवायवीय श्वसन माइटोकॉन्ड्रिया में होता है। यह केवल कोशिकाद्रव्य में होता है।
- यह लिखना कि CO₂ मुख्यतः हीमोग्लोबिन ले जाता है। यह ज़्यादातर प्लाज़्मा में घुलकर जाती है।
- यह सोचना कि पौधे श्वसन के लिए CO₂ लेते हैं। श्वसन में पौधे भी O₂ लेते और CO₂ छोड़ते हैं।