National Year 10 Combined Science: Trilogy
अध्याय: 13
1. 4.1 Cell biology
4.1.1 Cell structure · 4.1.2 Cell division · 4.1.3 Transport in cells
- कोशिका: जीवन की मूल इकाई – हर सजीव कोशिकाओं से बना है। 1665 में रॉबर्ट हुक ने कॉर्क में सबसे पहले कोशिकाएँ देखीं। कोशिकाएँ प्रोकैरियोटी (असली केंद्रक नहीं, जैसे जीवाणु) या यूकैरियोटी (असली केंद्रक) होती हैं। पादप कोशिका में कोशिका भित्ति, हरितलवक और बड़ी रिक्तिका होती है, जंतु कोशिका में नहीं। हर कोशिकांग का एक काम है। पानी परासरण से कोशिका में आता-जाता है। नई कोशिकाएँ समसूत्री (वृद्धि) और अर्धसूत्री (जनन कोशिकाएँ) विभाजन से बनती हैं।
- कोशिका चक्र और कोशिका विभाजन – कोशिका एक तय क्रम में बढ़ती है, DNA दोहराती है और बँटती है – इसे कोशिका चक्र कहते हैं: अंतरावस्था (G1, S, G2) और M प्रावस्था। S प्रावस्था में DNA दोगुना (2C → 4C) होता है, पर गुणसूत्र संख्या वही रहती है। समसूत्री विभाजन (पूर्वावस्था, मध्यावस्था, पश्चावस्था, अंत्यावस्था) और कोशिकाद्रव्य विभाजन से जनक जैसी दो कोशिकाएँ बनती हैं – यह समीकरणीय विभाजन वृद्धि और मरम्मत के लिए है। अर्धसूत्री विभाजन में दो विभाजन होते हैं; अर्धसूत्री I में समजात गुणसूत्र जोड़ा बनाते हैं, जीन विनिमय करते हैं और अलग होते हैं, जिससे गुणसूत्र संख्या आधी (2n → n) होती है। इससे युग्मकों के लिए चार अगुणित कोशिकाएँ बनती हैं और विविधता आती है।
- झिल्ली परिवहन: कोशिका में चीज़ें अंदर-बाहर कैसे जाती हैं – कोशिका झिल्ली वसा जैसे अणुओं की पतली दोहरी परत है जिसमें प्रोटीन लगे होते हैं. यह कुछ पदार्थों को जाने देती है और कुछ को रोकती है (चयनात्मक पारगम्य). विसरण में कण ज़्यादा सांद्रता से कम सांद्रता की ओर बिना ऊर्जा जाते हैं. सुसाध्य विसरण यही काम प्रोटीन चैनल से करता है. परासरण आंशिक पारगम्य झिल्ली से पानी का विसरण है. सक्रिय परिवहन ATP और प्रोटीन पंप से कणों को कम से ज़्यादा सांद्रता की ओर ले जाता है. बहुत बड़ी चीज़ें बुलबुलों में आती-जाती हैं (एंडोसाइटोसिस, एक्सोसाइटोसिस).
2. 4.2 Organisation
4.2.1 Principles of organisation · 4.2.2 Animal tissues, organs and organ systems · 4.2.3 Plant tissues, organs and systems
- ऊतक: पादप और जंतु ऊतक – ऊतक एक जैसी कोशिकाओं का समूह है जो मिलकर एक काम करता है। कोशिकाएँ ऊतक बनाती हैं, ऊतक अंग, अंग अंग तंत्र और तंत्र मिलकर जीव। पौधों में बँटने वाला विभज्योतक और न बँटने वाला स्थायी ऊतक होता है, जिसमें जाइलम (पानी ऊपर) और फ्लोएम (भोजन दोनों ओर) शामिल हैं। जंतुओं में उपकला, संयोजी, पेशी और तंत्रिका ऊतक होते हैं। हड्डियों, पेशियों और जोड़ों को सही मुद्रा, व्यायाम और कैल्शियम वाला भोजन चाहिए।
