Poland Liceum ogólnokształcące, klasa II Biology
अध्याय: 1
1. V. Human structure and physiology
Body organisation and homeostasis · Nutrition and digestion · Liver, diet and digestive health · Immunity · Breathing · Circulation · Excretion and osmoregulation · Hormonal regulation · Nervous regulation · Senses, sleep and brain health · Movement · Skin and thermoregulation · Reproduction and development
- समस्थापन (Homeostasis) – समस्थापन वह तरीका है जिससे शरीर अपना आंतरिक वातावरण (रक्त और ऊतक द्रव) स्थिर रखता है, चाहे बाहर का मौसम बदले। यह शरीर का ताप (लगभग 37 °C), रक्त ग्लूकोज़ (लगभग 4–6 mmol/L), पानी-लवण और रक्त pH (लगभग 7.4) नियंत्रित करता है। ज़्यादातर यह ऋणात्मक पुनर्भरण से होता है: ग्राही बदलाव पहचानता है, नियंत्रण केंद्र तय करता है, और प्रभावक स्तर को निर्धारित बिंदु पर लौटाता है।
- मानव पाचन तंत्र और विषमपोषी पोषण – विषमपोषी जीव दूसरे जीवों से बना-बनाया भोजन लेते हैं। मनुष्य प्राणिसम (holozoic) पोषण करता है: पूरा भोजन खाकर एक लंबी नली, आहार नाल, में उसे तोड़ता है। दाँत, लार, आमाशय का अम्ल, एंज़ाइम, पित्त और अग्न्याशयी रस बड़े अणुओं को छोटा करते हैं, जिन्हें क्षुद्रांत्र के दीर्घरोम रक्त में सोख लेते हैं।
- पोषण (Nutrition) – पोषण वह तरीक़ा है जिससे हम भोजन के पदार्थ पाते और इस्तेमाल करते हैं। शरीर को छह तरह के पोषक तत्व चाहिए: कार्बोहाइड्रेट और वसा (मुख्य रूप से ऊर्जा), प्रोटीन (वृद्धि और मरम्मत), विटामिन और खनिज (थोड़ी मात्रा, शरीर को सही चलाने के लिए), और पानी; साथ में पाचन के लिए रेशा। कार्बोहाइड्रेट और प्रोटीन लगभग 17 kJ प्रति ग्राम, वसा लगभग 37 kJ प्रति ग्राम देते हैं। संतुलित आहार सब पोषक तत्व सही मात्रा में देता है, और अंदर आई ऊर्जा लगभग ख़र्च ऊर्जा के बराबर होनी चाहिए।
- प्रतिरक्षा तंत्र: शरीर रोगाणुओं से कैसे लड़ता है – रोगाणु (रोगजनक) संक्रामक रोग करते हैं। शरीर में रक्षा की तीन पंक्तियाँ हैं: अवरोध (त्वचा, श्लेष्मा, अम्ल), तेज़ सामान्य (सहज) प्रतिरक्षा (सूजन, बुखार, भक्षक कोशिकाएँ) और धीमी पर विशिष्ट (उपार्जित) प्रतिरक्षा (B कोशिकाएँ एंटीबॉडी बनाती हैं, T कोशिकाएँ संक्रमित कोशिकाएँ मारती हैं)। स्मृति कोशिकाएँ दूसरे हमले को जल्दी रोकती हैं। टीका सुरक्षित रूप से स्मृति बनाता है। गड़बड़ी: एलर्जी, स्व-प्रतिरक्षी रोग, प्रतिरक्षा की कमी (जैसे HIV)।
- श्वसन: वायवीय, अवायवीय और मानव फेफड़े – श्वसन वह प्रक्रम है जिसमें कोशिका के अंदर भोजन (ज़्यादातर ग्लूकोज) टूटकर ऊर्जा देता है, जो ATP में जमा होती है। ऑक्सीजन के साथ (वायवीय) ग्लूकोज पूरा टूटकर CO₂ और जल बनता है और बहुत ऊर्जा मिलती है; ऑक्सीजन के बिना (अवायवीय) थोड़ी ऊर्जा मिलती है और एथेनॉल (यीस्ट) या लैक्टिक अम्ल (पेशी) बनता है। फेफड़ों की लाखों कूपिकाएँ रक्त तक ऑक्सीजन पहुँचाती हैं।