- मानव शरीर के अंग तंत्र – हमारा शरीर स्तरों में बना है: कोशिकाएँ मिलकर ऊतक, ऊतक मिलकर अंग, अंग मिलकर अंग तंत्र और सारे तंत्र मिलकर पूरा जीव यानी हम। हर तंत्र का एक मुख्य काम है: कंकाल (ढाँचा), पेशी (गति), परिसंचरण (ढुलाई), श्वसन (गैसों का लेन-देन), पाचन (भोजन), उत्सर्जन (कचरा), तंत्रिका और अंतःस्रावी (नियंत्रण), प्रतिरक्षा (बचाव), त्वचा तंत्र और जनन तंत्र। कोई तंत्र अकेले काम नहीं करता: व्यायाम में पेशियाँ, दिल, फेफड़े और नसें साथ बदलकर शरीर के अंदर का हाल स्थिर रखते हैं (समस्थिति)।
3. 4.3 Infection and response
4.3.1 Communicable diseases
- संक्रामक रोग: रोगाणु कैसे फैलते हैं और हम उन्हें कैसे रोकें – संक्रामक (संचारी) रोग एक बहुत छोटे जीव से होता है, जिसे रोगाणु (pathogen) कहते हैं: बैक्टीरिया, वायरस, कवक या प्रोटिस्ट। यह हवा, पानी-खाना, छूने या मच्छर जैसे वाहक से एक व्यक्ति से दूसरे में जाता है। शरीर त्वचा, बलगम, पेट के अम्ल और श्वेत रक्त कोशिकाओं से लड़ता है। टीका प्रतिरक्षा तंत्र को पहले से तैयार कर देता है। हाथ धोना, साफ पानी, अच्छी तरह पका खाना, मच्छरदानी और बीमार होने पर घर रहना फैलाव कम करते हैं।
4. 4.4 Bioenergetics
4.4.1 Photosynthesis · 4.4.2 Respiration
- जैव प्रक्रम और प्रकाश संश्लेषण – जैव प्रक्रम वे काम हैं जो ज़िंदा रहने के लिए शरीर को लगातार करने पड़ते हैं: पोषण, श्वसन, परिवहन और उत्सर्जन। हरे पौधे प्रकाश संश्लेषण से पोषण करते हैं: सूर्य के प्रकाश और क्लोरोफिल की मदद से वे कार्बन डाइऑक्साइड और जल से ग्लूकोज बनाते हैं और ऑक्सीजन छोड़ते हैं।
- श्वसन: वायवीय, अवायवीय और मानव फेफड़े – श्वसन वह प्रक्रम है जिसमें कोशिका के अंदर भोजन (ज़्यादातर ग्लूकोज) टूटकर ऊर्जा देता है, जो ATP में जमा होती है। ऑक्सीजन के साथ (वायवीय) ग्लूकोज पूरा टूटकर CO₂ और जल बनता है और बहुत ऊर्जा मिलती है; ऑक्सीजन के बिना (अवायवीय) थोड़ी ऊर्जा मिलती है और एथेनॉल (यीस्ट) या लैक्टिक अम्ल (पेशी) बनता है। फेफड़ों की लाखों कूपिकाएँ रक्त तक ऑक्सीजन पहुँचाती हैं।
5. 5.1 Atomic structure and the periodic table
5.1.1 A simple model of the atom, symbols, relative atomic mass, electronic charge and isotopes · 5.1.2 The periodic table
- परमाणु की संरचना – परमाणु के बीच में एक बहुत छोटा, भारी और धनावेशित नाभिक होता है, जिसमें प्रोटॉन और न्यूट्रॉन रहते हैं। इलेक्ट्रॉन इसके चारों ओर तय कोशों K, L, M, N में घूमते हैं। प्रोटॉन की संख्या (Z) से तत्व तय होता है; प्रोटॉन + न्यूट्रॉन = द्रव्यमान संख्या (A)। बाहरी इलेक्ट्रॉन संयोजकता तय करते हैं।
- आवर्त सारणी: वर्ग, आवर्त और प्रवृत्तियाँ – आवर्त सारणी में तत्व परमाणु क्रमांक (प्रोटॉन की संख्या) के क्रम में रखे जाते हैं। पंक्तियाँ आवर्त हैं; स्तंभ वर्ग (समूह) हैं। एक वर्ग के तत्वों में बाहरी कोश के इलेक्ट्रॉन बराबर होते हैं, इसलिए वे मिलती-जुलती अभिक्रिया करते हैं। मेंडलीफ़ ने शुरुआती सारणी बनाई, अज्ञात तत्वों के लिए खाली जगह छोड़ी और उनके गुण बताए। धातुएँ बाईं ओर और नीचे, अधातुएँ दाईं ओर और ऊपर। वर्ग 0 की उत्कृष्ट गैसों का बाहरी कोश भरा होता है, इसलिए वे अक्रियाशील हैं। वर्ग 1 की क्षार धातुएँ नीचे जाने पर ज़्यादा क्रियाशील होती हैं। वर्ग 7 (कई देशों में वर्ग 17) के हैलोजन नीचे जाने पर कम क्रियाशील होते हैं।
6. 5.2 Bonding, structure, and the properties of matter
5.2.1 Chemical bonds, ionic, covalent and metallic · 5.2.2 How bonding and structure are related to the properties of substances · 5.2.3 Structure and bonding of carbon
- रासायनिक आबंधन: आयनिक, सहसंयोजक और धात्विक बंध – परमाणु आपस में जुड़कर (बंध बनाकर) ज़्यादा स्थिर होते हैं। इसमें सिर्फ़ बाहरी इलेक्ट्रॉन काम आते हैं। ज़्यादातर परमाणु बाहरी कोश में 8 इलेक्ट्रॉन होने पर सबसे स्थिर होते हैं: यही अष्टक नियम है। इसके तीन मुख्य रास्ते हैं। आयनिक बंध में धातु अधातु को इलेक्ट्रॉन दे देती है; विपरीत आवेश वाले आयन बनते हैं और एक-दूसरे को खींचते हैं। सहसंयोजक बंध में दो अधातुएँ इलेक्ट्रॉन जोड़े बाँटती हैं और अणु बनते हैं। धात्विक बंध में धातु परमाणु अपने बाहरी इलेक्ट्रॉन एक साझा 'सागर' में छोड़ देते हैं जो धनायनों को जोड़े रखता है। विद्युत-ऋणात्मकता का अंतर बताता है कि कौन-सा बंध बनेगा। बंध का प्रकार ही गलनांक, बिजली चलाने और पानी में घुलने जैसे गुण तय करता है।
- संरचना से पदार्थ के गुण कैसे तय होते हैं – कण आपस में कैसे जुड़े हैं, यही तय करता है कि पदार्थ कैसा व्यवहार करेगा। आयनिक और विशाल सहसंयोजी पदार्थों में पूरे ढाँचे में मज़बूत बंध होते हैं, इसलिए वे बहुत ऊँचे ताप पर पिघलते हैं। छोटे अणुओं के बीच बल कमज़ोर होता है, इसलिए वे जल्दी पिघलते और उबलते हैं। धातुओं में मुक्त इलेक्ट्रॉन होते हैं, इसलिए वे बिजली चलाती हैं।
- कार्बन के अपररूप: हीरा, ग्रेफ़ाइट, ग्रेफ़ीन और फ़ुलरीन – अपररूप (allotropes) एक ही तत्व के अलग-अलग रूप हैं, एक ही अवस्था में। कार्बन के कई अपररूप हैं। हीरे में हर परमाणु 4 मज़बूत सहसंयोजक बंध बनाता है, एक विशाल 3D जाल में; इसलिए यह बहुत कठोर है, गलनांक बहुत ऊँचा है और बिजली नहीं चलाता। ग्रेफ़ाइट में हर परमाणु 3 से जुड़ता है, षट्भुजों की चपटी परतों में; परतें फिसलती हैं (नरम) और हर परमाणु का एक बचा इलेक्ट्रॉन घूम सकता है, इसलिए यह बिजली चलाता है। ग्रेफ़ीन ग्रेफ़ाइट की एक परत है। फ़ुलरीन जैसे C₆₀ खोखली गेंदें हैं; नैनोट्यूब लिपटी नलियाँ हैं। सभी ऑक्सीजन में जलकर कार्बन डाइऑक्साइड बनाते हैं।
7. 5.3 Quantitative chemistry
5.3.1 Chemical measurements, conservation of mass and quantitative interpretation of equations · 5.3.2 Use of amount of substance in relation to masses of pure substances
- परमाणु और अणु – रासायनिक अभिक्रिया में द्रव्यमान न बनता है, न नष्ट होता है (द्रव्यमान संरक्षण), और यौगिक में तत्व हमेशा द्रव्यमान के एक ही अनुपात में होते हैं (स्थिर अनुपात)। डाल्टन ने दोनों को समझाया: पदार्थ छोटे-छोटे परमाणुओं से बना है जो पूरी संख्याओं में जुड़ते हैं। परमाणु जुड़कर अणु बनाते हैं; आवेश वाले परमाणु या समूह आयन हैं। सूत्र संयोजकता को क्रॉस करके लिखते हैं। आण्विक द्रव्यमान (आयनिक यौगिक के लिए सूत्र इकाई द्रव्यमान) सूत्र के सभी परमाणु द्रव्यमानों का योग है, u में।