- मनुष्य में परिवहन: हृदय, रुधिर वाहिकाएँ, रुधिर और लसीका – हृदय चार कक्षों वाला मांसपेशी पंप है। एक पूरे चक्कर में रुधिर हृदय से दो बार गुज़रता है: एक बार फेफड़ों से ऑक्सीजन लेने, और एक बार पूरे शरीर तक। यही दोहरा परिसंचरण है। धमनियाँ रुधिर को हृदय से दूर ले जाती हैं, शिराएँ वापस लाती हैं और केशिकाएँ आदान-प्रदान करती हैं। रुधिर (प्लाज़्मा, लाल व श्वेत कणिकाएँ, प्लेटलेट्स) और लसीका मिलकर भोजन, गैसें, हॉर्मोन और अपशिष्ट ढोते हैं।
- उत्सर्जी उत्पाद एवं उनका निष्कासन – जीवों को नाइट्रोजन अपशिष्ट निकालना होता है। अमोनिया सबसे विषैली है और बहुत पानी माँगती है; यूरिया कम विषैला; यूरिक अम्ल को सबसे कम पानी चाहिए। मनुष्य यूरियोत्सर्जी हैं। हर वृक्क में लगभग 10 लाख वृक्काणु हैं। मूत्र तीन चरणों में बनता है: गुच्छीय निस्यंदन (लगभग 125 mL/मिनट, 180 L/दिन), पुनरवशोषण (लगभग 99% वापस) और स्रावण। हेनले लूप और वासा रेक्टा प्रतिधारा से मध्यांश को नमकीन बनाते हैं, जिससे गाढ़ा मूत्र बनता है। ADH, रेनिन-एंजियोटेंसिन-एल्डोस्टेरोन तंत्र और ANF जल व लवण नियंत्रित करते हैं। फेफड़े, यकृत, त्वचा भी मदद करते हैं। वृक्क फेल हों तो डायलिसिस या प्रत्यारोपण।
- रासायनिक समन्वय तथा एकीकरण – हॉर्मोन रासायनिक संदेशवाहक हैं जो नलिकाविहीन (अंतःस्रावी) ग्रंथियाँ बहुत कम मात्रा में बनाती हैं। ये रक्त में चलकर सही ग्राही वाली लक्ष्य कोशिकाओं पर काम करते हैं। हाइपोथैलेमस पीयूष को, और पीयूष कई ग्रंथियों को नियंत्रित करता है; ऋणात्मक पुनर्निवेशन स्तर स्थिर रखता है। मुख्य ग्रंथियाँ: पीनियल, पीयूष, थायरॉयड, पैराथायरॉयड, थाइमस, एड्रीनल, अग्न्याशय (द्वीप), वृषण, अंडाशय। हृदय, वृक्क, आहारनाल भी हॉर्मोन बनाते हैं। प्रोटीन हॉर्मोन झिल्ली ग्राही और cAMP जैसे द्वितीयक संदेशवाहक से; स्टेरॉयड व थायरॉयड हॉर्मोन कोशिका में जाकर जीन बदलते हैं। बहुत कम (अल्पस्राव) या बहुत ज़्यादा (अतिस्राव) हॉर्मोन से बौनापन, महाकायता, गलगंड, मधुमेह, एडिसन, कुशिंग जैसे रोग होते हैं।
- तंत्रिकीय नियंत्रण एवं समन्वय – समन्वय यानी अंगों का मिलकर काम करना। तंत्रिका तंत्र यह तेज़ी से तंत्रिका कोशिकाओं से करता है। तंत्रिका कोशिका में कोशिका काय, द्रुमिकाएँ और तंत्रिकाक्ष हैं; कई तंत्रिकाक्षों पर रैनवियर पर्व वाला माइलिन आच्छद है। केंद्रीय तंत्रिका तंत्र (मस्तिष्क, मेरुरज्जु) सूचना संसाधित करता है; परिधीय तंत्र (तंत्रिकाएँ) उसे ढोता है। PNS के दो भाग: कायिक (कंकाली पेशियाँ) और स्वायत्त (अनुकंपी, परानुकंपी), जो अंदर के अंगों यानी अंतरंग तंत्र को चलाता है। आराम में तंत्रिकाक्ष ध्रुवित है: अंदर −, बाहर +, लगभग −70 mV। उद्दीपन से Na+ अंदर आकर क्रिया विभव बनाता है जो आगे दौड़ता है। सिनैप्स पर तंत्रिका संचारी संकेत अगली कोशिका तक पहुँचाते हैं।