- मोल: तौलकर कणों की गिनती – मोल कणों की एक तय संख्या है: 6.02 × 10²³ (आवोगाद्रो स्थिरांक)। किसी पदार्थ के एक मोल का द्रव्यमान ग्राम में उसके सापेक्ष सूत्र द्रव्यमान (Mr) के बराबर होता है। इसलिए मोल = द्रव्यमान ÷ Mr। संतुलित समीकरण बताता है कि मोल किस अनुपात में अभिक्रिया करते हैं, और जो अभिकारक पहले ख़त्म हो, वह सीमांत अभिकर्मक है।
8. 5.4 Chemical changes
5.4.1 Reactivity of metals · 5.4.2 Reactions of acids · 5.4.3 Electrolysis
- संक्षारण, उसका बचाव और मिश्रातु – संक्षारण धातु का हवा, नमी या रसायनों से धीरे-धीरे खराब होना है। लोहे पर जंग तभी लगती है जब हवा (ऑक्सीजन) और पानी दोनों हों; जंग जलयुक्त आयरन ऑक्साइड है। इसे पेंट, तेल, यशदलेपन, क्रोमियम लेपन, ऐनोडीकरण या मिश्रातु बनाकर रोका जाता है। मिश्रातु किसी धातु का दूसरी धातुओं या अधातु के साथ समांगी मिश्रण है; यह शुद्ध धातु से प्रायः अधिक कठोर, मज़बूत और संक्षारण-रोधी होता है।
- धातुओं की प्राप्ति और निष्कर्षण – धातुएँ ज़्यादातर भू-पर्पटी में यौगिकों (खनिजों) के रूप में मिलती हैं; जिस खनिज से धातु लाभ के साथ निकाली जा सके वह अयस्क है। निष्कर्षण के तीन चरण: सांद्रण (गैंग हटाना), कच्ची धातु पाना (भर्जन या निस्तापन, फिर अपचयन या विद्युत अपघटन, जो सक्रियता श्रेणी से तय होता है), और परिष्करण (आम तौर पर विद्युत अपघटनी)।
- आयनिक यौगिक: धातु और अधातु कैसे अभिक्रिया करते हैं – धातु का परमाणु अपने बाहरी इलेक्ट्रॉन अधातु के परमाणु को दे देता है ताकि दोनों का बाहरी कोश पूरा (अष्टक) हो जाए। धातु धनायन बनती है, अधातु ऋणायन, और दोनों के बीच का प्रबल आकर्षण आयनिक (वैद्युत संयोजी) बंध है। आयनिक यौगिक कठोर क्रिस्टलीय ठोस होते हैं, उच्च गलनांक वाले, पानी में घुलनशील, और केवल पिघली या घुली अवस्था में विद्युत चालक।
- धातु और अधातु: गुण और सक्रियता श्रेणी – धातुएँ आम तौर पर चमकदार, कठोर, आघातवर्ध्य, तन्य और ऊष्मा-विद्युत की सुचालक होती हैं; अधातुएँ मंद, भंगुर और कुचालक। धातुएँ क्षारकीय ऑक्साइड बनाती हैं, जल और तनु अम्ल से हाइड्रोजन देती हैं, और अधिक सक्रिय धातु कम सक्रिय धातु को उसके लवण के विलयन से बाहर निकाल देती है। सक्रियता के क्रम में लिखी सूची सक्रियता श्रेणी कहलाती है।
- अम्ल और क्षारक: गुण, सूचक और अभिक्रियाएँ – अम्ल पानी में H⁺ आयन देता है और क्षारक OH⁻ आयन। सूचक रंग या गंध बदलकर बताता है कि कौन मौजूद है। H⁺ और OH⁻ मिलकर पानी बनाते हैं और पीछे लवण बच जाता है।
- विद्युत-अपघटन: बिजली से यौगिक को तोड़ना – विद्युत-अपघटन में दिष्ट धारा (DC) से किसी पिघले या घुले आयनिक यौगिक (विद्युत-अपघट्य) को तोड़ा जाता है। धनायन कैथोड (−) पर जाकर इलेक्ट्रॉन लेते हैं (अपचयन)। ऋणायन ऐनोड (+) पर जाकर इलेक्ट्रॉन देते हैं (ऑक्सीकरण)। पिघले यौगिक से धातु और अधातु मिलती है। विलयन में पानी के H⁺ और OH⁻ भी होते हैं: कैथोड पर हाइड्रोजन बनती है जब तक धातु हाइड्रोजन से कम क्रियाशील न हो, और ऐनोड पर ऑक्सीजन बनती है जब तक हैलाइड न हो। ऐलुमिनियम जैसी क्रियाशील धातुएँ विद्युत-अपघटन से निकाली जाती हैं।