- ज्ञानेंद्रियाँ – ज्ञानेंद्रियाँ हमें आसपास के बदलाव (उद्दीपन) पहचानने देती हैं। आँख प्रकाश, कान ध्वनि और संतुलन, नाक गंध, जीभ स्वाद और त्वचा स्पर्श, दबाव, गरमी, ठंडक व दर्द पहचानती है। हर इंद्रिय में ग्राही कोशिकाएँ उद्दीपन को तंत्रिका संकेत में बदलती हैं। संकेत संवेदी तंत्रिका से मस्तिष्क या मेरुरज्जु तक जाता है, जो मांसपेशी को आदेश भेजता है: यही अनुक्रिया है।
- गमन एवं संचलन – संचलन यानी शरीर के किसी भाग की स्थिति बदलना; गमन यानी पूरे शरीर का एक जगह से दूसरी जगह जाना। कोशिकाएँ तीन तरह चलती हैं: अमीबीय, पक्ष्माभी और कशाभिकीय। मनुष्य पेशीय गति करता है। पेशियाँ कंकाली, अंतरंग या हृद होती हैं। कंकाली पेशी तंतुओं से बनी है; हर तंतु में पेशी तंतुक हैं जो एक्टिन-मायोसिन वाले सार्कोमियरों की श्रृंखला हैं। तंत्रिका संकेत से Ca2+ छूटता है, मायोसिन सिर ATP से एक्टिन खींचते हैं और सार्कोमियर छोटा होता है (सर्पी तंतु सिद्धांत)। कंकाल में 206 हड्डियाँ हैं। संधियाँ रेशेदार, उपास्थिल या साइनोवियल (कंदुक-खल्लिका, कब्ज़ा, धुराग्र, विसर्पी, सैडल) होती हैं। रोग: मायस्थेनिया ग्रेविस, अपतानिका, पेशीय दुष्पोषण, संधिशोथ, अस्थि सुषिरता, गाउट।
- मानव त्वचा: परतें, काम और धूप से सुरक्षा – त्वचा शरीर का सबसे बड़ा अंग है। इसकी तीन परतें हैं: बाह्यत्वचा (बाहरी, जलरोधी, मेलानिन वाली), अंतःत्वचा (रक्त नलिकाएँ, तंत्रिकाएँ, ग्रंथियाँ, बालों की जड़ें) और नीचे चर्बी की परत। यह रक्षा करती है, छूना और दर्द महसूस कराती है, पसीने और रक्त प्रवाह से शरीर का तापमान सँभालती है और धूप में विटामिन D बनाती है। बहुत ज़्यादा UV त्वचा की कोशिकाओं को नुकसान पहुँचाता है, बुढ़ापा जल्दी लाता है और मेलेनोमा जैसा त्वचा कैंसर कर सकता है।
- मानव जनन – मनुष्य लैंगिक जनन करते हैं और जरायुज हैं (बच्चा माँ के शरीर के अंदर बढ़ता है)। वृषण की शुक्रजनक नलिकाओं में शुक्राणु बनते हैं, अंडाशय के पुटकों में अंडाणु। युग्मकजनन में अर्धसूत्री विभाजन होता है: 1 शुक्राणुजन से 4 शुक्राणु, पर 1 अंडजन से केवल 1 अंडाणु और ध्रुवीय पिंड। लगभग 28 दिन का आर्तव चक्र FSH, LH, एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरॉन से चलता है; दिन 14 के आसपास LH की अचानक बढ़त से अंडोत्सर्ग होता है। तुंबिका में निषेचन से युग्मनज बनता है, जो मोरुला और फिर ब्लास्टोसिस्ट बनकर गर्भाशय में धँस जाता है। अपरा भ्रूण को पोषण देता है; लगभग 9 महीने बाद प्रसव और फिर स्तनपान।