9. 5.5 Energy changes
5.5.1 Exothermic and endothermic reactions
- ऊष्माक्षेपी और ऊष्माशोषी अभिक्रियाएँ – हर अभिक्रिया में ऊर्जा संरक्षित रहती है; वह सिर्फ़ रसायनों और परिवेश के बीच आती-जाती है। ऊष्माक्षेपी (exothermic) अभिक्रिया परिवेश को ऊर्जा देती है, तापमान बढ़ता है (जलना, उदासीनीकरण, श्वसन, हैंड वॉर्मर)। ऊष्माशोषी (endothermic) अभिक्रिया ऊर्जा लेती है, तापमान गिरता है (ऊष्मीय वियोजन, सिट्रिक अम्ल + सोडियम हाइड्रोजनकार्बोनेट, प्रकाश-संश्लेषण, कोल्ड पैक)। अभिक्रिया प्रोफ़ाइल अभिकारक, उत्पाद और सक्रियण ऊर्जा दिखाती है। बंध तोड़ने में ऊर्जा लगती है, बनाने में निकलती है। ΔH = तोड़ने की ऊर्जा − बनाने में निकली ऊर्जा; ऋणात्मक हो तो ऊष्माक्षेपी।
10. 6.1 Energy
6.1.1 Energy changes in a system and ways energy is stored · 6.1.2 Conservation and dissipation of energy · 6.1.3 National and global energy resources
- कार्य, ऊर्जा और शक्ति – जब बल किसी वस्तु को खिसकाता है, तब कार्य होता है: W = F × s, मात्रक जूल (J)। ऊर्जा यानी कार्य करने की क्षमता। चलती वस्तु में गतिज ऊर्जा ½mv² होती है, ऊँचाई पर रखी वस्तु में स्थितिज ऊर्जा mgh। ऊर्जा न बनती है न नष्ट होती है, बस एक रूप से दूसरे रूप में बदलती है। शक्ति यानी कार्य कितनी जल्दी हुआ: P = W ÷ t, मात्रक वाट। उत्तोलक और घिरनी जैसी सरल मशीनें कम बल से भारी वस्तु उठाने में मदद करती हैं।
- खनिज तथा ऊर्जा संसाधन – खनिज चट्टानों में मिलने वाले प्राकृतिक पदार्थ हैं। ये धात्विक (लौह या अलौह), अधात्विक या ऊर्जा खनिज होते हैं। ऊर्जा पारंपरिक स्रोतों (कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस, बिजली) और गैर-पारंपरिक स्रोतों (सूर्य, पवन, परमाणु, बायोगैस, ज्वार, भूतापीय) से मिलती है। दोनों का संरक्षण ज़रूरी है।
11. 6.2 Electricity
6.2.1 Current, potential difference and resistance · 6.2.2 Series and parallel circuits · 6.2.3 Domestic uses and safety · 6.2.4 Energy transfers
- ओम का नियम – स्थिर ताप पर किसी चालक में बहने वाली धारा उसके सिरों के विभवांतर के समानुपाती होती है: V = I × R। R प्रतिरोध है, मात्रक ओम (Ω); 1 Ω = 1 V/1 A। ओमीय चालक का V–I ग्राफ मूल बिंदु से गुज़रती सीधी रेखा होता है।
- प्रतिरोधकों का श्रेणीक्रम और पार्श्वक्रम संयोजन – श्रेणीक्रम में प्रतिरोधक एक ही रास्ता बनाते हैं: हर एक में धारा समान, विभवांतर जुड़ते हैं और R_s = R₁ + R₂ + R₃। पार्श्वक्रम में हर प्रतिरोधक की अपनी शाखा होती है: हर एक पर विभवांतर समान, धाराएँ जुड़ती हैं और 1/R_p = 1/R₁ + 1/R₂ + 1/R₃, इसलिए R_p सबसे छोटे प्रतिरोध से भी कम होता है।
- घरेलू विद्युत परिपथ – घर में 220 V, 50 Hz की प्रत्यावर्ती धारा (AC) विद्युन्मय और उदासीन तार से आती है; सभी साधित्र पार्श्व (समांतर) क्रम में 5 A और 15 A के अलग परिपथों पर जुड़े होते हैं, और विद्युन्मय तार में लगा फ्यूज या MCB तथा भूसंपर्क तार घर को सुरक्षित रखते हैं।
- विद्युत शक्ति और विद्युत ऊर्जा – विद्युत शक्ति विद्युत ऊर्जा के उपयोग की दर है: P = VI = I²R = V²/R, मात्रक वाट। ऊर्जा = शक्ति × समय। घर में ऊर्जा किलोवाट-घंटा में मापते हैं: 1 kWh = 1 यूनिट = 3.6 × 10⁶ J। बिल = यूनिट × दर।
12. 6.3 Particle model of matter
6.3.1 Changes of state and the particle model · 6.3.2 Internal energy and energy transfers · 6.3.3 Particle model and pressure
- द्रव्य का कण मॉडल – हर द्रव्य बहुत छोटे कणों से बना है जो हमेशा गति करते रहते हैं। ठोस में कण पास-पास होते हैं और बस काँपते हैं; द्रव में पास होते हुए भी फिसलते हैं; गैस में दूर-दूर होकर हर दिशा में तेज़ भागते हैं। गरम करने पर कणों को ऊर्जा मिलती है: या तो वे तेज़ चलते हैं (तापमान बढ़ता है) या उनके बीच का खिंचाव टूटता है (अवस्था बदलती है, तापमान स्थिर रहता है)। गैस दाब कणों की दीवार से टक्कर से बनता है।
- आंतरिक ऊर्जा (Internal Energy) – हर चीज़ बहुत छोटे कणों से बनी है। कण हिलते-डुलते हैं (गतिज ऊर्जा) और आपस में बलों से बँधे रहते हैं (स्थितिज ऊर्जा)। सब कणों की इन ऊर्जाओं का कुल जोड़ आंतरिक ऊर्जा U है। गर्म करने पर U बढ़ती है: या तो कण तेज़ चलते हैं और तापमान बढ़ता है (Q = mcΔT), या बंधन टूटते हैं और अवस्था बदलती है, तापमान वही रहता है (Q = mL)। रगड़ना या दबाना (कार्य) भी U बढ़ाता है।
- गैस के नियम: दाब, आयतन और ताप का आपसी रिश्ता – गैस का दाब कणों के दीवार से टकराने से बनता है। गैस की तय मात्रा के लिए: बॉयल का नियम P₁V₁ = P₂V₂ (ताप स्थिर); चार्ल्स का नियम V₁/T₁ = V₂/T₂ (दाब स्थिर); दाब (गे-लुसाक) नियम P₁/T₁ = P₂/T₂ (आयतन स्थिर)। ताप हमेशा केल्विन में। संयुक्त नियम: P₁V₁/T₁ = P₂V₂/T₂। डाल्टन: मिश्रण का कुल दाब = आंशिक दाबों का योग; आंशिक दाब = मोल अंश × कुल दाब।
13. 6.4 Atomic structure
6.4.1 Atoms and isotopes · 6.4.2 Atoms and nuclear radiation
- परमाणु की संरचना – परमाणु के बीच में एक बहुत छोटा, भारी और धनावेशित नाभिक होता है, जिसमें प्रोटॉन और न्यूट्रॉन रहते हैं। इलेक्ट्रॉन इसके चारों ओर तय कोशों K, L, M, N में घूमते हैं। प्रोटॉन की संख्या (Z) से तत्व तय होता है; प्रोटॉन + न्यूट्रॉन = द्रव्यमान संख्या (A)। बाहरी इलेक्ट्रॉन संयोजकता तय करते हैं।
- रेडियोधर्मिता: अल्फ़ा, बीटा, गामा और अर्ध-आयु – कुछ परमाणुओं के नाभिक अस्थायी होते हैं। वे स्थायी बनने के लिए अपने आप, यादृच्छिक ढंग से विकिरण छोड़ते हैं। इसे रेडियोधर्मी क्षय कहते हैं। अल्फ़ा (2 प्रोटॉन + 2 न्यूट्रॉन), बीटा (तेज़ इलेक्ट्रॉन) और गामा (ऊर्जा की तरंग) मुख्य तीन प्रकार हैं। अर्ध-आयु वह समय है जिसमें आधे अस्थायी नाभिक क्षय हो जाते हैं।